चैतन्य महाप्रभु का दिव्य प्राकट्य | SB 11.5.32 | 25 Mar 2024 | Delhi | Srila Gopal Krishna Goswami

The transcript records a devotional dialogue between two speakers discussing the divine appearances (avatars) of God across the four yugas, focusing on the appearance of Chaitanya Mahaprabhu in the Kali Yuga as a pure devotee (shuddha bhakta). They cite scriptural sources such as the Srimad Bhagavatam (11th Canto) and Chaitanya Charitamrita to explain why the Lord manifests in each age. The conversation emphasizes the power of chanting the holy name (harinama) as the primary means of salvation for fallen souls in the present age, describing how divine leelas (pastimes) unfold to rescue humanity. Anecdotes about Jagannath Mishra’s family, early signs of divinity, and various scholars and devotees illustrate the spread of bhakti. The speakers also lament contemporary societal decline, urging a return to devotional practice. Additional passages recount confrontations with materialist "maya" ascetics, the speaker’s defense of bhakti against criticism, miraculous leelas such as a mango seed that instantly grew a tree bearing two hundred fruits, a story of a wrathful Brahmin who curses and is later forgiven, and the teaching that harinama is universally accessible—no qualifications, no rules, and no discrimination. The discourse stresses humility, service, and the need to avoid sin to fully benefit from chanting, asserting that deeper, sincere chanting diminishes material attraction and leads to divine grace. Throughout, the discourse blends scriptural exposition, narrative storytelling, moral exhortation, and practical guidance for devotional life.
Chapters
भागते भागते भगते आज शुभ दिन है,
आज का शुभ दिन है।
क्या है आज? श्री भगत के म 1 बड़ा प्रसि्ठलोकहैइसका वर्णन का राज है।
तो श्रीमद भागवतम के ग्यारहवें स्कंध में 1 बहुत प्रशिष्ट लोक है। इसका वर्णन कृष्ण कविराज, चेतने चरितामृत में भी करते हैं।
कृष्ण वर्ण वरना
कुशा कृष्णा संगो पास दम संकेत काहे जनती सू made a ma krishn sango pasang pasad
बनदे
साव दूत परिजन सहित कृष्ण चैतन्य देव राधा कृष्ण पादान ललिता, श्री विशाखा क्रिष्ण करुणा सिंधु 3 बंदो जगत्पते गोपेश गोपिका कांत राधा कांतनम तब कान चन गौरांगी गाधिवगावनेश्वरी िश् भानु सुते देवी कनममीहरीवचककरुबश सिंधु पे न मो कन्या प्रभु नित्यानंद, श्री गोदा शिवा सारी गोल भक्तवृंद हरी कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे, राम हरे, राम राम राम हरि हरि
कौन है, स्वयं भगवान है।
जितने भाव प्रभु स्वयं भगवान है।
और इस विषय चर्चा भागवत में भी की गई है।
और इस विषय की चर्चा भागवत में भी की गई है।
लाल महज कहते हैं या प्रकट होते हो। शुद्ध भक्त के रूप में।
प्रलाद महाराज सातवें स्कन्द में कहते हैं की आप प्रकट होते हो। शुद्ध भक्त के रूप में भगवान है, प्रकट होते हैं।
भक्त के रूप में।
भगवान है, प्रकट होते हैं। भक्त के रूप में।
1 और नाम है ना,
नाम है छन्ना, आवतार, छुपे छुपे हुए अवतार और
भगवान को कहा जाता है। थ्री युग 3 युगों में प्रकट हो
गए है और युगो में कहा जाता है। दूसरा, त्री युग। 3 युगों में प्रकट होते हैं, प्रकट होते हैं।
4 युगों में, चौथे युग प्रकट रूप
में प्रकट होते हैं, 4 युगों में, लेकिन चौथे युग में प्रकट होते हैं। भक्त के रूप में।
तो महाभारत साबित किया जाता है। भगवान कौन है?
तो महाभारत बहागवोतम और अनेक शास्त्रों में यह साबित किया जाता है कि जतन महा प्रभु कौन है?
स्वयं भगवान हैं श्री कृष्ण चैतन्य, राधा, कृष्ण
राधा, श्री कृष्ण चैतन्य, राजा कृष्ण नायन्यचैतनयभाबू और कोई नहीं राधा कृष्ण है।
प्रगट क्यों होते है?
परम भगवान प्रकट क्यों होते हैं?
गीता में भगवान के अलग अलग समय में प्रकट होता हूँ।
तो कहते है यह धरमसलाअनिरभगता। तो मैं युग युग में प्रकट होता हूँ।
युग में होता हूँ।
तो किस लिए प्रीत रन आये, साधु नाम, विनाश, सराय, सम्भव। तो अलग अलग युगों में में प्रकट होता।
तो भगवान जब प्रकट होते हैं, जब लीला भी होती है।
भगवान जब प्रकट होते हैं तो दिव्य लीला भी प्रकट करते हैं।
हम आप को
आज कल के आजकल के कलयुग में जो कोई भगवान कहते हैं तो उनको अगर कहें क्या आप को देवी लीला प्रकट कर सकते है तो कोई जवाब नहीं देते।
भगवान के प्रकट होने से पहले उनके सनातन साथी पकड़ हो जाते हैं।
भगवान के प्रकट होने से पहले उनके सनातन साथी प्रकट हो जाते है।
जैसे की
जैसे की 4 जगनाथ मिश्रा,
सच्ची, देवी, सच्ची, देवी
सारे। ये भगवान के पार्षद जो हैं उनके आने से पहले ही प्रकट हो जाते हैं।
चाय देखा की समाज की स्थिति बहुत बिगड़ गयी है।
अध्वध्याचारेजी ने देखा कि समाज की स्थिति बहुत बिगड़ गयी है और लोग जुड़े
हैं से कार्यों में और लोग जुड़े
हैं बहुत ही कार्यों में, वे जुड़े
हैं बहुत में रूचि नहीं ले रहे
है और वे जुड़े हैं बहुत ही कार्यो में और आध्यात्मिक कार्यों में, रुचि नहीं ले रहे है।
ठाकुर
अधत्याचार्औरदास ठाकुर सारा दिन कृष्ण के नाम लेते थे और कृष्ण कथा की चर्चा करते थे।
बड़ी गहराई के साथ भगवान के नाम को पुकारा था। प्लीज सेन
ने बहुत ही गहराई से भगवान के पान को पुकारा था और कहा की कृष्ण आप प्रकट हो, आपके
लावा कोई पचीसों का उद्धार नहीं कर
सकता, आपके अलावा कोई भी इन पतितों का उद्धार नहीं कर सकता।
चेतन हुए बुखार के कारण, चैतन्य महा
प्रभु प्रकट हुए अद्वत्यचारेके पुकार प्रार्थना के कारण।
ठाकुर कहते है प्रभु दया घोड़ा मोरे मोरे
दया कीजिये नरोत्तम दास। ठाकुर अपने 1 प्रसिद्ध भजन में कहते हैं श्री कृष्ण चैतन्य है प्रभु दया
करो मोरे तुम में के दयालु जगत है। आप जो हो दयालु हो तुम अभी
न के दयालु जगत से सारे आप जो हो बहुत दयालु हो
का उद्धार
करने के लिए, पतित पावन हेतु आप प्रकट हुए हो, पतितों का उद्धार करने के लिए, प्रकट हुए हो। पतितों का उद्धार करने के लिए।
सबसे ज्यादा प्रसिद कौन है?
