अपनी सामर्थ्य का उपयोग करे भगवान की सेवा में | SB 1.15.5 | Delhi | 1994 Feb 17 | Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī

Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī explains that all talents—wealth, beauty, intelligence, strength—come from God and must serve Him. He warns that divine grace withdraws from those who misuse their gifts, and offers daily chanting and mind control as the path to spiritual fulfillment.
Chapters
ओम नमो भगवते, बासु देवाय, ओम नमो भगवते, बासु देवा, म नमो भागवते, वासु देवाया, श्री भागवत, फर्स्ट मारा ना देव सेवा विस्मा। वो। इस ध्यान के इन श्लोखों में हम क्या देख रहे हैं कि अब जल है। बहुत शौक में, वो भगवान से 1 शंकलेंभीजुदानहीं रहना चाहते थे। तो इन श्लोकों में हम देखते हैं कि अर्जुन के किले में बहुत शौक है, वो बहुत दुखी हो रहे हैं। इस कारण के भगवान इस जगह को छोडकर अपने देवी धाम में लौट गए है। शो इस लोक में अर्जुन बताते हैं कि भगवान ने अपने धनिष्ट मित्र के रूप में स्वीकार किया था, जो अर्जुन का सम्बंध था, भगवान से ह बड़ा प्रिय सम्बन्ध था। और जैसे भगवान गीता में, हे अर्जुन, तुम सारे विषय को ये बताओ तो मेरा जो भक्त है उसकी मैं हमेशा रक्षा करता हूँ। और इस श्लोक में लोक में अर्जुन स्वीकार करते हैं कि जो शक्ति भी उनके पास थी, इस पर कार्यक्रम, जो देवता की चक्की करने वाला था, ये जो प्राप्त हुआ वो भगवान के द्वारा ही प्राप्त हुआ था। तो भगवान अर्जुन से कहते हैं कि मेरे भक्त ये सारे विश्व को बताओ कि मेरा उसकी रक्षा हमेशा ही करता हूँ। और पर्यमेवुपाजी ये बताते है की जो भी योग्यता, जो भी शक्ति व्यक्ति में प्राप्त होती है, वो शक्ति और ऐशवरया का सुदुपयोग कब होता है? जहाँ से भगवान की सेवा में बनाते है? तो भगवान के जो भक्त हैं, वो ये स्वीकार करते हैं कि जो ऐश्वर्य, जो खबसूरती, जो शक्ति, जो बुद्धि, जो गुन उनके पास है, यह भगवान के द्वारा प्राप्त हुआ है। इसीलिए उसका सदुपयोग यह है कि उसे हम भगवान की सेवा में उपयोग करे। पर आज हम समाज में क्या देखते हैं? आज समाज में यह देखते हैं कि जिन व्यक्तियों के पास ऐश है, यह गुण है, यह बडी है, या किसी प्रकार का भी गुण हो, वो ये नहीं सोचते की इसका सदुपयोग होगा, अगर हम इसे भगवान की सेवा में लगाए। वो ये ही सोचते है की ये सब हमने प्राप्त किया है। हमारे परिश्रम के कारण। तो हमें इन सब चीजों का उपयोग करना चाहिए, हमारे भौतिक सुख लिए और जो भक्त है, वो यह समझता है। भोक्ता। तोषण महेश की असल भोक्ता कौन है, वो असल है, पर केवल परम भगवान है। तो भक्त ये जानता है कि जो भी शक्ति है, जो भी गुण है, ये परम भगवान के द्वारा ही आया है। और भगवान जब उपचारित होते हैं, वो अपने नित्य पार्षदों को भी दिव्य शक्ति देते हैं अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए, और जब भी उद्देश्य पूरा हो जाता है। जैसे की कहा गया है उन पार्षदों से भी वो जो शक्ति है, वापस ले लेते हैं। तो प्रहुपजीइसविषय समझाते हैं की जब भगवान अपने पार्षदों से शक्ति वापस ले सकते हैं, तो ये भौतिक समाज के जो जितनी प्रभावशाली शक्तिशाली व्यक्ति हैं, उनसे क्यूँ नहीं ये शक्ति वापस ले सकते है। जैसे की जो कई नास्तिक व्यक्ति