आध्यात्मिक प्रगति हेतु समय का सदुपयोग | SB 09.13.01-03 | Delhi | 27 Dec 1998 | Gopal Krishna Goswami

In this Hindi lecture, Gopal Krishna Goswami expounds on the critical importance of using one’s time wisely for spiritual advancement, drawing primarily on Srimad‑Bhagavatam 9.13.01‑03 and related passages from the Gita. He narrates the story of Maharaja Nimi, a king‑spiritual‑being who, despite his royal status, recognized the fleeting nature of material existence and the perils of postponing devotional duties. Through Nimi’s dialogue about a priest’s reluctance to serve until another sacrifice (Indra’s) is completed, the speaker illustrates how attachment to worldly concerns leads to wasted time and missed opportunities for divine service. The lecture repeatedly emphasizes that the body is a source of suffering and fear, using analogies such as a small fish fearing a larger one, birds fearing predators, and humans fearing loss of wealth or security. Goswami warns that life is akin to “Shani” (Saturn) – unpredictable and potentially ending at any moment – and therefore every minute must be devoted to Krishna‑centric activities: chanting, service, and scriptural study. He connects ancient Yuga timelines to contemporary life, urging listeners not to delay spiritual practice under the illusion of abundant time. The talk concludes with practical exhortations: engage in regular bhakti, use the body as an instrument for divine service, avoid procrastination, and inspire others to make the most of their limited lifespan.
Chapters
ओम नमो भगवते baसuरवaaओमनमो भागवते baसुरवa m m bagtevasudvasre in one, two three tex one to have no purport tex, riton guru in c श्री गोरावेनमहा, श्री चिकनिया मना वेश्म सा पिता मेन भूतले स्वम रूपा कदाबम सदती स्वापदंदिखम बंदे हम, श्री गुरु, श्रीवतापदकमलन, श्री गुरु राइटनवमशत, श्री रोपा सगजता साहागाना लगुना संगतम संस जेवां साद्वेतम सबधुतम परिजना साह काम कृष्णा चेतरिया देवम, श्री राधा कृष्णा पदम सह गन ललिता, श्री विशाखा मितिशा हे कृष्ण करुणा सिंधु धीराबंदूजगपते गोपसा गोपिका कांता राधा कांत, नमो स्तुते सता कंचन गौरांगी राधे वृंदावन एश्वरी रिषबानसुधदेवी मी, हरि वंचाकलपतरव्याशचा, केप सिंहो भय बचा परितनपवनवजनेव्यु न मो न ह ज, श्री कृष्ण चैतन्य। hi krishna renmestlmiदाm vidwan सत गुरू तेरे अध्याय में हम महाराज निमी की वंशावली के विषय में ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। पिछले 3 श्लोकों में आपने इस प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया। महाराज इक्ष्वाकु के पुत्र थे। महाराज ने महाराज इक्ष्वाकु के विषय में आप कहाँ, पढ़ते हो गीता में कौन