भक्ति के सबसे सरल नियम | SB 3.29.18 | 08 Apr 1997 | Chandigarh | Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī

Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī explains the fundamental rules of bhakti based on Śrīmad Bhāgavatam 3.29.18. Chanting the holy name, living simply with minimal needs, and controlling the senses through discipline form the core practice. He emphasizes accepting a guru, studying scripture, and treating all beings with respect and friendliness.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, नमो भगवते वासुदेवाय,
नम भगवते वासुदेवाय।
datia nosanannamasamkit nacamajabenaya sangnaerahamkria tata
gantinandasaha njnashlacajaura meritananatrsmai shri guravenamaha shri chetanya manovestasapta but le suimrupagdamym ती स्वा दंतिखम मन दे हम, श्री गुरु, श्री वता पदक श्रीरन, श्री रुपम सगराजतमसहागना रगुनातंमतमथम सजेवम सद वेतम सब धुतम परिजना सहित कृष्णा चेतन्या देव श्री राधा कृष्ण पदनसहगनaल sri vichakantamsa he krishna na sinधoधीनबndu घoभेशा गोपि का कांटा राधागदनमुस्तते ता कंचना गोरांगी राधे व्रंदबनेश्वरी रिषबानुसुतेदेवी hripijasrekrisna chetna भुरि श्री रेत राध शिवा श्री को भक्त बिंदा हरे कृष्ण
हम जब हाथ ऊपर उठाते हैं, हर 1 नाम बोलते हुए अमित के द्वारा, भगवान से भीक मांग रहे हैं, उनकी दया के लिए, आशीर्वाद के लिए। जिस प्रकार द्रुपदी ने पहले तो प्रयास किया था, अपनी लाज को बचाने के लिए, हाँ कोशिश किया था साड़ी को पकड़ने के लिए। फिर उसने देखा, जब यह सम्भव है, तो हाथ ऊपर उठा कर उसने क्या कहा, अभी मेरा आदर, आपके हाथ में है। amicanosranannama kitnchamejavenaa naatiya इस ध्यान में भगवान कपिल जी के द्वारा भक्ति की व्याख्या होती है। इस ध्यान के आरम्भ में देवहूती ने भगवान से कहा और गहराई से मुझे समझाएगा भक्ति के क्या सिद्धांत होने चाहिए। 1 रूप से। तो भक्त और भगवान के विषय में ज्ञान आप 23 श्लोकों में प्राप्त कर सकते हो। भागवत में 18 हजार श्लोकों का उपयोग किया गया है। गीता में 700 लोगों का उपयोग किया गया है। और इन 2 ग्रंथों के अलावा लाखों लाखों और ग्रंथ है। कुछ और लोग हैं जिनके द्वारा केवल इसी विषय का ज्ञान हमें मिलता है। भगवान के पीले देव क्या कह रहे हैं? ये जो उपदेश दे रहे हैं, यह आपके लिए हमारे लिए है। खास कर के इस लो का जो तात प्रिय है। इन तातरियों में प्रभुपाजी ने बहुत शक्ति डाली है, समझदार सरल बर्ड बना दिया है। जैसे मैंने आपको कहा है? पहले प्रापा तात प्रियों को डिक्टर फोर में डिक्टेशन देते थे। 11 शब्द को बोलने से पहले वो सोचते थे, 2233 मिनट, 11 शब्द, 23 शब्द बोलते थे, फिर रुक जाते थे, 23 शब्द बोलते थे, थे, रुक जाते थे। तो 1 समय भक्त ने पूछा पापा इतने धीमे धीमे क्यों तात प्रिय का डिक्टेशन देते है? पापा ने कहा कि हर शब्द जो हूँ, उन्हें लोग 10 हजार साल तक पढेंगे। तो बड़ी सोच समझ कर हर शब्द लिखा गया ै जैसे की आप कोई वकील से, कोई एग्रीमेंट कराओ तो बहुत सोच समझ कर, बार बार पढ़ते है, कोई बीच में नहीं आ गया। इसी प्रकार बड़े ध्यान से प्रौपर्जी ने गहराई से इन श्लोकों को समझाया है। तो कहते हैं सबसे पहले कपिल देव भगवान। भक्त को चाहिए कि अध्यात्मिक बात भी सुने। तो ये हैं सबसे पहला आदेश क्या अध्यात्मिक बात भी सुनो। हाँ, बहुतिक बातों से दूर रहो। इसलिए रूपक को स्वामी जी कहते हैं। जलपान्यामगरहा पर जल प से व भक्ति जो है नष्ट हो जाती है। तो आपको आगे स्वामी जी अंदर दफ्तर भी जाते हैं। वहाँ तो हमें बहुत विषयों का की चर्चा करनी पड़ती है। तो इसका अर्थ यह नहीं कि आप जैसे आप समझो कोई विद्यार्थी हो या दफ्तर जाते हो, धंदा करते हो। अवश्य ही उन स्थितियों में आपको बहुत चर्चा भी सुननी पड़ेगी, पर आवश्यकता से अधिक नहीं सुना। जितना अवश्य