भक्ति में प्रगति न होने का क्या है कारण? | SB 3.24.26-34 | 11 Apr 2006 | Srila Gopal Krishna Goswami

यह व्याख्यान श्री गोपाल कृष्ण गोस्वामी द्वारा 11 अप्रैल 2006 को दिया गया एक विस्तृत प्रवचन है, जिसमें श्लोक "भक्ति में प्रगति न होने का क्या है कारण?" (श्रीमद्‑भगवतम् 3.24.26‑34) का विश्लेषण किया गया है। प्रवचन कई प्रमुख बिंदुओं को सम्मिलित करता है: (1) भक्ति में प्रगति न होने के मूल कारण – अज्ञान, इंद्रियों की लिप्तता, अहंकार, तथा भक्ति‑योग के अभाव; (2) भगवान के विभिन्न रूपों और विस्तारों की संख्या (99, 9, हजारों) तथा उनके दिव्य वर्षों की गणना, जिससे भौतिक समय में उनका अनुपात स्पष्ट किया गया; (3) विभिन्न ऋषियों‑संतों (कदमामुनी, कपिल‑देव, महा‑पूरी आदि) के जीवन‑उदाहरण, जहाँ भगवान ने विभिन्न रूपों में प्रकट होकर भक्तों को मार्गदर्शन दिया; (4) वास्तविक (परम) ज्ञान बनाम सापेक्ष (परिवर्तनीय) ज्ञान की अवधारणा, जिसमें वास्तविक ज्ञान अनंत और अपरिवर्तनीय बताया गया; (5) भक्ति‑योग के अभ्यास‑तत्व – नाम‑जप, शास्त्र‑वितरण, सेवा, धैर्य, विनम्रता, तथा गुरु‑परम्परा के माध्यम से आध्यात्मिक नेत्र को खोलना; (6) सच्चे भक्त के गुण – साहस, धैर्य, सेवा‑भाव, निरंतरता, तथा सभी जीवों के प्रति मित्रता‑भाव। प्रवचन में कई पौराणिक कथाएँ, गणनात्मक उदाहरण, और व्यावहारिक निर्देश सम्मिलित हैं, जो श्रोताओं को भक्ति‑प्रगति के अवरोधों को पहचानने और उन्हें दूर करने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय, नम भगवते वासुदेवाय, magaansaanjnashlca mitana mishra godara srecेtनaनvsm sapiतanaभuतlे s्wmrुpकधamzति स्वापगंदिहम बंदे हम, श्री गुरु, श्रीवतापकश्रीगुडुन पैशन, श्री रुपाम सग्रजतम सहगान रगना तमतम, कम सजेवम सदवेशमसुधूसम परिजना सायतन कृष्णा चेतन्या सेवम, श्री राधा कृष्णा पदा सगना ललिता, श्री विशाखन दम शम, हे कृष्णा करुणा सिन्धो दीन गोपेश गोbिककंतरादाकद मोसुतेसबताकजना, गोरा गी, राधे वृंदावनेश्वरी, रिषबनसुतदेवी ने, हरी कृपा सिंधु पे बचाव परिदान पवेवियुवशदेवियो नमो नम जय, श्री कृष्णा चेतन्या प्रभूनिकनंद, श्रीयदेतगरधरवाजले विन्द हरे सारे सारे siam भगवान जान भक्त। तो ये श्लोक का उच्चारण कर दाम मुनि कर रहे हैं। आपने पिछले अध्याय में पढा है के किस प्रकार कदम मुनि ने बहुत गहरी तपस्या की थी और कृदामामुनीकोई साधारण गिया पुरुष नहीं थे? उनके पास योग सिध्य उन्होंने अपना विस्तार किया था? कितने रूपों में 99 रूपो में अपना विस्तार किया? जो योगिक दिन केवल योगिक सिद्धिया है? व ज्यादा से ज्यादा विस्तार करे तो 9 रूपों में कर सकते हैं और परम भगवान जब विस्तार करते हैं वो हजारों रूप में कर सकते हैं। जैसे जब भगवान द्वारका में थे, उन्होंने अपना विस्तार किया था और 1 साथ 16 हजार 100, 8 महिलों में निवास करते थे। सुकरधानामुनी ने तपस्या का पालन किया था और भगवान प्रसन्न होकर उनके और देवहूती के घर में प्रकट हुए? किस रूप में? भगवान कपिल देव के रूप में? यहाँ कहा जा रहा है? मुनि द्वारा सदा अपने भक्तों का मान न करने वाले, भगवान, आप अपने बचों को पूरा करते तथा वास्तविक ज्ञान का