हैं, जो बड़े शक्तिशाली है, वो कहते है की अब भगवान में नहीं, विश्वास करते। प्यारी और शक्ति का बड़ा मन रखते है तो उनको भी वृत्ति के सामने झुकना पड़ता है। चाहे किसी भी शक्ति हो, कितने भी डिक्टेटर बन जाए, कितना धनी व्यक्ति बन जाए, रोग पीड़ा के सामने तो सबको झुकना ही पड़ता है। प्रकृति के जो कष्ट हैं उनसे तो कोई बच नहीं सकता कि जैसे आपने सुना होगा की लॉस एंजलिस में बहुत बड़ा आया था, आपने सुना होगा ना केवल 30 सेकंड के लिए और 30 सेकंड में उनका 30 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है 30 बिलियन डॉलर अंदाजा लगा। भारत में जब वो महाराष्ट्र में आया था तो सबने कहा कि यहाँ सरकार के पास हथियार, वगैरह वो सुविधा नहीं थी, ये बताने के लिए जाने वाला है तो अमेरिका में तो सब टेक्नोलॉजी, उनके पास टेक्नोलॉजी की तो किसी की कमी हुई है, ऐसी टेक्नोलॉजी है की अगर आप दिल्ली में प्लेस मोटर चला रहे तो उनको वॉशिंटन में पता लग जायेगा की मोटर कर प्लेट के अंदाजा भी लगा सकते है, उनके टेक्नोलॉजी है जो टेकनोलॉजी होने के कारण भी और 30 सेकंड में 30 मिलियन डॉलर का नुकसान हो गया, क्या हमने उदहारण में दिया था ये बताने के लिए, उनके पास ऐश्वर्य है, शक्ति है, प्रकृति के सामने सब को झुकना ही पड़ता है। तो इसलिए जो व्यक्ति है वो ये समझते है क्या ये जो शक्ति है, ये जो ऐश्वर्य है, ये परम भगवान से आ रहा है तो इसलिए हमें इसका उपयोग भी करना चाहिए किस लिए भगवान की सेवा परे कहते है ये भगवान को सब याद रहता है उनमें किसी प्रकार का दोष नहीं है। अपून्तानहीं भगवत गीता ने जब अर्जुन ने भगवान से सुना की ये उपदेश उन्होंने विवाह स्वान को दिया था तो अर्जुन ने हमारी पढाई के लिए 1 प्रश्न पूछा, उन्होंने पूछा कि मैं कैसे विश्वास कर सकता हूँ की आप से ये उपदेश सबसे पहले विवाह स्वान को दिया था। जब उनकी आयु से अधिक है तो भगवान ने उत्तर में कहा कि बहुत बहुत बार सबने मैने दोनो ने जन्म लिया है और मैं सब को याद कर सकता हूँ और तुम उसे याद नहीं कर सकते। तो हमें यह भूलना की साधारण प्राणी मात्र में, भगवान में, साधारण सी मात्र में 4 प्रकार के दोष है इस कारण पिछले जन्म की तो बात छोड़ो हम आपसे पूछे की 1 हफ्ते पहले क्या कर लेते समय शहरी आप ठीक रूप से उतर दे पाओगे क्योंकि साधारण पानी मात्र में 4 प्रकार के दोष है, चलने की इच्छा है वो गलती कर, पाई इंद्रिया को बम में रहता है तो इस कारण उसके पास जो भी ज्ञान है बुरा रहता है पर परम भगवान के द्वारा ही हम ज्ञान को प्राप्त कर सकते है। तो अर्जुन जो थे भगवान के बहुत भक्त थे, भगवान के जो भक्त हैं वो 1 क्षण के लिए भी भगवान से जुदा नहीं रहना चाहते जिस प्रकार उदाहरण दिया जाता है मछली जल के बाहर 1 क्षण के लिए नहीं रहना चाहती तो भगवान के जो भक्त हैं वो बिल्कुल भगवान से जुदा नहीं रहना चाहते। तो अर्जुन को इसलिए शोक हो रहा था, दुख हो रहा था क्या की भगवान अपने धाम में चले गए हैं, अभी हम उनके बिना कैसे रहेंगे क्यूँकि भगवान के भक्त सदा भगवान के साथ ही रहना चाहते हैं? तो आप यह प्रश्न पूछ सकते हो की वो क्या करे? वह भगवान की में प्राप्त हो रही है कि अर्जुन को प्राप्त हुई थी। तो देखोगे इस भाग में आगे की अर्जुन ने बाद में भगवत गीता के उपदेश का स्मारक आरम्भ किया और जब