Pushkar Dham Yatra (Evening Session) || Day - 1 || HH Gopal Krishna Goswami Maharaj || 2025

Bhakti Ashraya Vaishnava Swami Maharaj opens the Pushkar Dham Yatra with instructions for the lunar eclipse at Pushkar: fast, don't cook, bathe three times around the eclipse, and listen to scripture and chanting. He praises volunteers who built pavilions and accommodations despite hardship, saying difficulty in the guru's presence yields spiritual nourishment.
Chapters
ariraagopignarhari
gopi
ha
यशोदनnबरजजनरगना
नnनरजजनरजनशोदनंदना ना शोद नद ब्रज रंजन यशौदलनदनाजरनजनाय शोदमंदनबरजजनरंजन रन्जना मु नाती रा बना रमुनरानजाररमुनातर जमुना देरबनजरगयराधम
रा
य रा ध मा था हा njhazrarahahaaगoपी
गन
जरा ग दन रा री दया गoपiबाव शोध रमनातीराशrज हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृश्णाकपोलिशा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे रामा रामा रामा हरे हरे कृश्णा हरकरिश्णकृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे रामा हरे रामा रामा रामा हरे हरे सब बोलिये
कृष्णा
कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम रे रामा रामा रामा
हरे
जो हरिनाम संकीर्तन जो हम गा रहे हैं यह कोई ममूली बात नहीं है ये गोलोक धाम से आया हुआ है गोलोक प्रेम धन हरिनाम संकीर्तन हरिनाम संकीर्तन जो हम कर रहे हैं गोलोक धाम से आया तो इसका खूब झूम झूम कर ताली बजा कर के कीर्तन करना चाहिए तब भगवान सुनेंगे अब बैठ 1 आदमी बोल रहा है आँखे बंद कर रहा है। वैसे मजा भगवान बोले बजा मैं आपको याद करूंगा सीधा सा फार्मूला है। भगवान ने कहा मैंने नहीं कहा ये भगवान कहते है। इसलिए जब भी कीर्तन होता है तो खूब कीर्तन कीजिए ताली बजाइए और बैठे बैठे झूमि तब भगवान प्रसन्न होते है क्योंकि कलयुग में हरी नाम के अलावा और कोई तरीका है भी नहीं है सबसे बड़ा तरीका है यह भगवान को प्रसन्न करने का तो अभी कीर्तन करेंगे तो सबने बोलना है और सबने ताली बजानी है और झूमना है। नामा
विष्णु पदाया कृष्ण प्रष्टायाभूतले श्रीमते भक्ति वेदांत स्वामी ना मी विष्णु पद बोलिए
बोलिए कृष्णा
तले श्रमी राधा स्वामी ने देना मेने हा मस्ते सरस्वती देवे गोरवानी नेरा विशेष चना बादी देश का री
ने
सर गौरव ने 4 ने नविशेsचोनबादी पा स त देश तारने श्री shnajatanaprunita nda asad gora स tनारभुनेtनादतागध सी सा दी गौर रे कृष्णा का कृष्णा कृष्णा हरे रे हरे रामा रे राम राम राम हरे रे हरे कृष्णा रे कृष्णा कृष्णा कृष हरे हरे हरे रामा रामा रामा हरे हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे रे हरे रामा रे रामा राम राम अरे रे हरे कृष्ण कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे रामा रामा रामा रामा हरे हरे कृशनारकशनाकिश्ना देखा हरे रारे हरे रामा राम राम राम हरे हरे हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा रे आरे आरे रामा रामा रामा रामा आरे आरे आरे कृष्णा
कृष्णा
hr, hare, hare rama, rama, ram, ram, har, har kusnaenakinasnahr, har, har, rama, rama रामा रामा रे हरि
बोल रे
हर बोल हर बोरिता रि बोल हरि बो, हरि बोल, हरि बोल हरि बोल रे बो हरि बोल हरि हरी हरी बोल हरी हरी बोल हरी बोल हरी बोल हरी बोल हरी बोल हरी बोल हरी बोल हरी बोल हरी बोल हरी बोल बो, हरी बोल हरी बोल हरी बोल, हरि बोल हरि बोल हरि बोल हरि हरि बोलो हरि बो
हरे कृषन हरे कृषणा
कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्णा हरे कृषणा कृष्णा कृष्णा आरे आरे हररारराबरामा रामा रे रे हरे कृष्ण हरे कृषना कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे ष्णा हरे कृषना कृष्णा कृष्णा रे हरे हरे रा रे राम राम राम रे हरे हरे कृष्णा हरे
कृषना
कृष्णा कृष्ण हरे रे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे ृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे रा रे राम राम रा राम हरे हरे रशना हरे हरे हरे राम हरे रामा रामा रामा हरे हरे हरे कृष्ण हरे कृषणा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्ण हरे ना कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्ण हरकृणाकृष्णाकृष्णा हरे हरे हरे रामा रे रामा रामा रामा रे आरे आरे कुशना हर कषनाकुणरररामाआरे राम रामा रामा हरे हरे हरे
कृष्णा कृष्णा
हरे हरे राम रे राम राम राम रे रे गया गोराना रन
रन का
रहा ह र का हाय रे का राग राधा राधा पात राधे राधा बात सीता राम ल्षमननुमासीता राम लक्ष मनाना जय सीता राम कृष्ण वाला राम रा कृष्ण बलराम गया कृष्णा बाला राम गया कृष्ण बाला राम कृष्णा बाला राम कृष्ण बाला राम गया कृष्ण बलराम गए राधे श्याम जय राधे श्याम राधे श्याम गया राधे श्याम गया राधे श्याम राधे राजा राधेजा ज राधा श्याम सुन्दर राधा श्याम राधे राधा श्याम सुन्दर सुन्दर राधे ललिता
ललिता विशाखा या शाक
ललिता विशाखा ललिता विशाखा ललिता विशाखा जया जया प्रभुपााप्रभुपा प्रभु पाज्रभुपाप्रभुपा प्रभु पा ्रभुपाजजयप्रभुपा रभु पा प्रभुपाद रुपाजप्रबुपारुा ्रबुपारुजय ओम विश्नपातपरम।
ejnaridatsmimarag prupadkeisconfo the holodptitnilpke prem se ho shrna जगtबldev्वदरमरानी की परम पुण्य श्री गोपाल कृष्ण महाराज के बोल सब भक्तों की जद कार हो हरे कृष्ण सब भक्तों की जद कार हो रे गुरु और गौर रन की जद कार हो रे हरे
हरे कृष्णा हरे कृष्णा। तो सही वक्त 1 बार दोनो हाथ खड़े करके जोर से बोलेंगे हरे कृष्ण हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे रामा हरे रामा रामा रामा हरे हरे। तो इस बार की गोपाल कृष्ण समाज की स्मृति में जो वार्षिक यात्रा है इसमें आप सब भक्तों का हार्दिक स्वा है तो सब 1 दूसरे के लिए ताली बजा सकते हैं और स्वागत कर सकते हैं और विशेष धन्यवाद हम ऑर्गेनाइजर्स देना चाहते हैं कि बहुत परीक्षा में भी उन्होंने जो है ये व्यवस्था की हुई है। बता रहे थे इतनी चुनौतियां यहाँ निरंतर कई दिनों से बारिश आ रही है लेकिन उसके बावजूद भी प्रसाद की कोटेशन की और सब व्यवस्था किया है और हम सब भक्त भी आए हैं तो आप सबका हार्दिक स्वागत स पुष्कर धाम के अन्दर और आशा करते हैं कि जो यात्रा है हम सब के लिए आध्यात्मिक शक्ति से ओतप्रोत करके हमको और ग्रुम हाज की स्मृति हमको और यादगार करके प्रोपीके मिशन में हमें और समर्पित बनाएगी ये 333 दिवसीय यात्रा जो है जो इसका भी शुभ आरम्भ हुआ है और प्रथम जो इसका सत्र है वो देने वाले जगे श्रीदाम प्रभु तो श्रीदाम प्रभु जी प्रपा जी के शिष्य हैं और भारतीय शिष्यों में से पहले भारतीय शिष्यों में से 1 है और प्रपोज गोपाल कृष्ण महाराज के बहुत ही करीबी गुरु भाई हैं और महाराज से बहुत ही उनका प्रेम प्रिय है। और अभी रिसेंटली आपको जानकर भी खुश योगी पता भी होगा। प्रभु जी इस कौन के अधिक दिक्षा गुरु भी हैं। तो हमारा परम सौभाग्य है कि प्रभु जी जो हैं उनसे हमें सेवन करने का प्राप्त हो रहा है कि कैसे हम प्राजी सच्चे समर्पित शिष्य बन सकते हैं। तो 1 बार हम हरे कृष्ण महामंत्र से प्रभु जी का भी स्वागत करते हैं। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। और इसे आप अपने जितने भी अन्य भक्त हैं, जो नहीं आ पाए हैं उनको आप शेयर कर सकते हैं। गोपाल गुरु महाराज के जो चैनल है गोपाल कृष्ण गोस्वामी ऑफिशियल, इसका लाइव टेली कास्ट हो रहा है सारे लेक्चर्स का। तो जो भक्त किसी भी कारण वर्ष नहीं आ पाए हैं, आप अपने ग्रुप में पर्सनली उनको शेयर कर सकते हैं। यू ट्यूब पर आप देखेंगे इसी लिए आपको लिंक मिल जाएगा। नको आप शेयर कर सकते हैं और बाकी अपने मोबाइल फोन साइलेंट पर रख सकते हैं ताकि कथा के बीच में कोई बाधा न हो।
हरेक हरे हरे कृष्णा।
आज का जो टॉपिक है, इससे के लिए या भाषण कीजिए lecr उसका topic है। tarswerdsandections becoming to prowpadअनुगाज बाई thars words and con, मनसा वाचा कर्मणा ये p्रwpाजी के साथ हम कैसे अलाइनमेंट करें एकीकरण प्रहपाजजी के जैसे प्रपात जी के तो सारे, मन, वच और कर्म तीनों की अलाइनमेंट थी। यह नहीं है कि मेरे मन में कुछ है, बोलता मैं कुछ हूँ करता, मैं कुछ हूँ। ये आम लोग जो भौतिक लोग हैं, वो ऐसा करते हैं। लेकिन आध्यात्मिक जो लोग हैं, भक्तगण हैं, खास कर के कृष्ण भक्त हैं उनका बोलना, उनका विचार, उनकी एक्शन 1 ही लाइन में होते हैं। आपस में तालमेल होता है उनका कहा कुछ करा, कुछ ऐसे नहीं वो पर काम भी नहीं करता है। सा ऐसे व्यक्ति का शिक्षाएं भी अगर सुनेंगे तो वो आपके काम नहीं, आएंगे, असर नहीं करेंगे। इसके लिए आपको सरल होना पड़ेगा। पहले प्रहुपाजजी बहुत सरल थे। मुझे याद गई। बात जब मेरी दीक्षा हुई वृंदावन में, 1973 में
तो
उन दिनों सरकारी नौकरी थी। मेरी छोटी सी नौकरी थी, ज्यादातर गा नही होती थी। उन दोनों, वैसे भी तो वृंदावन में मैं दिक्षा लेने के लिए गया था। प्रवाज के क्वार्टर में अभी मंदिर बन रहा था, अभी बना नहीं था। प्रो पाजी का क्वाटर था। तो जब प्रऊपपाजजने दिक्षा दी थोड़े से पैसे थे मेरे पास, बताऊंगा ने कितने थे, थोड़े से पैसे थे, थोड़ा फ्रूट लेके गया था और बांके बिहारी मंदिर के पास से पेड़े लेके गया था। उन दिनों वहां पर ही बाजार था। ज्यादातर सेवंटी टू के आस पास बाकी और पेड़ पूरे के ही नहीं मिलते थे, फ्रूट भी वहाँ पर ही मिलता था। तो प्रऊपाजी को जब मैंने वो अर्पण किए। पैसे प्रपा जी इतने सरल कि उन्होंने फटाफट उठा कर के माथे में लगा के अपनी जेब में डाल दिए। ऐसा सरल कोई होगा। इतना। पूरी दुनिया में जगह जगह पर मंदिर बने हुए हैं। प्रवपाजीउससमय 1972 में कम से कम 90 मंदिर से ऊपर बन चुके थे। उसके बावजूद भी प्रपा जी, इतने सरल को मेरा बस रुपया उन्होंने फटाफट माथे में लगा कर अपनी जेब में रख
लिए
और जो पेड़े दिए थे उन्होंने पहले उसको मर्तबान था। क कांच का, वाइट रंग का मर्दान था उसमे डाला और उनमे से 1 बड़ा ना करके ऐसे जोर से अपने मुह में ले। तो ऐसी सरलता कहीं मिलेगी? केवल प्रउपाजक्यूंके। हम लोग प्रउपाजजीके न बनना चाहते हैं। बनना भी चाहिए। तो हमारे जो विचार है, हमारी जो सोच है, हमारे जो एक्शन है, करम
है,
प्रऊपाजीकेअनुसार ही होनी चाहिए। यह नहीं प्रउपाजीतो कुछ बोलते है। हम कुछ करते रहे। तो फिर प्रउपाजीकेअनुक कैसे बनेंगे? हम नहीं बन, नहीं बन पाएंगे। सिर्फ नाम मात्र के थोड़ा बनना है। तो उसमें कुछ प्वाइंट हम समझने की कोशिश करेंगे। हा 1 बात और याद आ गई सरलता के पर 1 तो ये बता दिया दूसरा जब मैं पहली दफा बंगाली मार्केट में प्रउपाजीसेमिलने गया। हालांकि राधा पार्थासार्थी से मैं पहले मिल चुका था, उनके देश मुझे पहले थे। सेवंटी टू में ही राधा पार्थासार्थी के दर्शन हो गए थे। मुझे हमारा मंदिर नहीं बना था। म केतन में। तो जब बंगाली मार्केट में पता चला कि प्रोप आने वाले हैं। रात के लगभग 9 साढ़े 9 बजे मैं गया। मंदिर तो बंद हो चुका था, छोटा मंदिर था। उस समय बंगाली मार्केट में नतूस्वीट्सकेसामने मुझे किसी ने नहीं रोका। मैं सीधे जाकर के प्रपज जी के कमरे में गया और वहाँ पर 34 लोग पहले से बैठे हुए थे। बरजमोनचांदीवाला और उसके साथी पार्टनर से और जा कर के मैं भी बैठे। तो कुछ लोग बोलते हैं कि प्रउपाजजी के पास मिलना बड़ा मुश्किल था, ये था, वो था। तो ऐसी बात नहीं बड़े सरल थे। भक्ति में सरल ही होना चाहिए। अगर सरल नहीं है, वह भगवान को प्राप्त नहीं कर सकता है। सरलता बहुत आवश्यक है। तो प्रउपाजजी सरल थे। तो हमें भी सरल रहना चाहिए। सो आज का जो टॉपिक है we have becoming truप्रउपादअनुगाज। बाई थस words and cons। मनसा वाचा कर्मणा। इसके द्वारा हमें प्रउपाजजीकाअनुक बनना कैसे बन सकते हैं? हम अक्सर जयादातर लोग कहते हम तो प्रऊपाजजीकेअफॉलोरह है प्रपा के। लेकिन यदि देखा जाए तो कहने में तो बहुत आसान है। लेकिन हमें असल में प्रउपाद के अनुक बनना चाहिए। अपने इंदर अंदर से हमारी जो वाणी है वचन है। वो अंदर से सरल होने चाहिए। प्र उपाज साथ एकीकरण होना चाहिए, उनका अलाइनमेंट होना चाहिए। ऐसे ही हमारी सोच का भी यही होना चाहिए। और जो एक्शन हम कर्म करते हैं वो भी जैसे प्राज ने करके बताया। हमें बिल्कुल उन के साथ मरा लाइनमेंट होना चाहिए। सो मनसा के बारे में बात करते हैं। जो हमारी चेतना है। चेतना की शुद्धता, ये हमारी फाउंडेशन है। मंशा के बारे में हमने बुद्धि से सोचना है। उसके लिए हमारी चेतना जो शुद्ध होनी चाहिए। भगवत गीता में भी और साथ में याद भी करना चाहिए। यह नहीं है कि जब तक याद नहीं करेंगे न तो किसी के साथ हम 1 कारण करना चाहते हैं। उनको फॉलो करना चाहते हैं। अगर हम उनकी बातों को सुनेंगे नहीं, पढ़ेंगे नहीं या याद नहीं करेंगे। तो फिर काहे के फॉलोअर बन गए। पर शो मेरा लेक्चर था दावन में भगवत गीता के ऊपर 9 में अध्याय का 22 मार्च लोग था।
वो।
तो बोलते बोलते कि हमारी तो आदत हमने शुरू से सीखा कि जब भी कोई लक्चर करते हैं तो हर 12 सेंटेंस के बाद, वाक्य के बाद प्रउप जी की उदाहरण देते हैं, अपने हिस् कोन की प्रशंसा करते हैं। हमारे स्कॉड में प्रउपाजनेये किया, पूरी दुनिया में नाम, हरी नाम का प्रचार किया, भगवत गीता बांटी, पूरी दुनिया के लोगों को भक्त बना दिया। इससे पहले तो और किसी नहीं बनाया। इस कसम की बातें हम करते हैं क्यों? क्योंकि हमारी कांशेस प्रपात जैसी है। तो 1 लेडी ने मुझे क्वेश्चन किया? प्रश्न के बाद आप लोग तो हमेशा ही इसको स्कोन करते रहते हो, प्रपात पर बात करते रहते हो। तो मखयाफिरतम्ेयाद करें। बच्चा जो है जो अपने पिता से सीखा है। तो पिता की बातें ही तो करेगा प्राजी के is my body, मेरा शरीर है तो फिर हम प्रपात को याद नहीं करेंगे को याद करेंगे, बार बार उसका नाम नहीं लेंगे। तो फिर तो हम जीरो है। अगर अपने भाषण में हम प्रउपाजी के बारे में नहीं बोलते हैं, इस कौन के बारे में नहीं बोलते हैं। क्या क्या उपलब्धियाँ हैं कौन की उनके भक्तों की, तो फिर तो हम जीरो है। फिर कहा के फल रहे प्रउपाजजीकीकंद ये ऐक्वललीमैंने प्रश्न इसने किया है। किसी ने मुझे ऐसे कहा था के स्कोन वाले ऐसे करते रहते हैं। ठीक है हम करते हैं अपने पिता को नहीं याद करेंगे तो किसको याद करेंगे। उसी ने तो बाकी जितने बड़े बड़े महात्मा है, हम उनसे रिशा नहीं करते हैं। लेकिन जो प्रपात जी ने कर दिया, स्कॉड ने कर दिया वो किसी और ने नहीं किया। प्रपात के पहले कितने कितने लोग गे है, कितने प्रचार के हैं, कितने संत महात्मा के हैं। जिन्होंने मलसों को भी भक्त बना दिया। हर किस्म का नशा था, उनमें हर किस्म के ऐब थे। कोई ऐसा ऐब और नशा नहीं जो उन्होंने नहीं किया। तो ऐसे लोगों को शुद्ध कृष्ण भक्त बनाना। कोई आसान बात है। और किसी ने ने किया प्रो पाजी ने किया, इस कोड ने किया। तो हम क्यों नहीं लाम लेंगे। उनका पुत्र जो है अपने पिता का नाम तो लेगा। बार बार मेरे पिता चाहे, हमने देखा कि चाहे हमारे पिता मूली से आदमी हो, लेकिन हम फिर भी बढ़ चढ़ के हमारे पिता ने ये किया, हमारे पिता ने ये किया, हमारे पिता ये किया करते नहीं हैं। तो प्र उपाज ने सचमुच करके दिखाया है। इस कौन सच मुच करके दिखा रही है। तो हम क्यों ना ले। इस कोन का नाम बार बार लेना चाहिए। सफल वक्ता वही है जो अपने लेक्चर के दौरान में कई दफा राधा, कृष्ण का नाम ले, प्रपा जी का नाम ले, उनका उदाहरण दे। इस कोन का नाम ले। अगर वो कोई इस कौन का नाम नहीं ले रहा है, उपाय नाम नहीं ले रहा है, कृष्ण का नाम नहीं ले रहा। इसका bogs, ये टेस्ट है हमारा इस कौन भक्त का टेस्ट है, कृष्ण, भक्त का टेस्ट है ये शो। भगवान कृष्ण भी भगवत गीता में क्या कहते हैं मनमनाभव मत भक्तो, al visting my, चौबीसों घंटे मुझे याद करो। जब चौबीसों घंटे याद करेंगे तो क्या होगा? हमेशा ही कृष्ण याद आयेंगे। कृष्ण मय हो जायेंगे हम। उसी प्रकार जब हम हमेशा सदा। जिस प्रकार भगवान को चौबीसों घंटे याद करते हैं, उसी प्रकार हम इस्कॉन को और प्रपात को भी चौबीसों घंटे याद करते हैं। हमारा कोई भी कार्य होता है, होना चाहिए। ऐसा सबको सिर मेरा नहीं, सबके लिए है। जब भी सुबेरे उठते हैं तो सबसे
पहले
ऊपर बिस्तर पर सोए स्वय प्रणाम करो लेट लेट के यहाँ गुट गुटों के बल प्रणाम करो या पृथ्वी के ऊपर अपना सर निभा करके प्रणाम करो। नमो विष्णु पदाया कृष्ण प्रष्टा, श्रीमते भक्ति वेदांत स्वामी तिनाम, नमस्ते सरस्वति देव गौर वाणी पर, निर्विशेष शून्यवादी पार देश तार। उसके बाद चेतनमय प्रभु जी और हरे कृष्ण मंत्र, हरे, कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण, हरे, हरे, हरे, राम, हरे, राम, राम, राम, हरे रे। इस प्रकार हम प्रभु पाजी के फॉलोवर बन जाएंगे। जिसको बार बार याद करोगे फॉलोवर फॉलोवर बन गए, उसी से प्रेम होगा। ये फार्मूला है मनसा वाचा कर बना। प्रउपाजी को फॉलो करना। सिर्फ कहने से नहीं करके दिखाना है।