प्रसार करने के लिए मेरे घर में अवतारित हुए हों तो भगवान अपने भक्तों के घर में अवतरित होते हैं। भगवान जब प्रकट होते है पृथ्वी में, वो प्रकट होते हैं, अपनी इच्छा के अनुसार और अपने ही भक्तों को माता पिता के रूप में स्वीकार करते हैं। जैसे कि वासुदेव देवकी। इन्होंने 10 हजार देवताओं के वर्षों के लिए 12 नहीं। देवताओं के देवताओं का वर्ष कैसे गिना जाता है? हमारे भौतिक जगत के 6 महीना उनके 12 घंटे के बराबर हैं। अंदाजा लगा 6 महीना कितने घंटे, वह हमारा 1 साल उनके 24 घंटे के बराबर है। तो 10 हजार 10 हजार कितने भौतिक वर्ष कितने बने है? मकैल्कुलरकरना पड़ेगा 10 हजार देवताओं के वर्षों के लिए वासुदेव देवकी जो थे, उन्होंने इतनी गहरी तपस्या की कि आप इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, दिन रात उनका चिंतन था। कब भगवान प्रकट होंगे हमारे घर में? और क्या खा रहे थे? वो 3 दफा खाते हो, न कल योजना कल चर्चा हुई थी? 3 बार वार देव की खा रहे थे कि वो हवा और जो सूखे पत्ते बरक्श से गिरते हैं, उसे केवल उठा कर खा रहे थे। बस टीवी देख ले। 10 हजार देवताओं के स्थानों के लिए, भगवान कृष्णदेव ने महाराज नावी और मेरू देवी को माता पिता के रूप में स्वीकार किया। महाराज ना भी राजा होते हुए भी उच एकोडी भक्त हैं। वो मेरू देवी तपस्या का पालन कर रही थी और उनकी इच्छा थी की भगवान जैसे पुत्र प्राप्त हो। भगवान ने कहा की मेरे जैसा पुत्र होना तो असम्भव है, मैं ही तुम्हारा पुत्र बन जाता हूँ। पर भगवान क्यों प्रकट हुए उनके घर आने में, क्योंकि वो भी बड़ी घरी तपस्या का पालन कर रही है। तो इसी प्रकार यहाँ के भगवान प्रकट हुए कदामामुनीऔर देवहूती के घर में, देवहुती घर से। जब भगवान देवहुति घर में थे, ब्रह्मा जी ने ये उन्हें सूचित कर दिया था कि भगवान आज घर में भी प्रकट हो चुके हैं। और माता को पता था क्योंकि गर्भ में कौन हैं। और अब भगवान ही प्रकट होने वाला है। इतिहास में 2 कपिल देव अवतार हुए हैं। इसीलिए ब्रह्मा जी ने कहा है इस अध्यापक, इस अध्याय में ही कि कपिल देव देवहूती का पुत्र आज पापा जी प्रिथी थे। तो 1900 सेवेंटी सिक्स में शायद क्रॉस मिनान में 1 बहुत बड़ा पांडाल हुआ था, तो वहाँ प्रॉपटी ने प्रवचन दिया था, 1 हफ्ते के लिए प्रवचन दिया था कपिल देव की शिक्षा के ऊपर और वही लेकर जो प्रॉपर्टी में दिए थे। बॉम्बे क्रॉस मिना में वो प्रकाशित हुए हैं। 1 ग्रंथ के नाम टीचिंग, गौड, कपिला और साथ में आगे ये लिखा हुआ है सन और देवहूती कपिला देव जो की देवहूति के पुत्र हैं। क्योंकि इतिहास में 2 कपिल देव हुए हैं, 1 पे होंगी, 1 थे असल, असली कपिल देव हैं कौन देवहूती के, तो भगवान और भक्तों में ये कॉम्पिटिशन रहता है, क्या भाग जाते है भगवान का गुणगान करें, भगवान चाहते हैं भक्तों की प्रशंसा करें और कई बार भगवान को वेश बदल कर। आना पड़ता है भक्तों की सेवा के लिए। जैसे की महानंदा पूरी, जो की ईश्वर पूरी के गुरु थे, वो बड़े ऊँचे कोटी के भर थे, क्या वे किसी से कुछ मांगते नहीं थे, मिल जाए कुछ स्वीकार कर लेते थे, कुछ नहीं मिला तो भूखे रहते थे, आपका भी यही स्वभाव है, मिल जाए तो लेते नहीं, मिला तो