न चाहते हुए भी क्यों हो जाता है पाप? इससे कैसे बचें? SB 1.5.38 | 2002 | Pune | Gopal Krishna Goswami

In this Hindi devotional discourse recorded in Pune (2002), Gopal Krishna Goswami addresses why a person may commit sin unintentionally and how to avoid it through sincere devotion. The talk weaves together several core Gaudiya‑Vaishnava teachings: the concept of a "sakshi" (witness) who testifies to one’s actions, the necessity of genuine shraddha (faith) cultivated by bhajan (chanting) and association with devotees (sangat), the purifying power of seva (service) that cleanses the heart, and the role of a guru who guides the aspirant. Illustrative leelas of Lord Krishna—such as the miraculous felling of two large trees—are recounted to show that divine manifestations are beyond material limitation and serve as a reminder that devotion removes all obstacles. The speaker stresses that worship through the chanting of the Lord’s names (nama‑sankirtan) and reverence for the deity’s physical form (archavigraha) must be combined, following scriptural prescriptions, to develop inner purity and protect oneself from inadvertent sin. Practical advice includes abandoning harmful habits, maintaining constant remembrance of the divine, and participating in communal worship and festivals, thereby strengthening one’s spiritual resolve.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय, नम भगवते वासुदेवाय, एतिमोरतअबिधनेना मंत्रा मुर्दे अमूल्पिकामयजतेयज्ञा पुरु, शाम सासम्यारशनापुमान एते मूर्त्या विधा ने ना बंता मरते मर्द जते यज्ञ पुरुष। समय दशना पान हो गया। तो भगत के लोक में हमे बहुत ही महत्वपूर्ण संदेश दिया जा रहा है। और पिछले कई लोगों में ये विचार, ये शिक्षा दी जा रही है कि हमें भगवान के दिव्य नाम का उच्चारण करना चाहिए। 2 लोग कई लोग पहले कहा जाए इसी अध्याय में कि व्यक्ति को अपने कर्तव्य का पालन करते हुए सदा निरंतर भगवान के नामों का, उनके गुणों का और उनकी लीलाओं का स्मरण करना चाहिए। रुपक स्वामी जी, भक्ति रस मरता सिंधु में हमें बहुत ही महत्वपूर्ण शिक्षा दे रहे हैं भक्ति की विधियों के विषय में। और स्वामी जी अंत में कहते हैं कि जो अनेक नियम हैं, इनका मूल भाग है कि अब सदा कृष्णा का स्वर्णन करें और कभी कृष्णा को भूले में। और इसलिए भागवत गीता की समाप्ति में भी भगवान हमें यह उपदेश दे रहे हैं। मनमाना बाबा भगत मद्याजी मां में सत्य के प्रति जने तो ये नहीं कि पहली बार आप के संदेश सुनते हो, लगभग रोज ही सुनते हो। पर प्रश्न यह है क्या? उस स्थिति में पहुंचेंगे, कैसे
और वो
पहुँचने का जो मार्ग है, वो आज किस लोक में दिया जा रहा है? और पिछले कई लोगों में दिया जा रहा है। वो यह है कि हमें मिलकर भगवान के दिव्य नामों का गुणगान करना चाहिए। यह है कृष्ण भावना के संदेश का निचोड़ कि हमें भगवान के नाम के उच्चारन को अपनाना चाहिए। जैसा की कहा गया है हरे नाम, हरे नाम, हरे नाम। एव केवल हम हेलो नस्थेवननस्तेवन नस्ते। इस कलियुग में क्या है उपाय भगवान के दिव्य नामों का उच्चारण उसके अलावा और कोई उपाय नहीं है। तो आज के शो में क्या कहा जा रहा है कि जो असली भक्त है, वो भगवान की पूजा करता है? और किस माध्यम से उनके नामों के चारण के द्वारा जो असली भक्त है, वह भगवान की पूजा करता है? कैसे? उद्गत दिव्य नामों के उच्चारण के द्वारा, जैसे कि में कहा गया है, कली, काले नामा, रूप, कृष्णा, अवतार कलियुग में भगवान उपचारित होते हैं? 