पानीहाटी चिड़ा-दही महोत्सव | Panihati Cida Dahi | 4 Jun 2020 | Delhi | Srila Gopal Krishna Goswami

Srila Gopal Krishna Goswami recounts the Panihati Cida-Dahi festival in Delhi, where the devotee Raghunath organized a massive communal feast of poha and yogurt for thousands. The story traces Raghunath's persecution by a tax collector and his unwavering faith, illustrating lessons on duty, humility, and selfless service.
Chapters
तो जैसे jante ho बहुत he s vr है। आज के दिन ये पानी हदी उत्सव हुआ था और इस कोन के लगभग हर केंद्र में युस मनाया जाता है और मेरे ख्याल से आज की क्लास के बाद अब पौवकाओगेरबडी धई के साथ नहीं तो इस लीला का वर्णन चेतचतमीधकीअंतय लीला अध्याय में है। तो हम लीला की चर्चा करेंगे। संक्षेप में तो 6 गो स्वामी थे जिनके विश्व में हम पढ़ते हैं और गोस्वामी उन्हें कहा जाता है जो कि गोपों को सहयोग देते हैं राधा रानी की सेवा में, तो स्वामी शे में सबसे पहले गोस्वामी हैं जो चेतना मा बाबू को मिले थे उनका जन्म बहुत ही धनी खानदान में हुआ था वो शोमीकर्थहै जिसका मन और इंडिया में पूरा वर्ष हो। आजकल तो आप देखते हैं भारत में वो शो में 1 जाल बन गई है मेरी से पियेंगे गोल स्वामी बुलायेंगे स्वामी का है इसका मन बुद्धि दिया, पूरा हुआ शो तो स्वामी का जन्म हुआ था बहुत ही धनी खानदान में। कहा जाता है कि आज की तुलना में उनके पिता और चाचा अरबपति होंगे उनके पिता का नाम और चाचा ताया अंक नाम था। दोनों भाइयों में 1 ही उला थी, 1 ही बेटा था। और माता पिता की इच्छा थी कि बेटा बहुत से कार में आगे बढ़े पर रगनादालकी शुरू से ही रुची थी आध्यात्मिक विश्व में। और हालांकि माता पिता ने बहुत प्रयास किया कि उनका भौतिक आकर्शन बड़े गुना किसी प्रकार इसे पकड़ने किया। चूडिया में ही उन्हें हरिदास ठाकुर की संगत भी प्राप्त हुई थी और हरिदास ठाकुर की संगत बड़ा गहरा प्रभाव था। तो उनके पिता और चाचा थे वो धनी कैसे बने? वो जमींदार थे। और उन दिनों में मुसलमानों का शासन था भारत में, और इनकी जो जो राजा था वो था मुसलमान। तुर्क राजा ने कर इकट्ठा करने की जिम्मेदारी रघुनाथ के पिता और चाचा को दी थी। रवीना के पिता ने हर प्रकार का सुख दिया बेटे को। कहा जाता है कि इंद्र का महल भी इतना खुबसूरत नहीं था जितना खुबसूरत इन का था। और उस समय की सबसे खूबसूरत लड़की से उनके माता पिता ने विवाह करवा दिया इस भाव के साथ यह प्रति के जायेंगे रगेदा कोई रुची नहीं थी और वो हर मौके का लाभ उठा दे थे या करने के लिए, वहाँ प्रभो मिलने के लिए, बसों की संगत प्राप्त करने के लिए, तो यह उनके पिता चौकीदार रखे हुए थे जैसे आपकी चौकीदार उन्हें बड़ा चौकीदार रखे थे इनका इन पर पूरी नजर रखने के लिए। और उनकी माँ ने कहा। माँ ने देखा कि बेटे का बड़ा गहरा कर्षण है भक्ति के प्रति। माता ने पाती से कहा हमारे बेटे को हमें बांध देना चाहिए। रसी के साथ बार बार यह