Live Lecture || HH Gopal Krishna Goswami Maharaj || 2023

In this live lecture, HH Gopal Krishna Goswami Maharaj, together with several speakers, expounds on the spiritual significance of the Kartik month, describing traditional devotional practices such as chanting 64‑, 32‑, and 16‑mala recitations and the immense merit attached to service performed during this period. He narrates the Damaodara (butter‑theft) Leela of Lord Krishna, recounting Yashoda’s complaints, the playful nature of the divine child, and the moral that the Lord delights when called a "butter thief". The story is linked to its source in the Padma Purana and highlighted as a beloved episode for Vaishnava devotees. The lecture then shifts to the historical development of Vaishnava scripture dissemination: the early book‑distributors (Thakur‑Brahmins), the lack of printing technology before them, the establishment of a press by Srila Chetan Mahaprabhu’s disciple, the sending of copies to institutions worldwide (including McGill University in Canada), and the role of ISKCON in expanding distribution. The speaker emphasizes that preaching (prasara) is the most cherished activity for a devotee, citing verses from the Bhagavad‑Gita and Bhagavata‑Purana, and stresses the necessity of cultivating compassion (daya) in service. Throughout, the lecture blends mythic narration, scriptural citation, and practical guidance for modern devotees.
Chapters
हरे राम राम राम knहुरककरआरेरामररम रामा रामा हरे हरे कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम राम राम हरे हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम रामा रामा रामा हरे
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हरे कृष्णा। आज हमारा परम सौभाग्य है। हमारे बीच में हमारे पूना के दोनो जी बी सी, गोपाल कृष्ण, गोस्वामी महाराज और स्वामी महाराज दोनो पद रहे हैं। मुझे याद है बहुत साल पहले श्री शिराधाकुंजबिहारी मंदिर में ऐसे अद्भुत दीक्षा का समारोह हुई उधर जिसमें गोपाल कृष्ण महाराज पर लोकनाथ महाराज पर राजनाथ महाराज तीनों लगभग 5 सौ 600 भक्तों को दीक्षा दी। बहुत सालों के पहले। इस तरह आज हमारे बीच में दोनो जी बी सी उपलब्ध है। गोपाल महाराज के बारे में 2 शब्द बोलना चाहता हूँ। नाइनटीन सिकस्टी फोर में मारे जो दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे, उसके आगे फ्रैंड्स और जर्मनी ऐसे प्रदेशों में जाकर बिजनेस मैनेजमेंट मैकगिल यूनिवर्सिटी में कर रहे थे और वो 1 वैषणव परिवार से उनका जन्म हुआ है। पंजाब में बचपन से उनको भगवान कृष्ण की ओर आकर्षण थी और 7 महात्माओं की ओर श्रद्धा थी। ऐसी वो ढूंढ रहे थे। मुझे 1 विष्व ग्रुप मिले जिनका आश्रय में ले सकता हूँ। इस तरह ढूंढते गए तो जब कनाडा में थे मां में, तब सिक्टी सेवन में वो कैनाडा के खान मंदिर से परिचित हुए तो भक्तों को मिला महाराज को बहुत अच्छा लगा। दोपहर को संडे फीस प्रोग्राम में जाते थे और रात तक जब ब्रह्माचार्य लोग दूध पीते थे। सोने के पहले कुछ समय तक ठहरते थे, अनेक सेवाएं करते थे तो 1 बार नाइनटीन सिक्स्टी एट सिक्सटी सेवन में भक्तों ने बोला कि शेर प्रोपज आने वाले हैं उस मंदिर में और उनको 1 सेवा दी प्रॉपर जी के कमरे को सफाई करके देने की 1 सेवा दी थी उन्होंने की थी। और प्रापा जी को पहली बार प्रोपज मुलाकात हुई उनकी प्रोपज हुए महाराज को मिलकर उन दिनों में ज्यादातर लोग पाश्चात्य देश के लोग ही जुड़े थे। 