कर्म रूपी वृक्ष को काटने का एकमात्र उपाय | श्रील गोपाल कृष्ण गोस्वामी | SB 1.5.34 | मुंबई | 1983

Shri Gopal Krishna Goswami explains how to escape the cycle of karma by dedicating every action to God. Each of the five senses—eyes, ears, tongue, hands, feet—must serve only devotional purposes. Without this single-pointed focus on the Supreme Lord, material desires keep binding the soul to endless rebirth.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम नमो भगवते। waसुदेवaamनमोभgte was devayagtin a yahnanjanasholcya jajuramitanana das mai shri guravenamaha sre chetanya manovestasakta butlेसवयम रूपा क दा म यम ददाति स्वापदंतिकम बंदे हम श्री गुरु श्रीवतापदकमगम श्रीगुर श्री रुपम सगराजतमसहागना रगुनातनमितमथम सजेवम सद वेतम सबधुतम परिजना सयतम कृष्णा चेतन्या देव श्री राधा कृषण ptansahagnalalita श्री vicakntamsahe krishna करना सेंध धीनबंदूjगपते गोपेश गोपिका कांता राधा कंत न मुस्त से रता कंचन गोरांगी राधे वृंदावनेश्वरी रिषबानसुतेदेवी रन मामी हरी जा श्री कृष्ण चेतना ्रभुनित्यानंदा श्री रेत राधा शिवाशरीगोरभक्त ब्रिंदा हरे कृष्ण
रा। एवमनणमक्रियायोगा सर्वे समस्त हेतवााएवतनाविना शाया पते का पिता। परे। तो इस लोक में ननद मुनि जी ये बता रहे हैं कि अगर हम कर रूपी वृक्ष की समाप्ति चाहते हैं तो हमें हर कार्य जो है वो भगवान की प्रसन्नता के लिए करना चाहिए। अगर हम कर्म रूपी वृक्ष की समाप्ति चाहते हैं तो उसका 1 ही साधन है। जैसे कि जब आप बीमार होते हो तो फिर वो बीमारी दूर करने का साधन होता है कि अब डॉक्टर के पास जाओ और दवाई लो तो उसी भाव से राज मुनि जी यहाँ ये उपदेश दे रहे हैं कि ये जो कर्म रूपी कार्य है, वो बंधन का कारण है। और बंधन का कारण मतलब यह है कि यह कर्म रूपी कार्य के कारण, हमें बार बार ये बहुतही जगत में जन्म लेना पड़ेगा। अनादि काल से हम लगे हुए हैं सकाम कर्म करने में। और यह इच्छा साकाम करने, कर्म करने की अत्यंत गहरी है। और क्योंकि यह इच्छा बड़ी गहरी है, हृदय के अंदर हम हमेशा जब भी अवसर प्राप्त हो, इंदयतिप्तीका लाभ उठाते हैं, मतलब कि जब भी हमें मौका प्राप्त हो, इंदियतिपतीकरने का, हम उसका पूरा लाभ उठाते हैं और बंधन में फंसे रहते हैं। और विभिन्न शरीरों में हमें जन्म देना पड़ता है। अद्नपरणानकेअनुसार विभिन्न प्रकार के शरीर है जैसे की जल की योनी, योनी, योनी, पक्षी की योनी, योनी, और अंत में मानव की योनी। तो विभिन्न प्रकार की योनियों में हमें यह जन्म लेना पड़ता है। इसके लिए सर्वप्रथम अगर हम बंधन से छुटकारा प्राप्त करना चाहे। तो जिस प्रकार नारद मुनि जी कहते हैं कि जो कार्य जिसके द्वारा हम करना चाहते हैं, जो कार्य हमारे बंधन का कार्य बनता है, वही कार्य को अब प्रभु की सेवा में उपयोग करो। जैसे कि ये आंखें हैं, ये आंखों का उपयोग कोई भौतिकवादी व्यक्ति करता है। और खूबसूरत स्त्री को देखने के लिए, सिनेमा देखने के लिए, तो शास्त्र यह कहता है कि यही आंखों का उपयोग होना चाहिए। भगवान का सुन्दर रूप देखने के लिए। हाँ, भगवान का रूप देखो, भगवान की तस्वीरों को देखो, जो भी चीज देखो, ये देखो कि