ध्यान पूर्वक जप करने का अर्थ क्या है? | SB 1.2.14 | 27 Aug 2019 | VyasPujaDelhi | Gopāl Kṛṣṇ Goswāmī

Gopal Krishna Goswami explains ध्यानपूर्वक जप, chanting the Lord's names with full attention and concentration. He teaches that focused repetition steadies a turbulent mind and removes sins and anxiety, citing stories from the Bhagavata Purana to show chanting's transformative power.
Chapters
jan gan jhisrीcrisनa, क्रिशन a a पूजा, ये श्लोक है। आप में से कितने भक्तों ने इस श्लोक को कंटेस्ट किया? हाबास, मैंने सोचा था। सवाल उठाएंगे बड़ा प्रसि स्लोक है और इसका उच्चारण सूतागुस्वामी कर रहे हैं। भागवत में देखते हो। कई लोगों का उच्चारण शुकदेव स्वामी कर रहे हैं। कईयों का क्यूंकि, जब शुकदेव स्वामी भागवत का उपदेश दे रहे थे, परीक्षण महाज को सूचना मिली थी। इस सार दिन के पश्चात उनका अंत आ जाएगा। राजा ने सारे संध को निमंत्रण दिया और मिनटों में हजारों संत पहुँच गए। राजा को ज्ञान देने के लिए। उनमें 1 थे कुस्वामी सूतरगुस्वमीने। 18 हज़ार लोगों का उच्चारण 1 ही बार सुना और 1 ही बार सुनने से उन्हें पूरा याद हो गया। और जो व्यक्ति 1 बार सुनने से किसी चीज को समझ जाता है याद कर लेता है, उसे हम कहते हैं। सूती धरा, श्रेया ोकि लखोके निकट है। वहां संतों की सभा हो रही थी और संतों ने सूत गोसवामी द्वारा ज्ञान प्राप्त किया। स्वामी हमें कह रहे हैं कि हाँ, हमारा भाव होना चाहिए। यहाँ उपस्थित हो आप, इसलिए उपस्थित हो। आपकी अध्यान्िकता में रूची है, आप ध्यान में रूचि नहीं होती तो आप क्यों हा दे है। दीक्षा की इच्छा रखते होंगे, व कई हो गए होंगे तो आप सब में धाता में रूची है। इस लोक का संदेश हम सबको बहुत ही गंभीरता के साथ स्वीकार करना चाहे। उस की सब में क्या कहते हैं? 1 भाव से योग की आध्यात्मिक जीवन में सफलता चाहता है। उसे क्या चेक करना जाए। परम भगवान के नामों का स्वर्ण आगे खेत, आगे, आगे पूजा, ये 4 आवश्यक कार्य है। चाहे आप ब्रह्माचारी हो या रियासत हो या सन्यासी हो। इन 4 के आधार पर ही भक्ति में बढ़ सकते हो। कह रहे है हम सब को दे होकर हमें परम भगवान श्री पुरुषोतम नामों का उच्चारण करना चाहिए। उसके माध्यम से श्रम भी होगा, कितन भी होगा आगे इस मारे नाम यह भी आवश्यक है। और आगे भगवान की उपासना। आगे इस तर को समय कहते हैं। परम भगवान कौन है अपने भक्तों के रक्षक हैं, हम अज्ञानता में सोचते हैं, हमारा बैंक बैलेंस, हमारी सुरक्षा करेगा, हमारे देश महंगे हथियार लेंगे, उससे सुरक्षा होगी। पर असली सुरक्षा केवल परम भगवान ही कर सकते हैं। और कोई नहीं कर सकता हु। और कलम आप लगभग हर स्टॉक में इस विषय का महत्व पढते हो कितना ये हम सब के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। वैसे तो भौतिक समाज में अनेक विषयों का की चर्चा हम कर सकते हैं। पर सबसे अवश्य क्या है भगवान के नामों का गान करना। कहा गया है। कली करे नाम रूप कृष्ण होता। इस कलियुग में भगवान प्रकट होते हैं। अपने दिव्य नाम के माध्यम से आप से पढते हो कि इस कलयुग में यही 1 उपाय है, ना नाम है व केवल कल सेवन। सेवन