1 भारत को 80 लड़का आया है और जो बहुत श्रद्धा पूर्वक जुड़ा है। तो प्रपा जी ने अध्यक्ष और बाकी लोगों को बोला कि इसके ऊपर ध्यान देना तो नाइनटीन सिक्स्टी एट में उसके बाद महाराज जी को प्रपा जी से दीक्षा हुई और प्रापा जी अनेक सेवा महाराज जी को खास करके उन्होंने बी बी टी की ट्रस्टी बनाया उनक को और भारत में उन दिनों में परमपुर गोपाल, क्ष महाराज और परमपुर जयपुर का स्वामी महाराज। ये दोनों बहुत वरिष्ठ भक्तों के बड़ी जिम्मेदारी थी, सारे भारत का जिम्मेदारी थी जैसे महाराज जी कानपुर दिल्ली, मुंबई, गुजरात मायापुर इसे मद्रास हैदराबाद ये सारे स्थानों का देखभाल करना, उसकी जीबी सी ते मारा जैसे और साथ साथ रशिया में प्रपज ने सोचा कि किताबें जाना चाहिए तो उनको ही नियुक्त किया। सोवियत में जाकर इन किताबों को छाप कर इनका वितरण करने का जिम्मेदारी तो प्रपज ने इनको इनको बोला था कि तुम अलग अलग भाषाओं में इसको अनुवादित करके छापो। तो इस जिम्मेदारी को महाराज ने हृदय पूर्वक स्वीकार करके अनेक भाषाओं में प्रपज की किताबों को छाप कर उसको वितरण करने के काम चालू की प्रचुर मात्रा में रोज की किताबें वितरण हुए। ये सब प्रोपज के समय में हुई। आगे जाकर महाराज जी दिल्ली में ग्लोरिया ऑफ इंडिया प्रोजेक्ट आप लोग जानते हो उदरसीचालूकीआजकल लगभग 20 पंद्रह दिल्ली में और पूना के महाराज जी जी बी सी नाइनटीन टी टू से तो महाराज जी इस मंदिर को शुरुआत से लेकर इसको डेवलप करने में महाराज का बहुत बड़ा हाथ है। तो नाइनटी नाइनटी टू नाइंटी थ्री में महाराज जिन्हें परपज राजनाथ स्वामी महाराज के साथ बातचीत करके कुछ भक्तों को बुलाते है। क्योंकि पूना का मंदिर उन दिनों में जुहू मंदिर के बक्तलोगीआते थे, इधर बस पार्टी में आते थे और लक्ष्मी नारायण मंदिर में प्रोग्राम चालू की थी। इस तरह उसके बाद काम का मंदिर आया तो इस तरह पर गोरक्ष महाराज और राजन महाराज दोनो कोलाब्रेटिव ली नाइंटी नाइन थ्री सी चालू किया। अनेक वक्त लोगों ने इसे योग्यता दी है। और पुनः के जिस मंदिर में हमलोग इधर अभी गार्डन में बैठकर सम्मिलित हुए है यह मंदिर लगभग 5 साढ़े 56 एकड़ का जमीन है। इसको लाने में बड़ा हाथ है। 1 बनर्जी नाम के 11 वृद्ध व्यक्ति था कैंप मंदिर के निकट उसको महारज ने पर्सनली कल्टीवेट की प्रेरणा दी उसको उसके पास 1 बड़ा बालाजी का डेटा तो महाराज से प्रेरित होकर उन्होंने महाराज को बोला की आप लालच के डेट को भी ले लीजिये साथ साथ मेरे घर को भी मैं दान में दे देता हूँ। तो उनके बाद में उनके देहांत होने के बाद उनके घर को जब बेचा उसमें से डेढ़ करोड़ मिला उसमें से जमीन प्राप्त हुआ। जमीन प्राप्त होने के बाद हमारे दोनो महाराज जी लोग बैठकर योजना बनाया। कैसे मंदिर का गोपुरम कैसे होनी चाहिए, डेटस का नाम क्या होना चाहिए, किस तरह का मंदिर हमें बनाना चाहिए, क्या क्या डेटस होनी चाहिए? 1 बार दोनो हमारे जी पी सी साथ में बैठकर। उन्होंने प्लानिंग की तो इतना सुन्दर मंदिर के कंस्ट्रक्शन में, इसके फंडरेजिंग में, प्रेसिडेंट को लाने में और इस मंदिर को चलाने में। परमुझे गोपाल क्षण महाराज का बहुत बड़ा हाथ है साल में लगभग 4 बार 5 बार आते हैं पूना में। इस तरह आकर प्रेरणा देकर। पूना में मैं पूना के बारे में ज्यादा बोल रहा हू क्योंकि पूना में महाराज बहुत बड़ा डेवलपमेंट का हाथ था। इसी तरह महाराज रशिया में ही नहीं लेकिन दुनिया के कोने कोने में जाकर प्रचार करते हैं। अभी लुधियाना में तीसरा मंदिर खोला है। इस का भी बहुत बड़ा मंदिर
और
कुरु क्षेत्र में, गुरु क्षेत्र में ज्योतिसर नाम के जो स्थान है, कृष्ण भगवान ने अर्जुन को आत्मबोध दी उधर बहुत बड़ा मंदिर भी बन रहा है भी। इस तरह हर 1 चीज हम बोल सकते हैं गवर्निंग बॉडी कमीशन्स में। वरिष्ठ महाराज जी बहुत हर मीटिंग से अभी 1 हफ्ते का मीटिंग हुआ। महाराज अपनी तबीयत का प्रवाह न करते हुए आकर मीटिंग में भाग लिया। उन्होंने। और सबसे महत्वपूर्ण चीज यह है कि गोपाल महाराज के लिए प्रोपर की किताबों को छापना, उसका वितरण करना उनके लिए सबसे प्रिय सेवा है। पिछले 45 सालों से महाराज जी हर बार मरतन के पहले आते थे। इस तरह के प्रवचन देकर हमलोग को प्रेरणा देते थे। मरतन होने के बाद भेंट, पुरस्कार सब बक्तों को देने के लिए वापस आते थे। जनवरी में ऐसे ऐसे जब से इनकी बुना आगमन, चालू हुई, मरतन के टाइम भक्तों की प्रेरणा दुगुना 3 गुना बढ़ गया। और इस तरह हर बार हमारे जिला डिपार्टमेंट वर्ल्ड फर्स्ट रैंक लाते हुए। लगभग 4 बार ऐसा हुआ है। तो महाराज की बहुत बड़ी करुणा कृपा है पूना के भक्तों के ऊपर अभी महाराज की तबीयत ठीक न होने के बावजूद भी महाराज जी आज हमारे बीच में पद आ रहे हैं और हमको प्रेरणा देने के लिए और महाराज अनेक हजारों, लाखों भक्तों