भक्तों को भी कष्ट क्यों ? | SB 4.29.36-37 | 25 Apr 2018 | Delhi | Srila Gopal Krishna Goswami

Srila Gopal Krishna Goswami explains why devotees suffer: lingering material attachment, ignorance, and karma. A true guru teaches selfless bhakti and liberation. Repeated study of the Bhagavata purifies the mind; freedom comes when the heart surrenders fully to Krishna.
Chapters
ओम नमो भगवते वा सुरवा
ओमनम भगवते सुलेवान
भगवते वासुदेवा। ma bagwat camdoforchapren twenty nine torty seven ा परंपरा के दोबजिया
भागवती agogamathaarama
butsaaaprmpra gvat
जaniciती
prampra bacio जी
हा साोगगाहसजहो
बढ़िया हो,
आज ही
हरी जीहयायायालजलसी
आज होली, नही होगा। साया
सी
महादरीज
ये तो
आज के जी रही हो। मेरा
ना जी का विवाद रुचि, जिससे परमपरा संस तक रुकना भर्तिया अतकी से
है।
गुर के प्रतिनिधि को
देदे
में ली वान, कहा, चित्र
या
श सभी से कट करता है। जीव का है, जिससे वंचित
रा,
संस्कृति ही सुनसान रुकना हत्या से या है। द
ती
व्यक्ति जान गया, जल तथा सदी सकता है। जीविका जी से है। ऐसी जिसके कारण से बार बार बार बार जन्म तथा देनी पड़ती है। जिसका 1 मात्र भगवान के लिए ले लिए, उन की ही कदम न करना ह। जब तक शेयर कर जवान भी नहीं करता
है।
न तो इस छोटी जगह से कहा ग्रेट हो सकता है और न अपने असली यानी को ही से कर सकता है। कि भौतिक परिस्थिति से विरक्त होने का यही उपाय है। इसका 1 मात्र निवारण है। कृष्ण भावना को नाना और भगवान वासुदेव की है। निरंतर पति प्रति सुखी रहने का प्रयास करता है और इस सुख को प्राप्त करने के लिए जो विधि अपनाई जाती है, वह स्वास्थ्य लाती है। दुर्भाग्यवस इस संसार के भीतर भटकता बद जी यह नहीं जानता कि उसके स्वाद का चरम लक्ष्य वासुदेव है। संस्कृति का कारण मोह रखते है, हातबृद्धिऐसी होता है और इस खंड सुरूप अनेक अमान की श्रंखला प्रारंभ हो जाती है। वांचितवस्तुमें बिजली विधि के लिए वस्तुका मानसिक। इस प्रकार मनुष्य इस संसार में विभिन्न प्रकार के शरीरों धारणकरता है। मनुष्य को पहले मन को वश करना होता है, जिससे बंद किया काम गाँव की शुद्धि हो सके। यह विधि मुख्य 70 रन के रूप में बन रहे हैं। जब तक शुद्ध नहीं हो जाता, कि भौतिक स्थिति से छुटकारा पाने का ही नहीं होता। जैसा कि श्रीमद, भागवत 1 साथ में कहा गया है। 2 वो
विजय जो
जीव के भौतिक जो है। भक्ति की विधि अपनाने से दूर किए जा ते है, साधारण इसे नहीं जानता। तथा देव ने साहित्य का संकलन किया जो कर से सम्बन्धित है। अर्थात वंचित वसु में 1 जीवन से दूसरे तक चलती रहती है। इस बंधन से निकलने के लिए मनुष्य को पूर्ण वासुदेव कृष्ण की भरती के रोती है। इस प्रसंग में गुरु शब्द महत्त्वपूर्ण है। इस का भारी या श्रेष्ठ के रूप में किया जा सकता है। सिरिसबदेवनेअपने पुत्रों को उद्देशकिया था। गुरु सा श्या वो जब तक अपने शिष्य को जन्म मृत्यु के आवागमन से बाहर निकाल सके, मनुष्य को चाहिए कि वह गुरु का पद स्वीकार न करे। भागवत 5 रा य संसार वास्तव में विभिन्न प्रकार के कर्मों की क्रिया प्रतिक्रिया विभाग की श्रंखला है। यही जन्म तथा मृत्यु का कारण है। इस कर को वास सेवा में लगकर भी रोका जा सकता है। उन कार्यों को सुचित करते है जो भगवान वासुदेव की सेवा में करने के लिए जाते है। क्यूँकि भगवान वासुदेव सर्वेष्ट है। अतः मनुष्य को देवताओं की सेवा न करके गुनी सेवा में लगना चाहिए। भक्ति का सुधार गमदिचिवस्थासीलेकर भगवान की प्रेम तक विस्तारित है। सभी अवस्थाओं का प्राय भगवान आज लोगो को करना है। मनुष्य वार देयों की भरती अत्यधिक हो जाता है तो वह शरीर की सेवा से पूर्ण लोगो से हो जाता है और इस प्रकार 2 या में पार हो जाता है और भगवान वारविोकीसेवामें संग हो जाता है। महा का कहना है जी 10 पृथ्वी जीवकी स्वाभाविक स्थिति के शुरू का दास है। जो ही वह भगवान वासी भक्ति प्रारंभ करता है उसे उसकी स्वाभाविक स्थिति मिलती है। यह स्थिति मुख्य वस्था कहलाती है
