मन में ही जप करता हूँ माला की क्या आवश्यकता?🤔 | NOI-3 | 18 Jan 1997 | Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī

In this Hindi devotional lecture, the speaker (Gopal Krishna Goswami) welcomes the audience and explains that true bhakti (devotion) does not depend on external tools such as a prayer‑bead mala; the mantra can be chanted mentally. He introduces six guiding principles that enable progress in bhakti: (1) maintaining enthusiasm in all devotional activities, (2) cultivating patience and perseverance, (3) aligning one’s actions with scriptural teachings, (4) seeking the company of sincere devotees, (5) practicing determination without fear, and (6) offering service with love. The talk repeatedly contrasts material‑world motivations (profit, status, comfort) with the inner fulfillment that arises from sincere devotion, emphasizing that scriptures are the voice of God and that a guru’s guidance is essential. Numerous anecdotes – a bird trying to draw water from the sea, a poor brahmana serving the deity in his mind, and stories from the Bhagavad‑Gita – illustrate how obstacles can be overcome when the principles are applied. Practical advice is given for integrating bhakti into daily life: regular chanting, attending temple gatherings, reading sacred texts, and maintaining devotion even amid worldly responsibilities. The lecture concludes with a call for listeners to adopt these principles, seek divine grace, and spread the teachings of the Bhagavata and Gita.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय, म नमो भगवते वासुदेवाय। आप सब का हम हार्दिक स्वागत करते हैं। आप सब यहाँ आते हो क्योंकि आप में आध्यात्मिकता में रुची है, नहीं तो आप क्यूँ आते? यहाँ तो रूपगोस्वामी जी हमें उपदेश देते हैं कि किस प्रकार से भक्ति के कार्य में हम आगे बढ़ सकते हैं। यह किस प्रकार से भक्ति हमारी बढ़ सकती है और किस प्रकार से भक्ति में रुकावट आ सकती है। तो आज हम उपदेशित स्वामी जी ने अनेक ग्रंथों की रचना की है। जिसमें से 1 ग्रंथ है श्री उपदेश मित जिसमें भक्ति के अवश्य कार्यों का वर्णन है। ये श्री तीसरा स्लोक है। स्लोक बोर्ड के नीचे लिखा हुआ है। आप अगर मेरे बाद दुराज सकते हो, पढ़ सकते हो तो दुराइएगासहनिष्टयद धर्य संग त्यागे सतोबरेते। sbi andsjanjnashalaka n n s ma, श्री गुरबन, श्री चितानिया मनो बेस्टम साबित न भूत ले स्वयम रुपाकदामयमददाति स्वापदंतिकम बंदे हम, श्री गुरु, श्रीपत पदकमल, श्री गुरु बैषनवमश्न, श्री रुपाम संग्र जत सहागनारगुनातनमितम तम सजेवम सद वेतम सब धुतम परिजना सायत कृष्णा चेतन्य देवम, श्री राधा कृष्ण दान सहाना, श्री विषाखान्मितम शा, हे कृष्ण करुणा सिंधु धीना बंधू। जगत गो पेशा गोपिका कांता दा कंत मस्ते सता कंचना गोरांगी राधे वृंदावनेश्वरी, रिश बानु सूते देवी जय, श्री कृष्णा चेतन्या, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा, हरे हरे हरे राम हरे राम उत्साह निष्चय धर्यतसतततकर्मा परवर्तन संगत्याग सतो सद्वि भक्ति प्रसिध्यति। ये लोग हमें रूप स्वामी जी दे रहे हैं। रूप स्वामी जी ने अनेक ग्रंथों की रचना की है, 5 लाख से अधिक लोगों की रचना की उन्होंने। चेतन्य महाप्रभु जी के बहुत शिष्य थे और चेतन्य महाप्रभु जी उन्हें वृंदावन भेजा था। भक्ति सम्बंधित ग्रंथों की रचना करने के लिए। तो उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की। जिसमें से 1 है श्री उपदेश में, जिसमें बहुत ही महत्वपूर्ण उपदेश है। तो इस लोक में रूप गोस्वामी जी हमें बताते हैं 6 सिद्धांतों का वर्णन कर रहे है जिसके द्वारा भक्ति में आप आगे बढ़ सको। जिस प्रकार 1 व्यापारी भौतिक स्थिति में यही इच्छा रखता है कि उसका नफा बढ़ते जाए। हर भौतिकवादी व्यक्ति यही इच्छा रखता है कि उसकी आमदनी बढ़ते बढ़ते जाए। हम यही चाहते हैं कि जिस क्षेत्र में भी हम है, उसमे हम उन्नति करें, तरक्की करे। तुसी प्रकार जब हम भक्ति के कार्य में भी रुचि ले तो हमारा यह उद्देश्य होना चाहिए की हम वही कार्य करें जिसके द्वारा हम जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त कर सके। जिस प्रकार कोई रोगी व्यक्ति, बीमार व्यक्ति, वो वो ही दवाई, वो ही चीजों को स्वीकार करेगा, जिससे की सेहत अच्छी रहे। अगर आपको पता लगे की किसी चीज को खाने से आपके शरीर को नुकसान पहुँचेगा तो उसे स्वीकार करोगे। नहीं। आजकल लोग बिसलेरी का पानी क्यों पीते हैं? क्यूँ बार पर, पंद्रह पर, बोतल में खर्च दे, क्यूँकि उन्हें भय है? नल के पानी से बीमारी हो जाएगी? तो कहते हैं हम पैसा खर्चेंगे पर हमें अच्छा शुद्ध पानी चाहिए पीने के लिए। तो उसी प्रकार शास्त्रों के द्वारा हम ज्ञान प्राप्त करते हैं कि कैसे भक्ति बढ़ सकती है, सफलता प्राप्त कर सकते हैं और कैसे नष्ट हो सकती है। शास्त्रों का अर्थ है भगवान की वाणी या उनके शुद्ध भक्तों की वाणी जिसमें वो ही विचार दिया जाता है। धर्म का अर्थ है भगवान की वाणी। तो शुद्ध भक्ति को सफल बनाने के लिए 6 सिद्धांत अनुकूल होने चाहिए। सबसे पहले क्या कहते हैं? उत्साही बने रहना, उत्साह उत्साहित रहना चाहिए। साधारण कार्य के लिए भी हम उत्साहित रहते हैं। कोई खिलाड़ी हो या कोई व्यापारी हो, कुछ भी हो हम उत्साह के साथ काम करते हैं तो ही उम्मीद करते है की इस क्षेत्र में सफलता प्राप्त होगी। तो जब हम भक्ति के कार्य को भी स्वीकार करते हैं तो उत्साहित होना चाहिए और भगवान का नाम का भजन करते हो, भगवान का प्रचार करते हो, भगवान के लिए मंदिर बना रहे हो, जो भी सेवा कर रहे हो, अगर उत्साह उत्साह के साथ करोगे तो आप दूसरों को भी प्रभावित कर सकोगे। और अगर आप यही सोचोगे कि कार्य कर रहे है तो उसका इतना आनंद नहीं आएगा। हर व्यक्ति सुख चाहता है, आनंद चाहता है। पर दुर्भाग्य की बात यह है की हम ये नहीं जानते की किस माध्यम के द्वारा असली सुख की प्राप्ति हो सकती है। अक्सर अध्यात्मिक ज्ञान की ज्ञाता के कारण हम क्या सोचते है की भौतिक धन, भौतिक सफलता के द्वारा खुशी की प्राप्ति होगी। थोड़ा अधिक से अधिक प्रयास करते हैं भौतिक कार्यों में सफलता प्राप्त करने के लिए। पर छात्र के अनुसार जिस प्रकार मछली जल के बाहर रहकर संतुष्ट नहीं रह सकती, जिस प्रकार रेत स्थान में आपको जल की प्राप्ति नहीं हो सकती, उसी प्रकार भगवान से सम्बन्ध जोड़े बिना आप संतोषा प्राप्त नहीं कर सकते। और अगर आप भगवान से सम्बन्ध जोड़ने का प्रयास कर रहे हो, फिर हर स्थिति में आप संतुष्ट रहोगे। तो रूप को स्वामी जी कहते है की शुद्ध भक्ति के मार्ग में सफलता प्राप्त करने के लिए हमें उत्साहित होना चाहिए और हम उत्साहित क्यों नहीं हो। हम जिस जिन नियमों का पालन कर रहे हैं वो किसी साधारण व्यक्ति की कल्पना के अनुसार थोड़ी है। वो तो परम भगवान की शिक्षा के अनुसार है। साधारण व्यक्ति के शिक्षा उपदेश्य में अनेक प्रकार के दोष रहते हैं, है आप सब ने सुना होगा। 