सा श्लोक है? वो है चौथे दिखाई में कि भगवान ने यह ज्ञान दिया था। सबसे पहले सूर्य के देवता विवासन विवासन हसते ज्ञान पहुँचा महाराज इश्वाकू। और उसी वंश में भगवान रामचन्द्र जी भी आये थे। और महाराज महाराज 1 शाकों का राज्य पृथ्वी पर था, 20 लाख साल पहले, योग के आरंभ में क्यूंकि त्रेतेयुगकचला था लगभग 12 लाख साल, फिर योग 8 लाख साल और कलियुग के 5 साल 5000 साल बीत गए। तो महाराज 1 शौक इस पृथ्वी पर थे, उनका राज्य था आज से लगभग 20 लाख साल पहले, या दुसरे शब्दों में युग के आरंभ में तो यह गीता का ज्ञान इस पृथ्वी पर 20 लाख साल पहले भी प्राप्त हुआ था। तो ये महाराज 1 शाकों के बेटे थे, जिनका नाम था महाराज निमी, तो महाराज निमी। जैसे की इन श्लोकों में आप पढ़ते हो। वो स्वरूप सिद्धि जीव थे, साधारण व्यक्ति में स्वरूप सिद्धि थे, राजा थे, पर साथ में स्वरूप सिद्धि भी थे। दूसरे शब्दों में ये नहीं हमें सोचना चाहिए की हम राजा या नेता नहीं बन सकते, स्वरूप सिद्धि भी नहीं रह सकते, रह सकते हो। जैसे महाराज ने, महाराज शाको, अमृश, महाराज महाराज जैसे हम राजा थे, पर साथ में स्वरूप सिद्ध जीव भी थे। तो महाराज ने मे उनकी इच्छा थी कि शुभा करने के बाद उन्होंने उनकी इच्छा थी की यज्ञ किया जाए। जिससे उन्होंने निवेदन किया प्रधान किसे उनसे उन्होंने उनसे विशेष को निवेदन किया। क्या इस यज्ञ का प्रधान पुरोहित बने, यज्ञ में प्रधान पुरोहित की भी आवश्यकता है। तो विशिष्ट ने कहा मैं बनने को तैयार हूँ। पर पहले मुझे इंद्र का यग समाप्त करना है। जैसे कई बार आप किसी को ज्यादा काम 2 तो पहले वो काम करता जहाँ ज्यादा थोड़ा लाभ हो। तो महाराज विशेष ने कहा की मुझे पहले इंद्र का यग समाप्त करने 2 उसके बाद मैं आऊँगा आपके के मुख्य प्रोहित बनने के लिए। तो ब्रिसिस महाराज निमी ने सोचा कि मैं इतनी देर रात क्यों देखूं, क्योंकि जिंदगी का तो कुछ भरोसा ही नहीं है। उन्होंने निवेदन किया विष से की मैं ये यज्ञ आप बने। मुख्य प्रोहित इसके ठीक है। आरोप। पहले मुझे इंद्र के यज्ञ समाप्त करने। 2 वहाँ भी मैं मुख्य प्रो के रूप में कार्य कर रहा हूँ। वो कार्य समाप्त करने के बाद मैं आपके यज्ञ में उपस्थित हो जाऊँगा। इंद्र के यहाँ वो मुख्य प्रवित के रूप में जा रहे थे, क्यूँ? क्यूँकि वहाँ उन्हें ज्यादा आर्थिक लाभ प्राप्त हो रहा था? तो इस तीसरे स्लो का नाद क्या है? महाराज निम्मी सुरूपसिधिजीव थे। अतएव उन्होंने सोचा कि ये जीवन शनिक है। वीर तक शेष की प्रतीक्षा न करने करके उन्होंने अन्य पोतों से यज्ञ सम्पन्न कराना शुरू कर दिया। तो ये है इस लोक तात्प्रिय का बड़ा अवश्य उपदेश, क्या कि महाराज निमी ने कहा कि मैं कब से उनकी राह क्यों देखें? ये जो जीवन है, ये तो बिल्कुल शनि है, ये जो जीवन है, ये तो किसी समय भी समाप्त हो सकता है। मैं अभी इतनी रात देखूंगा, यज्ञ नहीं करूंगा, मैं राह देखूंगा कि इन्द्र का यज्ञ समाप्त करके इधर आये मेरे यज्ञ में प्रोहित बनने के लिए। जब तक मेरा जीवन समझो समाप्त हो जाए। तो? तो