सुदामा ब्राह्मण की अटूट भक्ति | SB 10.80.03 | 11 Aug 2017 | Juhu | Srila Gopal Krishna Goswami

Srila Gopal Krishna Goswami tells the story of Sudama, a poor brahmin whose devotion to Krishna was so complete that his hut became a palace. The lecture teaches that bhakti matters more than wealth, and that remembering Krishna brings contentment in any circumstance.
Chapters
इन लोगों का उच्चारण परीक्षित महाराज कर रहे थे। जैसे आप जानते हो। परीक्षित महाराज को 1 ब्राह्मण ने श्राप दिया था। गलती से। इस दिन के पश्चात आपकी मृत्यु हो जाएगी। ऑपरेशन मनाज घबराए नहीं। उन्होंने उस समय के सारे संतों को निमंत्रण दिया। सबसे 1 महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा क्या था? ऑपरेशन जिस व्यक्ति का आने वाला है, उसे किस रूप से तैयारी करनी चा? उसी को देखो। स्वामी ने कहा, भगवान कृष्ण की कथा सुनी। चाय। तो परेक्शमराजअनेक प्रश्न पूछ रहे हैं और को स्वामी को उत्तर दे रहे हैं। जैसे भगवत गीता में पढते हो। अर्जुन प्रश्न पूछते हैं, भगवान उत्तर देते हैं। हमारे तो इस 10 वेस्कन के 80, 80 अध्याय में बड़ा सुन्दर कथा है किसकी सुदामा ब्राह्मण के परिकर मनाज ने पूछा शुकदेव गोस्वामी से बताओ मुझे भगवान की असीम लीलाओं के विषय में 10 स्कंद में भगवान की लीलाओं का वर्णन है। और रास लीला का में। पहले 9 स्कंद में शुगर स्वामी स्थापित करते हैं कि परम भगवान है कौन? और इसके पश्चात 10 सकल में सबसे पहले भगवान की बाल लीला प्रकट होती है। और आगे जाकर संक्षेप रूप में रास लीला। और जो भक्त हैं, भगवान की लीलाओं में रुचि लेते हैं। भौतिक बतरन में हम रुचि लेते हैं। किस विषय में भौतिक विश्व में लोग अखबार पढ़ते हैं, पद्शका पढ़ते हैं, उनमें क्या है राजनीतिक नेताओं की लीलाएं, चोरों की लीलाएं, कलाकारों की लीलाएं। लीलाओं को आप पढ़ते हो और फेंक देते हो। पर भगवान की जो लीलाएं हैं, इन्हें आप दिन रात सुन सकते हो। और आप थकोगे नहीं क्यूँ। क्यूँकि ये है दिव्य लीला। जैसे कि रोज जो आप क्लास में सुनते हो। यह थोड़ी की सुदामा राम की कथा पहली बार सुन रहे हो। कल आप को संक्षेप में या अर्जुन के उधार की कथा सुनाई। पहली बार ये कथा सुनी पास बैठे हो और सुनते जाओगे। व्यक्ति कई बार पूछते हैं तुम लोग 1 ही नाम का जाप करते हो? दिन रात थकते नहीं पूछते हैं। आपसे? नहीं थकते क्यों? क्योंकि यह दिव्य नाम जो कि प्रकट हुए हैं भगवान के धाम से। तो परे ाज ने इसे दिहाई के आलम में पूछा कि भगवान की जो असीम लीलाएं हैं, इनके विषय में और चर्चा करो। और परीक्ष मनाज। आदेश दे रहे हैं किस प्रकार शरीर के अंगों का उपयोग होना चाहिए? और किस प्रकार इस विषय पर हम लौटेंगे। थोड़े से में विश्व गुरु स्वामी ने परीक्षित महा से कहा 1 बड़ी सुन्दर कथा है इसकी सुदामा। ब्राह्मण के सुदामा ब्राह्मण भौतिक दृष्टि से बहुत गरीब थे ही गरीब। और