हो, उतना ही और मन के द्वारा सदा भगवान का चिंतन करते जाओ। जैसे भगवत गीता के अध्याय का जो बड़ा प्रशिक्ष लोक है, जिसमे भगवान कहते है की तुम मेरे ले, युद भी लड़ो और मन के बीच दोबारा मेरा चिंतन करो। तो समझो आप ऐसी स्थिति में हो। यहाँ की आपको भौतिक चर्चा सुननी पड़ती है। पर मन के द्वारा भगवान का स्मरण करते रहो और मन के द्वारा यही सोचते हो की ये कार्य करे हो। भगवान की प्रशंसा के लिए, तो को चाहिए की बात ही सुने। जो भक्त मंडल में रहते हैं के लिए तो यह लागू करना ज्यादा कठिन नहीं है। बहुत ही सरल है। क्यूंकी भौतिक विश्व में हमारी कोई रुचि नहीं ली होनी चाहिए। भौतिक चर्चा नहीं भौतिक कार्य नही। इसलिए हम लोग फिल्मे नहीं देखते, भौतिक विषयों को नहीं पढ़ते क्यूँ? क्यूंकि इनके द्वारा जीवन का लक्ष्य प्राप्त करने में कुछ सहयोग नहीं होगा। स्वामी जी ने कहा है उस कार्य को त्यागो जिसके द्वारा भक्ति में अर्चन आये, उसे स्वीकार करो, जिसके द्वारा भक्ति में सहयोग हो। तो वो कहते हैं भक्त को चाहिए कि आध्यात्मिक बात ही सुने और अपने समय का सुदपयोग भगवान के पवित्र नाम के जप में करें। तो भगवान कह रहे हैं अपने समय का सुदुपयोग, समय का सुदुपयोग करना बहुत बहुत, बहुत, बहुत महत्वपूर्ण है। चनक के पंडित जी ने तो इस विषय पर कहा है आयुष 1 पी लिया, सवाना कोटी भी क्या 1 पल का भी दुरुपयोग करोगे तो सारे विश्व के धन से उसे वापस नहीं ला सकते। गरीब व्यक्ति धनी बन सकता है, रोगी व्यक्ति सुखी बन सकता है। पर समय का जब दुरुपयोग किया जाए तो आप सारे विश्व के धन से आप किसी को नहीं कह सकते। मेरा 2 घंटे मैंने बर्बाद कर दिए थे सिनेमा देखने में और 2 घंटे मुझे वापस चाहिए ये लो 2 लाख रूपए में आप कभी वापस नहीं ला सकते। तो समय का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए, समय का सदुपयोग करना चाहिए। क्यूँ? भारतीय समाज तय समय में भगवान का प्रतिनिधि है और भगवान हर चीज के स्वामी हैं। तो वो कहते हैं कि उनके पवित्र नाम का जप करो। तो इस विषय में तो कुछ शंका नहीं होनी चाहिए कि भगवान का नाम बिल्कुल पवित्र है और हर स्थिति में वो पवित्र रहेंगे। भगवान के नाम और उनके नामों के उच्चारण से हमारा अपवित्र अशुद्ध हृदय भी शुद्ध बन सकता है। तो भगवान के पवित्र नामों का जप करो। कई बार भर सोचते हैं। सोना माला का जाप हो गया। बस अब और जॉब करने की आवश्यकता नहीं है। नहीं। गीता में भगवान कहते हैं सत तम कृतयंतोमामसततम, उसका क्या अर्थ है? निरंतर सदा सदा मेरा जॉब करो भगवान के जात, क्योंकि पवित्र हैं आप जाप करने से कभी थकते नहीं। जो व्यक्ति यह कहे कि मैं थक गया हूँ भगवान का जॉब कर के, तो इसका मतलब है कि उनका हृदय बहुत ही काला है। भगवान का जॉब करने से हम कभी थकते नहीं है। 16 माला का जॉब का तो नियम है की 16 माला तो हमें सावधानी से करना चाहिए और प्रयास करना चाहिए, चलते हुए, लेटे हुए, किसी स्थिति में भी अब जॉब करो। और वो तो जब दफ्तर में भी कर सकते हो, अस्त भी कर सकते हो, हर 1 काम करते करते कर सकते हो, यह तो आदत की बात है, प्रयास करोगे तो आदत पड़ जाएगी और कब जब आदत पड़ जाए तो अगर आप ऐसी स्थिति में भी हो समझो आपको बहुत धंधा भी कर, पर मन से आपका चलता रहेगा, वैसे नहीं, मन से करते है और जीप से नहीं करो। जैसे कई बार तो लोग ऐसे ही मिलते हैं जो कहते हैं जब करते है, मन मन ही मन में करते हैं। नहीं, वैसे। तो भगवान कहते हैं कि उनके पवित्र नाम का जप करो। देवहूती ने कहा कि मुझे वो ज्ञान 2 जिसके द्वारा हम सब सुखी हो सके। तो भगवान उस विषय पर ज्ञान दे रहे हैं, क्या कह रहे हैं कि उनके पवित्र नाम का जप करो, आगे उसका आचरण सरल हो। हमें आध्यात्मिक विश्व के बारे में सुनना चाहिए, समय का सदुपयोग करना चाहिए, और यह हमारा आचरण है, वो सरल होना चाहिए। सरल का क्या असल में इस अनुवाद में उन्होंने 1 शब्द में 2 विचारों को डाल दिया है, पर अंग्रेजी में, अनुवाद