इसको भगवान की सेवा में किस प्रकार से उपयोग कर सकते हो। भगवान का जो भक्त हैं, वो यह सीखता है कि हर स्थान में भगवान को देखना। तो इसका अर्थ क्या है? बार बार हम लोग यही कहते हैं कि हर जगह भगवान को देखना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि जहाँ भी आप देखो, ये देखो कि ये चीज भगवान के कारण है और इसके कारण भगवान है। इस कारण यह वस्तु का उपयोग प्रभु की सेवा में ही होना चाहिए। जब हम सोचते हैं कि ये कोई वस्तु भगवान से स्वतंत्र है, जब हम यह सोचने लग जाते हैं कि हमें अधिकार है, यह वस्तु का उपयोग करना हमारी इच्छा के अनुसार और जब हम ऐसा कार्य करते हैं तो हम बंधन में फंस जाते हैं। और भी कर्म रूपी व्रिक्ष को हम काट नहीं सकते। अगर हमें कर्म रूपी व्रिक्ष की समाप्ति चाहते हैं तो 1 ही उपाय है। ये जो सहकर्म कर्म है वो हमें छोड़ना है। अनादि काव से हम लगे हुए हैं। इनदिट्रिफ्टी में। रूप स्वामी जी भी इस विषय में कहते हैं कि अनाधिकार से मैं इंदिरा ट्रिप्टी कर रहा हूँ, जी भी इंडिया मेरी संतुष्ट नहीं हो रही। यह है इंडिया ट्रिप्टीकाएक लक्ष्य की आप कितना भी कोशिश कर, इंदियट्रिप्टि प्राप्त करने के लिए और इंदिया तृप्ति जो है आपको कभी भी संतुष्ट नहीं कर सकती। आप कितना भी प्रयास करो और आप संतुष्ट प्राप्त नहीं कर सकोगे। तो बात यह है कि जो बुद्धिमान व्यक्ति है वो यह पहचान जाता है कि इंदिया द्वारा वो शांति नहीं प्राप्त कर सकता, संतुष्ट नहीं प्राप्त कर सकता। इस कारण वो इंदियतृतिके निकट नहीं जाता। जैसे की बच्चे को कहा जाता है। तो आग के निकट मत जाओ। बच्चे को सिखाया जाता है कि जहर को कभी मुँह में मत डालो। जैसे की बच्चे को सिखाया जाता है कि रास्ते में अगर तुम्हे कोई मिलेगा जो कहेगा ये चॉकलेट लो, हम तुमको अपने घर ले जायेंगे तो मत जाना क्यूँ क्यूंकि। माँ बाप को यह चिंता रहती है कि कोई बच्चे को चुरा नहीं लेंगे। चॉकलेट देने के बहाने तो उसी प्रकार जो आध्यात्मिक वादी विध्यार्थी है, उस आध्यात्मिक वादी विध्यार्थी को ये समझाया जाता है कि माया जो है इनदीततिजोहैवो किसी रूप में भी आपको संतुष्ट नहीं दे सकती। तो नाद मुनि जी ये कहते हैं कि प्राणियों को जिस पदार्थ के अनुचित स से जो रोग हो जाता है वही पदार्थ हैश। जाए विज्ञान के अनुसार प्रयोग करने में क्या रोग की दूर नहीं कर सकता। रोग का मतलब है बंधन में फंसे रहना। तो जब तक हम इंद्रिय करेंगे, जब तक हम रोग में फंसे रहेंगे। मतलब 1 रोग से दूसरा रोग क्यूंकि चाहे व्यक्ति अमीर घराने में जन्म ले या गरीब बनाने में, लोगों से वो छुटकारा नहीं प्राप्त कर सकता। ये मानव जीवन प्राप्त करके उसे अवश्य ही क्लेशों का सामना करना पड़ता है। चाहे वो गरीब खानदान में हो या अमीर खानदान में हों। चाहे वो भारत में जन्म ले या विदेश में ले, लोगों से छुटकारा कोई भी नहीं प्राप्त कर सकता। जब तक कि वो कर्म रूपी कार्य करे, मतलब की कार्य करे। यह भावना से कि इ इसका लाभ, इसकी प्रसन्नता, उससे अनुभव होगी। तो हम ये बता रहे थे कि ये इंदियों का उपयोग भगवान के सम्बंधित कार्य में करना चाहिए। नरंद्र मोदी जी बड़े स्पष्ट रूप में यह बात समझाते है कि जब तक हमें इंदियों का उपयोग भगवत सेवा में नहीं