के लिए प्रेरणा दायक है सारी दुनिया में और हमारे भाग्य परम सौभाग्य है कि हम इनके साथ संग कर पा रहे हैं, इनका सानिया प्राप्त कर रहे हैं और इनका ध्यान हमारे पूर्ण मंदिर के ऊपर है, भक्तों के ऊपर है। यह हमारा बहुत बहुत बड़ा सौभाग्य है। आइये हम का स्वागत करते हैं रामचंद्र मंदिर, हरे कृष्ण महा मंत्रालय, हरे कृष्णा, कृष्णा, कृष्णा, हरे, हरे हरे राम, हरे रा रा महाराज की सार प्रताम मैं महाराज जिसे करूँगा महाराज हम लोगो को प्रेरणा दायक शब्द बोलेंगे उसके बाद हम परमपरास्वामीइंटरोडक्शन देंगे तो परमपुजेराधना स्वामी महाराज अमेरिका में उनका जन्म हुआ और 19, 22 में अमेरिका छोड़कर भारत की ओर निकल चले सत्य की कोच में भगवान की कोच में। ऐसे उन्होंने ए जर्नी होम करके 1 किताब लिखा है जो बहुत अडवेंचरस किताब भी है। साथ साथ उसमें वो आध्यात्मिक किताब भी है। अलग अलग अनेक गुरुओं को मिला उन्होंने अनेक संस्थाओं में गए। उनका अनुभव इत्यादि लिखा है। लेकिन अंत में भारत में आकर जब वृंदावन में वृंदावन का वास प्राप्त हुई। इनको उधर के भक्तों को देख कर उधर की भूमि, वृंदावन की भूमि, वृंदावन की भक्ति, उससे प्रेरणा लेकर उधर ही रखने की योजना की उन्होंने। उस समय प्रपाजीपरपाजीके शिक्षों के साथ मुलाकात हुई। उसके बाद नाइंटीन सेवेंटी वन में उधर, मुंबई में 1 क्लास मैदान फेस्टिवल हो रहा था। मुंबई में बहुत बड़ी मात्रा में लोग आये थे, 20 हजार लोग रोज जाते थे, 10 दिन के लिए है और प्रॉपर जी 10 दिन प्रवर्षण दिया और उसमें परंपरा महाराज। उस समय योगी थे। उनके बहुत लंबे बाल लंबे दाड़ी प्राजी ने उनको देखा, क्राउड में उनको बुलाया कर बैठने के लिए बोला 10 दिन अपने पास बेटा लिया उन्होंने। पूरा न करके। उसके बाद वापस वृंदावन चले गए और इस तरह प्रोपर से प्रेरणा लेकर उसके बाद नाइनटीन सेवेंटी थ्री में प्रोपर जी से दीक्षा ली। उन्होंने। प्रोपर ने बोला तुमको वृंदावन बहुत प्रिय है लेकिन मेरी इच्छा है कि तुम अमेरिका में कुछ खास काम तुमको करना है। इसलिए न्यू वृंदावन में तुमको बेचता हूँ। ऐसे न्यू वन्दावन में भेजा उनको सेवेंटी थ्री से सेवंटी नाइन तक वो पुजारी की सेवा करते रहे। उन दिनों में हारमोनियम बजाते हुए रात भर उनको हरनाम संकेतन करने की सेवा दी गई थी। दिन में पूजा आराधना करते थे, महाराज जी बोलते थे, उनकी पढाई भी हुआ, प्रोपर किताब दुखते हुए साथ साथ पढते थे। परवाज की किताब अनेक तपस्या की है। उसके बाद महाराज जी को कॉलेज के प्रचार में सेवा दी गई। उधर अनेक कॉलेज में प्रचार की। आगे जाकर नाइनटीन एइटी सिक्स। उसमें संन्यास लेकर महाराज जी को भारत भेजा गया तो भारत आने के बाद मुंबई में आने के बाद श्री श्री राधा गोपीनाथ मंदिर करके ग्रैंड र लोड। डाउन उदरसीचालुके महाराज की खास प्रेरणा है। कम्युनिटी बिल्डिंग डिवोटी, खैर अन, म, टो, टू, ट्रेनिंग, ऑन एजुकेशन ऑफ डिवोटी इन कैरिंग, फॉर dिवotीसयहमहारज के लिए खास एरिया है। भक्तों का ख्याल रखना और बच्चों से लेकर अंतिम सांस लेने तक, हर 1 को कृष्ण और भगवान कृष्ण के भक्तों की सान्दता और उनके संग प्राप्त होना चाहिए और उनकी देखभाल सही दंग से होना चाहिए। महाराज की यह सोच है, यह उनकी विजन है। तो उधर से उन्होंने डेवलप करके गोपा स्कूल डवलप की भक्ति हॉस्पिटल करके भक्तों के लिए खास करके चालू किया गया है। इसे और अनेक कम्युनिटी प्रोजेक्ट महाराज कर रहे हैं। जैसे गोबर देने को विलेज करके प्रौपर्जी की स्वप्न की। 7 मंदिर, 7 पहाड़ों के उपर बनाया जाए न्यू वृंदावन में। लेकिन वो उतना बड़ा प्रोजेक्ट, ता कोई कर नहीं पाया। लेकिन उसी प्रॉजेक्ट को लेकर महाराज जी उस मैप को लेकर गोबर देने को ले में डेवलप किए उन्होंने। इस तरह पूना में जब महाराज ने भक्तों को भेजा जाना, माता जी जय देव प्रभु, सत, माताजी और माताजी इस तरह अनेक लोगों ने कृष्ण ग्राम पहले, उसके बाद ब्रह्माचारी, कुछ लोग आये तो इस तरह महाराज की प्रेरणा से अनेक तरह के प्रचार के कार्यक्रम चालू हुई है और डेवलप हुए पुना में और महाराज इस तरह आजकल कुछ समय अमेरिका में, कुछ समय भारत में और इटली में इस तरह बताते हैं, प्रवास करते हैं और बहुत हर साल बड़े यात्रा निकालते हैं कार्तिक महीने में जैसे 5 10 हजार भक्तों को ले जाकर