नाम-संकीर्तन की महिमा | Oct 1995 | Mumbai | Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja

In this extensive devotional discourse, Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja addresses the spiritual condition of the present age (Kali Yuga) and emphasizes the unparalleled power of chanting the holy names of Lord Krishna (nama‑sankirtan). He explains how the material comforts and technological conveniences of modern life have led to a decline in genuine devotional interest, making elaborate rituals and priestly services less effective. The Maharaja presents the divine name as a simple, all‑encompassing remedy—pure, complete, eternal, and capable of delivering liberation without the need for complex sacrifices. He illustrates the practice with examples of long‑duration kirtans, the transformative effect of repeated chanting, and the scriptural basis for the supremacy of Hari‑nama. The lecture also critiques false religious practices, commercialized worship, and the exploitation of devotees, urging listeners to seek authentic guru‑satsang, develop sincere devotion, and adopt nama‑sankirtan as the primary means of spiritual progress. Social observations about the proliferation of telephones, television, and other comforts are used to highlight the paradox of material abundance versus inner peace. Throughout, the Maharaja calls for a return to the simple, powerful practice of chanting God’s name to attain mental tranquility, moral upliftment, and ultimate liberation.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम नमो भगवते बासु देवाय म नमो भगवते वासु देवाय धान जला सलखान सूरत ना श्री श्री चेतन्य मनबशामनवतनहूसले हयामुपा हम 1 से दुरी धोबेचाधोबकदे श्री हम श्री कृष्ण के कन्या हो गई कृष्णा कृष्णा हरे हरे राम राम राम है। यह बहुत खुशी की बात है क्या भक्तों में भगवान श्री कृष्ण के प्रति श्रद्धा अस्ते अस्ते बढ़ रही हुई है। 1 तरह से कल युग है तेजी से हलवाई सांस में कहा गया है की कलियुग में हम 2 चीजों को देखेंगे 1 तरफ से कलियुग का प्रभाव दूसरी तरफ सी के महा प्रवृति के आंदोलन का प्रभाव दोनो साथ साथ चलेंगे। कलयुग का प्रभाव का अर्थ यह है की बहुत कम व्यक्ति हानि रूचि नहीं है। श्रीमद भागवत में कहा गया है भाजपा की कलयुग की जो प्रजा है वो 1 दुर्भाग्यशाली है और आरती भी है और हिता में बहुत कम रुचि लेती है। तो आज अगर आप देखो समाज में हर जगह पूरी सुविधा प्राप्त होती है जिसके द्वारा अगर आप भगवान को भूलना चाहो तो आप भूल सकते हो। बड़ी मैंने आप लोगो को बताया था की आज घर बैठे बैठे आपको 50 के टीवी मिल जाते हैं और अनेक और सा है जिनके द्वारा हम भगवान को भूलना चाहे तो बड़ी सरलता के साथ भूल सकते और साथ में चेतन महाप्रभुजी का आंदोलन भी है। के में महा प्रबुद्धि के तो आप का परिचय है चेतने महाप्रबुद्धिपदम भगवान श्री कृष्ण का है जैसे की भगवान गीता के चौथे अभियान में बोलते है या जिला भारत अलग अलग समय में मैं होता हूँ क्यूँ ना साजन संभव का अलग अलग समय में धरम के नियमों की हाना करने से ल तो भगवान को पता था की कलियुग में अनामिका में बहुत कम लोग रूचि लेंगे और प्राचीन समय में जैसे की हमारे शासन के अनुसार 4 मुख्य युग माने जाते है। सत्य, अगला, क्या, अगला, अच्छा तो सतयुग में लोग 1 लाख साल तक जीते थे, 1 लाख साल तक उनकी अवधि होती थी और सतयुग में पूरी प्रजा भगवान के चरणों