भाग जाता है, रस्सी के साथ भाग बांधोगे तो भाग नहीं। सकेगा पिता ने कहा जब हम उनको खूबसूरत पत्नी के द्वारा बांध नहीं सकते है। और रस्सी से कैसे बांध है, हमने उनको हर प्रकार की सुविधा दी है, खूबसूरत पत्नी दिए हैं, जब भी वे बांध नहीं पा रहे to से कैसे बांध पाओगे to बहुत कार्य में भी बहुत तेज मुसलमानों का शासन था। तो जो चौधरी था चौधरी, कहा जाता था उन्हें जो कि राजा का प्रतिनिधि हो और जिसकी जिम्मेदारी हो प्रजा से टैक्स कलर करना कर जैसे आज भी हम देते हैं। पाचन या था 25 पर्सेंट का जो इकट्ठा होता था, जो इंस्पेक्टर करता था का उसे दिया जाता था। और बाकी 75 पर्सेंट सरकार को तो 1 मुसलमान चौधरी था। उसने देखा कि घोवरदानऔरहानमिमजुम दान है, उनके साथ बेईमानी कर ली है। तो मुसलमानों का शासन था। तो वो पहुंच गए रगना के घर में, लगना के पिता और चाचा को गिरफ्तार करने के लिए, तो इन्हें सूचना मिल गई। पहले ये पुलिस वाले आ रहे है। तो रगुनाथ के पिता और चाचा घर छोड़कर भाग गए। जब ये पुलिस मैन जब पहुँचे रगुनाथ पता लगा चाचा और पिता तो है नहीं, तो उन्होंने रंगनाथ को गिरफ्तार कर लिया। रंगना घर नहीं था गिरफ्तार करके चौधरी अपने स्थान मिले जेल में रखे रोज उसे बुलाकर पूछा बताओ कहाँ है तुम्हारे पिता? चाचा नहीं बताओगे तो हम तुम्हे सजा देंगे बड़ी पारी रघुनाथ बिल्कुल घबराए नहीं इन धमकियों से, उन्हें पूरा विश्वास था राकेकृशवानेकेे विश्वास है भगवान मेरी सुरक्षा करेंगे। तो कई दिन बीत गए, पूछता था कहाँ है कहाँ है तुम्हारे चाचा और पिता? फिर रगण साथ मेरे पिता और चाचा और आप तो भाइयों के समान हो, आप तीनों भाइयों के समान हो। और कभी कभी भाइयों में झगड़ा होता है, फिर शराबी हो जाती है। तो इस में आप लोग झगड़ रहे हो। पर जब आप मिलोगे तो मुझे पूरा विश्वास है आप आप भाइयों में 1 मात्र भाव आ जाएगा। तो चौरी रघुनाथ को मारने वाला था। उन्होंने ये मधुर शब्द सुने। रघुनाथ के द्वारा। उनका हृदय बिल्कुल नरम हो गया। और रघुनाथ को चौधी ने गले लगाया होगा। तुम मेरे बेटे जैसे हो, तुम क्यों नहीं किसी प्रकार से मेरा सुला करा। 2 मेरे पिता और चाचा रघुनाथ ने प्रबंध किया, उसके चाचा का में मिलन हुआ चौधरी से सेटलमेंट हो गया था शांति से। तो इस प्रकार रघुनाथ जी रघुनाथ उनका भाव तो था सेवा में, और माँ ने कहा हम तुम घर में रहो थोड़ी देर। और रगुणादास शुरू से ही हिना में जुड़े हुए थे, रात में हरी दास की संगत पाप की थी। और गुना दास यही था कब में माँ बापू के साल और कई बार वो घर से भागे जो भी भागते थे, पिता के प्रतिनिधि जाकर वापस घर ले आते थे। इस प्रकार की घटना बोल कई बार घी। पानी हटी 1 स्थान है जहाँ के कैरकरा से ज्यादा दूर नहीं है, माना जाता है कि 10 किलोमीटर पानी आता है 10 पंद्रह, किलोमीर दूर है? हाँ 18, 18, कचरा निकट है 18 पंद्रह उनके बीच क्या कर के निकट हैं। और हमारे वैष्णवा सिद्धांत में अनेक उत्सव हैं जॉब मनाते हैं, जिनमें 1 है। तो भगवान ने नंदा गंगा के तट पर 1 पत्थर पर बैठे थे अपने भक्तों के साथ भगवान दिंदा के चेहरे से हजारों सूर्यों की रोशनी प्रगट हो रही थी। वहाँ भगवान दिंदा साथियों के साथ हई नाम कितन कर रहे थे, कई और माँ नितिन भगवान खुद बैठे थे, कहा खुद बैठे थे। 