महाराज के खास प्रेरणा है कम्युनिटी बिल्डिंग तो इस तरह पूरा मंदिर की बड़ा स्वभाग है की हमें ये 2 महात्मा पुरुषों के आश्चर्य हम लोगों को प्राप्त हुआ है। प्रॉपर जी बोला करते थे की इस कान मेरा शरीर है और इस खान की जो लक्ष्मी है वो उस शरीर में खून है और शरीर में हृदय क्या है। बी बी टी है बुक ट्रस्ट तो प्रोपर जिनमे वक्त बुक ट्रस्ट को सौंपा दिया परन्तु यह गोपाल महाराज को विच mens हार तो गोपाल कृष्ण महाराज गोपलकषमहाराजइस बी बी टी को डेवलप करके सारी दुनिया में अभी 60 करोड़ से भी ज्यादा कि किताबें वितरण हुए हैं उसमें महाराज जी का बहुत बड़ा हाथ है और उसी किताब को पढ़ कर हम लोग आध्यात्मिक जीवन चालू करते हैं और उस हृदय को पोषण भी चाहिए तो उस पोषण के पर जोर देने वाले होते हैं जो राजनाथ स्वामी महाराज। so he narices the hard with krishna kata and krishna lila krishna kirtan, that is his hard, so we got to best leaders for puning and staying under the shade of the lotus feet of this to read sols puna community has been booming and pletishingalso sending manymanydewortis to many place इंडिया एंड टुडे पहले गोप महाराज बोलेंगे, उसके बाद हम स्वामी महाराज को करते है साथ साथ आज इसी बड़े सभा में अनेक महात्मा पुरुष लोग हुए है इस लेस नरंजन स्वामी है। इस तरह आप लोगों ने देखा है जो भी लोग 1 हफ्ते के लिए थे उनमें से कुछ लोग कह रहे हैं आज भी इस ने कृष्ण स्वामी महाराज हैं और जिनका नाम इस भक्ति पुरुष महाराज स, smmopishrybolye was trying to, fly back to, bombay state back in to, इन सबको भी हम स्वागत करते है। haribol
शाम
राधीश, राधेश्याम प्रभु जी, ये बड़े ही भाव के साथ नोटिफिकेशन किए,
तब थोड़ी खराब है और भर धेशामनका आई में थोड़ी देर बोलूंगा देशम, थोड़े
समय महाराज की तबियत और गला गले की वजह से वो थोड़ी देर बोलेंगे और उसके बाद वर्म पूजा, राधानाथ, स्वय,
महाराज बोलेंगे, हाई कृष्णा, आवाज बहुत हल्की है तो इसलिए जो बोला वो रिपीट होगा, ठीक है
महाराज करे उनकी आवाज हल्की है, इसलिए जो वो बोलेंगे उ को रिपीट किया जायेगा।
ओमनममबतेबासुदेवाया ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओमनमतेबासुदेवा ओम
नमो भगवते वासुदेवाय, ओमनमगतेबासुदेवाया ओम नमो भगवते वासु।
देवाया आज जैसा आप जानते हो कोई शुभ अवसर है, आज क्या है कार्तिक
महीने का पहला आप जैसे जानते हो आज बहुत ही शुभ अवसर है। आज कार्तिक महीने का पहला दिवस है
और कार्तिक के महीने में भक्तों का भाव होता है।
भक्ति बढ़ाये और कार्तिक महीने में भक्तों का भाव होता है कि वो भक्ति बढ़ाए।
कार्तिक के महीने में हमें प्रयास करना चाहिए कि हम श्रम के जनम बढ़ाये।
कार्तिक के महीने में, हमें प्रयास करना चाहिए कि हम श्रवण कृत्रम में लगे है।
कहा जाता है कि 12 महीनों में कार्तिक महिना सबसे,
ऐसा कहा जाता है कि 12 महीनों में यह कार्तिक महीना सबसे उत्तम है।
और महिने में थोड़ी भी सेवा करोगे,
गुना लाभ मिलेगा और कार्तिक महीने में आप थोड़ी भी सेवा करोगे, तो उसका हजार गुना लाभ मिलेगा।
दिलाई हुई है। भगवान ने भक्तों भक्त की और कार्तिक
महीने में भगवान की और उनके भक्तों की कई दिव्य लिलाएं हुई है।
ऐसे कार्तिक महीने में दिवाली मनाते हैं।
जैसे कार्तिक महीने में दिवाली मनाते हैं,
हमारे गुरु प्रकट हो, कार्तिक महीने में
और उनके गुरु महाराज ने श्िलप्रउपाजी अप्रकट हुए, वो भी कार्तिक के महीने में,
कार्तिक के महीने में थोड़ी भी भक्ति कर, उसका लाभ है।
कार्तिक के महीने में थोड़ी भी भक्ति
करेंगे तो उसका लाभ है, भक्त हैं। वो प्रयास करते हैं कि कार्तिक के महीने में हम
जो वैष्णव भक्त है, वह प्रयास करते हैं कि कार्तिक के महने में हम हमारा चैंटिंग और हेरिंग
बढाये, हमें यह नहीं सोचना चाहिए।
16 माला मैक्सिमम, हमे ये नहीं सोचना चाहिए कि 16 माला मैक्सिमम है।
बाबाजी ने जब संस्था की स्थापना की, उन्होंने कहा, न्यूयॉर्क में 64 माला करोड़ दिन हैं।
जब भक्तीजनससल ठाकुर ने संस्था की स्थापना की तो उन्होंने 64 माला जप करने का विदान दिया था।
भक्त उस समय केवल अमेरिकन भक्त है, उस समय केवल अमेरिकन भक्त है, उस
समय केवल अमेरिकन भक्त थे।
स्वामी जी कल?