करेंगे, हम कर्म रूपी वृक्ष की समाप्ति नहीं प्राप्त कर सकेंगे। भागवत गीता श्रीमद भागवत का यह निचोड़ है। यह सन्देश है कि यह कर्म रूपी वृक्ष की समाप्ति अवश्य ही प्राप्त करनी चाहिए। मानव जीवन का महत्व यह है कि कर्म रूपी वृक्ष की समाप्ति प्राप्त करे। और ये वृक्ष की समाप्ति समाप्त करने का साधन जो है। वो इन 2 लोगों में समझाया जा रहा है कि जो भी कार्य हम करते हैं, उसे भगवान की प्रसन्नता के लिए करना चाहिए। जिस प्रकार गीत में भगवान कहते हैं। यदि देव देवता के पास ना करने से अलग नतीजा पाप होएगा, भगवान की उपासना से अलग नतीजा पापहेगाभगवानकते है। करो जो भी तुम करो वो मेरे लिए करो। यज्ञ करना। तो वो यज्ञ भी मेरे लिए करो। जैसे कि भगवत में कहा गया है, वासु देव। पर वेद पढ़ने हैं। तो वेद पड़ो वेद का चोर है। वासुदेव को समझना। अगर यज्ञ करना है तो यज्ञ करो। यज्ञ। इसलिए मत करो कि भौतिक यज्ञ करो किसके लिए, वासुदेव की प्रसन्नता के है। अगर ज्ञान प्राप्त करना है तो ज्ञान प्राप्त करो। वासुदेव पर ज्ञान, पर ज्ञान प्राप्त करो। वासुदेव को समझने के लिए अगर योग करना है तो योग करो और योग करना है तो योग करो। वासु देव की प्रसन्नता के लिए। जिस प्रकार भगवत गीता के छठे अध्याय में भगवान कहते हैं। योगी, नाम, अपील, सर्वेश, सब से महान योगी वो है जो कि हमेशा भगवान को अपने हृदय में, उस हृदय में याद करता है जो कि हमेशा भगवान को देख रहा है। हृदय में परमात्मा के रूप में, भगवान हर व्यक्ति के हृदय में है और महान योग्य वो है जो कि हमेशा भगवान के चरणों पर अपना विचार, अपना मन रख रहा है। तो सफलता पूर्णता मानव जीवन की जब प्राप्त होती है। जब हमें कर्म बंधन से अपना अपना छुटकारा प्राप्त करने की प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। हमें यह परिश्रम करना चाहिए कि हमें कर्म बंधन से छुटकारा प्राप्त कर सक और उसका साधन जो है वो 2 लोक में नरादमुनी जी दे रहे हैं। तो आंखों का उपयोग करना चाहिए। भगवान का सुन्दर रूप देखने के लिए, कान का उपयोग करना चाहिए, भगवान के सम्बंधित कथा या भगवान का नाम सुनने के लिए कान का उपयोग नहीं करना चाहिए। कोई बहुत ही फिल्मी गाने सुनने के लिए, बहुत आवाज सुनने के लिए। श्रीमत भगवत में उदाहरण दिया गया है कि अगर हम बहुत ही धूम सुनेंगे। तो जिस प्रकार हिरण जो है, हिरन जो शिकारी की धूम से पकड़ा जाता है, हिरन को पकड़ना बड़ा कठिन है और शिकारी 1 खास धुन बजाता है तो हिरन और शिकारी की धूम की तरफ आकर्षित हो के आता है और फिर शिकारी उसको गोली से मार देता है। इसी प्रकार अगर हम ये कानों का उपयोग करेंगे, भौतिक धूम सुनने के लिए, फिल्मी गाने सुनने के लिए, या भजन सुनना जो कि बहुत ही कलाकारों ने गाया है तो उसका कुछ लाभ नहीं होगा। तो जिस प्रकार हिरण माना जाता है, हम भी मारे जाएंगे। तो शास्त्र ने बड़े स्पष्ट में कहा। यही का, यही काम आपको नरक में ले जा सकता है। यह आपको सर में जा सकता है। अगर तो आप ये कान का, इन कानों का उपयोग करते हो भगवान के सम्बंधित कथा सुनने में और भगवान का नाम सुनने में, तो यही कान आपको भगवान के चरणों में ले जाएंगे। और अगर आप यही कानों का उपयोग करोगे, उपयोग करोगे। ये फिल्मी गाने