1 उनके नामों के द्वारा, दूसरा उनके आंचल ग्राह के द्वारा। और इस स्लो को तातपेड में इन 2 विशयों पर बल दिया गया है, जैसे कि पापाजी ने तातेड़ में हमें उपदेवपंचविधि की चर्चा की है। त सुपर जलान विधि का अर्थ है शास्त्र की जो शिक्षा है, उसके आधार पर हम पर भगवान की उपासना करते हैं, उनके नामों के उच्चारन के द्वारा, उनके आंच विग्रह के उपासना के द्वारा। इसलिए इस लोक में यह भी कहा गया है कि भगवान का जो दिव्य रूप है, उसका कोई भौतिक रूप नहीं, जो भगवान का रूप है, वो सदा दिव्यम या आध्यात्मिक रहता है। तो छाते में उदहारण देते हैं। प्रॉपर्टी कहते हैं कि आप किसी से बात करते हो, चले फोन में कोई व्यक्ति बहुत दूर है और जब आप बात कर रहे हो तो आपको क्या महसूस होता है। जैसे वो व्यक्ति वहाँ हैं। यह नहीं कि आप किसी निराकार व्यक्ति से चर्चा कर रहे हो। तो प्रापा जी उदाहरण देते है दांत परि में कि अगर कोई भौतिक स्थिति में आप जब किसी पुरुष या किसी के साथ चर्चा करते हो। आप आज कल के जमाने में टेलीफोन का उपयोग बढ़ गया है। 1 जमाना था जब आप अमेरि का फोन करते थे तो सौ 8 मिनट लगता था, आज अब आप फ़ोन कर सकते हो 6 रुपए मिनट में, तो लोग और भी जादा फोन कर रहे हैं, है नहीं।
तो
आप जब किसी से फोन में बात कर रहे हो किसी रिश्तेदार से, मित्र से, तो आप यह महसूस कर सकते हो क्या वो व्यक्ति वहाँ खड़ा है?
आप किसी को मिले नहीं हो, उसकी
आवाज सुनते हो तो हौसला बढ़ जाता है। आपका हाँ, वो व्यक्ति वहाँ है।
तो जब यह भौतिक स्थिति में संभव है
तो धार्मिक स्थिति में जब आप भगवान के नामों का उच्चारण करोगे तो आप भगवान को महसूस कर। सकोगे यह नहीं कि भगवान के जो दिव्य नाम है, ये किसी प्रकार से भौतिक नाम है। तो हम इस भग्वतमकलोकके अनुसार जो असली भक्त है, वो भगवान की उपासना करता है। कैसे? उनके दिव्य नामों के उचाननकेद्वारा महा प्रभु ने बड़े स्पष्ट रूप से कहा है के हे भगवान। अपने अपने नामों में पूरी शक्ति ताली है। नाम चिंतामनी, किशन चेतना, पूर्ण नीति मुक्त भिन्नाता नाम। भगवान के जो नाम हैं, उनकी तुलना की जाती है। किस के साथ चेतावनी परस, पत्थर के साथ चेतावनी परस पत्थर जहाँ भी आप छोगे वो चीज को सोना बना देता है। तो भगवान के नामों में इतनी शक्ति
है कि ज्ञान से या ज्ञान से
जो भी भगवान के नामों का उच्चारण करेगा, उसका इससे इसका केवल लाभ ही पहुंचेगा। इसलिए भागवत के अनेक श्लोक हैं।
ये भाव जो इस श्लोक में प्रस्तुत
प्रकट किया जा रहा है। ये भाव भगवत के अनेक श्लोकों में प्रस्तुत किया जाता है कि भगवान की उपासना हम करते हैं, उनके देवे नामों के उच्चारन के द्वारा अब
आगे था। परी समझाते हैं कि हमारे जो इन्द्रियां हैं, ये अपून है,
इनमें कई कमियां
है और इन्द्रियों में साथ में महल भी है। ये मेल उपस्थित हैं किस रूप से,
अनेक भौतिक विचारों के माध्यम के द्वारा।
और इस मैल के कारण हम भगवान के दिव्य रुप और दिव्य नाम की
महिमा को नहीं समझ पाते।
इसलिए छे दिन महा प्रगति ने कहा है कि भगवान के नाम के उच्चारण का पहला लाभ क्या है? ्ेत्रदरपन महाजन पहला लाभ यह है कि
भगवान के नामों के उच्चारण से
जो
हमारा अशुद्ध, मन इंद्रिया हैं, शुद्ध बनती है। इसलिए प्रभा जी कहते हैं कि हमारी
जो इंद्रियां हैं, उनमें अनेक कमियां हैं, वह पूल हैं। हमारे में कई अनेक दोष है। इस कारण हम भगवान के विग्रह और
उनके नामों की महिमा को नहीं समझ पाते।