उन्होंने भगवत गीता का जो देश भगवान ने दिया था का स्मरण आरम्भ किया तो उनको जो शो था, जो था वो हस्ते हस्ते चले गए। और फिर से वो। तो क्यूंकि भगवान के दिव्य नामों में उनमें कुछ अंतर नहीं है। भगवान की शिक्षा में उनमें कुछ अंतर नहीं है। जब हम उनके दिल नाम का उद्घाटन करते हैं या उनकी शिक्षा का स्मरण करते हैं, तो हम फिर से भगवान की संगत को अनुभव कर सकते हैं। जिस प्रकार राज्य ने भगवान की संगत का को अनुभव किया। इसलिए कहा गया है अगर गीता के अनेक लोगों के द्वारा की अध्यात्मिक जीवन में सबका प्राप्त करने के लिए। यह बहुत ही महत्वपूर्ण है की हम अपने मन को जीतने का प्रयास करें। अगर हमने मन को वश में नहीं, अगर हम मन को नहीं जीत पाये तो अगर हम सारे विश्व को भी प्राप्त कर ले और मन को नहीं जीते। हमने कुछ भी प्राप्त नहीं किया। इसलिए कहा गया है मन मन बाबा मत तो मध्याजी मन के द्वारा मेरा प्रधान को मेरा पालन करो, मन को दी। तो भगवान छठे अध्याय में कहते हैं कि जिसने मन को जीत लिया वो शांत रहेगा और जिसने मन को नहीं जीता वो सारे विश्व की धन की प्राप्त कर ले और कभी शांत नही हो। जैसे की है 1 समय जब जी 1 तो बड़े बहुत बड़े संस्कृत के विद्वान थे और नीम के पेड़ के नीचे उनका हुआ था तो उनकी माता ने दिया था और वो पंडित थे क्यूँ के बहुत ही विद्वान थे जितने भारत में, उस समय संस्कृत के विधान से सबको उन्होंने हरा दिया था 1 बहुत बड़ा विधान था कश्मीर पर कश्मीर का, उसे भी हरा दिया था तो सब उनको बहुत आदर देते थे चेतन जी सबको भक्तों को संस्कृत पढ़ाते थे जैसे की आज कल सब अमेरिका में पढ़ने जाना चाहते हैं बिल कॉलेज में सब तरफ से थे, महाप्रभु जी से संस्कृत सीखने और उनका नाम था सन्यास, तो वो सबको संस्कृत बनाकर भेजते थे तो नंबर में 1 था जिनका नाम था खोला वेट श्रीला बहुत गरीब था, उसकी धोती भी 1 धोती थी उनके पास 1 धोती में 12 छे और वो रहते थे। 1 झोपड़ी के मकान में जिसकी छिनी थी अंदाजा लगा लो, उनका क्या काम था केले के पत्तों से दाल बनाते थे जो लोग खरीदते थे गंगा नदी की उपासना के लिए और उसके जो छोटी सी आमदन का जो आधा हिस्सा होता था वो खड़जे थे गंगा नदी की उपासना में चले भाई पंडित का, उनसे 1 खास न था दमा पंदित रोज उनके घर जाते थे और उनसे के प्यारे ये जो प्यारे बनाकर मुफ्त में ले लेते थे और ये जो शरीर थे वो सारी रात भगवान का केतन करते थे और अपने कमरे में नाचते थे। तो उनके जो पडोसी वगैरह थे के दुश्मन बन गए थे और वो बहुत गरीब थे, कई बार छेड़ते थे, कहते थे देखो तुम भक्ति तुम इतने गरीब हो और तुम्हारे पड़ोसी जब दुर्गा की पूजा करते हैं वो कितने धनी है। तो तुम भी दुर्गा की पूजा क्यूँ नहीं करते। तो वो कहते थे उनको छेड़ते थे तो निमाई फंदे बार बार खोले श्रीजा के जाते थे तो बोले के गरीब ना कहते थे तुम गरीब नहीं हो, तुम बहुत ही धनी हो और तुम्हारा धन जो है वो छुपा हुआ है तुम्हारे धन को सारे विश्व में बताऊँगा कि तुम कितने धनी हो के बाद भौतिक धन तो नहीं था, वो बिल्कुल सर थे, उनके पड़ोसी त्यारी थे, वो तो के बाद 1 ही होती थी, उसमें छत में 1 ही पुराना बढ़ता था, 1 दिन चेतन कीर्तन कर रहे थे भक्तों के साथ, 2 दिन में राजा थे तो राजा से जब परदे ने अपना आरम्भ किया जो लोग जिन मुसलमानों ने जाकर शिकायत की