6 प्रकार के दोष हर प्राणी मात्र में प्राप्त होते है। पर भगवान की शिक्षा में तो ये 4 प्रकार के दोष नहीं है। पर भगवान तो कभी गलती नहीं करते, न ही उनमें चलने की इच्छा है, न ही वो किसी प्रकार के भ्रम में आते हैं, न ही उनकी इंद्रियाँ अपुन है। इस लिए गीता में भी भगवान कहते हैं माता परतरननकेंचिदस्ती धनंजय इस ज्ञान से ऊँचा और कोई ज्ञान नहीं है। तो भक्ति के मार्ग में जिन नियमों का हम पालन करते है वो तो भगवान की शिक्षा के आधार पर है। भगवान ही स्वयम आपको कहते है क्या गीता का क्या अंतिम उपदेश है सर्व धर्म भगवान कह रहे हैं सब धर्मों को छोड़ कर मेरी शरण में आओ और भगवान की शिक्षा का पालन करने में किसी प्रकार का भय नहीं रहना चाहिए। साधारण जब हम राजनीतिक नेता वगैरह कुछ कहते है, हम विश्वास कर लेते है। और भगवान जब कहते है सब धर्मों को छोड़ कर मेरे शरण में आओ, हम हिचकते हैं, आप किसी के पास नौकरी करने जाओ। वो कहता है सेठ जी कहते हैं इतनी थनका मिलेगी, आपको विश्वास रहता है धन का मिलेगी आप। सेठ जी कहते हैं ज्यादा मेहनत करो, धन का बढ़ायेंगे, तो आप ज्यादा मेहनत करते हो, विश्वास रहता है। पर भगवान जब कहते हैं मेरे शरण में मेरी शिक्षा का पालन करो, तो हम हिचकते हैं। तो जिन व्यक्तियों ने इस भक्ति के मार्ग में प्रवेश किया है। भक्ति के मार्ग की सुन्दरता क्या है की आप जिस आश्रम में हो, जिस स्थिति में हो, उस स्थिति में रहते हुए आप आगे बढ़ सकते हो। कई बार लोगों के मन में विश्वास रहता है कि अगर हम भक्ति के मार्ग में प्रवेश करना चाहेंगे तो हमें घर बार ये सब छोड़ना, पड़ेगा, त्यागना, पड़ेगा, वगैरह। और ये सब त्यागने की आवश्यकता नहीं है, केवल अपनी चेतना बदलने की आवश्यकता है। तो उस के साथ हमें भगवान की शिक्षा का पालन करना चाहिए। बिना किसी प्रकार का भय रखे हुए शिक्षा का पालन करने में निश्चय के साथ प्रयास करना, निश्चित रूप से डिटर्मिनेशन के साथ, यह नहीं कि भक्ति के मार्ग में कठिनाईयों का सामना नहीं करना पड़ेगा। यह नहीं कि आप जब भक्ति के मार्ग में आओगे तो हर 1 चीज सरल हो जाएगी। कई बार लोग सोचते हैं, लोगों के मन में विश्वास रहता है कि अगर हम हरी नाम का जाप आरम्भ करेंगे या भक्ति के मार्ग में जुड़ेंगे तो हर चीज सरल हो जाएगी। क्योंकि भगवान हमारे लिए कार्य करेंगे। तो हम यह नहीं कह रहे है की ससुराल नहीं होगी। पर हम ये कह रहे हैं कि निश्चित रूप से हमें इस मार्ग में प्रवेश करना चाहिए। और अगर कठिनाई भी आई तो हमें इस भक्ति के मार्ग से जुदा नहीं होना चाहिए। है भगवत गीता में गुरु जी 1 बड़ा सरल उदाहरण देते हैं। 1 समय 1 चिड़िया के बच्चों को सागर ने चुरा लिया था। माता ने जाकर बच्चों सागर से कहा, मेरे बच्चों को तुम लुटा। 2 सागर ने हँस कर कहा, मैं नहीं लुटाऊंगा तुम्हारे बच्चों को, तो माता को दुख हुआ। माता ने कहा कि तुम नहीं लुटाओगे मेरे बच्चों को। तुम्हें अपने मुँह से सुखा दूंगा। तो सागर हँसने लगा। उसने उसके बच्चों को छुपा कर रखा हुआ था। 1 चिड़िया अपने मुँह से कितना पानी उठा सकती है। पर जभी भी उसने यह निश्चित कर लिया था कि मैने जरूर अपने बच्चों को वापस प्राप्त करना है। इस सागर से तर अपने छोटे से मुँह से वो पानी को सुखाना उसने आरम्भ कर दिया। असम्भव कार्य था। खैर, यह सूचना पहुंच गई। गुरुद तक गुरुद हैं वो चिड़िया जो कि भगवान विष्णु को उठाते हैं। जैसे ही गुरुता को खबर पहुंची कि ये थी चिडिया की स्थिति और अपने मुंह से सागर को सुखाने का प्रयास कर रही अपने बच्चों को प्राप्त करने के लिए तुरंत ही वहाँ गुरु आ गये। उन्होने सागर को कहा लौटा उसके बच्चों को नहीं तो मैं तुम्हे सुखा दूंगा। फिर सागर ने सारे बच्चे वापस कर दिए। तो सरल उदाहरण है। कहने का अर्थ यह है कि कई बार हमें भक्ति के नियमों का पालन करने में ऐसा महसूस होता है की ये