तो
हमारी जो सोच है वो तभी बनेगी। प्रपा जी जैसी हमारी एक्शन भी प्रउपाजीसे जैसे तभी बनेंगे, हमारे करम भी प्रउपाजीकेजैसेतवैसे बनेंगे। जब हम प्रपा को ज्यादा से ज्यादा याद करेंगे। प्रैक्टिकल एक्सपीरेंस है, आप सब का भी है, मेरा भी है। उसके लिए क्या करना होगा? हमें प्रुपाजीकांशेस बनने के लिए, प्रउपातभवनामतबनने के लिए क्या करना होगा। प्रउपाथजी की क्या करना होगा। किताबें पढ़नी होगी। यदि हम प्रउपाजजी की किताबें नहीं पढ़ेंगे तो अपने मन से वाचा कर्मणा से प्रउपाजजीकेसाथ। हमारा एकीकरण नहीं हो सकता, अलाइनमेंट नहीं हो सकता। जो हम बार बार पढ़ेंगे, उसमें क्या प्रऊपाजजीकेथार्टस हैं। प्रोप पाज ने क्या क्या एक्शन किया है, सारा से पता चलता है। हमें बुक, सारदा बेसिस। ये भी प्रोपपाजजी कहते हैं हमारा आधार, इस कोन में भक्ति करने का आधार हमारा क्या है किताबें हम में से लगभग सभी लोग, लगभग सारे लोग, जो भक्त बने हैं, भारत में भी, विदेशों में भी बुक्स पढ़ के बने हैं। जब प्रभुपाद जी की बुक्स पढेंगे तो धीरे धीरे हमारी सोच जो है वो भी प्रवपाजीजैसे होनी शुरू हो जाएगी। हमारे एक्शन भी प्रवपाजजीजा से होने शुरू हो जाएंगे। हमारा जो भाषण हैं, वचन वो भी प्रपात जैसा होना शुरू होगा। प्रैक्टिकल बात है। ये। तो प्रो पात जी के साथ अपने थार्स, वर्ड्स और एक्शन का अलाइनमेंट करने के लिए हमे क्या करना है। डेली प्रोपज जी की किताबें पढ़नी है। और उसके बाद फिर किताबों को बांटना भी। पा जी बड़े खुश होते थे। जब नई किताब चपके आती थी तो मंगला रती में मैंने खुद देखा। मंगला रती में वो किताब लेकर के सबको दिखाते थे। मंगला रती करने के बाद और बड़े खुश होते थे। इससे पता चलता है के प्रपात जी जो हैं बुक्स डिस्ट्रीब्यूशन को कितना बता देते थे कितनी किताबें छपे। अगर मेरे पास ज्यादा से ज्यादा पैसा आता है तो मुझे क्या करना है, किताबें छापनी है, किताबें छापनी है। प्रिंट बुक्स, प्रिंट बुक, प्रिंट बुक्स ऐसा
कहते थे
जो किताबें प्रिंट करनी है तो केवल रखने के लिए नहीं, उनको आगे वितरण करना है। ये हमारा दावा है कि अगर कोई भी व्यक्ति प्रउपाजजीकी बुक्स 1 दफा पढ़ लेता है तो वो कभी न कभी तो भक्त बने, बार नहीं रहेगा, भक्त बन जाएगा हंड्रेड परसेंट भक्त बनेगा।
व
ज्यादातर लोग ऐसे बने किताब इसको उनका भक्त आया। कोई प्रभु जी ये किताब लीजिए नहीं, नहीं, मैं नहीं लेता मेरे, मेरे पास पास ही है, मैं नहीं पड़ता ऐसा कर के कर को मैने आज गाड़ी में आ रहे थे तो हमारे वक्त किताबें बेच रहे थे तो लड़कों को दे रहे थे किताबें तो वो नहीं ले रहे थे। तो वो बेचारे बार बार उनको समझा रहे थे, उसके बाद नहीं ले रहे थे। तो किताबें बेचना बत करना कोई आसान काम नहीं है, उसके लिए नम्रता चाहिए, पेशेंस चाहिए मेरे जैसा आदमी तो गुस्से में आ जाएगा। शो प्रोपज कहते थे कि किसी 1 व्यक्ति के पास भी मेरी किताब चली जाती है, उसी से ही उसका कल्याण हो जाएगा और पढ लिया। तो फिर तो पक्का बैक, बैक टू गार्ड जाने का अधिकारी बन जाएगा वो और इस को न संस्था भी ज्वाइन कर लेगा। वो हमने सबने ऐसी ज्वाइन की है जब शुरुआत में किसी कारण वर्ष मुझे प्राणी, दिल्ली जमुना पार गीता कलोनी में जाना पड़ा तो वहां पर मुझे 1 किताब मिल गई। भगवत गीता एज इट, इज मैकमिलन कम्पनी की छपी हुई। जो सौ कहतर बत्तर में छपी थी, वो कहर में सेवंटी वन की छपी थी। मैकमिलन कम्पनी के तो उसका जब मैंने इंटरोडक्शन पड़ा पूरा भूमिका पड़ी तो मैं तो उस भगवत गीता का काल बन गया। मैं ऐसा तो कभी मैंने पढ़े ही नहीं है। बचपन से भगवत गीता हमारे स्कूलों में पढ़ाई जाती थी। लेकिन जो समझ प्रपात ने दे दी और कोई नहीं दे सकता। तो क्या यह बात हम बोले न लोगो को अवश्य बोलनी चाहिए। उसके बाद वो किताब मैंने लोन ली। उससे मैं घर जाके पढ़ूंगा। मैं गवर्नमेंट ऑफिस नौकरी करता था, मैं 1 महीने की छुट्टी ले ली और भगवत गीता पढ़नी शुरू कर दी। सो भगवत गीता केवल भगवत गीता किताब
नहीं है,
वो साक्षात कृष्ण है। जितनी भी पुस्तकें हैं, हमारी भगवत गीता भागवतम चितन्याचारतामृत, इनकी हमें डेली पूजा करनी चाहिए। जैसे डेली आल्टर में राधा कृष्ण जी की राधा पार्थसारथी की पूजा करते हैं।
न
हमें किताबों को भी पूजना चाहिए क्योंकि बखुदगीतामें क्या है भगवान के वचन भगवान न भाषण है भगवान का, तो भगवान के वचनों में, भगवान में कोई अंतर नहीं है। इस प्रकार यदि कोई आपको भगत गीता सुनाता है एजिटिसजथारूप वैसे अपनी तरफ से उसे कोई जोड़ना नहीं, घटाना नहीं है तो वो जो शब्द है उसको कृष्ण ही समझना होगा। उसी से हमारा कल्याण हो सकता है, लेकिन जिसके मन में कोई दुर्भावना है। कृष्ण के ऊपर श्रद्धा नहीं है, पर पाजी के ऊपर श्रद्धा नहीं है। ऐसा व्यक्ति हो सकता है कि बड़ा बहुत बड़ा भक्ता हो, बहुत बड़ा पीएचडी स्कॉलर हो, उसकी बात का असर नहीं पड़ेगा। तो 1 तो ये बात हमें पढ़ना है और किताबों को बांटना भी है। दूसरा प्रभुपाद जी की जो शिक्षाएं हैं, उनको भी हमेशा याद करना है। तो प्रपात ने कोई चीज कहा जो भगवान ने कहा भगवान क्या कहते हैं मुझे हमेशा याद करो, मन्मना भव मत बको मत जा, जी मा नमश करो। उसके बाद आप जब मेरे भक्त बनोगे, मुझे अनन्य भक्ति से मुझे याद करोगे। उसके बाद मेरी जिम्मेदारी है भगवान मेरी जिम्मेदारी है तुम्हारी जो भौतिक कमियां हैं, उसको भी पूरा कर दूंगा। जो तुम्हारे पास नहीं है और उसको भी प्रदान कर दूंगा मैं। तो फिर फिर हमें किस चीज का शक है हमारा ये नहीं होगा, हमारा वो नहीं होगा, हम भक्ति में लग जाएंगे किताबें पढ़ते रहेंगे। तो हमारा प कौन चलायेगा? हमें खाना कहां से मिलेगा
पे
ये इन्शुरेंस वाले अपना लोगो लिखते हैं। योग शीयमबहामेंहम उनकी बात कभी कभी पूरा बीमा मिलता भी नहीं है, रिफण्ड मिलता भी नहीं है पैसे। लेकिन प्रभु भगवान जी
कह रहे हैं
कि योग यम बहा में हम तो क्यों न उन पर मैं विश्वास करूँ। पर उपजी कहे हैं मैं तुम्हे भगवत धाम लेकर जाऊंगा, तुम ऐसा करो। उनकी बातों को क्यों न माने तो कैसे होगा? ये हमें भगवान को हमेशा याद करना प्र। उपाज जी को भी हमेशा याद करना है। चिता ने महा प्रभु जी को हमेशा याद करना है। तो उसके बाद फिर जिम्मेदारी भगवान अपने आप हमारी उठा लेंगे। हमें की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। अच्छा इतना हो गया, उसके बाद हमें अपने आप में नंबर नंबर बनना है। नहीं मैं किताब बाटने के लिए या गुस्सा गया। तो ऐसा करना भक्ति करने के लिए नम्रता बहुत जरुरी है। तरणादपिसुनीचेन तरो कितनी sदाhri तो नम्रता बहुत जरूरी है, प्रहपाजजीकेफॉलोर बनना है तो हमें नम्रता बहुत जरूरी है। प्रहुपाजजी को कई लोग कुछ कुछ कह देते थे। तो लड़ाई थोड़े मॉडल टाउन की बात है, शायद कोई लाला वहाँ पर लाले लोड जो है वहाँ पर चांदी चौक के वहाँ पर, उनके घर है। बहुत सारे लोग तो प्रपा को कोई लाला मिला होगा। तो ये इस्कॉन बनने के पहले की बात है। ये 1 गोडिया मठ के साधु थे, उनके द्वारा मुझे बताई गई है। बात ये और कहीं किताब में भी लिखा है।
कहीं?
तो लाला के घर में जाते हैं, वो डोर बल बजाते हैं। लेकिन गार्ड जो है कंद, वो बोलता है कि बहु जी तो घर में नहीं है। हालांकि घर में थे, वो तो ठीक है, मैं इंतजार करता हूँ प्रो पाज वहाँ पर खड़े रहे। 1 घंटा, 2 घंटे, इतनी देर में 1 गोडिया मट का साधु साइकिल के ऊपर, वो साइकल के पर जाते थे। पहले आजकल तो पता नहीं मैं, मैंने खुद भी देखा, हमारे घर में भी आते थे। गोडिया मटके तो साइकिल में आते हैं और 1 डरी होती है। साथ में आपने उनको 10 रुपए दिए तब भी वो लेते हैं, सौ रुपया दीजिये तब भी लेते हैं। तो उसने देखा प्रोपाजीकोजनताथा वो छुपी बड़ा आप। महाराज यहाँ पर कैसे खड़े है। मुझे ये वायदा किया है इस सेठ ने कि मैं तुम्हें 50 रुपए दूंगा, 50 रुपए, 20 रुपए। ऐसा कुछ मैं दूंगा तो मैं उसकी इंतजार कर रहा हूँ। घर में नहीं है तो वो साधु बोलता है न। तो आप मेरे साथ छोड़ो। मैं तुम्हें 20 की जगह 50 की जगह पर सौ रुपया दे दूंगा नहीं है। बाद में जब वो गोडिमडकेसाधु वापस भी आ, पा जी वहाँ पर खड़े हुए हैं तो इससे पता चलता है कि जो व्यक्ति कृष्ण के लिए कुछ करना चाहता है, उसकी बातों पर हमें विश्वास भी करना चाहिए, उसका इंतजार भी करना चाहिए। और उसके लिए हमें नंबर ता चाहिए। नंबर नहीं होंगे तो हम भाग जायेंगे। यहाँ से नहीं नहीं छोड़ो 20 रुपए के लिए। मैं यहाँ पर बैठा हूँ। तो नंबर होना बहुत जरुरी है। अगर हम प्रवपाज्जी के अनुक बनना चाहते हैं तो वचन प्रपा वचनों को भी हमें मानना है। हमारे जो वचन है, हमारे खुद के, आपके सब के ये ऐसे होने चाहिए कि प्रपात जी के साथ उनका लाइनमेंट होना चाहिए, उनका एकीकरण होना चाहिए। अपनी तरफ से कुछ बातें नहीं किया नहीं है। हमने जो प्रपात जी के विचार थे, प्रभुपाद जी के वर्ष से, उन्हीं के वचनों को हमने धरना है। अपनी तरफ से नए नए वचन शब्द घड़ने की जरूरत नहीं है और सच्चाई से करना है। झूठ मूठ ने सच्चाई से जो प्रउपाजीकेवचन हैं, वो तो शास्त्रों में पहले से बता रखा है, रूट है, शास्त्रों के प्रउपाजीकेजो बचन है। इसलिए हमे पूरी श्रद्धा के साथ देखिये। श्रद्दा बार बार शब्द आता है। श्रद्धा। श्रद्धा के बिना तो कुछ नहीं हो सकता। श्रद्धा वश होनी चाहिए। भगवान गलते हैं कि मैं तुम्हारा कल्याण करूंगा तो मैं तुम्हारा योगस्य करूंगा। मैं तो इस बात पर हमें पूरी पूरी श्रद्धा होनी चाहिए। जैसे प्रउप कहते हैं मैं अपने हर 1 भक्त को, शिशु को भगवत धाम ले के जाऊँगा। ये मेरा वायदा है। तो हम क्यों न विश्वास करें। प्रोप के ऊपर पता नहीं लेकर जाएंगे नहीं जाएंगे। तो हमारे बचन भी प्रभुपाद जी से ही लाइनमेंट होने चाहिए। 11 कर होना चाहिए। हमे भी लोगों को गलत बोलते नहीं बताना है। जो प्रभुपाद जी ने कहा है, उसी को रिपीट करना है। असली सिच जो है, सच्चा सि जो है, वो वही है जो प्रहुपाजी के शब्दों को दुराय। अपने शब्दों के द्वारा कुछ बताने की वश्यकता नहीं है। फिर चाहे हम ज्यादा पड़े लिखे हो, नहीं हो, योग्य भी हो, नहीं हो। केवल प्रहुपाजीके शब्दों को दुराते रहेंगे तो उसका असर पड़ेगा। मुझे याद है मैं जब अपने ऑफिस में था तो हमारे ऑफिस में तो साढे 7 एजुकेशन्स लोग आते हैं। हम तो मुबली पढे लिखे थे। तो लंच टाइम में, मैं प्रो पाजी की किताबें पढ़ता था। और मेरे सामने 5, 10, 20, कभी कभी 50 और ग्राउंड में होते थे, सौ सौ भी लोग के हो जाते थे। तो गर्मियों के दिनों में बाहर जाना थोड़ा मुश्किल था। तो कमरे में ही लंच टाइम में 1 से लेकर 2 तक प्रपा की बुक्स पढ़ते थे। भगत की तयाजिटिजऔरदूसरी और किताबें इजी जर्नी टू अदर प्लैन्स। तो लंच टाइम में क्या होता था कि जो बाहर से लोग आगे कोई बनारस हिंदू यूनिवसिटी आ गया, कोई अलीगढ से आ गया, कोई सेंट्रल यूनिवर्सिटी या डील करता था। उस समय तो वहां के प्रोफेसर वगैरह कभी कभी बाइसांसरभीहोते थे, वो भी आ जाते थे। तो वो बैठ के बैठ जाते थे, डिस्टरब नी करते, सुनते थे। तो 1 दिन 11 प्रोफेसर थे। वाइसांसरथे लखनऊ यूनिवर्सिटी के वो बोलते हैं। सर ये जो इंग्लिश आप पढ़ रहे हैं, या तो बड़ी आसान है लेकिन ऐसे शब्द हैं बहुत सारे। इसमे हमने कभी सुने ही नहीं है। तो आप तो बड़े अच्छे तरीके से से ट्रांसलेशन कर रहे हो। मैंने कहा ये केवल प्रउपाजयकेऊपर हमारे शेत है, यकीन है, उनको हम दिलो जान से चाहते हैं। ये सब उन्हीं के कारण हो रहा रहा है। बाकी हम तो बड़ा आदमी है, हमें कुछ नहीं पता। तो ऐसे करते करते उसके साथ मेरी दोस्ती भी हो गई। और दूसरे डॉक्टर गुरुबक्ष सिंह थे। दिल्ली यूनिवर्सिटी के, वो भी आते थे लंच टाइम के, तो वो भी कभी कभी सुन लेते थे। दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस है और उनका ये रिजल्ट निकला कि उसने अपना ये मंदिर था। हमारा समय ग्रेटर क्लास ब्लॉक में वहाँ
आया,
मेरे गुरु भाई परम्पुजी ने गोपाल किसा महाराज के साथ मिला वहां से पूरी किताबें लीं, भागवतम और भगवत गीता। तो ऐसे करके कहने का तत्पर यही है कि यदि हम जो प्रपज शब्द बोले हैं, वो ही उन्हीं को डराएंगे तो वो उसका असर होगा। अगर अपने शब्दों से बोलेंगे तो वो असर नहीं करेंगे। और जो परंपरा में बातें कही गई हैं, उन्ही बातों को हमें दुराना है। बिल्कुल सत्य सत्य कैसा होना चाहिए। सत्य बोलने में कम्प्रोमाइज नहीं करना है। सत्य जो है वो सत्य ही है। झूठ बोलने से। हो सकता है कोई बड़ा खुश हो जा। यार यह आदमी अच्छा है। इसने ठीक बोला। वो बोलेगा ये ठीक बोल रहा है क्योंकि उसमें उसकी प्रशंसा आ रही है। लेकिन भक्त को ऐसा नहीं करना चाहिए। जैसे प्रपा अमेरिका में लक्षर देते थे, यूरोप के इंटरव्यू में लक्चर देते थे।
तो
वहाँ जाकर के बोलते थे। तो हमारा जो कल्चर है वो तो कुत्ते बिल्लियों का कल्चर है। तो उससे लड़ाई हो सकती है। हमारे देश के कल्चर को तुम ऐसा बोलते हो। लेकिन ये शास्त्रों के अनुसार मैं अपने शब्द थोड़ा बोल रहा हूँ। शास्त्रों में लिखा है। तो सच बोलने में हमें कठिनाई नहीं होनी चाहिए। उसके बाद अगली इंस्ट्रक्शन है हमारे लिए, वो पहले शुरू में में कहा द्वारा से ये बात आ गई है। हमे प्रऊपाजजी ने जो भूला है उसी को रिपीट करना है, बिना किसी मिलावट के। और और क्या करना है। प्रवपाजजीकेअगरअनुगज बनना है और क्या करना है। ग्राम कथा इधरउधर की बातें बिल्कुल नहीं करनी है। देखिये, अगर कोई भक्त बनने के लिए स्कोन ज्वाइन करता है और साथ ही साथ दुनिया भर की गप्पें भी मारता है। यह विडियो भी देखता है। आजकल तो उसका बड़ा असर हो गया। मोबाइल का मोबाइल देखा तो वो भक्त नहीं रह सकता है। 1 दिन वो माला करना भी छोड़ देगा पक्की बात है।
ये
तो हमे वो ही कार्य करना है। अनुकूल लेन कृष्णन जो कृष्ण के अनुकूल है, भक्ति के अनुकूल है, जो प्रउपाज्य ने कहा है, उसी के अनुसार हमें कार्य करना है। दुनिया भर की इधर की बातें बिल्कुल, अगर करते हैं। तो त्याग दीजिये। अगर वाकई कृष्ण भावनामृत में आप तरक्की करना चाहते हैं, उन्नति करना चाहते हैं। तो गपशप जो दुनिया की है, ग्राम में कथा इनको नहीं करनी चाहिए। और जो देखिये जैसा मैंने शुरू में कहा किताबें वितरण करना जो है, बड़ा कठिनाई का काम है, धुआ भी खाना पड़ता है, मोटरों का। कभी कभी लोग कई बार गाली भी दे देते है। मुझे तंग कर रहे हो तुम, तुमने धंदा बचा रखा है। चौरा पर जाकर किताबें बांटते हो। तो कहने का तत्पर है, कि बहुत मुश्किल है किताबें बांटने का। लेकिन इससे भगवान भी परेशान होते हैं, प्र उपाज प्रशन होते है। और प्रउपाजी परेशान हो गए। तो समझो के हमारा काम बन गया। तो जो ये कार्य करते हैं, उनको क्या करना है, उनको उनकी नोटिफिकेशन करनी चाहिए। हमें कभी कभी दिल्ली नहीं तो कम से कम साल में 1 दफा। हम मनाते भी हैं। ये फंक्शन कितनी कितनी किताबें बेची हैं, कितनी वितरण की है, कितने सबसे ज्यादा की है। तो उनका ग्लोरिफिकेशन भी होना चाहिए। पर उपजी करते थे ग्लोरिफिकेशन पर पाजी की। जान है। बुक डिस्ट्रीब्यूशन बाकी एक्शन मनसा वाचा कर्मणा, कर्मना कर्म। तो कर्म से भी हमें वैसे ही कार्य करने हैं जैसे प्राजी करते थे। मनसा वाचा कर्मणा, सारे कार्य। जो कुछ भी हम करते हैं, जो कुछ भी हम खाते हैं, सब भगवान के अर्पित, अपने गुरु के माध्यम से। प्रोउपाजजीकेमाध्यम सेप्रउपाजजी ने अथक प्रयास करके, इतनी किताबें लिखी। वो किसके लिए लिखी है। सिर्फ दिखाने के लिए। हमें किताबें वितरण भी करनी है, हमें पढना भी है। यह नहीं है कि किताबें खरीद ली और जा कर के अपने घर में रख दिया। वो भी अच्छा है। क्योंकि भगवान से अलग नहीं हैं किताबें भगवान की। लेकिन उनको पढना भी है। जब हम पढ़ेंगे, तब हमारे मन में कृष्ण भावनामृत जागृत होगी। प्रउपाजी के विचार जो है, वो आयेंगे। प्रोपज की तरह एक्शन भी आयेंगे। तो इसलिए किताबें वितरण करना भी, पढना भी बहुत जरूरी है। किताबों वितरण के ऊपर तो बहुत जोर दे दिया हमारे। पर गोपाल से। महाराज भी किताबें वितरण करने के लिए बहुत जोर देते थे। पहले हिंदी में किताबें तो होती नहीं थी, इंग्लिश में थी, तो महाराज ने उसका ट्रांसलेशन कराया। हिंदी में, गुजराती में और दूसरी भाषाओं में और पूरे भारत वर्ष में सबसे ज्यादा। कभी कभी हमारे दिल्ली मंदिर के जो स्कोर हैं, ज्यादा हो जाते हैं। ये क्यों? क्योंकि महाराज उनको आगे बढ़ने का मौका देते थे, उनकी तारीफ करते थे। नोटिफिकेशन गाते थे उनके अपने जो शक्ति
है,