सुनने में, जैसे कि कई कलाकारों ने भी भजन गाए हैं। हरि चरण भक्तों के लिए नहीं है, वो है भार के लोगों को भगवान की तरफ थोड़ा, सा, आकर्षित करने के लिए, भक्तों के लिए वो जहर है। शास्त्र में प्राजी समझाते हैं कि जिस प्रकार दूध को अगर कोई सांप छू दे तो वो दूध दूध रहता है, अमृत रहता है, या जहर बन जाता है, जहर बन जाता है, है की नहीं। जो भी वो दूध को पिएगा, वो उसका नाश हो जाएगा। उसी प्रकार बेशक हमारे भजन हो। पर अगर भक्त उन भजनों को सुनेंगे जो कि मशहूर कलाकारों ने गाया है, तो वो उसकी तुलना की जाती है। जिसको जिसको शाम छू देता है। तो हमें ऐसे आवाजों की तरफ आकर्षित नहीं होना चाहिए। वेशक हमें लगे कि यह बड़ा मधुर है, यह बड़ा अच्छा गाता है, पर नहीं। यह इंडिया चिपटी है, उनका गाना सुनना लक्ष्मी, शंकर का सोना, हरी ओम का सुनना, भक्तों के लिए माया है। भक्तों को केवल कोई आत्मज्ञानी व्यक्ति की, धूम की आवाज सुननी चाहिए, बस वो, क्योंकि उसमें अमृत है। दूसरों में, अमृत में, जहर मेला है। और जब दूध में जहर का मिश्रण होता है तो वह जहर बन जाता है। तो यह कानों का उपयोग करना चाहिए। भगवान का नाम सुनने के लिए। अगर ये कानों का हम उपयोग करेंगे। कोई प्रजल्प जैसे कि प्रजल्प रूप को स्वामी। जी कहते हैं कि अगर अध्यात्मिक जीवन में उन्नति करनी है तो प्रजल्पा से दूर रहो। हम सबको आदत हैं प्रजाल्ता करने की। और भगवान प्रजाता का विरोध करते हैं। प्रजल्प है। वो हमें नहीं करना चाहिए। क्योंकि ये प्रजलपाहैप्रजलता का मतलब है। वो कार्य जो कि अवश्य नहीं है। भागवत सेवा के लिए। अगर वैसा कार्य करोगे जो कि अवश्य नहीं है। भागवत सेवा के लिए, वैसे ही कथा सुनोगे। तो वो कथा आपको भगवान के निकट नहीं ले जाएगी। पर वो कथा आपको भगवान से दूर ले जाएगी समझे। न। तो जीव जो है अभी जीव का क्या उपयोग करना, शास्र के अनुसार जीव का उपयोग करना चाहिए। भगवान का नाम लेने के लिए, भगवान की कथा सुनाने के लिए और भगवान का प्रसाद खाने के लिए। अगर हम जीव ही जीव आपको नरक में ले जा सकती है, यही जीव आपको स्वरक में ले जा सकती है। ये है नारदमुनि का, ये 2 लोकों का आज कि जो चीज आपको नरक में जाती है, वो ही चीज आपको स्वरक में जा सकती है। जो चीज आपके रोग का कारण बनती है, वो ही चीज आपकी स्वतंत्रता का कारण बन सकती है। चाकू जो है, यही चाकू से आप भगवान का प्रसाद काट सकते हो, यही चाकू से आप किसका गला काट सकते हो। और अगर आप किसका गला काटोगे तो आप जेल में पहुँच सके। और अगर आप भगवान का प्रसाद काटोगे और भगवान के चरणों में अर्पण करोगे तो यही सेवा आपको भगवान के पास वापस ले जाएगी। जैसे कि कोई व्यापारी है वो व्यक्ति धंधा करता है, धंधा करता है, जो धंदे से जो लाभ प्राप्त होता है, उसको भगवान के चरणों में अर्पण करना चाहिए। अगर वो लाभ को हम उठा कर अपनी सेवा, अपनी हिंदी अतिथि में उपयोग करते हैं तो वही कार्य हमारे बंधन का कारण बन जाता है। तो शास्त्र ये उद्देश्य देता है कि अब किस प्रकार से काम कार्य छोड़ कर बंधन को तोड़ सके, कम रूपी किस रूप स समाप्त कर सकते हैं। और समाप्ति का साधन है यह भक्ति योग का साधन। तो ये जो जीव है, जी है, इसका हमें अवश्य ही उपयोग करना चाहिए भगवान से सम्बंधित