1 पत्थर के ऊपर, रगुनादाजपीछे से आये और आदर के कारण और शर्म के कारण उन्हें जिनंदा के पास नहीं गए। वो महवानीतिनंदा के पीछे थोड़ी दूरी पर खड़े रहे और उन्होंने दूर से प्रणाम किया किसे भाने तिंदना जब उन्होंने प्रणाम किया भगवान के साथी थे। नंदा रगनाथ तुम्हे प्रणाम कर रहा है, प्रणाम कर रहा है। रगना इधर है ने कहा वो तो चोर है, चोर है, क्यों उसके पास इतना धन है? वो चोर है। और उसे यहाँ लेकर आओ तो के भक्त लेकर आये। रघुनाथ को नंदा के समक्ष और नंदा ने अपने पाँव को रघुनाथ के सिर पर रखा और कहा मैं चाहता हूँ कि तुम 1 बहुत बड़े उत्सव का प्रबंध करो और उत्सव में मेरे जो भक्त हैं लोग आप को पढ़ कर सुनाया था उत्सव करो उसमे मेरे सारे साथियों को धनी पोहा खिलाओ और गुण दास ने सुना की भगवान हिधिनंदा उन्हें सेवा दे रहे है जिसके द्वारा वो अपने धन का उपयोग कर सके। भगवान की सेवा में वो मोत ही प्रसन्न हो गए। तो निंदा ने कहा 1 बड़े उत्सव का प्रबंध करो और मेरे जितने साथी है सबको दी और कहा पोहाछिप्राइज खिलाओ तो as a cura और पोहा खिलाने के लिए to छोटे बोर्ड, क्या, छोटे मटकी मटकी में वो बहुत ही खुश हो गए और गाने तुरंत ही सब भक्तों को बुलाया और कहा 1 बड़ा उत्सव बनाने के लिए उस शहर, उस शहर के पड़ोस में जितनी भी दई थी, बाजार में जितनी भी रबड़ी थी, बाजार में जितना भी खीर था, बाजार में जो भी था सब उनके भाग लेकर खरीद के बाजार से दूर दूर तक सूचना पहुंच गयी की भगवान नंदा उनके साथियों के लिए उन्होंने 1 बहुत बड़े उत्सव का प्रबंध किया है। तो दूर दूर से भगत आये, दूर दूर से। और इस उत्सव परेशान ग्रहण करें। गुरु से भागता और ऊपर 1 प्लेटफार्म था जिसमें भगवान नितिन बैठे थे, अपने सीनियर भक्तों के साथ बाकी सब बैठ गए। गंगा के तट पर तो जितना जितनी सुविधा थी, बाजार में सब वो खरीद कर ले आये सब। और फिर भी उन्होंने देखा और भी कमी है जैसे परीक्षा में जाते हो, देखते है की नारियल वाले वहाँ पहुँच जाते हैं, क वाले पर पहुँच जाते हैं, देखा बहुत बड़े हैं, उत्सव का प्रबंध किया है। तो सारे व्यापारी आ गए, अपना समान लेकर। किस के बाद ही था, खेला था, छीनी थी, दूध और बड़े बड़े बर्तनों में इन्हें उबाला जा रहा था। और थोड़ी देर में ही सब तैयार हो गया। तो भगवान इत्यनंदनने 20 भक्तों को जोड़ा इस प्रसाधन को बाँटने के लिए जैसे आप लोग प्रसाद खिलाते हो, लाइन में बिठाते हो, लोगो को आगे जाकर। इसी प्रकार भगवान ने सारे भक्तों को लाइन में बिठा दिया। जितना समान था पड़ोस की दुकानों में, वो पड़ोस के शहरों में सब खरीद ले। अलग बना के नाद के पास पैसे की कमी नहीं थी, और सबको जो 20 भक्त थे उन्हें जिम्मेदारी दी परेशान बाटने के लिए