कठिन रहेगा माला का जॉब करने के लिए समय नहीं ढूंढ पाएंगे, हम शास्त्रों को पढने के लिए समय नहीं ढूंढ पाएंगे। रविवार को हम मंदिर जाने का नियम बनाया है। पर कई बार कोई न कोई कार्य आ जाता है या कोई न कोई घटना बीत जाती है। पर अगर आप निश्चित रूप से निश्चित कर लो, अपने माला का जाप जरूर करना है। आपने भगवान के आदेश को जरूर पढ़ना है, जो की है तो भगवान आपको सफलता हमें भूलना कहते है। ईश्वर भगवान हरि के हृदय में विराजमान है। कहते हैं ज्ञान अहाना मैं अपमान भूलने की शक्ति देता हूँ और किसकी स्मरण की शक्ति भी मेरे से ही आती है। तो क्या कारण है? 1 व्यक्ति को भगवान भूलने की शक्ति देते है और 1 व्यक्ति को स्मरण करने की। कारण ये है की भगवान इच्छा के अनुसार आपको सुविधा देते हैं। उदाहरण के लिए अगर आपकी इच्छा हो, क्या आपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करना है, तो भगवान आपको ऐसी स्थिति में डालेंगे जहाँ की आपको भक्तों की संगत मिलेगी। या भगवान का उपदेश्य ग्रंथों द्वारा मिलेगा। और अगर आपकी इच्छा हो कि नहीं। नहीं, हमारी भक्ति में कोई रूचि नहीं है तो बेकार का कार्य है। तो भगवान आपको वैसे व्यक्तियों की संगत में ले आयेंगे की कोई चर्चा नहीं होगी। तो भगवान हरि के हृदय में राजमन है। वो हर चीज के साक्षी हैं, वो आपको बुद्धि देते हैं और इच्छा के अनुसार आपको ज्ञान देते है। क्यूंकि? भगवान जबरदस्ती किसी को सेवा में नहीं छोड़ते तो रूप स्वामी जी का कहना है निश्चित रूप से हमे इस मार्ग में जुड़ना चाहिए। और जब भगवान देखते है की ये निश्चित रूप से मेरे साथ जुड़ रहा है तो भगवान आपको बुद्धि देते हैं, सुविधा देते हैं इस मार्ग में आगे बढ़ने के लिए। भगवान गीता में कहते हैं तेसामसदातायुकतानाम बदतम, प्रीति पूर्वक, जो कि प्रयास करते हैं प्रेम के साथ, प्रीति। प्रीति का अर्थ है प्रेम के साथ, जो कि प्रेम के साथ मेरी सेवा में जुड़ते हैं, उनको मैं बुद्धि देता हूँ। मुझे समझने के लिए भौतिक, वादी व्यक्ति। ये सोचते है। हमारे विज्ञानी यह सोचते हैं कि किसी भौतिक प्रबंध के द्वारा वो भगवान को ढूंढ लेंगे या समझ लेंगे। पर भगवान को समझने के लिए किन चीजों की आवश्यकता है? धन की, खबसूरती की नहीं, भौतिक शिक्षा की, पी एच डी डिग्री वगैरह की आवश्यकता है, है? नहीं। भगवान को समझने के लिए सेवा की आवश्यकता है। जैसे उदाहरण के लिए, भगवान गीता में कहते हैं पत्रम पुष्पम, पलम, तोयम कहते हैं पत्ता, मुझे अर्पण करो, उससे मैं स्वीकार कर लूंगा। पर 1 शर्त है। साथ में क्या क्या है, है भक्ति, प्रेम और से प्रेम और भक्ति के साथ, प्रेम के साथ आप जल्द। अपन भगवान उसे स्वीकार कर लेंगे। प्रेम और भक्ति के साथ तो जैसे की हम सब का व्यास है। प्रापा जी अमेरिका गए थे, किसी ने तो कृष्ण, बहुत कम लोगों ने अमेरिका मे कृष्ण का नाम भी सुना था विदेशों में और असली सन्देश तो बहुत ही कम लोगों को शायद पता होगा। पर पापा जी ने प्रचार किया, भक्तों ने स्वीकार किया, जब स्वीकार किया उनमें, उनके पास तो कोई गुण नहीं था, पर वो प्रयास करते गए। फिर हस्ते स्ते भगवान ने उनको बुद्धि दी। इस मार्ग में आगे बढ़ने के लिए तो निश्चित रूप से हमें इस मार्ग को स्वीकार करना चाहिए। आगे क्या धैर्यवान होना, धैर्यवान होना चाहिए। पेशेंट धैर्यवान बहुत अवश्य है। कई बार हम सोचते है भक्ति के मार्ग में प्रवेश किया है। तुरंत ही हमें भगवान का दर्शन प्राप्त हो जाना चाहिए। भगवान को देखना इतना सरल नहीं है। भगवान को देखने के लिए प्रयास करना पड़ेगा। क्या प्रयास से ही अशुद्ध, मन, अशुद्ध, इन्द्रियां, अशुद्ध, बुद्धि, शुद्ध बनेंगे। भगवान को समझने के लिए