उन्होंने कहा, मैं विशेष की राह देखने को तैयार नहीं हूँ। ुन्होंने क्या किया उन्होंने यह शुरू कर दिया दूसरे पोतों की सहायता से। और इस लोक के तार परी में प्रपजीचुनकेपंदित जी के कथन की चर्चा करते हैं। श्री राम, कृष्ण विधावामसीकलपता, सा 9 गुना के पंडित जी ने कहा है कि संसार में मनुष्य की आयु किसी भी समय समाप्त हो सकती है। इसलिए हमें इस जीवन का 1 पल का भी दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। आज समाज की समस्या यह है की 1 पैसा बचाने के लिए हम कुछ भी प्रयास कर देंगे। पर समय बचाने के लिए इस समय का सुदुपयोग करने की हम चिंता ही नहीं रखते। तो महाराज निम्मी की बुद्धि देखो वो कह रहे है की नहीं, मै नहीं देखूंगा वो शेष की मुझे ये तुरंत ही शुरू करने। 2 क्यूँ क्यूंकि ये जो जीवन है, ये किसी से भी समाप्त हो सकता है। तो हम सब जो की आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश कर रहे हैं, हमें इस उपदेश्य का लाभ उठाना चाहिए। आखिर हम भागवत रोज क्यों सुनते है? हम भागवत क्यों पढ़ते हैं? हम शास्त्र को क्यों पढ़ते हैं? क्यों सुनते हैं? क्यूँकि शास्त्र की शिक्षा के द्वारा हमें यह ज्ञान मिलता है? क्या कि किस प्रकार ये जीवन शनि है, किस प्रकार हमें हर पल, हर मिनट, हर सेकंड का उपयोग करना चाहिए। भगवान की सेवा में जो महाराज निमित थे उनको ये भौतिक शरीर नहीं चाहिए था। उन्होंने कहा कि यह भौतिक शरीर तो केवल दुखों का कारण बनता है। हम सब सोचते है की भौतिक श्री सुख का साधन बनेगा। पर महाराज निमी ने कहा की मुझे भौतिक श्री नहीं चाहिए। क्यूकी भौतिक श्री कष्टों का कारण बनता है और हरि के हृदय में महाराज निमी कहते है। इसी अध्याय में हरि के हृदय में भय है। जिस प्रकार भागवत में उदाहरण दिया जाता है, मछली का मछली जो तालाब में रहती है, उसे उसको हमेशा चिंता रहती है। क्या कर मुझे दूसरी बड़ी मच्छी खा लेगी। क्या है प्रकृति का नियम? छोटी मच्छी को बड़ी मछली खाती है। तो जो मछली होती है तालाब में, भागवत के अनुसार, उसके हृदय में हमेशा भय रहता है। का मुझे कोई खा लेगा आकर। 1 चिडिया भी आप, अन फेंको, अन के दाने फेंको, चिड़िया वगैरह तुरंत आ जायेंगी, 1 दाना चबाएंगे और फिर आगे पीछे देखेंगे। क्यूँ कंजूसी चिड़िया तो नहीं आ रही, मुझे ये दाना लेने के लिए कोई दूसरी चिड़िया तो नहीं आ रही मुझे खा मानने के लिए। तो महाराज निम्मी ने कहा कि मुझे भौतिक शरीर नहीं चाहिए कि क्योंकि भौतिक शरीर केवल दुख को चाता है और ये भौतिक शरीर हमें सदा भय में लगता है। भय के साथ पछतावा, ये है भौतिक जीवन के 2 नियम 1 तरफ से भय रहता है, दूसरी तरफ ऐसी हम पछताते रहते हैं के क्या पछताते है? अरे ये चीज कल थी, आज नहीं है, आज अगर धंदा ठीक नहीं तो पछताते हैं कल धंदा अच्छा था, आज अगर स्वास खराब है तो हम पछताते है की कल स्वास अच्छा था। तो इसी प्रकार ऐसी भौतिक संसार में हर व्यक्ति के हृदय में भय रहता है और भय के साथ हम पछताते हैं। तो महाराज निमी ने कहा कि मुझे मुझे भौतिक