में लीन थी, पूरी प्रजा से जुडी हुई थी पूरी प्रजा और उसके बाद आया खेत योग, खेत योग में भी अध्याितामेंरुची थी। के से थोड़ा का थोड़ा सा और भगवत प्राप्ति के लिये बड़े बड़े यज्ञ वगैरह किए जाते थे। उन यज्ञों में शुद्ध प्राणों की आवश्यकता होती थी। आज कल तक हमने कभी पूजा वगैरह करवाना। कहते है ब्राह्मण पंडित जी को दया और पंडित जीबी किधर भी जाने को तैयार हैं जब तक उन्हें चंदा मिल जाए थोड़ा और ये जो ब्राहमण होते थे ये चंदे के लिए कुछ वगैरह नहीं करते थे। इन में इतनी ताकत होती थी कि जब उन्होंने आंख भी जलाना हो में तो माचिस से नहीं चलाते थे, माचिस होती थी, सिगरेट लाइटर था वो मंजरों के उचानथेआँखको पैदा कर देते थे सकती थी उन ब्राहमणों में, तो वह थी ब्राह्मण यज्ञ करते थे और इन ब्राह्मणों के अलावा हर चीज में शुद्ध प्राप्त हो गयी थी। फिर आया द्वापर युग द्वाबयुगमें भक्ति की भक्ति का साधन था। वगैरह में महंगी चीजों को भगवान की चंदा में भेट रखना। पर कलियुग में भगवान को पता था कि न तो लोग भगवान का चिंतन कर सकेंगे, न कर सकेंगे, न ही भेद वगैरह अल्प कर सकेंगे। तो जिस प्रकार माता पिता जब बच्चे को पालते है तो समझ जाते हैं कि बच्चों की क्या योग्यता है और उसके अनुसार वो फिर बच्चों को खुराक देते हैं, यह जिम्मेदारी देते हैं। तो उसी प्रकार भगवान को पता था पता है की कलियुग में आध्यात्मिकता के प्रति रुचि बहुत कम लोग लेंगे। तो भगवान ने 1 बहुत सरल साधन दिया है, वो है कृष्णा का किर। इसलिए आप लोग जब भी किसी इस के कार्यक्रम में आते हो, यहाँ आपके बॉम्बे में ही नहीं विश्व के कि कोने में ले। पहले 123 घंटे कीर्तन हो आप रूस में जहाँ इंग्लैंड में जाओ 22 घंटे भर किर्तन करते हैं, किर्तन के द्वारा हम क्या करते हैं? भगवान के दिव्य नामों का आपका नाम है, हमारा नाम है आपकी पत्नी, बच्चे, माता पिता, मित्रों के नाम है हाँ जिसका नाम प्रेम सिंह है, किसी का नाम है कल्पना, किसी का है, मधु कुछ भी, तो आप उनके नाम को ले लो। उदाहरण के लिए और आप उनके नाम को प्रयास करो। बार बार पुकारने के लिए आप देखोगे की आप 2, 3, 10 बार पुकारोगे, फिर थक जाओगे। चाहे वो व्यक्ति आपका कितना प्रेमी हो, मित्र हो, का हो, क्या आप कोई भी नाम ले लो, 1 बार लोग, 10 बार लोगे, 20 बार लोगे, प्रेस थक जाओगे। पर भगवान के नामों में इतनी शक्ति है क्या आप 24 घंटे में लोगे तो नहीं थकोगे? इसीलिए कहा गया है पूल भिन्न नाम। नामी 1 प्राचीन ग्रंथ है जिसका नाम है पद्मा, पुराण में कहा गया है नाम है चिंता कृष्ण, ये जो कृष्णा का नाम है, द चिंतामनी परस पत्थर के समान है। पत्थर को जहाँ भी आप सो वह वो स्थान सोना बन जाता है। तो भगवान का जो दिव्य नाम है, ये चेतावनी पर पत्थर के समान है। आम के पूर्ण, शुद्ध, नित्य, मुक्त और ये जो भगवान के नाम है। पूर्ण हूणों का अर्थ है कि वो हर रूप से पुरे है। भगवान के नामों में बिल्कुल अधूरा पन नहीं है, हल, रू, सी, पूरा। हम सब में बेशकनीगुलहोपरअने कमिया भी है, दोष भी है और भगवान के नामों में कोई कमी नहीं है। पूर्ण मतलब ये है की अगर आप किसी प्रकार से भगवान के नाम को अपना लो, उसके अलावा और किसी प्रकार के यज्ञ की आवश्यकता नहीं है। यह हरी नाम के आलावा और किसी प्रकार के संयोग वगैरा की आवश्यकता है। कई बार आप डॉक्टर के पास जाते है, वो बोलता है, यह 1 दवाई ले लो और कोई दवाई लेने की जरुरत नहीं है। खैर वो हर डॉक्टर कहता है। और हम जानते हैं 1 दवाई में ज्यादा ताकत नहीं है। और शास्त्र में जब कहा गया पूर्ण पूरा विश्वास होना चाहिए। यह हरी ना में ही पूरी दिव्य शक्ति है। शुद्ध मतलब पूर्ण वो बिल्कुल पवित्र है। भगवान के नाम इतने पवित्र हैं की अगर