The video presents a devotional group discussion in Hindi where participants share several anecdotes related to their guru, HH Gopal Krishna Goswami (referred to as Maharaj). Speaker A recounts an early incident when Maharaj fell ill and, on an unregistered piece of paper, wrote a will that explicitly named a devotee (identified only as a ‘no‑body’) whose later contributions would be significant. Speaker C narrates the mysterious stopping of a vehicle (and a clock) on the very day Maharaj passed away, explaining that Maharaj had instructed the vehicle to be hidden in a black bag during rath‑yatra (chariot processions) to prevent theft, a practice that continues. Speaker D reveals lesser‑known information about Ved Vyas Prabhu, highlighting his deep friendship with Maharaj, his substantial financial resources, and his crucial role in funding the temple’s construction during a period of tight bank loans, including connections to a Mumbai‑based architect and a company named Dava Sahab Chatur Masih. The discussion is informal, reverent, and focused on preserving oral history, emphasizing the guru’s foresight, devotion, and the community’s collective effort in temple building.
Chapters
here kisna so, this is a first time when guru maharaj fall ill and he rod, his will that time, but not registered he rod on a paper, and that will he clearly मेंशन the name of that person and i mean it long long back after that that divoti has done so much more that is only ninety five so that person s name is a no body, but over। will his gras, wedeasprbु and in that will made also mention when go, then mydisiples can take shelter of hisolenes loknas swami mahaराज
cendasuiee। हे वो, हे वो पीछे गुरु बहुत बात पर बैठ जाते हैं, मैं बैठ जाता आप रहिए
पीछे महाराज का फोटो हरे कृष्णा। तो ये गाड़ी जिस दिन गुरु वह शरीर छोड़े थे उसी दिन ये गाड़ी बंद हो गया था। तो अभी इस घड़ी को चालू कर दिए है दसवतारपो। तो गोरुमारा कभी भी रथ यात्रा होता था तो गाडी लेके जाते नहीं थे, बोले थे कोई कोई चुरा लेगा तो इसीलिए महाराज बोले थे इसको छिपा के रख 2 तो हमेशा इसको कई बार जब भी रथ यात्रा हो कभी पब्लिक फंक्शन हो महाराज हमेशा बोलते है ब्लैक बैग में रखे रखो तो छिपा के रखते थे इसको
तो हम आपको वेद व्यास प्रभु के बारे में 1 बहुत दिव्य छिपा हुआ ज्ञान देना चाहते हैं जो आप सब लोगो को किसी को पता नहीं होगा क्यूँ महाराज जी के मन में इनके प्रति इतना प्रेम था और कैसे हमारी इनकी दोस्ती बहुत खास हो गई। बाद में जब ये मंदिर बन रहा था तो वेद व्यास प्रभु वैसे तो बहुत बड़े आदमी थे, बहुत पैसा भी था लेकिन जब मंदिर का निर्माण काल चल रहा था तो बहुत बैंक बहुत टाइट हो गयी काफी पैसा इनके ऊपर लोन था। तो जो हम लोग महाराज जी हमारे गुरु भाई को बम्बई से यहाँ लाये थे दवे साहब चतुर मशीदास दवे जी उनका ओरिजनल दस्तूर कंपनी के वो थे पहले और उन्होंने ही आर्किटेक्ट जो कनविंडे साहब है उनको जोड़ा
था उन्होंने ही
तो पैसा भी घटता तो हमारे पास आते थे अगर हम उनको 1 हफ्ते में कुछ पैसा नहीं दिए तो सीधा भेद व्यास के ऑफिस चले जाते थे। तो हमें पता चलता था की हमको तो रोज रिपोर्ट आती रहती थी कहाँ से कितना कलेक्शन आया 1 दिन सन्डे को हमारे पास बैठे थे और मैं उनको थोड़ा डर लगा रहा था हमने प्रभु आप हमेशा स्ट्रगल करो वेद व्यास पास मत जाओ उनके बारे में आपको कुछ पता है प्रभु हम तो पता नहीं हम तो जाते हैं हमको मिलता लेके चल देता हूँ तब तक के पीछे से वेद व्यास प्रभु आ गए तो ये सुन गए मैं उनको थोड़ा उनके ऊपर दबाव डाल रहा हूँ, उन्होंने कहा महामंत्री प्रभु आप शांत हो जाओ और शांत हो जाओ हम क्यूँ देखो ये जो टिशर पहना हूँ ये बैंक के पैसे का है की वो जो जेम गाड़ी खड़ी है नीचे वो उस समय जिन ऐसी आदते पीले रंग की जिन वो भी बैंक की है और अगर मेरा खाना पीना, रहना सब कुछ बैंक ऐसी सदर रहा है तो मंदिर क्यों नहीं बन सकता। इस बैंक से महाराज की बड़ी स्पेशल कृपा थी उन्होंने कैसे कैसे कैसे लोगों को इसमें जोड़ा और ये राधा पर साथी कुछ चमत्कारी भव्य विग्रह है न्होंने जैसे क्यूँकी प्रहुपाजीइनको खुद लाये थे और प्रभुजी महाराज के लिए छोड़ा हुआ था की काफी करोगे तो इसमें से काफी चीजें निकलेंगी तो उसी में से 1 प्रभु निकाले और हम लोगों का सौभाग्य है की हमारे गुरु भाइयों का, सब का और इस खान का भी क्योंकि ये तो कभी किसी को ना नहीं कर सकते तभी आप लोग ये मान के चलो जो शिकस्त में फंसो कभी इनके पास अगर आओगे तो कहीं न कहीं से बैंक से लोन ला के दे ही देंगे शील की गोपाल कृष्ण गोस्वामी, शिला भगवत बाद की।