के नाम के नाम के नाम ये हैं सांसों का संदेश हम सबको प्रयास करना चाहिए कि हम हरी का नाम ले रहे है। रूप स्वामी जी ने हमें 1 छोटा दिया है। इसका नाम है। श्री उब्धेश्रमउबधेशरमे ने रूपक उसमे कहते है भगवान के जो नाम है, अत्यंत मीठे हैं, चीनी। जैसे भगवान की जो भूल आये हैं, वो भी मीठी है। चीनी जैसे। तो आप पूछोगे, अगर भाल के नाम इतने मीठे हैं। हम निरंतर भगवान का नाम क्यों नहीं देते? आप जैसे निरंतर भगवान का नाम लेने की इच्छा है। किसी में तो है नहीं कर पाते। क्यूँ? क्यूँकि हमारी वाणी में अवधि का प्रभाव है। जैसे की साधारण उदाहरण, अगर आपको ऊंचा बिमार बुखार हो तो चाहे कितना भी अच्छा भोजन दे, पेश आयेगा, आपको नहीं आएगा तो उसी प्रकार काम, क्रोध, लोभ, मोह, मनमसरेका, बड़ा गहरा प्रभाव है, इन्हें हम अनर्थ कहते हैं। और दूसरे शब्दों में अनार का ये भी अर्थ है, यह आवश्यक नहीं है। तो इन अनाथ की आवश्यकता नहीं है। जीवन को सफल बनाने के लिए। और हम सोचते हैं, आवश्यक है। तो अवधिया के कारण हमें हरीना में मीठा पन नहीं महसूस होता। कई बार हम देखते हैं 112-112 वाला लोग ताना सा करते रहते हैं और आगे नहीं बढ़ते। क्यूँ क्यूँकि अविद्या की बीमारी है, इसलिए उन्हें पूरा टेस नहीं आ रहा। पर आगे कहते हैं की अगर हम नियमित रूप से देर होकर भगवान के नामों का उच्चारन करेंगे तो यही अवधि की बीमारी का क्या होगा, सुधार हो जाएगा और आप मीठापन मसूस कर सकोगे। तो हमारा प्रयास होना चाहिए कि हिना में रूचि बढ़े। आप ऐसे कितने भक्त हो, न में रूचि बढ़ाना चाहते हो। ये श् भक्तों की सभा है। ये आप सब चाहते है की हिना में रूचि बढे, वहैया में रूची बढ़ेगी। अगर आप प्रयास करोगे। अगर आप यही सोचोगे स्वामी जी का आशीर्वाद मिल जाएगा, उसे रूची बढ़ेगी, ये गलत है। अगर आप यह सोचोगे नहीं रूचि बढ़ानी है, हमें भी थोड़ा प्रयास करना पड़ेगा। तो क्या है प्रयास ईनाम का उच्चारण? जितने ध्यान से आप नाम का उच्चारण करोगे, उतनी ही तेजी के साथ आपके हिदेकी दूर होगी। इसलिए कहा जाता है के नम। प्र 8 लोक में ही पुरे को प्रस्तुत कर दिया है। तो वो कहते हैं दूर हो जाती है। पापाजी केंद्र खोला न्यूर्क में। तो प्रभा जी ने भक्तों को केवल कहा चेंज। हरे कृष्ण भक्तों ने चेन किया और प्रवाज ने कोई नियम नहीं दिए थे। वो थोड़े दिन बाद वो खुद ही पूछने लगे स्वामी जी आप चाहते नहीं, हम कोई नियम का पालन करे। तो नाम के उच्चारण से हे की जिम्मेदाए दूर होती है। तो हाई नाम अगर रुचि बढ़ाना है। तो 1 ही माध्यम है। हर नाम का जॉब करो। और अगर हार राम का जवाब नहीं करे तो क्या परिणाम होगा? रूचि घट जाएगी। तो हम सब अगर भगवान के सहनगर होना चाहते हैं। इसका अर्थ है हम सचमुच भगवान होना चाहते हैं, हम भगवान की शिक्षा का लाभ उठाना चाहते हैं, हमें उनके शिक्षा का पालन करना चाहिए। भगवान गीता के अंत में क्या कहते है क्या देश है सवा जिया सब धर्म को छोड़ कर, मेरे शहर में आओगे, मैं, तुम्हारी सुरक्षा करूँगा, मा सुचा घबराओ मत। हम भगवान को पता है, हम उनकी वाणी में पूरी श्रद्धा नहीं रखते। हम कहेंगे हम गीता पढ़ते हैं, गीता में विश्वास करते हैं, उनकी वाणी में