ब्राह्मण। किसे कहते हैं? ब्राह्मण उसे कहते हैं जिसमें ब्राह्मण के गुण हो। जैसे कि गीता का अठारहवें। अध्याय में भगवान कहते हैं समोदमसतपोसचमशांत राज्यो में चा य विज्ञान से क्या रमा कर्मा? ब्राहमण को हम गुणों के द्वारा निर्णय करते हैं। छात्र वर्ना मया सिस्टम गुणा कर्मा। गुणों के आधार पर ये निर्णय किया जाता है। कौन है ब्राहमण? कौन है साथिया शिया सुदामा ब्राह्मण ब्राह्मण थे। वो ब्राह्मण जो हैं हर स्थिति में संतुष्ट रहता है। ये नहीं कि केवल जब हमे मन की च्छा प्राप्त हो तो हम खुश हैं। अगर मन की पौधे इच्छाएं लाभ नहीं हो तो दुखी बन जाते हैं। ब्राह्मण सुख में और दुख में, दोनों स्थितियों में समानता का व्यवहार रहता है। तो ये सुदवा ब्राह्मण भौतिक दिशि से बहुत गरीब थे। आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं। वैदिक शास्त्रों का पूरा ज्ञान था। उनके पास पूरा ज्ञान कंठस् किया हुआ था उन्होंने। और हालांकि रहने के लिए केवल 1 छोटी सी कुटिया थी। आम जैसे महल, ने और पहनने के लिए 1 धोती थी। बस और छोटी सी आमदन। उसकी जो पत्नी थी, बहुत ही उच्च विचारों की थी। पत्नी भी गरीब थी और पत्नी के मन में 1 ही भाव रहता था। पति की संतोष था। पति को संतोष रखने के लिए बड़ी तपस्या उठा ली थी, लोगों से मांग कर पति को भोग देते थे। सुदामा ब्रामण संतुष्ट इसलिए थे क्योंकि वो 24 घंटे जुड़े हुए थे। भगवान के चिंतन में जो व्यक्ति भगवान की सेवा में जुड़ा है, वो हर स्थिति में संतुष रहेगा जैसे आप में खोलेजेश्वीदारका पढते हो। खुले जे स्वीदा बहुत ही छोटे व्यापारी थे, खोल के प्याले भेजते थे और अपनी आमदन का 50 प्रतिशत ये गंगा की सेवा में 1 दिन चेतन। महा प्रभु ने अपने 45 प्रिय भक्तों को निमंत्रण दिया और सबसे पूछा मांगा मेरे से क्या अवार्ड चाहिए? कोलेज श्रीधर से भी पूछा मांगो क्या वर्च ऐश्वर्य चाहिए? क्या जाए कोलेज श्रीधर ने कहा मुझे आपसे धन की सुविधा नहीं चाहिए, मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए। अगर आप वर्ड देना चाहते हो तो ये वर्ड दीजिये की मैं हर जन्म में आपके साथ रहूँ। आप हर जन्म में, दुकान में आउ सौदा करने। तो जो भक्त हैं वो बिल्कुल संतोष थे, खोला हो। उनके बार रहने के लिए। 1 कमरा था, जिसमें छत विनी थी, क्यूंकि वो हरी नाम का उच्चालन करते थे, संतुष्ट रहते थे, पापाजी उदहारण देते थे। गोस्वामी का रूप सनातन समाज में बहुत ऊँचा स्थान था, शाह के राज्य का शासन करते थे उन्होंने सारा सुख त्यागा, जो सुख था रूप गोस्वामी ने, जब अपनी नौकरी के आगे, उनके पास इतने सोने के सिक्के थे कि 1 पूरी नाव बढ़ गई थी और उन्होंने 4 प्रतिशत मनों को बाटा। पर वृंदावन में आकर मधुकरी करके जी रहे थे, पर संतोष क्यों थे कि हरि नाम उनके साथ रघुना दास। गोस्वामी करोड़पति खानदान के बेटे थे, इकलौते बेटे पर वृंदावन में आये मधुकरी करके रह रहे थे। और बिल्कुल संतुष्ट है क्यूं हर नाम। इसकी तुलना में प्रापर ने 1 उदाहरण दिया। जब गांधी जी की स्वतंत्रता का आंदोलन चल रहा था। 