जगन्नाथ पुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएं || Jagannath Puri Yatra || 21.01.2018

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Chapters
मारमोक। जैसे की भागवत गीता में भगवान कहते हैं जीव की 1 तपस्या है भगवान के नामों का उच्चालन करना, कृष्ण कथा की चर्चा करना, जीव की 1 और तपस्या है सत्य का चालन करना हमें आदत है। झूठ बोल देगी तो सत्य बोला ये भी तपस्या है, हमें आदत है बहुत 1 प्रजल्प की। तो तपस्या क्या है बहुत की क्या करो का 4 कल रात महरी राज ठाकुर की चर्चा कर रहे थे जिस में आप ने सुना कि दिन रात वो जॉब करते थे और कभी थके नहीं, कई बार बहुत बाली पूछते तुम लोग 1 ही नाम का उच्चारण करते हो, दिन रात थकते नहीं हो, नहीं थकते क्योंकि भगवान के नाम अब बैन है और भगवान अपने नामों में पूरी शती दाली। तो ये 1 तपस्या है जीव के द्वारा सत्य का उच्चारन करो और कृष्ण कथा की चर्चा करो। भगवान के नामों का उचालनकरोमन की। तपस्या क्या है? मन की, तपस्या की, भगवान के नीलाम का चिंतन करो, भगवान के उपदेश का चिंतन करो। तो गीता में प्राप्त होता है। शरीर की तपस्या क्या है? शरीर के द्वारा ब्राउन की सेवा करो, भगवान की सेवा करो। तो भगवान इश्ुदेवकहरेहैं तपस्या का पालन करो भगवान की खुशी के लिए, भगवत प्राप्ति के लिए और आप पूछना चाहोगे आज हम तपस्या करेंगे। तो इसके बदले में हमें क्या मिलेगा? कुछ मिलना चाहिए या नहीं? मिलना चाहिए? हाँ मिलना चाहिए, मिलना चाहिए या नहीं? आध्यात्मिक सुख आपको, आध्यात्मिक, आनंद प्राप्त होगा। जो की केवल बढ़ता जाएगा, वैसे हम भक्ति में जुड़ते हैं। इस इच्छा देने की बहुत सुविधा प्राप्त हो। पर अगर आपकी इच्छा यह है कि आपको असली सुख प्राप्त हो, यह भाव ठीक है तो बौधिक समाज में आपको नकली सुख प्राप्त हो। रा है। रिश देव। भगवान ने बेटे के माध्यम से हम सब को क्या देश दिया कि यह मनुष्य जीवन का पशुओं के समान उपयोग मत करो। पशु जो हैं तो से रात तक व्यस्त रहते हैं। उन्होंने कहा कि जो भक्ति के प्रतिकूल है, उसे या तो आज के लोक में क्या कह रहे हैं, कह रहे हैं जो व्यक्ति ये सोचें क्या द्वारा सुख मिलेगा वो व्यक्ति मुर्ख है। प्रवता, प्रवता का अर्थ है पागल, वो व्यक्ति पागल है, मुर्ख है। क्यों, आप भी क्यों तुम हमें मुर्ख बुलाने हो? क्यों कि वो पागल है। तो समझाते हैं, कहते हैं आज देते प्राप्त हुआ है। वो क्या दे रहा है? आपको कास्ट सच, ये झूठ कष्टी कष्ट दे रहा है? आज आपको प्राप्त हुए गीत से भगवान करते हैं, खाना है मशाला, दुखी, दुख और हर चीज स्थाई। तो आज देह प्राप्त हुआ है, वो आपको कष्ट ही दे रहा है और आप इन कार्यो में जुड़ोगे तो फिर से आपको 1 भी प्राप्त होगा। जो कष्ट कष्ट देगा। तो जो व्यक्ति यह सोचता है भौतिक हित द्वारा सुख में लगा, वो क्या है रमता पागल, मूर्ख व्यक्ति है। तो हम देख सकते हैं कि चाहे आप कितनी भी सफलता प्राप्त कर लो, भौतिक समाज में आपके अपने आप को कष्टों से बचा सकते हो। 7 प्रकार के कष्टों से बचा सकते हो, नहीं बचा सकते। चाहे आप डिक्टेटर बन जाओ, प्रधान मंत्री बन जाओ। आप अपने आप को कष्टों से नहीं बचा सके। जैसे हमारे चारों ने कहा है, यह बौद्धिक संसार 1 जेल खाना है। और यह बौद्धिक देर में क्यों प्राप्त हुआ है? कृष्ण बारबू मायाके। जब हमारे मन में यह भाव उत्पन्न होता है कि हम बौधिक सुख प्राप्त करें, तो हमें इस भौतिक जगत में आना पड़ता है, जहां की हम हम क्या अनुभव करते, कष्ट कर। दूसरे शब्दों में, इस लोक के द्वारा भगवान विष्णु देव हमें क्या कहते हैं? जो व्यक्ति के विपरित कार्य करता है, वो केवल मूर्ख है। तो इन इंडिया का हमें उपयोग करना चाहिए। अच्छे कार्यों में, उदाहरण के लिए, नेत्र हैं। नेत्रों से। आप