कई बार लोग हमें दोष देते हैं किस कौन संस्था में अनेक नियम है, बंधन है, यह सच बात है। पर जो बंधन है, नियम है, किसलिए है। आपको उस स्थिति में लाने के लिए, जिसके द्वारा आप भगवान के रूप, उनके
नामों की महिमा को समझ पाओगे।
तो ये जो भक्ति के अनेक नियम
हैं, उनके पीछे 1 भाव है।
और भाव यह है कि इससे आप कई लाज हो सकेगा। जैसे की आप बीमार होते हो तो बीमार होते हो तो आप का अनुभव है। डॉक्टर साहब, आपको केवल दवाई देते हैं की दवाई के साथ परेज भी देते हैं।
क्या कहते हैं
दवाई लोगे और परेज नहीं करोगे तो दवाई का असर नहीं पड़ेगा, परेज करोगे व दवाई नहीं लोगे,
फिर भी असल में अंतर है।
तो इसलिए ये जो अनेक नियम है, ये दिए गए हैं किसलिए हमारे अशुद्ध,
मान और इंडिया को शुद्ध बनाने के
लिए और भक्ति योग माध्यम है, जिसके द्वारा आप भगवान के दिव्य रूप को समझ सकोगे, जिसके द्वारा आप भगवान के शरणगत होकर उस स्थिति पर पहुंच सकोगे, जहाँ की आप सदा भगवान का स्मरण कर सको। भगवान का स्मरण करना हम सब का लक्ष्य है, पर उस स्थिति पर पहुंचने के लिए हमें प्रयास करना पड़ेगा।
प्रलाद महाराज ने हमें बहुत ही महत्वपूर्ण शिक्षा दी है जिसे आप 7 स्कन में पढते हो। 2 हफ्ते पहले आप भक्तों ने दी
बनाई थी, तो आपने पढ़ा होगा। सुना है किस प्रकार प्रात महाराज ने दिव्य ज्ञान प्राप्त किया था, जब ये
माता के गर्भ में थे किसके किसके द्वारा, नरेंद्र मोदी के द्वारा, और हालांकि
प्राग के पिता ने हाल रूप से प्रयास किया था कि किसी न किसी रूप से प्रलाद का जो आकर्षण है विश्व के प्रति, वो टूट जाए, वो सफल नहीं हो पाए। और प्रलाद के 2 अध्यापक थे, जिनका नाम था संत और अमेरिका, और ये
थे शुक्र 4 के पुत्र। शुक्राचार्य का अर्थ है शुक्र का अर्थ है वीर्य। 2 प्रकार के गुरु होते हैं समाज में 1 है गुणों पर आधारित 1 प्रदायी गुरु। तो शुक्राचार्य के पुत्रों को आदेश दिया था हिलाने का शिपु ने, कि किसी
प्रकार से
मेरे पुत्र का जो आकर्षण है भगवान के प्रति, उसको थोड़ा वैसे तो हिलाने का, शिप का परिचय तो है। दुष् विचार के थे, और वो थे ऊंचे कोटी के भक्त है। पहले क्या था, द्वारपाल थे न जाय जाय के रूप में जार हिलाने का भाई, हिरान्याक्षा का वद्ध हुआ था हाँ भगवान वाला के द्वारा, तो हिरन्याक्ष के पत्नी और बच्चे शोक में थे। पिता का देहांत ोगया पूरे जाकर वा ने उपदेश दिया उन्हें कथा सुनाई। कौन सी कथा? उन्होंने कहा कि 1 समय 1 राजा था जिसका नाम था महाराज सूर्या। ये राजा बड़ा वीर राजा था। आजकल जब युद्ध होते हैं, हमारे राजनीतिक नेता आगे थोड़ी जाते हैं, ने के लिए, वो तो छुप जाती है
और
साधारण जवानों को आगे भेज देते है। पर प्राचीन समय में जो राजा थे, प्राचीन समय में जो राजा थे वो स्वयं आगे जाते थे। युद्ध के मैदान में लड़ने के लिए, तो ये राजा की मृत्यु हो गई और उनकी पत्नियां ऐसा शोक आया की उन्होंने राजा के शरीर को शमशान में जाने से रोक दिया और जोर से रोने लगी। इतनी जोर से किन की आवाज याम राज तक, तो यमराज ने 1 निर्दोष बालक का रूप ग्रहण किया, क्योंकि बच्चे तो किसी किसी स्थिति में पहुँच जाते हैं। और यमराज जी पहुंचे और सभा में। उन्होंने कहा देखो ये औरतें इतनी जोर जोर से रो रही हैं, सोच रही हैं, क्योंकि पति उनका पति फिर से जीवित हो जाएगा। उन्होंने कहा वो यह नहीं सोच रही की उनका जीवन भी दिन पे दिन समाप्त हो रहा है। और उसनिदोशबालक ने 1 आगे कथा सुनाई की। 1 समय 1 शिकारी शिकार करने गया था जंगल में, और वहाँ शिकारी ने 1 पक्षी को मारा बक्षी को की मृत्यु हो गयी। पति जो था शोक में था, अरे माई बेटर हाफ पत्नी का देहांत हो गया।
अब बच्चों को कौन पालेगा?