कोई बुरी नीयत तो भगवान का नाम ले तो उसको ला। आपको याद होगा आज से लगभग 25 साल पहले आखिर बड़े प्रसिद्ध फिल्मी कलाकार देव ने 1 फिल्म बनाई। हरे रामा, हरे शिरामे समय छोटे हो गए। जवान है वो तो रात ने वो फिल्म देखी भी होगी। हमने फिल्म तो नहीं देखी। और ये जरूर सुना था इसमें 1 गाना था दम दम और इसमें यह भी कहा गया है 1 गाना है। वो फिल्म के बैकग्राउंड में कृष्ण मंत्र बज रहा था पूरी फिल्म में। तो हम उस समय जब ये फिल्म रिलीज हुई थी हमने परहाजी हमारे गुरु जी से कहा फिल्म हमारी संस्था को बुरा नाम देगी। फिल्म में वो दिखा रहे है की हरी कृष्णा मारते है। जानते हो हम लोग चाय भी नहीं पीते और कई लोग सोच रहे थे शुरू में की लोग दम मारते है और हरे कृष्णा बोलते है। तो हमारे गुरु जी ने कहा कोई नुकसान नहीं होगा। उन्होंने कहा चिंता मत करो, कोई बुरा नाम नहीं मिलेगा। संता क्यूँ लोग हर 1 कृष्ण मंत्र को सुनेंगे और इसका लाभ उठायेंगे। यह हर नाम में इतनी शक्ति है की आप अच्छी नीयत से बोलो या बुरी नीयत से इसका लाभ आपको जरूर बोले। तो आप ये कह सकते हो हम जो बुरी नीयत से बोलेंगे जैसे की आप अगर भगवान कृष्ण से जोड़ना चाहो तो आप पूतना भी बन सकते हो, कंस की बुद्धि भी रख सकते हो, सौदा माता की बुद्धि भी रख सकते हो। सौदा माता की बुद्धि ज्यादा। अच्छा तो ज्ञान से या ज्ञान से, प्रेम से। अगर हम ये हरी नाम का उत्चानन करे या किसी भी भावना से इसके द्वारा हमें लाभ जरूरी तो खोलो शुद्ध हो नित्य मुक्त हो। ये हरि नाम ही आपको केवल मुक्ति दिला सकता है। गहराई से देखा जाए तो अनेक प्रकार की मुक्ति है पर साधारण व्यक्ति यह समझता है। मुक्ति के द्वारा जन मृतक बंधन से छुटकारा तो ये हरे नाम हमें जन्म के बंधन से छुटकारा दिला सकता है। भिन्न स्वम नाम, नाम और हर नाम में और भगवान में कोई अंतर नहीं है। जब आप हरि नाम का उच्चारण करते हो तो भगवान स्वयं अपने आप को अपने नामों में डाला। भगवान ने स्वयं अपने आप को अपने नामों में पूरी शक्ति डाली है। पूरी शक्ति। इसी विचार को क्षेत्र महाप्रभु जी ने भी प्रस्तुत किया है। क्षेत्र महाप्रभु जी ने कहा है हे प्रभु आप तो इतनी दया दयालु हो की आपने अपनी पूरी शक्ति डाल दी है। अपने नामों में। ये देखो भगवान ने कितना सरल बना दिया है। यहाँ जीवन को सफल बनाने का मान्य महात्वाबजी कहते है कि हम इतने दुर्भाग्यशाली है कि हम इसका लाभ नहीं उठा रहे है। जैसे की शासन को उदाहरण दिया गया है, कई बार भारत में जो कुए होते हैं न कुए ये कुएं के अन्दर पानी है और ऊपर से 1 घास है। कुए के ऊपर तो प्यासा व्यक्ति कुएं के किनारे में खड़ा है। और यह नहीं जानता की अरे भाई पानी तो वह घास के नीचे है, हर जगह पानी को खोज रहा है तो जी काश हम आज समाज में सब खुशी की तलाश में है, खुशी की खोज में है। और ये खुशी शांति सुरक्षा प्राप्त करने के लिए बहुत ही प्रयास हम कर रहे है की आज कल लोग बम्बई में जाओ, सब जगह क्या वो पॉकेट टेलीफोन का एडटिजमेंटदिखता है। हम आज 1 सभा में गए थे, हमारे उस मीटिंग में 1 जो हमारे सदस्य थे, उनके जेब में पॉकेट टेलीफोन था, तो फ़ोन आता जाता था, अगर इटली वगैरह जाओ तो जैसे लोग उनके पीछे बंटवा रखते है न लोग वहाँ पॉकेट टेलीफोन लगते में खड़े होकर सब फ़ोन करे और लोग हम को फ़ोन कर ही तो हम सोचते है। अरे भाई, पहले तो भारत में टेलीफोन की कमी थी, 1 टेलीफोन मिलने के लिए 10 साल वेट करना पड़ता था, आजकल और जो क्या खुश है टेलीफोन अपने जेब में, जब जाना जहाँ जाना है, बस में बैठे बैठे, गाड़ी में बैठे बैठे आप घर फ़ोन कर सकते है तो हम सोचते है की इन सुविधाओं के द्वारा हम खुश होंगे। इत्यादि आरोप। जिस प्रकार रेट स्तान में जल की