गंदी तस्वीरें देख सकते हो या भगवान के विगरा का दर्शन प्राप्त कर सकते हो। महाराज अम्बरीश राजा थे और उन्होंने हमें उदाहरण दिया है। किस प्रकार आप अपने अनेक इंदियों का उपयोग कर सकते हो? भगवान की सेवा में, बौधिक समाज में हम नेत्र का उपयोग करते हैं। गनी तस्वीरें वगैरा देखने के लिए अम्मा का उपयोग करते थे। भगवान का देखने के लिए। मेरे ख्याल से आप में कई भक्तों के पास स्मार्टफोन भी है, है स्मार्टफोन कितने भक्तों के पास स्मार्टफ़ोन लगभग सब के बाद। और जो भगत है, अपने स्मार्टफोन में, भगवान की तस्वीर को बिठाते हैं, भगत हैं, अपने स्मार्टफोन में, क्या बिठाते हैं? गन्दी तस्वीरें, जो भगत है, स्मार्ट में, गीता प्रॉपर के ग्रंथों को बिठाते हैं, जो भगत है, भौतिक विषयों के खाते हैं। तो भक्तों का भाव रहता है। हर सुविधा का उपयोग करो। अध्यात्मिक कार्य के लिए ने नेत्रों का उपयोग किया, भगवान के दर्शन प्राप्त करने के लिए पर का उपयोग किया, किसलिए भगवान के मंदर चलके जाने ले, हाथों का उपयोग किया, भगवान के मंदिर को साफ करने के लिए जीव का उपयोग किया, किसलिए भगवान के नामों का उच्चारण और और कृष्ण प्रसाद। तो इस प्रकार हमें हाँ मगर, हम इंडिया का उपयोग करें हम भगवान की सेवा में। तो फिर आप असीसंदषोगेअगरहम चाह से विपरित कार्य करते हैं, तो उसका परिणाम भी हमें करना पड़ता है। क्या परिणाम होगा? फिर से? 1 भौतिक थे, चाहे धनी खानदान में हो या गरीब खानदान में, कष्टों से कोई अपने आप को बचा नहीं सकता। तो भगवान विष्णु देव। इस अध्याय में अनेक श्लोकों के द्वारा हमें यही उपदेश्य देते हैं। और आप भागवत के 18 हजार शो को पढ़ो देखोगे कि संदेश हमको बार बार दिया जा रहा है। इसलिए कहा गया है कि श्रीमान भागवत का ज्ञान है। ये भागवत तुम को नियमित रूप से रोज, नास्ता परेश रेशो, नित्यम भागवत से भागवत युद्ध बाकी, भावित सविता को स्वामी कहते हैं। अगर आप ध्यान से भगवत सुने तो हृदय की जो महल हैं, ये दूर हो जाएगी और दीर्ध होकर अब भगवान की सेवा में जुड़ सकोगे। इसलिए इस केंद्र में रोज सुबह भगवत का अध्ययन किया जाता है। क्योंकि अगर हम सुनेंगे पढ़ेंगे तो ध्यान, भाव, हवाना पड़ेगा। तो रिशदेवभगवान ये उपदेश दे रहे हैं। और तातपरेकीसमाप्ति में पापा जी क्या कह रहे हैं। व्यक्ति अपने जीवन को सफल बना सकता है। साधु संघ के माध्यम से। जैसे की आपने कुछ समय पहले सर व बरजाया और का ड्रामा ने कहा, कल हमने आपको उदाहरण दिया था शिवानंद सेन का शिवनंदन किस प्रकार 1 पशु का उद्धार किया तो सर वो मर चाय बहुत ही प्रसिद्ध मायावदी विद्वान थे। चेतन प्रकट हुए थे पृथ्वी पर पतितों का उद्धार करने के लिए, जैसे नरेदरनदाजठाकुर कहते हैं पति परवान हेतू आप प्रकट हुए हो, पति लोग को उधार दे ले। वहाँ प्रभु सन्यास लेकर जा रहे थे तेजी के साथ जगराज का दर्शन लेने के लिए। कल रात को, आप सब भी थे जगनाजीका दर्शन लेने थे। और जगनाथ जी का दर्शन लेते ही जगह जगह जगह जगह जगह कहते कहते भक्ति भाव में भी होश हो गए। पूजा ने द्वार बंद करना था भोग लगाने के लिए, तो उसने अपने सेवकों का, उसे पता नहीं था ये खूबसूरत से नियाजी कौन है। वहाँ पर बड़े खुबसूरत लम्बे थे। उसने देखा यह व्यक्ति भोज पड़ा है उमीदवार बंद करना। भूख लगाने में। वो कह रहा था अपने सेवकों से इसे उठाओ भर करो। पर सरोवर चाया जान गए। कोई साधारण सन्यासी नहीं है। तो बड़े आदर के साथ उन्हें ले गए अपने घर में जो कुल में है, और वहाँ पर वहाँ भक्ति भाव में बेहोश। जब उनके साथ ही नीतिनंदइत्यआदि आये, उन्होंने सुना कि मंदर में चर्चा हो रही थी। 