जड़भरत की शिक्षाएं | SB 5.10.11 | 15 Mar 2018 | ISKCON Vrindavan | Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Goswāmī

Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Goswāmī teaches from Srimad-Bhāgavatam 5.10.11 on Jada Bharat's story, emphasizing that the eternal soul differs from the temporary body and that karma determines future births. He urges surrender to Krishna, pure devotion, and association with authentic spiritual teachers aligned with Vedic teachings.
Chapters
हर कृष्ण सब भक्तों का हार्दिक स्वागत। मेरा गला ठीक नहीं है, तो इसे क्लास नहीं दे रहा था और भक्तों ने कहा छोटी क्लास दे? 2 इसे मैं दे रहा हूँ गला इतना ठीक नहीं very body हम नमभवदेवासुदेवा देव सु देवा हम भव दे वासु देवा देवास देवा होमनमोभगदेवासुदेवा देवा सुदेवा श्रीमल भागोतम 5 वर्ष 10 नंबर 11
झीवगरतवंलियमेनरदनी
भी रात
आध्यंकवध्यककसत तम भाव धुबई पा च सौ
योग
मंडराये नराधम नदी दिम महा भाव तय युगेश वन
जीवन रहा मेरा आज
आजगजारास वे
माताजी
धेयहामादरजेज जन
जीवन त्याग राम न
बिराजो
शबदर्थ
जीवन की होली कर। नियमन के नियमों द्वारा राजन के राजा आदि अंतत पते पदार्थ का आदि वनंत होता है। यह, क्योंकि तस्या भिकारी वस्तु का यहाँ शरीर का रस देखी जाती है। स्वाममयभावसेवऔसोमी का भाव परिवर्तनीय स्थिर इंडिया के गुजर या जहाँ कभी कभी कुछ, यदि कहा जाता है, बसों व होगा। आगे हम तोरे का सहयोग न राा। हे राजन। आपने बिना ही उन पर जी होने वाली तूर्य होने का आरोप लगाया है। इस सम्बन्ध में मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि ऐसा सहमत हे अपना है। आपका यह सोचना कि मैं राजा स्वामी हूँ, अस्पताल जाना भी नहीं है। क्यूंकि यह बात अस्थायी है? आज आप राजा हैं, मैं आपका दास केदुरकलस्थीटी बदल सकती है और आप मेरे पास सोते हैं। मैं आपका स्वामी हो सकता हूँ, ये लिये द्वारा ओपन अस्थाई करे। इस संसार में बेहाकी बुद्धि कार्य दशकों का मूल कारण है। विशेष रूप से कलयुग में लोग उतने और शिक्षित है। क्यूंकि हम भी यह भी नहीं आता कि शरीर पत्ते बदल रहा है और अंतिम परिवर्तन ही किया जाता है। जो इस जनम में राजा है, वही करम और स्थानीय जीवन में उत्ता पहुंच सकता है। आत्मा प्रवृति की शक्ति छोडकर, गहरी इतना में मग्न रहता है। वो इस प्रकार की अवस्था से दूसरी कार की अवस्था में रख दिया जाता है। बिना आर्म साक्षर का ज्ञान के वरद जीवन चलता रहता है और मनुष्य को झूठे ही राजा, दास, खुदका या बिजली के जाने का दावा करता है। ये परम व्यवस्था द्वारा लाने वाले विभिन्न धुप, मनुष्य, स्थायी, बिहार, बुद्धी की कल्पनाओं से भ्रमित नहीं होना चाहिए। वस्तुत इस संसार में कोई भी सामी नहीं है। क्यूंकि प्रत्येक प्राणी प्रकृति के नियंत्रण में और से प्रवृत्ति पूर्ण पुशत भगवान का है। भगवान श्री कृष्ण ही परम स्वामी है, जैसे कि चेतन के कान में कहा गया है 1 ईश्वर कृष्ण सब 1 मानक स्वामी श्रीकृष्ण औरनेसरमकेदाही अपने सम्बन्ध को भूलने का ही संसार के कार्य हे राजन। आपने इतना ही जीवित होने पर पुन्य होने का आरोप लगाया है। समुन्द्र में मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि ऐसा सरोकरहेकप्रत्येक बोधि वस्तु का अपना आदि और अंत होता है। आपका यह सोचना कि मैं राजा और स्वामी हूँ और इस प्रकार आप द्वारा मुझे आदि दिया जाना भी ठीक नहीं है, क्योंकि वह सही है। आज आप राजा है और मैं आपको ग्लास की दनवस्ितीबदलस आप मेरे है। मैं आपका स्वामी si
home a imrnsahashlkanas scatana ndhmshigriud sirupmsrajतम सहागनरगुनकनुदतम स जेवन सदबेतमसबधूसमिजनa sitmकृsणaकsrir कृष्ण कन सम हे कृष्ण करुणा सिंधु दीन बंधु, जग पते goes राधा गगन वान सुन wncकपशाकिपासभैजा mntanpvleaashrekisn chetna हरेश