ा
मुख्य अवस्था में मनुष्य अपने मूल कृष्णभक्त स्थिति में रहता है। वह के अंतर्गत संपन्न की जाने वाली अनेक प्रकार की सेवाओं, सामाजिक सेवा, राष्ट्रीय सेवा, जाति सेवा, कुत्ते सेवा, वाहन सेवा आदि को है। जैसा कि भागवत भागवत श्री करके मनुष्य तुरंत या संसार से दरकती है। इस प्रकार मनुष्य को इसे बहुत ही अच्छा बना दे सेवा में लग जाना चाहिए।
ओम गया न, कि बंदे से काम, सगजतमसहगनारगनातन, तम, स, व, र, वे कम, सवधूतमपिजनासैतम, किशना चेतन, दे व, she raधakisnaपदanसागन क्रिष्णा करना
2 जगत से हो
sकाजलागौरागी बा स ca a bus batti सम मन यहाँ शिक्षा दे रहे हैं? किसे शिक्षा दे रहे हैं? इस 34 खंड के 25 रिहाई से ये पुरंजन की कथा पढ़ रहे हो, सुन रहे हो गी
मिले राजा पर बड़े शहर से उन्होंने देखा कि राजा
ने अपने बेटों को तो भेजा है।
तपस्या का पालन करने के लिए राजा
खुद जुड़ा हुआ है।
किस में बहुत से कार्य, साकाम कार्यों में जो भगवान के जो भक्त हैं, उनकी सदा यही इच्छा रहती है कि पूरा समाज सुखी बने और खासकर के राज मुरली।
धर अत्यंत दयालु है।
उनके मन में 1 ही भाव रहता है। हर व्यक्ति को भगवान के साथ जोड़ा जाए।
जैसे कुछ दिन पहले आपने
मनायी और
प्रदान मराज की लीला भी सुनी होगी तो फान्राजकेमनमें सदा 1 ही भाव था।
कैसे जोड़ा जाए सबको भगवान की सेवा में।
हालांकि उनके पिता ने अत्यंत प्रयास किया
की परदाजकीभकती समाप्त हो जाए।
जो
भगवान की प्रीत वो टूट जाए
और प्रधान को अनिल कहा की कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा।
उन्हें पहाड़ों की चोटी से
सामने खेल
झरागेऔरहरस्थिति में भगवान लडकी सुरक्षा के और
ने कार नहीं होता। जब पता लगा के प्रवाह के प्रभाव
से सारे असूर विद्यार्थी वो भी भगत बन गये।
निर्णय किया।
अब मुझे बच्चे को मारे हे भगवान पकड़ हुए। भगवान के जो भक्त हैं उनके मन में यही भाव रहता है कि भगवान
का संदेश दिया जाए।
सब को तुम्हारा राज बुरी देखा
ये महाराज कुछ न पड़े।
बहुत से कार्यो से जुडे हैं, सकाम
कार्य से जुड़े हैं। तो उन्होंने उन्हें कहा इसका क्या लाभ? और पिछले
4 अध्यायों में अमाल शिक्षा प्राप्त करते हो।
इस प्रकार नारदपुरी ने कहा की बहुत
बली व्यक्ति जीवन कितनी तेजी से समाप्त होता है और नाजनीन उन्हें आध्यात्मिक शिक्षा ले।
इस अध्याय के आलम में राजा ने नाजबुनीऐसी हा
की
शिक्षा तो मैंने सुन
ली है और मुझे
पूरी तरह समझ नही। तो आप कृपा करके और गहराई के
साथ मुझे शिक्षा दीजिये के कई जिलो में पलते हो।
जैसे की
शिक्षा दी, जीवन के लक्ष्य के विषय में हगना शिक्षा।
ग्रहण की। वे रगना ने कहा, मैंने सो तो लिया है, पर ध्यान से पूरे रूप से समझने।
आए शिक्षा आप फिर से लीजिये तो जल ने फिर से गहराई के साथ यह शिक्षा दे।
इसी प्रकार इस अध्याय में नाद बूनी अनेक महत्वपूर्ण विषय की चर्चा कर रहे हैं। जिनकी चर्चा व कर बैठे हैं।
पर फिर से राजा के कहने पर इन महत्वपूर्ण विश्व की चर्चा कर रहे हैं।
तो इससे हमें क्या संदेश मिलता है। इससे हमें यह संदेश मिलता है की अगर हम ध्यान से इस शिक्षा को
समझना चाहे तो हमें बार बार सुनना पड़े। अगर हम ये सोचें की 1 बार
हमने सुन लिया है।
बस सुनने की है।
ज्ञान हमें ठीक समझने आया।
हमें नियमित रूप से रोज सुनना चाहिए।
नास्ता
भागवत, भागवत।
भारतीय
मूल अनेक महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा कर रहे हैं। जिनकी पानी में छात्र में बैठी है।
तो यह क्या कह रहे हैं? सबसे पहले नारवनी हैं की जीवात्मा का सबसे महत्वपूर्ण कार्य क्या है? यह हम अज्ञानता से निकले होगे।
अज्ञानता का क्या हमारे पास पीएच डी की डिग्री है।
यह आध्यात्मिक ज्ञान हम पैदा होते हैं अज्ञानता के वाचन में और अक्सर फलते हैं उसी वतर में। और नाइंटी नाइन परसेंट