शरीर नहीं चाहिए, मैं 1 पल का भी दुरुपयोग नहीं करना चाहता। जैसे भागवत में मछली का उदाहरण है, छोटी मच्छी को भय रहता है कि बड़ी मच्छी मुझे खा लेगी। इसी प्रकार पशुओं में जिन पशु के पाँव पाँव नहीं है, उनका भय रहता है कि जिनके पाँव है वो उनको खा लेंगे। जिनके 2 पाँव हैं, उनका भाई रहता है कि 4 पाँव वाले हमें खा लेंगे। तो यह है प्रकृति का नियम, जहाँ 1 व्यक्ति दूसरे को केवल कष्ट ही पचाता है। तो महाराज निम्मी ने कहा कि मुझे मुझे भौतिक शरीर नहीं चाहिए किसी हालत में। तो जो महाराज निम्मी ने कहा कि भौतिक जीवन में कष्ट है, भय है और हम पछताते हैं हमेशा इसी विषय के ऊपर। 1 बड़े प्रसिद्ध वैष्णव कवि जिनका नाम है गोविंद दास, उन्होंने 1 बहुत ही सुन्दर रचना भक्तों के लिए लिखी है, जिसमें वो कहते हैं ना जी नन्द नन्दन, न रविंदर, मे हे मेरा बन, तुम भय से भरे हुए हो, हर व्यक्ति के हृदय में भय आप। अपने घर में ताला क्यों मारते हो? क्योंकि ताला नहीं मारोगे, अच्छी तरह चोर जायेगा, मोटर को क्यों ताना मारते हो, सिक्योरिटी का लाम लगते हो, भय रहता है। तो इस भौतिक संसार में भय से भरे हुए हैं। तो गोविंद कहते हैं अगर भय से रहित होना चाहते हो तो किसी न किसी रूप से हमें क्या करना चाहिए, भगवान की शरण स्वीकार करना चाहिए। मनी नंद नंदन चलना, रविंद्र चरण की शरण लो, पा जी के पिता ने उन्हें क्या नाम दिया था पैदाइशी जो भाई नहीं लगता। तो ऐसे कैसे बच्चों के कह सकते हो ही नहीं। हमें किसका भाई नहीं है, जो व्यक्ति कहता है, हमें किसका है, वो भी भय से भरा हुआ है। जैसे अमेरिका इस पृथ्वी पर सबसे पावरफुल देश है, भगवान पर अमेरिका का राष्ट्रपति जब किधर जाता है तो उसके चारों और हजारों सिक्योरिटी के एजेंट रहते हैं उनकी सुरक्षा के लिए। अगर उनको भय नहीं है तो क्यूँ साथ ले जाते हैं, सिक्योरिटी एजेंट है इसलिए साथ ले जाते हैं तो हरी के ह्रदय में भय है। और अगर हम भय से रहित होना चाहते हैं तो जिस प्रकार गोविन्द दास जी कहते हैं, हमें किसी न किसी रूप से महाराज नंदा के पुत्र की शरण स्वीकार करनी चाहिए। तो इस स्लो के तक पड़े में इस विषय पर बल दिया गया है की हमें जिंदगी का कोई भरोसा नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति यह सोचे की जिंदगी बहुत लम्बी है वो मूर्ख है। जो व्यक्ति यह सोचे की जीवन किसी समय भी समाप्त हो सकता है। इसलिए मुझे महाराज निमी के के समान भगवान पर शरणागत होना चाहिए, वो है बुद्धिमान व्यक्ति। महाराज निमी को। तो विशेष ने कहा महाराज निमी ने ऐसे कहा यज्ञ करना है। आप कृपा करके मुख्य परहित बनिए आरोप कहा ठीक है मैं प्रोहित बन जाऊंगा। पर मुझे पहले दूसरा यज्ञ समाप्त करने। 2 पर ने कहा नहीं नहीं, मैं आपके लिए राह देखने को तैयार नहीं हूँ। तो उन्होंने दुसरे प्रोहित का सहयोग लेकर यज्ञ आरंभ कर दिया। तो हम भक्तों को ये विचार, ऐसी ये जीवन शनि है। ये जीवन किसी समय भी समाप्त हो सकता है। भागवत में कथा पढ़ते हैं महाराज खटवंगा की। 