तो उन्होंने कहा कि स्वामी जी, यह बहुत मुश्किल है।
पापा ने कहा 20 माला करो।
तो प्रवुपाजजी ने कहा कि 64 नहीं, तो फिर 32 माला करो, कहा ये है। तो उन्होंने कहा कि यह भी कठिन है। तो प्रवुपाजजी ने कहा कि सिक्स्टीन और नौले जो
कार्तिक के महीने में कई भगत प्रयास करे, 64 माला करना, 32 माला करना, 16 से अधिक।
तो कार्तिक महीने में कई भक् तो प्रयास करते हैं कि 64 माला करे या 32 माला करे, लेकिन 16 से आगे करे।
और कार्तिक के महीने में सु सेवा भी हजारों नाम है।
और कार्तिक महीने में जो भी सेवा करेंगे, उसका हजार गुना लाभ है।
गवान की दामोदर लीला भी कार्तिक महीने
में हुई थी, भगवान की दामोदर लीला भी कार्तिक के महीने में हुई थी,
दामोदर लीला की हुई थी, दिवाली के दिन, पर
दामोदर लीला, ये दिवाली के दिन हुई थी।
शीला लीला भक्तों के लिए बड़े प्रिय
है और दामोदर लीला भक्तों के लिए बड़ी प्रिय है।
सीप में शोध मासा खूब कैला कम्पलेंस मिली थी। माता, यशोदा माता को कई लोग ने कम्प्लेन किया।
ये शोध माता को गोपियों ने कम्प्लेन
किया कि आपका बेटा हमारे घर में आता है
कि आपका बेटा राने के लिए, आपका बेटा हमारे घर में आता है। माखन चुराने के लिए।
माता ने कहा बेटा तुम्हारे घर क्यों आये, हमारे पास 9 लाख गाय है।
तो यशोदा माता ने कहा की मेरा बेटा आपके घर क्यों आये, हमारे पास 9 लाख गाय है,
व्यक्ति की सम्पति थी गाय और खेती, तो उस समय
व्यक्ति की संपत्ति हुआ करती थी, गाय
और खेती अंदाजा लगाओ 9 लाख,
जरा
अंदाजा लगाइए 9 लाख गाय हैं उनमे
20 गाय थी जिनके फ्लेवर्ड दूध देती
थी तो उनमें से 20 गाय थी जिनका दूध सुगंधित हुआ करता था, फ्लेवर्ड
हुआ जैसे
जैसे आप वनीला डालते हो आपके तो उसी प्रकार से वो 20 गाय जो थी उनसे फ्लेवर दूध मिलता
था,
शरारती थे, भगवान शरारती थे
और भगवान और भगवान बड़े शरारती थे।
मन में चुराता है भगवान का चोर,
तो ये शोदा माता के पास अनेक कंपलेंट आती थी कि आपका बेटा जो है माखन चुराता है भगवान अनेक नामों में 1 नाम है माखन चोर आप
कभी आपको कोई चोर बुलाए तो आप
सह लोगे, तो आपको कोई चोर बुलाए तो आप सह लोगे
आनंद लेते है
तो आपको बड़ा गुस्सा आएगा। लेकिन भगवान को अगर माखन चोर बुलाते है तो भगवान को बड़ा आनंद आता है।
तो यशोदा माता
इस प्रकार यशोदा माता
नहीं दही दही मत दीदी को अच्छा
लगा तो उनका भाव था कि ये जो है मन में मेरे बेटे को
खिलाऊं,
भगवान को माता ने प्रयास किया
बांधने के लिए, तो ये श्रोता माता ने प्रयास किया भगवान को बांधने के
लिए जो माता भगवान को हल्की जा देना चाहती
शोदा माता भगवान को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहती थी।
शोध माता ने सोचा को मारना तो नहीं है बाँध लेते है।
तो ये शोध माता ने सोचा की इसको मारना ठीक नहीं है लेकिन इसको
बांध के रखते हैं तो वो घर नहीं छोड़ दे, मानू तो घर नहीं छोड़ दे।
तो उनको डर था कि अगर मैं उनको मारुंगी तो घर न छोड़ दे,
पर भगवान के लिए तो उन्होंने रस्सी
ली और रस्सी से प्रयास किया भगवान को बांधने के लिए 1 उखल के साथ भगवान को बांधने की चेष्टा थी
बड़ा प्रयास किया माता ने हमेशा 2
तो माता ने बड़ा प्रयास किया लेकिन हमेशा वो डोरी जो हुआ करती थी वो 2 ऊँगली छोटी हुआ करती, 1
दूरी सी दुनिया थी को दिया, पहले
1 डोरी से बांधने का प्रयास किया लेकिन वो 2 ऊँगली छोटी हुई तो फिर 234-5678 शहर में जितनी भी डोरिया थी उसको जोड़ को बांधने का प्रयास किया तो फिर भी वो 2 ऊँगली छोटी हुआ करती थी।
भगवान ने देखा ये मेरी माँ जो है उसके ऊपर बाकी गोपियाँ हँस हुई है। देखो यशोदा माता में इतनी शक्ति नहीं है पूरे बेटे को पालने के लिए,
तो भगवान ने देखा कि बाकी गोपियाँ जो है मेरे माँ पर हंस रही है और कह रही है कि देखो यशोदा माता में इतनी भी शक्ति नहीं है कि वो अपने बेटे को बांध सके,
बांध लो।
तो भगवान ने स्वीकार किया और कहा कि आप बांध लो मुझे दाम 2
लीला के का गुणगान करते हैं तो
ये संक्षेप में दामोदर लीला थी और जो वैष्णव भक्त है उनके। लिए ये बड़ी महत्वपूर्ण और प्रिय लीला है।
कि में 1 मंदिर था जिसमें 1
चूहा था, कार्तिक के महीने में 1 मंदिर था जिसमें 1 चूहा था।
मंदिर चखने के लिए, तो चूहा जो
है वो मंदिर जाता था भगवान के गर्भ गृह में घी चटने के लिए दिए का इसकी आदत थी, उसकी आदत
थी सो, ये जुआ ने देखा की 1 पत्ती में थोड़ी सी पत्ती जल रही है कोने कोने में, तो चोर