भूखे रहकर सेवा करते हो, सच वाले नहीं, हम नहीं मिले, पर स्ट्राइक में चले जाते हैं। पर पूरी कभी किसी से कुछ मानते नहीं थे। तो न्होंने गोदान की परिक्रमा की थी गोवर्धन परिक्रम समाप्त करके गोद में 1 ब्रिक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे और वहाँ उन्हें भूख लगी हुई थी और वो कभी किसी से मानते नहीं थे। तो भगवान ने 1 सुन्दर गाने का रूप ग्रहण करके 1 मटके में दूध लेकर आए। भगवान ने कहा मापसे हे संत माता, मुझे लगता है कि तुम थके हो तो मैं तुम्हे दूध लाया हूँ, तुम्हें दूध पियो और मैं लौटता हूँ गाय से दूध निकालकर। ये लौटा वापस लेने के लिए। माधुरी ने पूछा आपको कैसे पता था कि मैं भूखा हूँ? तो भगवान ने कहा कि औरतें जो जा रही थी कुएं से पानी लेने के लिए, वह आपके चेहरे को देखकर समझ गई की आज चल भूखे हो और मेरे गाँव में किसी को वर्त रखने की इजाजत नहीं, मेरे वर्थ गाँव में आपको प्रसार ग्रहण करना पड़ेगा। तो भगवान ये दूध का लोटा छोड़ कर चल पड़े। वहाँ से उसी रात को महा पूरी को 1 सपना आया और इस सपने में वो ही वाला जिसने उन्हें दूध पचाया था, सपने में आकर कहने लगा, मदन पुरी, मुझे गर्मी लगती है। मुझे मुसलमानों के अत्याचार से बचाने के लिए। उन जारियों ने मेरे विग्रह को खोद कर निचे इस थान में दबा दिया है। तुम वहाँ जा कर कल सुबह। उस थान को खोद कर मुझे वहाँ से निकालो और मेरी स्थापना करो। जब मां पुरी ने यह सपना देखा, सपने में पता लगा कि वो वाला जिसने उन्हें दूध पाया था, वो स्वयं भगवान थे, वो शर्मिंदा हो गए, शर्मिंदा हो गए। मैने भगवान से सेवा ली है। कई बार हम जुड़ते हैं, भगवान की सेवा में हम और हम उम्मीद रखते हैं। हम हम सेवा में जुड़े है। अब भगवान हमारी सेवा करेंगे। जो भी हमारी इच्छा है, पूरी हो जाएगी। हमें यहाँ लगायेंगे बिजनेस होना, बन जाएगा। को पत्नी चाहिए, विदेश की यात्रा चाहिए, क्यों चाहिए भगवान जरूर इच्छा पूरी करेंगे। पर भारत का यह विचार रहता है कि मैं भगवान की सेवा करूँ कि भगवान हमारी सेवा करे, रगनsgoस्वामि करोड पिता के इकलौते पुत्र थे, उन्होंने हर प्रकार का भौतिक सुख त्यागा भगवान की सेवा में जुड़ने के लिए और गनास्वामीराजगुं में गर्मी के समय जाप करते थे। 24 घंटे में डेढ़ घंटा, दिन में केवल व सोते थे, दिन में 1000 से ज्यादा दाबाद करते थे, लोगो को और खाने के लिए थोड़ी सी चाट पीते थे बस और कुछ नहीं तो रगnaदasgosामी रालपुर जाओ। तो अनेक संत महात्मा की भजन कुटीर देखते हो। और उस समय कोई भजन कुटीर का स्थान नहीं था। तो रगनादाजकोस्वामी वहाँ जाप करते थे। और 1 दिन इतनी गर्मी थी कि राधा रानी जी आई पीछे से अपने साड़ी को ऊपर छाता के रूप में रखा, रंगनाथ के सिर पर की रंगनाथ को गर्मी नहीं लगे। तो जैसे आप बहुत गर्मी हो तो आप टोपी पहनते हुए छाता खोलते हो। तो राधा रानी पीछे खड़े हो गए अपने डिपेको छाता के रूप में उनके सिर पर रखा। सनादगोस्वामी वहाँ से गुजर रहे थे। और जब सनातन गोस्वामी ने देखा तो उन्होंने फिर डाटा रूप स्वामी को रगुनाथ को क्यूं डाटा की तुम ने राधा रानी से सेवा ली, तुम्हें लाज नहीं, रानी से सेवा ली। हमारा कर्तव्य है उनकी सेवा करना, उनसे