1 समय महाराज खटवंगा ने देवताओ को सहयोग दिया था दुष्ट से युद्ध में लड़ने के लिए, जिसके कारण देवताओं की जीत हुई, उन्होंने विजय प्राप्त किया। असुरों के खिलाफ। तो देवता ने कहा महाराज खटंगा आपके भारी है। हम आप के लिए क्या सेवा कर सकते हैं? हमारे जो चाहिए देवताओं के पास जो योग्यता है वह हमारे पास नहीं है। देवता व्यक्ति कभी जीवित कर सकते हैं। तुमने कहा मांगो क्या बनना चाहते हो मजखठवंगानेकहा मुझे ये बताइए कि मेरे जीव और कितना समय बच गया है। तो देवता ने क्या कहा? 1 क्षण बच गया है? बस तुन्ोनेयेविनती की की मुझे कृपा करके इस पृथ्वी पर लौटने। 2 यहाँ की मैं भगवान का स्मरण कर सकू। इस जीवन को समाप्त करते हुए जहाँ यम, यम, वापी स्मरण भगवान, जहाँ व्यक्ति का मन होगा, मृत्य के समय उसी प्रकार का या में स्वीकार करना पड़ेगा। सेवा का चिंतन कर रहे हैं। अगले जीवन में आप भगवान के धाम लौटोगे। यह आपको सेवा का अवसर भक्तों की संगत में प्राप्त होगा। अगर मृत के समय ये सोच रहे हो अरे मुझे इतनी जल्दी छोड़ कर जाना पड़ रहा है। जबरदस्ती अभी तो मैंने अपने पोतों को नहीं देखा। अभी तो मैं यह खूबसूरत घर छोड़ कर जा रहा हूँ। तो आपको उसी घर में वापस जाना मिल जायेगा। जैसे पापाजी ने कहा घर के मालिक के रूप में, नहीं तो इस घर में कोई चीटी कीड़े के रूप में उसी घर में रह रहे हो। पर डर के जैसे कीड़े को, हमे किसी चीटी को हमेशा भाई रहता है। कौन मेरे ऊपर पावर देगा। तो इसलिए शास्त्र का बीड़ा क्या है। या वापिस मरण भवन भवन जिंदगी का इस प्रकार से उपयोग करो की मृत्यु के समय बिना किसी शंका के आप भगवान का चिंतन कर सको। इसलिए प्रापर्टी इस श्लोक के तार परी में कहते है की मनुष्य को इस तरह कर्म करना चाहिए जिससे वो अंत में भगवत धाम जा सके। ये है जीवन की सफलता। जब आप इस प्रकार से जीवन को चलाओ के अंत में आप भगवत धाम लौट सको। अंतिम नारायण स्मृति, यह है शास्त्र का निणय, अंतिम नारायण स्मृति। जीवन को इस प्रकार से चलाओ के अंत में आप भगवान का स्मरण कर सको। 1 पल का भी दुरुपयोग नहीं करे। कई बार हम सोचते है, ठीक है, गंभीरता से धात्मिक स्वीकार करनी चाहिए और 5 साल बाद आरम्भ करेंगे। पापा जी 1 उदाहरण देते थे। 1 समय 1 व्यक्ति उसकी सेवा की रोज जगन पूरी मंडल में पानी पहुंचा देना और जगत पुरी मंदिर में तो सारे विश्व से लोग आते हैं तो हमेशा अक्सर लम्बी लाइन लगी रहती है। जो व्यक्ति रोज सोचता था तो दूसरे लोगों को दर्शन लेने। 2 मैं तो यहाँ रहता हूँ, पुरी में मैं तो कल दर्शन ले लूंगा। तो इस प्रकार वो कल कल करते गया और कई साल बीत गए और भगवान जगना जी का वो दर्शन नहीं ले पाया। दर्शन लेने से पहले क्या हुआ? मृत्य हो गई हो? तो पापा जी ने उदाहरण दिया हमारे भारतीयों के विषय में वो सोचते हैं की कृष्ण भक्ति तो हमारे घर की बात है, कल हम गंभीरता से लेंगे कर लेंगे कर लेंगे वो कल कल आने से पहले जीवन समाप्त हो सकता है। तो इसलिए चने पंडित जी ने क्या कहा? 1 पीना या स्वर कोते, उन्होंने कहा चने पंडित जी ने की। 