और खुद सबको खिला 2 डोना दिया था चूरा और दही सबको बाँट रहे थे। तो यहां भगवान नितिन 1 और दिवे लीला पकड़ लिए, उनकी इच्छा थी की माँ प्रभु यहाँ आये तो 1 तरफ से भी भक्तों ने सब भक्तों को प्रसाद बांटा। फिर भगवान नित्य ने अपनी दिव्य शक्ति से चेतन महाप्रब को बुला दिया और ये केवल भगवान नित्य के चुना भक्तों को मिला जैसे जब चेतना प्रमुख उपस्थित थे रथयात्रा में, जगनाथपुर में, तो जब उन्होंने देखा वह पूजा का, व्यवहार का व्यवहार इतने धनी राजा है। पर जब भी झाड़ू दे रहे हैं सड़क को साफ करने के लिए। रथयात्रा से पहले तुम्हा ने 1 खास ना, वहाँ रात यात के समय हर रात के साथ 8 कितनी जोड़ी थी और वहाँ प्रभु उपस्थित थे, 4 के मन्नी थे रथ के आगे 1 तो वहाँ प्रभु अपने प्रभु उपस्थित थे सारे 8 के द i, m, a वो बड़े पसंद थे उनकी नम्रता से, तो उसी प्रकार भगवान नीतिन अपने दिव् शख्ती द्वारा चितिया महा प्रभु को भी पकड़ कर ले आये और वहा पर वो नीति की 1 खास इलाज चल रही थी। महा प्रभु और भगवान जिनंदा हर भक्त की थाली में, पते में, शाद हर भक्त के पते में पते से भगवान नंदा 1 मार्शल 1 चमच ले रहे थे, प्रसाद और महा प्रभु के मुँह में डाल रहे थे। महाप्रभु के मुँह में डाल रे महा प्रभु को बड़ा आनंद आता था। और हाँ प्रभु क्या कर रहे थे वो भी हर पत्ते से 1 मोर से पसार लेकर भगवान ने नंदा के मुंह में डाल लेते तो 1 तरह से भगवान नंदा हर पत्ते से मोर लेकर पुरुषा लेकर थोड़ा महा प्रभु के मुंह में डाल लेते और महा प्रभु वो हर भक्त की थाली से 1 नंदा के मुँह में दे वहाँ को बड़ा आनंद आया। इस उत्सव को देखकर और यह दिव्य लीला जिसमें नीति नंदा जी हाँ, प्रभु के मुँह में प्रसाद दाल रहे हैं, महा प्रभु नीतिनंदाकेमुँह में प्रसाद खिला रहे हैं। यह लीला का दर्शन के वो भक्तों को मिला। सबको प्रु बहुत ही प्रसन्न थे इसी इलाके तो पानी हाथी में यह उत्सव हुआ था। और इतने भक्त आ गए थे। ऊपर का प्लेटफार्म भरा हुआ था उसके पास। नीचे पुल सब सब भर गया था। इतनी भीड़ हो गई थी। और फिर बैठने का स्थानी था, खड़े खड़ा होने का स्थान था। वे भक्त गंगा में बैठ गंगा के जल में बैठकर खाने लगे। इस प्रकार ये उत्सव रगनदाजकीप्रेरणा से ये उत्सव, उनके आर्थिक सहयोग से ये उत्सव हुआ था और महा प्रभु बड़े प्रसन्न थे। इस उत्सव के साथ गुणा दास को महा प्रभु ने कहा तुम शिक्षा ग्रहण करो। कैसे माँ प्रभु के 2 सेकेटरी हमेशा होते थे है गोविंद और स्रूकदाउदरतो। कहा जाता है रगुनासरुपदाउदर। उन्होंने अध्यात्मिक शिक्षा ब्रेन की थी। स्रुपदामदरतोरगुना दास की रूची थी पर में और उत्सव के पश्चात गए। राग बंधन के घर में रागपंदभीमाँबड़ेप्रिय साथी थे। वहाँ उन्होंने राग पंदित द्वारा बहुत ही सुंदर परेशान बनाया खाया राग पंद कहा जाता है बहुत ही प्रसाद बनाने में। राधा को निर्माण समून द्वारा यह प्राप्त हुआ था। ज्यू बनाएगी प्रशाद ऐसा लगेगा जैसे सरगम बनाये। रागबंध ने बहुत ही अच्छा प्रसाद बनाया था। तो लगना दास घर छोड़कर चले गए, उनके गुरु उनके उनके खदाने गुरु थे, खाना ने गुरु से न चाहेगा, चाय ने मीरा के माता पिता से कहा की आपके बेटे को मेरे साथ भेज। 