1 सन्यासी खुबसूरत सन्यासी आया। भगवान जगना को देखते ही बेहोश हो गया, उठ गए है हाँ सर वो बढ़ जाएगा। बुक दाता सारे साल थी, वहाँ पहुँचे है, नाम किया मरे नाम करते ही भगवान पूरे होश में आ गए। नाच लगे खुशी में 10 चाया बड़ा प्रभावित था। भा प्रभु को देखकर और ये स्वीकार नहीं कर रहा था ये स्वयं भगवान है। उनके रिश्तेदार थे गोपीनादाचायय, जिनके मन में कोई शंका नहीं थी की परम भगवान है कौन के भगवान हैं और प्रकट हुए भक्त के रूप में हमें यह शिक्षा देने के लिए किस प्रकार में भक्ति का पालन किया जाता है। और गोपलाचायानेका बोला स्वयं भगवान और सयम ये मादा की प्रसिद्ध सन्यासी है। और भगवान नहीं हो सकता। तो चाय ने कहा इतना सन्यासी है क माया इसको विचलित कर ले। 24 साल की आयु थी, जवान थे वहाँ पर, उन्हें तो हमें उपदेश दिया है नम्रता का भाव रखो। जब माँ माँ को वो थे। 1 समय उनकी चर्चा हो रही थी केशव कश्मीरी के साथ और केशर कश्मीरी अपने आप को बड़ा संसद का विद्वान मानता था। और पर महा प्रभु में विनम्रता का भाव था। जब केशर कश्मीरी मिले निमाई से, तो उन्होंने कहा कि तुम ही हो वो प्रसिद पंडित जिसकी इतनी प्रशंसा मैंने सुना है। माय पंद ने कहा मैं तो 1 पंक्ति भी ठीक नहीं देख सकता। और फिर कैश किश्मिरीनेसौअंछ लोगों की का उचारण किया। गंगा की प्रशंसा करते हुए। निमाइनेन कमजोरिय निमाई के विद्यार्थी थे। वह हंसने लगे जब उन्होंने देखा कि केश कश्मीरी इन कमियों का उत्तर नहीं दे पाये, निमाइनेन रोक दिया। कहा आज वो थके हुए हैं। कल जवाब देंगे निमाइ शुरू से विनम्रता का उपदेश दिया। अपने आश्रम में ये भाव पकड़ किया, तो सर ने कहा, बड़ा सूरत सन्यासी है, इसकी सुरक्षा के लिए। मैं इसे विधान सूत्र का उपदेश देना चाहता हूँ। और 7 दिन के लिए दिन रात। उन्होंने मैदान श्रोता का उचारण किया। दिमानी चुपचाप सुन रहे थे, अक्सर, हम तो 2 मिनट भी चुप रह सकते। 7 दिन के लिए। कमाई ने कुछ भी नहीं पूछा। आठवे दिन सरवोमुलचायने क्या कहा? तुम्हें समझ आ रहा है, मैं क्या कह रहा हूँ, कोई प्रश्न नहीं पूछा। तुमने? माया ने कहा, विधान संदेश तो सूर्य के प्रकाश जैसे बिल्कुल क्लियर है, पर आपका जो संदेश है। और फिर आगे चर्चा हुई आत्माराम स्लो के ऊपर। जब केश सर्व चाया ने सुना माय की व्याख्या, तो वो उस प्रभावित हो गए, समझ गए। ये केवल 11 केवल भगवान कर सकते हैं, कोई साधारण नहीं। और उनके माँ प्रभु ने अपने प्रचार से 1 बड़े प्रसिद्ध मायावादी को उत्तम कोटी का भक्त बना दिया। माँ प्रभु वरणासी में थे, वहाँ परबुबनासीमें थे। और उनके भक्तों ने कहा कि यहाँ मायावनी सन्यासी सभा चल रही थी, प्रकाश होती और ये निंदा कर रही है। आपके देखो, ये क्या पागल जैसी नाचतागाता है हमारे साथ विधान का अध्ययन करना। तो छनजशेखरऔपरमसा के कहने पर महा प्रभु उस सभा में पहुँचे। या मायावादी सन्यासियों की सभा चल रही थी। प्रकाश नंदन साजवादी निर्देश में। और निमाई वहाँ पहुँचे। वो उन्हे बड़े विनम्र के साथ बैठे, जहां के लोग पाव ोते हैं। मंदिर में प्रवेश करने से पहले। और उन्होंने अपने दिव्य लीला प्रकट प्रकट किए। उनके चेहरे से इतनी रोशनी प्रकट हो रही थी, जैसे कि हजारों सूर्यों की रोशनी और माँ बबू से। जब उन्होंने पूछा, तुम इतने बड़े विद्वान हो, हमारे साथ बैठ कर विधान दशतक अध्ययन क्यों नहीं करते? माया ने कहा। मेरे गुरु ने देखा कि मैं मूर्ख हूँ काकी तुम केवल हरी नाम के हो। और अपने उद्देश्य से 10 हजार सन्यासी वा थे। सभा में, सबको क्या कर दिया, वन बना दे। इसी प्रकार महा प्रभु दक्षिण भारत की यात्रा में गए थे। दूर दूर से लोग आ रहे थे उनका दर्शन देने के लिए। और लोग देखते थे। महाप्रभु के भक्तों का क न सुनते थे। उन्हें देख कर वो भी प्रभावित हो रहे थे, हो गये और सबने जॉब करना शुरू कर दिया। और जब कोई व्यक्ति अपने गाँव में लौटता था, अपने सा मैं उसे देखकर। दूसरे व्यक्ति भी हरी नाम का उच्चारण