1 क्षण का अगर दुरुपयोग करोगे तो सारे पृथ्वी के धन से उसको वापस नहीं ला सकते। जैसे की इस समय हमारे मंदिर की घड़ियों के अनुसार 9 बजकर 1 मिनट हुआ है। जल्दी स्टैंड टाइम आज कौन सी तारीख है। 27 दिसम्बर नाइनटीन नाइनटी एट अभी 5 मिनट बाद आपको, हम कहें 5 मिनट क्यूँ अभी 1 मिनट बाद कहें फिर से 9 बजकर 1 मिनट पैदा कर। 2 सताईस दिसम्बर। हम आपको 10 करोड़ रूपए देते है। आप कर सकोगे को अच्छे से अच्छा वकील भी नहीं, कोई नहीं कर सकेगा, आप वापस ला सके। जो समय बीत गया उसको वापस नहीं ला सकते। तो यही कहते है, कहते है की सारे पृथ्वी के सोने को आप इकट्ठा कर। 2 सारे पृथ्वी की चांदी को इकट्ठा कर। 2 सारे पृथ्वी की संपति को साथ में जोड़। 2 और आप कहो की वो मुझे 1 मिनट बीत गया है, वो मुझे वापस कर। 2 वो वापस नहीं आएगा इस योग करना चाहिए, दुरुपयोग नहीं। जिस गंभीरता से माल मिनी ने यज्ञ आरम्भ किया, उसी गंभीरता से हम सब भक्तों को भी भक्ति में जुड़े रहना चाहिए। भक्ति में जुड़े रहने का क्या अर्थ? भक्ति में जुड़े रहने का अर्थ यह है कि आवश्यकता से अधिक हम किसी से बात भी नहीं करे। दूसरे शब्दों में, हम तो जल पर ऐसी बिल्कुल जी रहे। ग्राम कथा वगैरह से दूर है। क्यूँ? तो जलता का अर्थ है वो संदेश का। उसका भगवान से कुछ सम्बन्ध नहीं है। जिसका भगवान से कुछ सम्बन्ध नहीं है, उसमें हमारी क्या रूचि हो? स्वामी जी नौकरी करते, धंदा कर दे। तो हमें तो बहुत देशों की चर्चा करनी पड़ती है, पर आवश्यकता से अधिक नहीं है। और खास कर के जो ब्रह्माचारी वगैरह है, जो मंडल की सेवा में जुड़े हैं, उन से बहुत हाई से बचने का प्रयास करना चाहिए। क्यूँ की माया का क्या क्या कार्य है? माया का यह कार्य है की जैसे ही वो देखेगी, क्या आप सावधान नहीं हो, वो आप को फसा लेंगे। जैसे युद्ध के समय सबको सावधान रहना पड़ता है। कहीं शत्रु के हवाई जाज रात को तो नहीं आ जायेंगे। बॉम्ब किराने व भाई रहते हैं। न? तो सब साफ किसी न किसी को चौकीदारी में लगते हैं। सरकार अपना रेडर भी लगती है। कई शत्रु के हवाई जा नहीं आ जायेंगे। उसी प्रकार हमें भी भक्ति के मार्ग में सावधान रहना चाहिए। सावधान इस दृष्टि से की जैसे ही हम थोड़ी भी लापरवाही प्रकट करेंगे, मा एकदम हमें पकड़ लेगी, माया कैसे पकड़ेगी आपको। ये विचार दिलाएगी क्या ठीक है? इतनी क्या जल्दी है भगवान के शरण होने के लिए। अभी तो तुम जवान हो। जवान का क्या है। अब तो इन का समय है। और भक्ति का समय कब है? मे से थोड़े दिन पहले, थोड़े घंटे पहले थोड़े, जब तक तुम हमारे लिए हो, जब तुम बिल्कुल बेकार हो जाओगे, घुमे लगे आधे। अंदर जब तुम संतों के पास जाना। हम लोग ऐसे ही सोचते हैं। जब कोई व्यक्ति में कम हो जाता तो रख लो अपने मंदिर में, जो हमारा सहयोग दे, सके में साथ दे। सके न नहाने से अपने पास रखना चाहते है। तो ये है साधारण भौतिक जीवन का भाव। तो महाराज हम कह रहे है की मुझे भौतिक शरीर नहीं चाहिए की भौतिक शरीर के दुःख, पचायेगा, पचायेगा और पछतावा सा पछताते रहते है। मुझे