अपना समय जो है आपके पास जो टैलेंट है, उसको क्या करना है। भगवान की सेवा में लगाना है, प्रीचिंग में लगाना है। साधना साधना भी। अगर प्रो पाल जी को अगर फॉलो कर रहे हैं तो म्हें साधना भी करनी है। बिना साधना के काम नहीं। देखिये अपने भौतिक कोई चीज प्राप्त करनी है तो उसके लिए भी साधना करनी पड़ती नहीं है। फर्स्ट केजी का बच्चा भी जब पढ़ने जाता है तो सवेरे स्वेरे मां उठा देती है, उठो मां भी तपस्या करती है। सर्दियों में तो कोरा बड़ा होता है और बस में छोड़ने के लिए जाती है। उसके पास। तो जो हायर क्लासेज हैं, उनको कितनी मेहनत करनी पड़ती है। तो साधना करते हैं अब लोग। और यदि हमने वाकई प्रोप से प्रेम करते हैं, उनका मनसा वाचा कर्मणा से, उनसे कीकरण करना चाहते हैं, भगवा धाम वापस जाना चाहते हैं। इस संसार से, मृत्यु के चक्कर से छोड़ना चाहते हैं। तो हमें भी साधना करनी चाहिए। साधना क्या है हमारे पर्वत में जाना
नहीं,
वो वो साधना हम नहीं कर सकते है। बड़ी सिम्पल साधना है। सवेरे साढ़े 34 बजे, उठ जाइए साढ़े 4 बजे। मंगलाआरती अटेंड कीजिए, सुबह के सारे प्रोग्राम अटेंड कीजिए। यह आवश्यक है। अगर कोई ऐसा नहीं करता है तो वो hipoकरेciहिपोक्रिसी क्या कहते? हिंदी में दोगलापन वो समझो चाहे, मैं हूं, चाहे कोई और है, वो दोगलापन है। ये पोक्रेसी है कोई बोलेगा जी, महा तो मंदिर से बहुत दूर रहता हूँ। मैं कैसे अटेंड करूँ? सूर्य की प्रोग्राम उसके लिए भी है। देखिये मंदिर के आस पास रहते हैं तो उसको मंदिर के सारे प्रोग्राम अवश्य ही अटेंड करने चाहिए। जो मंदिर में रहते हैं, उनको तो करने ही करने हैं। जो आसपास भी रहते हैं, उनको भी करने चाहिए। और जो माल लिया दूर रहते हैं। हमारा मंदिर तो संतनगर में है। मान लिया तो पंजाबी भाग में भी है, द्वारिका में भी है। सब जगह पर है तो मंदिर दूर है। मान लिया बहुत नहीं आ सकते। घर में आने से 1 आधा घंटा लगता है, घंटा लगता है। तो क्या करेंगे? जहां प्रपात जी की बुक्स हैं, वो भी मंदिर है, वहां सुबह उठ जाइए। साढ़े 4 बजे उठ कर के घर में मंगलाआरती कीजिए। मंदिर में नहीं आ रहे वहाँ कीजिए। लेकिन कभी कभी आपको हफ्ते में 1 दफा या पंद्रह दिन में 1 दफा। मंदिर भी अवश्य जाना है। भक्तों के साथ भी मिलना है। खास करके जिसने दिक्शा लेनी है, उसकी दिक्षा कैसी होगी। अगर मंत्री नहीं जाएगा तो प्रेजिडेंट तो रिकमेंड नहीं करेगा न। उसको तो उसको तो जाना है। जो पुराने लोग है, पुराने भक्त हैं, उनको भी अवश्य जाना चाहिए। हफ्ते में डेली जाए तो बहुत अच्छा व गुड है। 6 दिन तक घर में मंगलआरती कीजिए, सुबह के पूर्व कीजिए, भगवत गीता पढ़िए अपने परिवार को बिठा कर के किर्तन कीजिए सुबह श्याम वो आपका घर दर bn गया है तो ये बहुत जरुरी है। और प्रसाद प्रसाद डिस्ट्रीब्यूशन मंदिर में भी। पर उपाय ने यह नियम बनाया था कि जो भी सुबह शाम को आरती में आते हैं। भक्तगण। बाहर से भी जो भक्त हैं, वो भी जो भक्त नहीं है, वो भी उनको थोडा थोडा प्रसाद मिलना चाहिए। पहले होता था, आजकल क्या बात है, पहले होता था। उसी प्रकार घर में भी अगर हमारा मंदिर है। घर में हमने बिगरा रखने की जरुरत नहीं है। किताबों की पूजा कीजिए। पेपर राधा कृष्ण जी के पेपर फोटो है उसकी पूजा कीजिए। उसमें और भगवान में कोई अंतर नहीं है। और उसके बाद सुबह नहीं आते लोग। तो शाम को सबको इनवाइट करो। मोहल्ले वालों को हमारे घर में जितना भगवत, गीता, पढेंगे, बैठ कर के आधा घंटा के बाद में क्या करना है। सब के लिए थोड़ा थोड़ा अपने असित के मुताबिक उनको सबको प्रसाद दीजिए। पर ऐसा तभी तो प्राजी बनेंगे। शिलरपगोस्वामiभक्ति समर सिंधु में कहते हैं अनुकूल संकल्प है। प्रतिकूल प्रजनन भक्ति का मतलब है। क्योंकि जो जो बातें बताई थी, इससे भक्ति आती है। न अनुकूल हैं हमारे भक्ति के, तो ये करना है। और जो भक्ति के अनुकूल नहीं है, उनको क्या करना है। त्याग 2 जा दुनिया भर की बातें करनी, इधरउधर की बातें करनी, आज से होटल में खाना, होटल में खाना, इसको त्याग 2 यह भक्ति में रुकावट है। कृष्ण भावना भावत होने में रुकावट है। लेकिन यदि मैं यह सोचता हूँ, लेकिन करता कुछ अलग हूँ, तो ये भी भावुकता है। सेंटी मिनट्स हैे। यह भी ठीक नहीं है। सो प्रपात जी के अनुग जब हमें बनना है, हमने मनसा वाचा कर्मणा भगवान कृष्ण की सेवा में ही अर्पण करना है। जिस प्रकार प्रपज ने अपने जीवन को अर्पण किया, अपने जीवन को मोल्ड किया, तो हम भी अगर ऐसा करते हैं तो हम प्रउपाजजीकेअनुक्स बन जाएंगे। हम लोग अपने आप को रूपा बोलते हैं, प्रोउपादनुगुपि बोलते हैं। तो ये सारी बातें तभी होएंगी जब हम अपनी सोच से, अपने एक्शन से, अपने विचारों से मनसाबाचाकर्मणा प्रउपाजीकीतरही करेंगे। तब होगा। और मन में ये होना चाहिए। हमेशा जैसे प्राजी हमेशा सोचते रहते थे। मैं कैसे कृष्ण भावनाओं को पूरी दुनिया में फैलाऊं। तो हमें भी यही भाव होना चाहिए। पूरी दुनिया में नहीं फैला सकते थे। अपने घर में फैलाइए, अपने महल्ले वालों को फैलाइए, उनको बुलाइए घर में। तब हमारे जो विचार हैं, हमारे एक्शन जो हैं, प्रवपाजीके साथ लाइनमेंट बैठ जाएगी, हमारे एकीकरण हो जाएगा। पूरी दुनिया में हमें प्रचार करना है, यह भी हमारे मन में सोच होनी चाहिए। प्रहुपाजजीने बड़े साफ, साफ, श्लोकों के अर्थ बताए हैं। तो हमे जो प्रभु पाज ने जैसे अर्थ बताए हैं, बिल्कुल वैसे का वैसा ही स्वीकार करना है। तोड़ना मरोड़ना नहीं है उसको बिशमेप्रभुपाजजी के एक्शन ये भी था। ये बातें भी सोचते थे। साथ में अथक प्रयास किया उन्होंने, और विदेशों में जाकर। उनकी सोच थी। न मन में सोच थी कि मैं न ये किताबें लिख रहा हूँ। तो इसे मैंने प्रचार भी करना है। पूरी दुनिया में। तो उसके लिए उन्होंने एक्शन भी किया, कर्म भी किया, क्या कर्म किया, केवल 40 रुपए लेकर विदेशों में गए, प्रचार किया और सफल भी हो गए। दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं है। अभी, ईवन, कैम्युनिस्ट, कंट्रियां भी, चाइना में भी शर्म तो नहीं। लेकिन वैसे भी वहां के चाइनीज लोग भी भक्त बने हैं। रशिया के तो बनेंगे रशिया भी वहां प्रचार करना बड़ा मुश्किल था। लेकिन अभी तो हजारों हजारों भक्त बन गए हैं। इस कोन के रश्यनलोगसोप्रउपाजी ने केवल सोचा ही नहीं, उसको किया भी। तो अगर हम भी अपने आप को प्रउपाजीकाफॉलोर कहते हैं तो हमें भी इसी लाइन पर चलना है। हमारे विचार इसी लाइन के होने चाहिए। इसी से ही हम भगवान कृष्ण की सेवा कर सकते हैं। अगर हम भगवान कृष्ण की सेवा करना चाहते हैं तो बिल्कुल वैसे का वैसा ही जैसा प्रपज करके दिखाया है। हमे करना है अपने जीवन को, ऐसा मोल्ड करना है कि हम 1 मिनट के लिए भी प्रभुपाद जी को न भूलें। बिल्कुल प्रभुपाद जी की तरह ही हमारे भी विचार होने चाहिए, हमारे एक्शन होने चाहिए। मन बुद्धि के द्वारा बार बार उसी प्वाइंट के ऊपर बात आ रही है। और हमें भी हमारे जो 11 शब्द है, उससे कृष्णभावना फैलनी चाहिए। लोगो में क्या जो मेरे शब्द हैं, मेरे कर्म है, मेरे एक्शन्स है, मेरी सोच है। उससे कृष्ण भावना फैलाने में मदद मिलती है कि नहीं यह भी सोचना है। अगर मेरे शब्द मेरे एक्शन मेरी सोच। अगर कृष्ण भावना फैलाने में बाधा डालती
है
तो ऐसे सोच, ऐसा एक्शन मेरे नहीं होनी चाहिए। हमें बिल्कुल प्रपात जी की तरह ही अपना सोच, अपना एक्शन होने चाहिए। और हमें हमारे मन में भाव होना चाहिए कि मैं किस प्रकार प्रउपाजजीकीकिताबों को ज्यादा ज्यादा पढूं लोगों तक वितरण करूँ और कैसे इसको का ज्यादा से ज्यादा प्रचार करूँ मंदिर बनाना। प्रोपी कहते मेरा ये एम नहीं है। पहला जो है, ये प्रश्न किया था किसी ने प्रोपाजजीसे। पहला मेरा उद्देश्य है मेरे मन से, मेरे वचन से, मेरे कर्मों, से के ज्यादा से ज्यादा कृष्ण भावना का प्रचार हो। और मंदिर बनाने जो वह सेकेंडरी है, वह बाद की बात है। जब पैसे आये, पैसे आयेंगे तो फिर मंदिर भी बनेंगे बनने चाहिए। वो हॉस्पिटल्स हैं इस भौतिक जगत की बीमारी के जनम, ऋतु की बीमारियां जो है जनमऋृतुजराब्यादी, ये बीमारियाँ हैं इनकी बीमारियो को ठीक करने के लिए। इस्कॉन जो है। स्कोन के मंदिर जो है वो क्या है, हॉस्पिटल्स हैं। और आप लोग जो प्रचारक हैं वो कौन है। डॉक्टर, आप लोग जो भक्त हैं, प्रचार करते हैं, किताबें बांटते हैं, वो कौन है। डॉक्टर कोन के डॉक्टर तो केवल नाम मात्र से ही के मैं तो प्रउपाजकअनुगहू
नहीं।
हमें जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी जिम्मेदारी है प्रउपाजयकाअनुख बनना। 1 जिम्मेदारी है। यह पद नहीं है। पद ले लिए ही जिम्मेदारी है। जिम्मेदारी क्या है। पूरी दुनिया में, पूरे संसार में भगवान के नाम का प्रचार करना, प्रउपाजीकीकिताबों प्रचार करना, उनका वितरण करना, ये जिम्मेदारी है। अगर वाकई में अपने आप को प्रउपाजीकाफॉलोर कहता हूं तो हमें 4 निजम पालन करने हैं। मॉर्निंग प्रोम टेंड करना है। साथ ही साथ में अपने आप को नंबर भी बनाना है। और ज्यादा से ज्यादा प्रउपाजजीकी बुक्स को पढना भी है और वितरण भी करना है। ऐसा जो करता है, वो ही सही माने में प्रउपाजीका असली फालो है। तब हमारा जीवन सफल है। नहीं। तो अगर हम ऐसा नहीं करते हैं। प्रोउपाजी के अनुसार अपने जीवन को नहीं जीते हैं तो हमारा जीवन असफल है। और जग। यदि हम प्रउपार्जीकी बातों पर पूरी श्रद्धा करके, विश्वास करके, पालन करते हैं, तो राधा कृष्ण जो हैं, वो हमें आश्चर्य प्रदान करेंगे। यह पक्की गारंटी है कि हम भक्त बने, क्यों हम भक्त बने? क्यों भगवान का आश्रय लेने के लिये, भगवान के प्रति समर्पित करने के लिए, अपने आप को अगर हम भगवान के प्रति समर्पित नहीं होते हैं। प्रपा की बातों पर असल अमल नहीं करते हैं तो किस चीज की? हम फालो रहे? हंप्रउपाजके तो हमें झूठ, मूठ, मैनी फॉलर बनना है, दिखावा गनी करना है, हमें असल में, अपने मन से, वचन से, एक्शन से प्रउप को फॉलो करना है। लास्ट में 1 फाइनल प्रेयर मैं, पढ़ूंगा वो है, ये इंग्लिश में है। silapa please bless dete torts words and actions me forever remain line in your service, so that we may be counted as your trough follows he prwupadji। मुझे आशीर्वाद दीजिए मैं, मनसा वाचा कर्मणा सदा आपकी सेवा में एकीकरण एकीकार रहूं और ताकि मेरा नाम भी आपके अनुग्जमें आ सकें 10 हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, कृष्णा, कृष्णा, हरे हरे हरे राम, हरे राम राम राम, हरे जगत गुरु शीला प्रभुपाद की, पतित पावन, जगत गुरु शिला प्रभुपाद की। तो सारांश में यही है लक्चर यहाँ पर जो ऐसे था, यह पूर्ण होता है। तो हमें ये करना है कि प्रवपाजजीकी किताबों को ज्यादा से ज्यादा पढ़ना है, तभी हम मनसावाचा कर्मणा, प्रवपाजजी को फॉलो कर पाएंगे, उनके फॉलोवर कहलाने के योग्य होंगे। अनाथा तो गप ही रहेगी, रूट है, ठीक है तो सभी लोग, सभी भक्त, जो जितने भी यहाँ पर है। मेरा यही प्रार्थना है कि प्रउपाजजी से प्रार्थना कीजिए, राधा कृष्ण जी से प्रार्थना कीजिए कि हम सही, सच्चे, सचमुच प्रउपाजीकेअनुक्ष बने, हमारी यह प्रार्थना डेली भगवान के सामने होनी चाहिए। धन्यवाद किसी का कोई प्रश्न है, कोई कमेंट या तो बोल सकते हैं, नहीं
तो हर 1 किसी क्वेश्चन तो हैड्रेस करें और माइक प्रोजी आपके यहाँ लेके जायेंगे, आप प्रश्न पूछिएगा
किसी और कोई
प्रश्न हो लेक्चर के रिगार्डिंग।
तो आप प्रश्न पूछ सकते हैं।
नहीं है तो ठीक है, पीछे 1
भक्त का है प्रोजी,
कुछ शब्द आप अपने स्थान पर खड़े हो जाइए, प्रोजी
माइक ले रहे हैं, आगे आ जाइए बि।
re krishna prvi thank you for letting s, now, how to become proupadaपरहुजी 1 प्रश्न समय रहता है कि जैसे आपने बोला, हम एक्ली प्रवाद को follow कर रहे है, प्रपात जैसे व्यवहार था हमारा ऐसा व्यवharha, तब जाके उसका इम्पैक्ट पड़ेगा दूसरे के ऊपर बट। इनिशियल स्टेज में कभी कभी होता है कि हमारा आचरण तो एकदम शास्त्र के अनुसार नहीं होता, बट फिर भी गुरु के आदेश के अनुसार प्रचार करना पड़ता है। तो उस समय खुद को भी लगता है कि नाव में भी आम नोट टीके तो प्लीज। तो इस सिच्वेशन में क्या समझ गया। ऐसा होता है शुरूशुरू में, क्योंकि हमारे जो पिछले कर्म है वो भी कोई अच्छे नहीं होते हैं किसी वजह से, किसी कारण भगवान की कृपा से हम भक्ती लाइन में आगे है। लेकिन कभी कभी जो हमारे पिछले कर्म है न, वो भी कभी कभी हमें तंग करते हैं तो उसका हमें तंग न करें। यही फार्मूला है ज्यादा ज्यादा, जॉब कीजिए और ज्यादा ज्यादा और पढ़िए जितना हो सके किताबें पढ़नी चाहिए हमें प्रउपाजजीकी धीरे धीरे धीरे धीरे हमारा मन जो है, हमारी बुद्धि जो है वो साथ हो जाए। 1 दिन में तो नही होगी न। कुछ दिन लग सकते हैं, कोई तो 1 महीने में भी ठीक हो सकता है, किसी को 1 साल भी लग सकता है। और कहीं तो बहु नाम जन्म नाम का है तो ये हमारे ऊपर जितना गुड़ डालेंगे उतना मीठा है जितना हम ज्यादा प्रोउपाजीके बारे में पढ़ेंगे सुनेंगे उतने हमें प्रउपाजी के बारे में भांग जासे। देखिये आपने देखा होगा मैं जब कीर्तन करता हूँ शुरू से ही, यहाँ तो प्रपात जी की टोन में बोलता हूँ। अब देखिये बच्चा बच्चा बोलना शुरू करता बचा तो जैसे उसके माँ बाप बोल बिल्कुल वैसे ही बोलता है। तो जब कीर्तन करते हैं। हरे कृष्णा हरे क्रिष्णा कर कृष्ण कृष्ण
हरे हरे हरे रामा हरे रामा रामा
रामा हरे हरे ये टोन प्रभुपाद जी की है तो हमें प्रपात जी की टोन में ज्यादा ज्यादा बोलेंगे न। तो प्रपात जी के भाव आएंगे हमें और अगर बोलेंगे क्या है। 1 बहुत पुरानी छोटे छोटे बच्चे होते न फिल्म i आर्डर दिल्ली केंट में मेरे पिताजी थे तो वहाँ पर फिल्म देखी थी 34 साल के बच्चे चले गए गाना उसी टोन के ऊपर तो हर 1 तमाम मंत्र गरे है तो कैसे तरक्की होएगी कॉन्सेसनेस नहीं बढ़ेगी आपकी जो भक्तों के द्वारा ट्यून बनाई गई है प्रउपाजजीकी ट्यून है उसी को धारण करना है ये अंटसंट की जो राग है न, उनके अनुसार प्रउपाजजीकाकिरतन नहीं करना है। अगर वाकई हम आगे उनति करना चाहते हैं तो नहीं तो जो मर्जी करो अभी उ कुछ दिन पहले भी बड़े नाच नाच के वो कीर्तन कर रहे थे कौन सा गीत था ऐसा होगा बोल और करता हूँ हरे कृष्ण हरे कृष्ण टू का है की है तो हमें जो आचार्यों ने ट्यून दिए है प्रपात आचार्यों ने तो वो बोलना है फिल्मी टोन को बोलेंगे न तो भक्ति
में नहीं आएगी
महाराणी की श्री श्री गवनताईकीजनेटकेन हरे कृष्ण जी जी मेरा सवाल
ये था की जैसे हम कई बार
अटेंटिव चैंटिंग का सुन तो हम अटेंटिव रीडिंग कैसे कर सकते हैं उसको प्रीचिंग में कैसे लेके आ हा अटेंटिव रीडिंग इसलिए ऐसे करना है की वो समय आप देख लीजिये कि इतना समय मैंने पढ़ना है। 1 नियम बना लीजिये भक्त ठाकुर जी ने तो लिख के लगा रखा था समय मैंने पढना है समय सोना है इस समय खाना है इस समय मे रात को फिर वो कोर्ट का भी काम करते थे, है न? तो हमें भी यह नहीं बताना चाहिए कि हमने डेली प्रउपाजजीकी बुक जो है 1 घंटा 2 घंटा जितना भी आपका समय है। अटेंटेबलीउसमेना फ़ोन फ़ोन बंद कर दीजिए, मोबाइल बंद कर दीजिए, घरवालों को बोल दीजिए, मुझे भी डिस्टर्ब मत करना डेढ़ घंटे के लिए, 2 घंटे के लिए तो अटेंटिमचार्टिंग हो जाएगी और अटेंटिव रीडिंग भी हो जाएगी। और तब आप मेरे से बात करना बाद में आप जो कुछ भी बोलोगे पब्लिक में जाकर के अवश्य उसका असर पड़ेगा या टा है। और कोई अटेंटिव ली आप पढेंगे न चांटिंग करेंगे तो जो आप भाषण देंगे न उसका असर होगा कोई और रहे हैं है पढने के लिए। पर्वूज ने बोला था मेरे गुरु, नारायण ने बोला था, पो तो पढ़ लिया और चिंग कर रहे हैं, चैटिंग कर रहे हैं तो साथ में ध्यान कहीं और जा रहा है तो वो टेंट नहीं होता है बैठ कर के 1 जगह बैठ कर के, अभी बुरे हो गया है तो हम बैठ नही सकते। तो खड़े होकर, परोपा जी भी खड़े होकर के तो ऐसे चलते चलते अपने कमरे में जा कर खड़े खड़े अरे रे, रे, रे, राम ऐसे करते थे वह चलते फिरते अपने कमरे में ऐसे खड़े 1 ही जगह पर खड़े अरे कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण, अरे, अरे, अरे राम, रे राम तो अटेंटिव हो जाएगा। कोई मुश्किल नहीं है। लेकिन भौतिक जगत देखिये मैं बार बार उदाहरण देता हूँ। 2 नाव में पैर नहीं रख सकते हैं, 1 पैर इधर नाव में, 1 पैर। इस नाव में, तो वो डूबेगा डूबा व्यक्ति तो 1 पैर भौतिकता की। और 1 धार्मिकता की ओर। तो ये नहीं चलेगा। हर कार्य जो है पूरा मनसा वाचा कर्मणा करना है, जैसे पराजय ने किया है। किसी और का प्रश्न तो बोल सकते
हैं हर प्रणाम आपका बहुत बहुत धन्यवाद। रोजी ने बताया की मंगल आरती में
डेली करना चाहिए तो नियम तो बन
जाता, कभी 15 दिन तो करते हैं
लेकिन 1 दिन छूट के, तो फिर
15 दिन पीछे चले जाते ह, वो