के प्रजा श्रीवती है।
ज्ञाता में वो भाग्यशाली व्यक्ति है जिसको असली ज्ञान प्राप्त होता है। न भगवान जी, गुरु कृष्ण, जो, भग्यशाली,
क्या, भक्ति का, ज्ञान का, भारती की
महिमा का ज्ञान प्राप्त होता है। राजमन की हर जीवात्मा का असली लाभ
कार्य वो है जिसके द्वारा वो जन्म मृत के बंधन से मुक्त हो सके। ये है सबसे महत्वपूर्ण कार्य जब श्रम
राव पर 1922 में
पहली बार अपने
गुरु मां से मिले तो पहली मुलाकात में बीशदांधजीनेयदेश लिया।
कहा तुम पड़े ले के युवक हो,
ले जाओ, महाप्रभू संदेश को कहा।
प्रभा जी ने कहा कि उस समय
प्रभा जी गांधी जी के स्वतंत्रता के आंदोलन के सदस्य थे।
पहले हमें देश को स्वतंत्र बनाना पड़ेगा।
वे लोग हमारे संदेश में।
सुनेंगे ने कहा असली हैं।
जन्म से ये होना चाहिए। हम सब का उद्देश शास्रो के द्वारा यही सन्देश प्राप्त हो रहा है।
जैसे इस समय आप उरंजनरंउरंजन की कथा सुन रहे हो।
भागवत में अनेक लीलाएं
पर इन सब
जिलों का निचोड या समरे
वो क्या है? क्या है हमें 10 भाव से शूल भक्ति मार चाहे तो वो ही विचार
यहाँ जमुनी फिर से प्रस्तुत कर। कह रहे हैं कि हर जीव आत्मा
का असली लाख जब है जो वो ज्ञान प्राप्त करे जिसके द्वारा जन्म मृ के बंधन से मुक्त हो सके।
तो ये जन्म का बंधन है। इसमें कष्ट कष्ट है?
आप लोग जाओ कष्टों से मुक्त हो सकते हो। जब ने काशिपुर छपरा
ब्रह्मा जी ने उनसे पूछा दीदी गे परसे का क्या उद्देश्य है?
ये ानेकाशपुजबमंजारा पर्वत में गए थे।
बड़ी गहरी तपस्या। उन्होंने के सौ वर्षों के लिए 1 बूंद पानी नहीं पिया। आप लोग साल में बहुत बड़ा चमत्कार कर दे। ने
सौ सालों तक 1 बूंद पानी का नीति और
योगा करते हो, कई
बार अंगूठा में खड़े होकर राज पर रखते हो कर रख सकते हो।
कितनी है आधे घंटा? क ने
के सौ सालों के लिए को ऊपर हटा।
उसका उदेश्य क्या था? मैं सनातन हो जाऊँ। पीछे से जाऊँ। पर ब्रह्मा जी ने क्या कहा? ब्रह्मा जी ने कहा कि मैच में वर्ग कैसे?
2 तो मुझे भी मृत के सामने झुकना है। तो ये जो है ये केवल क
और चाहे आप राजा बन जाओ।
यह राष्ट्रपति, ये बहुत ही सुनसान गया है।
अज्ञानता के कारण। हम सोचते हैं कि ऐसी कोई सुविधा बना लेंगे जिसके द्वारा हम कष्टों से बच सके।
ये है अज्ञानता और जो बुद्धिमान हो या वो।
जानता है चाहे मैं कितना भी प्रयास करूं।
कष्ट
कहते हैं कि हम सब व्यस्त हैं।
अनेक प्रकार की सेवाओं में समाज की
सेवा,
देश की सेवा, कुत्ते बिलियों की
सेवा,
आप कुत्ते बिलों की सेवा है।
पश्चिम भारत में कुत्ते मिल की सेवा।
लोग अनेक प्रकार की सेवा करते हैं।
सोचते हैं कि इनके द्वारा हमें संतोषा प्राप्त होगी।
पर ये है आज्ञा लाल महाज ने
इस विष में क्या कहा? लोग यह नहीं जानते कि कैसे मिलेगा तो है। हर व्यक्ति का सबसे लाभ धारी कार्य,
वो है कि उस शिक्षा का पालन करना जिसके द्वारा आप जन्म मृत के बंधन से मुक्त हो सको।
ये होना चाहिए हम सब का प्रयास। आगे क्या कह रहे हैं? आगे नामरी हैं। 1 ही उपाय है। वो है कि अपरा भगवान की शरण
ले, उनके प्रतिनिधि के माध्यम के द्वारा। ये सासों का निर्णय भागवत
भगवत गीता का निर्णय क्या है? भक्तियां नाम भक्ति के माध्यम से ही तुम मुझे जान।
सके।
भागवतम का निर्णय क्या है?
भक्ति।
तो मा परी के माध्यम से शिक्षा
हम सब को दे रहे हैं।
ये जो पुरंजन की कथा है। 1 रूप से हम सब पुरंजन, हम सब पुरंजन मर गए। हम सब राजा पुरंजन बन गये।
हाँ पुरंजन मी ओन बॉल, हमारे सो,
हम राजा किस दृष्टि से है। हम चाहें तो इस देह का सुदुपयोग कर सकते हैं।
वो चाहे तो दुरुपयोग कर सकते हैं।
ये छूट है हम सब के पास। भगवान ने गीता का संदेश दिया। अर्जुन से पूछा, अंत में क्या तुम ध्यान से सुना? क्या तुम्हें ज्ञानता दूर हुई है? और अर्जुन ने जब कहा से मुक्त हो गया हूँ।
भगवान ने क्या
तो हम सब है राजा पुरंजन।
हम सबके पास ये छूट है क्या?