में है ही शुल, ऑलवेज बी स्ट्रेट, फॉर्वड एंड सिंपल। तो इन 2 शब्दों को उन्होंने 1 में डाल दिया है। इस सरल हक है, उसका जो आचरण है 1 तो उसको बिल्कुल स्पष्टवादी होना चाहिए। यह नहीं की की हम कहें कुछ और सोचे कुछ। भक्त को हास करके भक्तों के व्यवहार के साथ बिल्कुल स्पष्टवादी होना चाहिए। अगर आप गलती भी कर लो तो से स्वीकार करो, छुपाने की कोई बात नहीं है। तो भक्त का व्यवहार जो है, खास करके जहाँ भक्तों से अभी भौतिक दुनिया में आपको थोड़ी करमी पड़े। क्योंकि दूसरे व्यक्ति उनकी, उनके विचार, उनका उद्देश्य बिल्कुल अलग है। पर जो शास्त्र पर निर्भर जीवन बिता रहा है, उसे स्पष्टवादी होना चाहिए। बिल्कुल स्पष्ट वादी प्रयास करना चाहिए। क्योंकि जब आप स्पष्टवादी होते हो तो आप अधिक मात्र में भगवान पर निर्भर रहते हो। जब आप चापलूसी वगैरह करते हो तो आप अपनी बुद्धी पर निर्भर रहते हो। सिर ठीक है न, आप सोचते हो की आपके हाथ में कुछ है। जब आप स्पष्टवादी होगे तो अगर आपने गलती भी की है तो आप ये समझ ले की मैं भगवान पर निर्मल रहना चाहता हूँ। अगर भगवान की इच्छा की वजह कोई दंड भुगतना पड़े दन भुगत लूंगा, उसमे क्या है, गलती कर दे तो भुगतना भी अच्छा ही है। तो भक्त को स्पष्टवादी होना चाहिए। ये है भगवान कपिल देव का उपदेश। आखिर हमें भूलना नहीं चाहिए की ये जो उदेश्य है, ये भगवान का पीला देव दे रहे हैं। अर्जवेनाजरजवेना का अर्थ है स्पष्ट वाली, आगे सिप, सादा, जीवन, सादा, सादा होना चाहिए और आगे दर चालू नहीं होना चाहिए। बड़ा बड़ा अच्छा उपदेश है। हर्ष लोक में अच्छा उपदेश है। पर कई श्लोक के उपदेश को हम सरलता से हमारे चरित्र में अपना सकते हैं, हमारे व्यवहार में अपना सकते हैं। तो भगवान के पीले देव कहते हैं इरशालूनहींहोना चाहिए। ये जो इरा है, यह बहुत गहरी बीमारी है। इतनी गहरी बीमारी है की आप सरलता से समझ भी नहीं सकते कि आपको ये बीमारी है। बिमार होते हुए आप समझ नहीं सकते कि आप बीमार हो है। सबसे पहले हम भौतिक संसार में क्यूँ है? इरा के कारण कृष्णा भाई, मुकना भोगा, वंच, करे, निकटस्त, माया, तरे, झापतियर्धरे। सबसे पहले तो इर्षा होती है हमारी भगवान के प्रति, क्यूँ हम ये सोचते हैं, भगवान को हर चीज की भोक्ता नहीं होना चाहिए। इस के कारण हम यहाँ आते हैं। जो मायावादी है वो भगवान के दिव्य रूप की इशा रखते हैं। इसलिए कहते हैं भगवान तो निराकार है। भगवान का रूप है ही, भगवान है। सचिन बिगड़ा हो ही नहीं सकता है। वो भी 1 प्रकार का की शा है क्यूँ? वो सोचते है की हम जब हमारी हिन्दियो से कुछ नहीं कर सकते, भगवान कैसे कर सकते हैं? ये भूल जाते हैं कि वो सरकार है और उनका जो रूप है वो दिव्य है। फिर भक्तों के प्रति भी इर्षा नहीं रखनी चाहिए। ये अगर किसी भक्त को हम देखते हैं कि वह हमारे से ज्यादा बेहतर अधिक सेवा करता है तो इन शालू होने की आवश्यकता नहीं है। हमें तो किसी और के त्याग को देख कर यही प्रार्थना करनी चाहिए कि हम भी उसी के समान आगे बढ़ सके। त्याग के क्षेत्र में गोपियों का जो उदाहरण है उसका हमें लाभ उठाना चाहिए। गोपियों के उदाहरण में हमने क्या देखा कि गोपियों में आध्यात्मिक इर्शा है, भौतिक, इरशानपजअध्यात्मिक, इर्षा का हमें उदाहरण देते हैं। क्या उदाहरण हैं कि जब आप देखते हो कि 1 व्यक्ति जैसे गोपियों में जब ललिता देखती है कि विशाखा अधिक मात्र में सेवा करनी है तो ललिता की क्या भावना होती है कि मैं भी अपनी सेवा को बढ़ाऊँ तो वो अपनी सेवा बढ़ाती है। और फिर आगे ललिता जब सेवा बढ़ाती है तो उसका उदाहरण देकर, फिर विशाखा भी अपनी सेवा बढ़ाती है। इस प्रकार गोपियों में चंद्र वाली और राधारानी में भी इसी प्रकार की आध्यात्मिक इर्षा रहती है। और अंत में राजा रानी की जीत होती है। तो कपिल देव भगवान कह रहे हैं आध्यात्मिक बात हमें सुनना चाहिए, समय का सदुपयोग करना चाहिए, भगवान के पवित्र नाम का जॉब करना चाहिए। आज चरण हमारा स्पष्टवादी होना