बराबर नियम नहीं बन पाता। सुबह के साधना का राइटर अगर बार बार कोशिश कीजिए, देखिये छोटा बच्चा जो है जब चलना शुरू करता है, पहले पेट के बल चलता है, पहले पेट के बल चलता नहीं है, उसके बाद कुछ दिन के बाद चलता है। माँ बाप बड़े खुश होते है, हमारा बच्चा अभी चलना सीख रहा है, उसके बाद खड़ा चलता है तो कभी गिरता है, कुछ दिन गिरता है, उसके बाद मां उसको पकड़ लेती है, उसको गिरने नहीं देती। और 1 दिन ऐसा आता है, वो भागता है, बच्चा माँ उसके पीछे पीछे जाती है, साइकिल के नीचे न आ जाए, किसी गाड़ी के नीचे न जाए। तो उसी प्रकार जब हम पूरी श्रद्धा के साथ, विश्वास के साथ धार्मिक नियमों का पालन करते हैं, तो हम तो बच्चे हैं भैया, हम तो गिर सकते हैं, लेकिन कृष्ण जो है वो हमारे साथ साथ है। 1 दम पकड़ लेते हैं, गिरने देते हैं। हमें चल बच्चों तो दिल गया, बंदर बंदर बंदर ले आयेंगे। भक्त के क्या कहेंगे भक्त वो पुराना जो। और यह याद रखो कृष्ण के माध्यम से जो भक्त हैं वो भी याद रखते हैं। यह पुराना जो है, आपको टोक भी देंगे, वो सबको याद है। चाहे वो मोर रूपा हो, मोर रूपा को भी याद रहता है। बाकी छोटे भक्तों को भी याद रहता है, रहता है। भक्त डेली ता था, आज नहीं आया, अच्छा 7 दिन से नहीं आया तो आपको बोल देंगे। भगवान आपको गिरने नहीं देंगे पकड़ लेंगे। लेकिन आपको चलने की इच्छा होनी चाहिए। rgsnapouthैंk you सो uc for this nder for lecture। आपके पर्सनल एक्सेंज जो रूपाजी के साथ रहे थे, वो सुनकर काफी अच्छा लगा, काफी कुछ सीखने को मिला। आपने प्रूफ बू डिस्टर्ब के बाद बताया बट मेरा पर प्रश्न नहीं कि आपका जो टाइम था, जब आपने दीक्षा ली, उस लमोस्ट फिफ्टी प्लस। उस समय का जो दौर दौर था, उसमें उतना टेक्नोलॉजी मोबाइल इस सबमे नहीं था। लेकिन अभी के टाइम में हम लोग कितना भी कुछ कर ले, लेकिन मोबाइल
टेक्नोलॉजी हमें
डिस्ट्रिक्ट करते है। उतना अच्छा से मतलब बुक रीडिंग या फिर बुक डिस्ट्रिब्युशन, कुछ भी अच्छा करना चाहते हैं तो डिस्ट्रेक्ट करता है। तो अभी के समय में किस तरह से हम लोग अच्छे से भक्ति करे और प्रचार करें। थोड़ा सा पर्सनल टिप्स वोही निजम है, नियम ही है जो पहले थे। और हमेशा के लिए यह सनातन निजम है, सनातन निजम है। सुबह जल्दी उठिए थोड़ा 10 बजे तक हो जाइए। पूरे मंदिर के पूर्ण अटेंड कीजिए पढ़िए और नियमों का पालन कीजिए तो नियम तो ही है। सनातन नियम है की टेक्नोलॉजी आ गई है। तो इसलिए तो बड़ा कर कर है। कुछ फायदे भी है क्या, कुछ फायदे भी है लेकिये बहुत सारे कंट्री में तो बच्चों को बंद कर दिया है। ये मोबाइल नहीं दे सकते। ऐसा कुछ इंट्यून किया है। लेकिन हमारे हिन्दुस्तान में तो रिवाज बढ़ता जा रहा है, माँ भी मोबाइल देख रही है, बच्चे भी मोबाइल देख रहे हैं, पति भी माल देख रहे हैं। घर में कोई कुत्ता भी आ गया तो पता नहीं है कि कौन आ गया, कौन नहीं आ गया। तो इससे थोड़ा बच के तो ठीक है किताबें नहीं। तो अभी किताबे नहीं पढ़ रहे हैं। इसी लिए तो अभी यह 1 हफ्ता पूरा है, तेरा तरीका है। शायद 7 से लेके 19 दे के रीडिंग करना है। आपने ऑटेंटिब्लीतो आप भी कर सकते हैं। रीडिंग अपने घर में, मंदिर में, आके पढ़िए 10 भक्त जाइए, आदमी पढ़े पाकी, सुने, 1 पैरा, आपने पढ़ लिया, 1 पर दूसरा पढ़ेगा, दूसरा पैरा, अगर आप तीसरा आदमी पढ़ेगा, इस पर कार पढ़ेंगे तो पढ़ने में ज्यादा मन लगा। जो जो मजा वाकई मेरा अपना एक्सपीरियंस है, जो किताब में पढ़ कर, मजा आता है न, वो मोबाइल में पढ के मजा नहीं आता है, वो ठीक है। आजकल टेक्नोलॉजी बढ़ गई है। लेकिन इसका दुष् परिणाम भी होता है। अभी अभी मैं पढ़ रहा हूं, उसके बाद 2 मिनट तो ठीक ठाक आ गया। उसके बाद ऐसा सीन आ जाएगा, आपका मन विचलित हो जाएगा, जो पीछे पड़ा लिखा, न पड़ा लिखा, वो तो खत्म हो जाएगा। जो सीन आ गया आपके मोबाइल में, उसका मन जो है आपका विचले तो ऐसा होगा कि मीना पर उससे बच नहीं पाओगे। तो अभी आपको देखना है क्या करना है। बाकी मेरा तो साफ कहना है कि मोबाइल जो है, जिससे लोगों का आध्यात्मिक जीवन नष्ट हो रहा है।
हरि कृष्णा रहजी प्रभु जी, कई बार जैसे हम हेरिंग करते हैं, रीडिंग्स करते हैं तो हमें कुछ समझ में नहीं आती, कुछ चीजे हैं तो हमारे आसपास ऐसे नहीं होते। कोई भी डिवोटी सीनियर या एक्स में
या जो उसको पढ़ चुके होते है
कि हम पूछ सके उनसे तो इस केस में क्या करना चाहिए क्योंकि हम उसका आंसर फिर मिलता नहीं है, है
1 तो यह है कि आप डेंटेब्लीउनको सुनो जो बोल रहे हैं, अगर फिर भी समझ में नहीं आ रहा तो आप वक्त से प्रश्न कर सकते हैं। प्रभु जी, आपने जो पुराने है मेरी समझ में नहीं समझा दीजिए, वो आपको समझाएंगे अगर फिर भी समझ रहा तो उसी श्लोक को प्र पढिए, बार बार पढ़िए बोलतेहैं बुद्धि योग ददामि, उस बात पर भी विश्वास कीजिए। तो आपको भगवान बुद्धि दे देंगे, मैं प्रैक्टिकल अवधारण आपको देता हूँ जब शुरू में, क्योंकि हमें तो न इंग्लिश आती है न हिंदी, आती सीधी सी बात है तो किताबें होती थी भगत की तैयजिटीजनेकमिलन कॉम्पनेगीजैसे मैंने शुरू में बताया तो इंग्लिश में हिंदी तो होती नहीं थी। उन दोनों में पढता गया, पढता गया। तो जो इंटरोडक्शन थी, वो तो बड़ा अच्छी तरह से मुझे समझ में आ गई। मैं इसके अलावा और कुछ नहीं है। लेकिन जब श्लोक पढ़ने शुरू किए तो कुछ समझ में आया, कुछ नहीं आया। जब ये श्लोक आ गया कि बुद्धि योग ददामि भगवान कह रहे हैं कि समझ में आएगा आएगा आएगा, तो इसलिए मैं पढ़ता रहा, आगे पढता रहा तो उसी का रिजल्ट है कि आज 55 साल हो गए मुझे इस कांड में, इसी प्रकार आप भी वक्ता से पूछिए प्रश्न पूछिए बता दिया। ठीक है न? तो उसी श्लोक द्वारा अपने घर जाकर अपने टैम पर पढिए अवश्य आपको समझ में आ जाएगी, श्लोक में ही आएगी तो अगले श्लोक के पढने को समझ जाए। ठीक है हरे कृष्ण अभी यहाँ पर विराम देते हैं सब बोलिए पहले जगत
गुरु शीला प्रभुपाद की,
पतित पावन, जगत
गुरु शीला प्रभुपाद की,
पर गोपाल महाराज
की, श्री श्री राधा भगवान की, आप
सब की भी जय धन्यवाद।
हरे कृष्णा, श्री राम प्रभु की। लोग जोर से बोले श्री राम प्रभु के बहुत ही बहुत धन्यवाद और प्रभु जी के 55 साल हम में कई भक्तों की 55 साल उम्र भी नहीं होगी। और प्रभु जी, पे फिफ्टी फाइव रस कृष्णा कौन से स टी के अंदर। तो आप वास्तविक फिफ्टी थ्री। यर्स तो प्रभु जी, आप सही में प्रभुपाद अनुगा है, और बहुत ही अच्छे से, गाया कि से, अपने मन से प्रपात पुस्तकों को पढ़ के वाणी से, ऐज इट। इस वही बोलें जो प्रोप जिन्हें अपने पुस्तकों में, अपने निर्देशों में दिया है और अपने कर्म से हम वो कार्य करे जो प्रभाजी को प्रसन्न करते हैं और पूरे विश्व में विश्व में नहीं तो मोहल्ले में प्रचार करे, कम से कम तो बहुत ही प्रैक्टिकल सन्देश आपने दिए। और मैं आशा करता हूँ जब आप ये प्रभुजन सुन रहे थे, यह वचन सुन रहे थे, तो शायद 1 व्यक्ति ऐसे थे जिनका पूरा जीवन जो प्रहुजी ने बताया वो डिस्क्राइब कर रहे थे। कौन थे वो? परमपुजेगोपालकृष्ण गोस्वामी महाराज है कि नहीं? अगर आप देखें जो मनसा वाचा कर्मणा, हर तरीके से उनकी प्रत्येक सांस जो है शिला प्रभुपाद जी के लिए थी। हर समय यही विचार करते थे। कैसे प्रभुपाद जी के धन को आगे बढ़ाया जाए, कैसे अधिक पुस्तकों का वितरण किया जाए, प्रकाशन किया जाए, कैसे जो है मंदिर बनाये जाए, कैसे अधिक से अधिक भक्त बनाया जाए, किन जगहों में प्रचार नहीं हो रहा है। महाराज हमेशा जब में प्रवचन देते थे, प्रभाजी की पुस्तकों से ही दिया करते थे। वही बात दोहराते थे कितने उत्तरों के अंदर प्रोपज ने इस विषय पर ये कहा था प्रवपाजीनेविषय, पर ये कहा था। तो निश्चित रूप से हमारा बड़ा सौभाग्य है कि परम गोपाल कृष्ण को स्वयं महाराज का हमें संग प्राप्त हुआ था। और उनकी स्मृति में यह यात्रा है। तो जो है इस यात्रा का, अब दूसरा पढ़ा हो। अभी हम यहाँ पर पंद्रह मिनट के लिए गौर आरती करेंगे, 15 से 20 मिनट और उसके बाद में हमें संघ प्राप्त होगा। परम भक्ति, आश्रय श्रम महाराज का। और महाराज जो है इस तीर्थ की महिमा जो पुष्कर धाम के क्या गुण है, क्या महात्मय है, महिमा है, क्या यहाँ पर लाई हुई थी और क्या हमें चेतना रखनी चाहिए, इत्यादि। इस विषय के ऊपर हमें जो है मार्ग दर्शन करेंगे, वो आज कल उसके बाद हम दिन का विराम करेंगे, शायद कुछ भक्तों की सेवा होगी, बीच में निकालना हो तो कल सुबह 5 बजे इसी पंडाल के अन्दर हम एकत्रित होंगे किस के लिए, मंगल आरती के लिए जैसे प्रहुजीने बोला था। अगर साधना उचित नहीं है, तो क्या है? हम हिपोक्रेसी है वो, तो कल सुबह प्रयास कीजियेगा अफकोर्स हो सकता है। मौसम को चैलेंज चुनौतियां प्रदान करें। 5 बजे मंगल हरती के बाद यहीं पर जप और उसके बाद सवा 7 बजे जो है गुरु पूजा और पौने 8 बजे हमें संघ प्राप्त होगा। परम पूजनीय प्रवोदानंद सरस्वती स्वामी महाराज का। तो फिर वो प्रवूचन देंगे और उसके बाद तब हम अंत में और आपको इस विषय में सूचना दे देंगे। हर 1 कृष्ण, तब सब भक्त अपने स्थान पर खड़े हो सकते हैं और उत्साह पूर्वक जो है गौर आरती में भाग ले सकते हैं। हर कृष्ण
हो
इस में संख
निताई सुन्दर, भगवान की जगनातबलतवशुर्रा, महारानी की पुष्कर, धाम की परम, शुगप्रंभलपउपाग की गौरप्रमानंदौहरि, हरि बोल गौर, प्रमानंद, हरिहरी बो सिवा, जया जया घोरा चांदे आरती के शोभा
सिवा
जला
जला,
गोरा चांदे आरपी, सिवा, सौ, जहा ना लिपतना, जग ना ना ना जा, जहा ना लग, मaनलाजहादलततान जगन भा जा ilaदcताईचामामे, गंदा भा रत kelatcicamamegada tara, कम, गधधाराओatactरनेका, tjaaaaacatrbरने का, siwan, bsi,
रतना
सिंह, हसाने, सिवा बासी, गो, रचा, रत्ना सिंह सारे, ये आरती करना, ब्रहमा, aditewakarतीकर ना ब्रह्मा आदि देव क। शeवनaरaहरआधिकारे हमारा 2 लार सिवा नारा हरी करी हमारा ढूला संझाया मकुन्दा गुसाया देगा
स
सnjजामकुनदाबसगुससा दि गाय सा sevasanखा बाजे गन्ड बाजे बाजे का रता ला
eva
sanga ntbbajcaltala माधुरामदंगaपरामरसला मधु maधuramdnगamaर waरaमालासालाब शंख बजे घंटा बजे मधुर मधुर मधुर बजे शंख बा शंख बजे घंटा बजे मधुर मधुर मधुर बाजे संख निताई गौर हरि बोल हरि बो हरि बोल हरि बोल
ता
ता गौर हरि बोल हरि बो हर बोल हरि बोल या गौरा निताई गौर नेता गौरा नेता जया गौरा ने ताई गा गौर नेता सेवा बहु कोटे चन्द्र जी ने बदनाउजोलासिवा बहु किवापहओcोtiचnदrज ने बधाला जला किवा बा les माला कर जल माला जल aगलदसबनामाला करे जाला वा ला गा sewa shiva sucaनaराda प्रेम गादा गादा शिवा शिवा सूखा दादा म ग दा सिवा सिवा भागती बिना देखे गोरा राज समपाद भागती baगतीबिनोदadगरa रaसमपादाभागदी jai shri krishna chetanya prbonitanaaiadit गौर भक्त श्री जया थ्री कृष्ण तान्या प्रभु नित्या नाना रियाद तगदधारसिरुवासदी गौर बत्तरी हरे कृष्णा हरे कृषणा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे रामा हरे रामा रामा रामा हरे हरे हरे वि हरे कृष्णा हरे कृषणा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे रामा हरे रामा रामा रामा हरे हरे हरे कृष्णा अरे हा रे
j m visणpatrr्sotst e na dan conf hold pti जा ओम विष्णपापरीमभकति सिद्धांत स्वामी महाराज pad puskrhamkeptitn pad ki gloristosmbldabotis krishna glorie some आल क्लोरिस टू श्री गुरु श्री गौर goris ुशिलापपकीरेक
हरे कृष्णा तो सब भक्त अपना स्थान ग्रहण कर सकते हैं और 1 बार हमारे पीछे धराये हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे रामा हरे रामा रामा रामा हरे हरे तो अब हमारा बड़ा सौभाग्य है हमें संग प्राप्त हो रहा है परा भक्ति श्वशन स्वामी महाराज का जोरदार ध्वनी से बोले हरे हरे हरी बो तो महाराज आज और कल शाम को भी महाराज का हमें संग प्राप्त होगा और इस पुष्कर धाम में महाराज परमपूजमगोपाल कृष्ण महाराज के वरिष्ठ शिष्यों में से और बहुत ही समर्पित शिष्यों में से 1 है और हम देख रहे हैं सुना था जैसे कि गुरु के जाने के बाद में हम किस प्रकार से अपनी विरह की भावना को इ इतर सकते हैं वो है जिम्मेदारी लेकर के और तो हम देखते हैं किस प्रकार महाराज देश विदेश में पूरे भारत में 9, 30 पर सब सब जगह प्रचार कर रहे हैं और दीक्षा गुरु की जो सेवा है उसको स्वीकार करके अनेक भक्तों को आश्रय प्रदान कर रहे हैं और महाराज का नाम भी सार्थक के भक्ति आश्रय वैशन स्वामी महाराज तो जो है बिल्कुल सार्थक कर हे हैं। तो हमारा बड़ा सौभाग्य है केस पुष्कर धाम की महिमा के बारे में महाराज हमें बताने वाले हैं हमने पिछले सत्र में देखा था, काफी सीट भर गई थी तो सोच रहे थे बोलना पड़ेगा भक्त आगे आके बैठ सकते हैं पहले ही बैठ गए हैं लेकिन अच्छा है मैं फिर भी रिक्वेस्ट करूंगा जो भक्त ऊपर आना चाहते हैं और आ सकते हैं खासकर प्रभु जी लोग ब्रह्मचारी या कोई और भी डिवोटिज तो स्टेज में भी आ सकते हैं क्योंकि कई कई जगह पानी इत्यादि गिरा हुआ है तो कुछ भक्त इधर दोनों साइड में आकर उस साइड से भी आकर बैठ सकते हैं। और अगर इधर स्थान हो तो माता जी, वगैरह और जहां पर आपको स्थान मिले आगे आ सकते हैं। कुर्सियां छोड़ करके जो भक्त कर सकते हैं ताकि अन्य जो वरिष्ठ भक्त हैं वृद्ध भक्त हैं, उनके लिए स्थान पर आप हो या अंत में आने वाले जो भी धीरे धीरे भक्त पहुंच रहे
हैं, उन
harekrsna to, हmकaरcrmo, ge, bate, hreyana,
पीछे, पीछे,
स, हरे, कृष्ण पीछे, सब कुछ सुनाई पड़ रहा है कि नहीं। आप सभी को जो विशेषकर के दिल्ली एनसीआर से और भिन्न भिन्न स्थान से तिथराजपुस्कर में इस घनघोर बारिश के मौसम के होते हुए भी, सब प्रकार के कष्ट का सामना करते हुए भी
आये
और आ करके फिर इस संग काल में भी स्टेज में आ कर के यहाँ उपस्थित हैं। आप सभी महानुभव श्रद्धालु भक्तगण किसी चरण में मेरा सादर प्रणाम स्वीकार करे बना। कल पत्र दिनां भारतवर्ष में करोड़ो करोड़ो तीर्थो में से 1 अति प्राचीनतम, उनको भी तीर्थराज कहा जाता है। ये पुस्कर जी है। और ये पूरे विश्व में 1 स्थान है। जहाँ पर हमारे संप्रदाय के प्रवर्तन आचार्य, भगवान के बाद में भगवान के जो संप्रदाय को मुख्य प्रवर्तन आचार्य के रूप में, ये ब्रह्म सम्प्रदाय का मूल आचार्य के रूप में सी ब्रह्मा जी हैं। हमारे कुलाधिपति कुल पिथेश्वर सी संप्रदाय के प्रथम आचार्य शी ब्रह्मा जी के 1 मात्र पूजित स्थान है। हम उन्ही संप्रदाय के द्वारा भगवान के पास भगवान संबंधित होना प्रयास करते हैं। तो अगर इस थान में नहीं आयेंगे तो फिर कहाँ जायेंगे ये हमारे कुलदेव है। तो इसलिए जो भी आय है आप लोग बहुत ही बधाई के योग्य हैं, धन्यवाद के पात्र हैं आपने इस आचार्य पीठ में आये इतना कष्ट करके। इसलिए मैं बारम बार आपके चरण में सत सत प्रणाम करता हूँ।
मुझे
आदेश हुआ कि इस तथराज के बारे में थोड़ा बहुत चर्चा करें और गुरु महाराज का इस वार्षिक यात्रा के पीछे क्या भाव है, उसके बारे में थोड़ा चर्चा करें। यद्यपि मैं जुगा नहीं हूं तो प्रयास करेंगे। ये स्थान का नाम पुष्कर है। भारत वर्ष में अनेक पर्वत मालाएं हैं। ए पर्वत माला ब्रज से शुरू है। अरावली पर्वत माला दक्खिन तक गया है। ये छोटी छोटी पर्वत आप देखते रहे। चारों तरफ अनेक पर्वतों के बीच में सुंदर झील 3 झील है। मुख्यत 1 जस्ट पुस्कर, मध्यम पुस्कर, कनिष्ठ पुष्कर किबदंती में ऐसा प्राप्त होता है कि 1 समय भगवान असुर, नासन, इंदिरारिब्याकुलम लोके मुणयंतिजुगेजुग। जुग जुग में जब ब्रह्मांड के कार्यकरता ब्रह्मंड संचालन में असमर्थ हो जाते हैं, जो संचालक हैं, ब्रह्मा आदि, शिव आदि देवता अपनी पूरी ताकत से संचालन जो फेल हो जाते हैं, तब फिर हर अवसर के पास की प्राथना करते है। प्रभु हम शो काम नहीं बन रहा है। आप आकर संभालिए। कभी इसे हम लोग भी मैनेज हो जाता है, ऊपर तक जाना पड़ता है तो ये इशु सुष्टि के शुरुआत से रहता है। तो ब्रह्मादि देवता जाते हैं उनके इस ब्रह्मांड के मुख्य जो अधिनायक ोखिरसाईविष्णुहै इसलिए सारे देवता ब्रह्मा शिव आदि भी उनका जो बस हेड हैं, खिरसाईविष्णुखिरसागर तक जाते है, उसके आगे उनकी पहुंच नहीं है, उनके पहुंचे ही तक खिरेसागरतकहीजा सकते हैं। उनके आगे उनका फोन नंबर भी नहीं, उनके पास और जा भी नहीं सकते। और खिरसा विष्णु तक जाने के खिरेसागरतकजानते हैं। लेकिन खिरसा विष्णु के दर्शन हो, जाएगे की गारंटी नहीं, दर्शन नहीं होता,
जा
करके मेसेज ड्रेप करके आते हैं, प्रार्थना करते हैं, फिर आधा हो करके आते हैं और भगवान सुन करके एक्शन ले लेते हैं। जितने अवतार इसी ब्रह्मांड संचालन के लिए होते हैं। भगवान सब कृषाय विष्णु के होते हैं। कृषि विष्णु के ऊपर उनके पास सीगरभसाईविष्णु है और उनके ऊपर महा विष्णु है, करण साई विष्णु है और उनके ऊपर श्री संक्षण देव है, उनके ऊपर प्रथम चतुर वि है, उनके ऊपर प्रथम संकर्षण है, उनके ऊपर बलदेव है, उनके ऊपर श्री कृष्ण है। हायर के नुसार कहाँ है?