2 तो वो तो खाना के गुरु से माता पिता नहीं नही, कह सके तो रगुनादास घर से निकल गए और वो चौकीदार थे उन्हें भी पता नहीं कहाँ गए और गुना दास में चले कहा पहुंचने के लिए जगनादपूरीरााका उत्सव आने वाला था और उन्हें पता था कि सारे वक्त वहाँ पहुँचेंगे। उनके पिता ने हर रूप से प्रयास किया कि लगनदास ढूंढ ले सन में भेजा अपने नौकरों को किधर भी वो ढूंढ नहीं पाये। 12 दिन की सफर, 12 दिन का सफरतारगुनादास के स्थान का पानी हती से जगनपुरी और रगुनाजने इतनी गहरी भावना थी कि वो अकेले चलते गए, छुप छुपकर और फिर पहुँचे जगनपुर 12 दिन के दौरान यात्रा में केवल 3 बार रगुणादास ने प्रसाद ग्रैन किया बाकी समय कुछ भी नहीं रगूणादासकेपिताजी उनको। अंत में सूचना मिल गयी कि रगूणादास हैं पुरी में। माँ प्रभु के पास, सो रविनाथ के माता पिता ने धन भेजा, रविनाथ को उन्होंने वो धन पहले तो उपयोग किया वहाँ प्रभु के महीने में 2 बार मंडारा बनाने में। फिर उन्होंने ये नया नाम भी बंद कर दिया। माँ प्रभु ने जब देखा कि रगुनाथ ने अपने माता पिता से विधादेनाबंदकरदिया वो बड़े प्रसन्न हुए बड़े त्यागी थे और समझदार जो जगना पुरी में वह और खड़े होकर भीख मांगते थे, दे दिया, खाते कुछ नहीं दिया मांगे। तो 1 दिन रगना दास को शिक्षा दे रहे थे, द तोरघनादास की इच्छा थी कि महाप्रभु से पूछा जाए क्या है मेरा कर्तव्य? what is my duty? क्या कर्तव्य मुझे करना चाहिए। तो रविदास को तो महाप्रभु ने शुरू दान सौप दिया था। तो रघनादासकभीभी महा प्रभु से डायरेक्टली कुछ क्वेश्चन नहीं पूछते थे। तो माँ रंगना से पूछा ने पूछा की मुझे ये बताओ वह क्या कर्तव्य होना चाहिए what in my duty? यह था शुरु दामन ने कहा कि रघुनाथ जानना चाहते हैं मेरा क्या कर्तव्य है। आप लोगो ने कहा मेरे से शुरू की जिम्मेदारी में सोपा हुआ है और तुम्हे ये प्रश्न सुवदामदरसे सुनना चाहिए। इसका उत्तर क्यूंकि तुम मेरे पास आ गए हो? प्रश्न पूछने के लिए मैं जवाब देता हूँ। तुम आप लोगों ने क्या कहा यह बड़ा प्रभावशाली संदेश है हम सब के लिए ने कहा भौतिक भौतिक वादी व्यक्तियों के समान रचा। mt o do not talk like people in genel, what they have to say? you should not any paledablefod should dress were niti? तो का प्रश्न क्या था श्रुभदामदर से आप महाप्रभु से पूछिए मेरा क्या कर्तव्य होना चाहिए? और ये प्रश्न हम सब को पूछना चाहिए चाहे आप किसी में हो क्या है हमारा कर्तव्य। महा प्रभु ने उत्तर कहा वैसे से तुम्हें शिक्षा शुर्भगामनासे लेनी चाहिए। क्यूंकि तुम मेरे पास आये हो? तो मैं आज उत्तर दे दूंगा। तो उन्होंने क्या कहा? बौधिक व्यक्ति के समान भौतिक कार्य में मौलिक परजलपामेंउसे बचे और प्रजल पा से क्या होता है? प्रजल्प से जैसे रूप में कहते हैं प्रलय प्रजल्प से