और जैसा वो सोच रहा था शोक में। शिकारी ने 1 और गोली चलाई जो जिसने पर पति पक्षी को भी मान ले। तो ये कथा किसने सुना? यमराज ने ये किस लिए अपने भावी और भतीजों के शो को 7 तो फिर ये कथा सुन महाराज की पत्नियों ने इजाजत दी, यह समझते हुए कि हम सबका श्री नश्वर है में जाने के लिए, तो ये उपदेश दिया था हिरानी काशीपुर ने यह स्थापित करने के लिए कि आत्मा सनातन है, श्री नश्वर है।
तो यही रानी काशी।
फू ने 1 दिन अपने पुत्र प्रलाद को अपने गोद में बिठा कर पूछा बेटा ये बताओ आज तुमने पाठशाला में क्या सीखा है? और बेटे ने क्या कहा? नामदा भक्ति का पेशा श्रवण खेतराम विष्णु सरन भारतीय सेना आज 10 संख्या। तो ये नवधा भक्ति है ज्ञान में, सबसे पहले क्या कहा गया है? शव आगे और आगे विष्णु स्व। तो विष्णु स्वर्ण जो कि पिछले शोक में उपदेश दिया जा रहा है। इसी अध्याय में कि हम सब का प्रयास रहना चाहिए कि हम निरंतर सदा भगवान के गुणों का, नामों का, लीलाओं का स्मरण करें, ये सम्भव हो सकेगा अगर हम श्रम और कितना भी करें, अगर आप श्रवनम कितना नहीं करो, ये सोचो कि सीधा विश्व स्मरण तक पहुँच जाओगे तो यह संभव नहीं है। तो यहाँ कहा जा रहा है कि हमें भगवान के दिव्य नाम का उच्चारण करना चाहिए। तो ये उच्चारण हमें करना चाहिए। किस माध्यम से यह उच्चारन हमें करना चाहिए भगवान के दिव्य नाम के उच्चारण के द्वारा और इस प्रकार भगवान के दिव्य नाम के उच्चारण के द्वारा हमें भगवान की पूजा करनी चाहिए। भगवान अवतरित होते किस माध्यम से उनके दिव्य नामों के उच्चारण से। भगत के छठे स्कंध में आज ही मिल की कथा पढते हो। छठे स्कंध में शुक्रदेव के स्वामी से परीक्ष महाज ने पूछा 1 प्रश्न पूछा, उन्होंने पूछा कि असली पाक असली धर्म क्या है? उन्होंने 1 उदाहरण दिया कि कई बार 1 हाथी तलाब में स्नान करता है और फिर स्नान करके आता है,
फिर
मिट्टी में बैठता है, तो फिर शरीर गन्दा हो जाता है। तो उन्होंने कहा पूछा कि
अगर हम
धन के स्थान में जाए
पछतावा करें,
फिर आकर, फिर पाप करें, तो उसका कुछ फायदा है। तो उन्होंने कहा कि मुझे यह शिक्षा दीजिये शुकदेव गुदस्वामी से, जिसके द्वारा ये जो पाप की भावना है, इच्छा है, वो सब समाप्त हो जाए। और स्वामी ने कहा केचितभक्तयावासुदेवा
के शोध भक्ति के द्वारा ही
ये सम्भव हो सकती है। और उन्होंने उदाहरण दिया यह अर्जी मिल की कथा का। उन्होंने कहा कि पुरानाज में ये बहुत प्राचीन कथा है। और फिर उस कथा का वर्णन किया। कौन सी थी वो कथा आर्जी जिसमे आप देखे कि भगवान के नामों में इतनी शक्ति है कि ज्ञान या ज्ञान से जो भी नए नामों का उच्चारण करेगा, उसमें केवल उसका लाभ ही होगा। तो यहाँ स्पष्ट रूप से ये कहा जा रहा है कि हमे भगवान की पूजा करनी चाहिए। कैसे उनके दीवे नामों के उच्चारण के
द्वारा आगे यह कहा गया है कि
भगवान का कोई भौतिक रूप नहीं है।
यह समझना भी आवश्यक है कि भगवान
का कोई भौतिक रूप नहीं। इस विषय में गीता के चौथे अध्याय में भगवान कहते हैं जन्म कर्म च मे दिव्यं, त्यक्त देह, पना, जन्मा नाती माँ, मेरा संसार में प्रकट होना, प्रकट