तुम रोक को जल्दी से नहीं रोकोगे तो कृष्णा के बन जायेंगे ने शिकायत की, उन्होंने कहा की हम भी फंस गए है इसमें कृष्णा इसमे क्या आकर्षण है हम खुद नहीं सुन सकते जल्दी बंद करवा। तो जब मुसलमान राजा ने रोकने का प्रयास करे तो नाक और भी ऐसी 1 दिन बहुत किया था माइक तो उन्हें प्यास लगी तो पानी पीने और किधर और वो ही जो 1 टूटा हुआ पर था उनके घर में, उसी बर्तन से उन्होंने पानी पिया जब खोला वे को पता लगा की निमाई पंडित ने इस प्यारे से पानी पिया है, उनको बोलती तो खैर निमाई हमेशा कहते थे खोलो तुम्हारे पास तो जो धन है किसी के पास नहीं है। तो 1 दिन निमाई पांडे बड़े विद्वान थे प्रेत, उस समय किसी को पता नहीं था कि भगवान के होता है। तो 1 दिन श्रीवास ठाकुर के घर में जब परदे ने अपने दिव्य रूप को प्रकट किया। 4 हरिदास ठाकुर और खोलवेश्रीलाखोलवे श्री का इतना से था उन्होंने अपने बच्चों को बोला जाओ तो किसी को तो उनका का पता भी नही पता था, ये पता था की वो 24 घंटे निरंतर हरी का नाम करते रहते हैं तो उनके साथी ढूंढने गए से हर घर के सामने जाकर कौन हरी का नाम कर रहा है तो उन्होंने खुद ही भूल कर लिया है। तो निमाई पंडित ने अपने दिव्य रूप को प्रकट किया और उन्होंने अपने सब भक्तों से पूछा बोलो तुम्हें क्या क्या वरदान चाहिए? तो पहले तो उन्होंने अधवेताचारियसीपूछा तुम्हें क्या वरदान चाहिए। 4 ने कहा की आप यह हरी नाम का वितरण कीजिये, सब की भलाई के लिए क्यूँकि छारिया की उपासना के कारण ही पर भगवान बाद में असारित हुए चेतन माती के रूप में। तो न्होंने कहा कि हरी नाम का वितरण करो हर जगह केवल उनको नहीं देना, हरीराम जलन है प। तो फिर वो उन्होंने पूछा तो वे श्रीराज से तुम्हें क्या बर्दाश चाहिए? तुम्हें 8 प्रकार की चितियां चाहिए, या हैं? जिनके द्वारा किसी पर भी बग कर सकते हो। यहाँ बैठे बैठे अपना हाथ खड़ा कर किधर से भी पैसा उठा सकते हो, कुछ भी कर सकते हो। 8 प्रकार की स्थिति है। उन्हें कहा की तुम्हे तुम्हे शिष्य वगैरह चाहिए, नहीं चाहिए, क्या चाहिए बोलो क्या वरदान चाहिए? पूछा, तुम्हे क्या वरदान चाहिए? योगी सिधिया चाहिए, मेरे समान ऐश्वर्य चाहिए, धनी सिर चाहिए, क्या चाहिए बोलो मैं देने को क्या क्या की अगर आप मुझे वरदान देना चाहते हो तो यह वरदान 2 कि मैं हमेशा भक्तों के शासन में रह कर आप का गुणगान कर सके और हर चैनल में मुझे आपका साथ मिले निमाई पंडे के रूप में। हालांकि निमाई पंडित जाकर। उनको सताते थे, छेड़ते थे, करते थे, उनसे भी छीन लेते थे। गरीब रोज कहा से दू मुफ्त में, तो मुझे क्यों छोड़। 2 उन्होंने मुझे यह वरदान चाहिए की मुझे हमेशा आपके संग प्राप्त हो। हर जनम में तो ये उदाहरण सुना है। तो ये उदाहरण हमने इसलिए दिया ये बताने के लिए कि जो व्यक्ति भगवान के शरणागत हो जाए, जो भगवान के देव दानों को अपना ले, वो इतने संतुष्ट हो जाते हैं कि जब उन्हें ये वरदान दिया जाए की क्या सुविधा चाहिए, किस प्रकार के ऐश्वर्य चाहिए वो भी नहीं मानते। अब समझे जैसे की भगवत में। 