शुद्ध, मन, शुद्ध, बुद्धि, शुद्ध इंद्रियों की आवश्यकता है। जैसे बीमार व्यक्ति को आप अच्छे से अच्छा खाना खिला, 2 उसे उसका टेस्ट महसूस नहीं होगा। तो इस इस स्थिति में हम भगवान को नहीं समझ सकते। इसलिए रूप गोस्वामी जी ने 1 और ग्रंथ जिसका नाम है भक्ति रस मृत सिंधु। उसमे रूप को स्वामी जी वैधी भक्ति का वर्णन करते हैं। वैधी भक्ति, वैदि का क्या, नियम, अनेक नियमों का पालन करना और जब इन नियमों का पालन करोगे तो इन नियमों के पालन से हमारा अशुद्ध, बुद्धि, अशुद्ध इंदिया शुद्ध बनती है तो हमे धैर्यवान होना चाहिए। जैसे की खास कर जिन लोगों ने ग्रंथों को पढ़ा है वहाँ देखा होगा आपने कि चेतना महाप्रभु जी ने जो कहा है सिनादूपीसुनीचेना इस पर बहुत बल दिया गया है। बिल्कुल सहनशील होना चाहिए। अगर हम हरी के नाम को जीव के साथ जोड़ना चाहते हैं तो धैर्यवान होना चाहिए। इस मार्ग में सफलता प्राप्त करने के लिए आगे क्या अनुसार के अनुसार कर्म करना। भक्ति का ज्ञान हमें शास्त्रों द्वारा प्राप्त होता है और जो पूर्व अचार्य है वो जब उपदेश देते है, शास्त्र के अनुसार है, जो असली अचारिया है वो कभी ये नहीं कहता। मेरे विचार से ऐसे होना चाहिए वो केवल यही कहता है श्री भगवान उवाचा भगवान ने यह कहा और इसलिए आपको ऐसे करना चाहिए। आज हम देखते है में अनेक धार्मिक संस्थाएं हैं, धार्मिक संस्थाओं की कोई कमी नहीं है और हमारे देश में क्योंकि बहुत कम व्यक्ति शास्त्र के अनुसार शिक्षा ग्रहण करते है तो परम भगवान और देवताओं का अंतर वो भी वो समझ नहीं पाते। धार्मिक शिक्षा हमें शास्त्र के अनुसार स्वीकार करनी चाहिए। तो यहाँ कहा गया है की अनुष्ठानों के अनुसार कर्म करना जैसे कि नव भक्ति का वर्णन है। यहाँ नव भक्ति, इसका उदेश्य हमें सबसे पहले प्रलाद महा जी ने दिया था। प्रलाद महा जी ने तो आध्यात्मिक शिक्षा स्वीकार की थी अपनी माता के घर में, किसके द्वारा, मुनि जी के द्वारा यह शिक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने। तो हमे विश्व में जी ने क्या कहा श्रम, कितना विष्णु स्मरण आत्म निवेदन तो सन कितन विष्णु सेन आचनमवंद्यम दस्यम सख्यम आत्म निवेदन। तो यह है भक्ति का ज्ञान। तो हमें इनका पालन करना चाहिए। सारे 9 का नहीं कर सकते तो 12 का करो 3 का करो देखते होगे की जब भी आप भक्तों से मिलते है यह निवेदन करते हुए करते हैं। क्या हर कृष्ण कीजिये, क्यूँ भव द्वानी की मैल जो की उपस्थित हैं। काम, क्रोध, लोभ, मद, सरिया के प्रभाव के कारण वो दूर हो जाती है। और महा प्रभु जी ने बड़े सुन्दर शब्दों से कहा है कि भगवान इतनी दया दयालु है की अपनी पूरी शक्ति डाली है। किसमें नामों में भगवान ने पूरी शक्ति डाली है। अपने नामों में। मौत वादी व्यक्ति समझ नहीं सकते कि भगवान के भक्त व इनामों का बार बार कैसे कर सकते हैं। जब प्राजी ने इस संस्था की स्थापना की पश्चिम देशों में तो कई लोग इतने हैरान हो गए थे। कहते दे तो कोई जादू कर दे, देंगे। कृष्ण वाले लोग क्यूँ जादू। वो ही नाम बार बार वो लोग लेते है। क्यूँकी? साधारण समाज में तो आप किसी भौतिक नाम को बार बार तो नहीं ले सकते। रेडियो में भी फिल्मी गाने सुनते हो तो सुनते होगे। वो गाना 1 गाना बजाते हैं। फिर अगले अगला गाना कोई और होता है। पर भगवान के नाम में भगवान ने पूरी शक्ति डाली है। भिन् न नाम नाम। तो जब आप भगवान के नाम को लेते हो तो भगवान के नाम लेने से चेते। महा प्रभु जी जैसे कहते है की हृदय की जो महल है वो निकलना शुरू होती है। पर हम भगवान के नामों के गुणों को जानते हुए भी दुर्भाग्य की बात क्या है, लाभ नहीं उठाते चेतन प्रभु है। पर भगवान पर आये थे भक्त के रूप में, जब लोग कहते थे