भक्ति मार्ग में एकता आवश्यक क्यों है? | SB 4.30.8 | Rohini | 20 Dec 2023 | Gopal Krishna Goswami

Gopal Krishna Goswami explains why unity matters in bhakti practice, citing dangers of pride and gossip among devotees. He addresses how to serve selflessly, stay resolute through life's struggles, and handle conflicts in temples by cultivating humility and shared devotion to the Lord.
Chapters
ओह भगवते
भगवते तपस्या का वर्णन शास्त्र में नेक स्थानों पर है। भगवान ने इनका उद्धार किया। प्रचेता ने तपस्या की शिव जी शिव जी के द्वारा मंत्र प्राप्त हुआ था। भगवान भक्तों की तपस्या से बहुत प्रभावित होते है। जैसे की द्रु माराज ने भगवान की बहुत तपस्या की जिसके द्वारा उनके भगवान का दिव्य दर्शन प्राप्त हुआ। रिशव देवी अपने पुत्रों को कहते हैं अपने पुत्र को भगवान की तपस्या करो। दिव्य आनंद के लिए
पर
और तपस्या का क्या परिणाम होता आनंद प्राप्त होता जो केवल बढ़ता जाता है। भौतिक जीवन में ऐसी तपस्या है, ऐसी तपस्या आपको कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं देती। तो यहाँ परम भगवान प्रचेतस के सामने प्रकट हुए बोला कि मैं आपकी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ क्यूँ इन सब भाइयों में 1 ही भाव था, भक्ति योग भक्तियोग उन सबका 1 ही व्यापार व्यापार था भक्ति योग भक्तयोग तो ये सब भाई 1 जुट थे। भगवान की सेवा में सब भाइयों का 1 ही भाव था
है।
भगवान ने कहा की तुम का मांगो क्या चाहिए? भक्त क्या मांगता है भगवान वो मानता है। शुद्ध भक्ति
में
जैसे भगवान ने 2 महाराज को कहा की मेरी वजह से तुम इतनी कठाई झेलनी पड़ी मांगो क्या पहले तो मैं इस भाव से तपस्या कर रहा था की मुझे सबसे विशाल राज्य प्राप्त हो प्राप्त हो लेकिन अब मुझे 1 हीरा मिल गया है हीरा प्राप्त हो गया है। अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। अब मुझे जीवन का लक्ष्य प्राप्त हो
गया,
आपका दर्शन प्राप्त हो गया लिए क्लियर था अगर कोई वर देना चाहते तो ऐसा वर दीजिये की मैं हमेशा उत्तम भक्तों की संगति में हूँ।
उनकी यह च्छा दीजिये मैं
प्रात महाराज ने कहा अगर आप मुझे वर देना चाहते हैं तो ऐसा वर दीजिये कि मेरे हृदय से सारे बहुतिक आकर्षण खत्म हो जाए।
यहाँ भगवान मांग
यहाँ भगवान कह रहे है माँ को क्या वर चाहिए। मैं आपकी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ।
यहाँ
यहाँ पर चेता जनेक भाई थे। इस प्रकार आप देखते हैं। इस काम में भी बहुत सारे भक्त हैं। आश्रम में 4 आश्रम हैं ब्रह्माचार, ग्रस्त, वान से संन्यास ब्रह्मचारी जो आश्रम में है, ग्रस्त है वो नौकरी भी करते हैं, पैसा भी कमाते हैं, न की सेवा भी करते हैं, कुछ मान प्रस् हैं, कुछ सन्यासी है। नारदमुनी के इस उपदेश्य के अनुसार सभी को 1 चीज में जुड़ना चाहिए भक्ति योग 1 भाव से जुड़ना चाहिए। भक्ति योग में हमारा भाव क्या होना चाहिए कि हमें शुद्ध भक्ति को स्वीकार करना है।
और