कार्य करने के लिए, भगवान से सम्बंधित कथा करने में जीव का उपयोग मत करो। परजलपाप्जलपाकमत वो बातचीत जिसका भगवान से कोई सम्बन्ध नहीं है, प्रजल का मतलब, वो वो कथा जो कि अवश्य न हो। तो प्रजल्प अगर हम जीव से करेंगे तो ये जीव का हम गलत उपयोग कर रहे हैं। और ये जो जीव है इसके इसका उपयोग निरंतर भगवान का वर्णन करने के लिए होना चाहिए, भगवान का नाम लेने के लिए होना चाहिए, भगवान के सम्बंधित कथा सुनाने में होना चाहिए, भगवान का सन्देश लोगों को सुनाने के लिए करना चाहिए। और अगर हम इस भावना से ये जीव का उपयोग करेंगे तो यही जीव हमें भगवान के चरण कमलों के निकट ले जाएगी। और अगर हम ये जीव का बेकार में भौतिकवादी व्यक्तियों के समान उपयोग करेंगे तो जो मेंढक है न। जिस प्रकार वो मेंढक अपनी मृत्यु को बुलाता है, हम भी अपनी मृत्यु को बुलाएंगे मेंडक मिट्टी को कैसे बुलाता है पता है आपको वो आवाज करता करता रहता है, फिर सब जो है वो कहा मेंडक उधर बैठा है। तो शाम को सुन लेता है, किधर से आवाज आ रही है तो वहा जाके वो मेंढक को काट लेता है। तो उसी प्रकार अगर हम इस जीव का उपयोग कर मेंडक के जैसा करेंगे तो बस ये जो समय है सै समय है शाम के रूप में यह शाम हमें काटा जाएगा। तो अगर आप ये शाम के कार्ड से बचना चाहते हो तो फिर ये समय का उपयोग करो, भगवान से सम्बंधित कार्य को है जीव का उपयोग करो भगवान के सम्बन्धित कार्य में तो यही जीव आपको भगवान के निकट ले जाए, जो शेर है उसका क्या करें, शेर का उपयोग करो, भगवान के सामने झुकाने में बुद्धि का उपयोग करो। यह कार्य सुनने में कि जिसके द्वारा भगवान के निकट जा सको। चेतन चेतनित में कहा गया है कि जो सिर भगवान के सामने झुकता नहीं है वो सिर को काट देना चाहिए, जो सिर भगवान के सामने झुकने को तैयार नहीं है, वो सिर को काट देना चाहिए। भगवत दूसरे सदन में समझाया गया है कि जो सिर्फ भगवान के सामने झुकता नहीं है, वो बहुत भारी बोझा उठा रहा है और जो व्यक्ति बोझा उठा रहा है, जिस व्यक्ति ने 1 भारी पगड़ी पहनी है और व्यक्ति समंदर में जल्दी डूब जाता है, तो उसी प्रकार जो भौतिकवादी व्यक्ति हैं, जो कि अनेक प्रकार के विचारों को मन में रख रहे हैं, जो जिनके, जिनमें जिनके हृदय में भगवान के सामने प्रणाम करने की इच्छा प्रकट नहीं होती, वो व्यक्ति पगड़ी बहुत भारी पगड़ी को उठा रहे हैं और वो ही पगड़ी उन्हें के संबंध में डुबा रही है। तो सिर माथा है, उसका भी उपयोग होना चाहिए। जो मन है, उसका क्या करें? मन के द्वारा हम इंडिया टिपरी का सोच सकते हैं। जैसे इस श्लोक के तातपर्य में यह समझा गया है कि उस समागम में भक्त को अवश्य में शरीर से प्रेम सेवा अर्पित क करनी चाहिए तथा हृदय का उदार नि निष्कपट बनाये रखना चाहिए, तो ये प्रेम सेवा जो अर्परथमकरते हैं, भगवान के चरणों में, उसको प्रेम से करना चाहिए। भगवान कहते हैं शाम युक्त पितिपूर्वकंपिति पूर्वक का मतलब है। प्रेम से, प्रेम से जो भी सेवा दी जाए, वो सेवा करो। अगर आप मन से सोचोगे क्या सेवा करनी चाहिए, क्या सेवा नहीं करनी चाहिए, तो फिर वो सेवा प्रेम ही सेवा नहीं है। जिस प्रकार मां माता जब बच्चे की देखभाल करते हैं, करती है, वो बच्चा चाहे, रात को सो, रात को रो या