पूरा विश्वास नहीं करते। अगर करते हो तो आप हर कार्य करोगे के अनुसार। परम भगवान। हमारे आस्ती शूपशुतकहैतो भगवान कह रहे हैं, अगर मेरे शहर में आओगे, फिर मैं तुम्हारी सुरक्षा कर हूँ। अगर कोई साधारण बयपारी कहता है, मान ले लो नहीं, अच्छा लगता है तो वापस कर देना। हम उसमें विश्वास रखते हैं जो भगवान कहते हैं। नई मिशन तो महीना अगर रूचि बढ़ानी है। और हराम का उच्चारण यही 1 साल है, और कोई सहारा नहीं। भागवत में अनेक उदाहरण है। यहाँ की आपको अहिना की। महिमा ज्ञान मिलता है। पांचवे स्कन्द में, छठे स् में आजम की कथा पढ़ते हो। आप तो शुगर को स्वामी से, परिश्रम से पूछा था, ये जो पाप की इच्छा रहती है मन में, हृदय में, इसको हम दूर कैसे करे? और बाद ने कहा, 1 हाथी, तालाब में स्नान करता है, फिर जब बाहर आता है, मिट्टी में बैठता है, और तुरंत गंदा हो जाता है। उन्होंने कहा, इस धर्म का क्या लाभ, जहाँ की हम आज कुछ अपराध करें, कल माफी मांगे। उन्होंने कहा कि पेड़ के जड़ अगर पृथ्वी के नीचे हो, ऊपर से पेड़ काटोगे भी, तो फिर उग जाएगा। तो ये जो जड़ है इसको कैसे काटा जाए। प्रश्न के उत्तर में गोस्वामी ने आज मन की कथा का वर्णन किया, जिसमें संक्षेप रूप से इसका संदेश क्या है। भगवान के नामों में इतनी शक्ति है, यह ज्ञान ज्ञान था, इसी भाव से भी लोग लाभ मिलेगा। आज मिल बुरी संगत में था, पर 1 अच्छा कार्य कर रहा था, हजार नारायण का नाम ले रहा था। लोग। भगवान के नाम में पूरी शक भी है। और हम सब का प्रयास होना चाहिए कि हर नाम में रुचि बढ़ाए, यह सम्भव होगा। अगर हम ध्यान पूर्वक मना करे। कई बार पूछते हैं ध्यान पूर्वक अर्थ क्या? सबसे उत्तम अर्थ तो यह है कि आपका मन बिल्कुल स्थिर हो जाय। और मन को स्थिर बनाने के लिए हमें लगता है। तो अगर आप कम से कम इतना करो जब आप जॉब करने बैठते हो, केवल जॉब को 1 कार्य रखो, ये नहीं जब भी कर रहे हो तो कहीं दूसरे कार्य भी कर रहे हो। और अगर ऐसा प्रयास रहेगा तो हृदय की महल भी तेजी से निकले और रूचि पढ़ेंगे। और अगर हम धार्मिक नामों का उच्चारण नहीं करेंगे, हमें क्या करना पड़ेगा। 11 कृष्ण कथा अध्याधिक विषयों की चर्चा करना और दूसरा है उन विषयों की चर्चा करना जिनका भक्ति से कोई समन नहीं। जैसे चेतन ने कहा, भगवान जी, गुरु कृष्ण, हमें भूलना नहीं चाहिए। आजाओ अजाओ जल के पश्चात हमें मनुष्य देह प्राप्त हुआ है। और यह भक्ति का, बीज, भक्ति का, बीज का अर्थ है। ये ज्ञान भक्ति सबसे महत्वपूर्ण सेवा है। और ज्ञान प्राप्त कर लेना। और हम चादेंगे आगे बढ़े, पेड़ उगे। और ये भक्ति का पेड़ कैसे उगेगा। 4 से 10 नाम अपराधों का वर्णन है, उनसे भी में प्रयास करना चाहिए लिए और साथ में यह भी समझा जाता है। ग्रंथों का अध्ययन करना। पापा जी ने जैसे जानते हो बड़े, प्रयास और परिश्रम से इन ग्रंथों की रचना की। इन ग्रंथों में है क्या? सबसे उत्तम ज्ञान जब शुखव्यासदेवसोच रहे थे, क्या है मेरे ज्ञान? मेरे निराशा का कारण सोच रहे थे। मैंने सारे सासों का वर्णन किया, प्रस्तुत किया में अभी मुझे लगता है कुछ कमी रह गई है। तो उसी समय मूली ने क्या कहा? कहा कि तुमने भक्ति का वर्णन नहीं किया। जिसके