और सबसे ज्यादा प्रतीत कौन है? मैं हूँ
क्षेत्र में हमें हम क्या सोचते हैं?
हम सबसे ज्यादा है आध्यात्मिक क्षेत्र में, हम क्या सोचते हैं कि हम सबसे ज्यादा पतित हैं
हुए कुशों का उद्धार करने हैं।
जितने हे वहा पर वो प्रकट हुए पतितों का उद्धार करने के लिए
कौन
और उनके कारण कौन थे। अद्वित्य चार्य
उम्र में बड़े तस्वीर
अद्रतताचारय प्रकट हुए थे, चैतन्य महापुर से पहले वो उनसे बड़े थे, इसलिए आप देखते हैं मैं उनकी सफ़ेद दाढ़ी दिखती है।
भगवान हुए कौन से माता,
भगवान प्रकट हुए तो उनके पिता थे जगरनाथ मिश्रा और माता थी सच्ची देवी छोटी आयु
से प्रकट करना आराम कर दिया था
और छोटी आयु से ही उन्होंने अपनी जो दिव्यता उसको प्रकट करना शुरू कर दिया था। अपनी
पैरों के लक्षण उनके फर्श पर
दिख रहा है, सबसे पहले उनके माता पिता ने देखा कि दिव्य पैरों के लक्षण उनके फर्ष पर दिख रहे हैं
तो उन्होंने सोचा की जो मूर्ति है उनके घर में उनके चरण है, सबसे
पहले उन्होंने सोचा कि उनके घर में जो मूर्ति है ये उसके उनके चरण है ये
उन्होंने कहा कि नहीं ये निशाने तो उनके बेटे में, फिर उन्होंने
देखा ये ये तो उनके चेन्ने नहीं है।
तो 1 से 1 बार बनाया था हर घर में,
उन्होंने देवी लीला भी प्रकट की, 1 समय 1 ब्राहमण आया था उनके घर में
प्रसाद तो उनको
कहा की आप प्रसाद खाइए और
ब्राहमण जो है
प्रसाद बनाते, वो ब्राह्मण जो है वो खुद ही प्रसाद बनाते थे
तो वो ब्राह्मण भोग लगाया सो वो हो गए
तो वो जब ब्राहमण भोग लगते थे तो भगवान छोटे से थे, वो प्रकट हो गए उस स्थान पर
और और उस प्रसाद को खा लिया
और भगवान ने उस प्रसाद को खा लिया।
ब्राह्मण ने सोचा था यह साधारण बालक है।
ब्राह्मण ने सोचा था कि यह साधारण बालक है
ऐसा क्यूँ कर रहे हो? भगवान को भोग लगा है।
उन्होंने ऐसा क्यों कहा भगवान को भोग लगा। मिश्रा ने उनको कहा आप फिर से बनाओ, उन्होने बनाया, उसने फिर से बनाया,
भूख लगाया फिर वहाँ पहुँच गए, दूसरी
बार भी भोग लगा रहा था भगवान फिर वहाँ पहुँच गए और वो
शोक में था।
तो ब्राहमण जो है वो रो पड़ा और वो बड़ा शोक में था।
ब्राह्मण को बुलाया है बस्ती कर रहे हो उनको थोड़ी दूरी पर बंद कर दिया में।
तो जगनाल मिश्र ने कहा कि हमने बुलाया उनको भोजन पर और तुम जो है उनको तंग कर रहे हो, हमारी बेस्टी कर रहे हो। तो इसलिए उन्होंने फिर जो है 1 कोठरी में उनको बंद कर दिया जगनाथ मिश्र ने चेतन को छोटे से बालक के रूप में, तो मन ये सोच रहे थे कि शायद भगवान की इच्छा है की मैं भूखा रहू
शोबानी।
तो उन्होंने जगलाल मिश्र ने कहा नहीं ये ये हाँ शोभा नहीं देता,
मैंने बेटे को बंद कर दिया है, तुम बिना चिंता के हो, तुम्हे मैंने अपने
बेटे को बंद कर दिया, तुम बिना चिंता के भोग लगाओ,
वो भोग लगे।
तीसरी बार भी जब वो भोग लगाने गए तो निमाई भी वहीं पहुंच गए
हो, तुम भोग किसको लगा रहे हो, मुझे लगा रहे हो शाम सुनहरा रूप
पर, तो राम जब परेशान हो गया निमाई को, तो फिर भगवान बोले कि तुम भोग किसको लगा रहे हो, मुझे लगा रहे हो। और फिर उन्होंने उनको अपना शाम सुंदर का जो रूप है वो दिखाया और
ये कहा की किसी को यह नहीं बताना
और ये भी कहा कि किसी को यह नहीं बताना कि तुमने मेरा
दर्शन किया है तो परम भगवान जो है अबू
तो परम भगवान प्रकट होते हैं पतितों के उद्धार के लिए और वो अपनी दिव्य लीला प्रकट करते है।
महा बहु अनेक नाम है
तने महाबहु का 1 नाम है अनेक नाम, अनेक नाम हैं, 1 है विश्व, 1 है विश्वंबर, पूरे विश्व को, पूरे विश्व को, वो उठाते हैं।
गो ही उनको देखते ही लोग
लोगों
को याद आ जाता है हरी राम
करना और उनको देखते ही लोगों को याद आ जाता है कि हरि नाम करना चाहिए जब
रोना बंद कर से केवल हरी नाम
तो जब हुए, रोना केवल तभी बंद करते थे जब कोई उन्हें हरि नाम सुनाता था।
रोरंगगोलंगागोरंगा
गौरांगा है गोल्डन गौरांग, सुनहरे, सुनहरे
रंग अलग अलग युगों में, भगवान से
अलग अलग रंगों में, अलग अलग युगों में भगवान प्रकट होते हैं अलग अलग
रंगों में वो अलग अलग युगों में अलग अलग साल है भगवत प्राप्ति के
लिए और अलग अलग युगों में अलग अलग साधन हैं भगवत प्राप्ति के लिए
जैसे की में भगवत प्राप्ति का साधन था भगवान का चिंतन करना जैसे की
सच में भगवत प्राप्ति का साधन था भगवान का चिंतन करना और और त्रेता युग में भगवत प्राप्ति का साधन था
बड़े बड़े यज्ञ इसमें शुद्ध शुद्ध वस्तु
की आवश्यकता थी, जिसमें शुद्ध शुद्ध मंत्र, शुद्ध वस्तुओं की आवश्यकता थी।
और साधन के सा भगवान की उपासना
करना और द्वापर युग में भगवत प्राप्ति का साधन क्या था की बड़े बड़े तरीके से भगवान की उपासना करना
होगा।
कलयुग में साधन है भगवान के नामों का उच्चारण करना, वैसे तो है ना
की महिमा भागवत के अनेक श्लोकों में
है, वैसे तो हरिनाम की महिमा भागोतम के अनेक श्लोकों में है
हुए थे, 500 से 500 साल पहले, पर भागवत
की रक्षा की 5 साल पूर्व चतनेमाबहप्रकट हुए थे लगभग 5 सौ साल पहले, लेकिन भागवत की रचना हुई है 5000 वर्ष पूर्व।
जैसे की किसने की जैसा कि किस प्रकार कलयुग में लोगों का उद्धार होगा।
परीक्षित महाराज ने गोस्वामी से पूछा की किस प्रकार कलयुग में लोगो का उद्धार होगा?