1 और कथा है महाज की, महाज के ने उन्हें अपने पिता की गोद में बैठे तो छोटे छड़के बच्चे थे, वो जंगल में गए। मधुबन जंगल में भगवान को खोजने के लिए कहा था। मैं तो तुम्हारा सहयोग नहीं दे सकती, पर सुना जाता है भगवान दे सकते हो। भगवान को कहा प्राप्त करेंगे सुना जाता है। तो जैसे वो निकाल रहे थे, मुनि जी वहाँ पहुँच गए। ना। मुनिजी ने उनकी परीक्षा लेने की इच्छा की तो उन्होंने कहा पहले अरे भाई, तुम्हारी सदरी तुम्हारे से खेल रही थी, तुम तो बच्चे हो भगवान को ढुंढने कहा जा है। छोटी उम्र में जाओ खेलो ने। हा अगर आप मेरा सहयोग दे सकते हो। भगवान को खोजने में ऐसी बात न जाने। 2 ना बनी ने देखा ये गंभीर है, भगवान को खोजने में दिया, क्या हम नंबर देवा का मंत्र की संचालन करो, भगवान का रूप बनाओ, मिट्टी और जल के जल को जगह में भगवान के रूप बनाया का चालन किया। भगवान का। भगवान भगवान की बहुत प्रसन्न हो गए थे। 2 ने उनसे पूछा की ये बताओ क्या होता चाहिए? तुम्हे ने कहा कि ना। तो इतना बोल को के पहले मैं टूटी को खोज रहा था, आपका मजा असली हीरा प्राप्त हो गया है। तो भगवान के जो भक्त है वो इतने संतुष्ट, इतनी संतुष्ट महसूस करते हैं दिव्य नाम के उच्चारन के द्वारा, भक्ति के द्वारा। क्योंकि हृदय में यही भावना रहती है की किसी न किसी प्रकार से सदा भगवान का स्मरन कर सके, भगवान के दिव्य नाम का उच्चारण कर सके। इसलिए नाजी नवधा भक्ति का ज्ञान हमें देते है नवधा भक्ति का ज्ञान देते। वह सबसे पहले क्या कहते हैं हमें इस प्रकार से इस जीवन को चलाना चाहिए की आप भगवान के दिविदानोकाशरणकितन भी कर सके और अर्जुन भगवान को छोड़कर। अपने दिवेधामेलौदे विद्यार्थी। उन्होंने भगवान की शिक्षा का स्मरण आरम्भ किया। उन्हें वही महसूस हुई जब भगवान के साथ, तो अगर हम श्रम किन करेंगे सावधानी के साथ तो हम भगवान को विष्ट कर पाएंगे, नहीं तो ये मन भटकते रहता है अनेक भौतिक विषय में, इस मन में, ये मन में अनेक प्रकार के भौतिक विचार रहते हैं। आज जितना प्राप्त हो गया है कल इतना प्राप्त होना चाहिए? आज इसने हमारा अपमान किया है तो हम इसका अपमान करना है। हमें इरादा ठीक रूप से नहीं मिला। तो मन में तो अनेक भौतिक विचार है। त भगत में तो हृदय है। 1 फोटो एलबम के समान है। जैसे आपके घरों में एल्बम रखते हो तस्वीर है बचपन की और रिश्तेदारो के वगैरह तो उसी प्रकार हृदय में करोड़ो तस्वीरें हैं। फोटो एल्बम में 50 सौ दे दे का पर आपकी हृदय की फोटो है तो लाखों लाख लाख को तस्वीरें रोज बढ़ती ही जाती है। और इस जीवन की तस्वीरें ही नहीं तो पूर्व जन्म के भी विचार रहते है। तो इसलिए वो मन में आते हैं। तो मन को हमें बनाना चाहिए। भगवान के जिला उपदेश आदेश शुरू इन सबका स्माल करके फिर हमारा मन प्रयास करेंगे जीत पाएंगे। कई बार सुना जाता है कि मानपुर जीतना बहुत ही कठिन है के मन को वश मनाना बहुत ही कठिन है। मानपुर जीतना बहुत ही कठिन है कठिन है जरुर ने क्या कहा न चलाए ये तो इतना है की वायु को वर्ष में ला सकते हैं। उससे भी ज्यादा अगर किसी अर्जुन ने कहा ये तो मन तो उससे भी ज्यादा कठिन है। तो आप कहोगे अर्जुन के ही कठिन है? तो हमारे जैसे कुछ का क्या क्या। हम तो भगवान ने कहा प्रयास करोगे तो संभवता प्राप्त करोगे भगवान विभाग गीत में हमें यह उपदेश भी देते हैं की मेरे भक्तों में उनके जो करीबी होगी उसे मैं दूर कर देता हूँ। बस ये बच है की श्रद्धा के साथ उनके श्र्नगतहोतोये हमने इसलिए कहा यह बताने के लिए कि अगर हम प्रयास करेंगे भगवान के शर्नागत होने के लिए, तो अगर हमारी कोई योग्यता नहीं भी हो तो