हम चाहें तो
वे का उपयोग कर सकते हैं, साल के आधार पर, वो चाहें तो इसका दुरुपयोग कर सकते हैं।
आज आप समाज में क्या देखते हो? आज हम समाज में यह देखते हैं कि अधिकतर लोग प्रयास कर रहे हैं। क्या भौतिक समाज में किसी न किसी
साधन से सुख प्राप्त है।
ये है समाज का प्रयास।
जैसे प्लाजमा ने कहा, जब मैं देखता हूँ की इस प्रकार लोग दुख की स्थिति को सुख किसी भी बदलने का
प्रयास कर रहे हैं।
मेरा दुख आता है। ये है प्रयास, आपके बाल सफेद हो
रहे हैं, बराबर लक्षण आ रहे है, जी कर लो। पर वास्तविकता क्या है?
दुखान है हम फिलहाल दुई कह रहे हैं कि
हमें वो ज्ञान का प्राप्त पालन करना चाहिए जिसके द्वारा
जन्म बंधन से। और आगे कहते हैं 1 ही उपाय
है,
कई उपाय है, उसे 1 चुन लो बड़े फर्स्ट रूप से इस श्लोक में वो दूसरे श्लोक में क्या कहा गया है?
1 ही उपाय है। वो क्या है?
परम भगवान के शरण थोला, ये है शासन। पर हम भगवान के
और शरणागत होने के विषय में क्या कहा गया है? भगवान की शरण लो। और ये ज्ञान भगवान के प्रतिनिधि और
गुरु के सहयोग से स्वीकार करो।
तो शास्त्र में बड़े स्पष्ट रूप से शिक्षा प्राप्त होती है।
किस प्रकार भगवान के होना में बड़े रूप से गुरु साधू शास्त्र, शास्त्र का
अर्थ है भगवान की वाणी, हम साक्षात भगवत बनेगा। शास्त्र में भगवान की वाणी और शास्त्र
में किसी प्रकार की अपुना, किसी प्रकार का दोष नहीं, किसी प्रकार की कमी नहीं।
पाली, ग्रंथों का नवाज जैसे जानते हो,
लगभग हर प्रसिद्ध भाषा में हुआ है। और सारे विश्व में लोग पढ़ रहे।
गांधी क्यों?
क्योंकि इनमें सनातन उद्देश है यह सोचना
कि आज के युग्य में इस सन्देश का लाभ नहीं उठा सकते। यह गलत है। तो शासों द्वारा हमें भक्तियों की महिमा का ज्ञान मिलता है। और जो साधु है, साधु वो ही
संदेश देता है, जो शास्र में है। और जो गुरु है, वही संदेश आगे प्रस्तुत करता है, जो साधु ने किया है। इसलिए कहा गया है गुरु साधु, शास्
साधु को वही कहना चाहिए जो शास्त्र में है।
और गुरु को वही कहना चाहिए जो
कि पहले साधु ने अचारियों ने दिया है। जैसे की अगर आप पापाजी के ग्रंथों
को पढ़ो तो आप देखोगे की पापा
जी के साथ प्रिय भी हैं। वो भी सौ पर निर्भर है जो
हमारे आचार्यो ने शिक्षा दिए। जैसे कि भगवत गीता, भगवत गीता का तातपर्य, प्रापा जी का निर्बल है वालादेविदएभूषन के तात्रय। उसी प्रकार जब राबाल भागवत के तात्प्रय को देर करते थे, तो अपने सामने
महानाचारियों का जो तात्रय था, उसे रखते
थे, उनके तातप्रियके इम्पोर्टेंट पवाइंट्स लेते थे। और वो ही भाव प्रस्तुत किया।
रापंजीनेअपनेतो भगवान के शरणागत कैसे होना चाहिए, यह ज्ञान हम प्राप्त करते हैं।
गुरु साधु
आगे जब तक कोई भक्ति योग नहीं करे,
रागाके भावना उत्पन नहीं होगी। वासदेव भगवती, भक्ति योग प्रयोग
की भक्ति करोगे।
क्यूँ?
जब भक्ति करोगे। भक्ति के माध्यम से हमारा
हृदय इंडिया सो भक्ति भक्ति का अर्थ क्या है?