व्यास देव ने बहुत सारे ग्रंथों की रचना की और सभी ग्रंथों में क्या उन्होंने निष्कर्ष किया ये बीड़ा किया दिया है की हमे जो मनुष्य जीवन प्राप्त हुआ है उसका सदुपयोग करना चाहिए। जब व्यास से नारद मुनि से मिले तो उन्होंने कहा की मेरे हृदय में संतुष्टि नहीं है। तो नारद मुनि ने उनको कहा की आप श्रीमत भागदूमकी रचना करो जिसके 18 हजार श्लोकों में 1 ही विषय है। शुद्ध भक्ति तो भगवान यहाँ कह रहे हैं प्रचेतस की मैं तुम सब भाइयों से बहुत प्रसन्न हूँ क्योंकि तुम सब के हृदय में 1 ही भाव है, वो है भक्ति योग
हमारी सेवा जैसा
की मैं कह रहा था कि 4 आश्रम हैं इस काम में, तो, लेकिन सभी भक्तों को 1 भाव के साथ निष्काम भाव के साथ भगवान की सेवा में जुड़ना चाहिए। तो यह नहीं कि ब्रह्मचारी आश्रम में सभी हंड्रेड परसेंट दे पाएंगे। लेकिन भाविक होना चाहिए की भगवान की सेवा है। ये भगवान की सेवा में प्रैक्टिकल तरीके से भी करनी है। कई बार हम अपने विचारों में इतना फंस जाते हैं कि हम एकता की भावना भूल जाता है। प्रोप जी कहते थे की यूनाइटेड वी, स्टैंड, डिवाइड, फॉल एकजुट रहेंगे तो खड़े रहेंगे, नहीं तो हम गिर जायेंगे। प्रापा जी उदाहरण देते थे। 1 बार 1 पिता ने अपने 4 पुत्रों को बुलाया। उन चारों पुत्रों में हमेशा अनबन रहती थी, सब झगड़ते रहते थे। उनके बाप ने आओ इधर पहले उन्होंने 1 लकड़ी का टुकड़ा दिया, चारों बेटों को 11 लकड़ी का टुकड़ा दिया,
तोड़ो
इसे बड़ी आसानी से तोड़ दिया,
फिर
उन्हे बंडल दिया लकड़ियों का बंडल। अब इसको तोड़ो और सब फेल हो गया। क्यूँ जब लकड़ियों को इकट्ठा रखा था तो मैं ज्यादा शक्ति थी, इसलिए प्रापा जी कहते थे इसी तरह से अगर हम सब 11 जुट रहेंगे तो कुछ नहीं हो सकता। तो हमें हर स्थिति में इस तरह से रहना चाहिए कि हम एकता से कार्य करे। तो प्रचेता में क्या गुण था की उनके सबके अंदर 1 ही भाव था भगवान की प्रसन्नता और ये होना चाहिए हमारा लक्ष्य और चेतन्य महापुर ने 1 बहुत महत्वपूर्ण शिक्षा दी है। चेतन ने शिक्षा ष्कम के तीसरे श्लोक में। तो
हम में तोे
तो भौतिक, जगत में सर्दी, गर्मी, सुख, दुःख, ये तो आएगा, लेकिन हमारा भाव, हमेशा ये होना चाहिए की हम भगवान की सेवा में लगे रहे। त तो इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अगर कठिनाइयों का सामना करना भी पड़े। तो भी हम तैयार रहते हैं। भगवान को प्रसन्न करने के लिए हमें कीमत भरनी पड़ती है। भगवान बहुत गीता के अंत में क्या
कहते है
नमस्कर माँ, सत्य माँ में कम, नमरजशीश्यामीमा सभी धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में हो, मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा, घबराओ मत अक्सर म घबराते हैं,
इसका
कोई लाभ होगा में तुम भगवान कह रहे? अगर पूरे विश्वास के साथ मेरी शरण में आते हो तो मैं तुम्हारी रक्षा
करूँगा,
अपने मन द्वारा मेरा चिंतन करो, मेरी प्रार्थना करो, मुझे प्रार्थना करो और बिना शंका के ऐसा करने से आप
मेरे धाम मरो वापिस आओगे लौटोगे।