भगवान वो कान बंद कर देते थे। आज तो स्थिति यह है कि जो ढोंगी व्यक्ति है वो दावा करते है। हम भगवान है महाप्रभु जी जो असली भगवान थे, उन्होंने अपना विराट रूप दिखाया था। द्वेतचायकोअपना सद बुज रूप दिखाया सर्वमवचारेऔरअनेक भक्तों को। वो तो सचमुच परम भगवान थे। जब वो वृंदावन में गए तो वृक्षों ने भी उन्हें पहचान लिया। पेड़ों ने भी की आप हो कृष्ण। पर जब कोई उन्हें कहता था ये की आप भगवान हो। वो कानों में हाथ रख देते थे। कहते नहीं तो जितना महा प्रभु जी को भक्त के रूप में आये थे। तो उन्होंने कहा है कि भगवान इतनी दया दयालु हैं, उन्होंने अपनी पूरी शक्ति डाली है इन नामों में और मैं इतना दरभागयशाली हूँ के मैं उनके प्रति आकर्षित ही नहीं हो रहा। तो वो है हम सब की स्थिति। हम हरी नाम की महिमा के विषय में ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं, शास्त्र को पढ़ चुके हैं। पर जब भी मन होता रहता है, हमारा मन। इसलिए रूप को सम कहते हैं। निश्चित रूप से। और रूप ऐसी स्वीकार करे। फिर हम अपने आप को बचा सकेंगे। तो रूप को सम जी कहते हैं। अनुसार के अनुसार कर्म करना चाहिए। हमारा सारा कार्य, शास्त्र के अनुसार होना चाहिए और जो चारियों का सिद्धांत है उसी के अनुसार चलना चाहिए। और भक्त की संगति छोड़ देना तो आप का हो गया की अगर भक्तों की संगति छोड़ दे तो हमें मंदिर में ही रहना पड़ेगा। आप धन्दा करते हो तो आपके सारे गिरा तो शायद हरे कृष्णा मंदिर के भक्त में ही होते है तो आप पढाई करते हो या नौकरी करते हो तो भक्तों की संगति कैसे छोड़ोगे और जितना हो सके भक्तों की संगत का लाभ उठाओ। जैसे के हर केंद्र में हर रविवार को इस प्रकार का कार्यक्रम किया जाता है। आप सब घर में रहते हो, धंदा करते हो, नौकरी करते हो, पढाई करते हो, पर हर रविवार को अगर आप मंदिर में भगवान के विग्रह का दर्शन प्राप्त होगा और भगवान में कोई अंतर नहीं है। भगवान इतनी दया दयालु है की न ही वो अपने दिव्य नामों में अवतरित होते हैं, न ही वो अपने शास्त्रों के द्वारा अपने आप को प्रकट करते हैं, पर वो अपने आर्चेविग्राहा के रूप में भी अपने आप को प्रस्तुत करते हैं। देखो कितने दया दयालु हैं, उनके आर्च व्यग्र के आप उपासना करो, उनके दिव्य नामों का उच्चालन करो और उनकी शिक्षा का अध्ययन करो। बस और किसी कार्य की आवश्यकता नहीं है आध्यात्मिक मार्ग में सफलता प्राप्त करने के लिए और अगर आप श्रद्धा के साथ आर्य ग्राहक की उपासना करोगे तो यही मूर्तियाँ आपसे वर्ता करेगी। आप से बात भी करेंगे तो हर रविवार को जब आप आते हो, मंदिर आरती में उपस्थित होते है, भगवान के सामने प्रणाम करते हो, भगवान के भ भक्तों की संगत प्राप्त करते हो, शिक्षा प्राप्त करते हो, किर्तन में भाग लेते हो, वे कार्यों के द्वारा प्रेरणा बढ़ती है। भक्ति में, भक्ति में इतनी शक्ति है कि अगर आप प्रमाण रूप से नहीं कर सको और केवल मन में ही सेवा करो तो भी उसका पूरा लाभ उठा सकते हो। 1 समय 1 बहुत गरीब ब्राह्मण था और आध्यात्मिकता में उसकी बहुत रुची थी, तो 1 समय वो कथा सुन रहा था जहाँ की उसने सुना क्या उसने सुना की भगवान की भक्ति अब मन से भी कर सकते हो। तो उसने गरीब था पर उसे दुख नहीं था की वो गरीब है। आर्थिक दृष्टि से वो समझ गया था कि पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण सुख दुख हम सबको भुगतना पड़ता है, तो दुख को भी उत्साह से ही भुगतता है, घबराता नहीं है। तो उस गरीब ब्राहमण ने यही सोचा कि मैं भगवान की पूजा करूँगा, उसने यह सोचा अपने मन में की मैंने अपने घर में 1 बड़ा सुन्दर सिंगर सान बनाया है, सोने का, सोने का, लकड़ी का भी नहीं। और उसने अपने मन में यह