संक्षेप में
भक्तियों का अर्थ है मन
बुद्धि इंदियों का उपयोग करना, किस में
भगवान की सेवा में। और अगर हम मन, बुद्धि इंदियों का उपयोग करें। भगवान की सेवा में जो अशुद्ध मन है, इंडियन है, वो शुद्ध बन जाएंगे।
तो यहाँ नहादवुरीकहरे है की जब तक हम भगवान की सेवा में नहीं जुड़े,
ये विज्ञा प्राप्त नहीं होगा।
और जो असली ज्ञान है,
जो असली
संदेश है, उसका हमें लाभ उठाना है। वे भक्ति योग माध्यम है। तो प्रापर्टी इन विषों की चर्चा करते हैं। बाबाजी कह रहे हैं तात्पर्य में की हर व्यक्ति प्रयास कर रहा है। सुख प्राप्त करने के लिए वास्विकता में क्या प्राप्त हो गई है। तो ये है अभियानता अज्ञानता के प्रभाव
में आकर हम सोचते है की किसी
भी प्रकार से हम सुख प्राप्त कर सकेंगे।
और संसार में तो बहुत ही संसार
में अगर हमें थोड़ा सुख प्राप्त ही होता है। हम क्या देखते हैं? इसी से
है।
और अगर हमें असली सुख चाहिए। क्या ये उपाय भी योग ब्रह्म।
जो व्यक्ति हम में जुड़ेगा वो असली
आनंद प्राप्त करेगा तो इसी विषय की चर्चा है। और कहते हैं आगे की भक्ति योग
में सफलता प्राप्त करने के लिए मन को क्या करना है। मन इस विषय की चर्चा राई के साथ कर चुके हैं। वो यहाँ है। अगर आपको भक्ति योग में सफलता चाहिए
तो मन पर विजय प्राप्त करना बहुत आवश्यक है। देखोगे कि इस विजय की चर्चा
शास्र में बार बार की जाती है। गीत के अंत में भगवान क्या कहते
हैं मनमलभाबामवासत्यम
तुम मन का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। जिस व्यक्ति ने मन पर विजय प्राप्त कर ली, वो व्यक्ति हर स्थिति में सुख सुखी रहेगा। जिसने मन पर विजय प्राप्त नहीं किया। जो को चेतन मन का दास है
और कभी भी सुखी है तो इसलिए
शास्र में इस विषय की चर्चा की जाती है। अंतिम नारायण स्मृति इस प्रकार की
योजना करो की है। अंत में किसका स्मरण करोगे
जब भारत की कथा में आप हो जल भारत
पूर्व में भारत महराज थे, हेलन को खोजते थे।
खोजे खोज ेश। इसका क्या परिणाम हुआ के रूप में
जन्म ग्रैंड तो प्रकृति के नियम बड़े कठिन है।
इसलिए आप अनेक श्लोक में इस विषय का ज्ञान बात कर।
हे हो।
अर्जुन ने तो कहा जंचा भर्तियों की
विलय के पालन से मन को वश मे ला सकते।
तुम मन के मन को वर्ष में लाओगे। तुम को भी वर्ष मिला। गे पापाजी उदाहरण देते थे। goswami का गोवामी थे। स्वामी समाज में उनका बहुत ऊँचा स्थान था।
पीसी जी की कमी नहीं थी, पर मुझे वो वृंदावन आये वो मदिर मधुकली
करके रह रहे थे।
पेड़ो के नीचे वो संतुष्ट थे क्यूँ
की उनका मन वर्ष में था, वो जुड़े हुए थे।
भक्ति तो
मन पर विजय प्राप्त करने के लिए बता में क्या का पालन। ये सोचना की मन को हम कभी वर्षमे नहीं ला सकेंगे।
ये मन चंचल है और भगवान ये भी कहते हैं। भक्तियों की विधियों का पालन करोगे तो मन को वर्ष में ला सकोगे। श्रवण नाम विष्णु समान शनम करोगे तो विष्णु स्पान भी सम्भव हो पाएगा।
अगर आपका शन कमजोर रहेगा तो मन पर विजय प्राप्त करना भी तो प्रॉपर जी इसी विषय की चर्चा करें।
शास्त्र में आगे जाकर प्रॉपर तातरी में ऋषवदेव की शिक्षा का वर्णन करते हैं। मैं आज रशुदेवकशाकोभागवत में प्राप्त होती है। ऋशुदेवकेसौपुस्तक थे और उन्होंने पोतों को दिव्य
ज्ञान दिया
जिसके द्वारा वे जीवन को सफल बना सके। तो भगवान विषद शिक्षा कहते हैं व्यक्ति
को गुरु नी बनना चाहिए। जब तक अपने शिष्य को ठीक शिक्षा नहीं दे जिसके द्वारा वो भगवान के धाम लौटे। जब तक वो अपनी उलाज को ज्ञान
नहीं दे जिसके द्वारा वो भगवान के धाम लौट सके।
तो
देव जी के अनुसार अगर हम माता या पिता बनते हैं तो हमारी
ये जिमेदारी बनती है की हम उन्हें वि ज्ञान प्रदान करें जिसके द्वारा
वो समझ सके जीवन का क्या लक्ष्य होना चाहिए। इस विषय पर प्रधान राज्य का उद्देश्य है। भागवत
मनुष्य जीवन बहुत ही दुर्लभ है इस लिए छोटी आयु से ही अध्यात्मिक
ज्ञान अनुकूल करना आरंभ कर देना चाहिए। तो माता पिता के रूप में माता
पिता का कर्तव्य बनता है की छोटी आयु से बच्चों को शिक्षा दी जाए।
जिसके द्वारा जीवन के लक्ष्य
आगे गुरु बनता है तो उसकी भी जिम्मेदारी है शिक्षा दे जिसके द्वारा हम भगवान के धाम लौट सके।
गुरु कहते हैं वह जो वेग मन
वेगा
गुरु में गुरु का जो
आचरण
है शा पर आधारित होना चाहिए और गुरु को स्वयं मन बुद्धि
और गुरू को कौन सी शिक्षा देनी चाहिए।
क्यूँकि शास्त्र साधु द्वारा आ रही है।
तो फ्राबाजीताजबरीमें कहते है कि पिशणभगवान की
भक्ति ज्ञान गुरु द्वारा प्राप्त होता है।
और आगे उन्होंने की शिक्षा के धारा
के द्वारा यह स्थापित किया है की जो गुरु है उसकी जिम्मेदारी बनती है कि वो सुध संदेश दे। भागवत के सातवे सखन में भगवान ने
हिरा पश्चात लाल से कहा कल मेरे कारण
तुम्हे इतना कष्ट बुगतना पड़ा था?