चाहिए, जीवन हमारा सरल होना चाहिए और हमें इर्शालु नहीं होना चाहिए। भगवान से यही प्रार्थना करनी चाहिए क्या की इर्शालु भावना हमारी नष्ट हो जाए। हमारे परिश्रम से तो हम कुछ प्राप्त नहीं कर सकते। और अगर हम श्रद्धा के साथ प्रयास करेंगे तो फिर भगवान की दया से, गुरु की दया से असंभव कार्य भी संभव हो जाता है केतन महा प्रभु के विषय में कृष्णदास कविराज कहते हैं कि उनके शरणगत होने के द्वारा अंधा व्यक्ति भी देख सकता है, गुंगा व्यक्ति भी बोल सकता है, लंगड़ा व्यक्ति पहाड़ों के पार जा सकता है, बहरा व्यक्ति सुन सकता है, दुसरे शब्दों में हर प्रकार की समस्या को हल कर सकते हो। कई बार भगत इर्शा की समस्या बहुत गहरी है और प्रयास करने से यह संभव है। आगे भगवान के पीले देव क्या कहते हैं वो सबों के प्रति मैत्रीपूर्ण होते हुए सो सबों के प्रति मैत्रीपूर्ण होना चाहिए। तो भी सबों के प्रति मैत्रीपूर्ण होने का ये अर्थ नहीं कि आप हर प्रकार के भक्ति संगत रखो देखो। भागवत का उपदेश कितना तेज है 1 तरफ से, तो कपिल देव भगवान कहते हैं सबों के प्रति महत्वपूर्ण होना चाहिए। आगे साथ में ये कह रहे हैं कि ऐसे व्यक्तियों की संगति से बचें जो आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत नहीं है। समझ गए सब के प्रति महत्वपूर्ण होना चाहिए तो उनकी संगत से बचना चाहिए जो आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत नहीं है। स्वामी जी श्री उद्देश्य मृत में इस विषय के ऊपर 7 लोग में कहते हैं कि जो भक्त हैं, मन से, आदर देता है हर व्यक्ति को, जो हरि नाम का जॉब करता है, जो व्यक्ति भी हरिनाम का जाप करे, उसको मन से, वो आदर देता है, इज्जत करता है, पर संगत लेता है उसकी जो कि नियमों का पालन कर रहा है और सेवा करता है उस व्यक्ति की बड़ी निमृत भावना से, जिसकी जो बिल्कुल लीन है भगवान की सेवा में और जो इर्शालू नहीं है। तो कपिल देव भगवान कहते हैं की सब के प्रति महत्वपूर्ण होते हुए भी सो सबसे पहले हमें मैत्रीपूर्ण होना चाहिए। तो ये मैत्रीपूर्ण व्यवहार हम अनम करते हैं भक्तों के साथ। 1 दुसरे के भक्तों के साथ हमें बिल्कुल मैत्रीपूर्ण होना चाहिए। चाहे हम राजा हो, चाहे हम जी बी सी हो, गुरु हो, सन्यासी हो, टेंपल प्रेसिडेंट हो, यह हम नए भक्त, हम सब को 1 दूसरे के साथ बिलकुल मैत्रीपूर्ण व्यवहार रखना चाहिए। कई बार लोग सोचते हैं की मैत्रीपूर्ण व्यवहार में हम दूसरों को ठीक नहीं कर सकते। मैत्रीपूर्ण व्यवहार के साथ कई बार कड़की भी करनी पड़ती है। पर अक्सर व्यवहार जैसा भगवान कपिल देव कह रहे हैं हमें मैत्रीपूर्ण रखना चाहिए 1 दूसरे के साथ और मैत्रीपूर्ण व्यवहार रखेंगे तो मंदिर का वातारण बहुत ही सुन्दर रहेगा, वैष्णों का जो सम्बन्ध है, बहुत ही गहरा रहेगा और भक्ति का जो पूरा आनंद हम उठा सकेंगे। आज इस श्लोक अभी तक तो हमने आपको केवल वह विचार सुनाये हैं जो कि कपिल देव भगवान ने स्पष्ट रूप से इस लोक में बताया। अभी प्रपा जी आगे क्या कहते हैं, आध्यात्मिक बोध में अग्रसर होने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान के विषय में प्रमाणिक सोत्र का श्रवण करना चाहिए। यह है पहला पॉइंट की प्रामाणिक क्षोत्रों से श्रवण करना चाहिए। का बाय। हमारे भक्तों में भी मैं ये कमजोरी देखता हूँ की ध्यान ज्ञान प्राप्त करने के लिए कि वो कतर में चले जाते हैं, वो कथा में चले जाते हैं, इधर स्थान चले जाते हैं, उस स्थान चले जाते हैं। नहीं, हम लोग इस इस कौनसंसमें ग्रंथों के विषय में प्राप्त के ग्रंथों पर निर्भर रहते हैं और प्रमानिक क्षेत्रों के द्वारा हमें अध्यात्मिक ज्ञान को अनुकूल करना चाहिए। प्रमानिक क्षेत्रों के द्वारा आपको असली संदेश मिलेगा, उसमे कोई शंख नहीं है। जैसे की आप जब कुछ दाम, कोई वस्तु खरीद न जाओ तो आप बड़ी कंपनी का पहले खरीदते हैं। हाँ क्यूँ क्यूँ की आपको ये लगता है की ये बड़ी कंपनी का माल है तो इसमें धोखेबाजी