दिन को माँ, प्रेम के साथ उसकी सेवा करती है, उसी प्रकार भक्त जो है वो प्रेम के साथ गुरु और भगवान की सेवा करता है, तो अपने मन के अनुसार नहीं। मन। तो हमारा बड़ा चंचल है। और मन चंचल होने के कारण मन को आज। मन कुछ चाहता है, कल कुछ चाहता है? मन जो है वो अशुद्ध है। और अशुद्ध होने के कारण उसे यह पता नहीं कि क्या कार्य मुझे लंबे समय में लाभ देगा, क्या कार्य मेरा दुश्मन बनेगा। तो परी में पापा जी समझाते हैं कि हमें फॉर्म भर प्रेम सेवा को बिगर किसी इच्छा के करना चाहिए, अपने अशुद्ध मन से इशारा नहीं लेना चाहिए। तो मन को इतना कदर मत करो? माया हमेशा को ये कहती है कि ये कार्य मत करो, ये करो, ये करते है। तो माँ कहती है? यह कार्य मत करो, अभी करो, यह कार्य करो। तो यह कहते, यह मत करो, ये करो। मन जो है। 1 चीज को आज स्वीकार करता है, कल उसी चीज का विरोध करता है? ठीक है न? वही चीज कभी स्वीकार करोगे, 10 मिनट बाद उसी का विरोध करोगे। इस कार ध्यात्म विद्यार्थी को कभी मन को सुनना नहीं चाहिए। उसको ये पहचान जाना। मन जो है वो वैश्या के समान है, वो किसी को प्रेम नहीं करता। इस कारण शास्त्र ये समझाता है। कोई आत्म, ज्ञानी, व्यक्ति गुरु के इशारे से भक्ति करना चाहिए। गुरु साधु, शास्त्र यह नहीं कि अपने मन के अनुसार आप सेवा करो। तात परी में प्रॉपर्टी ये बड़े स्पष्ट रूप में कहते हैं। और कई स्थानों में प्रॉपर जी ये बात समझाते है कि जो भौतिक इस समय जो हमारा मन है, वो गन्दा है, वो शुद्ध नहीं है, वो अशुद्ध है। और क्योंकि हमारा मन इस समय अशुद्ध है, उसे यह पता नहीं है कि क्या रोशनी है, क्या अंधकार है। हम सोचते हैं कि हम जानते हैं, रोशनी किसको कहते हैं, अंधकार किसको कहते हैं, पर हम नहीं जानते और जब तक हम सोचेंगे कि हम जानते हैं, रोशनी क्या अंधकार क्या है, हम माया के पंजे में फंसे रहेंगे और कल रुपी की समाप्ति हम प्राप्त नहीं कर सकेंगे। तो जैसे प्रापजीतातपरिय क्या है कि जो मन जो है उसको कुछ कदर मत। 2 मन के इशारे के अनुसार सेवा मत करो और जो आत्मज्ञानी व्यक्ति है उसके इशारे से सेवा करो और उसके इशारे से अगर हम सेवा करेंगे। हम ये जो अशुद्ध मन अगर कोई शुद्ध मन की वाणी को सुनेगा तो फिर ये मन भी शुद्ध से शुद्ध हो जायेगा और अगर ये अशुद्ध मन अशुद्ध वाणी कोई सुनेगा तो फिर वो सदा ही अशुद्ध रहेगा। तो मन का उपयोग करो भगवान के सम्बंधित कार्य, कथा समझने में, सुनने में और इसी प्रकार हाथ का उपयोग करो भगवान के मंदिर को साफ़ करने में, पाव का उपयोग करो, कोई सिनेमा हॉल जाने में नहीं पर पाँव का उपयोग करो भगवान के मंदिर चले जाने के लिए और इसी प्रकार अगर हम सच सब इंद्रियों को ये भगवान के सम्बंधित कार्य में उपयोग करेंगे तो हम विभिन्न शरीरों से समाप्ति प्राप्त कर सकेंगे और हमें भी 1 आध्यात्मिक शरीर से प्राप्त होगा यह आध्यात्मिक शरीर जो की हमें किसी प्रकार का क्लेश या रोग नहीं पहुँचाएगा और ये अध्यात्मिक श्री वे प्राप्त करने के ये साधन इस लोक में समझा गया है और हमे ये संसाधन को गंभीरता के साथ स्वीकार करना चाहे तो ही हम ये बहुत ही लोगो से छुटकारा प्राप्त कर सकेंगे हर के के नाम ना।
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