मांगो मेरे से क्या वर्ड चाहिए।
तुम्हे मांगो
ने कहा
मुझे आपसे कोई वर्ड नहीं चाहिए
जो सेवक इस भावना के साथ सेवा करता है। इस सेवा के बदले में मुझे कोई लाभ मिले,
वो व्यापारी है,
धंधा कर रहा है। और जो गुरु या मालिक इस भावना से शिक्षा दे इसके बदले में मुझे कोई आर्थिक लाभ मिलेगा, ऊचा संभाल में
पद मिलेगा तो वो असली गुरु भी नहीं है। वो असली असली गुरु नहीं है। जो यह उम्मीद करता है की अगर मैं को शिष्य बनाऊंगा। न
सेवक का भाव होना चाहिए निस्का
भाव और गुरु का भाव होना चाहिए।
निष्क भाव से उपदेश देता। जिसके पालन से हम आगे, उन्नति के
पार ने कहा मुझे
आकर्षित मत करो,
ये क्या कर, मेरे क्या बच्चे तो आगे जाकर। उन्होंने कहा पर अगर आप मुझे वर्द
देना चाहते हो तो 1 वर दीजिए,
मेरे सारे भौतिक आकर्षण, नच नाय।
अगर आप मुझे वर देना चाहते हो तो सा वर दीजिये, सारा भौतिक आकर्षण जो है
ये रात विनम्र और इससे
हमें क्या शिक्षा मिलती है, हमें शिक्षा मिलती है। अगर हम वर की भीक मांग रहे
हैं तो ये वर मांगो की हम
भगवान के शरणनगर हो सके, हम भौतिक से बच सके।
ये भावना होनी है। तो यहाँ प्रापा जी ने कहा है कि अगर कोई गुरु भी है तो उसको वो शिक्षा देनी चाहिए जिसके द्वारा हम गत प्रेम प्राप्त कर सके।
और आगे यह भी कहते हैं रात प्रेम में देवता की उपासना नहीं करते।
1 परम भगवान जी
ईश्वर परम कृष्ण
नमक काम, 1 ईश्वर है और 1
ही
और गीता में भगवान ने
कम बुद्धि के लोग देवता की शरण लेते
हैं और जो बार
देवता दे रहे हैं ओ वर कहाँ से आ रहा है।
इस भाग है कि हमें देवताओं की भी लेनी चाहिए।
माँ बाप की चर्चा
ने कहा हम
सब का
क्या है कर्तव्य या भगवान के दास और नित्य दास सदा दास है।
यही के द्वारा भी यही संदेश दिया
जा रहा है कि हमें भक्ति में जुड़ना चाहे तो ना बनी
बड़े स्पाइस रूप से
इस लोक में फिर से 1 बार यही सन्देश दे रहे है। और अगर आप भागवत को सुनोगे पढ़ोगे
तो देखोगे कि शुरू से अंत तक इसी महत्वपूर्ण विषय की चर्चा की जा रही है। अलग अलग तरीकों से।
तो कई बार लोग पूछते हैं लोग
बार बार 1 ही सन्देश सुनते हो,
थकते नहीं नहीं थकते और बार बार सुनने की आवश्यक।
क्योंकि हम कलियुग में इतने ठीक है। ये बार बार सुनने से भी बचा नहीं कहा। इसलिए बार बार सुनने की आवश्यकता है।
साथ में इन लतों का अध्ययन भी बड़ा महत्वपूर्ण है। हमें सुनना चाहिए और पढना जाए और
भक्तों के संग में रहना चाहिए।
इस प्रकार ये प्रेरणा प्राप्त होती है जिसके द्वारा आप भक्ति की विधियों का उपादन कर सको। तो संक्षेप में आज इस शो में नारदमुनी कह रहे हैं कि हम सब का असली हित,
असली लाभ, असली उद्देश्य यह होना चाहिए कि हम ज्ञान को प्राप्त करें द्वारा जन्म के बंधन से राजा विद्या जागो।
गीता में भगवान क्या गया है ये
सब ज्ञानों का राजा है।
ये है सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान, यह ज्ञान जिसके द्वारा भगवत और आज के श्लोक में और 5 लोग को प्रॉपर जी
ने ढाई पेज का साथ दिया है।
और प्रौपर्जी पूरे 4 पर मैंने लगभग
1 ही संदेश दे रहे हैं। वो है क्या।
यह हम सब का भाव होना चाहे? तो भक्ति योग में जुड़े भक्तियोग का अर्थ क्या है?
श्याम
जब हिरा धिकारी स्कूल में
बेटे को बिठा कर, गोद में पूछा
तुम ने की शिक्षा प्राप्त करते आ रहे हो। पर सबसे सबसे मेहतपूल्लशिक्षा क्या थी जब तब ने प्राप्त की स्कूल में, प्लान
में क्या
क्या गया?