1 बहुत बड़ा वकील था जो गांधी जी को कैदा डोनेशन चंदा देता था, तो गांधी जी ने उनसे पूछा अब मुझे तुम्हारा पैसा नहीं चाहिए, तुम चाहिए तुम आओ तो वकील को तो आदत ही रही जैसे राजा जैसे रहने की। गाँधी जी ने बोला आओ मेरे साथ हो और आया अच्छा नहीं थी। मैं 1 महीने में मृत्यु हो गई क्योंकि भगवान की भक्ति नहीं थी। और जब उसे अलग वातारण दिया गया, वो वो जी नहीं पाया भक्त है जो भगवान की शरण लेता है सुख में, दुःख में, आदर में, अपमान में, सर्दी में, गर्मी में, हर स्थिति में संतोष रहता है। नहीं कोई कठिन सेवा हो तो अरे, ये तो मेरे से नहीं होगा। नहीं जो भगवान ने मां पूरी को कहा चंदन लेकर आओ मेरे लिए। बादपुर ने 2000 मील की यात्रा की भगवान के आदेश को पूरा करने के लिए। तो सुदामा ब्राह्मण बिल्कुल संतोष था, ये नहीं सोचा उसने। भगवान ने मुझे इतना गरीब क्यों बनाया? जो ब्राह्मण हैं कभी किसी को दोष नहीं देता, नहीं तो हम 1 दूसरे को दोष देते रहते हैं। तुम्हारे कारण ये घटना मिली ब्राहमण किसी को दोष नहीं देता। उनकी जो पत्नी थी, उसे पता था कि बचपन में उनका पति 1 बड़े धनी व्यक्ति के साथ शिक्षा प्राप्त की। संदीपन मुनि के आश्रम में सनी मनी कौन थे भगवान के गुरु भगवान जब प्रकट होते हैं, वो भी गुरु को स्वीकार करते ने ईश्वर पूरी को स्वीकार किया तो उनकी पत्नी को पता था मेरा जो पति है उनका, बचपन का मित्र लक्ष्मी देवी का पति है ना मतलब कि बहुत धनी हैं बहुत। तो पत्नी ने कहा आप आपके मित्र को मिलने क्यों नहीं जाते दुहार का। वाका में उनके अनेक महल हैं, द्वारका चाहिए उन्हें मिलने के लिए। तो पति ने सोचा चलो बहाना मिल जाएगा मेरे मित्र को दर्शन प्राप्त करने के लिए। पति तैयार हो गए। पति ने कई बार कहा अरे धनी मित्र को क्यों नहीं मिलते। पत्नी का अलग भाव था और पति का अलग भाव था, पति का भाव था मित्र कृष्ण को, मिलूंगा भगवान है और पत्नी का भाव था। हाँ धनी मित्र को मिलेगा धनी मित्र शर सहयोग कर देगा। दोनों के भाव अलग अलग थे। तो पति ने घर छोड़ने से पहले पूछा पर जो मुझे भेज रहे हो मेरे मित्र के पास, पर मैं खाली हाथ तो नहीं जा सकता। कुछ तो 2 मुझे जो मैं अपने मित्र को दे सकूँ। तो पत्नी के घर में कुछ भी नहीं था, वो इतने गरीब थे। जब पति ने कहा कुछ मुझे 2 खाली हाथ थोड़ी जा सकता हूँ। दुवार का मिले तो पत्नी को पड़ोस के घरों से भीख मांगनी। पड़ी और पड़ोस के घरों से। उन्होंने चाय मुट्ठी, चूड़ा, चिप्राइवचडमुट्ठी, चूड़े का इकट्ठा किया और अपने धोती में फटी धोती में वहाँ जोड़ दिया। रख दिया तो सुधामा ब्राहमण चले द्वारका की ओर सोच रहे थे। रास्ते में मैं तो इतना गरीब हूँ, पुरानी धोती पहनी है उनके घर में कोई भेट देने के लिए। कुछ था भी नहीं। अंदाजा लगाओ उनकी पत्नी को पड़ोस के घरों से मांगना पड़ा। कुछ भेट खोले जा सके तो