प्रचेता के 4 अलग अलग विचार थे, लेकिन 1 भाव जो उनमे कॉमन था वो था की भगवान की भक्ति करनी है। उसी प्रकार हम भक्तों का यह भाव होना चाहिए कि हम भगवान की खुशी के लिए काम करे, अपनी खुशी के लिए नहीं। भौतिक समाज में सब लोग कार्य करना चाहते हैं, अपनी खुशी के लिए सही बात है, उनका क्या भाव रहता है। हमारी खुशी भगवान की खुशी है। तो अगर हम भगवान हमें खुश नहीं करते तो हम दूसरा मार्ग अपनायेंगे। भक्त का क्या भाव होता है की जो भगवान की प्रसन्नता जिसमे है उसमे मेरी प्रसन्नता है। अगर हम ऐसा वातावरण रखना चाहे की जिसमें सब भक्त लोग मिल कर, सेवा कर रहे हैं तो हमें क्या करना चाहिए? तो विनम्रता के भाव से भक्ति में जुड़ना चाहिए। तो हमें क्या करना चाहिए? दुसरे का सहयोग दे भक्ति योग के मार्ग में सफलता प्राप्त करने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है। कई बार हम ये कहते हैं की हमें सेवा तो करनी है लेकिन ये 1 इच्छा भी हमारे साथ हैं, हमारा भाव यह होना चाहिए जो भक्ति के लिए अनुकूल है उसको स्वीकार करो और जो प्रतिकूल है उसको त्याग।
2
तो प्रापा जी परपर में बता रहे है की हमारे इस कौन के भक्तों में भी अलग अलग विचार हो सकते है लेकिन 1 विचार कॉमन होना चाहिए भक्ति योग का? तो अगर इस एकता के साथ चलोगे तो हमारा मंदिर भी आगे बढ़ेगा। तो ये जो भव्य मंदिर हम बना रहे हैं, किस की प्रसन्नता के लिए बना रहे हैं भगवान की तो भगवान की प्रसन्नता के लिए जितना भी परिश्रम करो आपको यही लगेगा हमें और करना
चाहिए
जैसे की आप हरि नाम का उच्चारण करते हो। कई बार लोग पूछते हैं की 1 ही मंत्र का, जब आप दिन रात करते थकते नहीं हो, दूसरा मंत्र कर
लो,
भक्त नहीं नहीं थकते, भक्त क्यों नहीं थकते? क्यूँकी आध्यात्मिक नाम और जितनी बार लोगे उतना ही कम है। तो चेतना वो कहते है अंदर प्रदीप की जितना जब करतेहैं उतना ही अनंत बढ़ता जाता है, ये जो जल है ये मीठा है, नमकीन नहीं है और इसके जब से जो आध्यात्मिक खुशी जो मिलती है वो बढ़ती जाती है। हम सबको अपने आप से पूछना चाहिए की क्या इस कार्य से मैं भगवान को प्रसन्न कर रहा हूँ की नहीं तो अगर कुछ गलत है तो हमें बैलेंस करना चाहिए।
उसको
प्रचेता के सभी भाइयों का 1 भाव था इसी भाव से उन्होंने भगवान को प्रसन्न किया, मांगो क्या चाहिए? भगवान कहते मांगो मेरे से क्या चाहिए। आपने कई बार सुना होगा भक्त लोग कहते हैं प्यूरिटी इज द फोर्स पवित्रता भी बल है
का पालन।
तो यह पवित्रता का मतलब है की भक्तियों के नियमों का पालन। तो जब आप भक्ति योग के सभी नियमों का पालन अच्छे से करते हैं तो भगवान भी आपको सुविधा प्रदान करते
हैं, देखते हैं लिए?
तो भगवान जब देखते हैं कि भक्त प्रयास कर रहा है मेरी सेवा के लिए, तो भगवान उसको बुद्धि देते हैं भाग्यशाली तुम सब भाई बहुत भाग्यशाली है, भगवान कह रहे हैं क्यूँ? क्यूंकी आप सब लोग भक्ति योग में जुड़े हो
सेवा।
जैसे मैं कल कह रहा था की भाग्यशाली व्यक्तियों को इस सेवा का मौका
मिलता है जिससे
तो आज के श्लोक में यह कहा गया है वहाँ करे। मैं आपके भक्ति के भाव से बहुत प्रसन्न हूँ, माँ को क्या चाहिए तो आप बहुत भाग्यशाली हो,
केवल आनंद ही
आनंद है, भक्ति के मार्ग में केवल आनंद ही आनंद है। 1 एकता आवश्यक है। तो अगर हम अपने छोटे छोटे दल बना लेंगे तो उससे भगवान प्रसन्न नहीं होंगे तो 1 ही दल होना चाहिए। कृष्ण भक्ति और ये मंदिर, हर मंदिर का यह भाव होना चाहिए।