आध्यात्मिक जीवन नष्ट हो जाता है। और जल करोगे तो क्या करने का आदेश है। कृष्ण कथा, कृष्ण कथा करोगे, कृष्ण कथा सुनोगे। तो चीर दर प्राप्त होगा। और अगर हम जल्पा करेंगे समय पर जल्पा में बिताएंगे तो ये जो भक्ति का बीज है, वो उगेगा नहीं, वो नष्ट हो जाएगा। इसे कहते हैं से बचो। तो यहाँ महा कह रहे हैं बोतिवादियोकेसमान जला में रुचि मत लो। आगे क्या, कहा? और साधा प्रसाद खाओ। यह नहीं ड़ी जल माँ बाप ने हा क्या था, मुझे बताइए मेरा क्या कर्तव्य होना चाहिए। उन्होंने घर त्याग दिया था, धन था, उसे त्याग दिया था। वो पूछे क्या कर्तव्य होना चाहिए? तो सबसे पहले माँ लोगों ने कहा जा से बचो, फिर साधा भोजन खाओ, साधा भोजन खाओगे। तो वर्ष ज्यादा आसानी से कर सकोगे। कहते हैं वे जीव वानी पर वश रखोगे। तो बेली और जेनेट को भी कंट्रोल कर सकोगे। जीप पर वश नहीं किया, जीप पर वश नहीं किया। तो को वश बनाना कठिन होगा? देश साधा सादा प्रसाद खाओ और ज्यादा अच्छे वस्त्र मत हो, खैर आप कुल सादा वस्त्र ज्यादा महंगा सा। कई बार आप साधु को देखते हो। 44 अंगूठी के साथ रेशम के कपड़े वगैरह पर माँ प्रभु वो कर सदा माँ प्रभु प्रभु को मिले और नासी में चन्द्र शेखर के घर में, तो उस समय मन सनातन स्वामी ने 1 बहुत महंगी चादर उड़ी हुई थी, क्यूंकि जब वो छुप छुप कर आ रहे थे, माँ को मिलने के लिए रास्ते में वो रुके। श्रीकांत के घर में श्रीकांत वैसे उनका रिश्तेदार था, बदल लो जिसको राजा ने मुसलमान राजा ने भेजा था, घोड़े खरीद कर लाने ले। 3 लाख सोने के सिक्के थे, जेब में ने देखा सुना, क्योंकि 1 समय लगभग प्रधानमंत्री जैसे था राजा के शासन में अभी फटे कपड़े दाढ़ी वगैरह के साथ पहने दाढ़ी कपड़े पहने। ये क्या है उन्होंने 1 महंगी चादर दे दी बोलने के लिए। जब सनातन माँ पर पहुँचे, वासी में उन्होंने महंगी चादर उड़ी हुई थी। और तो माँ को देखा तो घुल कर सनातन समझ गए, माँ भी खुश नहीं है। तो गए गंगा के तट पर, या 1 बंगला साधु था फटे कम्बल के साथ। सना ने कहा मैं आपको मेरा महंगी, महंगी चादर देना चाहता हूँ, आपकी फटी चादर मुझे मिल सकती है। उसने कहा क्या क्या तुम इतनी महंगी दोगे? मुझे? नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, मैं गंभीर हो देखा की सनातन फटी चादर पहन रहा है। महंगी चादर की वजह। तो उन्होंने कहा 1 अच्छा डॉक्टर मरीज का इलाज कर के जो मरीज बीमारी का कारण है, वो रहने नहीं दे देता। तो उन्होंने कहा तुमने घर सब त्यागा है, भक्ति पर जुड़ने के लिए शोभा नहीं देगा। जो महंगे वस्त्र पहनो। तो यहाँ माँ प्रभु कह रहे हैं। कृष्ण कथा में रुची लो और सारे कपड़े पहनो सारा भोजन खाओ और सारे वस्त्र पहनो। आगे क्या कहते है? do not expect on her, but offer all respect to everyone, always can the holy name of god, krishna and midi main and selvistoradrancrishna in। तो ye है sicasaka सी सी स्लो सन्देश। आप लोगो ने आगे क्या कहा आदर मत उम्मीद करो लोग किसी से ये