सुदामा में चले द्वारका की ओर सोचते थे। रास्ते में मैं अपने से कैसे चर्चा करूँगा, कैसे बात करूँगा। वह पहुचे देखा चारों तरफ बड़े सुन्दर महल में भगवान के कितने महल थे, 16 हज़ार महल, भगवान हर महल में उपस्थित थे ये भगवान। आज के वादन में कई लोग कहेंगे हम भगवान के अवतार हैं। उनसे पूछो अब 1 साथ कितने स्थान में उपस्थित रह सकते हो। ओह 1 ही जगह पर भगवान कृष्ण ने 1 साथ 16 हजार 100, 8 महलों में थे, 1 साथ ये की जीरोक्स कॉपी बनाई थी फोटोज की जैसे वो फोटो बना दे, प्रिकेट कॉपी बना दे, कॉपी को अलग अलग जगह रख, 2 भगवान 1 साथ उपस्थित थे ने तो सुना राम पहुंचे पहले 3 दरबारों से निकल गये जैसा राष्ट्रपति भवन जाओ, दिल्ली में कई द्वारों से आपको गुजरना पड़ेगा अंत में जाकर राष्ट्रपति का कमरा मिलता है। और फिर पहुंचे भगवान कहाँ थे? भगवान रुकमिनी के साथ बैठे थे अपने पलंग में हो। भगवान ने दूर से देखा, मेरा पुराना मित्र सुदामा आ रहा है। भगवान तुरंत रुकमिनी को छोड़कर आये किसका स्वागत करने सुदामा भगवान ने हमे उदहारण दिया किस प्रकार सु ब्रामणों की सेवा की जाती है। उन्होंने क्या क्या, क्या, क्या मैंने ब्राहमण को बिठाया, बिठाकर, चरण, धोए, चलन, धोने के बाद उस जल को अपने सिर पर डाला। भगवान ने सुनाम ब्रामण के बड़े आदर के साथ स्वागत कि महल में जो दूसरे सेवक थे, सब हैरान हो गए। अरे ये ब्राहमण पुरानी धोती फटे हुए कपडे में आ रहा है। भगवान इतना स्वागत कर रहे, क्या भाग्य है, इसका तो बड़ा भाग्यशाली भक्त है, भगवान उसको इतना आदर दे दे। फिर दोनो ने चर्चा की किस विषय की चर्चा, बचपन की चर्चा जैसे आप अगर कभी अपने पुराने मित्रों को मिलते हो तो बचपन की कथा कभी करते हो। खैर, अब तो आपका जीवन बदल गया है। खैर दोनों 21 के आश्रम थे संदीपनि मुनि के आश्रम में और संदीपनी मुनि इन दोनो की सेवा से बहुत ही प्रसन्न थे। 1 समय गुरूजी ने 1 बड़ा कठिन कार्य उन्हें दिया जाओ जंगल से ये लेकर आओ और दोनों गये गुरु का आदेश पालन करने लिए और रास में 1 तूफान आ गया बड़ा भयंकर तूफान। और फिर गुरु ने आकर बचाया तो दोनो मित्र चर्चा कर रहे थे कि बचपन में कैसे दोनों ने गुरुजी की सेवा की और किस प्रकार गुरु जी प्रसन्न हुए सुदामा ब्राह्मण बड़े खुश थे कि भगवान ने उन्हें इतना आदर दिया अपने बचपन के मित्र को। मिले और वो आये थे किसी और भाव से, किस भाव से। पति ने भेजा था कि शेर उनके धनी मित्र से और धन की चर्चा करेंगे। मैं सुदामा ब्राह्मण सोच रहे थे, मैं क्या कैसे चर्चा करूं? मैं कैसे बताऊं कि मेरी पत्नी ने किस भाव से भेजा है। पर उसने न कुछ पूछा नहीं। और थोड़े समय वर्तलाभकरने के पश्चात सुदाम हमराम लौटे अपने स्थान में वापस आने। और बरसात में कहा गया है ईश्वर सर्व भूत नाम हिरदेश रजना। मैं हरि के हृदय में विराजमान हूँ। और भगवत गीता में भगवान कहते हैं माता अपना, मेरे द्वारा स्मालर की शक्ति आती है, मेरे द्वारा अपान अपना मतलब भूलने की शक्ति आती है। वो क्या कारण हैं? भगवान 1 व्यक्ति को स्मरण की शक्ति देते हैं। 