कम होगी है। असली माल मिलने की संभावना है तो प्रमानिक सोत्रो के द्वारा आपको असली उपदेश्य मिलेगा। इसलिए प्रमानिक क्षेत्र के द्वारा ये आध्यात्मिक ज्ञान हमें अनुकूल करना चाहिए। आगे आध्यात्मिक जीवन की वास्तविकता समझने के लिए कठोर अनुस्थानों का पालन करना चाहिए। तो हमें कठोर अनुष्ठानों का से भय नहीं रखना चाहिए। लोगों को आध्यात्मिक जीवन भी चाहिए। आज और नियम इत्यादि नहीं चाहिए, नियम इत्यादि नहीं। लोग ब्राहमण भी बनना चाहते हैं, ग्रामीण जेनू भी चाहिए। जब उनसे कहा जाता है कि ब्राहमण के गुणों को अनुकूल करो, ये सब विधि विधानों का पालन करो तो उसमे वो इनकार कर देते हैं। तो कठोर अनुष्ठान का पालन, आर में ये अनुष्ठानों कठोर दिखते हैं। प्रयास करने से वो सरल बन जाते हैं। ये हमें भूलना नहीं चाहिए। कठोर अनुष्ठानों का क्या अर्थ? 4 नियम का पालन, वह भी भक्ति का पालन। जो लोग भक्त दिक्षित हैं, जो घर में रहते हैं, उन्हें वह भी भक्ति का पालन, साधना भक्ति का पालन घर के वातवरण में भी करना चाहिए। अगर आप बंदर नहीं आ सकते, चंदी भाग्य है कि आप सब मंदिर के निकट हो, ज्यादा दूर नहीं ह। पर कई व्यक्ति जैसे लन्दन, न्यूयॉर्क, बॉम्बे, वगैरह में रहते हैं, जो बड़े बड़े शहर हैं। 1 फासले से दुसरे फासले जाने में 22 घंटे लग जाते हैं, तो वो लोग शायद हफ्ते में 1 बार ही मंदर आ सकते हैं। पर साधना भक्ति का अर्थ क्या है? घर में मूर्ति पूजा करो, अमंगल, आरती ये सब चीजें करो तो इन सब चीजों का पालन करने से हमें डरना नहीं चाहिए। क्यों? क्योंकि इन सब कठोर अनुष्ठानों के पालन के द्वारा इंद्रियों का नियंत्रण हो जाता है। समझे इन नियमों के पालन से आप इंद्रियों को वश में ला सकते हो। हम सब भक्तों को गोस्वामी बनना है, गोदास नहीं रहना। गोदास उसे कहते हैं। जो कि इंदियों का दास है, जो इंद्रियों का सेवक है, उसे तो हम कहते हैं गोदासा। इस समय तो हम सब गो दास है। जब आप आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करते हो तो आप गो दास से गोस्वामी बनने का प्रयास कर रहे हो। गोस्वामी का अर्थ यह नहीं कि केवल प्राप्त करो तो ही आप गोस्वामी बनोगे नहीं। जिस आश्रम में हो, जिस स्थिति में, उस स्थिति में इंडिया का नियंत्रण करना अवश्य है। अगर आप आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ना चाहते है, हमें भूलना नहीं चाहिए। स्वामी जी का कहना स्वामी कहते हैं कि अनाधिकाल प्रयास करना इंदियों को संतोष करने के लिए दिया जो है, सदा बेचैन रहती है। कठोर अनुसान का पालन करने के द्वारा हिंदियों पर आप नियंत्रण कर सकते हो? फिर आगे क्या कहा गया है? नियंत्रण प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य, हिंसक तथा सत्य निष्ठा बने। अहिंसक भर जो है, चीटी को भी कष्ट नहीं देना चाहता। चेतन मृत में आप कथा पढते हो। शिकारी की जो की पशुओं को पहले घायल करता था, फिर उनको देखता था, तड़फते हुए और जब हँसता था, और जब उनकी मृत्यु होती थी तो उनको खा लेता था। इतना पापी था। पर नारद मुनि जी की संगत का ऐसा असर पड़ा संगत का बहुत असर पड़ता है। नारद मुनि तो 1 मिनट में ही लोगों के जीवन को बदल देते थे उनका। पर ऐसा असर पड़ा कि चीटी पर भी वो पाव नहीं रखते थे। कदम पर पाव रखने से पहले चीटी तो नहीं आया? नीचे हम वैसा में जब आप चलते हो, सावधानी से चलना चाहिए की चीटी पर भी पानी आ जाए। क्यूँकि जो हैं वो हिंसक है। यही नहीं की 1 तरफ से हम धर्म को अपना तरफ से गाय का, गला काटे या जिसे जान का, गला काटे, जबान के चस्के के लिए ये धर्म नहीं है। पापा जी जब पश्चिम देशों में भी प्रचार करते थे और बड़े बड़े क्रिस्टियन पादरी वगैरह आते थे पापा को के लिए। सबसे पहले प्रापा जी कहते थे क्या cris के केल और इनके बाद कोई उत्तर नहीं होता था। तो कपिल देव जी के श्लोक को समझाते हुए प्रापा जी कहते हैं की बेवकू, अहिंसक और आगे सत्य निष्ठ सत्य। हमारा सत्य नष्ट होना