प्राप्ति नहीं हो सकती, उसी प्रकार इस भौतिक संसार में आप कितनी भी सफलता प्राप्त कर लो, कितने भी प्रसिद्ध व्यक्ति बन जाओ, कितने भी धनी व्यक्ति बन जाओ, कितनी भी खुबसूरत व्यक्ति बन जाओ, आपको मन की शांति प्राप्त नहीं हो, मन की शांति प्राप्त हो सकती है जब आप किसी न किसी प्रकार से गुरु के द्वारा भगवान के शरणागत हो जाओ। और जो व्यक्ति भगवान के शरणागत हो जाता है, वो केवल ये हरी नाम के द्वारा ही संतोष प्राप्त करता है। क्षेत्र ने महाप्रभु जी का बंधन मैंने किया था। थोड़े समय पहले तो जब क्षेत्र ने महा प्रवुति में थे, तो 1 भक्त था जिसका नाम था खोला बेटा श्रीरा, ये खोला बेटा श्रीधर था, उनका क्या झंडा था, ये केले के पत्तों के प्याले बनाना। और जो लोग गंगा नदी में पूजा के लिए जाते थे, उनको बेचते थे कितनी कमाई होती होगी इसमें थोड़े पैसे महीने में 500 साल पहले और वो कमाई का आधा हिस्सा वो अर्पण करते थे गंगा नदी की सेवा के लिए, और उनके पास केवल 1 ही धोती थी और कुछ नम्बर धोती में, 11, 6 से 11 से आप लोग के बोर्ड में, जहाँ सब बोर्ड रोप भरा हुआ, गर्मी का वो, सर्दी का वो, उसके बाद फिर 1 ही होती थी 11, 6 के सा और 1 झोपरपटीठीरहने के लिए, जिसमें छत थी और 1 ग्लास था, बस पूरे घर में हरी नाम के द्वारा उन्हें इतनी सता प्राप्त हुई थी। माँ ने उन्हें कहा कि तुम्हे क्या वरदान चाहिए मेरे से मांगो। उन्होंने क्या कहा की अगर आप मुझे कोई वरदान देना चाहते हो तो यह वरदान दीजियेगा की मैं हर जन्म में आपके सेवक आपका सेवक हूँ। उन्होंने यह भी कहा मुझे, हम तो जब मंदिर जाते हैं, किसी संत महात्मा की संगत में आते हैं, हम कहते हैं आशीर्वाद 2 और यह आशीर्वाद देने के पीछे भाग क्या रहता है। संत की संगत में आकर हमारी लॉटरी, निकल या ठीक है। अब मंजर जाते है ₹500 चलाते हैं हिंदी में और सा लगता है की 5 लाख बदले में मेरे मंदिर जाते हैं। ये विचार के साथ ये वो लाभ, मिले, ये सुख मिले, ये सुख मिले 2 कली देखे। हर व्यक्ति की भावना तो यही रहती है, कभी कोई बीमार नहीं हो, कभी हर व्यक्ति चाहता है तब डॉक्टरों का दिवाला हो जाए, दिवाला तो नहीं हो रहा है। हर व्यक्ति चाहता है की ये सारे हॉस्टल बंद हो जाए और दिन देखते है कोने कोने में खोल दे तो दिन प्रयास करते हैं। हम लोग पीड़ा को दूर रखे बुढ़ापे पन को दूर रखे और हो सके तो विज्ञानियों का सहयोग लेकर मृत्यु को भी दूर करे और किसी भी क्षेत्र में हम सफलता प्राप्त नहीं करे चाहे। विज्ञान किसी भी करे 4 प्रकार के 7 प्रकार के जो कष्ट हैं, उनसे तो आपको कोई नहीं बचा सकता है। जनन बुड़ापा बीमारी दूसरे व्यक्ति से। इसलिए भगवान कहते हैं सर्व परित्या मा, मे कम बजा, हम सर्व पाप मोशमीम सब धर्मों को छोड़ कर, तुम मेरे शरणागत हो जाओ। किसी न किसी। तो अगर हम भगवान के शरणागत नहीं होना चाहते तो जबरदस्ती आपको माया की शरणागत होना पड़ेगा, ठीक है न? अगर आप भगवान के उद्देश्य में रुची नहीं रखना चाहते तो आपको माया की शिक्षा में रूची रखने पड़े। अगर आप में अच्छी आदतें नहीं पड़ेंगी तो बुरी आदतों की संगत आपको लेनी पड़ेगी। जब आपके बच्चे कुछ शैतानी वगैरह करते थे या करते है तो आप क्या करते हो? उनको कोई ऐसा काम देते हो जिससे वो शैतानी नहीं करे देते हो या ऐसी जगह बिठा लेते हो जहाँ वो हालत नहीं कर सके। तो उसी प्रकार हमारा जो मन है ये है शैतान। मन केवल इंडिया ट्रिप की इच्छा ही रखता है। मन और इंडिया को केवल भौतिक सुख चाहिए और मन केवल यही सोचता है। आदर मिले कोई हमारा अपमान नहीं करे। तब कहें देखो कितने होशियार है। वो तो ये अहंकार और इन की भावना के कारण हर प्राणी मात्र को 1 योनि से दूसरी योनि में गुजरना पड़ता है। वैसे तो