ने देखा कि 1 बत्ती में घी है और उसकी जो बत्ती है वो बड़ी धीमी जल रही है।
तो उसने सोचा की
तो उसने सोचा की मैं जाकर उस घी को चाहूँ,
उस रूई जो थी उसके
जो मूंज जो थी रुई, वो रुई जो थी वो दात में चिपक गयी, प्रयास किया हटाने के लिए, तो उसने प्रयास किया कि वो रुई को हटा सके हटाने के लिए प्रयास किया
प्रयास कर रहा था
तो वो जल्देजल्ते रुई लगी थी, और प्रयास कर रहा था निकालने के लिए, लेकिन वो वो जैसे भगवान को दिया ऑफर कर रहा था उस प्रकार
से ज्यादा सरलता से भगवान का दर्शन दे सके में फस गए, प्रयास किया अपने आप को भर निकालने के लिए, बड़बड़ा दिया था लोग भगवान का दर्शन ले सके
तो वो प्रयास कर रहा था की रुई जो फंसी उससे निकाले, लेकिन वो धस गई थी और जो रही थी उसके प्रकाश से, लोगों को भगवान का दर्शन लेने में सहायता हुई
है और ये सेवा मुक्ति प्राप्त हुई
और इस तुच्छ सेवा के लिए उसे मुक्ति प्राप्त हुई।
यह कथा पद्म पुराण में है, में
तो ये कथा जो है पदम पुराण में है, और ये कार्तिक के महीने में घटी थी।
तो आज के प्रोग्राम का मूल संदेश क्या है? कौन बताएगा?
तो आज के इस पर्व का मूल सन्देश क्या है? कौन बताएगा?
आज का विषय क्या है?
आज का विषय क्या है?
आज का विषय है, ग्रंथों का वितरण,
आज का विषय है, ग्रंथों का वितरण, ग्रंथों का वितरण।
आप जैसे जानते हो पा जी ने वो ही बल दिया है इस सेवा के ऊपर।
तो जैसे आप जानते हो की प्रपा जी ने बहुत बल दिया है इस सेवा के ऊपर।
में। अक्सर भक्तों को कहता हूँ की सबसे पहले बुक डिस्ट्रीब्यूटर से ठाकुर भक्त विनोद।
तो मैं भक्तों को हमेशा कहता हूँ की सबसे पहले बुक डिस्ट्रीब्यूटर जो थे वो थे ठाकुर भक्त, विनोद
से पहले प्रिंटिंग नहीं हुई थी, वो छाप नहीं सकते थे किताब को,
तो ठाकुर भक्त विनोद के पहले प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी नहीं थी, तो वो छाप नहीं सकते थे ग्रंथों को,
ठाकुर उस महान आचार्य थे शुद्ध
स्थान की ठाकुर भक्तिनों जो थे वो बड़े ही महान आचार्य थे। और उन्होंने चेतन महाप्रभु की शुद्ध शिक्षा
की स्थापना की, उन्होंने ग्रंथ लिखा था चेतन महा प्रभु के जीवन के ऊपर,
तो उन्होंने 1 ग्रंथ लिखा था चेतन महाप्रभु जी के जीवन के ऊपर।
और उन्होंने विश्व के अनेक प्रसिद्ध विद्या में 11 कॉपी भेजी और उन्होंने विश्व
के अनेक प्रसिद्ध महाविद्यालयों में और पाठशालाओं में उसकी 11 कॉपी भेजी थी मुझे
कैसे पता मॉन्ट्रियल कनाडा में मैकगिल यूनिवर्सिटी
है, मोंट्रियल कैनाडा में मैगिल यूनिवर्सिटी और
मैकगिल यूनिवर्सिटी की लाइब्रे में प्रापा जी का 1 शिष्य रिसर्च कर रहा था
मैगिल यूनिवर्सिटी के लाइबरी में प्रापा जी के 1 शिष्य जो हैं वो रिसर्च कर रहे थे ओह, तो वो
देख रहा था क्या किताबें हैं लाइबरेरी में,
तो वो देख रहे थे कि लाइब्रेरी में क्या क्या किताबें हैं और
वहाँ उसको की पुस्तक मिली और वहाँ उनको
भक्त ठाकुर की ये पुस्तक मिली अंदाजा लगाओ।
एई टीन नाइनटी प्रभाजी प्रकट हुए थे नाइनटीन नाइन्टीन सिस्ट सेवन को,
तो अंदाजा लगाइए एईटी नाइन टी सिक्स में प्रोप जी प्रकट हुए थे, और वो किताब नाइनटीन सिक्टी सेवन तक उस लाइब्रेरी में
पड़ी थी ये जो किताब है भारत से पोस्ट पता किस रूप से भेजा, वो भेजा था एटीन नाइंटी सिक्स में,
तो ये किताब जो है भारत ऐसे पोस्ट से या फिर किस तरीके से भेजा था पता नहीं लेकिन वो एटीन नाइंटी सिक्स में भेजी थी आम सौरी
ठाकुर ने मैगी युनिवर्स को भेजा था
ये किताब, तो भक्तिन ठाकुर ने मैगी यूनिवर्सिटी भेजी थी ये किताब इससे अंदाजा
लगा सकते हो की किताबों का कितना
प्रभाव है तो इससे अंदाजा लगा सकते है की किताबों का कितना प्रभाव है।
तो भक्ति से के परम गुरु थे, उन्होंने भी इस सेवा पर बल दिया।
तो भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर जो की प्रोप जी के परम गुरु है, प्रोप जी के गुरु महाराज है, उन्होंने भी इसके ऊपर बल दिया।
चास में अनेक लोग हैं जिनके द्वारा 4 की सेवा महिमा बताते हैं।
तो शास्त्रों में ऐसे अनेक श्लोक हैं जिनके द्वारा प्रचार की महिमा का उजागर किया गया है उसकी महिमा पता चलती है।
4 की सेवा को बहुत बल दिया।
चेतन महाप्रहुजीनेभी प्रचार की सेवा पर बहुत बड़ा बल दिया है।
क्या कहा उन्होंने सहे को कृष्ण उपदेश,
उन्होंने कहा जा रे देखो तारे कहो कृष्ण उपदेश जिसे भी तो मिलो कृष्ण का उपदेश 2 आप जिससे भी मिली है उसको कृष्ण का उपदेश।
2 तो कृष्ण का उपदेश का अर्थ क्या है?