सेवा लेना नहीं। इसके बाद फिर रगनाथ जी ने 1 भजन कुटिल बनाई और उनके भजन कुटीर लाल पहली भजन कुटीर की। तो यहाँ कदम मुनिजी कहते हैं आप सदा अपने भक्तों का, जो आदर है भक्तों का, मन मानव सदा करते रहते हो। भगवान की इच्छा रहती है भक्त का गुणगान करें और भक्त की इच्छा रहती है भगवान का गुणगान करें। कई बार लोग कहते हैं कभी कभी सीधा भगवान के भक्त है। हमें कोई गुरु नहीं चाहिए, हमें चाहिए कुछ नही। भगवान क्या कहते हैं जो कहे मेरा भक्त और मेरा भक्त भक्त का भक्त है। 10, 10, 10, 10 वो है मेरा भक्त। भगवान। आगे कदम मनी जी कहते हैं क्या प्रकट हुए हो अपने वचन का पालन करने के लिए और असली वास्तविक ज्ञान का प्रसार करने के लिए। तो वास्तविक ज्ञान जो है वो हमें हर भगवान के द्वारा प्राप्त होता है। भगवान गीता के चौथे दहाई में। क्या कह रहे हैं? यदा यदा हि भी भारत में अलग अलग समय में अपने आप को क्या करता हूँ, पर करता हूँ और प्रकट करता हूँ अपनी इच्छा के अनुसार। आप और हम जो नाम देते हैं कर्म। पर निर्भर। भगवान प्रकट होते हैं अपनी इच्छा के अनुसार। और किसलिए भई सनाया सपना थाया भगवान प्रकट होते हैं किसलिए धर्म के नियमों की स्थापना। तो यहाँ आप पढ़ रहे होंगे। किस प्रकार भगवान कपिल देव प्रकट हुए हैं देवहूती के पुत्र के रूप में। तो यहाँ कदम मुनी जी कहते हैं कि आप प्रकट होते हो किसलिए वास्तविक ज्ञान का प्रसार करने के लिए। जो जो असली ज्ञान है, वास्तविक ज्ञान 2 प्रकार के ज्ञान है। 1 है वास्तविक ज्ञान, दूसरा है रेलेटिव ज्ञान, रेलेटवज्ञानरेलेटेव ट्रोट। तो जो रेलेटिव ट्रुटहैआज है, कल बदल सकता है। आज सरकार 1 नियम बनाती है, कल दूसरी सरकार गनी में बैठती है और नियम बदल देती है। आज 1 विज्ञानी कहता है? ऐसे होना चाहिए दूसरा विज्ञान का विरोध करता है। पर जो वास्तविक ज्ञान है वो कभी नहीं बदलता। जैसे हम सनातन धर्म का पालन करते हैं, जो कि अनादि काल से चलते आ रहा है। भगवान ने गीता का सन्देश देते हुए कहा कि मैंने ज्ञान सबसे पहले दिया था कैसे सूर्य के देवता विवास्वान को, जिससे ज्ञान पहुँचा कहाँ मनु मानवता के पिता, फिर चाकू को। दे के आदर में। तो अर्जुन ने पूछा कि मैं कैसे स्वीकार करूँ कि आप ने ज्ञान दिया था सूर्य के देवता को, जब कि वो आपसे पहले प्रकट हो चुके हैं। भगवान ने उत्तर में कहा बहुत बहुत बार तुमने मैंने जन्म लिया है। मैं अपने सब जन्मों का स्मरण कर सकता हूँ और तुम नहीं। और मैं ज्ञान तुम्हे क्यों दे रहा हूँ? क्यूँकि तुम मेरे प्रिय, भक्त और मित्र हो? इसलिए तुम ज्ञान के देवी और रहस्य को समझ पाओगे। तो इससे स्पष्ट स्थापित होता है कि अगर आप इस दिव्य ज्ञान के रहस्य को समझना चाहते हो तो भक्त वाला इस ज्ञान को हमें स्वीकार करना चाहिए। तो जो वास्तविक ज्ञान है इसका प्रसार होता है परम भगवान के द्वारा। और भगवान के अवतारों का वर्णन में कहा प्राप्त होता है? शास्त्र में 6 प्रकार के अवतार होते हैं। भगवान के, उषा, वतार, लीला, अवतार, गुना, अवतार, मन, युगावतार तो सकता। भगवान के अवतारों के अलग अलग विभाग हैं, जिनका वर्णन हमें शास्त्र में प्राप्त होता है। तो जब भगवान ने प्रवेश किया था, देव