करते थे। जैसे कई बार आप देखते हो, 1 बीमारी 1 व्यक्ति से आरम्भ होती है और समाज में सबको बीमार कर देती है, उसी प्रकार साधु संघ के माध्यम से आध्यातिक जागृति उत्पन्न हो सकती है। वहाँ लोगों ने दक्षिण भारत की यात्रा में सबको वैष्णव बना दिया। पूरा भारत वैश्नव बन गया है। तो साधु संगत की आवश्यकता है। अगर हम अध्यातिक बना चाहते हैं। देखिये, प्राबाजी पश्चिम देशों में गए, लगभग 70 साल की आयु में और सारे विश्व में प्रचार करके भक्तों को संग देकर। सबको जोड़ा किसमें कृष्ण बाबा जी गए थे। रशिया जैसे देश में नाइनटीन सेवेंटी वन में 5 दिन के लिए, 5 दिन की यात्रा में उन्होंने ए ग्रेशियन भक्त को दीक्षा। दी शिक्षा दी, कैसे प्रचार करना चाहिए। उसने प्रचार शुरू किया। से से हजारों भक्त बन गए। ये है साधु संघ का प्रभा। इसलिए इस श्लोक के तातमनीमेंप्रभाजी कह रहे हैं कि व्यक्ति अपने जीवन को सफर बना सकता है। भक्तों की संगत हम साधु संगत द्वारा भक्ति में जुड़ते हैं और आगे बढ़ते है। इसलिए कहा गया है साधु संग, साधु संग, संग लावा, मात्र, साधु संगत से लावा मात्र 1 सेकेंड के चौथे हिस्से के लिए भी संगत मिले। आपका जीवन सफल सफर। तो महाप्रभु की अनेक लीलाएं हैं। कल? हमने कहा था आपको किया हूँ महा प्रभू की पूरी गिरीलाओंकासीमें वर्णन करेंगे लीला तो यही थी की कैसे उन्होंने चाय का सर्व चाया के 1 बेटी थी, जिसके पति का नाम क्या था। हाँ, मोगा मोगा के हृदय में थोड़ा सा गलत भाव था। वहाँ प्रभु के विषय में वहाँ पर मुझे यात्रा करते थे। अनेक गिया सब भक्त ने निमंत्रण देते थे। और गया सभा कहते दे आइए आइए 10 दिन खाना प्रसाद, हमारे घर में माँ नहीं, 3 दिन, 4 दिन। इसी प्रकार सर वो बड़े चाइन ने निमंत्रन दिया था। वहाँ पर उसने स्वीकार किया कि 5 दिन के लिए आपके घर में खाऊंगा सर वो चाय की पत्नी 1 घंटे में 70 सी चीजों को बनाने लिए आप माता बना सकती है। 1 घंटे में 70 सी प्रकार की मिठाइयां सब्जी माइक्रो वे में नहीं बना सकते। आप सो मोगा के हृदय में एशिया का भाव था। वहाँ पर वो बड़े ध्यान से खोजता रहता था। क्या कमी है, कोई कमी को ढूंढना प्रयास करता था, चाय खड़ा रहता था डंडा लेकर कि वो अपने दमाद को अंदर आने नहीं देता था। भक्त प्रेम से महाप्रभो को बड़ा भंडारा अरपन करते थे। माँ प्रभु इतने ऊँचे कुटी के सन्यासी थे कि वो बिल्कुल थोड़ा ग्रहण करते थे। सन्यासी के विषय में महा प्रभु ने कहा सन्यासी का जो है बिल्कुल शास्त्र पर आधारित होना चाहिए। माँ प्रभु ने उदाहरण दिया। 1 सफेद चादर में 1 काला दाग हो तो दूर से भी दिख जाएगा। सच बात है। इस साल के जल में कमियां नहीं होनी चाहिए। तो 1 दिन सर चाय को जाना पड़ा। पत्नी का सहयोग देने के लए मोगा ने आकर अंदर देख लिया। इतना बड़ा मनारा कहने लगे देखो सन्यास ले लिया है, खाते से भी ज्यादा और इसका क्या परिणाम हुआ सब हो जाए। हे उनको घर से भगा दिया और उसको बड़ी गहरी बीमारी हो रही कोल राकी गोपीलचायाजिमी सूचना मिली हो गा के में बहुत बीमार है। वहाँ पर हो गए। उनके हृदय में हाथ कर कहने लगे जब तक तुम्हारे हृदय में एशिया देश रहेगा, भगवान नहीं रहेंगे। और क्या परिणाम हुआ। उसके हृदय में पछतावा का भाव उत्पन हुआ। माँ प्रमुख हो गए और फिर भाग्य बन गए। तो इस प्रकार माँ बहू ने कईयों का उदाहरण किया ने माँ बहु 1 राजा थे जिनका नाम था राज पद बड़े धार्मिक राजा थे। रथयात्रा आरंभ होने से पहले पूरे रास्ते को साफ करते थे, गुलाब के पानी से धोते थे। वह। आज पूजा की इच्छा थी कि महाप्रभु का दर्शन पा। माँ प्रभु ने कहा मैं तो सन्यासी हूँ, मैं उनकी संगत नहीं रख सकता। जो कि स्रियों से, धन से संबंध रखना पड़ता है। असल में महा प्रभु उनके उनके उत्साह बढ़ा रहे थे। और राजा ने संदेश भेजा