योग्यता से अपने साथ हो जाएगी। भगवान हृदय में विराजमान है पर महात्मा के रूप में। जब वो देखते हैं की ये प्रयास कर रहा है मुझे समझने के लिए, मेरी सेवा करने के लिए, जो जो अज्ञानता है अज्ञानता के क्या लक्षण हम सोचते है के शरीरी हमारा स्वरूप है, हम सोचते है शरीर का उपयोग करना चाहिए। इसलिए भौतिक सुविधा के लिए हम सोचते हैं, ये हमारा है, ये सब अज्ञानता के अलग अलग लक्षण है में इन अज्ञानता के लक्षणों का वर्णन किया गया है। मृत्यु से भय न, ये सोचे पार्टी के स्वामी हो, ये अनेक रूप हैं अज्ञानता के, तो भगवान कहते हैं कि जब मैं देखता हूँ की कोई व्यक्ति प्रयास कर रहा है मुझे समझने के लिए, मेरी सेवा करने के लिए। तो मैं हृदय में जो विराजमान हूँ, उसकी अज्ञानता को दूर कर देता हूँ। ज्ञान के साथ जज की रोशनी अंधेरे पंग को दूर करती तो प्रयास करोगे की द्हात्मिकजीवन को सफल बनाने के लिए। तो भगवान आपको कुछ पूरी टूटिया भी होंगी, कुछ चिंता की बात नहीं है। भगवान आपको योग्यता देंगे, बुद्धि देंगे, जिसके द्वारा सकोगे और जिसके द्वारा आप भक्ति के मार्ग में आगे बढ़ सकोगे। तो भक्ति के मार्ग में का करने के लिए कोई बहुतिक धुप की आवश्यकता नहीं है। यह ववश्यनहीहैकीआपके पास पीएच डी डिग्री होनी चाहिए या आपको धनी होना चाहिए या खूबसूरत होना चाहिए, या किसी और प्रकार का गुण भौतिक गुण होना चाहिए। केवल श्रद्धा की आवश्यकता है। अगर आप खेलने में श्रद्धा रखोगे। और ये श्रद्धा कैसे बढ़ती है साधु सन के साथ, जैसे की आदम में थोड़ी भावना प्रकट होती है, क्या यह भगवान का स्माल करे है? गीता में भगवान क्या कहते हैं सर अपान स्मृति स्मृति का अर्थ है भगवान का स्मरण करना, अपना मतलब भगवान को भूलना तो भगवान का स्वागत करने की योग्यता भी उनसे ही आती है और जो व्यक्ति नाशिक बनते हैं भगवान को भूलते है वो योग्यता भी उनसे ही आती है। तो भगवान जब देखते हैं कि इस व्यक्ति में ये भावना है, श्रद्धा है कि वह किसी प्रकार से जीवन के उद्देश्य को प्राप्त कर सके, तो भगवान ऐसा प्रबंध करते है की वो व्यक्ति भक्तों के सम्बंध में आ जाए। जैसे आप सब अगर सोचने का प्रयास करो कि आपका परिचय कैसे हुआ इस क्रम के भक्तों के द्वारा तो आप ये देखोगे की किसी न किसी समय आपके मन में आध्यात्मिक जागृति आरम्भ हो रही थी तो जैसे आपके हृदय मे जागरूत आरम्भ हो रही थी। भगवान ने ऐसी सुविधा बनाई के हाथ के हाथ में पहुंच गया या किसी को मिले जिसने आपको ये कहा, चलो, दर्शन, चलो, चलो मिलने के लिए ऐसे कुछ भावना थी। तो भगवान ने ऐसी स्थिति बनाई कि आपके हृदय में हस्ते हस्ते भक्तों की संगत प्राप्त हुई और जितना हम भक्तों की संगत का लाभ उठायेंगे उतना ही भक्ति की दुर्भावना है वो ज्यादा पक्की बनेगी, ज्यादा देश बनेगी उतना ही पड़ेगी। तो जो व्यक्ति भगवान का स्मरण करते हैं वो सुविधा भी भगवान के द्वारा प्राप्त होती है और जो भगवान को भूल रहे हैं, भगवान जब देखते है की इस व्यक्ति में बिल्कुल इच्छा नहीं है, उनकी शिक्षा को स्वीकार करने के लिए नातिक बनना चाहता है व्यक्ति फिर कुस प्रकार का वातावरण प्राप्त हो जाता है जिसके द्वारा वो व्यक्ति भगवान का समाधन कर ही नहीं पा है। तो जितने महा प्रभजी सनातन को स्वामी को शिक्षा देते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार 1 हुशियार माली माली जो है अपने बगीचे की देखभाल बड़ी सावधानी के साथ करता है, बीज को लगता है, पर बीज को उगाने के लिए क्या करता है, रोड पानी है तो उसी प्रकार भक्तों की संगत के द्वारा भक्ति का जो बीज है हृदय में, पर ये बीज को उगाना है संघ के द्वारा यह पता लगता कि जीवन का क्या आपको देश होना चाहिए। भगवत प्राप्ति का क्या साधन है। पर केवल उतना ज्ञान प्राप्त करना ही काफी है। जैसे भारत में आपको अनेक व्यक्ति मिलते हैं जिन्होंने पूरे सासों को कंठस् किया है भारत में और वो और गंदी चीजें भी करते हैं। वगैरह तो केवल ज्ञान प्राप्त करना और उसका उपयोग नहीं करना काम नहीं चलेगा। इसलिए कहा गया है शास्त्र के सम्बंध भी सम्बंध। ये 3 बहुत महत्वपूर्ण है। वेदों द्वारा यह पता लगता है क्या से क्या सम्बन्ध है। जैसे की साधारण समाज में माता, पिता, भाई, बहन, पति, बच्चे इन सब से हमारा अलग अलग सम्बन्ध है। हम भगवान से क्या सम्बन्ध है? सोचते है की हमारा भगवान से यह सम्बन्ध है की जो हम इच्छा प्रकट करे भगवान भगवान को न करे। हम अक्सर ही सम्बन्ध है हमारे ऑर्डर सप्लाई जो भी हम कहे वो पूरा हो गे है। जब तक वह पूरा होते जाए हमारी श्रद्धा बढ़ती जाती है। जब जैसी कुल रुकावट हम भूल जाते है की पूर्व जन्म के संस्कार पर आधारित जो सुख लिखा है उससे आपको 1 भूल भी ज्यादा नहीं मिला जो उससे ज्यादा नहीं है। तो हम यही सोचते है की हमारा सम्बन्ध भगवान से यही है कि जो भी हमारे कष्ट है हम उनको सुनाए जा। ज्यादा अच्छा है। नास्तिक व्यक्ति तो किसी सिटी में भी भगवान की शक्ति को नहीं स्वीकार करता। तो कम से कम आप ये तो जानते हो कि अगर कष्ट भी हो तो भगवान के पास ही जाए क्यूँकि? भगवान स्वयं कहते हैं की में क्या 4 प्रकार के व्यक्ति मेरे गत होते हैं। दूसरा जाता है जिज्ञासु और ज्ञान के कारण। तो असली सम्बन्ध क्या है। उसका उपयोग करना शिक्षा है, उसका उपयोग करना। शिक्षा के पास व्यक्ति जानता है। हर व्यक्ति को हर हिंदी, भारत में जानता है। पूछो कितने व्यक्ति इसकी धार है। आप। तो हम कह रहे थे कि जो असली बुद्धिमान व्यक्ति है वो इस ज्ञान का उपयोग भी करता है। केवल ज्ञान रखना नही करने से काम नहीं चलेगा। तो चेतन महाप्रभु जी बता रहे थे कि जो भक्ति भी जो स्थापित हुआ है संगत के द्वारा, अब इस बीज को हमें उगाना चाहिए वो होगे कैसे? जैसे कह रहे थे बीच पर रोज पानी पिलाना पड़ेगा, इस भक्ति के बीच को पानी पिलाना है, रोज रोज पिलाना पड़ेगा जैसे की रोज खाना खाते है तो पानी इस बीच को पानी भी रोड पिलाना पड़ेगा पानी का 2 रोज इसको पानी पिलाना पड़ेगा फिर जो है और फिर ये जो पेड़ है बहुत मीठे फल फलों को पैदा करेगा जैसे की पेड़ से फल भी पैदा होते है। और फिर यह कहा गया है कि जो व्यक्ति भी फलों को काटेगा खाएगा वो जन्म मिलने के बंधन से मुक्त है तो लोगों के हृदय में भर्ती का बीज भी स्थापित हो रहा है। और अगर हम लोग इसे पानी नहीं फलाएंगे तो क्या है ये जो भर्ती की जो थोड़ी भावना भी जागृत हो रही है वो समाप्त हो जाएगी। क्यूंकि जिस भौतिक समाज में हम रहते है। वह तो हमारा यही अभ्यास है कि हर व्यक्ति में भगवान को भुलाना चाहता है। माता पिता, मित्र, वगैरह, वो आपको भगवान का नहीं करवाना चाहते। ये कह देंगे जरूर हम आपको भर्ती से थोड़ी लगते