2 अपान के भगवान ने हम सब को छूट दी है। जिन के मन में ये इच्छा है जब भगवान के शरणगत हो जाए, उन्हें भगवान शुद्ध संग देते हैं। जब भगवान को भूलना चाहे उन्हें भी उसी प्रकार की बुद्धि देते। तो सुदामा ब्राह्मण तो भगवान को पता था सुदामा ब्राहमन किस भाव से आया था, पर सुधा शरमा रहा था, भगवान से कोई मांग नहीं, उसने केवल भगवान से शुद्ध भक्ति की भीख मांगी और ब्रामण भगवान को मिलने इस दृष्टि के साथ, इस भाव के साथ में, परम भगवान को मिलूंगा क्या भाग्य है मेरा सुदामा घर की ओर लौटे और रास्ते में यही सोच रहे थे, क्या रास्ते में यह सोच रहे थे। मैं ने मिस को मिल तो लिया मैने मैंने स्कूल से कुछ माँगा ही नहीं। अब मैं पत्नी को क्या कहूँगा पत्नी? तो पूछेगी तो धनी मित्र को मिल के आये, कुछ लाभ हुआ क्या सुना रावण के मन में तो ऐसे भाव है। तो सोचते थे अभी पत्नी को क्या बोला जाए? पर वो जब पहुंचे जहाँ उनकी कुटिया थी, तुमने क्या देखा कुटिया की वजह मह और 1 महल नहीं भगवान सुदामा ब्रामण की भक्ति से इतने प्रसन्न थे भगवान और भगवान समझ गए थे की सुदामा आया था मेरे पास, धन की इच्छा लेकर, पत्नी की प्रेरणा पर कुछ न कुछ मांगा नहीं मेरे से केवल भक्ति मांगी तो में उसे ऐसा ऐश्वर्य दूंगा को देवता का ऐश्वर्य बेस की तुलना नहीं कर पाएगा। तो भगवान जब सुदामा राम में लौटे यांगी उनकी कुटिया थी? 1 तो बड़ा महल था उनके रहने के लिए, वह नहीं, चारों तरफ महल के महल बन गए थे। और सिधा महल देखा, वो आश्चर्य हो गए, और महल में 50 नौकर भी उनकी पत्नी जो पहले इतनी पतली थी, क्योंकि वो कुछ खाती नहीं थी, तो थोडा धन मिलता था, पहले पति को खिलाती थी। 1 फटी हुई साड़ी थी, बोले अपनी पत्नी सजी हुई है गहनों के साथ और बड़े महंगे वालों के साथ। मेरी पत्नी ने, पत्नी ने तो पहले अनुभव कर लिया था कि उनकी कुटिया महल बन गई, तो बड़े उत्साह से पति की राह देख रही थी। पति आ गया तो इसका मैं स्वागत करूंगी। जब पति आया तो पति पत्नी दोनों महल में प्रवेश किया और सुधामा समझ गए। ये सब संभव हुआ है मेरे प्रिय मित्र कृष्ण की कृपा से, तो आप पूछोगे यह सोचोगे क्या हम भी हैं, यह उम्मीद कर सकते हैं कि हम भी 1 दिन जब घर लौटेंगे, हम चौल में, कमरे की, वजह 1 बच्चा महल होगा वो और हमारी पत्नी भी गैरों में और ेशियम की साड़ी में सजी होगी, ऐसी उम्मीद कर सकते हो, आप ही भागवत में पढ़ते हो। 1 समय 1 औरत से बेची थी, सेव बेचते बेचते भगवान के घर में पहुँचे किसको सेब चाहिए? क्या उन दिनों में व्यापार का माध्यम था? वाटर आप कोई वस्तु? 2 उसके बल में वस्तु लो, भगवान छोटे से थे। 