नहीं सकते।
महरी का पोजिशन नहीं तक है। तो 1 समय इसे असुरक था, जिसका नाम था बजरनावऔर। किसी के बस में नहीं रहा उनका उत्पाद बढ़ा तो ने प्रार्थना की। तो भगवान ने अब जाने जितने विष्णु, अवतार सब संखचक्करगदापदमधारी, केवल उनके जो बस से, बस से बस वो बांसुरी वाले हैं कोई गदा। लेकिन ये जितने मेंटेनर है। मटनशबषरहै सब चतुर्भुज, शंख, चक्र, गदा, पद। मदारी तो इस रूप में असुर से युद्ध करना था। युद्ध की असुर बड़ा बलवान था। असुर लोगों को भी पता है कि जिम जा कर के प्रोटीन खा कर के बल नहीं होता। तप बल महाबल, अगर शक्ति कुछ पाना है तो तपस्या के द्वारा प्राप्त होता है। उनको ही पता है। तो उन लोगो ने तप करके बल प्राप्त किए थे। तपसाध्यबलतो। इसलिए देवी दे, ता, तप बल के पास में हर जाते है। दूसरी बल होता तो चलता तो घमासान युद्ध हुआ था भगवान नारायण के साथ। यह सुर्ती बलशाली था कि युद्ध के प्रभाव से भगवान नारायण के जो पदम कमल, पुष्प धारण करते हैं। पुष्प हिल गया था, उसके ऊपर चोट पहुंचा था, हाथ के ऊपर तो उसमें 3 पेट पुष्प के 3 पंखुड़ी गिर पड़ा। भगवान के साथ कोई भी चीज संपर्क होता है, वो तो नित्य हो जाता है। भगवान जब माला पहनते हैं, बरसों पहले मुरझाएगा ही नहीं, अल्वेजप्रेस उनके कपड़ा भी अमलान है। सब कुछ नित्य हो जाते हैं। उनको कुछ मुरझाना बासी हो जाना। ऐसे प्रश्न नहीं उठता। तो भगवान के हाथ में कमल हो तो हमेशा एवर फ्रेस हमेशा रहता है। लेकिन युद्ध के दौरान पुष्प से कुछ पंखुड़ी 3 डी टूट कर गिर पड़ा। भगवान के श्री करकमल से, उनके धारित पुष्प से कुछ पाठ गिरे। यह कोई साधारण बात नहीं है। साधारण बात आप लोग सुने होंगे। भारत वर्ष में 1 बहुत प्राचीन तीर्थ है गया तीर्थ, जहाँ लोग जाते हैं पित्र पिंड करने के लिए। आप लोग गया में जाकर देखेंगे। व बड़ा मंदिर है। बहुत भीड़ भर लोग जाते हैं देने के लिए। लेकिन है इधर पूजित विग्रह क्या है? भगवान की चरण चेन्नई और कुछ नहीं पाद पद्म मंदिर, मंदिर के अंदर जाएंगे विग्रह फिक्र नहीं है। भगवान की बाम पदचिन्ह की छाप है। बस यही दर्शन इधर मंदिर, कंद्र को ही पद चिन नहीं, दर्शन होगा। यहाँ गया। सुर को बंद करने के लिए। भगवान पैर रख दिए थे, उनके बखे के ऊपर हो गया। वो पूरे गया डिस्ट्रिक असुर था, उनका बढ़ी है, उसी के ऊपर साधा जाता है। और भगवान ने चरण धर दिए थे। इसलिए लाखों वर्षों से भगवान शरण में जो चढ़ायेगा, पितर, पुरुष सब तर हो जाते हैं, सब छूट जाते हैं, वो तीर्थ बन गया। क्योकि? भगवान के चरण स्पर्ष, कर के पावन गंगा, ये 3 लोग को पावन करने के लिए शक्ति कहाँ से आया? उसको अभी 2 दिन पहले भगवान वामन देव के अभिभाव था। 52 देव के बंदना में शी जयदेव जी कहते हैं छलयसिविक्रमणेबडिमदभुत बामन पद नख निर, जनि तज न, पावन पद नख, नीर नीर मतलब पानी कौन सा पानी न, पद नख। उनके पैर नहीं, पैर के अग्रभाग के जो अंगुली ओबी नहीं, अंगुली के ऊपर जो नाखून है। 1 अंगूठा के नाखून को स्पर्श किया था, वो पानी वो छातफेदक ऊपर उठा रहे थे, पर वो पानी नाखुन में टच किया था। पद नख, निरा, पदपर के अंगूठा के नाखून को टच किया था। 1 बार 1 बार टच में इतने पुटेनसीइतनेशख्ति आ गया, चार्ज हो गया कि 3 लोग को पावन करते जा रहा है। करोड़ सालों से कभी डाउन नहीं हो रहा, बैटरी उसका केवल नाखून को स्पर्श करने से। जब पानी की इतनी ताकत आ जाता है कि त्रिताप त्रिताप हारिणी कितनी पापतावसंतापकरता है, इतने पावर आ जाता है और कितने कभी डाउन होता नहीं। जहाँ नाखस्परसमात्र में यह महिमा है, तो यहां तो भगवान के सीख कर, कमल सी। करकमल में अनादि काल से पुष्प धारण किया गया था। पुस्पा गिर गया तो पुष्प भगवान के कर में था पुष्प कर और वहां से समाज के कल्याण करने के लिए जब असुर निधान वे भगवान थे तो कर से पुष्प कुछ पंखडिया गिर पड़ा था। तो इसलिए जहां, जहां पटाल पड़ा, 3 जगह में 3 पवित्र पुष्करिणी हो गया। कर से पुष्प गिरा। इसलिए नाम पड़ा पुस कर, पुष्प करा, पुस पाकर को नाम पड़ा पुष्कर। भगवान से किसी भी प्रकार से संबंध होना चाहिए। चाहे किसी भी प्राणी का हो, किसी भी वस्तु का हो, किसी प्रकार संबंध हो जाने से उनका परम कल्याण ही है। तो भगवान किसी कमर कम कर। कमल का जो पुष्प इस धरती में इसी स्थान को प्राप्त किया और यहाँ ये पवित्र पुष्करणी सृष्टि हुआ तो ये तिर्थराज हो गया। इसे कोई बड़ी बात नहीं कि भगवान की कर कमरे से था। तो वहां के कुछ भी हो जाए। वही महिमा भगवान के हाथ में शंख रहता है। 15 साल का लड़का था ध्रुव महाराज, बालक 5 साल का। भगवान को भगवान ने गुरु दर्शन दिए। उनके तप प्रभाव से ओह भगवान को पहले नहीं देखा था। देख कर के बालक ध्रुवन गदगद हो गया, दंडवत किया, राम करके गिरा हाथ जोड़ कर रो पड़ा। कुछ प्रार्थना स्तुति करना चाहता था। लेकिन अभी अड़मिशनहुआ नहीं था। उनका स्कूल में पढाई नहीं था। तो कई से बोलेगा स्तुति, कुछ पढाई नहीं था, लेकिन देखकर वो रोता था, कुछ बोलना चाहता था, कुछ बोलूं बोलना आता ही नहीं। भगवान देखे बच्चा कुछ मस्ती करना चाहता है, लेकिन अनपढ़ है। भगवान के अपने कर कमरे में जो बेदमायासंख था, शंखक उनके कपोल में, गाल में टच करा दी, जस्ट टच जैसे स्विच करने से लाइटजलउडताफे फैन चल उठता है, चल बैठता है, ठीक टच किए उनके गाल में और उनके बच्चे 5 साल के बालक, जो अनपढ़ बालक को समूह से धुरंधर संस्कृत के श्लोक निकालने लगा। हवा के वेग से। ये है भगवत कृपा की भगवान की किसी भी प्रकार से, कोई भी चीज, भगवत, सम, संधि, किसी को छू जाए, स्पर्श कर जाए, ये उसका परिणाम है। अद्भुत इसमें अदभुत करने की सूचना नहीं है। असंभव को संभव करने वाला ही शक्ति है। उनकी शक्ति सब कुछ होता है। तो वो चाहे तो कर सकते हैं। तो उन्हीं के कर से पुष्प आकरके पुष्कर बना और पावन तीर्थ बन गया। उसमें कोई बड़ी बात नहीं, क्योंकि उन्हीं किससे संबंध है। भगवत संबंध से यह स्थान संबंधित हो गया, पवित्र हो गया और कल्प कल्प से यह स्थान फिर महानतृथसपरिगणित हुआ। कुरु खेत्र गया गंगा प्रभासपुष्कराणिच प्राचीन तत्व में जहाँ पर पितृ पुरुषों की ओर कइयों की प्राधान्य दिया जाता है, कुरु खेत्र गया गंगा और पुस्कर, ये 4 स्थान है, इनका, महिमा गाया जाता है। क्रू खेत्र गया गंगा, पुष्कर इस थान
में
तो 4 युग में इन्हें इन लोगों का प्रभाव है। कलियुग में थोड़ा गंगा का प्रभाव ज्यादा है, बाकी अन्य ंजुगननतृ्थका प्रभाव था। लेकिन ये चारों हमेशा है और चारों ही समाज के लोगों को कल्याण करने के लिए हर 1 प्रकार से सामर्थ रखते हैं। जो पिंडदान चाहे करो क्षेत्र में करो गयाम करो, गंगाजी में करो या पुष्कर्म करो कोई किस्से कम नहीं है। तो इस प्रकार पुष्कराज प्रकट हुए थे। बहुत कोई कल्प में कभी हुआ था। अब ब्रह्माजी के सम्बंध बाद में हुआ ये तीरथ भगवान की कर से, पुष्प गिरकर के असुर बद से ऊपर पुश कर बन कर हुआ। किसी कल्प में, हर कल्प में और महा जी को सुबह उठके सुष्टि की सजा करना पड़ता है। verde 1 महाकल्प और 1 कल्प ब्रह्माजी के 1 दिन जब शुरू होता है, 1 दिन में 14 मनु शासन करते हैं 1000 चतुर जो ब्रह्मा जी के 12 घंटा होता है तो इसलिए उनको पूरी करना पड़ता है सब कुछ एव्री डे मर्निंग उठ करके सब कुछ, फिर तपस्या करते हैं, फिर सब करते हैं, फिर सब कुछ करना पड़ता है। कल्प महाकल्प के बात तो फिर क्या कहे। तो इसलिए किसी कल्प में भगवान ने, प्रत्येक दिन ब्रह्मा जी ने, उठ कर के तपस्या करते हैं, जज्ञे करते हैं सब शुरुआत करने के लिए जज्ञासहीसृष्टिहो सब कुछ होता है तो अन्य किसी कल्प में सुष्टि के लिए कल्प सी एवरीडे किसी दिन ब्रह्माजी ने सुबह सुष्टि कार्य को शुरू करने के लिए जज्ञाजोकरेहकभीदसास से जज्ञ एव्री डे जज करना पड़ता है सुष्टि के लिए तो किसी 1 दिन मतलब किसी 1 कल्प में ब्रह्मा जी के 1 दिन मतलब। 1 कल्प कल्प, कल्प सुजानी हम भगवान कहते है। हर कल्प में आता हूँ। ब्रह्मा जी के 1 दिन में। तो किसी दिन मे महज ने इस को चुने। इस तिर्थ इतने सुन्दर जागा अर ली। पर्वत माला के बीच में 3 सुंदर पुष्करिणी है। इतने पावन पवित्र स्थान है। और भगवत के कर कमल से ही उत्पन्न हुआ है। कमल गिर कर के। तो यहीं पर सुष्टि क्रिया की शुरुआत के लिए जुजज्ञाकरनिकेले आये। ब्रह्मा जी गृहस्त हैं। आप लोग सो ब्रह्मा जी के बारे में। क्यों? हम ब्रह्म संप्रदाय के जानते हैं। ब्रह्मा जी के। 1 नाम है स्वयंभू। स्वयंभू का अर्थ है स्वयं प्रकट होने वाले। उनके माता जी नहीं है। ब्रह्मा जी के माताजी के नाम है। नहीं क्या बताएंगे। आप पापा भी नहीं कह सकते हैं। स्वयंग प्रकट हुए क्यों पापा ने। क्योंकि जब ब्रह्माजी प्रकट हुए, जन्म हुए तो बोलना चलना। तब सब कुछ हो चुका था। सब ऑलरेडी वेल मैनेज। जब जन्म होते, बालक फिर पहले ऐसे लेटता, फिर फ्रंट लेटता, पेट के बल पर लेटता, फिर घुटरूवन में फोर, हिलर में जाता, फिर तो हिलर में आता, फिर चलता, फिर चाइडरूडनहीं ग्रो करना, चाइल्ड को ग्रो करना। जानते हैं सब लाला पन लालीपन होता है। बालक बालिकाओं के बाजी कुछ नहीं चाइलहुट। नहीं उनका चाइल्ड ध नहीं तो क्या करे? प्रकट हो ग्रोनबायइसलिए स्वयंभू नाम पड़ा। क्योंकि उनके मम्मी उनको न स्तन दूध पिलाया, दूध पान किए, न ग्रो किए। बच्चे को जैसे ग्रो करते हैं। माताजी ने। कोई ऐसा नहीं, कोई खिलौना पकड़े नहीं, कुछ नहीं होते। भगवान ने सीधा अपने नाभि कमल प्रकट किए। माता जी से, सब मां से। आज भी कोई बच्चे प्रकट होते हैं। नाभि छेदन से, नाभी से कनेक्ट होते हैं। तो बह्माजी ब्रह्मा जी का कनेक्शन नाभि से तो था, लेकिन पद बना है। भगवान नारायण से प्रकट हुए भी अभी से कनेक्शन था। ऐसे प्रकट हो कर के बर्मा जी। लेकिन अच्छे खासे सब जान बुझकर थे। बोले की मैं कहां से आया। 4 कुछ दिखता नहीं, न मम्मी पापा को नहीं रोना। धोना ब्रमाजी कुछ नहीं के प्रकोर। हम लोग तो रो कर के ओपनिंग करते हैं। चारों तरफ देखे कुछ नहीं मिला। चारों तरफ जल ही जल था, जल से कमल उठा था, चारों तरफ जल ही जल था। हवा चल रहा था, कुछ भी नहीं देखा, चारों तरफ मुंह करके देखे। 4 मुख हो गया। इधर देखे, इधर मुड़े। 1 मुख पीछे, 1 मुख चारों तरफ देख ले। चतुर मुख हो गये। 4 मुख हो कर के चारों तरफ देख ले। कुछ भी नहीं दिखाई पड़ा नीचे कमल को देखे बोले कमल का शो कई से आया में कमल से प्रकट हुआ। कमल कहां से आया। यह जिज्ञासा हमारे जो प्रथम प्राणी सृष्टि का उनके अंदर भी था। इसलिए हमारे अंदर कोई चीज को जानने के लिए जिज्ञासा होता है। 3 मूलभूत पदार्थ प्रत्येक मनुष्य में पाया जाता है, जिज्ञासा जानने की इच्छा, जिजीविषा जीने की इच्छा और बहुत सा भोगने की इच्छा। 1 दिन के कारण जी जी वी सा जीने की इच्छा के कारण कोई मरना नहीं चाहता कितने परेशान मरने में बड़ा डरते हैं। हम जीना चाहते हैं। भले ढाई सौ 5 सौ साल, इतने मरना नहीं जीना चाहते है। क्योंकि हम जिनके, हमारा जो अनसीहहमजिन वो नित्य है। सब हमेशा रहने वाले हैं, हम उन्हीं के टुकड़े हैं। इसलिए हम भी हमेशा रहना चाहते हैं। व आनंदमय है। इसलिए हम भी खुश रहना चाहते हैं, भोग करना चाहते हैं। कोई भोग करके आनंदित होना चाहते हैं। भोग ने कई श्याम और चिदानंद है। चिन्मय ज्ञान मय है, इसलिए हम जी जी वी सा। कुछ जानने जिज्ञासा होता है, कुछ जानने की इच्छा होता है। तो महज जानने की इच्छा से रिसर्च स्कोलर बने। आजकल रिसर्च करते हैं, रिसर्च करने लगे की खैर आया। कहाँ से मैंने? सोर्स क्या है? तो आपने कुछ सुख करके रिसर्च स्कोलर। बड़े र रिसर्च करते हैं बड़े सुख ज्ञान से, विचार शक्ति से। वे फाइन करते हैं और और और अंदर जाते हैं, विश्लेषण करते हैं। तो विश्लेषण करते हुए, अपने कुछ सुख करके। ब्रह्मा जी ने इसी कमल के अन्दर घुसे, कमल के, नाल के अंदर गए, फूल के अंदर नाल के अंदर गए, बरसों तक गए। कई सैकड़ों हजार वर्षों तक अंदर गए गए गए। कुछ अंतर नहीं पाए। वापस आये। बोले हाथ उठा ले। जितने सख्त था, इतने तक गए। लेकिन कुछ पता नहीं चला। क्योंकि भगवान कितने नीचे हैं, कहाँ से कमल नाल कितना बड़ा कोई पता नहीं लगा पाए, हार कर वापस आकर बोले हताश। कोई पता नहीं चलता। हताश होकर जब बिल्कुल चिंता, क्या करूँ, तब प्रथम 2 साउंड उनको सुनाई पड़ा त प तो समझे, कुछ अगर करना है तो तप करना है। इतना ज्ञान उनका था, इसलिए बोला कि ग्रोन पलड़े थे। चाइल्ड हुड, पास टाइम नहीं, ब्रह्मा जी के ढूंढना देखना समझना। ये बच्चा तो केवल रोता है। हम लोग सब रो रोकर। हम कुछ नहीं जानते। टॉयलेट बात मम्मी पापा करते। लेकिन उनके नहीं विलमचडतेरइसलिए स्वयंभू उनको ग्रो नहीं का गया था। तब किए, तब करने का मतलब जान। बूझकर के कष्ट सहन करना। और क्या 1 थानी। कुछ खाने पीने के कई थान और क्या करें करना बढ़ गए। कैसे पता चलेगा हजारों वर्षों ध्यान लगाने के बाद भगवान ने कृपा किए, दर्शन दिए। और क्योंकि ब्रह्मा जी जब प्रकट हो न तो कोई स्कूल था, न कोई कॉलेज था, न कोई किताब था, न खाता। पेन, टीचर कुछ भी नहीं थे ही वाज द, ओनली पर्सन 1 ही 1 ही प्राणी। तो कैसे पढ़ाएंगे भगवान बोले कैसे पढ़ाउंगा यार मेरा दोस्त होगा? पित्र, दुशेर मूर्खता। अगर बच्चा मूर्ख हुआ तो पिताजी के दोस्त हैं। तो हो न हो। बोलेंगे मेरी से तो प्रकट हुआ है, नाभी से, मेरी से प्रकट हुआ। मैं उसको पढ़ा लिखा कर। आऊँगा कैसे पढ़ाऊंगा, कहीं स्कूल ही नहीं हैं, किताब नहीं खाता? पैन कलम चक, सर कुछ भी नहीं है। तो भगवान को पढ़ाने का तरीका ऐसा है। अभी तक किसी ने उसको पकड़ नहीं पाया। कैसे पढ़ाते हैं, यहां तक आ गए, डाउनलोड करते हैं, कुछ कुछ शिप्स में और डाटा ट्रांसफर कर देते हैं वायरलेस में। लेकिन प्राणियों के साथ कैसे ये नहीं कर पाते हैं तो गैजेट्स में शो करते हैं। लेकिन भगवान ने ब्रह्मा जी को पढ़ाने के लिए तेने, ब्रह्म, हिदाय आदि कबयोमुइहंतियतसूरयह ब्रह्मा के हार्ड डिस्क में हार्ड डिस्क डाल दि डाउनलोड कर दिए। सारे ब्रह्मा जी को नहीं पता चला। कैसे ज्ञान आ गय ये तरीका भगवान के पढ़ाने का, एजुकेशन का जो तरीका आज तो कोई नहीं समझ पाता। बड़े बड़े सोचते है, हम बहुत डेवलप किए, ये कर दी, सुपर मयान सुपर कंप्यूटर बना दिए। लेकिन भगवान ने जिस प्रकार से ज्ञान प्रदान करते हैं, तक नहीं समझाते हैं। अगर ए सिस्टम पता चलता है तो स्कूल कल से बंद हो जाता है। अब पैदा हुआ बच्चा को सीधा पी एच डी कर के छोड़ देंगे और क्या सीधा अंदर अंदर डाउनलोड कर देंगे। सर जा क्या इतना ट्रेनिंग ले, इतना टेशन करो इतना सीधा डाल 2 मसला अंदर ये भगवान को पता है यह समय सुन सीधा बच्चे को बताने चला, ब्रह्मा जी को बताने चला, सारे ज्ञान अंदर डाउनलोड कर दे। तेने ब्रह्म