होना दोनों ही दिव्य है।
कई व्यक्ति ये सोचते हैं कि भगवान जब प्रकट होते है, तो भौतिक प्रकृति के प्रभाव में आकर हमारे समान बन जाते हैं।
यह गलत है।
भगवान जब प्रकट होते हैं, अपनी इच्छा के अनुसार, अपने ही भक्तों को माता पिता, भाई, बहन के रूप में स्वीकार करते हैं।
जैसे कि जब भगवान प्रकट हुए थे,
पृथ्वी पर 5000 साल पूर्व, वासुदेव और देवकी, जिन्हें माता पिता के रूप में स्वीकार किया था, इन्होंने 12 हजार देवताओं के वर्षों के लिए,
इतनी गहरी तपस्या
की थी कि आप उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। उन्होंने तपस्या की थी। इसलिए भगवान को पुत्र के रूप में रात के कितने सालों के लिए, 12 हजार देवताओं के सालों के लिए, और हमारे पृथ्वी के 6 महीने देवताओं के 12 घंटे के बराबर है। जब अंदाजा लगाओ 12 हजार, आप इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। और उन्होंने किया था ये तपस्या किस विचार से कि भगवान पुत्र के रूप में प्राप्त हो। हेरान या काशी हू, जिनकी चर्चा कर रहे थे, उन्होंने भी तपस्या की थी। आपको पता है अभी अगले हफ्ते 2 हफ्ते में आप निर्जल करोगे, 1 दिन निर्जल करोगे और आप क्या सोचते हो जल वाले दिन देखते जाओगे। कब कासी समाप्ति का समय आ रहा है, पर हिलाने का शिपूजअबगएथेतपस्या करने के लिए, देवताओं के सौ वर्षों के लिए, हमारे 6 महीने देवताओं के 12 घंटे, तो देवताओं के सौ वर्षों के लिए। हिलाने का शिपू ने निर्जल वर्थ रखा था। 1 बूंद पानी नहीं पिया, बाबा दाजा। 1 बूंद पानी नहीं पिया सौ देवताओं के वर्षों के लिए। और उनका भाव कुछ और था, उनका भाव था कि मुझे ब्रह्माजी का पद मिले। पर वासुदेव देवकी का भाव क्या था कि हमें भगवान पुत्र के रूप में प्राप्त हो। तो भगवान जब आते हैं अपने भक्तों
को
माता पिता के रूप में स्वीकार करते हैं। और जब भगवान प्रकट हुए थे कब्ज के जेल खाने में, तो किस रूप में प्रकट हुए थे? अपने चतुर सजे घेरे हीरे मोतियों के साथ, और इस रूप में पकड़ क्यों हुए थे, ये स्थापित करने के लिए। भगवान पकड़ हो चुके हैं। और फिर जब माता पिता ने निवेदन किया तो उन्होंने साधारण बच्चे का रूप ग्रहण कर लिया। तो भगवान का जब प्रकट होते हैं, उनके दिव्य रूप में प्रकट होते हैं। ये सोचना की जब भगवान इस पृथ्वी पर आते हैं, तो हमारे समान बन जाते हैं। ये गलत विचार जब मायावती विचार के व्यक्ति हैं, आय समाजी हैं, इत्यादि, वो भी जन्म समी बनाते हैं, और वो सोचते हैं, ये किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का जन्मदिन है। और जहाँ वैष्णव भक्त है, वो सोचते है कि वो शुभ दिन है, क्योंकि भगवान प्रकट हुए थे अपनी इच्छा के अनुसार, धर्म के नियमों की स्थापना के लिए। तो यहाँ पे स्लो में कहा जा रहा है कि पर भगवान शिव विष्णु का कोई भौतिक रूप नहीं है। तो भगवान के नामों का उनमें अंतर नहीं। भगवान के जो नाम हैं, ये कहाँ
से आ रहे हैं?