उत्तर में उन्होंने हमें भागवत का ज्ञान दिया। तो हम सब का यह प्रयास है। महामना जब ध्यान पूर्वक करें सुबह के समय का सबसे बेहतर है। और अगर जाना है तो घर की आवश्यक सेवाएं हैं। आगे इस सूतक सब में क्या कहते है? ये 1 रूप से हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है। सच बात है। भगवान क्या कहते हैं? यह मन मित्र बन सकता है और शत्रु बन सकता है। मित्र जब है जब भगवान गुरु की शिक्षा के आधार पर हम कार्य कर रहे हैं। और जब माना जाता है, जब हम शास्त्र के विपरित कार्य कर रहे हैं, तो अगर आप सोचो की हम विष्णु स्मरण करेंगे तो शर्म के त नहीं करेंगे। यह सम्भव है कि करोगे ज्यादा सरल बनेगा। और हमारे पास इतना सिद्धांत हैं जितने पापाजी ने छोड़े हैं, इसी नहीं छोड़े इसी संस्था के पास नहीं है। और आपको जानकर खुशी होगी कि लगभग इन ग्रंथों का अनुवाद आगे लगभग हर प्रसिद्ध भाषा में हो गया। तो भागवत के द्वारा भी यही संदेश है। मेरा नाम कृष्ण और विष्णु सर मेरा नाम कितना करोगे? विष्णु का स्मरण भी सफल होगा। चंचल मन कृष्ण अर्जुन ने कहा मन तो बहुत ही चंचल है। वायु को वश में लाना ज्यादा आसान है। मन को वश में लाना ज्यादा कठिन है? सच बात है। यह तो आप पूछोगे कोई उपाय है या नहीं? भगवान कहते हैं अगर आप भक्तियों के नियमों का पालन करोगे तो फिर मन भी स्थिर बन जाएगा। तो प्रयास करना चाहे। मन द्वारा भगवान की लीलाओं का चिंतन, उपदेश का चिंतन। जब भगवान प्रकट हुए ने, सनातन, शादी, अर्जुन, अत्यंत, दुखी थे, उन्होंने उन हिना का स्मरण किया जो कि संभव क्योंकि जिसमें वो सफल हुए, केवल उनके गणेश दिया। और में उसके पश्चात पहले वो उदास थे। उन्होंने गीता के संदेश का स्मरण नाम किया। और जब भी गीता के संदेश का स्मरण किया, उन्हें ऐसा लगा कि भगवान कृष्ण उनके समक्ष है। तो उसी प्रकार अगर हम प्रयास करेंगे गीता के संदेश का स्मरण करना तो मन भी स्थिर हो जाएगा। ये संभव होगा। केवल अगर आप करोगे तो। तो ये भी तीनों आवश्यक है। शास्त्र में कहा गया है भगवान की लीलाओं का, भगवान की गुणों, नाम के गुण, भगवान की लीलाएं उपदेश भगवान का बिगड़ा है। इसका हमें न चाह। आगे पूजन। भगवान अपने आप को अनेक रूपों में प्रस्तुत करते हैं। और 1 है में भगवान अपने आप को आंचल विग्राह के रूप में दे। आर्शलविगराहऔर भगवान में कोई अंतर नहीं। और भगवान के आर्च विग्रह को वो वही आदत देना चाहिए जैसे भगवान वहाँ उपस्थित है। वैसे शास्त्र में अनेक लीला है। पुरी जब ओरिसा जा रहे थे, लंदन लाने के लिए, रास्ते में, वो रुके मिना में, वहाँ की खीर को रखने के लिए, क्योंकि वहाँ की खीर बड़ी प्रसिद्ध थी, नाम सामने खेली और यह इच्छा प्रकट हुई कि उन्हें तेज करने का मौका मिले। जबकि भगवान को भोग लग रहा था, तुम्हार पूरी शर्मिन्दा हो, क्योंकि नियम ये हैं। भोग लगने के बाद हम खाते है। वो छोड़ कर चले गये, बाजार में करने लिए, वान ने क्या किया? क्या? क्या बगवान ने, कौन बताएगा जोर से बोलिए है। प्यारे को चुरा कर पुजारी को आदेश दिया, पुरी को सूचना मिली भगवान का प्यारा चूरा है, वो इतने प्रसन् हो गए। तो ऐसी कई लीलाएं हैं। तो ये सोचना की ये मूर्ति