2 हाथों में अन जा रहे थे, सेव की वजह अन देते और सेव दे दे, पर वहां तक पहुंचने तक सारा अन हादसे फिसल गया था, पर जब भी उस औरत से बच रही थी, बड़ी प्रभावित हुई भगवान की कप सूरती से, और उन्होंने उन्हें मुफ्त में सेव दे दिए। जब मोड़ के देखा, टोकरी में क्या थे सोने के से तो आप सोच सकते हो या पूछ सकते हो। राम। भगवान ने उस औरत की टोकरी में तो सोने के सेब दाल दिए। सुदामा ब्राहमण को कुटिया की वजह महल दे दिया। क्या हमें भी यह उम्मीद हो सकती है? हो सकती है हा या ना हो सकती है। भगवान के लिए कोई खाना संभव नहीं, पर हमें उस भावना से नहीं करनी चाहिए। भक्ति हमें यह प्राप्त हो। तो सुदामा ब्राह्मण, बड़ा प्रिय भक्त था भगवान, तो ये जो लोक हमने आपको पढ़े, इनका उच्चारन प्रेक् मना कर दे। पर क्या कहते हैं हमारे जो वाणी है वो सदा आपके गुणों का गुणगान करे। भगवान ने हमें जीत दी है। 1 या 2 है तो 50 जीबी होती है। 50 जी। आपको कुछ खायेंगे, उसको कुछ खायेंगे को कुछ करेंगे। लोग कहते हैं 1 जी, 10 जी में तो मन है। वानी द्वारा भगवान के गुणों का वर्णन होना चाहिए। गुणों का नीला, उनका जैसे रोज सुन रहे हो। अलग अलग लीला के का था। ये 1 उदाहरण दे सकते हो जीप के द्वारा भगवान का गुणगान, भगवान की लीलाओं का वर्णन आगे क्या? हाथों द्वारा भगवान की सेवा करो। कल मैंने आपको हाथों के विषय में उदाहरण दिया था। महा प्रभु जब गुंडिचा मंदर की सफाई कर रहे थे, रुद्रा ओडिशा के राजा थे। उनकी इच्छा थी कि महा प्रभु का दर्शन प्राप्त हो। महा प्रभु इनकार करते गए, कहते गए वो कैश में है। बौद्धिक वादी व्यक्ति को दर्शन नहीं दे सकता ने देखा कि राजा अपने हाथों से झाड़ू दे रहा है, सड़क को साफ कर रहा है तो बड़े प्रसन है। हतुन द्वारा भगवान की सेवा करो, हार द्वारा भगवान की सेवा करो, भगवान का मंदिर साफ करो, भगवान के लिए फूल बनाओ, हार बनाओ और हादुनद्वाराभगवान की सेवा करो। मन द्वारा क्या करो। मन के द्वारा भगवान की लीलाओं का चिंतन करो। भगवान कहते हैं गीता में मन के मन को बंधू बनाओ और शत्रु नहीं मन। बंधू कब माना जाता है। जब मन में अध्यातिक विचार हो और मन शत्रु कब माना जाता है। जो मन में मौलिक विचार हो। जिस व्यक्ति ने मन को बंदूक बनाया, वो व्यक्ति हमेशा शांत रहेगा। जिसने मन को वर्ष में नहीं किया, वो सदा अशांत रहेगा, केवल अगर थोड़ा और धन कमा ले, शांत हो जायेंगे। पर आप से लाखों गुना ज्यादा धनी लोग हैं, वो अशांत है। तो मन आपको शांति नहीं देता, धन शांति नहीं देता। आपने मन को वर्ष में किया है तो हर सितम शांत रहोगे। भगवान करे। पर सलमान कह रहे हैं। वह द्वारा क्या करो, भगवान का चिंतन करो, भगवान की लीला का वर्णन का स्मरण करो, भगवान के रूप का स्मरन करो। आप रोज राधराजवारी का दर्शन देते हो तो भगवान के रूप का दर्शन करो, चिंतन करो और हर चीज का उपयोग करो। भगवान की सेवा में। दूसरे शब्दों में, परेक्ष महाराज आज के श्लोक में वो ही उपदेश दे रहे हैं, जो आपको कल सुनाया था। मनेगी और अनुकार की सेवा में कल के श्लोक का उच्चालन करते थे। कौन कौन उच्चारन कर रहा था, न कोर मनी और वही संदेश आज के श्लोक में प्रेशर बना दे