भक्ति योग
तो भक्तियोग मार्ग प्राप्त होता है। कैसे संगति के द्वारा तो ये संगति 2 रूपों से प्राप्त होती है।
ग्रंथों का प्रभाव 1 है।
ग्रंथों का प्रभाव, दूसरा भक्तों का प्रभाव
का प्रकाशन।
तो प्रौपर ने स कौन की स्थापना की। तो प्रपात के मन में था। ग्रंथों का प्रकाशन और वितरण बहुत जरूरी है।
अरे ये मान लिया था
तो ये आदेश उनके गुरु महाराज ने उनको दिया था। राधा कुंड में 1935 में
मे
तो
उन्होंने मृदंग की तस्वीर खींची और कहा कि अगर तुम्हारे पास पैसा हो तो ग्रंथों का प्रकाशन करना बहत। दंगा सेवा का बेहतमदंगा कैसे
किताब बांटते हो।
तो अगर। जब आप किताब बांटते हो तो सके यहाँ बांटो और पढ़ी जाएगी। अमेरिका में
बाट पढ़ी जाएगी।
यहाँ बांटोगे तो हो सकता पर ही जाएगी आफ्रिका में। और जो नॉर्मल मरदाना बजाते है, उसकी आवाज थोड़ी दूरी तक की जा सकती है। तो ये ग्रंथों की वितरण की सेवा बहुत महत्वपूर्ण है। हम एकता के साथ सेवा करना चाहते हैं। तो अच्छे व्यवहार के लिए में क्या भाव रखना चाहिए? आम भक्तों के गुणों को देखे तुम्हारा जी भाव क्या रहता है? नुक्स देखते हैं लोग। भक्तों पापा जी कहते थे मधु मक्खी बनो, दूसरी मक्खी, मत बनो, कूड़े वाली मक्खी, मत बनो। मधु मक्खी और जो कूड़े वाली मक्खी में क्या अंतर है? मक्खी जो है, सर गंदे स्थानों पर बैठती है, वही ढूंढती है। मधु मक्खी फूलों पर बैठती है। यह हमारा भाव होना चाहिए। तो अगर इर्शा के प्रभाव में आकर चुगली करे निंदा करे तो फिर क्या होगा? तो आप वैष्णव अपराध करोगे। वैष्णव अपराध से क्या परिणाम होता? हमारी भक्ति कमजोर होती जाती है।
भगवान है
तो परम भगवान प्रचेता को क्या कह रहे हैं? तुमने तपस्या की है, इसलिए मैं प्रसन्न हो। ग्रंथों के वितरण की सेवा में जाना 1 प्रकार से बड़ी तपस्या है।
है।
तो जब आप किसी से मिलते हो तो ये यकीन तो नहीं होता की वो पुस्तक लेगा ही लेगा, नहीं लेगा। यहाँ कुछ और बोल लेगा की काम गंदा नहीं है। तब भी हमें स्थिर होकर और िटामिन होकर करना चहिए। यह प्रयास करना चाहिए। यह नहीं कि थोड़ी कठिनाई आई और डर जाए। तो जब भगवान नित्या हरिदास ठाकुर जितने माप की आज्ञा से घर घर जाकर प्रचार कर रहे थे, तो कई लोगों ने कहा आइये आइये, हम तो आपकी राह देख रहे थे और कइयों ने उनकी बहुत बेस्ती भी की, दरवाजा भी नहीं खोला
सौरी।
हमें तैयार रहना चाहिए। हर प्रकार के व्यवहार के लिए। कहीं आपका स्वागत किया जाएगा, कहीं आपकी निंदा करेंगे, कहीं आलोचना भी करेंगे। तो इस प्रचार के सम्बन्ध में 11 घटना भी थी। बेचती हुई क्यों, जो प्रचार करने गए। अगर आप मंदिर में बैठे रहते तो बेसिक होगी। युद्ध के मैदान में सम्भव है। हमे इस भगवान के आदेश का पालन करना चाहिए। भगवान कहते हैं सो भक्तों में मुझे प्रिय कौन है? जो प्रचार करता है। तो जैसे मैं कह रहा था कि भक्ति में हम कैसे जुड़ते हैं या ग्रंथों का प्रभाव होता है, जहाँ भक्तों का प्रभाव होता है। तो जैसे इस्कॉन के भक्तों ने रिकॉर्ड सेट किया यूथ प्रीचिंग में, तो प्रापा जी ने कहा था जो यूथ है उनको