होती के घर में। ब्रह्मा जी ने सूचना दे दी थी कि आपके घर में कौन है? स्वयं भगवान हैं और भगवान भक्तों के पुत्र भी बन जाते हैं। जिसके द्वारा भक्तों को मौका मिलता है उनकी सेवा में जुड़ने के लिए। और भगवान सदा भक्तों का जो आदर है उसे बढ़ाना चाहते हैं। अब आगे जाकर प्रा पा जी इस लोक के तात्रेय में संख्या फिलोसफी का वर्णन करते हैं और इस समय आप चौबीसवें अध्याय को पढ़े हो। पर पच्चीसवें अध्याय से कपिल देव जी शिक्षा देना आरंभ करते हैं। इस सिद्धांत के विषय में कहा गया है भगवान जो प्रकट होते हैं, अपने ही देवीय शक्ति द्वारा प्रकट होते हैं। और सदा उनका लक्ष्य रहता है कि बज्जी प्रजा को जोड़ा जाए उनकी सेवा में। तो पर भगवान के द्वारा जो ज्ञान प्राप्त होता है वो है वास्तविक ज्ञान, जिसमें कोई दोष नहीं, कोई अपना नहीं, साधारण ज्ञान में कितने प्रकार दोष है, क्या है। 4 इंदिरा खून हैं, छलने की इच्छा और गलती करते हैं और क्या भ्रम में आ जाते हैं भ्रम में आकर जैसे कई बार अंधेरे में आप शाम को रस्सी मान लेते हो, रस्सी को शाम मानने तक। अंधेरे में। तो ये 4 प्रकार के दोष हैं बहुत ही ज्ञान में, परम भगवान में किसी प्रकार का दोष नहीं, तो परम भगवान होते। इच्छा के अनुसार और देवहूती ने परम भगवान से वृद्धि की थी कि आप कृपा करके हमें शिक्षा दीजिये। देवहुति ने कहा मैं जो 1 अज्ञान औरत हूँ और क्योंकि उन्हें पता था उनके पुत्र स्वयं भगवान हैं। तो उन्होंने हा ब्रह्माजी के शब्दों का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि मैं 1 अज्ञान औरत हूँ और मेरी जो इंद्रियां हैं वो सदा विचलित होती रहती हैं। और इस कारण मैं अज्ञानता की स्थिति में गिर गयी हूँ। और आप जो हो केवल 1 साधन हो जिसके द्वारा मैं इस अज्ञानता से छुट सकती हूँ। आप क्या हो आप वो मेरे आध्यात्मिक नेत्र? जैसे कि आप आँखों द्वारा हो। और जिनकी आंखें कमजोर हो वो चश्मा या कॉन्टेक्ट लेंस का उपयोग करते हैं। तो उसी प्रकार यहाँ देवहूती कह रही है अपने पुत्र से की आप हो मेरे आध्यात्मिक नेत्र, हमें आध्यात्मिक नेत्र के माध्यम से भगवान के संदेश को समझने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आप हो मेरे आध्यात्मिक नेत्र और आपकी असीम कृपा से मुझे यह अवसर प्राप्त हुआ। क्या आपसे दिव्य प्रश्न पूछने के लिए जब कपिल देव ने माता का ये प्रश्न सुना जिसमें माता ने कहा कि तुम मेरे ट्रांआध्यात्मिक नेत्र हो, मेरी इंदियों के काल में विचलित होती हूँ। अब तुम मुझे मार्ग दर्शन 2। तो कपिल देव जी यह सुनकर बड़े प्रसन्न हुए जैसे की आप भागवत के प्रदंसकदमेंपढते हो। कि जिया परे्षेलमणाने पूछा शविदेव स्वामी से की ये बताए की किस प्रकार जिस व्यक्ति का अंत आने वाला है उसे क्या करना चाहिए कि भगवान स्वामी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा इस उत्तर से परे समाज का। तो देवासी ने कहा कि अहंकार के कारण मैं अपनी इन्द्रियों से इंदियों के प्रभाव में आ गई हूँ। अभी हमें यह नहीं सोचना चाहिए अगर देवी कहती है तो मतलब की अगर भगवान की माँ पाया में इंदियों के प्रभाव में आ सकते हैं। हमारी क्या स्थिति ये उनकी निम्रता है? तो