भगवान के, यही सोचते है
जो भगवान के भक्त हैं वो सदा सदा यही सोचते हैं कि पतितों का कैसे उद्धार होगा। वो समाज के शुभ वो समाज के शुभ चिंतक हैं।
प्रश्न के वस में,
परीक्षित महाराज के प्रश्न के उत्तर में शुकदेव गोस्वामी ने
कहा कल दोषी राजन, कलयुग में जो
दोष है, कलेर दोष निदे राजन, कल युग में दोष ही दोष है, पर गुण है, पर ये गुण है, क्या है, क्या है कृष्ण का नाम
महिमा का वर्णन किया गया था।
तो इसका जो वर्णन है 5000 साल पूर्व किया गया था इस नाम की महिमा का वर्णन श्रोता कृष्ण
भगवान के शुभ नामों के उचार से
की देकृषामुख बजे थे। तो बाते बता रहे है कि हरी नाम के कीर्तन से जो हमारे हृदय में दोष है वो दूर हो सकते हैं।
सो कहने का उद्देश्य यह है की हर नाम की महिमा है, वर्णन है
5000 साल पहले, तो कहने का मतलब है की जो वर्णन है हरि नाम की महिमा का, शास्त्रों में, वो वर्णन है। 5, 6000 वर्ष पूर्व।
तो यह नही की 6 नाम को लेकर आये, हरिनाम का प्रचार किया, यह
नहीं की भाव हरिनाम को लेकर आये, तने महाबूब ने हरि नाम का प्रचार किया।
जैसे शास्त्र में कहा गया था नाम, नाम, हर नाम केवल,
जैसे शास्त्र में कहा गया था हर नाम, हर नाम, हर नाम केवलम, हरी का नाम ही है जो कलयुग में उधर कर ही
नाम की महिमा, भगवान के नाम की महिमा का वर्णन शासन पढ़ते आये हो
हजारो सालो से, तो भगवान के नामो की महिमा आप पढ़ते आये हो हजारो सालो से, शास्त्रों में इसका वर्णन है।
माँ बाबू ने क्या क्या, माँ बाबु ने भक्त के रूप में अपने आप को पकड़ किया और हरी नाम की महिमा का उपदेश किया।
तो चने बाबू ने क्या किया? माँ प्रभु ने अपने आप को भक्त के रूप में प्रकट किया और हरि नाम की महिमा का प्रचार किया
है। भक्त जो है अपने उदाहरण से धर्म के नियमों को पकड़ कर।
तने चरित्रामृत में कहा गया है कि भक्त जो है अपने उदाहरण ऐसे धर्म के नियमों को प्रकट करता है। प्रकट हुए भक्त के रूप में, प्रकट हुए भक्त के रूप में कहा जाता
था, तो भगवान हो, कृष्ण हो, अपने कानों को बंद कर देते थे, जब
उनको कहा जाता था की आप भगवान हो, कृष्ण हो, तो वो अपने कानों
को बंद कर लेते थे, वो दिखाना चाहते थे, भक्त का क्या व्यवहार होना
चाहिए, क्यूंकि वो दिखाना चाहते थे, भक्त का क्या व्यवहार होना चाहिए?