व गुद्दा धाम से, भगवान के, और उनमें उनके आंच विग्राह में भी कोई अंतर नहीं, जैसे कि ह वैशणभरतबंदरो में उनके आंचल बिगहा की उपासना करते, जैसे कि आपके में शिजीरानककुबिहारी गोणेदायकाबिग्राह है, तो भगवान अपने आचल विग्रह में प्रकट होते हैं, किसलिए हमें दर्शत देने के लिए, उनकी सेवा में जोड़ने के लिए। अगर हम ये सोचें कि ये जो विग्रह है है, ये लकड़ी का है, या मार्बल का है, या पत्थर का है। यह 1 प्रकार से अपराध है। भगवान का जो रूप है, सदा दिव्य में रहता है। और जैसे की पंच रात विधि की चर्चा कर रहे हैं। इस तारे में पंच रात विधि के अनुसार हम भगवान की पूजा करते हैं, कैसे उनके आंच विग्रह के रूप में, और इस आंच विग्रह के रूप में, और भगवान में कोई अंतर नहीं है। आप लोगों ने में साक्षी गोपाल की कथा सुनी है। किस प्रकार ये धनी व्यक्ति जो यात्रा में गया था, उसका सहयोग दिया था 1 जवान ब्राहमण ने, और उसका भार उसने प्रकट किया था, यह कहते हुए कि मैं अपनी बेटी की शादी करूंगा, कहा, तुम्हारे सौ गरीब ब्रामनउश्याल था धनी खाना के, हम खाना के कहाँ संभव है। पर जब भी उसने कहा, ठीक है, अगर आप यह करना चाहते भी हो, तो बच्चे दीजिये कहा भगवान के विवाह के सामने, जी। धनी व्यक्ति घर लौट, घरवालों ने दयितलाजकरदिया। पत्नी ने कहा, मैं तो आत्मा हत्या कर लूंगी, अगर तुम मेरी बेटी की शादी कराओगे इस गरीब ब्राह्मण के साथ।
फिर अंत में
इस ब्राह्मण पर दोष भी लगाया कि तुमने तो हमारे पिता को भंग पिला दिया था, उसके धन चुरा लिया था। अंत में ब्राह्मण की इज्जत की प्रशन का प्रश्न था। और अंत में हम हाँ बेलवा साक्षी है। धनी व्यक्ति के पुत्र ने पूछा कौन है? तुम्हारा साक्षी न्होंने कहा मेरा साक्षी है भगवान का। धनी व्यक्ति के पुत्र ने कहा, वो साक्षी का मत ठीक है, पूछ ले
आओ साक्षी के रूप में।
अगर उन्होंने गवाई दी, तो मैं मान जाऊँगा। मेरी बहन की शादी हो सकती है। तुम्हारे साथ गरीब ब्राहमण की पूरी त का पूरा विश्वास था कि भगवान के बिगर में कोई अंतर नहीं तो आये। और भगवान के किसाने प्रणाम करके उन्होंने पूछा। उन्होंने कहा आप साक्षी थे, अब गवाई दीजिये। भगवान ने कहा वह कैसे गवाई दूं। मैं ने दूर चल के कैसे जाऊँ। उन्होंने साक्षी गवाई दी थी वृंदावन में और खाना में कैसे चले। जाओ ने कहा की अगर आप बोल सकते हो तो आप चल भी सकते हो। तो भगवान के विग्रह उनमें कोई अंतर नहीं है। ये केवल श्रद्धा पर निर्भर है। और श्रद्धा कैसे बढ़ती है। श्रद्धा निष्ठा में कैसे आती है? भजन क्रिया के माध्यम के द्वारा। जैसे रूप स्वामीजी कहते हैं। सबसे पहले हमारे हृदय में श्रद्धा होनी चाहिए किस विषय पर की हम भगवान
के शरण होना चाहते हैं।
और अगर वो श्रद्धा होगी तो भगवान जो अन्दर यामी है उपस्थित हैं। पर महात्मा के रूप में वो हमें मार्ग दर्शन देंगे जिसके द्वारा आपको भक्तों की संगत मिले। और जब आपको भक्तों की संगत प्राप्त होती है तो उसके द्वारा आपको शिक्षा मिलती है। भक्ति की विधियों के विषय में जिसे आप सब जो यहाँ उपस्थित हो। मुझे याद है।
1 समय था जब पूना में 1
भक्त विनी था जो प्रापा जी आए थे, यहाँ पापाजी आए थे नाइनटीन सेवेंटी सिक्स में केवल जीवन सदस्य थे, कोई भक्त नहीं थे। फिर 7 संगत द्वारा, प्रचार के माध्यम के द्वारा, भक्तों की संख्या बढ़ी तो