विशणसपरनापालआज मार? तो ये है भगवान के शरनगतहोनेका माल्,
ये सवाल होता है शवनमकेसा हमें इस विषय पर ध्यान देना चाहिए और हमारा
प्रयास होना चाहिए कि हमें इस पर
बल दें, प्रयास करें, ध्यान करने और जितने ध्यान से हम सुनेंगे पढ़ेंगे उतना
की तेजी के साथ
हर रोज सुबह शिक्षा उच्चारण करे। और माँ ने क्या कहा, क्या कहा
ा ये हरी नाम का 1 लाभ क्या है पैदा लाभ, ये है क्या
जो हमारे हृदय में भौतिक आकर्षण है,
जिसके द्वारा भगवान कृष्ण नगर नहीं होते।
ये भौतिक आकर्षण क्या है घर जाए, ये हैं लाभ नाम का भक्ति हो शिक्षा का पालन। तो हमें इस शिक्षक का लाभ सच है। मानो भाग्य ये है कि शलपापाजीने पूरा ज्ञान दिया है।
ग्रंथों में 7 में हमें केवल के लाभ उठाने की आवश्यकता है
ने लगभग
हर विषय पर
ध्यान दिया है।
आप में से जो बात पोलियो इस्तेमाल
करते है आपका अनुभव होगा। लगभग किसी विशु कंप्यूटर में डाला आपको कोर्ट सुना जायेंगे। पापा ने ाthinyoneetoनois the book जो भी
तुम जानना चाहते हो ये सब मेरे
ग्रंथ में, हमें इन ग्रंथों को भरना
चाहिए, बाटना चाहिए
और इनके को सोचते रहना चाहिए। कभी कभी नहाने फलों में उठा रहता है प्रचार का और मेराथन के महीने में जाना रहता है कि
हम प्रयास करते हैं। सारे साल का मैराथन करना बॉम्बे में
शुरू कर दिया है और कई साल में किया है।
सारे साल में
जा सके इस प्रकार की योजना रखे क्यूँ सारे साल लोग
भूखे ज्ञान सोचते हैं।
कौन लेगा ज्ञान को हजारों लोग राह देख रहे हैं।
सब कोई हरे कृष्ण का वक्त आएगा
हमें संदेश दे लेंगे। हजारों लोग सोचे हम कंफ्यूज हैं जिंदगी में।
हमें यह नहीं पता क्या करें।
फेस, बुक, गूगल, सोशल मीडिया में वो देख रहे हैं। सोशल मीडिया से भी बच्चों की बुद्धि खराब हुई है।
अब बड़े बड़े भौतिक रोडपति कह रहे हैं।
हमारे बच्चे खराब हो रे है तो कई लोग खोज रहे हैं।
शांति का उपाय है। उन्हें।
पता नहीं कैसे हम प्रचार के जाए। जो इस संदेश को संदेश की राह देखा, तब कोई भगाएगा बने।
सन्देश दे रहे तो नही में दया की भावना थी। उन्होंने देखा, मनाजपरिशयेसाकाम कार्य में जुड़े हुए हैं। बेटों को तो भेज दिया उन्होंने। तपस्या के शिक्षा पालन प्राप्त करने के लिए।
मनी ने सोचा चलो।
इनको बचाया जाए।
वैसे ही हमारा भाग ने, हजारों लोग मंदिर आते हैं, प्रचार की राह देख रहे हैं।
हमें भी प्रचार का लाभ उठाना चाहिए।
व ज्ञान देना चाहिए, जिसके द्वारा समाज सुखी बन सके।
ठीकहै।
he is an, this is the english tomenologyavorson and detachment
detachment means uropanise
this
is bad fat my spurturelife i m
replying from a spice
back from a spiral so i should not purse hou it
and worsen
you to compulsion many begat i think your real question what is real meingotatachment in the net and
e a both english word a worgioninatase so proses yukti
with means jenendetargment not
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k before propasal with a best no chara
gone
before bukisa car car saline gad bukisa use a gard to travle so that is some old
jenna okay
yeah as was in the purab yes yes है some things in practical si, we are not
in a water
in r so an
you and the,
but sometimes you walk to a counter system on a monitor system that means that you nesicillyhavtogoto bregingoto qualify teachers can help or so that the same thing yeh thank you much to put
my
question that be ce year that narnysfीcिंग is so is of qualities and action beach sex so my weston is
all
the qualities of peace is most important quality that s montfenquolity pic y example we should be? यहं का प्रश्न ये है कि प्रचारक में कई गुण होने चाहिए।
सब गुन में सबसे महत्वपूर्ण कौन्सेप्ट बन रहे हैं?