भारत के सभी सुनते आये हैं जो राखी लाख योनियाँ हैं, जिनमे की केवल 6 लाख यूनिया ही मानव की पर हम भूल जाते हैं की वो जो दूसरी 80 लाख योनियां हैं उनमें हम गुजर कर आये है और वापस वहाँ जा सकते हैं। शास्त्र यह नहीं कहता कि आप शर्मा जी आपने मानव जीवन प्राप्त कर लिया है। अब नीचे नहीं गिरोगे। शास्त्र वो नहीं कहता। शास्त्र यह कहता है कि कर्मों के अनुसार आपका पक्ष निश्चित होगा। आपकी सरकार, आपको यह तो नहीं कहती अभी हमारे देश को स्वतंत्रता मिल गयी है। आप स्वतंत्र नागरिक हो। जो करना है करो, कोई को जेल खाने में नहीं रह लेगा सरकार। वैसे कहती है। आप किसी को नौकर को अपनी कंपनी में नौकरी देते हो। आप यह तो नहीं कहते। अब भी हमने तुमको नौकरी दे दी है। जो करना है करो, तुम्हें कभी छुट्टी नहीं करेंगे। जैसे कोई कार्य करेगा, उसके अनुसार ही आप अपना परिवार भी करोगे तो उसी प्रकार अगर हम मानव जीवन की प्राप्ति के पश्चात सावधानी के साथ इसका उपयोग नहीं करेंगे तो अंत में इसका परिणाम ये होगा की हमें फिर से पशु त्यादी की योनि में गिरना पड़ेगा। अगर पक्ष के रूप में अच्छा भाग्य हो तो अच्छा मालिक मिल जाएगा। जैसे अभी हम सुन रहे थे। थोड़ी देर पहले पुस्तक कुत्ते तो वो कुत्ता था, कुत्ता लोगो को तो पता नही क्या कौन सी भाषा बोल रहा है। थोड़ा अंदाजा हो जाता है, अंदाजा नहीं होता। वो कुत्ता जो है जरा अच्छा भाग्य है उसका उसको अच्छा मालिक मिला अच्छा देने का स्थान मिला है, खाना पीना मिल जाता है से। अमेरिका में तो कुत्ते बिल्लियो को कमरे भी मिलते हैं। से 1 औरत थी। फिर में उसे अपनी बिल्ली की सुरक्षा के लिए 1 मिलियन डॉलर अपने फिल्म में छोड़ दे। उसकी 1 बिल्ली थी जो उसका दांत होने से उसने अपने बिल में पूरा मिलियन डॉलर अपनी बिल्ली की देखभाल के लिए छोड़ दे। तो कोई कई कुत्ते बिल्ली दिल का भाग्य अच्छा हो। उनको अच्छा मालिक मिल जाता है। हा हा ने पीने की तकलीफ नहीं होती। सड़क में देखोगे हजारों कुत्ते 1 साल से दुसरे स्थान खाने की खोज में जा रहे हैं, बारिश आदि पर भी रहे हैं। जान का भी गर्म होता है। अच्छे कर्म से ज्यादा अच्छा मालिक बन जाता है। पशु की जीवन प्राप्त कर सकते है, अनेक योनि में जीवन प्राप्त कर सकते है। पर मानव जीवन की प्राप्ति के पश्चात ये कहा गया है की हमें ऐसा कार्य करना चाहिए कि हम केवल आगे बढ़े पीछे नहीं बुझते जैसे नौकरी कर रहे हो। और आपके 10 हजार महीना साल का है। सब के मालिक कह दे। अब अगले महीने से तुम्हारी का 5000 हो जाएगी और 6 महीने बाद ढाई हजार हो जाएगी। आपको क्या अच्छा लगेगा कोई नहीं हमें बढ़ाओगे हमारी तो उसी प्रकार भगवान भी उम्मीद करते है की मानव जीवन की प्राप्ति के पश्चात आगे बढ़ोगे पीछे नहीं और आपके और हमारे आगे बढ़ने के लिए भगवान ने वैदिक शास्त्रों की रचना की व्यास देव जी के रूप में आपके और हमारे आगे बढ़ने के लिए भगवान अपसारित होते है। अलग अलग समय और आपके हमारे आगे बढ़ने के लिए भगवान अपने प्रतिनिधिम को भेजते हैं। जैसे की भक्ति, गांधा, स्वामी, प्रभु, जिनकी शताबदी हम अगले साल मनाने जा रहे है क्यों जैसे की माता पिता को चिंता रहती है उलाज की देखभाल की, उसी प्रकार कदम भगवान को चिंता है आपकी और हमारी देखभाल के लिए। पर हम इतने ढीठ हैं कि कहते हैं हमने क्या सीखना है इन संत महात्मा से हमें 1 सच बात तो यह भी है की आज कल इतने संत महात्मा हैं, ढोंगी और में पलक करने के लिए प्रयास करना पड़ता है। इतने लोग हैं जो धर्म के नाम पर लोगों को लूट ले है, हाँ अपने आप को बनाते हैं। सुमी सब ठीक है। राम रावण, का बाजार क्या क्या गंदे, गंदे तो आज धर्म के नाम पर धर्म चल रहे हैं। जगह यह है हमारी समस्या तो हमें यह की