क्या चाहिए? मुझे चाहिए आध्यात्मिक शरीर, ये आज तो हम सब के पास भौतिक शरीर है। भौतिक शरीर को भगवान की सेवा में उपयोग करो। तो भौतिक शरीर रहते हुए भी आप आध्यात्मिक वातावरण अनुभव करोगे। क्या जी 1 उदाहरण देते हैं। जैसे 1 चुआ चुआ बिजली बिल्ली से डरता है, जब चुआ बिल्ली को देखता है, बिल्ली के मूह को, तो क्या सोचता है अब खतम। और यह बिल्ली का छोटा बच्चा किन किन हिंदी में बोलते हैं, देखते हैं क्या? बिल्ली को उससे क्या होता है? ये तो मेरी माँ है। ये मुझे उठाएगी। अपने दातों में तो वो घबराती नहीं, वो तो खुश होती है। तो इसी प्रकार जो भक्त है, वो उस भौतिक जगह का उपयोग करता है। भगवान की सेवा में जुड़ने के लिए, शरीर का उपयोग करता है, भगवान की सेवा में जुड़ने के लिए, तो उसका भाई नहीं रहता। और जो भौतिक वादी है, जो शिक्षा का लाभ नहीं उठाते, उनके, उन्हें भौतिक समाज से डर लगता है। उन्होंने। ये अज्ञानता के कारण ये नहीं पता रहता किस रूप से इस भौतिक समाज का उपयोग करना चाहिए। भक्तों का ये बुद्धि यह बुद्धि है कि हर वस्तु, हर सम्बन्ध, हर स्थिति का उपयोग करना चाहिए। भगवान की सेवा में और को स्वामी जी कहते है। यह हरे से गया। जो व्यक्ति इस भौतिक शिविर का भगवान की सेवा में उपयोग करता है वो उस भौतिक संसार में रहते हुए यह सोचता है की भगवान के धाम चलेगा। जो व्यक्ति अपने शरीर को सदा भगवान की सेवा में उपयोग करता है तो भौतिक संस्थान में रहते हुए उसे बिल्कुल चिंता। नहीं रहती। तो महाराज भीम का हमें उदाहरण का लाभ उठाना चाहिए और जिसका ये की हमें 1 पर कभी उपयोग नहीं करना चाहिए। खास कर के जो भारतीय समय में रहते हैं। सुबह के वक् त हमें मंगल की जॉब करना चाहिए, क्लास में आना चाहिए धन के भगत हमें सेवा में जोड़ना चाहिए। और देखिये भगवान की असीम कृपा प्राप् की कृपा कितनी है की सेवा करने का कितना मौका है हमारे पास। जैसे की रोज हजारो लोग आते है मंदिर में भगवान का दर्शन देने का, जिसका क्या हज़ारों लोग आपके घर में आ रहे हैं उनको जाकर नमस्ते बोलो हरे कृष्ण बोलो के संग 2 अपनी तो इतने खुश हो जाते है की आपको इसके द्वारा 4 करने का और भी मौका मिलता है। जब दिल्ली में थे आपने पढ़ा होगा दिल्ली में थे में जाते थे किताब बाटने के लिए, पापा जी कॉफी क्लब में जाते थे प्रचार करने के लिए, वो लोगो को ढूंढ रहे थे किसको में प्रचार कर सकूँ। तो यहाँ तो अभी आपको ढूंढने की जरूरत नहीं, खुली लोग आ रहे हैं भगवान का दर्शन लेने के लिए और आप से कुछ का उद्देश्य अपनी संगत प्राप्त करने के लिए। ये नहीं कि केवल सुबह और शाम लेक्चर होता है तो बाकी समय में प्रचार नहीं करने देते। सारा दिन से दोपहर को भी जब भगवान का दर्शन बंद होता है तो लोग नीचे बैठे होते हैं, दर्शन की राह देख रहे होते हैं। अगर आप जाकर लोगो ऐसे हर कृष्ण बोल कर प्रचार करना शुरू करो। इतना खुश होते हैं? नहीं नहीं उनको दर्शन का समय है तो दर्शन तो लेंगे और आपको जो प्रचार का मौका भगवान दे रहे है उसका अगर आप पूरा लाभ उठाओ। तो