तो छोटी आयु में ही वो संस्कृत के बड़े विद्वान बन गये थे, छोटी
आयु में ही वो संस्कृत के बहुत बड़े विद्वान बन गये थे,
8 साल में फैली भाषा उन्होंने
उन्होंने शुरू कर दी थी, संस्कृत पाठशाला 8 साल की
उम्र में कर गया, अपना पाछला खोल
दिया था, 11 साल की उम्र में उन्होंने अपने पाठशाला खोल दिया था,
भाई तुझे में सबको पता था निमाई जो है उनका 1 नाम है निमाई क्यूकी, उनका जन्म हुआ था नीम के पेड़ के नीचे
के जो लोग हैं उनको पता था ये जो निमाई है उनका 1 नाम निमाई है, क्योंकि उनका जन्म हुआ था नीम के पेड़ के नीचे,
द का मतलब है पास ज्ञान हो
तो पंडित का मतलब है जिसके पास आध्यात्मिक ज्ञान हो। आजकल तो पंडित 1 जात बन गई
है, मतलब है धात्मिक, ज्ञान हो, चयन
हो तो पंडित का मतलब है जिसके पास आध्यात्मिक ज्ञान हो और आचरण हो
तो निमाई पंडित लोग जानते थे,
है तो निमाई पंडित, सब लोग जानते थे की ये बहुत ही बड़ा विद्वान है।
तो 1 और विद्वान से था केशव
कश्मीरी 1 और विद्वान थे जिनका नाम
था केशव कश्मीरी, उनमें ज्ञान था, गौरव
भी था, उनमें ज्ञान था लेकिन उनमें गौरव भी था। इतना बड़ा प्रदेश की मैं इतना बड़ा
पंडित हूँ, उन्होंने सब पंडितों को हरा
दिया था, तो उन्होंने सब पंडितों को लगभग हरा दिया था।
आजकल क्रिकेट मैच वगैरह होता है,
का डिबेट होता तो आजकल जैसे क्रिकेट मैच होता है, और उन दिनों में पंडितों के बीच में होता था, कश्मीरी
पंडितों के साथ करते थे, उनको हरा देते थे लेख के 2
जो केशव कश्मीरी है वो पंडित के साथ साथ करते थे, और जब हरा देते थे तो उनको कहते थे लिख कर 2 मैंने तुम्हें हरा दिया है।
तो केशर कश्मीरी को पता था कि में अनेक विद्वान है।
तो कश्मीरी को पता लगा की यहाँ नवद्वीप में अनेक विद्वान है जिनमे की
सबसे प्रसिद्ध है निमाई पंडित और जिसमे
की सबसे प्रसिद्ध है ये निमाई पंडित
निवाई पंडित 1 दिन गंगा जाने के पर बैठकर अपने विद्यार्थियों के साथ भी विद्या शिक्षा दे रहे थे।
तो निमाई पंडित 1 दिन गंगा तट पर अपने विद्यार्थियों को शिक्षा दे रहे
थे और अपने के साथ
तो केशव कश्मीरी अपने शीशों के साथ वहाँ पहुँचे
मफसिस इसकी प्रशंसा सुनते हैं।
तो केशव ने कहा उनको आप भी हो, वो निमाई पंडित जिसकी हम प्रशंसा सुनते हैं। तो वो निमाई पंडित ने कहा तो ये जो विद्यार्थियों का उच्चारण है मैं तो समझ भी नहीं पाता,
आप मुझे आप के यान का अंदाजा लगाऊं, मैं आप किसी विषय पर उच्चारण कीजिये।
तो केश्वर कश्मीर ने कहा कि आप मुझे सुनाइए कुछ ताकि मैं आपके ज्ञान का अंदाजा लगाओ। किसी विषय पर कुछ आप उच्चारण करिए।
मुझे तो कुछ क्या है।
आज सुनहि मा ने कहा मुझे तो कुछ ज्ञान नहीं है, आप सुनाइए
कश्मीर गया?
तो केशव कश्मीरी का अहंकार और भी बढ़ गया।
मै कह रहा है उसके बाद कुछ
ज्ञान है ही नहीं कह रहा है उसके पास कुछ ज्ञान है ही नहीं।
तो बिवाई के निवेदन पर की सौ लोगों का उचारण प्रशंसा करते हुए।
तो निमाई के निवेदन पर केशर कश्मीर ने सौशलोकों का उच्चारण किया। गंगा नदी की प्रशंसा करते हुए। तो कैसे लगा तो उन्होंने पूछा तुम्हें कैसे लगा?
बहुत सुन्दर पर आपके इस लोक में कमी आए हैं। इस प्रकार से उसे कमियों की रचना के।
तो उन्होंने कहा निमाई नहीं के बहुत सुन्दर आपके इन श्लोकों में, कुछ कमियाँ हैं उनको जो अपने बनावट में
निमाई ने कमियों को सुनाया कैसे कश्मीरी आश्चर्य हो गए।
जब निमाई ने उन कमियों को सुनाया तो केशव कश्मीरी आश्चर्य चकित हो गए, क्यों क्यों?
1 तो उनके बाद निमाई ने जो प्रश्न पूछे उत्तर नहीं था 1 तो
निमाई ने जो उनसे प्रश्न पूछे उनके पास उनका उत्तर नहीं था।
और फिर उन्होंने कहा मैंने जो वायु की तेजी पर इन श्लोकों का उचारन किया था, कैसे? 1 बार कंस करे तो दूसरा।
उन्होंने कहा मैंने तो वायु की तेजी से इन श्लोकों का बनावट किया था, को बनाया था, आपने कैसे उनको कंठस्त कर लिया?
निमाई के विद्यार्थी थे। उन्होंने देखा की निमाय
तो जो निमाई के शिष्य थे, उन्होंने जब देखा कि केशव कश्मीरी माँ प्रभु के प्रश्नों के उत्तर नहीं दे पा रहा तो वो हँसने लगे
दिया।
निमाई ने उनको रोक दिया, हँसी उड़ाने हँसी उड़ाने से रोक दिया।
सा किसका भक्त सरस्वती का केशो कश्मीरी
था, वो किसका भक्त था सरस्वती का
पूजा हमेशा करते आये हो, आज कैसे में मुझे बुद्धि नहीं दी उत्तर देने के।
तो शाम को उन्होंने सरस्वती की पूजा की और उनको कहा की आप हमेशा मेरी मुझको बुद्धि देते आये हो। लेकिन आज कैसे हुआ बुद्धि नहीं दी। निवाई के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए।
छो देवी ने कहा देवी ने साधारण नहीं है, स्वयं भगवान है।
तो सरस्वती देवी ने उत्तर दिया कि ये जो निमाई पंडित है ये कोई साधारण बालक नहीं है, यह स्वयं भगवान है।
निमायक ही शरणागत हो गया और ये
केश कश्मीर जो है ने माइ के शरणागत हो गए।
निमाई की महिमा बढ़ती जा रही थी,
निमाई की महिमा बढ़ती जा रही थी।
निमाई भग मिले मेरा नाम था सपनिश्रनिमाई
को 1 भक्त मिले जिनका नाम था तपन मिश्रा।
तपन मिश्रा यह बताइए कि जीवन का क्या लक्ष होना चाहिए।
तो तपन मिश्रा ने निमाई से पूछा की ये बताइए कि जीवन का क्या लक्ष्य होना चाहिए?