राम राय के द्वारा कि मुझे दर्शन चाहिए। मारा माँ बुला नहीं। फिर अंत में अपना कुछ कोई वस्त्र जो पैना था, वो भेज दे। उस राजा को कोई राजा इस वस्त्र की पूजा करने लगा जैसे महा प्रभु की पूजा की जाय। जिसके पश्चात वहाँ प्रभु, उनके बेटे और उनके बेटे का बेटा रूप भगवान कृष्ण जैसे था। और माँ प्रभु से गले लगाया। जब उसके पिता ने उसे गले लगाया, वो ही भगवत प्रेम प्राप्त हो। तो महा प्रभु इनकार करते गये। जब महाप्रभु ने देखा की रथ यात्रा के आरंभ होने से पहले ये राजा होते हुए बड़े बड़े साधारण सेवा कर है, झाडू देना, सड़क को साफ करना किसका काम होता है। भंगी का ना वो भंगी का काम कर रहे थे। माँ बहू बड़े प्रसन्न है। और माँ बहू ने राजा को खास। महा प्रभु हर किरतनमण्नी के साथ, हर रत के साथ आज किरतनमणनियो को जोड़ते थे। और मा प्रभु ने अपना विस्तार किया था। और वो सब किर्तन में 1 साथ उपस्थित थे। हर किरतरमनलीसोीथी हमारा क्या से भाग गया। भा प्रभु हमारे किरतलमणदी में है और ये दव्यदर्शनभारप्रभु 8 के 8 किरतलमंडियोमें है। केवल चुने हुए भक्तो को मिला। इनमें 1 थे, 1 थे। कौन, कौन, कौन थे। महा महा महा प्रभु बोले प्रसन्न हो गये थे। ये देखकर राजा का विनम्र भाव जब हम सेवा में जुड़ते हैं, हमारे मन में ये भाव नहीं होना चाहिए। हमें तो कोई साप की सेवा चाहिए, हमारे मन में यह भाव होना चाहिए। कुछ सेवा भी मिलेगी तो हम खुशी से निभाएंगे माँ प्रबु। क्यों खुश हो, ना राजा होते हुए सेवा कर रहा है। इसलिए महा प्रभु ने कहा है हमारे मन में क्या भाव होना। साब की सेवा या तुझ सेवा। आप जवाब नहीं दे रहे हैं। तुझ सेवा से भी भगवान को आँखे के गुंडीचा के मर गये। सब गए सुबह आप लोग, उनके भग मिलकर गुंडिचा के मंदिर को साफ किया। कई भक्त जुड़े थे। दूर दूर से पानी लाया जा रहा था लोटो में और महान भक्त गुंडीचा मंदिर को साफ कर रहे थे। वह पब, खुद, ब्रश लेकर छत, दीवार, फर्श सबको साफ कर रहे थे। खुद और सारे भक्त मंदिर की सफाई में जुड़े थे। महा प्रभु सारे भक्तों के पास जाकर देख रहे थे किसने कितनी, कितनी मैल इखट्टा की है। और अगर किसी ने कब मैल खट्टा की थी, क्या करते थे, क्या करते थे। जो ज्यादा सफल थे, उन्हें कहते थे इसे बताओ और अच्छी तरह सेवा। कैसे की जाए। और सारे भक्त सेवा कर रहे थे। सफाई की मैल निकले थे, धो रहे थे और साथ में क्या कर रहे थे। हरे कृष्ण मानता का उचा, हरे कृष्ण बंदर को जान साल में सफाई कर रहे थे। और 1 दूसरे से कोई चर्चा नहीं, अगर पानी चाहिए होता था तो इशारा करते थे, किसी चीज की आवश्यकता थी तो इशारा करते थे और सारे भगत जुड़े थे। क्या किस कार्य में, मंदिर की सफाई में, तो भक्ति सिधांत ठाकुर। हमारे परमगुरु कहते है की जब आप मंदिर में सफाई करते हो, अपने दिल की सफाई कर रहे हैं। हम जो सेवा में जुड़ते हैं, जैसे जब आप हाई नाम करते हो और तो वह नाम के उच्चारण से अपने हृदय को शुद्ध बना रहे हो। शासक कृष्ण कथा सुनते हो, हृदय की मैल को दूर करते हो। जब आप सेवा करते हो तो सेवा से क्या कर रहे हो? क्या कर रहे हो? हृदय की मैल को दूर कर रहे हो? बाबा जी कहते थे आध्यात्मिक उन्नति के लिए हमें 2 चीजों की आवश्यकता है। 1 है दवाई, 10 पढ़े माना आपको कोई बीमारी हो जाए तो इस बीमारी का इलाज करने के लिए आपको क्या चाहिए? कौन बताएगा है दवाई और परेश? तुम्हारी दवाई क्या है हरे कृष्ण प्रेज है सेवा, दोनों के दोनों करोगे तो इलाज जल्दी होगा, है कि नहीं? केवल दवाई लोगे और प्रेज नहीं करोगे तो इलाज होगा, नहीं होगा दोनों की आवश्यकता और पापा जी ने इस विषय पर कहा है कि भक्ति में उन्नति करने के लिए हमें है। नाम तो करना है, शासन अध्यन करना है, साथ में सेवा भी करना है, सेवा भी करोगे। विर भक्ति में आगे