हृदा हृदय में सीधा ज्ञान। तो ये सी ब्रह्मा जी हैं। तो उन्होंने सृष्टि का शुरुआत इस कल्प के विशेष कल्प में इस स्थान को चुने और तपस्या और जज्ञ से ही सब काम शुरू होता है। तपस्या करने के बाद जो जज्ञा करने के मनस कि इस जहा को चुने। ब्रह्मा जी ने जो अजन्मा गण होते हैं, जिनको हर कल्प में आप एंट किया जाता है। पुन पुन कल्प के लिए वो लोग सब रहते हैं अलग अलग स्थान में, हर कल्प में उनका काम है। कल्प आदि दे, बता, इंदिरा, मनु, ऋषि, मनुष्य, पुत्र आदि। कल्प कल्पांतर उनका गवरमेंट चल रहा है। तुम सबियो को बुला करके देवता, रिसी, मनु, ब्रह्मा, विष्णु सबको बुला करके इसी स्थान में शुभारम्भ करने, सुष्टि का, ब्रांड का शुरुआत जज्ञ, पूजा करने के लिए उनके विचार किए। इस सुन्दर जगह पर। इतनी बड़ी जब अरेंजमेंट हुआ सब टेंट फेंड लगा वाटरपूपटरेंट लगाए होंगे। अब जो व्यवस्था हुआ तो बड़े बड़े रुषीयमनियकुशु बुलाया गया। मुर्माजीकेबेठे तो थे सब बोले पापा का फस्टिवालहै शुरू करेंगे इस कल्प का। इस कल्प में सब ये सब बड़े बड़े, गेस्ट, टायर, सी मनीष आय। बिल्कुल बाकायदा ब्रह्मा जी के 1 नाम है विधि, रूल्स, रेगुलेशन, पक्का से। वही तो बताते हैं, सर उनके पुत्रगण करते है। रेडी किया करने के लिए। तो ब्रह्माजी ग्रस्त थे उनकी पत्नी का नाम कभी सरस्वती लिखा गया, कभी सावित्री। या जो भी हो चाहे सावित्री बनो या सरस्वती मानो जो उनकी पत्नी थे ब्रह्मा जी के। मैडम। तो उनको ब्रह्मा जी बोले गेट रेडी जग्गन करना है। अन्ना जग्गे चलेगा। लंबा समय तक तैयार होकर कहा मैं तैयार हो कर जा रहा हूँ। पाना तैयार हो तो जैसे ब्रह्मा जी से फोन। ब्रह्मा जी फ़ोन करके अपने सारे मित्रों को इंद्र रिसी, विष्णु सबको बुलाए सभा आये तो मैडम भी अपने सारे फ्रेंड को बुलाई फ़ोन करके सभा है। इतने बड़े में भी चल रही हूँ। सभा तो जितने और भी देवियां है। लष्मी, सरस्वती, पार्वती आदि आदि। सावित्री जी के कहने पर सब बोले बोले आ रही है, आ रही है। जानते हैं आज भी सभी मानेंगे स्त्रियां थोड़ा रेडी होने का टाइम लगता है उनका मेकअप टाइम लगता। हम लोग शान के तिलक के पापा उनके तिलक नहीं चले। थोड़ा। उनका कस्मेटिक बॉक्स होता है। ड्रेसिंग टेबुल बिना टेबुल में उन्हें उनका ड्रेसिंग के लिए पूरा बक्सा टेबल सब प्रावधान व्यवस्था चाहिए। टाइम लगता है उनको थोड़ा मेक अप होने में जद्देपीदाडीफड़ी नहीं। सेविंग करना तो नहीं पड़ता लेकिन फिर भी पाउडर पेस्ट लगाने में टाइम लगता है। अगर दाड़ी होता। भगवान ने। इसलिए नहीं दी बोले और टाइम लगे बिना गाड़ी में थोड़े से मुंह में इतनी मसला डालते हैं। अगर गाड़ी दे देता तो और कितना टाइम लगता है। लेकिन उनका टाइम लगता है। और जो सहलियों को फ़ोन करके बुनाया सभी अपने अपने बढ़िया साड़ी मेकअप कर के आएंगे तो बिल्कुल फिट मेकअप होना चाहिए। तो और भी थोड़ा। हाई टाइम हुआ। सभी नए काम में टाइम लेते हैं। ब्रह्मा जी और बाकी पुरुष। लोग आ गए स्टेज पर, क्योंकि वहां ब्रह्मा जी स्वयं विधि है। विधि मत नियम नियम के अनुसार टाइम के अनुसार सब होना चाहिए। बिल्कुल अमृत महिला अमृत मुहरत में शुरू होना चाहिए। सृष्टि के कार्य और बड़े बड़े ऋषि से बैठक के तैयारी कर रहे हैं। राजी प्रमु पुत्रगण बोले पापा टाइम हो रहा है, राजी गये, फ़ोन कर रहे है। मैडम फोन नहीं उठा रहे है। डोलवेटहैबोलेlेt डांट दिए, माजी बोले और क्या नही के फोन नहीं। डांटे बोल रहा हूं। चलता अपने पति को बोल देते हैं। थोड़ा थोड़ा वेट किए लेकिन सब बोले को धारण सर लेट हो रहा है। सर अब फोन ही करूँगा। किसी को भेजे। पहले जाओ मम्मा को लाओ नारद गए। बोले मम्मा पापा बुला रहे हैं। पूजा में सब के रेडी हुए सब बैठा हूँ चलो आ रहे हैं। फोन के जी पार्वती जी, बस अभी आई, चलेंगे साथ साथ में चलेंगे हम आई। उनको भी टाइम लगता है कि इतने सारे बड़े पंडाल में जायेंगे, अच्छा से सेंट लगाकर जाएंगे। अब जेपी खोद रेडी हो चुकी थी। लेकिन उनके सहेलियों के चक्कर में थोड़ा वेट करना पड़ा नाराज रहे। फ्रेंड आ रहे हैं। है। फिर वेट के बाहर रिस टाइम हो रहा है तो बेकार हो जाएगा, दूसरे को भेजे जाओ। तीसरी बार तीसरे को उनको भेजे, तब भी वेट कर रहे हल। क्या हो गया? आ रहे हैं। तो रिषिमुनी बोले तो बेकार हो जाएगा। और ब्रह्मा जी बोले फर्गेटिटमेंफ़ोन कर लिया, 3 दिन भेज दिया, नहीं आ रहे इन्द्र को बोले इंद्रा को अरेंजमेंट करो। आप यस्त हो। अर्धांगनी के साथ होना पड़ेगा। न कोई दूसरा अर्धांगिनी काम चला, निकाले अरेंज करो समबडी तो इंद्र तुरंत गाड़ी निकाल चल पड़े। 1 गोपाल ने गोपी अनमैरिड गाल कावर्ड गाल गोपी को पकड़ के ले आये। अच्छा देखने में थी। ब्रह्मा ब्राह्मण है, लेकिन ये नियम है। पुरुष अगर उच्च बरना का हो, स्त्री नीचे बढ़ने का होने से चलेगा एक्सेप्टेड उतना अपग्रेड हो जाता है। लेकिन पुरुष अगर नीचे बरना का हो तो स्त्री व पुरुष अपग्रेड नहीं होंगे। गड़बड़ है यह बिल, यह ठीक है। तो गोपी को ले आये। गोपी के बोले इंद्र बोले फिर या करो उसको तो पुष् करणी के किनारे 1 बहुत सुंदर गाय था तो इंद्र ने उस गोपी को लेकर के गाय के मुँह में डाल दिया बोला उनको पवित्र को तो गाय ने उसके मुंह में ले लिए ले करके फिर पास कर दे दिया। तो गाय के मुख से जा करके फिर गाय से प्रकट हो गए तो उनका नाम पड़ेगा गायत्री तो गायत्री देवी बन गई, ब्राह्मणी गई नमो ब्रह्मणे देव आए गो ब्राह्मण हिताय। अब गायत्री देवी। इतनी सुन्दर ब्राह्मणी लड़की होकर आ गई और सारे रूसी, मनी, मंत्र, मंत्र, साहब के सब उनको सब रेडी कर दिए, उनकी शादी करवा दी। अनडिस्पाटब्रह्माजी तो इसके लिए पुष्कर्म कन्यादान? यहां कन्यादान विष्णु ब्रह्मा सब विष्णु जी और शंकर जी स्वयं बैठ कर के कन्यादान करा दिए। लेट हो रहा है जल्दी कराना कन्यादान करा लिए बम ने शादी करके उनके लेफ्ट साइड में बैठा बैठा कर जगत शुरू हो गए। जगन शुरू हो गया जब चलने लगा काम कोई रुका नहीं, सब टाइम पर काम चलने। थोडे समय जगह चल पड़ा था। मैडम ने आई पूरा स्टाफ के साथ आई। उनके जितने स्टाफ थे साथ में बाजे गाजे बजाकर उनको क्या पता कि अपने पार्टी बाजे, गाजे संकृतन के साथ आई पी होंगे। अब आकर के स्टेज में घुस कर देख रहा है। तो ये कौन बैठा है मेरे पर। वो जो दृष्टि थी लोग जानते है कभी कभी इसे देखते भी होंगे। अगर ऐसी भी घटना हो जाए तो आप किस नजर से देखते होग। ब्रह्मा जी देख ले नीचे मुँह करके बाप रे बाप जला देगी लगता है। ब्रह्मा जी नीचे मुंह कर के बैठ गये। बोले संभालो वही आ गई हो, खा जाएगी भी छोड़ेगी नहीं पूरे आये हैं। सब उमाजी नीचे मुंह कर दिए। अब इंदिरा, बाकी, नारा सब साइड हो गए। बोले हमने ब्राह्मण जो करते थे बोले थोडा देर बढ़ जा। लेकिन वो क्रोधित हो कर के देखा कि ब्रह्मा सरेंडर कर लिए की समझ गया कि वो नहीं कि उन लोगों ने उनसे करवा दिए। वो मेरे लिए वेट करते होंगे। लेकिन उन्होंने फोर्स करके करा दिए। और क्या तो सबसे पहले उन्हीं लोगों को साफ देने लगेगी जितने विष्णु महेश जितने देवता थे। सभी को साफ देन ब्राह्मण तक, गाय तक वो गाय ने पवित्र करा था, गायत्री को, गाय को, ब्राह्मण को, सबको साफ देने लगे। किसी को भी ऐसी सरकार सबको अलग अलग साफ देने लगे। देख करके पर लाइन ब्रह्मा जी के पास आई। जो भी हो अपने हसबंड तो है है। तो बह्माजी साइलेंट हो चुके थे। तो बोले ठीक हैं आपको कौन सा क्या करना चाहिए था। लेकिन सृष्टि की शुरुआत कर दी है। अपनी जगा कर दे। मेरे बिना तो भी नहीं किए। तो आपको सृष्टि में और कहीं सम्मान पूजा नहीं मिलेगा। यहीं आप बैठे, यही पीट, यहीं आपको पूजा करेंगे। इसके अलावा और कहीं नहीं। तो उनको इस प्रकार साथ मिला और बाकी सभी को अलग अलग साफ दिए। सब सब देने के बाद में जज संपन्न हो गया। सब चली। गई। यहां से गुस्से होकर के पैर कचारे हुए गुस्से में आई नहीं जाकर देखे होंगे कि इस तरफ पहाड़ हैं। पहाड़ की चोटी पर अपने मंदिर बनाकर बैठे सावित्री देवी का मंदिर। बिल्कुल चोटी में अकेली किसी की न सुनी बोला चली गई। जाकर वहीं बैठने लगे। व चले जाने के बाद में जगन चल रहा था, चला चली गई सब काम के तो पर गायत्री देव बोले दीदी ने सावदेिकसलादा मैं भी तो कुछ हूँ। तो उन्होंने सो काउंटर कर दी सभी का कुछ न कुछ उपाय निकाल कर। वो भी वरदान दे दी सबको गायत्री ने कुछ उनके साथ काम किया, कुछ काम किया सभी को। लेकिन बाकी सब तो अपन ने उनको भी मिला और वरदान मिला इसे विदा होकर ब्रह्मा जी को गायत्ृतेउनकी पत्नी हो गई। 1 पत्नी वहां रूट कर बैठ गई। दूसरी पत्नी उन्ही से काम चलाना है। घर व उनके साथ में रहे। तिरमजी उस कर राज के श्रेष्ठ अधिनायक पूजित विग्रह के रूप में यहाँ रह गए। इस प्रकार से इस पुष्कर के उत्पन्न हुआ है। क्योंकि भगवान की पुष्पकर से, उन्ही से यह प्रकट हुआ है। उसी कमल से भगवान गस्त कमल के पंख पड़ी से पुष्करिणी उत्पन्न हुआ है। तो उसका सृष्टि के कुछ भी पाप ताप को मिटाने के लिए समर्थ है। और उसके बाद सुष्टि के प्रारंभ के जज्ञ बहुत बड़े पूजा करे होने के नाते यहां अनेक ब्रह्मपुत्र ब्रह्मा जी जब रहे। उनके जितने, ऋषि, मुर्सी सब तो भगवान की पुत्र ही हैं। कश्चप आदि, कुलस्त आदि जितने, सप्तम, हर्षी सब कुछ कड़क कुटिया बना कर बैठते थे। जज्ञातपदानपवित्र प्रकार के ही चलने लगा ब्रह्मा जी संख्या तो बैठे ही हैं। तो सारे पित्रपुरुष पर जा के जितने पिता महा सबके पितामह के पिता मह तो वही है, वही जा बैठे। तो इस प्रकार उनके प्रभाव से अब पूरे वर्ष में तीर्थ का महिमा, वहाँ स्नान का महिमा पुण्य खतर का प्रभाव पड़ने लगा। तो आज तक कल्प से लेकर आज तक इस प्रकार उस कर के महिमा है। भगवान राम भी आए थे वह प्रदान करने के लिए, दशरथ महाराज का प्रणयदान यहाँ करने के लिए। उनको बुला गया के आप सब जब किए। लेकिन यहां भी क लीजिए ऋषि, मुनियो का कहने पर दंडकारण्य से भगवान राम यहाँ भी आए थे उन्नान करने के। और तो और 1 बार हमारे इष्टदेव श्री राम, कृष्ण, कृष्ण बलराम भी आये थे, यहां वन्दन करने के ले नहीं। 1 कृष्णलीला में जब भगवान द्वारका मे थे, कृष्ण बलराम तभी 1 साल राज, उनका नाम था ब्रह्मदत्त, उनके पुत्र नहीं हो रहे थे, उनके 2 पत्नी थे, लेकिन पुत्र नहीं हो रहे थे पुत्र प्राप्ति के लिए। तबके और उनके साथ में मित्र सहकर के ब्राह्मण थे, उनके पुत्र नहीं थे पुत्र के लिए। तपके दोनों मिल कर के तप के इस स्थान पर आये। तप करने के लिए। क्यों बड़े जाना पवित्र स्थान था। वो जो ब्रह्म दत्त थे वो परमसयबतथेशिवभक्त थे। वो शंकर जी को तप किए। जो मित्र स ब्राह्मण थे वो विष्णु के भक्त थे। दोनों क्षेत्र में आ कर के दोनों तप करने लगे। दोनों पास स्वास में थे, दोनों को फ्रेंडशिप हो गया। पर सेम 1 काम के लिए दोनों लगे हैं, लेकिन दोनों के मंत्र अलग अलग हैं। दोनों के देवता अलग अलग है। विष्णु की प्रार्थना कर रहे है, उसी की प्रार्थना करते हैं। जो भी हो, अपने अपने इष्ट का उन को कृपा हुआ। और शंकर जी की कृपा से उनको भी 2 पत्नियों से 11 करके 2 पुत्र हुए। मित्र सह की पत्नी उनके भी 1 पुत्र हुए, 2 पुत्र, 1 साथ में हुए। दोनों पत्नी में जो ब्रह्म दत्त के, तो उनका नाम उन्होंने हंस और डिंबक 2 नाम रखे थे। और जो मित्र सह ब्राह्मण थे, उनके पुत्र हुआ तो वे ठाकुर जी से कृपा से उनका नाम उन्हें जनार्दन रखा। लेकिन जब तप कर रहे थे, तभी बोले थे। अगर हमारा प्रभु कृपा के पुत्र हुए। हम दोनों को जैसे मित्रता हमारे पुत्र के वि से मित्रता होगा तो ही हुआ। 1 साथ में तीनों पुत्र, उनके 2 बेटे उनके बेटे हुए और पलने लगे बढ़ने लगे। 1 साथ में रहने लगे तो तो राजा था, ब्रह्मदत्त उनके पुत्र। 2 राजकुमार हुए तो वो ब्राह्मण था, उनके सेवक बन करके वहां रखा, उनका बेटा भी उनके सर्वेंट हुआ। जनार्दन जी, लेकिन जनार्दन का गुण वैष्णव होने के नाते बड़े सदाचार सद्गुण थे। और वे सब होने के नाते बड़े बदमाश थे, असुरगण था उनके अन्दर। दोनों ने भी असुरगण बोलते हैं कि साधारण शक्ति से कुछ नहीं, असाधारण शक्ति प्राप्त करने के लिए तप करना पड़ेगा और तपस्या करने चले गए। हिमालय में जाकर के कठोर तप करने लगे। कुछ बरसों तप करने के बाद शंकरजी आसुतों से मुझे क्या चाहिए। दोनों हाथ जोड़ करके 5 बर मांगे। ये भी 5 बार दोनों 1 साथ है। होलसेल में अलग अलग नहीं बोले हमको भी, उनको भी दोनों को 55 बार चाहिए। शंकर जी तो देखते नहीं। जहाँ जाने 2 पीछे छोड़े एवं मस्तू क दिए। उसमें से बार मांगे थे कि हम सुरसुर से विजयी भव, हमारा कोई इससे ना मरे, कोई हमको हरा ना सके, वो इतने बल हमको प्राप्ति हो जाए। और आप के 2 अनुचर, 22 अनुचर हमारे साथ युद्ध में रहे। सी करेंगे ऐसे कई बार मांग लिए थे। शिव जी तो बोले चलो, इतना तपके, वो तो सोचते ही नहीं दे देते हैं। बाद में पस्त आते हैं तो मस्त कर दे। बोले ठीक है, जा तो शिवजी से, वरदान से प्राप्त करके आकर उत्पात करने लगे। ये हमेशा रेकड में होता है और सर से करते ही हैं। तपस्या करके आयेंगे, फिर सब का नाक में दम करेंगे उत्पात करने लगे। यहाँ तक कि दुर्बासा रुषिकुझहाकरके खूब साज का अपमान कर। जानता था कि कुछ होगा नहीं। ये भी 1 वरदान में था। कोई रिषिमुनि का अभी सब हमको नहीं लगेगा, दुर्बदशिकोपता था। मैं गुस्सा कर कुछ कर नहीं पाऊंगा। वह संग, शिव अंश और शिव जी की कृपा से उनको कोई अवसर नहीं लगेगा। उनको तो उनके साइज के भरी सभा में तो ये दुर्बुद्धि हो जाता है। बहुत कष्ट करके शिव जी को प्रसन्न किए थे और शिव जी आंख बंद करके वरदान दे दिए थे। लेकिन वरदान देने से सख्ती तो मिल जाता है, लेकिन बुद्धि भ्रष्ट हो जाता है। विष्णु की तपस्या करो। विष्णु की तपस्या में शक्ति के साथ साथ मति भी सुधरता है, सद्बुद्धि होता है सदाचार। इस प्रकार भगवान विष्णु हितेसी है और कोई हितेसी नहीं तो उदिभ्रष्टवाजाके दुर्वासा का अपमान के। दुर्वासा जी अब देखे, कुछ कर नहीं। पाऊंगा। सीधा गए द्वारका। भगवान ग्रस्त धर्म निभा रहे थे। द्वारका में। दुर्वासा जी आये। सदल बल तो तुरंत उनको वेलकम किए, बैठा उनको पूजा किए। सब कुछ दुर्वासा जी गुस्से थे। मेरे द्वारिका धीश। आप। मुझे पूछे कुशल मंगल? आपको? क्या पता नही आप सर्वज्ञ श्रमणी हो। मैं किस लिए आया हूँ? आपको सब पता है। फिर क्यों मुझे पूछ रहे हैं? मैं कितने गुस्से में हूँ? क्या आप मुझे समझ नहीं पा रहे? बोले ठीक, ठीक बोलिए न सर। मुझे पता है। ठीक बोलिए थोड़ा ले। तो बताए कि इसे इसे, इसे, इसे सर से उत्पात मचा। मुझे इसे अपमान के सिवा। तो हवान बोले, आप क्या चाहते हैं? मैं चाहता हूं बंद करो, उनको मारो, जल्दी खत्म कर, आउट करो। उनको तो भगवान सपथ किए। बोले ठीक है। अब समय आ रहा है कुमार। कोई वरदान उनको रखा नहीं कर पाएगा। चाहे कितने बर ब्रह्मा से कहीं से ले ले। मेरे सामने टिक नहीं सकता न। मैं जानता हूँ, आप ही कुछ कर सकते हैं। इसलिए आपके पास आया कितने भी वरदान हो, आप ही केवल कुछ कर सकते हैं। तो कुछ कीजिए जद्यपि क्या क्या जाए। लेकिन फिर भी आप कुछ कर सकते हैं। कुछ कीजिए। तो भगवान ने दुर्वासा जी के चरण में प्रणाम करके बोले अभी कर लूंगा। अब कोई वरदान सुरक्षा नहीं कर पाएगा। कब करेंगे समय आयेगा करने में। उसके बाद में दोनो इतने बढ़ गए थे। उनका टेम्पर इतना बढ़ गया था। राजा तो थे ही और उनके अंडर में उनके जो भाई की तरह मानते थे। जनार्दन उनके साथ में रहता था। लेकिन जनार्दन हमेशा सद्भाव के था, भजन करता था उनको। ये सब उनके कार्य तेरी जी में अच्छा नहीं लगता था, समझाता था लेकिन कोई सुनते नहीं थे उनका। तो उन दोनों ने उनके पिता जी को जाकर बोले। हम इतनी शक्तिशाली है, हमारा बल से