चाहिए। सच्चाई पर निर्भर रहना। चाहे भगभगधर्म के 4 आवश्यक लम्बे हैं सत्यता, दयालुता, और और तपस्या। उन में से 1 है सत्य सत्यता। तो पहला नियम है सत्यता का। भगवान की वाणी को स्वीकार करो। यथा रूप भगवान के शब्द को लेकर बदलो नहीं। अपने अशुद्ध विचारों को आगे प्रस्तुत करने के लिए। दूसरा नियम है गुरु के आदेश का पालन करो। तीसरा है। उदाहरण है सत्यता का की 1। दूसरे के व्यवहार के आपके व्यवहार में बिल्कुल सत्यता प्रकट करो। यह नहीं कि आप आप झूठ झूठ से व्यवहार रखो, गलती भी कर लो जो सत्य रूप से स्वीकार करो। हाँ, मैंने यह अपराध किया है, मैंने दोष किया है। आप कृपा करके मुझे आशीर्वाद 2 कि मैं ये दोष नहीं करूँ। पापा जी उदाहरण देते थे उस गरीब ने। वो 11 लड़का तो विध्यार्थी था जिसके क्लास में पूछा था कि पता करो की आप सबके पिता कौन है? पिता का नाम क्या है? जब जब उसने अपनी माता से पूछा के मेरे अध्यापक यह जानना चाहते हैं कि मेरे पिता का नाम क्या है? तो माता ने कहा, बेटा, सच बात यह है कि मेरा चरित्र अच्छा नहीं है। और मुझे पता नहीं यह कौन है। तुम्हारे पिता से वही जाकर अध्यापक को सुना दिया। तो पापा ने कहा ये है सत्यता और इस प्रकार की सत्यता। पापा जी ने कहा कि हमें इसका पालन करना चाहिए। जो सत्य निष्ठा, यह बहुत अवश्य है। बिल्कुल सत्य व्यवहार आगे चोरी न करना। स्पष्ट रूप से कपिल देव के उपदेश को आगे समझा रहे हैं। कहते हैं चोरी नहीं करना चाहिए है, चोरी से बचना चाहिए। खास कर के पूरा भौतिक दुनिया तो चोरी कर रहा है क्या? जैसे कि रावण ने क्या क्या सीता को चुरा कर लेगा तो? तो सीता की सम्पत्ति सीता है। भगवान राम के सम्बंधी। आज हम लक्ष्मी को चुरा रहे हैं। पर लक्ष्मी का व्यवहारिक स्थान क्या है? नारायण के चरणों में लक्ष्मी नारायण। आजकल हमारे व्यापारी लोग लक्ष्मी पूजा करते हैं। दिवाली के अवसर पर। पर लक्ष्मी नारायण पूजा नहीं करते, लक्ष्मी चाहिए, नारायण नहीं चाहिए। तो इसलिए वो केवल लक्ष्मी पूजा करते हैं। सबसे पहली चोरी तो ये है भगवान की संपत्ति को हम अपनी संपत्ति बना रहे हैं। प्राचीन समय में सरकार टैक्स लेती थी, जो आपका उत्पादन होता था, उसका, 25 परसेंट टैक्स लेती थी सरकार, और अगर उत्पादन नहीं हुआ, घाटा हुआ तो कुछ टैक्स नहीं, पर जो टैक्स आता था उसका 1 पैसा भी, 1 कौड़ी भी पैसा छोड़। सरकार अपने स्वार्थ के लिए उपयोग नहीं करती थी, पूरा टैक्स का उपयोग होता था प्रजा के सुख के लिए। ये महाराज प्रीतो का उदाहरण। इस विषय पर आप गहराई से भागवत में पढ़ सकते हो। पर आजकल क्या यह विचार देखा जाता है? आजकल देखते हो कि 1 पैसे भी समाज के स्वार्थ शायद 2 पैसे आता है। बस जैसे यूनाइटेड नेशंस, वगैरा ये जो बड़ी वेलफेयर एज है न। तो आप कभी कभी पढते हो की उन्होंने इतने करोड़ दान दे दिया, ये दे दिया, वो दे दिया। तो वो $1 दान भी देते हैं। समझो कहा गया तो $1 1 रुपया दान में आगे आदमी के पास पहुँचता है, 60 पैसा खर्च हो जाता है उनके प्रतिनिधि की हवाई जाज की। टिकट में तो दुनिया को तो दिखायेंगे। हमने इन्हें 10 करोड़ दान दे दिया, पर प्रजा पर पहुँचता है क्या? 23 करोड़। तो ये तो है बड़ी चोरी 1 समय अलेंरअलेांडरको क्या हिंदी में सिकंदर सिकंदर बहुत बड़ा राजा था। तो उसके सामने 1 चोर आया, तो उसने सिकंदर ने जोर से पूछा बोलो क्या सजा तुम्हे मिलनी चाहिए? तुम बोलो क्या सजा? तो चोर ने कहा जो सजा आपको लगे ठीक दे। 