जब आप कोई इलाज करवाना हो तब 10 आदियों से पूछते कौन है? सबसे अच्छा डॉक्टर है न? आप कल डॉक्टर के हाथ में नहीं फंसना? चाहते आपने कोई केस कराना हो। तो मित्रों से पूछते कौन है? अच्छा वकील जो हमें धोका नहीं दे, वकील वकील उसी प्रकार धन के विषय में भी हमें प्रयास करना चाहिए। यह समझने के लिए असली और नकली में क्या अंतर है? असली संस्था कौन सी है? असली हदमा कौन है? और असली ग्रंथों का अनुवाद भाव किसने दिया है? और फिर जब असली चीज प्राप्त हो जाए या असली चीज से हमारा सम्बन्ध जुड़ जाए, फिर हमें उसका पूरा लाभ उठाना चाहिए। फिर हमें उसे हाथ से नहीं देना चाहिए। जैसे की आप लोग व्यापारी हो, कभी आप का मौका मिल जाए कोई अच्छा सौदा करने का, तो फिर आप यह नहीं चाहते वो सौदा करने का मौका हाथ से फिसल जाए। तो उसी प्रकार हम सबको मौका मिला है। आपका भाग्य यह है कि हजारों जन्म के पश्चात आपको उन भक्तों की संगत प्राप्त हुई है जिनके द्वारा आपको भगवान का असली संदेश प्राप्त हो रहा है। जब भक्ति स्वामी प्रॉपर जी ने भागवत गीता का अनुवाद किया तो उन्होंने इस ग्रंथ को प्रकाशित किया। भगवत गीता यथारूप के यथा रूप जिसका अर्थ यह है कि भगवान का संदेश बिना बिना बदले हुए सबके सामने व्यापा ने इसे प्रस्तुत किया और क्यूंकि भगवान का संदेश यथा प्रस्तुत किया था। आज हम देख रहे हैं सर शो में लोग इन ग्रंथों को पढ़ रहे हैं, न ही पढ़ रहे हैं, पढ़ा रहे हैं विध्यार्थियों को, इत्यादि और इन ग्रंथों के द्वारा असली शांति की प्राप्ति अनुभव कर रहे हैं। हमारे देश का दुर्भाग्य यह है की आज की राजनीति भी ऐसी हो गयी है की हमें केवल इस शिक्षा से दूर ले जाया जा रहा है। हम कहते हैं हमारा देश सेकुलर है तो सेकुलरिज्म के नाते कुछ पचा नहीं हो रहा। अमेरिका जैसे देश में भी सुप्रीम कोर्ट ने 1 रूलिंग दी थी। 23 साल पहले की स्कूलों में भगवान का नाम जरूर लेना चाहिए, तभी अमेरिका के स्कूलों में पूरी छूट स्कूलों को भगवान का नाम लेने के लिए ट्रेन से लाउड हो गए हैं। हमारे देश में क्या है? अगर तुम भगवान का नाम ले, भगवान का नाम स्कूल में नहीं ले सकते, गवर्नमेंट स्कूल में, अमेरिका में हर जगह ला। तो आज जो वातावरण है वो इस प्रकार का है कि धर्म 1 शास्त्र की शिक्षा की आवश्यकता ही नहीं समझ। हमें भूलना नहीं चाहिए कि शास्त्रों द्वारा हमें सनातन धर्म की शिक्षा प्राप्त हो रही है। जो कल सत्य थी आज सत्य है और कल भी सत्य रहेंगे। इसके लिए हमें शास्रों के उद्देश को बिना किसी सुख के स्वीकार करना चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए। शेर जी किसी की कल्पना है। क्या सबूत है ये भगवान की वाणी है, क्या सबूत है ये जो भगवान का उद्देश्य, ये सच है, झूठ है किसने देखा की आत्म कई बार लोग कहते हैं न, क्या सबूत है। गीता में भगवान कहते है के जिस प्रकार को बदलते हो उसी प्रकार यह आत्मा 1 शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर स्वीकार करते है तो हर व्यक्ति सनातन है। आज आप 1 पोशाक में हो और उस पोशाक में आपने किसी को पत्नी के रूप में स्वीकार किया है। कहीं आपके बच्चे हैं? इत्यादि कल? कल? कल आप कहाँ होंगे? दूसरे कहाँ होंगे? आपको क्या पता? जिस प्रकार समुंदर की लहरों के कारण ये घास के पत्ते वगैरह थोड़ी ही समय के लिए जुड़ते हैं, फिर जुदा हो जाते हैं तो यह हमें भूलना नहीं चाहिए। ये मानव जीवन अस्थायी है और यह मानव जीवन किसी समय भी समाप्त हो सकता है। कोई यह नहीं कह सकता कि मेरा जीवन और 10 20 साल तक समाप्त नहीं होगा। तो इसलिए भगवान का ये कहना है की हमें साधु संगत का लाभ उठाना चाहिए। स्वामी जी इस विषय के ऊपर हमे कहते है की सबसे पहले तो हमारे हृदय