इसका क्या परिणाम होगा? हम भी भक्ति में आगे बढ़ेंगे और दूसरे भी बढ़ेंगे। और यहाँ का जो बात है क्या बनेगा? जैसे की के विषय में क्या कहा हवन पृथ्वी पर स्वर। तो हमें इस पूरे हरे कृष्णा का वातावरण कैसे रखना है? पृथ्वी पर स्वर जैसे व्यक्ति अंदर आता है जाने तक बिल्कुल स्वर्ग का वातावरण वकुनचाकावातावरण वाका का, वातावरण का क्या अर्थ है की हर समय हम कृष्ण का स्मरण करें और दूसरों को कृष्ण का स्मरण करने में सहयोग दे। तो इस प्रकार हम अपने जीवन का सदुपयोग करेंगे, दूसरों को ये प्रेरणा देंगे की वो भी अपने जीवन का सदुपयोग करे। तो आप भक्तों से यह छोटी सी विनती है की जब आपके पास समय हो कमरे में बैठने की जगह बाहर आ जाओ प्रचार के मैदान में और प्रचार के मैदान में हमेशा कोई न कोई सर्जन रहता है जिसको आप प्रचार करके अपनी संगत दे सकते है। मैंने खुद देखा है जब भी मैं यहाँ से गुज़र रहा होता है, इतने लोग मिलते हर 1 बोल कर बात करना शुरू करो। इतने खुश हो जाते हैं, इतने खुश होते हैं की हम यहाँ मंदिर में आये और किसी ने हमारी परवाह की इतने खुश जारिया मंडल में आये, किसी ने हमें से पूछा कैसे हो? तो आप अगर इस मंडल का पूरा लाभ उठाओ तो अपने जीवन में भी परिवर्तन होगा, धात्मिक दूसरों को भी आप प्रेरणा दे पाओगे जिस के द्वारा वह अपने जीवन को सुधार सके। तो इस श्लोक के संक्षेप में वह आज दिन के विषय में कहा गया है के महाराज ने आज इसको के पुत्र थे, सब सिद्धि जीव थे और उनकी इच्छा थी की 1 तो हो उन्होंने इस लोक में जीवन के विषय में क्या कहा हूँ ये 1 सनक है जो भौतिक वादी है उनको ये सुनना अच्छा नहीं लगता। जब वो ये सुनते है तो कहते है कृष्ण मंद नहीं जाना है, वो तो डरा देते हैं, हमें डरा देते है की ये जीवन शनि हम तो ये सोचना चाहते के जीवन चलेगा 80 90 साल तक तो बौधिकवादीडरजाते है। जैसे की भागवत के पांचवे कंद में नरकों का वर्णन है ये लिखा गया है 24 प्रकार के लोग हैं अलग अलग अलग अलग पड़े पाप, अलग अलग पाप के कार्य का अलग अलग परिणाम भुगतना पड़ता है। जब अमेरिका में हमारे भागते 5 सि बात रहे थे एयरपोर्ट में जब लोग पढ़ते थे हेलिशलाइनेंट थोड़ा पड़, एअरपोर्ट में फेंक दे छोड़ दे क्यूँकि उनको इतना भारी लग गया था ये पड़ कर की शायद हमें नरक में जाना पड़ेगा इस पाप के कार्य के ले तो ये है समाज की स्थिति। अगर आप किसी को बोले न की इस प्रकार के दोष का ये परिणाम होगा तो वो आपको फिर मिलने नहीं आयेंगे सच पर है क्यूंकि वो असलियत को कोई सुनना नहीं चाहता। सब यही सुनना चाहते हैं कि ये जीवन इंडिया के लिए है और मिलने के बाद सब सरक जा रहे है। 12 में देखते हो ही लव फॉर बोर्ड हर 1 के विषय में क्या सर चले गए। अरे सर जाने के लिए जरा मेहनत करना पड़ेगा। फिर आपको सोरा की टिकट मिलेगी। भगवान के शिक्षा के आधार पर चलेंगे तो हमें महाराज बीमी का उदाहरण देकर। हमें भी गंभीरता के साथ भक्ति करनी चाहिए। हरे कृष्ण ये नाम रा बाले रे।
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