2 आपने में अंतर यह है, आप बड़े चोर हो, मैं छोटा चोर हूँ, आप पूरे देश को चोरी कर लेते हो। और मैं थोड़ा खीरा चोरी करता हूँ, थोड़ी सब्जी वगैरहा चोरी करता हूँ। पर आप 2 चोर 2 दोनो है। आप यह जानते हो जो सजा देना चाहते हो। देखो। तो पापा जी ने यह उदाहरण दिया था कि वो ही है समाज की स्थिति, कोई बड़ा चोर है, कोई छोटा चोर है। सबसे पहली चोरी तो ये है की हम भगवान की संपत्ति को अपना समझते हुए अपने जेब में रहे हैं। ये है सबसे बड़ी चोरी। तो भक्तों को खास करके समझते हैं क्या की हर चीज के स्वामी भगवान है खास करके जब हम मंदिर में रहते हैं, हम भगवान की संपत्ति को देखते हैं तो उसका दुरुपयोग भी नहीं करना चाहिए। पापा जी 1 समय शेयर कर रहे थे भक्तों के साथ, तो उन्होंने देखा कि किसी कर्मी के बगीचे में पानी बहराए कर्मी भक्त का घर नहीं था, किसी कर्मी का घर था। पापा जी अंदर गए हाँ बिना पूछे उन होंने नलका बंद कर दिया तो भक्त आश्चर्य चकित हो गए। पापा जी किसी कर्मी के घर में चले गए। कृष्णा नर्जी, ये पानी भी भगवान की एनर्जी है, वो दुरुपयोग हो रहा है। तो भक्त जो है यह मानता है कि सब भगवान की शक्ति है। खास कर के। जब हम भगवान की संपति को देखे, उसका हमें बिल्कुल दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। जैसे की लोग चंदा देते हैं, दान देते हैं इस भावना से कि अब आगे उसको भगवान की सेवा में उपयोग करोगे तो भगवान की सम्पत्ति बहुत सावधानी से हमें उपयोग करना चाहिए। अगर हम इसका दुरुपयोग करोगे तो ये मत भूलो हजार। गुना आपको भुगतना पड़ेगा बाद में। तो इसलिए बड़ी सावधानी से चलना चाह। आगे पापा जी कहते हैं ताल पड़े विषय जीवन से दूर रहो, हम आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करते हैं। क्यूँ हम विषय जीवन से दूर रहना चाहते हैं? दसवां नाम अपराध क्या है, भगवान का नाम भी ले रहे हैं और विषय जीवन की बिताने की भी भावना रख रहे हैं। यह संभव है तरफ से आग जलाना चाहते हो, दूसरी तरफ से पानी फेंक रहे हो, 1 तरफ से आग बुझाना चाहते हो, बहुत आग ऊपर से घी डाल रहे हो, बहुत ही आग भी बुझाना चाहते हो और ऊपर से घी डाल रहे हो तो आग काम बुझेगी। तो विषय जीवन से दूर रहना चाहिए। क्यूँकि विषय, जीवन, विषय, विषय, विचार, वातावरण, विषय चर्चा, ये सब आध्यात्मिक जीवन को कमजोर बना देती है। इसलिए विषय जीवन से हमें दूर रहना चाहिए। आगे क्या और जीवन निवाई के लिए कम से कम आवश्यक वस्तुओं को रखो। तो ये है सरल था जीवन का कि कम से कम आवश्यकताओं की को रखने का प्रयास करें। अधिक नहीं भक्त हैं। तो चलो 1 टीप रिकॉर्डर रख लिया। टेप सुनने के लिए बस ये नहीं चाह, टेप रिकॉर्डर चाहिए। ब्रहमचारियो थोड़े कपड़े रखो जितने आवश्य है। ये नहीं की बहुत ज्यादा शो जो ग्रस्त हो। सादा जीवन बिताओ। यह नहीं कि दुनिया दारी को दिखाना है कि यहाँ बहुत धनी है न। अरे उन सब चीजों के पीछे जाओगे तो आपका यात्मिक जीवन ही खत्म हो जाएगा। सादा जीवन आवश्यकता से अधिक नहीं, चाहे आप ग्रस्त हो, ब्रह्माचारी हो, किसी स्थिति में भी कम यह नहीं कह रहे की आप वृक्ष नीचे सो। आरोप ये है कि शास्त्र का ध्यान शास्त्र का उदेश्य है की हमारा जो जीवन है वो सादा होना चाहिए। और आगे क्या न। आवश्यक से अधिक साथ समाज के सामान्य व्यक्तियों से विदा करे और बिना किसी उद्देश्य के विधि विधानों का पालन न करे। स्वामी जी इस विषय की चर्चा करते हैं। कहते हैं नियम मा, ग्राहा। ये जो विधि विधान है, इनका पालन करते हैं। हम इस विचार के साथ इन विधि विधानों का पालन करके हमारा हम पवित्र बनेंगे। नाम के लिए विधि विधान का पालन करने का इतना अधिक लाभ नहीं है। समझे ना। विधि विधान का पालन किसी स्थिति में लाभ तो जरूर पहुँचेगा। पर रूप को। स्वामी जी का कहना है कि विधि विधान का जो पालन है, इनका लाभ क्या है, वो समझ कर करना चाहिए। जैसे सोते सुबह के समय, प्रातकाल के समय, इंडिया, तो कहती है आप सो जाओ, सो जाओ और सो जाओ। और आध्यात्मिक बुद्धि कहती नहीं नहीं जागो जागो जागो सुबह का समय जाप के लिए सबसे बेहतर है। क्यूँ हम सुबह जाप करते है। सुबह बुद्धी तेज रहती है। सुबह आप शांति से जॉब कर सकते हो और जितनी शांति से जप करोगे उसका आपको अधिक लाभ मिलेगा। तो ये जो विधि विधान है, 16 माला का जॉब क्यों करते है? क्यों हम कहते हैं कि सावधानी से करो। क्योंकि जितनी सावधानी से करेंगे, उतना अधिक हम भगवान का स्मरण कर सकेंगे। जितना हम अधिक स्मरण