प्रचार करो। तो विदेश जाने से पहले प्रापा जी ने बहुत प्रयास किया था युद्ध को आकर्षित करने के लिए। तो प्रापा जी कहते है। तो उन पैरेंट्स को की आपका 1 बेटा प्रचार के लिए 2 प्रापा जी को इतना सहयोग प्राप्त नहीं हुआ। तो जब प्रोबा जी वापस आये अमेरिका से, और भारतीयों ने देखा की विदेशी लोग भक्ति कर रहे हैं, तो फिर भारतीय लोग जुड़ने लग गए। तो जब प्रोपर जी पृथ्वी पर थे वैसा युद्ध प्रोग्राम शुरू नहीं हुआ था। तो भक्तों ने उसके बाद युध प्रीचिंग शुरू की। तो उनका क्या परिणाम हुआ? हज़ारों युध है इंडिया मे जो 16 माला कर रहे हैं और नियमों का पालन कर रहे हमे भगवान की सेना को बढ़ाना है, हमारा युद्ध है माया के साथ और माया के कई सेवक है असंख्य सेवक। अगर माया की इतनी बड़ी सेना का सामना करना है तो आपको अपनी सेना भी बढ़ानी पड़ेगी प्रचार बढ़ाना पड़ेगा करों द्वारा प्रकट होता भगवान का सन्देश क्या
है
आप बहुत गीता पढ़ते हो श्री भगवान ह।
आज आज में
अगर संसार में किसी
चीज की कमी है।
आज तो वह दिव्य ज्ञान
है।
आज ये दिव्य ज्ञान, शुद्ध ज्ञान कौन प्रचार कर रहा है।
आज
आप टीवी में कई धर्म प्रचारक देखते हो तो लेकिन शुद्ध धर्म का प्रचार सिर्फ स्कोर संस्था कर रही है। हमें हरिनाम देना चाहिए और भगवान संदेश का प्रचार करना चाहिए। तो दूसरा है भक्तों का संग, भक्तों का भाव क्या रहता है की कैसे भगवान के संदेश को आगे बढ़े। तो इसलिए हम ये सोचते है की पिछले साल इनको बांटा था, ग्रंथ, अब इनको देना है। आगे प्लानिंग मैरेथन की शुरुआत में ये लगता है। सबको तो बाट दिया किसको दे सब चिंता में रहते है, मै शुरू करते
हो,
फिर जाओ मेरिकन शुरू करते हो, फिर देखते हो वान की कृपा। भगवान उनकी सहायता करते सहयोग देते हैं। जो खुद प्रयास करते हैं। न देखेंगे की आप प्रयास कर रहे भवान, उस प्रकार की बुद्धि भी देंगे गो स्वामी कहते है उत्साह निश्चेत अगर भक्ति के मार्ग में सफलता प्राप्त करनी है तो यह भाव होना चाहिए। निष्काम भाव से हमें सेवा करनी चाहिए। इस कोन में आजकल 1 शब्द आ गया है कंफर्ट जोन आप ने सुना है।
यह
क्या मतलब है इसका हम सेवा
करेंगे,
अपने हिसाब से हम सेवा करेंगे। लेकिन अपने हिसाब से तो जितना कंफर्ट जोन आपको चाहिए मिल सकता है। वा ने पूरी सुविधा दी। तो ये भी सोच ले की उतनी ही मात्रा में भगवान की सुरक्षा भी मिलेगी नहीं मिलेगी। मतलब कम मिलेगी कंफर्ट जोन में रहो भगवान कहते हैं ये तुम्हारा कह रहे हैं की जितनी मात्रा की कोई मेरे शनागति होता है उतनी में सुरक्षा प्रदान करता है तो 10 परसेंट शनागतीहैतो, 10 पर्सेंट प्रोडक्शन है। तो 90 पर्सेंट है तो 90 पर्सेंट। तो आप देखते हो भौतिक जगत में जो इंश्योरेंस होती है उसका 1 प्रीमियम होता है। तो जितना प्रीमियम, ज्यादा भरोगे उतना कवर ज्यादा मिलता है तो जितना कंफर्ट जोन से बाहर निकालोगे उतनी ज्यादा सुरक्षा मिलेगी। हम यह सेवा करेंगे बड़े वाली ये चाहिए पहले मुझे चेयरमैन बनाओ
फिर मैं
आगे बढूंगा ये है डिस्काउंट, डिस्काउंट है, डिस्काउंट है, डिस्काउंटेड से हो तुम्हारा भाव होना चाहिए। भक्ति में आगे बढ़ने का
क्या कहते है?