मैंने सोचा मैंने सोचकर कहा मैं ने कहा लक्ष्य चाहिए भगवत प्राप्ति।
धनी। मां ने सोच कर कहा उन्होंने कहा जीवन का लक्ष्य होना चाहिए भगवत प्राप्ति
ा। ये बताइए की क्या है जीवन का लक्ष्य।
तपन मिश्र ने ये पूछा की क्या है जीवन का लक्ष्य
का लक्ष्य है भगवान के शरणागत हो जाओ।
तो निमाई ने कहा कि जीवन का लक्ष्य है की आप भगवान के शरणागत हो जाओ तो
है हम सब तो
ये उत्तर है हम सबके लिए निमाई
प्रकट हुए थे
तो निमाई प्रकट हुए थे हरि नाम की महिमा को बढ़ाने
के लिए नेमाई
चेतने महा प्रभु ने हरि नाम का प्रचार किया जा रे
रे 1 दिन, मा भाव का
1 दिन है। निमाई अपने कमरे में भाव प्रकट कर रहे थे, गोपी भाव प्रकट कर रहे थे उसका वर्णन कर रहे थे।
और गोपियों का जो भाव है यह
सबसे उत्तम भाव है, गोपियों के भाव जो है ये सबसे उत्तम भाव है।
मा बाप ने कहा है गोपियों का भाव जो है सबसे उत्तम भाव है।
चेतने बाब ने कहा है गोपियों का भाव जो है यह सबसे उत्तम भाव है।
मा गैर गोपी गोपी गोपी कह रहे
थे हाँ प्रभु गोपी गोपी गोपी कह रहे थे तो
गोपी गोपी गोपी।
तो सामने के विद्यार्थियों ने जब सुना के निमाई जो हैं वो गोपी गोपी गोपी कह रहा है
क्या गोपी गोपी बोल रहे हो
तो उन्होंने हा क्या गोपी गोपी बोल रहे हो हरे कृष्णा
बोलो निमाई को गुस्सा वो ब्यारी भागने
लगे तो निमाई को बहुत गुस्सा आया उनके क्रोध को देखकर विद्यार्थी भागने लगे,
निमाई उनके पीछे भागे निमाई भी उनके
पीछे भागे
निमाई 1 बार छोड़ रहे हैं तुम हमारे विद्या का अपराध किया में करोगे हम देखेंगे है।
तो उन्होंने कहा कि हम हम इसको छोड़ रहे हैं आपने हमारे विद्यार्थियों के प्रति अपराध किया है भविष्य में करोगे तो हम आपको देख लेंगे
सोचाकर यहाँ क्या देखा जा रहा है ये विद्यार्थी को
तो मैं ने सोचा कि मैं प्रकट हुआ हूँ बच्चों का उद्धार करने के लिए और यहाँ ये जो विद्यार्थी हैं वो मेरी पोजिशन को नहीं समझ
रहे तुमने क्या सोचा मुझे अभी सन्यास
तो उन्होंने क्या सोचा मुझे अभी सन्यास
लेना चाहिए भारत सन्यासियों को
क्योंकि भारत में सन्यासियों को आदर दिया जाता है ् तो फिर निमाई ने सन्यास ग्रहण किया
महाबबुचाशुरूकिया हर प्रकार के समाज के लोगों का
तो चतनेमहाबबूनेजब प्रचार शुरू किया तो उन्होंने समाज के हर प्रकार के लोगो का उद्धार किया
लोग
तो 1 बार उनकी चर्चा हुई दूसरे धर्म के लोगों के साथ बुध बुध बुध धर्म के बुध धर्म
वो जो मुझे भक्त है वो महा प्रभु के प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाये तो जो बुद्दिस्ट
थे वो महाप्रभु के प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाये
का मन हुआ तो
1 तरह से उन्होंने देखा की उनके जो गुरु जी हैं उनका अपमान हुआ है बदला लेना है उन्होंने सोचा की हमें बदला लेना है ने क्या किया उन्होंने क्या किया में 1 प्लेट में खाना सड़ा हुआ खाना डाला
हो गए बहू को यह हम आप के लिए महा प्रसाद लाये है
गए वहाँ प्रभु के पास यह कह कर कि हम आपके लिए महा प्रसाद लाये हैं
को दे रहे थे निमायक निमाई को वो
पीतल की थाली में लेके गये और वो उनको दे रहे थे निमाई को दे रहे थे पीतल की थाली
के थाली उठाकर दे रहे थे,
जब वो पीतल की थाली उठाकर उनको दे रहे थे तो ऊपर से 1 बार आई
बाज ने सारा खाना मुंह में रख लिया की सारी गुरुजी के
बाद में वो सारा खाना अपने मुँह में रख लिया और जो थाली है वो जो गुरुजी थे उसके उनके सिर पर गिरी
सो गुरूजी हो गये गुरू जी बेहोश
हो गए
हमारे अपराधी विचार के कारण
है तो उनको लगा की हमारा जो अपराधी विचार था इसी कारण से हुआ है
गुरूजी।
तो उन्होंने ये निवेदन किया कि गुरुजी को बचाओ निवाई से
उनके कानों में
जाकर हरी नाम को सुना उनके निवा ने कहा उनके कानों में जाकर हरि
नाम सुनाओ नाम सुनाया और इसके कारण गुरू जी जीवित हो गये तो उन्होंने
हरिनाम सुनाया तो इसके कारण उनके गुरु
जी जीवित हो गए और ये क्या बन गए
और वो फिर वैष्णव बन गए वो बुझ सी वैष्णव बन गए
तो मुझे मा आप।
तो चेतने महाबोब ने अपने प्रचार से हर प्रकार के व्यक्ति को अपनी और आकर्षित किया
यही कहते थे
और जिसको भी मिलते थे वो यही कहते थे कि कृष्ण का नाम लो और कृष्ण का उपदेश करो करो 1 समय चेतने महा बाबू आये वाराणसी और
सन्यासियों की
सभा सदर रही थी, वहाँ पर मायावादी सन्यासियों की सभा चल रही थी और
10 हजार सन्यास सभा सदर रही थी
10 हजार मायावादी सन्यासियों की सभा चल रही थी और
गुरु कौन थे उनके
गुरु कौन थे प्रकाश प्रकाशनंद सरस्वती यात्रा करके जब वृंदावन से वाराणसी पहुंचे तो
वो थे जो 1 भक्त चंद्रशेखर के
घर में वो रहते थे उनके 1 भक्त चंद्र शेखर के घर में चंद्र
शेखर जो था बड़े पतित खाना का
था, चंद्रशेखर जो था वो बड़े पतित खानदान का था वो चंद्रशेखर
मिले माँ
प चन्द्रशेखर और तपन मिश्रा मिले महाप्रभु से
हम आपकी सन्यासी भी बहुत जिंदा,
तो उन्होंने कहा की हम आपकी बेस्टी नहीं सह सकते, ये जो मायावादी सन्यासी हैं ये आपकी बहुत निंदा करते हैं।
माया वादियों का बड़ा विरोध किया बड़ा
विरोध किया है वैसे तो चेतना महापुर मायावादियों का बहुत विरोध किया है
करते थे माया वादियों को
और बक्सा प्रचार करते थे, वो भी मायावादियों की बहुत जिंदा करी मायावादी अपमान है जो मायावादी ये कह रहे हैं 1 रूप से यह भगवान का अपमान है, आपके हाथ