भक्तों की संगत के द्वारा को शिक्षा
मिलती है क्या कि जो शिक्षा श्लोक में दी जा रही है। जब आप पिया का पालन करते हो
तो फिर क्या लाभ आता है उसका
अनर्थ ने वृद्धि जो हमारे अनार्थज हैं, जो बहुत आकर्षण है, वो नष्ट हो, कमजोर होता है और न हो जाता है। और इसके पश्चात निष्ठा आदि है। पर यह सब सम्भव कैसे है? यह सम्भव होता है भजन किया के माध्यम के द्वारा।
तो ये ही उपदेश इस लोक में दिया जा रहा है कि हमें भगवान
की पूजा करनी चाहिए उनके देवी नामों के उच्चारण के द्वारा। और भगवान उनके नामों में कोई अंतर नहीं। और भगवान का जो बिगड़ा है उनमें कोई अंतर नहीं।
और भगवान को जो बिगड़ा है उसके
विषय में कहा गया है पर में
सच और भगवान का जो है उसको
आप समझ सकते हो कैसे सेवा के माध्यम श्री कृष्ण मा ह से वो
मुके जीवा 2 स्वयं एवं सुरा अपनी
भौतिक इन्द्रियों के द्वारा आप भक्ति योग या भगवान के दीव लक्षणों को नहीं समझ सकते।
और सेवा के माध्यम के द्वारा आप
भगवान के दिव लक्षणों को समझ सकोगे। क्यों? क्योंकि सेवा के माध्यम के द्वारा आपका जो अशुद्ध हृदय है वह शुद्ध बनता है।
तो भगवान जब इस पृथ्वी पर आते भी हैं तो अदभुत लीला प्रकट करते हैं। जब भगवान अपनी अद्भुत लीला प्रकट कर
रहे थे, तुम के माता पिता भी
यह सुन कर देख कर आश्चर्यचकित हो गए थे। उदाहरण के लिए जब भगवान ने 2 बड़े वृक्षों को गिराया
तो यशोदा माता उस समय रसोई में थी।
तुमने सुना 2 बड़े पेड़ गिर गए हैं, नीचे तो भागे भागे, आए को चिता, कहीं? बेटे को चोट तो नहीं लगी? तो दूसरे वालों ने कहा कि आपके बेटे ने ये 2 पेड़ो को नीचे गिराया है। हमने अपनी आँखों से देखा। माता ने कहा सच ये छोटा बच्चा इतने 2 बड़े पेट पेड़ो को कैसे गिरा सकता है? न्ने? नहीं, नहीं, नहीं, हमने अपनी आँखों से देखा। पर माता ने कहा यह कैसे सम्भव हो सकता है, तेजी से आती आई होगी, जिसके कारण ये पेड़ गिरे। तो माता भी विश्वास नहीं कर पा रही थी कि मेरे छोटे बेटे ने 2 बड़े पेड़ को गिराया। और भगवान जब अपनी अद्भुत लीला प्रकट
करते थे तो माता पिता क्या सोचते थे?
शायद हमारा पुत्र जो है, देवता है, नारायण की खास कृपा है? उस पर तो भगवान का रूप की दिव्य है, इसलिए वो बचपन से ही अद्भुत लीला प्रकट कर पाते हैं। ये है कारण भगवान के लिए क कोई भी कार्य असंभव नहीं। यही भगवान अपने आचल विग्रह के रूप में प्रकट होते हैं, जिसके द्वारा वो हमें उनकी सेवा में जोड़ने का मौका देते हैं। अभी आगे प्रपर्टी में कहते हैं कि ये दिव्य ज्ञान हमें प्रमाणित गुरु के माध्यम से द्वारा प्राप्त करना चाहिए। इस लिए है क्या? कहते हैं गुरु की शरण लो, सेवा करो, दिक्षा लो। ये पूछो की भक्ति में आगे बढ़ने के लिए क्या त्यागना चाहिए? जो त्याग न पड़े तो उसे त्याग। जैसे कि बीमारी का इलाज कराने के लिए। कई बार किसी चीज का चस्का भी हो तो आपको चस्का छोड़ना पड़ता है, है न? आपको डायबिटीज हो गई और आपको रसगुल्ले मिठाइयों का बहुत शौक है, छोड़ना ही पड़ेगा। अगर आप जीवित रहना चाहते तो उसी प्रकार रूप को समझे। कहते हैं कि भक्ति के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जो प्रतिकूल कार्य है, वो हमें त्यागने को तुरंत तैयार हो जाना