आप भौतिक स्थिति में क्या चाहते है, बीमार के हेल्दी रहो
दिया है,
जो को प्रसाद दिया जाता। आपको अच्छा प्रसाद चाहिए या जिसमें नमक वगैरह सब सही है। डायबिटीज वाले को चीनी बनाया।
लोक में
इस श्लोक में वहाँ बहुत महत्वपूर्ण संदेश दे रहे है। 1 तरफ से 1 तरह से भागवत के हर श्लोक में महत्वपूर्ण संदेश है।
अमर जी ने कहा की इस में जलती है,
श्राप के 3 ग्रंथों में इतनी शक्ति है। अगर आप 1 बार 1 श्लोक भी पढ़ लेंगे तो आपका आध्यात्मिक जीवन आरम्भ हो जाएगा। भगवान प्रसन्न हैं पर चेता से क्यू क्यू पूछ रहे महाराज
सब ने
हम 10 हजार साल तक तपस्या कर रहे थे, उस मंत्र का जप कर रहे थे, शिव जी ने उनको दिया था और उस मंत्र में क्या था भगवान की महिमा का गुण। हम सबको प्रयास करना चाहिए की हमारे कृष् महामंत्री के पति आकर्षित हो। हमारा हरी नाम में करन बड़े क्या लक्ष्य बना। कई बार भक्त लोग पूछते हैं क्या लक्ष्य बनाना चाहिए। हम कहते हैं हरि नाम के प्रति रूची बढ़ा। इस इस समय हमारी रूची बहुत कमजोर है। तो फिर रूची कैसे बढ़ाये
भाई चेनटिंजितना
जब करोगे उतनी रूची बढ़ेगी, शास्त्र पढोगे तो शास्त्रों में रुचि बढ़ेगी। तो अगर भगवान भक्तों के संग में रहने की इच्छा रखोगे तो भक्तों का संग मिलेगा। ये इच्छा होनी चाहिए की भक्तों के संग में रहे।
1
तो जब जेतनवाबलूदक्षिण भारत की यात्रा कर रहे थे तो वो रामानंद राय से मिले
जो राम भाई
उनको पहले सूचना मिल गयी थी कि रामानंद राय है वो बहुत प्रसिद्ध भक्त है। महाप्रभु उन्हें मिले गोदावरी नदी के तट पर और वहाँ पर अभी कौन का वहाँ पर मंदिर भी है। चेतना बहुत सारे प्रश्न पूछे रामानंद राय स। तो उसमे से 1 प्रश्न यह था कि भक्त के लिए असली कष्ट क्या है? तो रामानंद राय ने कहा भक्तों की संगति से जुदा हो जाना, ये है सबसे दुख की स्थिति की आप भक्तों के संग से दूर हो जाओ। अगर आप वैष्णव अपराधों से बचने का प्रयास करोगे तो बहुत अच्छी संभावना है की आप भक्तों के संघ से दूर नहीं होगा। तो हमारा ये भाव लेना चाहिए की यूनाइटेड विस् शुड की स्कर्ट यूनाइटेड हम इस कान को 1 साथ रखना। 1 हमारा मंदिर में भाव होना चाहिए एकता के साथ कार्य करेंगे डिपार्टमेंट है तो हमें यह नहीं देखना की मेरा डिपार्टमेंट में अपना ही देखूंगा दूसरा डिपार्टमेंट और देखे हमे बड़ी पिक्चर देखना है यह हमारा मंदिर है। बातें तो विनम्र भाव से कार्य करोगे। तो 1 दुसरे की बातों को सुनोगे। कई बार हमारे अंदर ये भाव मुझे सब पता है
जी
प्रापा जी 1 छोटे व्यापारी से भी सलाह लेते थे। जब प्रौपर्जी बैक, टू, गार्डेड मैगजीन बांट रहे थे तो प्रौपर्जी लाइब्रेरी में गए
जो
लोग
तो प्रौपर जी उसने 6 पेज की, लाइबेरि ने कहा की प्रोपर जी 6 पेज की पे बैक, टू बार्डर लोग पढ़ते हैं और फेंक देंगे आप ग्रंथों को प्रकाशित करो। प्रपा ने यह परामर्श स्वीकार कर लिया और प्रोप ने ग्रंथों का प्रकाशन कर दिया। 