नहीं, श्रद्धा पैदा होनी चाहिए, क्या श्रद्धा की हमने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करना है, हमने मानव जीवन का सदुपयोग करना है, दुरुपयोग नहीं। हमें असली धर्म चाहिए, हमें असली गुरु चाहिए, हमें असली शिक्षा चाहिए। पहले आपके हृदय में यह श्रद्धा जागरत होनी चाहिए। इसके पश्चात भगवान तो हरी के हृदय में विराजमान हैं, पालमहात्माके रूप में वो समझ लेते हैं की किस प्रकार की श्रद्धा है। हमारे हृदय में हमें असली धर्म चाहिए, नकली धर्म चाहिए और उसके अनुसार वो फिर उसी प्रकार की बुद्धि देते हैं जिनको चाहिए बनावटी धर्म उनको भगवान भेज रहे उन गुरु के चरणों में और जिनको चाहिए। असली धरम, असली प्यार, असली ज्ञान। तो फिर भगवान वैसी सुविधा बनाते है की आप उस स्थान पर पहुँच जाए तो श्रद्धा के द्वारा साधु संगत प्राप्त होता है। फिर जब साधु संगत प्राप्त होता है तो फिर क्या फिर आपको शिक्षा प्राप्त होती है। आप हरी नाम का जाप करो। आप 1 माना से शुरू करते हो, फिर से 1 मान से 2 पर जाते हो, 2 से 33 से 44 से 5 शास्त्रों को पढ़ते हो फिर आपकी हृदय में भावना प्राप्त होती है। अभी तो मुझे दिक्षा भी लेना चाहिए, क्यूँ? क्यूँकि दिक्षा देना भी अध्य जीवन में आगे बढ़ने के लिए बहुत अनिवार्य है। फिर जब दीक्षा ले लेते हैं और हर नाम का जॉब करते जाते हैं तो उसका यह परिणाम होता है अनार की जो हमारे हृदय में अनादि काल से जो अनर्थ है, जो हमारे अध्यात्मिक जीवन के शत्रु हैं वो अस्त अस्ते पिघलने लग जाते हैं। जिस प्रकार जब आप दवाई लेते हो तो आपके शरीर में जो कमियाँ हैं वो दूर होने लग जाते हैं। तो ये अध्यात्मिक दवाई के द्वारा आदि अनारों को हस्ते हस्ते बुखार सकते हो। तो साधु संगत, साधु संगत, साधु संगत बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए हम आप भक्तों को कहते हैं कि इस प्रकार का सत्संग करो क्यूँकि आप सब भी आस्था आश्रम में हो लो सका मंदिर नहीं जा सक तो हम कहते हैं वह आपके घर आ जायेंगे, आप अपने मित्रों को बुलाओ फिर रविवार को हो सके तो मंदिर आ जाओ। खास कर के जो दोखिनवालावगैरह इस इलाके में रहते हैं, उनके लिए तो मंजर बहुत ही पास है। कई साल पहले, 10 प साल पहले बॉम्बे की जो क्रिस्टियन आबादी है, इसाई आबादी उनका 1 सर्वे हुआ था और उन्होंने यह देखा की 80 परसेंट बॉम्बे के जो क्रिस्टियन हैं संडे को चोर जरूर जाते। 80 परसेंट आप अपने पड़ोसी को देखो वो क्रिस्टियन है में इतवार को जरूर हो जाएगा और हमारे हिंदू भाई बहन उसी समय फिल्म देख रहे होंगे तो साधु सुंदर जब आप मंदिर जाते हो, वहाँ जाकर सुन्दर मूर्तियों का दर्शन प्राप्त करते हो, जैसे खास करके बॉम्बे में, तो रादर बिहारी जी लगभग पुरे विश्व की सबसे खूबसूरत मूर्तियों में मानी जाती है। पा जी भी इन मूर्तियों की तस्वीरों को अपने साथ उठा कर ले जाते थे। हर जगह भगवान भी कितने दया दयालु है। न ही वो केवल अपने विवे नामों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। और अपने के रूप में जब आप उनकी मूर्तियों का दर्शन प्राप्त करते हो। साथ ही आपका शुद्ध, देश शुद्ध बनता है। और खास कर के जब आप भगवान के सामने प्रणाम करते हो, जब भगवान की मूर्तियों के सामने जाओ तो आपको बिल्कुल झुक जाना चाहिए। जब आपका सिर झुकता है, भगवान के सामने, जब वो झुकने के द्वारा आपका हृदय आप अध्यातिक मार्ग में परिवर्तन करते हो, तो साधु संगत से डरो मत, साधु संगत से लाभ का लाभ उठाओ और संता से ये पूछो किस प्रकार जीवन के दृश्य को मैं प्राप्त कर सकू। जैसे की कहा गया है कि जब महाराज दशरथ के महल में कोई भी व्यक्ति आता था तो महाराज 10 जी पहले उनसे पूछते थे यह बताओ तुम्हारे अध्यात्मिक जीवन में