है, मंगलवार को गैर पर भागवत, प्रेम को हृदय में वो नहीं बढ़ाना चाहते। और साथ ही वो ये दावा भी करेंगे की हम हमारे चिंतक है। तुम जानते है हमने तुम्हे जो हम कहें, वैसे तो इसलिए ठाकुर प्रा में कहते है की चेतना महाप्रभु जी ही आपके शुभ चंदन के और कोई नहीं है, प्रभु जी, तुम्हारे कोई नहीं है। स जरूर करेंगे भाई जानते हैं केवल भगवान के शुद्ध भक्त, वो ही हैं। आपके शुभचिंतक। इसलिए कई परपानी ने कहा कि कृष्ण भाव भावित होने का क्या अर्थ है? यह स्वीकार करना 1 और भगवान हरचीज के स्वामी है, वो हर चीज के भोग है, वो ही हमारे शुभचिंतक हैं। जब आप ये समझ जाओ की वो ही हमारे स्टिप्टेंतकहै, फिर आप उनकी शिक्षा को बिना शंका के स्वीकार करोगे। जैसे की छोटा बच्चा, वो जानता है कि माता पिता उसके सिस्टर चीज करने से पहले पूछता ये मैं करूँ, यह करूँ, यह करूँ, कहते हैं करो, फिर वो करे, ओके नहीं करते। तो ये विश्वास हृदय में स्थापित होना चाहिए। क्या कि उनके प्रति मेरी वो ही हमारे वो ही है। क्या हमारे आध्यात्मिक भलाई के ल तो भक्ति के बीच रोज, पानी नहीं पिलाओगे तो हस्ते हस्ते, सूख जाएगा तो पानी पिलाते हैं। कैसे? तो चाहे हम विद्यार्थी हो, व्यापारी हो या घर में कार्य करते हो, हम सबको ये भूलना नहीं चाहिए की हमे रोज पानी पिलाने का प्रयास करना चाहिए, पाना करना चाहिए। इससे भगवान भगवान की संगत भी प्राप्त होगी, भक्ति का पेड़ भी अस्त अस्त बढ़ेगा। जितनी श्रद्धा के साथ अब भगवान के शहनगतहोने का प्रयास करोगे, उतनी ही मात्रा में भगवान आपको बुधी देंगे। ये उम्मीद हम नहीं कर सकते कि हम बिल्कुल रूचि, प्रकट नहीं करे। और भगवान ने हमें सब प्रकार की बोली दे। ये तो उम्मीद नहीं कर सकते। भगवान अंतर्यामी है, साक्षी है, समझ जाते है की कितनी ही व्यक्ति मेरे का प्रयास कर रहे हैं। तो चेतन ने कहा है कि जहाँ हो वहाँ ही रहो और अपनी चेतना को बताओ। जब अमेरिका पहले गए तो पापाजी अपने प्रवचन में बहुत शब्दों में यही लोगों को समझाते थे कि कृष्ण भावना भावित होने का क्या अर्थ है। अपनी चेतना मत लो। ये समझो जैसा की लोग में बताया जा रहा कि ऐश का उपयोग भगवान की सेवा में करना चाहिए। तो चेतना दलने का अर्थ यह है यह सोचना कि हर हम टी के स्वामी है की भगवान हर चीज के स्वामी हैं, हमें हर चीज का उपयोग करना चाहिए। उनकी सेवा में ये बुद्धि आएगी। अगर आप हरी नाम का उच्चारण करो, छात्रो का अध्ययन करो, भक्तों की संगत का लाभ उठाओ तो जितना भी आप का अवसर प्राप्त उनका लाभ उठाओ। इस प्रकार आप अपने अभियानि जीवन में परिवर्तन कर पाओगे। तो ये श्लोक का संक्षेप हम देख रहे हैं कि अर्जुन जो है इन श्लोकों के द्वारा अपने शो को पर कर रहे हैं। क्यूँकि परम भगवान अपने धाम में लौट गए हैं। तो जिस प्रकार अर्जुन भगवान का स्मरण कर रहे हैं, हम भी प्रयास करना चाहिए भगवान का सदा स्मरण करने के लिए। और जब भगवान का स्मरण करेंगे, मन गन्दे विचारों से खुद ही दूर रहेगा। जैसे की अगर इस प्याले में ग्लास में पानी भरा है तो अंदर और दूध नहीं डाल सकते। अगर ये आधा खाली है फिर तो अगर आपके मन के द्वारा भगवान का स्वर कर ले फिर आपका मन आपका साथ देगा। अध्यातिक जीवन में पूर्व बरबादे। hi ki, हाल गाम, रा, hr, hr krislgrisnा।
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