1 बार 1 भारतीय व्यापारी जो बॉम्बे में रहते थे, प्रोप जी से मिले लॉस एंजलिस में क्या आपकी जो बैक, टू, गॉड और मैगजीन बहुत अच्छी है, आप भागवतम को इसमें सीरियलाइज क्यूँ नहीं करते? पापा ने कहा गुड, आइडिया प्रॉपर ने फिर शुरू कर दिया। तो हमें विनम्रता का वातावरण बनाने के लिए 1 दुसरे के विचारों को आदर देना चाहिए। तो यह नहीं कि मैं हम जो सोच रहे है वो सब ठीक है, जो दूसरा, सोचता सब गलत है। राइट राइट या रॉंग, मैं सही हूँ तुम गलत हो इस भाव से आप उन्नति नहीं कर पाओगे। क्या कमी है जो में सुधार सकता हूँ। भक्तों से पहले तो पूछना चाहिए की मेरे अंदर क्या कमी है जिसको मैं सुधार सकता हूँ। तो अगर कोई भक्त सोचे की मेरे अन्दर सारे गुणी है, कोई कमी नहीं है तो वो कभी आगे नहीं बढ़
सकते,
सारी कमियां दूसरों में है, मेरे में नहीं है, पर यह बहुत ही आपराधिक भाव है। अपराध
सेवकहै
तो हम तो अज्ञानता में पैदा हुए हैं। जब भक्तों का संग मिले तो हमें पूछना चाहिए की हम भक्ती में आगे कैसे बढ़े? और प्रोप जी ने अपने जीवन के द्वारा यही भाव प्रस्तुत किया है। इस लोक का संदेश कौन समझ गया, कौन बताएगा
तो प्लीज लोड वी हैव, भगवान को प्रशन करने के लिए तपस्या करनी है और वो भी यूनाइटेड हो के हमे सेवा करनी है तो भगवान उसे और ज्यादा प्रसन्न होएंगे, हमसे
हम
सब अलग अलग है। फिर यूनिटी कैसे आएगी पूछ रहे है।
जब हमारा लक्ष्य 1 होगा तो उससे हम यूनाइट हो सकते हैं। हमारा लक्ष्य
आराई की लक्ष्य होना चाहिए। विष्णु की प्रसन्नता क्वेश्चन किसी का प्रश्न
गुर महाराज बहुत बहुत धन्यवाद, बहुत ही तरीके से आपने अपने महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा की महाराज जैसे आपने बताया की हर भक्त का उद्देश्य होना चाहिए की हरी नाम में रूचि उत्पन्न करे। और साथ साथ हम ये भी सुनते है की भगवान को प्रचारक बहुत प्रिय है। तो ये जो भक्त हम सुनते हैं तो हम दिखाते हैं कि सफलता का मतलब है बाहरी रूप से ज्यादा से ज्यादा संख्या में भक्तों को इकट्ठा करना, ज्यादा से ज्यादा धन इकट्ठा करके लाना तो इसमें लोग बोलेंगे मैं सफल हूँ, उसके लिए अगर मुझे भक्तों से कुछ कम्प्रोमाइज भी करना पड़े, भक्तों का कुछ अपमान भी करना पड़े, भक्तों के साथ कॉरपोरेट न भी करो। तो मेरे लिए मुख्य लक्ष्य भारी रूप से सफलता क्यूँकी इसी को पहचाना जाता, इसी को रिकगनाइज किया जाता है। तो कैसे इस मानसिकता से ऊपर उठे मारा।
हमें उन भक्तों का भार प्रकट करना चाहिए जो ग्रंथ बाट रहे है, अच्छी सेवा कर रहे है लेकिन साथ में यह भी देखना चाहिए उनका आचरण कैसा है। तो आज चरण के लिए अच्छी साधना आवश्यक है। अगर ये एटीट्यूट रखोगे तो गमंडी नहीं होगे आप तो कई ऐसे भक्त हैं जिनकी साधना बहुत अच्छी है पर 4 पे भी बहुत अच्छे है वो विनम्बर रहते है
हरी कृष्णन, गुरूमा थैंक, यू सो मच, सोच, गुरु महाराज जैसे आपने बताया की युद्ध के मैदान में जाते हैं तो कुछ न कुछ परेशानी होंगी तो स्ट्रगल दोनो तरफ बताया महाराज बाहर कभी स्ट्रगल है और फिर अपने भी नर्थ होते है तो ऐसे में हम अपने आप को कैसे डिटरमाइंड रखे ताकि उस स्ट्रगल ऐसी भी निकाल सके और भक्ति में आगे बढ़ सके।
रिपीट केन
हरि कृष्णा, गुरु महाराज, गुरु महाराज जैसे आपने बताया की जब हम युद्ध के मैदान में होते हैं तो कुछ न कुछ परेशानी आएगी तो कुछ तो गुरु महाराज अपना इंटर स्ट्रगल रहता है, अनर्थ रहते हैं और कुछ हमारी सेवा बाहर भी होती है तो ऐसे में उस स्ट्रगल से हम कैसे निकाले कैसे हम अपने को डिटरमाइंड रखे हैं भर्ती में