तो कृष्ण उपदेश का अर्थ क्या है?
गीता भागवत का सन्देश, गीता भागवत का सन्देश। तो भगवान गीता के वे में कहते हैं सब भक्तों में सबसे प्रिय कौन है? जो मेरा प्रचार करता है।
तो भगवान गीता के अठारहवें अध्याय में कहते हैं कि सब भक्तों में सबसे प्रिय कौन है?
जो मेरा प्रचार करता है, हर वक्त प्रयास करता है।
तो हर वक्त प्रयास करता है कि कि हम कोई प्रसिद्ध व्यक्ति के प्रिय बने।
तो भगवान कहते है वो है जो की प्रचार करता है।
तो भगवान कहते हैं कि सब भक्तों में वो प्रिय है जो कि प्रचार करता है
को कहा भगवान को प्रसन्न करना चाहते हो कर दिया है।
तो भागवत के चौथे सिकंदर में नारद मुनि जी ने प्रचेता कहा की दया सर्वभूतेशु संतुष्ट है न केनवा अगर आप भगवान को प्रसन्न करना चाहते हो तो आपको प्रचार करना चाहिए, दया दया की भावना होनी चाहिए, दया दया की भावना होनी चाहिए।
ये बहुत आवश्यक है।
यह बहुत आवश्यक है, वैष्णव भक्त है
वो इसके ऊपर बहुत आदर देता।
जो वैष्णव भक्त है वो इसके ऊपर बहुत ज्यादा बल देते हैं।
हमें दया की भावना प्रयास करना चाहिए।
तो दया की भावना हमें विकसित करने के लिए प्रयास करना चाहिए।
तो भगवान को पीला देव भी कहते हैं सुविधा सलबन्धहै दया की भावना।
तो कपिल मुनी भी कहते हैं कि जो भक्त हैं उनका 1 लक्षण है कि उनमें दया के भाव न हो।
सी ठाकुर ने इस सेवा को बहुत बहुत बल दिया।
तो भक्तजन ठाकुर जी ने भी इस सेवा पर बहुत बड़ा बल दिया, उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस खोली, उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस खोली
और जाते थे के लिए होते है।
तो जब उनके भक्त जाते थे कलकत्ता में ग्रंथों को बाँटने के लिए, तो बक्से ठाकुर बड़े प्रसन्न होते थे,
य
बाबा जी के साथ थे पर भक्ति से दादा जी के साथ थे। राजकुल में 1935 में
तो प्रौपषजीबक्सनस ठाकुर के साथ, राधा कुंड में 1935 में
से दादा जी 1 बड़ी यात्रा को लाये थे। ब्रज में उसमें दादा जी बड़ी यात्रा को लेकर आये थे।
तो उस समय बक्सें बड़ी यात्रा को लेकर आये थे।
राधा कुंड में, तो दादा जी ने 1 मृदंग की तस्वीर बनाई तो बक्से
सदी ठाकुर ने 1 मृदंग की तस्वीर बनायी,
गान कुछ दे सुविधा दे ग्रंथो को अनुवाद करो प्रकाशित करो।
तो उन्होंने कहा कि अगर आपको भगवान सुविधा दे तो ग्रंथों को प्रकाशित करो और उसको वितरित करो।
सुभक्ति सिधांत ने 1922 में पापा जी के 1 मित्र थे, इसने कहा चलो यहाँ 1 बड़ा प्रसिद्ध संन्यासी है।
तो 1922 में प्रोप जी के 1 मित्र थे। उन्होंने प्रोप जी से कहा की चलो यहाँ पर बहुत प्रसिद्ध संन्यासी आये है,
पापा अनेक संतो को मिल चुके थे।
तो प्रो अनेक संतों को मिल चुके
थे, उनके पिता े हर प्रकार के साधु की देखभाल करते थे।
तो उनके पिता गौर, मोहन डे हर प्रकार के साधु की देखभाल करते थे।
और परिचय हुआ था अनेक संतों के
साथ, तो प्रपा जी को अनेक संतों के साथ परिचय हुआ था, किसी से प्रभावित नहीं हुए, लेकिन प्रपात किसी से भी प्रभावित नहीं हुए।
जब साधु है मिलो, पापा जी ने कहा बहुत साधु को का हूँ।
तो जब उनके मित्र ने कहा कि 1 साधु आये हैं चलो मिल लो, तो प्रोपाजी ने कहा की मैं बहुत साधु से मिल चूका हूँ,
मिलना नहीं
चाहता तुम्हें मिलना नहीं चाहता हूँ
बोला फिर से, और फिर पापाजी मिले,
तो उनके जो मित्र थे उन्होंने बड़ा आग्रह किया, तो फिर प्रोप जी मिले बक्स