न
सर सबसे महत्वपूर्ण गुण है। उदाहरण देना चाहिए।
अच्छा आप अच्छा उदाहरण दोगे और आपका चरित्र ठीक रहेगा, तो फिर आप दूतको
जल्दी ही प्रभावित कर।
सकोगे। 2 ये भी दूसरों जैसे हैं, कहते
हैं, कुछ करते हैं, कुछ
नहीं, जो
कहते हैं वो ही करते हैं।
तो फिर आपके उद्देश्य में ज्यादा शक्ति होगी। सब ने विश्व में प्रॉपर की शिक्षा को स्वीकार किया, उन्होंने देखा की प्रॉपर
जो कहते हैं वो ही करते हैं।
who he kate ha, sa s, sad should be example of course, tes being examples, not an that is post, who we also have to make an effort, sometimes we have example the bodies, but
they do do, they dont do any precing
thats not got all you like the modi shah, the king is eaten fordert sons fact is the purse, so,
he enter the tales on on the move
to go to beach on invitation।
कई बार लोगों के घर जाते हो, हर किसी ने बुलाया हो तो ही जाते हो।
अब सोचते हो हमें बुलाया नहीं, हम क्यों जाएं और नारद मुनी इन्विटेशन की रानी देख।
उन्हें ने देखा, राजा सा काम खाने में जुड़ा हुआ है। भेडों को भेज दिया तैयारी मुझे खुद ही पहुंच।
तो प्रचारों को खुद ही पहुंच जाना
चाहिए,
कोई बुलाएगा तो जाएंगे, ये उत्सव होना चाहिए, बिना बुलाए पहुँच जाए।
this one dbodyinjodfol was stalin m। हर हर में
वो गीता बर, वो
भी गाड़ी अपनी गाड़ी में, होता है, कहीं भी गाड़ी को में बात का,
ias me everything meet people, nice people, get intrested okay more questions और
तो
हमारा कैसे जैसे कहा जाता है कि के साथ में बार करना चाहिए।
तो कैसे
कैसे बचाने के लिए शादी की
है
कठिन गाड़ी मे सबसे बेहतर
है, आप सब के दास बन जाओ, ना।
सब के दास बन जाओगे तो कोई चिंता नहीं रहेगी।
कौन बना मैं? कौन हमारी समस्या है, हम सबके स्वामी बनना चाहते हैं। अब सोचो हम सबके दास हैं। और ये भाव रखोगे
तो सबके प्रति
आदर का भाव रहा।
अगर आप कोई नेता भी हो, भाव होना चाहिए।
हम सब के दास हैं हम ऊँचे,
पद, पढे,
सब हमें नमस्कार करे भी चाहिए। हम सब के लिए नौकर सेवा, ये भाव होना चाहिए। हर भले, चाहे सीनियर हो या जूनियर हो। अच्छा हाँ पूछिए थैंक यू
के जीवन
में जो क माइक में बोले, हरे
कृष्ण महाराज
के जीवन में जो दुख
आता है, कष्ट है। जो फिनांशियल क्राइसिस की होती है, उसको कैसे समझ मा। हम ये सोचते हैं।
अभी हम भग बन गए है।
बंदूक का चेहरा नहीं देखना पड़ेगा,
हम
कभी भी बाहर नहीं होंगे, हमारा इन्वेस्टमेंट ऊपर जाएगा, स्टॉक मार्केट में
जगह से लाभ हो। हम भूल जाते हैं।
हम सब का कर्म का इतिहास भी है।
भगवान की कृपा से कष्टों का कोटा घट जाता है।
पापाजी उदाहरण दे देते, पंखा तेजी से चल रहा है। स्विच बंद करोगे तो पंखा बंद हो जाएगा। यह उम्मीद नहीं कर सकते थे क्या? अभी हम भाग्य बने तो किसी प्रकार का कष्ट हो।
भाइयों का, देख
के जीवन मे ले लो हो। प्रॉपर की जीवन दोस्त अनेक कष्टों का सामना करना। पड़ रहा है और कुंती बनाने को कहती है।
व कष्टों को बढ़ाओ पाजमेसदस में जितना बढ़ाते हो उतनी ज्यादा में
तो भक्त को जब कठिन स्थिति आती है, उसे चाहिए भगवान की कृपा से
छोटी माता मुझे कश की जी आपने।
yes yes kishor thank you very much
for verisbaniection
ear the difrent।
समता छोर
कर सो हाल तो स्ट्रक्चर
अंडरस्टैंड पार्सल profaincnmition fast
stron
you can
instruction of mind in
mind in a begeschieter
the anmentrofmin is worst enemy so that ignor and thus follotedirection on us adushadayou have counsler take there and that s not in a in go to more senior counsler good next level। people always very portion yes। ओह
1 उपाय है, जो भक्ति दे जाता, हमने तुम्हारा कहना नहीं माना? so झाडू रखो अपने पास लो तुम्हारा सब नहीं, सबसे भीतर
noreenslmiwosor and da
sawan in
a
try try our game
you sefitedsबचपन में नहीं सुना प्रयास करते जाओ अंत में gevsindontgiveou परेशन
मकसनकेप्रति विश्वास भक्तों के प्रति मतलब आपके जो लीडर्स
हैं, उनके प्रति,
जो आपके लीडर हैं,
उनके प्रति
इतना विश्वास रहना चाहिए। वो जो बोले हैं मैने सुधार के बोल, हम सब सोचते हैं, हमें बताया
हमारे लिए क्या बचता है हमें यह सोचना चाहे बूट नंबर 1
माँ से
पूछ विधवा तुम्हारे साथ बैठकर
क्यों नहीं
पढ़ते माँ मेरे गुरु ने
में ज्यादा योग्यता नही है
कैसा? okay, जॉब के टाइम, जॉब के टाइम नहीं, यह कोई नई बीमारी नहीं,
पराली बेमानी है, जबकि मीना भगवदमकलासमेंनीना में नीना और परेशान सावधान है। ये पुराने मेवानी है। हमारी जाप में ज्यादा रुची नहीं है तो प्रयास करना पड़ेगा।
आज करने से ही में हर क्षेत्र में सवाल सकती है।
ओके रामा, रामा रे।
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