पैर नहीं है, आपका कोई रूप नहीं
है, आपके हाथ नहीं है, पैर नहीं है, आपका कोई रूप नहीं है
वाली सन्यासी, वो कह रहे थे ये बड़ा पागल,
तो वो मायावती संन्यासी कहते थे ये है तो बड़ा विद्वान लेकिन पागलों की तरह नाचता है, गाता है
ा आपकी बहुत बेस्ती हो रही है।
तो उन्होंने जब रस आया चतनेमहाबरोतो उन्होंने कहा की आपकी बहुत बेस्ती हो रही है, आप इन मायावादियों ऐसी मिली है
तू जो है वो आप से रहेगा,
भक्तों की जो भक्त हैं वो अपनी बेस्ट तो सह लेते हैं लेकिन वो भक्तों की और भगवान की बेस्ट नहीं सहते। तो भक्तों के कहने पर चैतन्य भाव ने निर्णय कर लिया कि वो मायावादी संन्यासियों से मिलेंगे
भक्त हैं।
सभा पहुँचे तो वहाँ उस सभा में चतन्य भा पहुँचे।
सन्यासी ऊँचे मंच पर बैठे थे।
वो सारे जो सन्यासी थे वो ऊँचे मंच पर बैठे थे।
वो बैठे बैठे होते है।
महाबर कहाँ बैठे वहाँ पर बैठे होते हैं मंदिर में जाने से पहले।
और
वहां पर उन्होंने बहुत अदभुत लीला। प्रकट की
चेहरे प्रकाश उनकी तुलना की जा रही है। लाखों सूर्यों के प्रकाश है।
तो जेतने महबूब ने अपने चेहरे से इतना प्रकाश प्रकट किया जिसकी तुलना की जाती है लाखों सूर्यों से।
तो माया देखा इस प्रकाश को, वो आश्चर्य चकित हो गए।
तो मायावादी सन्यासियों ने जब देखा इस प्रकाश को तो वो आश्चर्यचकित हो गए
इतना प्रकाश सन्यासी के चेहरे से इतना
प्रकाश इस सन्यासी के चेहरे से उनके
गुरु ये ऊपर बैठा तो उनके जो
गुरु थे प्रकाशन वो आये मंच से निचे और उनके हाथों को पकड़ कर तने भावों को ले गए, अपने मंच
पर की चर्चा हुई।
फिर उनकी चर्चा हुई और उन्होंने पूछा
इतने बड़े विधान हो हमारे साथ बैठकर अध्ययन करना चाहे। आप पागल यदि नाचे हो, गाते हो।
तो उन्होंने चर्चा की के आप जो है संस्कृत के इतने बड़े विद्वान हो तो आपको। तो हमारे साथ बैठ कर इसके वेदांत पर चर्चा करनी चाहिए। आप को पागलों की तरह नाचते हो, गाते हो।
मेरे गुरु ने देखा की मे में कोई योग्यता नहीं है। गुरु ने कहा अगर कोई योग्यता नहीं है जो शायद हरी कृष्णा।
तो मेरे। जब गुरु ने मुझे देखा तो उन्होंने कहा कि तुम्हारे में कोई योग्यता नहीं है। तो अब सिर्फ जो है चैट हरी कृष्णा लो
महा महिमा का वर्णन।
तो महाप्रभु ने हरिनाम की महिमा का वर्णन किया।
उसका क्या प्रभाव हुआ। माली सन्यासी थे उनके ही नाम की महिमा का गंगा जब सुना वो भी हरीराम को स्वीकार कर तो इसका क्या
इसका यह प्रभाव हुआ कि जो सारे वो सन्यासी थे उन्होंने जब महिमा को सुना तो उन्होंने भी हरी राम को ग्रहण कर लिया। इस से कितने बने हर प्रकार के लोगों को आकर्षित किया।
वो दक्षिण भारत की यात्रा में दूर दूर से लोग आते थे। उनकी यात्रा को देखे जब वो दक्षिण
भारत की यात्रा में थे तो दूर दूर से लोग आते थे उनकी यात्रा को देखने के लिए।
यात्रा को देख कर वो भी नाम के पति आकर्षित हो जाते थे।
उनकी यात्रा को देखकर वो भी हरिनाम के प्रति आकर्षित हो जाते थे।
पूरा
इस प्रकार पूरा दक्षिण भारत वैष्णव बन गया।
अलग लीला है और स्वयं भगवान है,
भगवान अनंत लिलाये हैं और वो स्वयं भगवान है।
भक्तों के साथ शिवा संगन में किस
कर ते थे तो जितने महा बाबा अपने भक्तों के साथ श्रीवास आंगन में कीर्तन करते थे। 1 पूरा साल कीर्तन किया, 1 पूरा साल कीर्तन किया। सारी रात सारी रात कीर्तन करते थे।
तो तो 1 दिन को भूख लगी
है तो 1 दिन की दिन के बाद भक्तों को भूख लगी। भूख लग रही है। तो उन्होंने कहा हमें भूख लग रही है। मा बव ने लीला प्रकट की अदभुत
लीला, उन्होंने 1 आम का बीज बो
दिया, उन्होंने 1 आम का बीज बो दिया और तो वो बीज जो है इन्स्टंट ली मिनटों में ही वो 1
पेड़ बन गया में 200 आम तो
उस पेड़ में 200 आम आम लग गए,
1 आम खाने से पेट और
1 जो है इतना बड़ा था भारी था की 1 आम खाने से पेट भर जाता था
पूरे साल के लिए और रोज वो पे
तो 1 साल तक भापरगनेकेतनकिया श्रीवास आंगन में और वो पेड़ जो है रोज केतन के समाप्ति पे 200 आम देता था रोज 1
आम भाई पूरा पेट भर जाता और
इतना भारी था वो इतना बड़ा था कि 1 आम से ही सब का हर 1 भक्त का पेट भर जाता
था और आम में कोई हड्डी नहीं थी
और वो ऐसा आम था उसके अन्दर कोई हड्डी नहीं थी और न ही उसका कोई छिलका था सिर्फ मीठा मीठा जूस जितने महापउन्हेंअपने दिव्य लीला प्रकट
की तो 1 ब्राहमण
तो 1 ब्राह्मण था जिसके हृदय में इर्शा थी श्रीवास के प्रति उ,
श्रीवास को इतना आदर मिल रहा है मुझे
तो वो कहता था कि श्रीवास को इतना आदर मिल रहा है
मुझे देश की कमियाँ है
इश्शाद्वेश, ये हम सब की कमियाँ है।
माँ बापू ने कहा है की हमें इस से बचना चाहिए, माँ बाबू ने
कहा है कि हमें इश्शद्वेशसे बचना चाहिए
तो घर के आगे दुर्गा रेवीनीकीपूजा।
तो इस ब्राह्मण ने श्रीवास के घर के आगे जो है दुर्गा देवी की जो पूजा करते हैं जिससे वो सामान रख दिया शराब वगैरा शराब वगैरह हो।
तो देखा ये जी पूजा मान।
तो श्री राज ने जब दरवाजा खोला घर का तो देखा कि दुर्गा की पूजा का सारा समान है देखो पड़ोसी
तो दुर्गा का भक्त, तो उन्होंने बोला
सारे पड़ोसी को देखो पड़ोसी में तो दुर्गा का भक्त हूँ तो
विश्वास नहीं, य लोगों ने भी विश्वास नहीं किया,
लोगों ने विश्वास नहीं किया और
हमने स्थान को साफ कर दिया और सबने
उस स्थान को साफ़ कर दिया।
पर क्या परिणाम हुआ?