कल्पना की कि भगवान की राधा कृष्ण की मूर्तियों की स्थापना भी हो गयी है। और जैसे की हम मंदिर में 7 बार दिन में भगवान को भोग लगते लगते हैं। कई मंत्रों में जैसे जगत पुरी भगवान जगत के मद में कितनी बार भोग लगता है, 56 भोग लगता है जगत पुरी में भगवान जगना जी के पास भोग लगते रहता है तो ये भगवान का भोग लगा था रोज विदाउट फेल जैसे आपने देखा होगा के मन में आरती बिल्कुल ठीक समय होती है, ठीक समय वो आरती करता था, ठीक समय भूक लगता था, भगवान के लिए रसोई बना रहा था सब अपने मन ही मन में भगवान ने उसकी भक्ति को पूरा स्वीकार किया। 1 दिन वो सो रहा था तुम 1 सपने में ये आया विचार के भगवान के लिए मैं खीर बना हूँ खीर बनाते हैं, गर्म करके उबाल कर ठंडी हो जाती है भगवान को चढ़ाते हैं के लिए गर्म है की अभी ठंडी हो गयी है। जब उसने उंगली डाली अंदर तो सच मुच ही उसकी उंगली जल गयी, जब उसकी उंगली जल गई तो हैरान हो नींद से उठा हैरान हो गया था कैसे उंगली जल गई तो कल्पना में मन में ही सेवा कर रहा था। पर भगवान उसे अपने में वापस ले गये क्यूंकि मन ऐसी ही वो इतनी सेवा कर रहा था। मन से ही उसने भगवान की मूर्तियों की स्थापना कर ली थी अपने घर में मन से ही उनको भोग लगा रहा था, मन से ही उनकी पूजा कर रहा था, मन से ही उनको रोज प्रणाम कर रहा था। तो आप कहोगे तो हम भी मन से ही सेवा शुरू कर देते हैं। बहुत से व्यक्ति जिनको हम कहते हैं जब करो कहते है कर दे है, जब स्वामी जी जप माला कहाँ है मन में करते हैं हम जब मन ही मन में तो 1 समय हम पापा जी के साथ थे तो 1 दिल्ली में ये घटना बीती थी, कई सजने मिलने आये तो प्रापा जी सबसे यही निवेदन करते हे की जगह तो उन्होंने कहा की स्वामी जी हम जॉब करते हैं और मन ही मन में जॉब करते है। तो स्वामी जी ने कहा उन्हें जब आपको भूख लगती है आप के मन ही मन में खाते हो या मुह के द्वारा का खाते हो, आप को मुह से खाते हो, अगर मन ही मन में खाओगे तो पेट भरेगा नहीं भरेगा तो उसी प्रकार हमें परिश्रम करना चाहिए इन भक्ति के नियमों का पालन करने के लिए। श्रम कितना के सहयोग से भगवान का स्मरण भी सम्भव होएगा। तो भक्तों की संगति को त्याग का अर्थ है की आवश्यकता से अधिक नहीं, जितना आवश्यक उतना तो रखो पर जितना मौका मिले भक्तों की संगत का भी लाभ उठाओ। क्यूँकि इस संगत के द्वारा भक्ति के विचार हृदय में गहराई से स्थापित होंगे? और भक्ति की भक्तों की संगत के द्वारा भक्ति की जो भावना है वो बढ़ती है। भक्तों की संगत में आने से ये प्रेरणा बढ़ती है। जैसे की पिछले महीने गीता मेरा में गीता बाटी थी, आप सब से निवेदन किया था, आप गीता बाटने में सहयोग दीजिएगा और आप में से कई ने सहयोग दिया। तो सारे विश्व में इस संस्था का सबसे मुख्य कार्य क्या है? ग्रंथो को बाटना क्यूँ भक्तों द्वारा लोगों को संगत मिलती है महान चारियों की और संगत के द्वारा जो भक्ति की भावना जो की हुई है, भौतिक विचारों से वो मैल निकालती है। और यह भावना जागृत होती है। सो आप सब के। हम भारी है कि आप ने पिछले महीने बहुत प्रयास किया था, सहयोग दिया था ग्रंथों को बाटने के लिए। पर आप सब से निवेदन यही है की आप भक्ति के मार्ग में आगे बढ़िए। रोज। श्रीमा हरी कृष्ण मंद का जवाब, जरूर कीजियेगा चाहे कितने भी व्यस्त क्यों न हो, चाहे कितनी भी जिम्मेदारियाँ हो, प्रयास करो रोज भगवत गीता श्रीमद भागवत को पढ़ने के लिए। और भागवत पढ़ोगे तो क्या ज्ञान प्राप्त करोगे। शुद्ध भक्ति का बड़े स्पष्ट रूप से भागवत में कहा गया। सब पूनम भक्ति की आत्मा संतुष्ट हो सकती है। केवल इस सेवा में। जुड़ने के द्वारा। और इतनी अच्छी कथा है, लीला है भगवान की। भगवान का, उदेश्य