क्या हम हम जैसे रोज पूछते हैं, हवा कैसे बेटा 1 ही जवाब देते। ठीक है, कभी कोई कहता नहीं है और बोला है। और कभी आप पूछते हैं की ऐतिहातिक मार्ग में आपकी क्या उन्नति हो रही है? नहीं, क्योंकि हम उसकी आवश्यकता नहीं। तो आप सब भक्तों से हम यह प्रार्थना करना चाहते हैं की आप इस शास्त्र की शिक्षा का लाभ उठाओ। हर 1 कृष्ण मंत्र का उच्चारण करो। वैसे तो कृष्ण राम भगवान के नाम है, दिव्य शक्ति। तो जब हम इन दिव्य नामों का उच्चारण करते हैं, तो हम इन दिव्य नामों के उच्चारण के द्वारा भगवान से प्रार्थना करते हैं। क्या टपक कर के आप हमें भक्ति 2, भक्ति 2, भक्ति 2 जब हम और आप देखोगे की जब आप थोड़ा समय त्याग करोगे। इस हरिनाम को अपनाने के लिए, भगवान की शिक्षा का पालन करने के लिए। तुसकिये परिणाम होगा की आप असली सुख को महसूस करोगे। और यही असली धन है और असली संपत्ति है। हरि नाम बहुत ही सरल है। आप लोग तो बचपन से ही इसको सुनते आई हो। आप लोग तो बचपन से ही इसका उच्चारण करते आये हो। पर अभी 1 गंभीरता के साथ करना चाहिए और साथ मे भाग की भगोतमभीखरोजबआप इस सास को पढते हो। शास्त्र में क्या है भगवान की वाणी? जैसे आप पत्र लिखते हो। किसी को अपने बच्चों को या भाई को, बहन को, तू शास्त्र है भगवान की वाणी भगवान ने जो कहा है वो गीता में है और संत महात्मा ने उन्हें हमें हमारी भलाई के लिए समझाया है तो इस प्रकार हम अपने जीवन को सफल बना सकते है भक्तों से यही निवेदन है की आप ये जो सत्संग का कार्यक कर रहे हो ये बनाते जाओ रोज करो किसी न किसी के घर में है और आप लोग भी अपने मित्रों को बुलाओ सबको ये प्रचार करो भगवान गीता के अठारवें में कहते है की सब भक्तों में सबसे प्रिय वो भक्त है जो की मेरे संदे का प्रचार करता है आज अगर विश्व में किसी चीज की कमी है तो भगवान के नाम की और भगवान के असली उपदेश्य की और ये नाम और उपदेश्य का वितरण केवल आप भक्ति कर सकते हो वियासाआशरममेंरहते हुए भी आप भगवान का प्रचारक बन सकते हो हम यह नहीं कह रहे आपको के घर छोड़ो धन्ना छोड़ो मैं जहाँ हूँ वही हो पर अपनी चेतना को बदलो और दूसरों की चेतना को बदलवाओ और ये सब सम्भव हो सकेगा अगर चेतना महाप्रभु जी के सन्देश का वितरण करो तो चेतना महाप्रभु जी की यही इच्छा थी की हर भारत वासी इस संस्कृति को अपनाये हर भारतवासी इस संस्कृति का वितरण करें आप लोग कृपा करके माध्यम बनिए जिसके द्वारा क्षेत्र में महाप्रभु जी का सन्देश पहुँचे उनका सन्देश क्या था जाने लाखों तारे का हो क कृष्णा प्रदेश जिसको भी जो मिला उसे कृष्णा का उपदेश 2 बस और कुछ नहीं अपना उपदेश मत 2 कृष्णा का उपदेश, 2 आपका उपदेश दोगे, 2 मिनट में आप अपना उपदेश बदल दोगे अभी आपको कोई चीज अच्छी लगती है वही चीज से नफरत हो जाती है कृष्णा का उपद भगवान ने गीता कब बोली थी सबसे पहले विवासन करोड़ो साल पहले गीता का उपदेश जो है करोड़ों साल पुराना कोई उपदेश नहीं है और करोड़ों लोग इसको पढ़ते आ रहे हैं क्या आप लोग कृपा करके 1 शिक्षा के द्वारा अपने जीवन को सुधारिए और भगवान के शरणागत हो जाइए डरो मत ये मत सोचे की जब शुरू कर देंगे जब बढ़ाएंगे तो हमें घर वाले सब छोड़ना पड़ेगा नहीं आप जो काम कर रहे हो वो काम ज्यादा बूढी सी कर सकोगे अगला माला का जप करो तो माला का जाप जरूर कीजिये और ये पतंगी कार्यक्रम को बढ़ाइए कोने कोने में ऐसा स्थान होना चाहिए जहाँ के लोगो को भगवान का सन्देश प्राप्त हो और अगर आप इस दा माना जीवन का उपयोग करोगे इस शुद्ध कार्य के लिए स के द्वारा आप अपने जीवन के लक्ष्य को भी प्राप्त करोगे और दूसरों का भी भाव करोगे। ह हमारे हाल हाल लहालेडामाधहल हाले।
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