उन्होंने कहा कि अब मैं आपके शरण गत हो रही हूँ और आप हो वो चाबुक एक्स जिससे पेड़ कट सकता है। अब आप कृपा करके मेरी अज्ञानता की जो स्थिति है इसको दूर करो और फिर दे। उनके उत्तर में पुत्र ने फिर शंका फिलॉसफी का वर्णन किया जो की संक्षेप में भक्ति योग है। रापा जी बड़े रूप से आज के तातप्रीयमें समझा रहे हैं कि संख्या सिद्धांत और भक्ति योग में कोई अंतर नहीं। जो व्यक्ति यह कहे कि संख्या से और भक्ति योग में अंतर है वो असली संख्या सिद्धांत नहीं दे रहा। क्यूँकि संख्या सिद्धान के द्वारा हम मैटर स्पोट को समझते है। और उसका निर्णय क्या है कि भक्ति योग में भगवान के होना तो और ये सिद्धान क्या है के भौतिक आकर्षण से विराज्या उत्पन कर। नाम, राज्ञा और ज्ञाना। वेराज्ञाज्ञाना का अर्थ है दिव्य ज्ञान जो हम गुरु परंपरा द्वारा स्वीकार करते है। और जब अध्यात्मिक ज्ञान हो तो ही वे राजा की संभव है, संभावना है। अगर हम अध्यात्मिक ज्ञान को अनुकूल नहीं करें तो फिर राज्ञा का उत्पन्न होना संभव है। इसलिए देव कपिल देव। भगवान ने भी इसी विषय का वर्णन किया है। तो भगवान ने कपिल। देव ने कहा कि मैं आपको संख्या सिद्धांत दे रहा हूँ। जो की 1 बहुत प्राचीन सिद्धांत है। प्राचीन सिद्धांत जो है यह बहुत ही प्राचीन सिद्धांत है। और भगवान का पीला। देव ने कहा कि हमें संतो के प्रति आकर्षित होना चाहिए। अगर हम संतों के प्रति आकर्षित होंगे। उनका मतलब है संतों के संदेश के प्रति आकर्षित होना चाहिए। पापाजी ने कहा संत को जानते हो उनके संदेश के द्वारा। तो भगवान कपिल? देव ने कहा कि संतों के प्रति आकर्षित होना चाहिए। इसके द्वारा बहुत आकर्षण घटेगा जैसे की हमने उदाहरण के लिए इंद्रियों का उपयोग करना है। अगर हम इंद्रियों का शुद्ध उपयोग नहीं करेंगे तो जबरदस्ती दुरुपयोग होगा। अगर हम इंद्रियों का वश्य लाना चाहते हैं तो उसका अर्थ है कि हम इंद्रियो का उपयोग करें। भागवत सेवा में, भगवान की सेवा में। तो भगवान की कपिला संख्या का वर्णन करते कहा कि संतों के प्रति आकर्षित होना चाहिए। और आगे उन्होंने खुद यही कहा कि संतों के क्या लक्षण होते हैं। और संतों का लक्षण करते हुए उन्होंने कहा तितिक्शवाकरूँनि कहा सूरदा सर्वा आगे क्या क्या संता सातवां साधु भूषण, ये 1 बड़ा प्रसि लोक है। आप में से कितने भक्तों ने ये श्लोक कंठजकियाहुहसच बताइए? ये ये 2, ये लोग तो आप सब को कंठस् करना चाहिए। तो क्या कह रहे हैं? करुण का सूरज सर्व दही, अजय साव, साधु भूषणा। इसमें भक्तों के गुणों का वर्णन किया जा रहा है। तो सबसे पहले क्या है? कृतिक शोवा? क्या अर्थ है क्या सैनशील होना। तो साधु को सैन शील होना चाहिए। साधु का मान होता है साधु को केवल पत्थर भी मारते हैं। जब नीति नंदा हरीदास प्रचार कर रहे थे, लोग उन्हें पत्थर मार रहे थे, लगा मा पत्थर भी फेंके थे। तो साधु को हर प्रकार की समस्या, अपमान, इत्यादि देने के लिए तैयार होना चाहिए। चेतन महाडोज कहा है इस विषय पर की। अगर आप निरंतर नाम को उच्चारण करना चाहते हो तो क्या चीज? क्या आवश्यकता है? सिनाद मना लेना सदा। अगर आप सदा कृष्ण का कदर करना चाहते हो तो हमें सहनशील होना चाहिए। तो हमें सेंचिल