बोलोगे और अपराधों से बचना है के तेरे महाप्रभु के गुरु का नाम था ईश्वरपुरी, ईश्वरपुरी के गुरु का नाम क्या था, ईश्वरपुरी के गुरु भाई थे, जिनका नाम था रामपुर। वो भी आपके पूरी धा में निवास करते थे। और जब कोई सन्यासी पूरी धाम में प्रवेश करता था, रामचन्द्र पुरी जगनाथ प्रसाद का बड़ा प्लेट उठाकर ले जाते थे। और जब सन्यासी कहते थे हम सब सन्यासी हैं, इतना नहीं खाना चाहिए। थोडा ही दीजिये। अरे जंगाजीकामहाप्रसाद इनकार कर रहे हो। अपराध है सन्यासी खाले दे दे। और जब खा ले देते तो क्या कह दे दे देखो। त्यागी बन रहे हैं दुनिया की नजरों में, और खाते हैं कयास से भी ज्यादा तू ने बड़ा आनंद आता था भक्तों की निंदा करने में, कई को आनंद आता है, कई लोग, कई भाग दूसरों की कमियों को ही ढूंढते रहते हैं। उसमें क्या कमी है, उसमें क्या कमी है। और कई भक्तों के गुनों में को देखे। बाबा जी कहते थे गुणों को देखो आप गुनों की वजह तो 1 दिन रांजयनपुलपुरी आये, भाई प्रभु, 1 दिन रामचंद्र पुरी आ महाप्रभु कमरे में और मन ने देखा लकड़ी का फर्श था, चीटियाँ चल रही थी तो उन्होने सोचा ये समाजी मीठा खाया आयेगा, इस कारण इतनी चिट्टियां है। फोर्स में तो चीटियां थी गर्मी के कारण, गर्मी का मौसम था। तो चीटियों को भी गर्मी लगती है। तो वो ऊपर आ गई था। तो भा प्रभु ने अपना खाना बिल्कुल कम कर दिया, उनके भक्तों को पसंद नहीं आया और रामचंद्र पूरी की आदत थी भक्तों की कमियों को ढूंढना और क्या भक्तों की कमियों को ढूंढना। क्या परिणाम हुआ की वो महाप्रभु की निंदा भी करने लगे, जो स्वयं भगवान थे, अपने गुरु माधव पुरी के साथ बैठे थे। बाद पुरी बहुत ही ऊँची कोडी के भक्त थे, दिन रात है, नाम का उच्चारण करते थे, कभी किसी से कुछ मांग न थे, अगर किसी ने कुछ दे दिया तो खाते थे तो भूखा रहते थे। तो बड़े विनम्र भाव से अपने अंतिम दिनों में भाव के मेरा जीवन व्यस्त बेकार हो गया। भगवत प्रेम मैंने प्राप्त नहीं किया। तो रामचंद्र पूरी मुल्क उनके विलंब विलम्बन भाव को समझ नहीं पाया, कहने लगा अरे ब्रह्माण का चिंतन करो। इस प्रकार कहने का क्या लाभ, आंदोलन के गुरु इतने दुखी थे। उन्होंने कहा मेरी नजरों से दूर हो जाओ। तुम्हें देखते हुए शरीर को तिहागूंगा जीवन व्यस्त माना जाएगा। तो ये है अपराधों का परिणाम। जैसे कैंसर होता है, न कैंसर, कैंसर, कैंसर पह करनहीं, कैंसर 1 साल से शुरू होता है, फिर हस्ते हस्ते फैल जाता है। तो इसी प्रकार यह निंदा चुगली एशिया द्वेश का भाव शुरू होता है। साधारण भक्तों से असेस ऊपर तक पहुँच जाता है। इससे हमें इससे बचना चाहिए। और ये रामचंद्रपुर के गुरु भाई थे, जिनका नाम था इश्वरपुरी, जो कि चेतीरेमहाप्रभुजी के गुरु थे। तो ईश्वरपुरी का क्या भाव था बड़े विन्मता के साथ सेवा करना गुरु की। उनके मन शाम को भी उठा साफ करते थे। और बड़े विनम्र भाव से सेवा। तो बाल पूरी इतने प्रसन्न थे। उन्होंने ईश्वरपुरी को तो वर दिया तुम सारे विश्व में भगवत प्रेम का प्रचार करो। जो की उन्होंने किया किस के माध्यम से, किसके माध्यम से, प्रपात के माध्यम से दूर हो जाओ। हमें वैष्ण अपराध से बचना चाहिए। चाय महा विष्णु के अवतार हैं। सच्ची माता के मन में थोड़ा बहुत भाव रहता था, मेरे बड़े बेटे ने घर छोड़ दिया है। छोटे बेटे ने भी सन्यास ले लिया। ये अद्वेता चाय की शीताली है, देखते है, पर है। देता उनके मन में थोड़ा क्रोध था, वहाँ बाबू तो बड़े दयालु थे, पतितों उधार होने के लिए प्रकट हुए थे। तो भग कहते थे आप सब पर दया बरस रहे हो। अभी माता पर दया क्यों नहीं? माता ने अपराध किया है। क्या था उनका अपराध? क्या था भा? और जो देता को कहा जाता था। महा प्रबु ने कहा की उनकी माँ का गल भाव साहबके प्रति अदविता चाया कहते थे। यह कैसे