हम
समेत जज्ञ करेंगे, राजस्व जज्ञे करेंगे। पूरे विश्व में 1 छत्र सम्राट आप होंगे। सब कुछ हमारे अंदर रहेगा। तो जनार्दन उनके साथ सलाहकार में बैठते थे। वो बोले कि देखिये ए प्रकार की राजज्ञा करने के लिए आपको सारे राजाओ को जीतना पड़ेगा और क्या जीत लेंगे। बोले नहीं भिष्म है, द्रोण हैं शाखा। जदु सेना है जादव बिगण, वो लोग सब अजेय है, उनको जीता नहीं जा सकता। आप कैसे सोच लिए वो अकेले भरी पड़ जाएंगे। जीत नहीं सका। अरे हम इतना बड़ा है, दिव्यास्त्र सब है। तुम ऐसा करो। सबसे पहले बोले मित्र है, विश्व बुढा हो चूका है। रिटायर्ड मैन द्रोण ब्रामण है उनको। क्या, उनको चाय दक्षिणा दे। देंगे केबल गड़बड़ करने वाले जदुवंशी उनको आम भेज रहे हैं। आप का दूत बन कर जाओ। जा के जादू बनसम द्वारिका धीश को हमारे मैसेज 2 कि हम नतमस्तक होकर हम टैक्स दे। बोले समुद्र किनारे रहता नमक भेजे हमको टैक्स जनार्दन को अब क्या करे। उनके सर्व तो जाना पड़ा जा। कर के द्वारका के सुधर्मा सभा में पहुंचा ब्राह्मण थे। उनको बड़ा अच्छा से ट्रीटमेंट किया गया। भगवान को लाकर पूजा के ब्राह्मण को कैसे वेलकम करना है। भगवान को आता तथ्य करना बड़े। अच्छा से स्वागत किए बोला मैं दूध बनकर आया हूँ। ब्रह्म राजकुमार के हंश से मुझे शर्म आता बोलने के लिए। लेकिन न बोले बोलिये आप क्यों शर्म करते है। बोलिए क्या तो बोला यही मुझे मैसेज है कि न्होंने राज जगह करना चाहते थे। बाकी सब बोले कोई जीते हैं, केवल जादूवंशी हैं उनको मैसेज पहले सरेंडर कर ले। ना पड़े सरेंडर करके समुद्र के न रहते नमक लाकर। हमको दे टैक्स में नमक बोलने का मतलब है। यह अपमान सूचक बात है। इसे अपमान सूचक बात जब सुने तो जितने सारे बैठे थे सुधर्मा राज सोहा में सारे कैंडिडेट से ताली बजाकर हंसने लगे। बोले पागल हो गई है दूसरा कोई इस से होते हैं। भगवान जब प्रेजेंट थे धरती पर, तभी भी 1 व्यक्ति था, जिनका नाम था महाराज पोंड्रक, वो भी उनका भी किसी ने उनके पिता जी ने उनका नाम जनार्दन रख दिए थे। वो भी सोचा में ही जनार्दन और लोग उनको बुलाते थे। तो उन्होंने रिसर्च किया पढने समय में कि जनधन का क्या क्या क्वालिटीज क्या सिमटम जितना हम लोग को पता उतना ज्यादा पता क्या सारे पुराण शास्त्र भक्त से ज्यादा करके कुरखितयूनिवर्सिटी में आया था पढ़ने के लिए। केवल आया था। भगवान के बारे में रिसर्च किया, रिसर्च करके पता लगाया उनके 4 हाथ होते तो नोट बोल्ट फिट करके लकड़ी से 2 हाथ एक्सट्रा लगाया था। उन्होने चतुरभुज हुआ चक्र धारण किया बनाया चक्र लकड़ी, कोई फ्रेम फ्रेम लगाकर, आरी में लगाकर चक्कर बनाया संख जो बिल्कुल फिट फाट हो करके नारायण बन करके बैठा था। परेशान होता था तो विचार बड़ा होने के लिए, इनफॉर्म पहनने के लिए। लेकिन फिर भी चतुर सब बैठकर नारायण बन करके बैठता लोग बोलता हो नारायण बोलो। मैं यहां तक उत्पाद। मचा चिट्ठी लिखा था कि मैं अरिजनल नारायण तुम डुप्लीकेट हो धरा के पास। इस प्रकार के भगवान जब थे। तभी भी ऐसे से डुप्लीकेट होते हैं। तो आज भगवान नहीं डुप्लीकेट होना कौन सी बड़ी बात है। तो जब हनसर्डेनकामेसेज दिया सभी ने मजाक के उड़ाए उसको तो भगवान बोले कि नहीं आप दूत हो, हम उसको कुछ नहीं करेंगे, आप जाओ जा करके बताना कि कहा पर मैं टैक्स देने आऊंगा लोकेशन सियार के मरे ही आ जाऊंगा। मुझे लोकेशन देव में कहा पर आऊं टैक्स करने के लिए। और मैं वहीं आ जाऊँगा। तैयार और तैयार क्या अपने सेना सैनिक जितने साथी सब आये कि मेरे टैक्स संभाल पाये नहीं पाते पुलिस। दल बल होकर आये तो ने जाकर बताया और सुन कर के गुस्से में टूट गए। इस गुलाम को तो उन्होंने अपने जन्म
स्थान,
अपने पिता जी के तप स्थान, तपस्थली पुष्कर की चुना बोला। मैं वहीं जा रहा हूँ वो पवित्र क्षेत्र है, वही लोकेशन से ही जाए, वहीं मिलने के लिए। और जितने उनके मित्र मंडल राजा थे, सबको इनवाइट किया, बोला सब सेना लेकर आओ। मेरा झगड़ा होने वाला है। जनार्दन जो दूध, उनको बोला कि मेरा बड़ा सौभाग्य था। मैंने दर्शन किया, बड़े उनके भगवान का गुणगान किया, उनको सुन कर, गुस्सा निकल जाओ।
देश से
शत्रु के गुणगान करता है। हमारे भाई को बुरा हो का था। जो लोग जरासंध बोले कि आये नहीं, कैंसिल बोला मैं ही जाऊंगा। मुझे पता है में में 17 बार फिर दोबारा बोला मैं पंगा नहीं लूंगा, मैं नहीं जाऊँगा। और जरासंध के साथ जो आए थे, वो भी नहीं आये। बोले बाप रे बाप, हमको पता है। बाकी जो नए नए थे, वो लोग आ गए। सन् सामंत और वो भी दोनों भाई। पूरी सन्यास। उनका तो बल था कि वो सी जी के 222 उनके साथ आये। शिव ने शंखर्जी के 22 दूध उनके साथ आये थे। 1 इंद्र विजय, 1 महा भूत उनके साथ भी आया था उनके बल से, और भी उनका बल बता उनके साथ में सारे दिव्यास्त्र था। पासुपतास्त्र सब कुछ था, उनके पास है। शंकर के से तो इससे बलवान होकर आये। लेकिन ये न पता नहीं था कि सारे दिव्यास्त्र सारे बल भगवान के सामने क्या काम करे। तो भगवान आये। तो संकरषण उनके साथ आये। तो कृष्ण बलराम जदु सेना के साथ आये। शरीर घुल गया। सत्य की आय था, उनको बताने के लिए। सत्य की भी आय। सात्यकी बोले तुम आ जाओ करेंगे। सत्य की आदि यादव सेना कृष्णबलराम आये। पुष्कर क्षेत्र में इन हंशडमोकीसनाकसात। उनका ही घमासान युद्ध हुआ था। युद्ध होने से पहले, युद्ध शुरू होने से पहले बचाने का होता है। आप जानते हैं कि पहले जमाने में युद्ध छिप कर के नहीं होता था। सम्मुख युद्ध हुआ करता था। सम्मुख युद्ध समझता था। सामने सामने आ कर के हाथ हथियार से लड़ते थे। यह युद्ध का समय। आजकल तो छिप कर घर बैठते हैं, वहाँ फेंकते हैं, यहाँ फेंकते हैं, छिप कर अंदर में लाइट है, फेंकते हैं। इस प्रकार से नहीं होता था। नियम के अनुसार युद्ध होता था। तो दोनों सामना होगा। जब बचने का मतलब दोनों को गाली गुलज करेंगे। ये उनको गाली थे। उसमें वो जोश बढ़ते, लड़ाई पहले गाली गो, जो होगा, बातों में होगा, फिर लातों होगा। जब गाली गुलज कर रहे थे, कृष्ण बलराम उनके जादू सेना थे, उनकी तरफ उनके सेना थे। गाले लज के बीच में भगवान बोले, वो क्या शुरू करे बदमाश। भगवान पहले उतर बोले, हम मनुष्य रूप में हैं। मनुष्य के साथ युद्ध होगा। देवताओं का क्या काम है? इधर भूत प्रेत, देवताओं का क्या काम है? बहुत बहुत पीछा। भगवान ने तुरंत अपने रस से उतरे उतर कर के जो शिव पार्षद दोनों थे, उनको पकड़ कर के मोड़ मार करके फ फेक दिए। यह चारों को फेंक दिए। सीधा कैलास पार्सल करके वहीं से पुष्कर से डायरेक्ट। इनडायरेक्ट नहीं डायरेक्ट पार्सल। कोई गाड़ी फाड़ी में नहीं, प्लेन में भी नहीं। सीधा उड़कर चले गए। कैलाश में जाकर गिरे। भगवान शंकर जी समझ गए ने हाथ लगाया, निशान समझ गया। जो कोर बैठे उनका डट गया। अब उनका मेरा जितना वरदान था, खत्म होने जा रहा है। पर क्या कर सकता हूँ? उनको फेंक दिए। पुष्कर से सीधा कैलास जो 4 शिव दूत थे, उनको भेज दिए। जो उपदेव थे, इन्द्र को विजित कर आया था, उनको जला दिए। ओ भी जल गया। जब वो जल गया, जितने और बहुत थे, वो सब भाग गए। बोले बाप, रे बाप ये हाई पावर सो नष्ट, हम क्या लड़ेंगे भाग गए। अधिकांश लोग भाग गए। दोनों गुस्सा हुए। बोले इसे क्यों क्या बोले और क्या मनुष्य से मनुष्य युद्ध में उनको क्यों लेकर आये। सबसे पहले उनको आउट का भी आप लड़ो लड़ना। क्या था कृष्ण बलराम के सामने दिव्यास्त्र क्या काम करे? जितने सारे दिव्यास्त्र मारे संकर्षण कृष्ण से तो काम करेगा। क्या उनको हमारे जैसा हुई है, मनुष्य है। उनको नहीं पता था। तो सारे दिव्यास्तर खत्म कर दी। कुछ काम नहीं। कैश बेकार हो गया। कुछ काम नहीं करता, उनको नहीं पता। जिनसे उन्होंने वरदान पाकर के अस्त्र लाये, वो वरदान हो भी देने की शक्ति कहा से लाये? वह भी राम, राम, जप उन्ही की कृपा से तो उनको मिला वरदान देते हैं। अब दानी तो उनके सामने उसका गांव कैसे चलेगा? कुछ काम नहीं किया, सब फ्यूज गया। अब देखे की सारे बाकी जो, जितने, जुद्धा सब मर रहे हैं। ने तो भाग रहे हैं। हमारा जितना दिव्यास्तर था, सो बेकार हो, कुछ काम नहीं कर रहा है। अब शाम तक बड़े मुश्किल से लड़े बोले अब तो आज तक मरे आज अगर शाम हो जा। नहीं जाता। रात को जुद्ध विराम हो जाता। अगर जुद्ध और 1 घंटा चलता ह मार दे मार दे होते। शायद तो जैसे युद्ध विराम हुआ, भाग गए, फरार हो गए। बोले वो लड़ेंगे युद्ध छोड़कर भाग गए। सुबह उठे देखे की है, नहीं तो कृष्ण बलराम ने दोनों ने अपना घोड़ा पकड़ लो कि तो उनके तेज के सामने, यहां से पुष्कर से जाकर। वंदावन पहुंच गए थे। जमुना किनारे पकड़ गए वहीं जाकर पकड़े वहीं देख कर जमुना में कूद गया, दबकने कूद गया जमुना में तो भगवान ने खुदे उनके ऊपर इतने प्रेशर उनके ऊपर आया। बेचारा लोक चला गया। पानी के अन्दर पूरे नीचे पाताल तक ले गए। नाग लोक में, वहां सब नरभक्खी जीव होते हैं, सांप और असुर होते हैं। वो खा गए। उनको सहा संस्कार भी नहीं करना पड़ा। अच्छा हुआ उनका भोजन होगा। खत्म करके ही आये। उनको बोले थे। कोई असुर लोग से मनुष्य से नहीं बनूंगा, मनुष्य नहीं होते। ो पाताल लो किलो खा गए। यहाँ तक उनके बुद्धि में नहीं था कि उनसे भी प्रूफ मांगेगा तो था न, वही खा गए।
न।
तो दूसरा भाई बचा था, रोने लगा, मेरा भाई कहाँ गया? मेरा भाई कहाँ गया? भाई नहीं मिला तो सुसाइड कर लिया ने अपने जीव को खींच कर के जमुना में खुद करके मर गया। भगवान तू इस प्रकार से पुस्कर भी आये थे राम, संकष् और जगण साथ। इस प्रकार से तो ये पुस्कर क्षेत्र है, जहाँ पर सीता राम लक्ष्मण भी आये थे। श्री कृष्ण, बलराम और जदुवंश के लोग भी आये थे और ब्रम्हा, विष्णु, महेश, देव, गण, ऋषि, मुनि सब्त थे ही। भगवान ने अनस बंद करने के बाद वापस इधर ही आये क्योंकि बाकी यहां पर कश्पादीरुषिपलिस रुसी के बड़े पूजा किए। भगवान के राम शंकर्षण पर यहीं सफेद द्वारका गए। तो इस प्रकार ये प्राचीन तीर्थ में के मदद के अनुसार अनेक अनेक इसी पवित्र घटनाएं ऐतिहासिक पौराणिक घटनाएं घटी हैं। और ये पूरे ब्रह्मांड में जितने पवित्र तीर्थ है। इसमें 1 परम पवित्र तीर्थ है जिसने बताया 3 पुष्करिणी है। मुख्या आप जो देख रहे हैं और आज भी सावित्री देवी पहाड़ की छुट्टी पर अभी भी बैठी है अलग से और ब्रह्मा जी के दर्शन किए होंगे कई बार आज भी कर लेंगे फिर जाकर ब्रह्मा जी इधर ही हैं हमारे संप्रदाय के मूल पिठाथिस और आज भी जुगत हजारों लोग विशेष कर के इस राजस्थान क्षेत्र के लोग का परम विश्वास में वो, पितृ, पिंड आदि को विस्ना ब्रत स्नान दान जजञादयहींकरते हैं। विभाजज्ञातसबकुछ बड़े पुण्य माना जाता है। भारत वर्ष के जितने लोग, विदेशी लोग यहाँ आते हैं। इसलिए बड़े बड़े शोरीशोटगष्टास बनाकर रखे हैं। इस प्रकार से पूरे विश्व के 1 प्राचीनतम तीर्थस्थल से उसके विशेष स्तिथ है। इस खेत्र में अब मुझे यह भी कहा गया था, थोड़ा बहुत चर्चा करने के लिए कि हमारे परम आदरणीय प्रहुपादकृपामूर्ति परम पुज्य गुरुदेव गोपाल कृष्ण को स्वयं महाराज। जब उन्होंने स्वयं इस धराधाम में थे, हम लोगो के साथ में थे, तो कई बार ये वार्षिक यात्रा में स्वयं उपस्थित करते स्वंग जाते थे। तो उनके नाते हजारों संख्या में भक्त विशेष कर के दिल वाले, दिल्ली वाले, दिल वाले होते हैं। वहीं पहुंचते ज्यादा, बाकी क्षेत्र वाले नहीं आते। हर यात्रा में दिल वाले लोग पहुंच जाते थे। चाहे रामेश्वर हो, चाहे जगनाथ पुरी हो, चाहे उडुपी हो, चाहे द्वारका हो, है।
न
कहीं कहीं पहुंचते थे सेंटर ट्रेक्शन गुरु महाराज थे उनके संग पाना, उनके दर्शन करना, उनसे कुछ सुनना सुन, उनकी स्माइल को देख लेना, दर्शन कर लेना, उनके सानिध्य में 1 दिन बिताना इसी के लिए लालायित होकर के लोग चले जाते थे। गुरु महाराज का 1 विशेषता था उनकी दृष्टि दृष्टि नेता स्कैनिंग था और नजर से स्कैन कर लेते थे। आप क्या सोचते हैं, क्या करते हैं तो उनके जिस जगह नाथ स्वामी। नयनपथगामी भाव तुम्हें तो से गुरु महाराज प्राथना करते है। आपके नयनपथगामी ही हो जाए, नजर पड़ जाए 1 बार अब स्कान कर लेंगे तो कभी कभी उनके आस पास से चले जाओ और देख लेते थे नजर से नयनपथगामी भव। तुम्हे तो इसी आकर्षण से इस चाह से हजारों संख्या में भक्तगण आते थे। यात्रा में यात्रा भक्ति को पोषण तत्व 11 पोषण तत्व ये है। इसमें अनेक भक्तों का संग प्राप्त होता है। गेट टुगेदर होता है कई भक्तों का। 23 दिन तक। अब घर में तो है नहीं, यह अफकोर्स फोन डिस्ट्रबंस कर रहा है। अगर फोन छोड़कर आये तो फिर और अच्छा होता टाइम लगा करके यहाँ बैठ कर के सुनना जिससे अब इतने बैठ कर घंटों से सुन रहे हैं, घर में होते तो नहीं हो पाता। यहाँ आ कर के तीर्थ में, बैठ, कर के क्षेत्र में सुनना देखना, प्रसाद, खाना, थोड़ा, तपस्या करना, थोड़ा, कष्ट सहना कभी कभी और सेंटर है। गुरु कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए हमारा जो भी भक्ति मय कार्य है, यह समस्त कार्य के लख्य तो 1 ही है। गुरु कृष्ण की प्रसन्नता। तो गुरु कृष्ण की प्रसन्नता के लिए इतने भक्त, गण के बीच में यह भक्तिमय इवेंट, जो सब होता है, उसके अंदर भाग लेना, क्षेत्र में, वह साक्षा गुरु जनों के बीच में, उनके निध्य में रह करके, इसमें भक्ति का
पोषण