रहे हैं। और यही सन्देश है। आप प्रथम संग से 92 सगंत बार बार सुनते हो, बार बार, 1 बार नही। क्यों हम इतने डी हैं, हम भूल जाते हैं, हमें बार बार सुनने की आवश्यकता है। पर राज कहते हैं कि हमारे सब इन्द्रियों का उपयोग करना चाहिए। भगवान की सेवा में। आगे वह जो सिर है, उसको भगवान के सामने झुकना चाहिए। जब मंदिर में आते हो तो भगवान को प्रणाम करना चाहिए। तो सिर को झुका कर नेत्रों द्वारा, नेत्रों द्वारा क्या करना चाहिए। है। श्रीमद भागवत के दूसरे स्कल में कहा गया thesis do not see the for, the lord compare to plums of the pikokfeterमोर के पंख होते हैं। उनमें वो प्लूम्स होते हैं जो आंख जैसे दिखने पर जिनसे आप देख नहीं सकते। तो भागवत में कहा गया है वो आँखें जिनके द्वारा भगवान का दर्शन नहीं लेते। वो आंखें बिल्कुल बेकार के हैं, जो परीक्षण आदेश देते हैं। किस प्रकार हमें मन बुद्धि का उपयोग करना चाहिए? किसमें भगवान की सेवा में तो सुदाब ब्राह्मण की कथा में कथा से हमें अनेक प्रकार के संदेश मिलता है। 1 संदेश यह मिलता है कि हमें हर स्थिति में संतुष्ट रहना चाहिए। यह रही कि जो बहुतिक सुविधा प्राप्त हो, आप खुश हो, नहीं तो निराश हो। सुदामा ब्राह्मण की कथा में यह देखते हो कि हमारा भाव हर है। भगवान से प्रेरणा में, यम भक्ति में आगे बढ़े। स्ुधावाब्राहमीण की कोई इच्छा नहीं थी। हम भगवान से कुछ मांगे वो गए थे। मिलने इस भावना के साथ ह। मुझे फिर से भगवान का दर्शन प्राप्त होगा। तो इस प्रकार भगवत तुम्हे भगवान के अनेक लीन आये हैं। प्रापा जी किच्छा थी की सारे भक्त कृष्णा बुक को पढ़े, वह भाव होना चाहिए। 1 अध्याय रोज पढ़ो, 1 अध्याय रोज पढ़ोगे तो 1 साल में भगवान की सारी लीलाओं से परिचित हो जाओगे। फिर आप ज्यादा सरलता के साथ भगवान की लीलाओं का स्मरन कर सकोगे। हमारा प्रयास होना चाहिए। मन क् मा? विष्णु स्मरण। तो कई बार भक्त पूछते हैं। विष्णु स्मरण की स्थिति पर कैसे पहुँचे? क्या करना पड़ेगा? तो सरल उपाय है आप नम किन पर ध्यान दीजिये। अगर आप शवनम कितन करोगे, ध्यान के साथ तो फिर विजनेस मरन भी सरल हो जाएगा। भगवान ने इसलिए कहा शनमकिरतनमविशनेस मर्म। उन्होंने यह नहीं कहा विष्णु स्मर्ना, श्रवनम श्रम के रो, विश्णु स्मर् सरलता से सम हो जाएगा। तो जनमास्मीकेउपलक्ष बहुत तैयारी हो रही है, पंडल बन रहा है, यह बन रहा है। और दूसरी तरफ से हमें हृदय की तैयारी करनी है। हमारे हृदय में भाव होना चाहिए। हमें भगवान के शरणागत होता है। जीवन को समर्पण करना है भगवान की सेवा में, जिसका अर्थ है हम मन बुद्धि, धियों का उपयोग सदा करें। किस में, भगवान की सेवा में। और जितने ध्यान से शवनम कृत नम करोगे, उतनी तेजी के साथ 6 धदर्बरमार्जनम होगा। और अंत में अनंदबुदिवर्दनम, असली, आनंद अनुभव कर, पाओगे असली आनन चाहिए। ये है। उपाय, हाई, कृष्ण, हरे, राम, रामा, रे।
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