पर क्या परिणाम हुआ, क्या हुआ, क्या
हुआ ये भी ब्राह्मण हैं। गहरी कोड की बीमारी हो गई और
जो ब्राहमण है उसको गहरी कोड की बीमारी हो गयी।
वो बहुत वो बहुत दुखी था, और
कष्ट में था, दुखी था और कष्ट में था।
2 मुझे बुझा, 2 मैंने अपराध किया,
माफ़ कर 2 तो उन्होंने कहा कि मैंने जो अपराध किया है मुझे माफ़ कर 2 लोगों को माँ नहीं तुमने
इतने सब
माँ बाबू ने कहा नहीं तुमने इस 1 उत्तम वैष्णव की निंदा की है, तुम तड़फते रहो, वो
लौटे और गंगा नदी जा रहे थे स्नान के
सन्यास लेके जब लौटे और चेतन्य महाबोर नदी में जा रहे थे स्नान करने के लिए, तो ब्रामण फिर मिला उनको
माँ ने कहा मैं तुम्हें माफ़ नहीं कर सकता, तुम श्रीवास के पास जाओ, वो तुम्हे माफ़ करे तो ठीक
है, मैं तुम्हें माफ नहीं कर सकता, लेकिन तुम अगर श्रीवास के पास जाओ वो तुम्हे माफ़ करे तो ठीक।
है माँ
और ये ब्राह्मण जो है ये श्रीवास के पास गए और श्रीवास उन्हें माफ किया और श्रीवास ने उनको माफ़ किया।
अनेक उदाहरण है क्या हम से है।
तो चेतन चरित्रामृत में अनेक उदाहरण हैं जहाँ हम ये समझते हैं कि हमें वैश्नव अपराध से बचना चाहिए,
परिणाम
है तो वैश्नव जो अपराध है उसके परिणाम से हम फिर बचते हैं।
1 पपू आंगन में हमको
तो 1 ब्राह्मण था, उसके ह्रदय में बहुत क्रोध था कि श्रीवास आंगन में जब सिफक्ुतन करते है तो हमे आज्ञा नहीं है, हम इनको इसको देख सके
देखा गंगा में है स्नान करने के लिए,
1 बार वो जब गंगा पर गए स्नान करने के लिए। मापूतो ब्राह्मण ने कहा मैं
दिया हूँ की तुम्हे कभी बौजिकसुनहीमिला।
तो उन्होंने कहा कि मैं जब कल रात को अन्दर घुसना चाह तो आपके भक्तों ने रोक दिया मुझे तो मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि तुम्हे कभी भी भौतिक सुख नहीं मिलेगा। शुक्र महा बबा ने कहा शुक्रिया है
कोई ऐसा
तो हमें कोई ऐसा शाप दे की आपको कभी भौतिक सुख नहीं मिलेगा। तो हमें खुश हो जाना चाहिए। तो आज के दिन हमें इस चने मावो की लीलाओं और उनके उपदेशों का स्मरण करना चाहिए।
महा प्रभू का उपदेश,
महाप्रभु का उपदेश्य और सिद्धांत जो है वो हम पढ़ते हैं। चेतने चरित्र मृत में
विषय में 3 परसेंट ग्रंथ है। दौरा ज्ञान प्राप्त कर सकते है।
चेतने महापूर्व के विषय में 3 ग्रंथ है जिनसे आप उनके बारे में ज्ञान प्राप्त कर सके। 1 श्री चेतन्य चरितामृत ज्यादा से धन
और कम लीलाएं हैं।
तो जिसमे ज्यादा से है और कम लीलाएं हैं, भागवत फिर है। चेतने भागवत लीला का वर्णन है,
गहराई
के साथ है, जिसमें लीलाओं का वर्णन है गहराई के साथ। और चैतन्य मंगल और चैतन्य मंगल के
मंगल को ठाकुर ने मंगल नाम दिया
था, कहते हैं पिदवनदासठाकुर ने चैतन्य भागवत को चैतन्य मंगल नाम दिया था।
फिर होंने देखा की दास ठाकुर ने कितने मंगल नाम के उसका प्रकाशन किया, फिर नाम बदल दिया।
जब उनको पता लगा की लोचनदास ठाकुर ने जो नाम दिया है चैतन्य मंगल दिया है। तो फिर उन्होंने अपने ग्रंथ का नाम बदल दिया और उसका नाम फिर चैतन्य भाग
सिद्धांत
और शिलेपहुबालने चेतने चरित्र में दिया। हमने उसका ट्रांसलेशन किया क्योंकि शिलेपहबाद हमें सिद्धांत देना चाहते थे।
े पढ़ते हो
तुम प्रभु का उपदेश, आप पढ़ते हो चने चरित्र
के अंत में अगर आप ध्यान से सुनोगे तो करेगा।
तो अगर आप ने बाबा की लीलाओं को ध्यान से सुनोगे तो हमारा जो भौतिक आकर्षण है वो घटेगा। आज के दिन हमें महा प्रभु की लीलाओं का स्मरण करना चाहिए।
रोज रोज
यही नहीं 1 ही दिन करो रोज
थे, उन्हें पता था की
स्वयं भगवान है, आज 4 जो थे उनको पता था की माँ स्वयं भगवान
हैं, उनकी पुकार
उनके पुकार के उत्तर में ही भगवान प्रकट हुए थे।
और जो माँ बाप को बहुत आदर
देते थे और जो अद्वत्यचारयथेचतन्य भाव को आदर देते थे, माँ तो ने महा बाबू को भी था चारे जो है वो महा विष्णु के अवतार है।
तो वो उनको देते थे।
तो वो उनको बहुत आदर देते थे
या खुश नहीं थे, मुझे इतना आदर मिलता है।
तो चारे खुश नहीं थे कि मुझे इतना आदर मिलता है, मुझे
माह को करना है।
तो उन्होंने सोचा की मुझे महाप्रभु को क्रोधित करना है।
तो उन्होंने मायावादी सिद्धांत का प्रचार।
तो उन्होंने मायावादी सिद्धांत का प्रचार शुरू
कर दिया, तुम भगवान, हम भगवान, भगवान,