नहीं सोचे की मुझे आदर मिलना चाहिए और इस बंद में मुझे पूरा मैं जाऊँगा। दूसरे बंदर में हमारे मन में ये भाव नहीं होना चाहिए। गेट प्रॉपर ऑन न आई, स्टे ने क्या कहा ना ना रो सा हमारी ना ना देना। अगर तुम चाहते हो की हरी का नाम सदा से मारे जी वाली द्वारा उच्चारण हो तो ये में विनम्रता का भाव बहुत ही महत्वपूर्ण है। तो यहाँ माँ पभुरगुनाधासे कह रहे हैं किसी से आदर की उम्मीद मत करो और सबको आदर 2 सबको आदर। 2 ये नहीं कि ठीक है हम आदर देंगे, अगर तुम दोगे तो मेले पर दर लाओ, तुम भेजी करोगे तो हम भी वैसे करे नहीं तुम परवाह मत करो, दूसरे की तुम्हें आदत दे या नहीं। तुम अपनी तरफ से आदर। 2 और आगे क्या कह सदा हरी का नाम लो, ये है सास का निर्णय hi कलयुग का धर्म क्या है? तो विश सत्य में साधन था, चिंतन में साधन था, या गया, वापी साधन था, उपासना वही लाभ प्राप्त हो सकता है। कि इस माध्यम से तो यह आगे रहे है। ह नाम माँ प्रभु प्रकट हुए थे किसलिए नाम के प्रचार के लिए माँ प्रबु। माँ प्रबु ने अपने प्रचार से पूरे भारत की प्रजा को वैश्य बना दिया था। और माँ प्रबु क्या याद माँ ने कहा आजा की उम्मीद, मत रखो, सबको आदर। 2 सदा हरी का नाम लो और मंद वाला क्या है मंद वाला? राजा ने कहा मैंने तो संक्षेप में तुम्हें समझा दिया है, क्या? क्या आवश्यक है? क्या है तुम्हारा पर और गहराई के साथ। अगर तुम्हे इस विषय को समझना है तो सिर्फ दामर के पास जाओ पर भूले। क्योंकि रंघनालकीदेखभाल की जिम्मेदारी किसे दीदी? शुरु दामलरकोरगणादाज ने पूछा क्या है? मेरा कर्तव्य के कैसे शरुभदामलरकेद्वारा? माँ प्रभु ने कहा तुम्हें उत्तर देना चाहिए, शुभ पास आये हो, मैं संक्षेप में दे देता हूँ। और संक्षेप में देने के बाद उन्होंने क्या क्या कहा डीटेल एक्ने बाई सुदामा मेन पॉइंट्स दे दिया और कहा आगे शिक्षा देगा। मा प्रभु बहुत ही थे रगुणादास की सेवा के द्वारा। और महा प्रभु को किसी वक्त ने 1 गोरदन शीला दी थी और गोरदन शीला दी थी और 1 हार दिया था शिलाओं का। तो वो माँ बाबू इतने थे की सेवा से गोदान शिला किसको दे दिया भेट के रूप में हों खुद कहा कैसे इस गोदान शीला की सेवा करनी चाहि। तो वहाँ प्रभु इतने प्रसन्न हो गए थे रवि दास के त्याग से उन्हें हर प्रकार और आर्थिक सुख त्यागा हर प्रकार की सुविधा थी। आगे जो पैसे उनके घर वाले भेजते थे, वो भी लेना बंद कर दिया। जो चावल साफ़ करते हैं जो कचड़ा है वो बाहर फेंकते हैं। वो कचड़े को लेकर उन्होंने अपना प्रसाद मना ले थे और हर प्रकार की सुविधा उन्होंने त्याग दे और माँ बाबू से विज्ञान प्राप्त किया तो रंगनाथ को स्वामी। को से गोदान शिला प्राप्त आम लोगों ने भेड़ के रूप में दी तो गोवर्दन पहुँच गए। गोरदन और बकरा रूप और सनातन से मिलकर कृष्ण कथा करते थे। दिन में 20 से 22, 52 में 22 घंटे। वह इनाम का उच्चारन करते थे। 