होना चाहिए। उदाहरण के लिए प्रचार के दौरान कई बार प्रचार करना पड़ता है। अधिक सर्दी में, जैसे की आप भक्त ने मेरेथोन किया था। दिसंबर में भी जाओगे, ग्रंथों के वितरण के पर विदेशों में खासकर रूस जैसे देश में लोगों ने मेसोन किया था। जब माइनस 30 पैं30 डिग्री था, मतलब इतनी सर्दी थी कि आप भार 1 मिनट खड़ा होना इतनी सर्दी थी। और उस स्थिति में भक्तों ने अपने पीठ में किताबों को उठाकर। आगे उठाकर। मैं बन गया। तो भक्त में यह सैन शीलता की शक्ति ने हमें थोड़ी गर्मी आती है। भारत में, तो हम सोचते है, चलो पहाड़ों की ओर जायेंगे, बुक डिस्ट्रीब्यूशन करने। हालांकि हमें पता है, वह ज्यादा बुक डिस्टि्ब्यशन हो, गा नहीं। पर हमें ठंडी हवा चाहिए। तो चाहे गर्मी हो, सर्दी हो, हमें सहना चाहिए इस स्थिति को। अगर हम भगवान की सेवा में जोड़ना चाहते हैं, करुणिका। करुणिका का अर्थ है दया की भावना अनेक प्रकार की दया है। जल से जाओ तो रास्ते में कई भी खाली मिलते हैं न, और कई लोग दान देते हैं। सोचते हुए कि हाँ, गरीब विचार दे। 2 कैसे वो दान खर्च होता है, उसका कुछ अंदाजा ही नहीं, कुछ बी पी, उससे खरीदे। शराब। तो भात जो है। ये जानता है कि सबसे ऊंचे कोटी का दान क्या है? भगवान का, विज्ञान का नाम। इसलिए हम प्रचार के कार्य में जुड़े हैं। क्या कारण है कि प्रौपर्जी ने इस विषय पर बोल दिया? ग्रंथ के वितरण के ऊपर। क्या कारण है कि पूरी संस्था में हम सोचते हैं? का वितरण, हमारा सबसे महत्वपूर्ण सेवा क्यो? क्यूंकि? ये 1 माध्यम है जिसके द्वारा आप लोगों को लोगों पर, दया की भावना पर कर सकते हो। जो है वो है परा दुख। दुखी। मतलब कि दूसरों को दुखी देखकर वो भी दुखी हो जाता है। जब नए नमिशरहनाकेसंतो ने देखा की कलुवा के क्या लक्षण हैं, तो उन्होंने जब देखा कि कलियुग में किस प्रकार व्यक्ति विचलित होकर जुड़े रहेंगे। माया रूपी कार्यों में, तो बड़े घबरा गए। उन्होंने पूछा कैसे लोगों का उधार होगा? और फिर उपाय दिया गया। महाप्रभु गए हरिदास ठाकुर को मिलने हरिदजठाकुरक्यूंक। उनका जन्म हुआ था। मुसलमान खानदान में। वो उनके भजन कुटी थी, जहाँ से वो जगनपुरी मंदर के शक का दर्शन कर सके। पर वो अंदर नहीं जाते थे, वहाँ पबूजी रोज जाते थे उन्हें मिलने के लिए। तो वहाँ प्रहुजीनेएकदिन पूछा, हाई 10 इन यानो की स्थिति देखकर मेरा हृदय घबरा रहा है। ये बताए कि कैसे उनका उदार होगा? तोहारीदास ने कहा प्रभु चिंता न रिया, आप चिंता मत करो, हा राम, हा राम बलि नाम भार से इसी रूप से भगवान के नाम का उच्चारण अपराध मना करेंगे। तो उसके द्वारा क्या बचेंगे? माया के प्रभाव से तो भक्तों में करिखा होनी चाहिए। दया की भावना। इसलिए हमें प्रचार में जुड़ते रहना चाहिए, प्रचार के लिए उत्साह होना चाहिए, प्रचार के लिए इच्छा होनी चाहिए, प्रचार के कार्य में जोड़ने के लिए हमें प्रयास करना चाहिए। और ये निर्भर है किस पर पवित्रता, पर और पवित्रता निर्भर है। अच्छी साधना के ऊपर अगर हम अच्छी साधना रखेंगे, चाहे आप गृहस्थ हो या ब्रह्माचारी, फिर आप की पवित्रता शुद्धता प्राप्त होगी। शुद्धता के प्राप्त होने से प्रचार के प्रति जो श्रद्धा है वो बढ़ेंगे। तो भक्तों को करों ने कहा सुरदा सरवा देना। इसका अर्थ है जो वैष्णव भक्त हैं, वो अपने आप को पूरे समाज का मित्र मानता है। ये नहीं कि ये मित्र है, ये शत्रु हैं। भगत जो है सब को अपना मित्र मानता है। जो उसकी आलोचना करे, निंदा करें। यहाँ कोई सुलझाव दे, उसे भी अपना बंदू मानता है। यह नहीं कि अगर आप कोई सुझाव दे रहे है, लोग कर रहे हो तो आप उसको शत्रु मानो सूरदा। सर्वधहीनाभौतिक संसार में अलग अलग है। सब हैं। 