तुम भगवान, हम भगवान, सब भगवान। तो ये सूचना पहुँच गयी, महाप्रभु तक
सच है कि मायावती सिद्धात का प्रचार कर रहा है।
तो उन्होंने नित्यानंद प्रभु से पूछा की ये बात सच है, मायावती सिद्धांत का प्रचार कर रहा है, हाँ बिल्कुल सच है। उन्होंने कहा हाँ बिल्कुल सच है, मैंने भी सुना है, मैंने भी सुना है
हो गए, वे
तो इतने क्रोधित हो गए, न्होंने पैर रखा चारे के ऊपर और कहा की तुम भी मायावती सिद्धांत का प्रचार कर रहे हो,
माँ को पता लगा, नाटक था,
को पता लगा, यह तो सब नाटक था
माँ पर मन को इतना नहीं े।
तो क्योंकि अध्यत्यचारे चाहते थे कि माँ पुर उनको डांटे,
स्वयं भगवान,
चेतनेमाबूस्वयं भगवान है।
1 दिन दुनिया के कोने कोने में यही नाम का उचारण होगा।
तो उनकी भविष्यवाणी थी कि पृथ्वी के 2 नगर आदि ग्राम सर्वत्र प्रचार हुई मरो नाम कोने कोने में, उनके नाम का प्रचार होगा,
विश्व के कोने कोने में पहुँच गया है।
आज का और महान आचार्यों की कृपा से हरिनाम जो है विश्व के कोने कोने में पहुँच गया है। ओ
में हरिनाम का प्रचार खुले रूप से किया, बिना किसी भेद भाव के।
तने महाबोब ने हरिनाम का प्रचार खुले रूप से किया, बिना किसी भेदभाव के।
उन्होंने ये नहीं देखा कि कौन योग्य है, कौन नहीं है।
उन्होंने ये नहीं देखा कि कौन योग्य है और कौन नहीं है, बारिश बारिश
बढ़ती है, ये नहीं देखती की सागर है यह बिना भेद भाव के बादल पानी को बरसते तो बादल है।
जैसे बिना भेद भाव के वो बरसते हैं। ये नहीं देखते की यह सागर है या ये जो है, रेगिस्तान है या यह साधारण पृथ्वी है। को सब जगह 1 ही तरह से बरसते हैं।
खुशी ने ये नहीं देखा कि कौन कौन सी के करेगा कौन नहीं करेगा।
तो जतन बाबू ने इसी प्रकार ये नहीं देखा की कौन सी कार करेगा कौन नहीं स्वीकार करेगा,
कोई नियम नहीं है, अभी भी कर सकते हो।
बाबा ने कहा कोई नियम नहीं है, आप हरि नाम का उच्चारण किसी भी समय कर सकते हो,
हरी नाम का पूरा लाभ उठाना चाहते हो। तो अपराध से हमें बचना चाहिए।
अगर हरी नाम का पूरा लाभ उठाना चाहते हैं तो अपराधों से हमें बचना चाहिए।
जब तक आप अपराधों से रहे उछा नहीं करोगे उसका पूरा लाभ भी मिलेगा।
कृष्णदास कविता जी कहते हैं अगर आप बहुत जन्म, अगर आप ये नाम करो और अपराधों से नहीं बचोगे तो आपको हरिनाम का पूरा लाभ नहीं मिलेगा।
और माँ ने कहा नाम का सदा करना चाहते हो, क्या भाव होना चाहिए।
लोगों ने कहा कि अगर आप सदा हरि नाम का उच्चारण करना चाहते हो तो क्या भाव होना चाहिए
हमारा नाम बना लेना का उच्चार करना।
बाबू ने कहा ना तो हमारा भाव जो है बिल्कुल विनम्र होना चाहिए अगर हम सदा हरिनाम जप करना चाहते हैं
न। गुरु भाई से कहा मैंने ये ड्रग टॉनिक बनाया है
1 बार अपने गुरु भाई से। प्रोपज ने कहा मैंने 1 ड्रग टॉनिक
बनाया है में फार्म बाजी के अलाहाबाद
में अपनी फार्मेसी थी गुरु
अरे बाबू मुझे मुझे।
तो उन्होंने कहा अरे बाबू मुझे कोई ऐसे टिक नहीं चाहिए मुझे ये बताओ की हरी नाम में रूची कैसे बढेगी
हा नो द फार्मुला मेडिसिन इस रेडी।
तो उन्होंने मेरी विनेवरता से हा आई नो द फार्मुला वे मेडिसिन नोट रेडी।
उन्होंने पूछा क्या है फॉर्मुला तो होंने
पूछा क्या है फार्मुला? तो उन्होंने कहा सुनी तरोरी सदाहरी हम
सब को विनम्र भाव अनुकूल करना चाहिए।
हम सबको विनम्र भाव अनुकूल करना चाहिए। सबके दास बना, सबके दास बनो,
सबके सेवक बोलो, सबके सेवक बनो में यह भाव होना चाहिए सेवा भाव।
और हमें ये भाव होना चाहिए सेवा भाव।
ध्यान से तेजी के साथ
जितने आप गहराई से हरिनाम का उच्चारण करोगे, उतना तीव्रता से आपके अनर्थ हटेंगे, हरी कृष्णा
हरे कृष्णा महाराज धन्यवाज, महाराज, आपने इतना कथा सुनाया। महाराज पति शब्द का क्या अर्थ होता है? पी जी महाराज हम सबसे ज्यादा निकम, कोई योग्यता नहीं है।
हमें आपकी कृपा चाहिए, हमे आपकी कृपा चाहिए।
तो सबको आने 2 बिना किसी आदर की उम्मीद, सबको आदर 2 बिना किसी आय की उम्मीद रखे है, सबको आदर
2 बिना किसी आदर की उम्मीद। रखे वापस में और विशेष है। हम हृदय से हार्दिक पर प्रकट करना चाहते हैं।
पर
रे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
राम राम।
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