22 घंटे नाम सोते थे, 1 घंटा या डेढ़ घंटा खाते थे, क्या थोडी सी लसी, बस 22 घंटे। दिन में क्या है नाम। दूर दूर तक सूचना फैल गई कि रगना दा बहुत ऊँचा संत आया है। तो हजारों लोग, कम से कम 2000 लोग रोज आते थे। रवीना दास का दर्शन देने गए और वीना दास हर व्यक्ति जो अंदर आता था, सबको पहले प्रणाम करते थे। तो दिन में 20 से 22 घंटे। हरी नाम का उचार, 2000 से ज्यादा धंडबाद वो उन अतिथियों अतिथियों को करते थे। ये थे गोदान का दर्शन देने के लिए रविादास का दर्शन। ना खुद जॉब करते थे। दिन रात और खाने के लिए क्या थोड़ी सी लसी, बस थोड़ी सी लसी, कोई और रूप और सनातन के साथ बैठकर सारा। दिन कृष्णा का था, 1 दिन लगना, बहुत गर्म मौसम था, कुल में अपना भजन कर रहे थे। और राज रानी ने देखा राधा रानी ने देखा बहुत गर्मी है, ओई रगना दास जॉब कर रहे हैं। इतनी गर्मी में तो राधा रानी पीछे से आई, अपने साड़ी को छात्र के रूप में रखा। दास की सुरक्षा के। उसी समय वहाँ से सनातन गोस्वामी गुजर जा रहे थे। सनातन ने देखा राजा रानी रघुनाथ की सेवा करनी है, उन्होंने अपनी साड़ी का छाता बना दिया है। रगुनाथ को धुप से छान ले। उन्होंने रंगनाथ को कहा तुम राजरानी से सेवा ले रहे हो। उन्हें डाटा जो उत्तम भक्त हैं, वो केवल सेवा करना चाहते हैं, लेना नहीं चाहते हैं। और उसके पश्चात ये भजन कुटी जो देखते। हो में ये बाल शुरू हुआ तो रगुनादासनेोपानी हदी का उत्सव का प्रबंध किया था। उन्होंने अपने धन का उपयोग किया इस उत्सव को सफल बनाने में। और उन्होंने अपने धन को बांटा। ब्राह्मणों को पानी ही उत्सव में प्रचार के पश्चात राग बंदर के घर में गए तो वहाँ उन्होंने उनको सोने के कॉइन दिए उन्हें बोला सब को तो रगनदाजकीप्रेरणा से, नितिन के आदेश से ये उसे हुआ था। तो कहा गया है अगर आपको नितिन जी की कृपा चाहिए। अगर आप इस पानी हदी उत्सव में नाचो गाओ विशाका करो तो जो अर्चन है आपकी भक्ति के रास्ते में यह अर्चन क्या होगा। ये अर्चन दूर हो जायेंगे। जिन भक्तों की इच्छा है कि नीति नंदा की कृपा प्राप्त हो, उन्हें बड़े उत्साह के साथ इस प्रसाद को तैयार करने में सहयोग देना चाहिए और बांटने में सहयोग देना चाहिए और इस उत्सव को सफल बनाने में सहयोग देना। जारविणदकोस्वामी की पानी, दी, सब की और कौन के हर मंदिर में मनाया जाता है। मेरे खयाल मंदिर है जहाँ की मनाया नहीं जाता तो आप देवी में भी मनाया जायेगा। वो पानी हरी उत्सव के साथ जुड़ी हुई है। रगना दास की लीला और गनदास के मन में सदा 1 ही भाव था बचपन से वो भाव क्या था भगवान की सेवा और इस सत्र में जो भी सेवा करेंगे भाग्य लेंगे उनको नीति नंदा की कृपा प्राप्त हो गयी और नीति नंदा बड़े प्रसन्न थे रंगदास है और उनका इतना वस् था कि वो अपने चिंतन से महा प्रभु को मिले ह उस में और माँ हरेक भक्त ने की थाली से ने सबको खिलाया, माँ ने सबको किसे खिलाया हमें इस लीला का स्मरण करना चाहिए और इस लीला का प्रचार करना चाहिए। उत्सव में बहुत खूबसूरत विशाल बना कर सबको खिलाना चाहिए। रामा रामा, रे, रे।
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