सम्भव है? वो तो भगवान की माँ है, यह सम्भव नहीं हो सकता। तो इस प्रकार से महा प्रभु ने माता को वर नहीं दिया था। पर 1 दिन जब उन्होंने देखा कि देता प्रणाम कर रहे हैं, माता ने पीछे से आकर अलवेला के चरणों की धूल लेकर माथे को छू दिया है। माँ को बड़े प्रसन्न हुए का अ में माता को भगवत प्रेम प्राप्त होगा। हमें भक्ति के मार्ग में अपराधों से बचना है। वैसे तो 10 नाम अपराधों का उच्चारण हम रोज करते हैं और हम घर में भी अगर रहते हैं। हमें अपराधों का उचारण रोज करना चाहिए। जितने ध्यान से अपराधों से बचोगे, उन्हें तेजी के साथ भक्ति में आगे बलपर होगे। मा प्रभु के भक्त परेशान लेकर आते थे महाप्रभु के लिए, गोविंदा उनके सैक्टरी थे। जैसे मैंने कहा कल रात को गोविंद और माँ ने कहा था कि अब मैं नहीं कुछ खाऊंगा मा को खिला दे। फिर वो पूछते थे माँ पब को खिलाया हमारा प्रसाद मैंने बनाया था, झूठ बोल दे हाँ माँ को मैंने खाया आपके भाग दूर दूर से आ रहे है। है पूछतेहै खाया मैं कहता हूँ खाया अच्छा लगा हूँ आप लोगो को बहुत अच्छा लगा प्रसाद प्रसाद की सौ भक्तों को मैं खिला सकता हूँ क्या सारा प्रसाद ला सौ भक्त को प्रसाद खुद खा महा स्वयं भगवान हैं। आप के पुरी धाम में अनेक लीला प्रकट की। आप के पुरी धाम में बक्सी सिधांत सरवादी ठाकुर भी प्रकट हुए थे। और आप जानते हो कि जब बक्सी सिधांत प्रकट हुए थे तो उनके पिता बाख्तिन ठाकुर उस समय बड़े प्रसिद मैजिक थे जगनादपुरी मंदर के और उनके शासन में कई कमियां जो थी जगनपुरी मंदल में उन्होंने सुधार दी थी। तो जरुरत रुका था उनके घर के सामने, तो भक्त साल उनकी माँ का नाम था भगवती देवी। भागवती देवी ने उनके बेटे को भगवान जगना जी के चरणों में रखा और 1 हार जंग्नाजीका उनके गले पर गिर गया वे हार गिरा उनके गले में भगवती भक्ति और ठाकुर ने इसे बोला शुभ लक्षण के रूप में स्वीकार किया और आप से जानते हो की 1936 में बाबा जी ने पद पर लिखा था भक्ती सिधांत जी को। बाबाजी ने कहा कि आपके इतने सन्यासी शिष्य हैं जो आपकी इतनी सेवा कर रहे हैं। मैं आपकी इतनी सेवा नहीं कर पाया, मुझे आदेश दीजिये क्या करना चाहिए। मुझे बकतीसिरांतजीउुस समय पूरी धाम में थे। उन्होंने पूरी धाम में अपने शरीर को त्यागा और पूरी धाम से उन्होंने ब्रापाजी को बड़ा पर पत्र डाला जिसमें उन्होंने कहा तुम पढ़े लिखे युवक हो, अच्छी अंग्रेजी भाषा जानते हो, ले जाओ छे। तिरे भा प्रभु के स देश को कहाँ कहाँ पश्चिम देशो में वो जो ये आदेश बी सिधा दिया था कब 1922 में और फिर तो ये पदसे भक्ति सिनाद जी ने उन्होंने लिखा था कहां से पूरी धाम से व, पूरी धाम पुरुषोतम धाम, नीलाचल धाम बड़ा शुभ स्थान है। और जैसे कल मैंने कहा था शास्त्र में लिखा है जो व्यक्ति इस धाम में आये, यह माना जाता है कि वह सब धामों की यात्रा जरूरी, तो ये शोटकट है सब धामों की यात्रा करने की वजह और पूरी धा में आओ यात्रा करो और जगराज का दर्शन लो। पूरी धाम के यात्रा में आकर ये भाव होना चाहिए। हमने महाप्रभु जी की लीला में रूचि लेनी है, उनके शिक्षा में रूचि लेनी है। तो पूरी धाम में अनेक दिलाएं बीती थी। कल शाम को हम हरीराज ठाकुर की चर्चा कर रहे थे। 1 समय अलवेदाछायाने अपने पिता की शाद सुरबने के लिए हरदा ठाकुर को बुलाया भोजन हरिदास ने कहा आप मुझे बुला रहे हो इस कार्य के लिए अपना नाम खराब करोगे। मैं तो बड़े नीच खानदान में मैंने जन्म लिया था। और आप ग्रामीणो की वजह मुझे भोजन खिला रहे हो। चाय क्या का आपको भोजन खिलाना हजारों। ग्रामीणों को भोजन खिलाने से ज्यादा बेहतर है मतलब कि जो व्यक्ति भगवान का भक्त बन जाए, वो है असली ब्राहमण। और जब हरी लाल ठाकुर अ प्रकट हुए थे तो चेत्र महाप्रभु ने उनके देह को लेकर इस सागर में स्नान करवाया। उसके