2 भाई भी, 1 साथ नहीं रह सकते, 1 खाना है, हजार करोड़ है, 2 भाई से हजारों करोड़ बहुत कम है। हमारा झगड़ा तो मतलब यह है की अलग अलग दल बनते रहते हैं। और भगवान की सेवा में हमारा 1 ही दल है। इसलिए हम सब के मित्र हैं। अज सबके प्रति मित्रता के भाव से व्यवहार होना चाहिए। ये नहीं कि ये हमारा बंधू है, ये हमारा शत्रु है, ये हमारा है, यह हमारे, हमें सबके प्रति मित्रता की भावना होनी चाहिए। और सत्रवाशंता। तो पी शांति शांति कैसे प्राप्त होगी? शांत मन रहेगा। जब आप के मन में 1 मात्र भाव रहेगा, वो है क्या? भगवान की सेवा। आज शांति या महसूस करते हैं तो उसका मूल कारण यह है की मन में संघर्ष रहता है। भौतिक, इच्छाओं और आध्यात्मिक लक्षणों का कई बार मन कहता है? नहीं, नहीं, हमें भौतिक उंची लेनी चाहिए। कई बार बुद्धि का उपयोग करके हम करे। नहीं बौधिक। तो हमें प्रयास करते रहना चाहिए। तो संता और सादा साधु भूषण सादा मतलब शास्त्र के आधार पर। जैसे यहाँ आपको भगवान के शिक्षा प्राप्त हो रही हैं, जो की भागवत के में प्राप्त होगी। तो हमें शास्त्र पर आधारित चलना है। जैसे की यहाँ दे रही है आप अध्यात्मिक नेत्र हो, शाह शास्त्र चकशुषोशास्त्रजो है। हमारे आध्यात्मिक नेत्र हैं। उनके द्वारा हमें आध्यात्मिक परिवर्तन करने का प्रयास करना चाहिए। संक्षेप में हम उन गुणों का वर्णन किया जिनका वर्णन कि भगवान करे है। और हम सब भक्त को प्रयास करना चाहिए की इन लक्ष्यों का प्रभाव हमारे आश्रम में भी जुड़े जिसके द्वारा हम भगवान के शर्नागत हो। सके। असली स्वाभाविक ज्ञान क्या है। ये भगवान होना, उनकी सेवा में जुड़ना। तो चाहे आप संख्या सिधान पड़े हो या कोई और सिधान, इसका मूल भाव क्या है? सरवा धर्मा प्रीत जिया माँ में कम शर्मा हम भगवान कहते हैं, सब धर्म को छोड़ कर कहा आओ मेरे चरण में और इसके बदले में आपको क्या मिलेगा? क्या? भगवान क्या कहते हैं? क्या मिलेगा हम को भगवान की है? हमें? क्या मिलेगा भगवान के में और तुम सब के परिणाम से मुक्त हो जाओगे। भगवत गीता में भगवान कहते हैं बिना चिंतन करो, मेरा मन, मेरी पूजा करो, करो करो। और अगर यह सब करोगे तो बिना शंख के कहा होगे? तो बिना शंका के हमे भारती योग में जोड़ना है। भारत योग, शंख योग में कोई अंतर नहीं, योग का निर्णय भी है। पर भगवान के गत होना और भजन के माध्यम से भक्ति योग में श्रद्धा हमारी बढ़ती है और भगवान के शरण हो पाते तो चाहे आप गस्त हो या वन प्रास ब्रह्मचारी सन्यासी हम सब का मूल उद्देश्य है की हम भगवान श हो और जिसके द्वारा हम असली सुख शांति प्राप्त कर सके। हरे करिश्णा हाई, क्रिष्णा हार, कृष्ण हाल हाहाहा हा।
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