ठाकुर से उस पहली मुलाकात में भी दादाजी समझ गए। ये है वो युवक जो की हार के सन्देश को, संदेश को।
तो पहले ही मुलाकात में प्रपा जी समझ गए कि ये है वो युवक जो चेतन महाप्रभु के संदेश को सम्पूर्ण पृथ्वी पर प्रचार करेगा
सदा रहता है।
तो प्रोप जी के हृदय में सदा यह भाव रहता था कि मैं मेरे गुरुमाराज के आदेश का पालन करूँ जी
कहते थे गुरु को कहते हैं सदा गुरु के आदेश का पालन करने का
प्रयास किया तो प्रोपज ने भागवतम का पहला स्कन्द जो है अपने गुरु महाराज को समर्पित किया है और उन्होंने सदा अपने गुरु के आदेश का पालन करने का प्रयास किया है जैसे तू जैसे स्कंद संस्था जैसे इस्कॉन संस्था बढ़ रही है वैसे पुस्तक वितरण भी बढ़ रहा
जैसे स्कॉन संस्था बड़ी थी, वितरण भी
बढ़ता गया तो जैसे ही इस्कॉन संस्था बढ़ती गई वैसे ग्रंथों का वितरण भी बढ़ता गया क्यूँ
क्यूँ किया
था क्योंकि प्रोपाजी को उनके गुरु महाराज का ये
आदेश था तो पापा जी विदेशों में जाने से पहले भी उन्होंने कर दिया
तो प्रोपाजी विदेश जाने से पहले उन्होंने ग्रंथों का अनुवाद जो है वो प्रारंभ
किया था प्रापा जी जाते थे, राधा आते थे अपनी किताबों को लिए तो
प्रपा जी राधा दामोदर मंदिर वृंदावन में रहते थे पर दिल्ली आते थे अपने किताबों को छापने के लिए और वितरित
करने के लिए आ गए
तो प्रपा जी फिर आ गए छिपी वाड़ा में जहाँ पर वो रहते थे इस्कॉन का
सुन्दर मंदिर है, उस थान पर आज सुन्दर मंदिर है उस साल में आज
इस्कॉन का 1 बहुत ही सुंदर मंदिर है उस स्थान पर
कोई धन नहीं था, डांग लेते थे, थर्ड क्लास डेब्यू मे आते थे दिल्ली तक साइकिल लेकर अपने स्थान पर पहुँचते थे तो प्रोपर
जी तांगे से आते थे, वृंदावन से मथुरा और मथुरा से दिल्ली ट्रेन के थर्ड क्लास डिब्बे में प्रवास करते थे और दिल्ली आकर अपने स्थान पर पहुंचते
थे और दिल्ली में न प्रकाशित करने
के लिए तो दिल्ली में दिल्ली में प्रोपाजी ने बहुत समय बिताया क्योंकि वो प्रथम स्कंध का अनुवाद करना चाहते थे और उसको छापना चाहते थे
3 भागों
में प्रकाशित किया, प्रोपाजी ने फर्स्ट को जो है भागवत 3 भागों में प्रकाशित किया बैक्टूगॉरडेड उससे पहले प्रौपर जी बैकटोगोर्डेड
मैगजीन छापते थे, वो बैक्टूगॉडेडआजकी बैक्टी गॉडे के लिए समान नहीं था, 1 था
वो बैकटोगोडेडआजकी बैकटोगोडेड की तरह नहीं था लेकिन 1 सिम्पल पेपर हुआ करता था,
1 लेख लिखा नो टाइम, 1 लेख
उन्होंने लिखा था बैकटोगॉर्डेड में जिसका शीर्षक था सौरी नो टाइम, उसे बताया है
प्रॉपर कहते हैं मैं इस व्यक्ति को मिलने गया था स्वामी जी अब जानते है
तो उस आर्टिकल में प्रोपर जी लिखते हैं कि मैं 1 बड़े प्रसिद्ध व्यक्ति को मिलने गया था लेकिन उसने कहा कि स्वामी जी, आप जानते हो मैं कितना व्यस्त हूँ आई हैव नो टाइम फॉर ऑल दीज थिंग अगले दिन
उसका हार्ट अटैक हो गया और अगले
दिन उनको हार्ट अटैक हुआ तो प्रपा जी ने ये आर्टिकल लिखा और उसको शिक्षक दिया सौरी नो टाइम तो प्रहपाजी इस प्रकार ऐसे इशूज पर लिखते थे
तो पापा जी ने जब भारत से निकले
तो प्रऊपाजीजब भारत ऐसी निकाले जलदूत जहाज में तो अपने साथ भागवतम का
प्रथम स्कंद लेकर गये, पापाजीने जहाज में बुक डिस्ट्रिब्यूशन किया तो प्रपा जी ने
उस जहाज़ पर भी बुक डिस्ट्रीब्यूशन किया
जहाज ज।
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