तो आध्यात्मिक जीवन में डिटरमिनेशन रखना चाहिए, भौतिक जगत में कोई सफलता चाहिए, कार्य में तो डिटरमिनेशन चाहिए ह दिन रात क्वाईाईटी में एडमिशन चाहिए तो आप दिन रात पढ़ते हो, आए तो आई ए एस में अगर दाखला चाहिए तो दिन रात तैयारी करते हो। तो जब भगवान की भक्ति में जुड़ते हैं तो हमें निष्काम भाव से जुड़ना
चाहिए
और कोई प्रश्न
महाराज। कई बार जब हम रोगतगीताबढ़ने जाते हैं तो कुछ लोग कहते हैं कि भगत विता पढ़ने का हमारे पास समय नहीं है और अगर हम भगुतगीतापढ़नहीं पाएंगे तो इससे अपराध होगा। तो इसलिए हम बगतगितानहीं ले सकते। ऐसे महाराज को क्या कहना चाहिए
की है जी
से कुछ कर रही है, आज का है कम करेगा। तो लेगा
इसको बचने का कोई
प्रचार
खाली सेवा
जाना प्रसन्न होते है। तो जो बाकी सेवाएं कल की विप्र
सेवा
सेवा
को सेवा दे ह भगवान
प्रसन्न होते पर दू सेवा का ना
जी
जिस बंदी नहीं दे,
जो वो
जो
करता था स तो इसको पेश
करने के
नाचराहू तो ये रोज सेवा के 2 बहुत तो खुशी में भी जो कहते है की ी
खाली कृष्ण धन्यवाद गुरबाज बहुत सुन्दर प्रभु महाराज जी जैसे की हम जैसे मंदिर में रहते हैं, मंदिर के माहौल में रहते हैं और देखते हैं कि कई भक्त जो है वो आपस में मतभेद रहते हैं और सही तरह से व्यवहार नहीं करते। हम भी कई बार उसी प्रभाव में हमारा व्यवहार अच्छा नहीं होता, बड़ा दुःख होता है और फिर 1 मंदिर हृदय में अच्छा नहीं लगता और फिर लगता है की हम फिर ऐसी जगह पर रहते हैं, फिर वहाँ पर भी इस तरह से हो रहा है तो कैसे इससे मतलब बचे हैं। कैसे हम अपने आप को अच्छा करे और वो जो वरिष्ठ लोग हैं वो ठीक भी नहीं कर रहे चीजों को तो और दुःख होता है तो फिर
कैसे कर सकते है
कई बार और
कई बार वरिष्ठ
gs
करोगे
लेकिन अगर
आप अधिकार, करोगे की
अधिकारी को,
मंदिर
के अधिकारी को,
हर किस्म बहुत बहुत धन्यवाद महाराज आपने इतना सुन्दर लेक्चर जैसे महाराज आप बता रहे थे की लेक्चर में भी की भक्तों का अलग अलग वो होना चाहिए, भाव होना चाहिए सेवा करने का और अलग अलग तरीके हो सकते हैं सेवा करने के लेकिन भाव यही होना चाहिए की वो अपनी सेवा से भगवान को प्रसन्न करे लेकिन जब अलग अलग तरीके से सेवा करते हैं तो अलग अलग तरीकों से सेवा करते हैं तो ऐसा लगता है की अब तो के बीच में कॉरपोरेशन नहीं है और तो फिर इसे कैसे समझे महाराज
जैसे आपने कहा की अलग अलग
सर
कही तरीके से सेवा करता है, कई तरीकों से करते हैं तो उनमें मतभेद होता है और परेशन ऑपरेशन नहीं है। मंडल को
आज
तो गए
कितने
ये
रही
धन्यवाद महाराज महाराज सें कई बार ये सोचते है की ज्यादा विनामनबनगयासहनशील हो गया तो मैं बेवकूफ बन जाऊंगा,
लोग
मेरा फायदा उठाएंगे ये तो केवल किताबी बातें हैं, प्रैक्टिकल होना चाहिए, सिचुएशन का फायदा उठाना चाहिए, अपनी सफलता दिखानी है तो चक्कर में हम रहते हैं और इन चीजों को लगते है ही ये प्रैक्टिकल है तो और हम देखते भी हैं की जो इसका पालन नहीं कर रहे वो बड़े फ्लरिश कर रहे हैं और जो उसका पालन कर रहे हैं उसको लगा में सफ़र कर रहा हूँ तो कैसे इसको दुंद को समझू
वो
है?
अरे कुशा को 1 बार जोर दे।
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