है, ये गलत है, भगवान स्वयं उपस्थित हैं। आगे भगवान से कहते है भगवान हम भक्तों के रक्षक हैं, यह सच है, झूठ है, सच है भगवान हमें वे असली सुरक्षा है, उनके लिए कई बार भक्त पूछते हैं। हम भक्ति में आ गए, विकसित हो गए। यह रोग पीड़ा हमें क्यूँ पोंची लोग पूछते नहीं है। वो ये नहीं जानते की हम सब के साथ 1 सा हिसाब भी चल रहा है। कर्म के अनुसार सुख दुख प्राप्त होता है। ये बात जरूर है। अगर आप भगवान के हो, जो कष्टों का कोटा है, वो कम हो जाता है। और ये सोचना की हमने दिक्षा ली है, तो कभी भी बीमारी नहीं होगी, घर में, घर में केवल नफा नाफा होगा की अच्छी बनाएंगे, ये ठीक नहीं है। तो भगवान हमारे सुरक्षित हैं। भगवान ने अर्जुन से क्या कहा बहन जहाँ अर्जुन तुम सारे विश्व के लोगों को सूचना। 2 मेरे भक्त की सुरक्षा हो गए, भगवान खुद भी बोल सकते थे। भगवान खुद बोलते। तो लोग कहते है थोड़ी बोल रहे हैं, जैसे आप देखते हो। कई बार बिल बोर्ड, कोई खिलाड़ी, क्रिकेट का या कोई फिल्मी कलाकार। कहता है ये माँ। 1 शिव क्रीम खरीदो हम विश्वास करके खरीद लेते हैं, पर ये कहने के लिए उसको 7 करोड़ कमा लेता है। हमे पता है उसको पैसे दिए हैं। जब भी हम विश्वास करते तो भगवान ने कहा अर्जुन तुम यह सूचना 2 तो भगवान हमारे सुरक्ष। 1 समय मुनि अपने 10 के साथ नुहिहोधनकेघरमे पहुँचे। धन है उनका बड़ा अच्छी तरह स्वागत किया, राज समानी बड़े प्रसन्न थे। और निकलते समय उन्होंने पूछा मैं कुछ कर सकता हूँ तुम्हारे लिए, आप किसी के घर जाओ कुछ सेवा करो। अच्छी वो पूछते हैं हम भी कुछ कर सकते हैं आपके लिए। तो दुर्योधन ने कहा जैसे आपने मेरे घर को पवित्र बनाया है, मेरे भाई के घर को भी पवित्र बनाता हूँ, पर आप उनके घर में जाना। दोपहर के समय क्यूंकी उन्हें पता था कि जब पानव भाई बनवा लेने जा रहे थे, उन्हें 1 वर प्राप्त हुआ था, द्रोपदी को 1 अक्षय पात्र प्राप्त हुआ था, जिसके द्वारा ज्यादा को भोजन नहीं खा, जितने भी अतिथि आ जाएंगे, लाखों, करोड़, सब को भोजन मिलेगा। और 1 बार उन्होंने भोजन खा लिया। तो उसके पश्चात अगले दिन तक कुछ नहीं मिलेगा। तो ये दुर्योधन को ये पता था। तो उसने सोचा कि अगर दवा बन जायेंगे तो उनको कुछ नहीं मिलेगा उनके घर में, तो क्रोधित होकर उनको श्राप देंगे। क्योंकि हर रूप से जो योजन, नके साथियों ने प्रयास किया था पांडव भाइयों का वध करने के लिए। तो वे पहुंच गए देश। मरा उनका स्वागत किया और कहा आप प्रशाद खाइए कहा जाता है। अगर कोई शत्लुभीआपके घर में आए तो उसका स्वागत बड़े आदर से करना चाहिए। सबसे बेहतर है आप उसे भोजन खिलाओ प्रशाद। अगर आप भोजन नहीं खिला सकते, कम से कम मीठे पानी 2 पीने के लिए पानी भी दे सकते। कम से कम चटाई 2 बैठने के लिए चटाई भी नहीं दे सकते। कम से कम मीठे शब्दों से स्वागत करो। यह सबसे भारी है। मीठे शब्द बोलना इतना आसान नहीं है। तो विदेश शब्दों से बोलो और किसी रूप से स्वागत प्राबाजी की इच्छा थी हमारे मंदिरों में खास करके बड़े बंदरों में जो भी अतिथि आए, उन्हें प्रसाद खिलाया जाए। प्राबाजीपतिमंदर और गुवार का उदाहरण देते थे, वैसे होना चाहिए इसके में मायापुर में ऐसा उन्होंने किया है। तो का प्रशाद खाइए। ठीक है, पर स्नान करके आता हूँ 10 हजार है। अभी पुरी ने कहाँ से मैंने तो आज का भोजन खा लिया है। तभी तो कल तक अक्षय पद के द्वारा कुछ नहीं मिलेगा। वो घबरा गई, उसे चिंता थी, दवा से क्रोधित होकर उन्हें श्राप नहीं दे रहे। जैसे वो चिंता कर थी। भगवान वहाँ पहुँच गए। भगवान ने कहा मुझे भूख लग रही है, कुछ खाने के लिए सर कुछ नहीं है। मुझे देखने 2 वो देखने गए। तो क्या देखा? 