बहुत अच्छी तरह से होता है, जो कभी कभी हमारा भक्ति तो करते हैं, बहुत डाउन हो गया है, दि दिग हो रहा है और क्या कर उसको तनिक देने के लिए यह 1 बिल्कुल पकड़ लेता है, फिर हष्टपुष्ट हो जाता। तो इस प्रकार बड़ी स्टोर पुष्ट करने के लिए इस प्रकार की यात्रा का आयोजन होता है। इस यात्रा में गुरुजन लोग वरिष्ठ भक्त लोग आते हैं। और अनेक भक्त कहते हैं उनके संग में किरतन गाना, प्रसाद, पाना, घुमना, स्टान करना, बातचीत करना, 1 साथ होना, यह सब जो इतने बड़े संगति, इतने बड़े, जो थोड़ी बहुत कमी है, वो भी अर्ज चलते हैं, उनके अंदर भी जाना जाता है। तो इसलिए इन इस प्रकार के महापुरुषों के सानिध्य में जो यात्रा है, इसमें भक्ति के पोषण तत्व बहुत है, ये सब भक्ति के लिए टानिक है। और इसी बात को जान करके गुरु महाराज चाहते थे कि जो भक्तगण साल भर में भिन्न रहते हैं, हम से भेंट नहीं हो पाता, मिल नहीं पाते हैं, कभी इकट्ठा नहीं हो पाते, सब 1 जाग में बैठ करके मिले 23 दिन बातचीत करेंगे प्रश्नोत्तर करेंगे। ज्यादा कुशिनआंसरहोता था, कभी कभी किवनेसनकुश्िनआंसर हो, बातचीत हो, कोई प्रकार घुमना, फिर संग देने के लिए और भक्तों को 1 साथ में इकट्ठा करके भक्तिमय वातावरण बनाने के लिए उन्होंने भी अपने समय निकाल करके वो आया करते थे। और वो चाहते थे कि साल में कम से कम 1 बार कोई 1 अच्छा स्थान है, पहले तो केवल गुंदा हुआ करता था, हर कार्तिक में धीरे धीरे, फिर संख्या बढ़ने लगा, फिर अलग अलग स्थान को जाने लगे। और यहाँ तक मैं तो देखा राम सुर में भी कुछ कम संख्या में नहीं गए थे, भारी संख्या में पहुंचे थे, इतनी दूर, वहाँ भी पहुंचे थे। तो ट्रेन जनी 33 दिन का ट्रेन जनी करके गए थे। इतने कष्ट उठा कर वही था कि गुरु महाराज के सानिध्य प्राप्त होगा, इतने भक्तों के संग प्राप्त होगा। तो इसलिए तपस्या करके पहुँचते थे लोग। और वहां जो भक्ति मय वातावरण होता था से, फिर लोग कहा करते थे, अगले साल की यात्रा कब होगा? फिर जायेंगे ये करेंगे प्लानिंग करते थे। तो इसी में ये निश्चित रूप से आप लोगो का पोषण होता है। लेकिन अभी गुरु महाराज जद्यपि हमारे बीच
में
मौजूद नहीं है, लेकिन जहां भी है प्राजी के साथ, वहीं से देखते होंगे, वहीं से भी उनके स्स्कानिंगदृष्टि अभी भी घूमता होगा। सी सी कैमरे की तरह स्कान कर देखते हुए कौन कौन आया है, कौन? कौन नहीं आया? तो इसलिए मत सोचिए कि गुरु माना सहेनियामक्योजाय। he, वेरी मच देर लुकिंग, अभी भी देख रहे हैं। कौन? कौन पंडाल मे है, क्या कर रहे हैं, क्या सोच रहे हैं, देख रहे हैं। अगर आप अनुभव करना चाहे, अनुभव कर सकते हैं। अब तो वही हमारे सारे भजन का, इसका यही श्रे प्रसाद। यही तो है। जस्या प्रसाद बस तो ही संपन्न करने के लिए हम दिन रात लगे हुए हैं। तो इसके लिए 23 दिन कष्ट करके आना सिनयर इतनी नहीं करेंगे। तो कैसे वक्त मचाते हैं? थोड़ा हो जाए कैसे? बोंगा इतना तो करना ही पड़ेगा। तो इसलिए यह मत समझिए कि न हे नए नए ने, उनका जो इच्छा था, जो स्वयं वो चाहते थे, तो उनकी इच्छा, उनका जो प्रयास, उनके आसान आज भी कायम है, और कायम है, उसका प्रमाण आज भी हजारों संख्या में हर इक हो। मैं तो सोच कर के हैरान हो रहा था। पुष्कर से नजदीक है। इतनी बारिश किसी भी जन्माष्टमी राधाष्टमी, इतने सारे भारी, फेस्टिवल। अब सब गया, क्या लोग आयेंगे नहीं, कुछ नहीं होगा ये। इन्द्र ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। मैं गडबड करूँगा ही करूंगा। हो केस पानी यहाँ उठाकर, यहाँ बैठ जायेंगे। इस प्रकार की जो लालसा, इस प्रकार के संग पाने की जो इच्छा, यही तो उनके पास पहुंचता है, यही प्रयास पहुँचता है। इस प्रयास से हमको कुछ सुख। राम तो मिलता नहीं, दुख मिलता है। कठिनाई मिलता है, पैसा खर्च करके कष्ट सैनिक लगाए हैं? यस पैसा खर्च करके कष्ट सहने के ले आता। इतनी तकलीफ उठाने के लिए आते है क्यों? क्योंकि उनके पीछे कुछ और 1 दिव्य प्रसन्नता कारण है। यही कारण है गुरु कृष्ण के ना इस ले के लिए अगर कष्ट उठा
जाए
तो वो ही हमारे भक्ति के लिए तनिक है। वही पोषण तत्व है। तो इसके लिए जो यात्रा कमिटी है, जो लोगो ने इतने, इस स्थान पर, आकर के यहाँ जगा लेना, इतने भारी, वाटरप्रूफ, पंडाल बनाना, अकमडेशन प्रसाद की व्यवस्था करना किए, इतने सारे प्राकृतिक विपदाओं के बीच में मैं उन कमिटियों के चरण में सत सत प्रणाम करता हूँ। इस धन्यवाद के पात्र हैं। क्योंकि गुरु महाराज की इच्छा था कि अवश्य साल में 1 बार मे सारे विशेष करके दिल वाले जो हैं, जिनके दिल है, वो भी दिल्ली वाले ही हैं, और भी जहां से जो जिनका दिल है, वो आये मेरे नाम में कई 1 जाग में एकत्र हों, 1 साथ 23 दिन, रहकर के 1 साथ में जाप किरतन प्रशा सवरणकृतनकरेंयही उनका आसा था, चाहते थे। तो इस महत इच्छा से, गुरु महाराज की। इच्छा को, इच्छा को पूर्ण करने के लिए और अपनी भक्ति को पोषण करने
के लिए
जो व्यवस्था करते हैं, जो आते हैं, जो भाग लेते हैं, जिस प्रकार से सभी कहुपाजीकृष्ण और महाराज कृपा के भाजन अवश्य होंगे और उनके लिए
मैं
भगवान से प्रार्थना करता हूं, तीर्थराज पुष्कर से, श्री ब्रह्मा जी से और अपने ब्रह्म परंपरा के समस्त वरिष्ठ आचार्यों से, कि आप जितने भी लोग पधारे इस कष्ट के साथ आप सब स्वयं ब्रह्माजी से अब तक वर्तमान आचार्य प्रजंत सभी के विशेष कृपा को प्राप्त करे, तृथराजकृपा को प्राप्त करे और इस कृपा को प्राप्त करके आपके लिए भक्तिमय जीवन को, सबल परुष्टहुष्ट करके गुरु महाराज के इच्छा को और उनके संत और पोषण करे। और बढाए बस ही विशेष सुभेक्षा के साथ मैं ही विराम देना चाहता हूँ कि मुझे पता नहीं टाइम इतना हो गया है। आप लोग को भी नरात्रि जाना होगा। आपका जहाँ आकमडिसनहैप्रसार लगा तो ज्यादा समय नहीं लेते हैं। मेरा समय भी काल पूरा हो चुका है। लगता है कुशन अच्छा रहु जी बोलते हैं कोश्चन के लिए ओह अच्छा कल पूर्णिमा है और भद्र पूर्णिमा। आप लोग को पता होगा कल चंद्रग्रहण भी है और चन्द्रग्रहण तो हैं। रात को लगभग 89 बजे से लेकर के मिड नाइट तक है। लेकिन उसका जो सूतक जो कंटामिनेशन शुरू हो जाता है लगभग 1 बजे से 1 सा आवेश शुरू हो जाएगा। क्योंकि हम लोग किस स्थान में है। यह स्थान विधि के स्थान हैं। बह्माजी विधि। विधि तो यही है कि इस प्रकार के सूतक पातक का जो विधि है उसका पालन करना चाहिए। कम से कम 8 घंटे पहले से भोजन नहीं करना चाहिए, कुकिंग नहीं करना चाहिए, देव, पूजा आदि नहीं करना चाहिए। मंदिर अल्टर बंद रहना चाहिए। अगर खुला है तो खुला बंद है तो बंद ऐसे रहना नहीं होना चाहिए। तो इसी के लिए जब भी इसी की ऐसे कई समय आता है जैसे कल का है तो जो जानते हैं उसकी विधि के बारे में, नियम के बारे में। तो दोपहर 1 बजे तक भरपेट प्रसाद ले लीजिये, जितना डाउनलोड करना चेक कर लीजिए, कंठ तक, दांत तक, जीव हाथ तक जितना भर लीजिये, भर लीजिये। फिर नेक्स्ट डे मर्निंग जो ब्रेक फास्ट होगा या ब्रेकफास् होगा, जल्दी कर सकते हैं, क्लास से पहले कर सकते हैं क्योंकि सर्व मुख्य होगा। लगभग 2 ढाई बजे तब तो सब निद्रामें होंगे, जकते ही प्रसाद ले सकते हैं, ऐसी व्यवस्था कर सकते हैं। मंगल खाद दिया, मंगल दर्शन नहीं, मंगल, भोजन उठ करके तैयार होकर आए और प्रसाद पाए बाद में मंगला आरती करे। ऐसे हो सकता है या मंगल रती बाद जिसे कभी भी निर्जला में करते न बदला लेने के लिए तो इसे बदला ले सकते हैं लेकिन इतना नहीं कि दोपहर में तो अच्छा सा डाउनलोड करते हैं। 1 डिनर मिस करने से बड़ी बंद लॉन्च तो करेंगे लॉन्च और ब्रेक फास्ट को दोनों मिला कर के अच्छा तरह से कर लीजिये। 1 डिनर मिस कर लीजिये। सुबह उठकर फिर सा मिल जाए और पुजा पुजता कही नहीं। शाम को वहाँ आरती होगा ही नहीं, केवल जब कथा किर्तन व ही रह जाएगा जितने जम के करो और ग्रहण में। ग्रहण में यही होता है कि पवित्र नद नदी में स्नान करना होता, जहाँ पवित्र नदी। और ये 1 विश्व के पवित्र तीर्थ में, 1 ब्रह्माण्ड के पवित्र तीर्थ में ब्रह्मा जी साथ बैठे हैं, जिसके किनारे आपको महासौभाग्य मिला कि पूर्णमासी की चन्द्र ग्रहण स्नान करना पड़ेगा।
ग्रहण।
स्नान 1 बहुत बड़ी सजग होता है तो ये महा सुयोग आपको अमृत में सुयोग प्राप्त होता है काल 3 बार स्नान किया जाता है ग्रहण की शुरुआत में ग्रहण के मध्य में, ग्रहण के बाद में तो आप कल तो 1 बार स्नान कर ही लीजिये। दिन में जब शुरू होता है और
फिर
8 तारीख सुबह और 1 बार कर लीजिये। भोर भोर में तो ग्रहण सर्व मुख्य स्नान हो जाएगा वहां तीर्थ स्नान हो जाएगा और आपके ग्रहण व नियम पालन हो जाएगा। तो रमाजी के सानिध्य में रह कर के इस विधि का पालन करना उचित है और जद्यपि जो कृष्ण भक्त हैं वैष्णव है उनको यह शूतकपातक नहीं बाधित करता लेकिन फिर भी हम समाज में रहते हैं और समाज की जो नियम है ने इसको हमको साथ मिल करके चलना चाहिए। तो इसलिए इस प्रकार के नियम है अभी अपना है में तो वही बताया कि कम से कम सभी को 1 बजे तक जो कुकिंग टीम है देर सुनो मेक वाटेवर, फीस्ट और सब कुछ ज्यादा से ज्यादा डबल आईटम कर खिला दें 1 बजे प्रसाद हो जाए देन स्किप डिनर इवनिंग प्रसाद नहीं नेक्स्ट मोर्निंग एलडी प्रसाद कर दिया जाए जो मैनेजमेंट टीम कहीं होंगे सुनते होंगे तो इस को सुन ले इस प्रकार करें और वर्ड इविनिंग आरती संध्यार्ती न करें कृतन कर सकते हैं, नाच सकते हैं, श्रवण कर सकते हैं और सभी इवेंट कर सकते है। भगवान की पूजा आर्ति नहीं करना चाहिए, प्रणाम कर लेना चाहिए। आ दर पर दाम रखो खोलकर जैसे रखा। आज टीच, ऐसे कर सकते हैं बाकी जब अध्ययन किर्तन श्रवण इसको जितनी ज्यादा करो। ग्रहण के समय यह बहुत फलदाई होता है, कई गुना ज्यादा प्रभाव देता है। तो कल के दिन आप जब संख्या बढ़ा सकते हैं, श्रवण की संख्या, पठन यह सब संख्या बढ़ा सकते हैं। बहुत पावरफुल होता है ग्रहण के समय, दान ग्रहण के समय, स्नान, ग्रहण के समय, जज्ञ नाम, जब तक सबसे बड़ा जज्ञ है सबसे बड़ा जग्य, कलि युग में संकृतन महा जज्ञ है। तो विशेष संकृतन, विशेष नाम, जब विशेष नान, दान जितने करना है, कल ग्रहण के समय कर सकते हैं ये सुजोग कहां पर मिलेगा? तीर्थराज पुष्कर क्षेत्र में, पुस्कर पुष्करिणी में, ब्रह्माजी के सानिध्य में यह ग्रहण समय का जो विशेष अमृत बला है उसमें जितने भी पुण्य कर्म करना कर सकते हैं। और पुण्य कर्म से सबसे शिष्ट पुण्यकर्म है। भगवान के बारे में सु सुनना, भगवान के नाम, गुण ला को कितन करना, hreksnकोश्चन और भी है न
अॉnसenटहरे कृष्णा तो विशेष भार प्रकट करेंगे, भक्ति, आश्रय, वेस्ट स्वामी, महाराज का हरी, बोल हरे, कृष्णा, हरे कृष्णा र, हरे, हरे, हरे
राम हरे राम राम राम हरे हरे
इतनी सुन्दर पुष्कर, धाम की महिमा और सब चीजों के विषय में हमें बताया। महाराज ने तो कल का शेड्यूल इस प्रकार रहेगा। हालांकि अभी भारत अनाउंसमेंट किया है। इसके बाद में मैनेजमेंट न डिस्कस करके प्रसाद का अनाउंस कर दिए। अभी तक जो हमने डिसाइड किया था वो अनाउंस कर रहे हैं। एंड जो होगा चेंज उसको फिर हम ग्रुप्स में सर्कुलेट कर देंगे सुबह 5 बजे सब भक्तियां इकत्रित होंगे मंगल आरती के लिए पंडाल में और उसके बाद जप, सवा 7 बजे गुरु पूजा और पौने 8 बजे हमारे संप्रदाय के जैसे महारज बता रहे थे आचार्य आदि आचार्य जो हैं ब्रह्मा जी, ग्लोरी ऑफ ब्रह्माजी, ग्लोरी न, ग्लोरियस सर्विस और ब्रह्मा जी के विषय में प्रबोधानंद सरस्वती स्वामी महाराज और फिर सवा 9 बजे हमारे गुरु परंपरा के 1 बहुत सुन्दर नाटिका प्रस्तुत की जाएगी गौरंगा गुरुकुल के भक्तों के द्वारा और वैसे अभी शिड्यूल डे पौने 10 बजे का प्रसाधन तो देखते हैं वो 1 बजे वाला कैसे हम इसको ऑर्गेनाइज कर सकते हैं एंड देन साढ़े 10 से 3 बजे तक हमने समय रखा था जहाँ पर भक्त लोग दर्शन करके आ सक हैं ब्रह्माजी के मंदिर और सावित्री देवी के मंदिर और 1 बजे के बाद स्नान करके आ सकते हैं वैसे हमने कल शाम को कथा सरोवर के पास में ही रखी थी वहीं पर ही महाराज के द्वारा रखी थी लेकिन मौसम को देखते हुए असंभव लगता है जिस प्रकार के हालात है कि वहां पर व्यवस्था करना इतने भक्तों के लिए तो 3 बजे से 5 बजे में हमें विशेष संघ प्राप्त होगा परमपूजनीय गुरु प्रसाद स्वामी महाराज का अरे वह तो महाराज विशेष आ रहे अभी 34 दिन पहले साउथ अमेरिका से आये और महाराज डबल माइंड्स में थे की मैं यात्रा में आऊं लेकिन फाइनली पुष्ट विशेष भद्र, पूर्णिमा कल, विश्वरूप महोत्सव और शिला प्रभु सन्यास ग्रहण महोत्सव है तो महाराज जिस प्रकार गुरु महाराज इस यात्रा में हमेशा पुस्तक वितरक संदेश देते थे तो अपने सब संदेशों से 1 सन्देश देने के लिए जो प् प्रमुख आ रहे हैं पर पूजन गुरु प्रसाद स्वामी महाराज और वैसे हमने 5 से 6 प्रसाद रखा था बट अगेन विल मेक व एवर ऑल्टरेशन जो होगा 6 से साढे 6 बजे फिलहाल 1 और ड्रामा था अजमेर के भक्तों द्वारा, पतित पावन गौरहरी के ऊपर और उसके बाद में अगर गौरारदीवर्षिप नहीं तो हम कीर्तन करके और 7 से साढे 8 बजे शाम को क्लास थी परमपुजनभक्तिआश्र वैश्रमहाजकेऊपर के द्वारा, ब्रह्मविमोहन लीला के ऊपर तो कल का शिड्यूल है अभी प्रसाधन के हिसाब से जो भी थोड़ा बहुत चेंज वगैरह होगा वो हम आगे कम्यूनिकेट कर देंगे या कल मॉर्निंग का सेड्यूल तो ऐसे रहेगा तो उस समय हम कम्युनिकेट कर देंगे हरे कृष्णा और अभी आप सब भक्तों के लिए प्रसाद है तो माता जी लोगों के लिए प्रसाधन, जहाँ पर सुबह में प्रसाद था वहाँ है प्रभु जी लोगों के लिए जो प्रसाद की व्यवस्था होगी वो इसी पंडाल में होगी तो थोड़ा सा आपको जो है व्यवस्था का ध्यान रखना पड़ेगा अभी हमारे भक्त लोग व्यवस्था कर रहे हैं माताजी लोग प्रोसिड कर सकते हैं तब तक कुछ बक कुर्सियां हटाने की जो है 1 के अंदर 1 रखे ताकि सुव्यवस्था कर सके, हरे कृष्ण पुष्कर यात्रा की जाए, शीला प्रभु पाद की जाए, भनपुजगोपालकृष्ण को स्वामी महाराज की जाए, नेता गो प्रेम, नंद, हरेहरे।
More from PRASAD

Rare Pastimes & Timeless Lessons of Guru Mahārāja | Stories Every Disciple Should Hear

ISKCON Legends- pure devotees meet-HH Jayapataka Swami, HH Gopal Krishna Goswami, HH Radhanath Swami

Jagannātha Ratha-yātrā Through Śrīla Prabhupāda's Mercy | 29 April 2006 | Nairobi, Kenya

Lord Jagannātha's Appearance Pastime | 21.07.2019 | ISKCON Calgary | Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

The Ācārya Teaches by His Own ExampleGuṇḍicā Mārjana by Guru Mahārāja #shorts

Guṇḍicā Mārjana – Lord Jagannātha's Pastime | 21.7.2019 | ISKCON Calgary |Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

H.H. Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī Mahārāja - Exemplary Sādhana and Deity Worship # shorts

भगवान की कृपा कैसे प्राप्त होगी ? | 11 Jan 2014 | Punjabi Bagh | Srila Gopal Krishna Goswami

Material Education vs Spiritual Education | Srila Gopal Krishna Goswami #shorts