है इन के द्वारा, अपने मन को, मन के द्वारा, इन भगवान के उपदेश का स्मरण करो। मन है। अर्जुन ने क्या कहा? वायु को वश में लाना सम्भव है। और मन को वश में लाना ज्यादा कठिन है। और मन को बंधु बनाना चाहिए। मन जब तक बंदूक नहीं बनेगा, आप कठिनाई महसूस करोगे भक्ति के मार्ग में? और मन बंदूक कब कहलाता है? जब वो छात्रों की शिक्षा, गुरु की शिक्षा, साधु की शिक्षा के अनुसार सोच रहा है, तो भागवत अब पढ़िए गीता पढ़िए और घर में जो भी खाओ, केवल प्रसाद ग्रहण करो, प्रसाद ग्रहण करना कठिन नहीं है। सबसे पहले, अवश्य यह है की आप मासंदामच्छीभगवान को नहीं अर्पण कर सकते। खाने से पहले भगवान को भोग लगाओ, भोग लगाओगे तो प्रसाद बन जाएगा प्रशाद का, भगवान की दया और इस प्रसाद में भगवान की थूक भी प्राप्त होती है। भगवान तो नेत्रों से ही खा लेते हैं, कानों से ही आप और हमको खाने के लिए हाथ की आवश्यकता है, चम्मच की आवश्यकता है, मुह की आवश्यकता है। पर भगवान तो कानों से और नेत्रों से ही खा लेते है। तो ये सब बड़े सरल कार्य है। और भगवान का यही उदेश्य है की हम किसी न किसी रूप से उनके शरणागत हो। भौतिक संसार है कष्ट का स्थान और हम सब प्रयास कर रहे हैं इन कष्टों से छुटकारा प्राप्त करने के लिए। और उपाय है शास्त्रों की शिक्षा। आज अगर किसी चीज की आवश्यकता है तो इस शिक्षा की आवश्यकता है, कृपा करके इसे स्वीकार कीजिये और यही शिक्षा दूसरों तक पहुँचाइए। इसके द्वारा आपको भी आनंद प्राप्त होगा और दूसरों को भी सुख प्राप्त होगा। और आप भगवान के प्रिय भक्त बनोगे तो प्रयास कीजियेगा। भगवान के प्रिय भक्त बनने के लिए सब प्रयास करते हैं। कोई प्रसिद्ध व्यक्ति का मित्र बनने के लिए, उसके निकट जाने के लिए, तो इससे अच्छा भगवान के निकट जाने का प्रयास कर। और सब सुविधा तो दी हुई है। सारी शिक्षा तो प्राप्त है, पर इन ग्रंथों में हर लोक के पीछे इतने लम्बे लम्बे, तात प्रिय लिखे हैं। ये छोटी सी किताब है आ और हर्ष लोक के ऊपर। प्रभा जी ने 8, 10 पेज का तात्पर्य लिखा है। क्यूँ? क्यूँकि उन्होंने सरल शब्दों में भगवान उनके संतों की शिक्षा को समझाया है। और अगर हम प्रयास करेंगे तो हमारा ज्ञान, बढ़ेगा और ज्ञान से, आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति से बुद्धि तेज बनती है और तेज बुद्धि के साथ माया रूपी विचारों को काटना ज्यादा सरल बन जाता है। सो कृपा करके भगवान श्री कृष्ण की शिक्षा को प्राप्त करके अपने जीवन को सफल बनाइए। हरे कृष्ण हारे कृश्णा, हरे किशना क्रिश्ना हारे, हारे, हारे, मा हार हार।
More from PRASAD

Rare Pastimes & Timeless Lessons of Guru Mahārāja | Stories Every Disciple Should Hear

ISKCON Legends- pure devotees meet-HH Jayapataka Swami, HH Gopal Krishna Goswami, HH Radhanath Swami

Jagannātha Ratha-yātrā Through Śrīla Prabhupāda's Mercy | 29 April 2006 | Nairobi, Kenya

Lord Jagannātha's Appearance Pastime | 21.07.2019 | ISKCON Calgary | Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

The Ācārya Teaches by His Own ExampleGuṇḍicā Mārjana by Guru Mahārāja #shorts

Guṇḍicā Mārjana – Lord Jagannātha's Pastime | 21.7.2019 | ISKCON Calgary |Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

H.H. Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī Mahārāja - Exemplary Sādhana and Deity Worship # shorts

भगवान की कृपा कैसे प्राप्त होगी ? | 11 Jan 2014 | Punjabi Bagh | Srila Gopal Krishna Goswami

Material Education vs Spiritual Education | Srila Gopal Krishna Goswami #shorts