कर सकेंगे, उतना ही अधिक हम जल्दी उतनी, जल्दी हमारी भौतिक, रोग, पीड़ा को हम दूर कर सकेंगे। फिर आगे पापाजी कहते हैं मनुष्य को गर्व नहीं रखना चाहिए, गर्भ नहीं रखना चाहिए। अंगार, अंकार, विमुदात्मककर्ता, मिति, मन्यते गीता में भगवान कहते हैं अंकर के कारण व्यक्ति यह सोचता है कि मैं ही हर चीज का कार्य हूँ, मैं ही इस सफलता का कार्य हूँ गया। पर जो भक्त है, उसे गौरव नहीं रखना चाहिए और न अन्य से व्यर्थ का सम्मान करना चाहिए। यही नहीं कि जबरदस्ती लोगों को मुझे ये इज्जत 2 इतना, आदर, 2 मुझे इतना कोटा चाहिएद। पर का ये मतलब भी नहीं कि आप आदर नहीं। 2 चेतन्य महाप्रभु जी ने तो ये कहा है हरि को आदर। 2 बिना किसी उम्मीद के। ठीक है न? ये चेतन्य महाप्रभु जी का उपदेश, हमारे व्यवहार के लिए, सबको आदर। 2 बिना किसी उम्मीद के। पर जो भक्त हैं, वो ये नहीं कहता कि तुम को जबरदस्ती मुझे आदर देना चाहिए। पर इसका ये अर्थ नहीं। इसका दुरुपयोग मत करना कि भक्त को तो आदर नहीं चाहता, हम तुमको आदर क्यों दे? तो आदर दे। पर भक्त को ये आदर की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। ये मानना नहीं चाहिए कि तुम्हे मुझे इतना आदर देना चाहिए। वगैरह आगे कहते हैं प्रॉपर जी, बिल्कुल सें शील होना चाहिए, सेन शील होना चाहिए। इस विषय में चेतन्य महाप्रभु का बड़ा प्रसिद्ध श्लोक है। तेनादपीसुनीचयन। उदाहरण के लिए फिर आग कहते हैं, गुरु को स्वीकार करना चाहिए। गुरु को स्वीकार करने के विषय में भक्ति रस। मृत सिंधु में रूपक गोस्वामी जी कहते हैं सबसे पहले गुरु स्वीकार कर। पर गुरु स्वीकार करने से केवल वो अंत नहीं है। वो तो पहला कदम है गुरु स्वीकार करना। आगे गुरु से पूछो, ये जिज्ञासा करो क्या? हम आगे कैसे बढ़ सकते हैं? अध्यात्मिक जीवन को हम सफर कैसे बना सकते है? यह भी अंत नहीं है। जिज्ञासा करो। केवल गुरु स्वीकार करना, जिज्ञासा करना। इससे काम खत्म नहीं हुआ। आगे सेवा करो। सेवा। तो गुरु की हम सेवा करते हैं। जैसे पापा जी ने हमें कहा iscon इज माई बॉडी। उनोने कहा इस्कॉन संस्था जो है, वो मेरा शरीर है। गुरु क्या कहता है? मंदिर की सेवा करो, संस्था की सेवा करो। तो सेवा हमें करनी चाहिए। गुरु ग्रहण करने का लाभ केवल जब है। जब अंत में हम शरणगत होना चाहते हैं, सेवा करना चाहते हैं। भारत में कई लोगों का यह विचार रहता है। गुरु। स्वीकार कर लिया और साल में 1 दफा जिज्ञासा कुछ पूछ लिया। बस काम खत्म, अभी भगवत प्राप्ति अवश्य हो जाएगी। नहीं, रूप को स्वामी जी बड़े स्पष्ट रूप से भक्ति रस। ऋतु सिंध में समझा दे। पहले कहते हैं गुरु को स्वीकार करो, दूसरा जिज्ञासा करो, फिर सेवा करो। तो सेवा जो हैं सेवा के द्वारा हम यह दिखाते हैं क्या की हम भगवान के उपदेश का पालन करने को तैयार है।
हरे कृष्ण का हार हह ह ह
ले, रहल ह ले।
More from PRASAD

Rare Pastimes & Timeless Lessons of Guru Mahārāja | Stories Every Disciple Should Hear

ISKCON Legends- pure devotees meet-HH Jayapataka Swami, HH Gopal Krishna Goswami, HH Radhanath Swami

Jagannātha Ratha-yātrā Through Śrīla Prabhupāda's Mercy | 29 April 2006 | Nairobi, Kenya

Lord Jagannātha's Appearance Pastime | 21.07.2019 | ISKCON Calgary | Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

The Ācārya Teaches by His Own ExampleGuṇḍicā Mārjana by Guru Mahārāja #shorts

Guṇḍicā Mārjana – Lord Jagannātha's Pastime | 21.7.2019 | ISKCON Calgary |Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

H.H. Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī Mahārāja - Exemplary Sādhana and Deity Worship # shorts

भगवान की कृपा कैसे प्राप्त होगी ? | 11 Jan 2014 | Punjabi Bagh | Srila Gopal Krishna Goswami

Material Education vs Spiritual Education | Srila Gopal Krishna Goswami #shorts