पश्चात उन्होंने बड़ा भंडार लग गया। ये जो सागर का क्या नाम है, बोल रही थी सागर का जल। इसलिए हम पवित्र मानते हैं। सागर में महाप्रभु भी खुद आते थे स्नान करने के लिए। और महा प्रभु ने हर राज ठाकुर के शरीर को लेकर यहाँ उनको स्नान कराया। इसके पश्चात महाप्रभु ने बहुत बड़ा भंडारा का प्रबंध किया, खुद लोगों से भी मांगी और बहुत बड़ा भंडारा किया। तो पुरी धाम में भगवान के भक्तों की अनेक लीलाएं बीती है। और चेतिनचरतमीता और केत भगवत और चेतन मंगल के द्वारा भगवान की अनेक लीलाओं का ज्ञान प्राप्त हो। सकत भौतिक समाज में। हम फिल्मी, कलाकर की लीला में रूचि लेते हैं, लीला में रूचि लेते हैं, स्पोर्ट्स मैन की लीला में रूचि लेते हैं। हमें रूचि लेनी चाहिए। भगवान के भक्त की लीलाओं में। मन मन भाव माजी, माँ में मची सदमे, प्रति दिन मेरा चिंतन करो, मेरा आप सब आये हो, चले जाओगे। इस भाव के साथ जाओ के हमने जो सन्देश सुना है, उसका पालन करेंगे। हमने जगना हमने जगना जी का दिया और जगना जी की इच्छा क्या है के मिले हरिदास ठाकुर को। उन्होंने कहा हे हरिदास बताओ, कैसे उधार होगा, हिदाज नाम अपना, भाषा, नाम न सिर्फ, अपराधों से रहित नाम का जाप करेंगे। जगराज की यही इच्छा है कि हम सब उनके भक्त बने। हमारा ये भाव होना यहाँ और गहराई के साथ भगवान की भक्ति को स्वीकार करें और आज कि श्लोक में रिषिदेव? भगवान क्या कह रहे हैं? क्या कह रे, कौन बताएगा, क्या है? भगवान का उपदेश? किस लोक में क्या है? वो व्यक्ति पागल है जो सोचता है कि बहुत ही गिरी द्वारा मुझे सुख। मिलेगा तो आप की हो, मित्र है। वो कहते हैं हँसते हैं, अरे तुम भक्ती में रूची ले रहे हो। वो हम लोहा को खींचना चाहते हैं। बहुत कार्य में वो मुल्क है। मुल्क क्यों है आज जो देश है वो केवल कष्ट ही दे रहा है और फिर से 1 देह प्राप्त होगा। जब तक हम भगवान के श्नगतनहीं होंगे, आपको भटकना पड़ेगा। 24 करोड़ लाख योनियों में कभी पुरुष की योनी, कभी पशु की योनी, पक्ष की योनी, यह ये नहीं है के 1 बार मनुष्य की योनी प्राप्त हो जाए, हमेशा मनुष्य की योनी प्राप्त होगी और चाहे किसी वाटर में भी जन्म हो। अंत में परिणाम क्या है? क्लेश क्लेश का स्थित हमें ऋशव देव जी की शिक्षा का लाभ उठाया जाए। विश्व देव जी कह चुके हैं कि जो भक्ति के प्रति कुल है, उस कार्य को त्याग हो। भक्तों की संगत में रहोगे तो सदा ये सुनते रहोगे की कृष्ण भक्ति ही जीवन का उद्देश्य। है तो हम सब अत्यंत सौभाग्यशाली हो क्या भक्ति में जुड़े हो भगवान जी गुरु, कृष्ण के बाबा, अने कने, कने, कने कोनिल के पश्चात ये जन्म प्राप्त होता है जिसमें आप भक्ति के मार्ग में जुड़ते हो भक्ति भी उगता है शव द्वारा और अपराधों से बचो तो भक्ति का में पूरा लाभ उठाना चाहिए यूपगुस्वामी कहते है हे मेरे मित्र जो भी त्यागना पड़े त्याग तो कृष्ण भक्ति को हाथ से मत फेसर 2 तो पापाजी ग्रंथो को पढ़ोगे तो ये पैचानोगेक्या त्यागना क्या नहीं त्यागना और अगर हम इस शिक्षा का लाभ उठायेंगे तो बिना शंकर के भगवान के धाम लौट, सकोगे, भगवान के धाम लौटना चाहते हो या आपको दिल्ली बॉम्बे अच्छा लगा, आपकी दिल्ली बॉम्बे का सुख कम मिलेगा आज लोग कितने मुल्क है, उनको कहो क्या परिणाम है कहते हैं वो कर लेंगे, उसमें क्या पशु बन जाएंगे, उसमें क्या तो पशु बनने को तैयार हो तो ठीक है जो बुद्धिमान व्यक्ति वो कहता है कैसे कष्ट से निकलो तो भगवत गीता में स्पष्ट रूप से हमें उपदेश दिया गया है, इसका में लाभ उठाना चाहिए और जीवन को सफल बनाना चाहिए ये असली सुख असली सुख प्राप्त होगा भक्ति की बधियों के पालन से जो शिक्षा दी है, पापाजी ने उसका लाभ उठाओ और जीवन को सफल बनाओ हरे कृष्ण।
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