1 चावल का दाना 1 सब्जी के टुकड़े के नीचे था। भगवान ने कहा तुम कहते कुछ नहीं है। जैसे ही भगवान ने खाया, जैसे उदाहरण दिया जाता है, पेड़ की जड़ को पानी 2 गए, पूरे में उसका असर पर और ज्यादा भगवान ने खाया। सारे ब्रह्मण को लगा की सब का पेट भर गया और सबको सबको इचकी आने लगी। तब इचकी आने लगी जामुनी। समझ गए। हाँ कोई भगवान की अदभुत लीला है क्यूंकि? उन्होंने अपना सबक सीख लिया था। अमरीश मुरार के साथ। दुरवासा ने कहा चलो भागो, यहाँ से युद्धेश्वरकेघर जायेंगे, उन्होंने भोजन तैयार किया होगा। हम कुछ खायेंगे, नहीं तो बुरा दिखेगा। फिर भगवान ने भी भीम से कहा जाओ, अपने अतिथि को बुला कर ले। आओ बोलो भोजन दिया है। वो गए, खिला रहे थे। जरा सी बनी प्रसाद की। संतों ने कहा अरे, वो तो भाग गई। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। तो आपकी श्रद्धा के। भगवान आपके सुरक्ष हैं। ये बढ़ेगी अगर आप प्रयास करोगे तो हमें 4 महत्वपूर्ण विषयों पर बल देना है। कौन सी 4 हैं। पहला क्या है, दूसरा क्या है, क्या, तीसरा, तुम्हारा नाम, चौथा, ये और 5 विषय क्या था? भगवान हमारे सुरक्षित है। तो अगर आप शो नाम कर, नाम करोगे ध्यान से। तो फिर विश् स्मरण भी सम्भव हो पायेगा। और अभी भी स्वीकार करोगे कि भगवान हमारे असली सुरक्षित है। तो आप सब के भारी है। और सबसे निवेदन को पढो। आप सब बुक डिस्ट्रीब्यूशन में करते हो। पिछले साल बार धन में आप में से कौन कौन गया था? ग्रंथ के वेतन की सेवा में तो नहीं गए थे। उन्हें आप से तैयारी करना शुरू कर देना चाहिए। ये साल भी जाओगे का कोटा कर लिया। 2 साल चलेगा बस है। कई बार हम सोचते हैं कौन लेगा इन ग्रंथों को? कितने लोग इतने वक्त उत्साहित हैं। इन ग्रंथों को प्राप्त करने के लिए हमें लगता है कि कोई नहीं लेगा। बाबा जी ने कहा कि इन श्लोकों में इतनी शक्ति है कि अगर कोई 1 श्लोक भी पढ़ ले और अपना ले, उसका जीवन सबुल हो सकता है। आप सब सोचिएगा यह प्रचार कैसे, बढ़ा भगवान के दिन गीता में, सब भक्तों में सबसे प्रिय कौन है? जो मेरा प्रचार करता है, उससे ज्यादा पी को हुआ है। लोग तो सब प्रयास कीजिये नाम का उचारण ध्यान से उसके द्वारा सारे गुण प्राप्त हो जायेंगे। कई बार भाग पूछते हैं, वा में विनम्रता का भाव कैसे अनुकूल होगा? हम कैसे बनेंगे में उत्साह कैसे बढेगा, रूची कैसे बढ़ेगी? इन सब प्रश्नों का 1 ही उत्तर है। क्या है मेरे नाम का उचारण? वन मेडिसन फोर ऑल जीजस 1 दवाई है। हर प्रकार के 2 इस को ठीक कर देंगे तो ये हमारा सबसे पहला महत्व कार्य ठीक है। हरे कृष्ण, हरे कृष्णा, हरे शा क्रिष्णा हारे, हारे, हारे मा र, हा रे।
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