चाहिए। तो संक्षेप में आज के इस लोक में कहा जा रहा है कि हमें भगवान की उपासना करनी चाहिए कैसे के उच्चारण के माध्यम के द्वारा। और पर भगवान का जो विरह जो रूप है, वो किसी रूप से भौतिक रूप में ही पर क्या है। आध्यात्मिक है। तो इसको आप समझ सकते हो कैसे? शास्त्र के माध्यम के द्वारा, शास्त्रों की शिक्षा के द्वारा। और भला भगवान इतनी दया दयालु है के अपने नामों के रूप में प्रकट हो रहे हैं। और उनके आंचल विग्रह और शास्त्र के अनुसार हमें दोनो का लाभ उठाना चाहिए। ये नहीं कि आप केवल हरिनाम करेंगे और भगवान के आंचल विग्रह की पूजा नहीं करेंगे। इसलिए आपने देखा होगा की इस काम के मंत्र में मूर्ति स्थापना होती है। जब पापा जी पहले अमेरिका गए थे, उन्होंने केवल पंचतत्व की स्थापना की और जैसे भक्तों की संख्या बड़ी, भक्तों की श्रद्धा बढ़ी तो उन्होंने फिर आचलविग्राह की स्थापना की। हम लोग प्रचार शुरू करते हैं, नए शहर में, हर नाम द्वारा, लोगों को आकर्षित करते हैं, पहले तस्वीर रखते हैं, वो जैसे भक्तो की संख्या बढ़ती है। तो क्या करते हैं? भगवान के आच्चविगरा की स्थापना करते हैं। क्यूँ? क्यूँकि भगवान के अच्छे विघा की उपासना भी आवश्यक है? भगवान हमें अपने आर्चर विग्राह के रूप में प्रकट होकर हमें उनकी सेवा के माध्यम से जुड़ने का मौका देते हैं। जैसे कि आज सारे विश्व में इस गान के भक्तों के द्वारा रथयात्रा उत्सव मनाया जाता है। अभी रथयात्रा उत्सव में आप क्या देखते हो? भगवान प्रकट हो ने किस रूप में, जगना जी के रूप में और वो भक्तों को मौका देते हैं? क्या उनकी सेवा में जोड़ने के लिए, उनके रत को खींचने के लिए, उनकी प्रशंसा के लिए, नाचने के लिए, गाने के लिए? तो भगवान अपने आर्चर के रूप में प्रकट हो रहे हैं, जिसके द्वारा वो हमें सेवा में जोड़ने का मौका देते हैं। हमें हरे नाम का लाभ उठाना चाहिए, साथ में उनके आर्चरविग्राहक की पूजा करनी चाहिए। जो ग्रामीण दिक्षित है वो आर्चेविग्राह की पूजा कर सकते हैं। आरती के माध्यम के द्वारा, भगवान के लिए, भोग बनाने के द्वारा, भगवान का शिकार करने के द्वारा। तो आप को पूछोगे हम तो ब्राहमण देश हम सेवा कैसे करें? नाचकर गाकर भगवान के लिए, गिर कर के। जब हम गिर करते है भगवान की प्रशंसा के लिए, तो भगवान ऐसे बड़े प्रसन्न हो तो भगवान प्रकट हो रहे हैं के रूप में और उनके देव नामा के रूप में। हमें इन दोनों का लाभ उठाना चाहिए भक्ति के मार्ग में आगे बढ़ने के लिए। ये है श्लोक आज के ये संदेश आज के श्लोक का और आज के तार और भगवान के आर्च विग्रा की उपासना करनी चाहिए। कैसे शास्त्र के अनुसार यह रही कि हम किसी को भी भगवान बना लें, ये नहीं कि अपनी मनमानी रूप से उपासना करें। इसलिए प्रापर्टी ने बड़े स्पष्ट रूप से कहा। पंचशतक सिस्टम शास्त्रों की विधियों के अनुसार और हरी भक्ति विलास में सनातन गोस्वामी जी ने हमें बड़ी गहराई से इस विषय में शिक्षा दी है। किस प्रकार भगवान के आचीविवराकी हमें उपासना करनी चाहिए, इसका हमें लाभ उठाना चाहिए और इस माध्यम से अशुद्ध, हृदय, अशुद्ध हरदिया शुद्ध बनेगी और हम भगवान के शरनागत हो। सकेगी
हाय कृश्णा हाल किशना क्रिष्णा हारे हारे,
हम हार।
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