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nam e a e a a e a so some baarueaa 1 योगा तो ये इस शो का उच्चारण जद भारत के पांचवे स्कल में, जदबार की कथा पढ़ते हो भगवान रिशवदेव सौ फुस से, इनमें सबसे बड़े बेटे का नाम क्या था भारत और उन्होंने इतना सुन्दर शासन किया था समाज में, समाज में किसी प्रकार का कश्मीर और उनके सबसे बड़े बेटे का नाम था भारत भारत भारत ने शासन करने के पश्चात निर्णय किया। अब मुझे जंगल में जाना चाहिए भगवान का चिंतन करने के। वहाँ 1 दिन उन्होंने देखा 1 हिरणी का पीछा 1 शेर कर रहा था, और हिरनी अपने जान को बचाते बचाते हुए, जो बच्चा था, गर्भ से बाहर आ गया और माता देहाद राजा ने सोचा भगवान की इच्छा है कि मैं इस परशु की देखभाल करूँ। और उस परशु के प्रति उनका बहुत ही गहरा आकर्षण था कि 1 पल के लिए भी अगर परशु दूर था, तो घबरा जाते थे। 1 दिन उस परीक्षा को धन से क्या हो गया भागवत गीता में। भगवान कहते हैं यहाँ जहाँ आपका मन होगा, मिलने के समय इस प्रकार का प्राप्त होगा। और इस विषय का, इस विष की चर्चा बड़े गहराई से की गयी है भागवत गीता में। और इसलिए शास्त्रो का निर्णय क्या है अंतिम नारायण स मिली इस प्रकार की योजना करो की अंतिम समय में भगवान का चिंतन कर सको, तुम्हारे भारत को पशु के रूप में जन्मे स्वीकार करना पड़ा है। और ज्यादा देर में नहीं रहे। और फिर उन्होंने ब्राहमण कुल में जन्म लिया, उनका नाम क्या था? वो समझ गए थे कि पिछले जन्म में क्या गलती की है उन्होंने और इसलिए उन्होंने यह निर्णय कर लिया। मैंने ये गलती फिर से नहीं की english me canyons viden और उन्होंने ऐसा व्यवहार किया समाज में जैसे कि गुंगे होम, भरे हों। उनके पिता थे ब्राहमण पिता की 2 पत्नियां थी और पिता ने बहुत प्रयास किया गरामिगतसंस्कृति की शिक्षा बेटे को देने के लिए, और बेटा तो आत्मज्ञान था शुरू से, और उन्होंने कोई इच्छा प्रकट नहीं की जिसके कारण पिता ने सोचा प्रयास करना बेकार है, पर उनका भाव कुछ और था जज भारत का भाव यह था कि अब मैंने किसी प्रकार के किसी के प्रति आकर्षित नहीं होना। और चला उनका निरंतर चिंतन था भगवान का। 1 समय उनके पिता का देहांत हो गया, माता का देहांत हो गया, तो सौतेली माँ और सौतेली भाई बहियों ने खास देखभाल नहीं की जल भारत के और 1 समय में सेवा दी थी खेती की देखभाल करने गए। और 1 खाली देवी के उपासक डाकू जो देव काली देवी के कई उपासक हैं जो जीवित व्यक्ति को भी अर्पण करते हैं। उनकी इच्छा थी कि हमारे डाकू गुरु को पेटा प्राप्त हो। वो 1 पागल प्रकार के व्यक्ति को पकड़ लाये थे और बलि द्वारा कली के चरणों में अर्पण करने लगे थे। और वो पागल आदमी भाग गया। अपनी जान को बचाने के लिए। हर व्यक्ति प्रयास और डाकू के भक्त दौड़े। उन्होंने देखा जल्द भारत खेती की देखभाल कर रहा है। उन्होंने सोचा कि यही है वो विकी जो भागा था तो उसको पकड़ कर ले आये है। कली के चरणों में अर्पण ने जद भारत न सर भगवान के जंतर में जुड़े हुए थे। और जब डाकू ने बली उठाई जद भारत को काटने के लिए दुर्गा जी की मूर्ति प्रकट हो गए भारत। उन्होंने मुरबली से इन दागों को काट दिया तो जज भारत लम्बे थे ऊँचे कद के लंबे हाथ और 1 दिन महाराज रोगन राजा थे और भगवान के उत्तम पोती के भक्त व जाते थे कपिल श्रम में कथा सुनने के लिए और उन्हें पलकी में उठाया जा रहा था। प्राचीन समय में जो राजा होते थे यह राजसी खानदान के, केवल उन्हें ही पल्की में उठाया जाता था, सबको नहीं। राजा को पलकी में उठाकर ले जा रहे थे कथा सुनने के लिए। और राजा ने कहा तेजी से चलो मुझे देर हो रही है। राजा धार्मिक था और राजा होने के कारण रजजगुनकाप्रभाभी था उनकी चली तो उनके सेवकों ने जद भारत को देखा लम्बा व्यक्ति उससे कहा कि हे राजा को उठाने में मदद करो। जत भारत का समाज में व्यवहार था से गूंगा और बहरा है। और जद भारत मान गए। और राजा ने अनुभव किया कि पलकी डैमन डोल हो और से जाने के बजाय और धीमे धीमे चल रही है। राजा ने कहा ये क्या हो रहा है मैंने तेज चलने के लिए तुम रस्ते चल रहे हो। तो जिसे सेवक थे वो घबरा गए। उन्होंने कहा राजा हमें मत डाँटो, हमारा कोई दोष नहीं है, ये जो नया व्यक्ति हमने जोड़ा है, ये बहुत धीमे धीमे चलता है, पता नही क्या देखता है। जमीन में जल भार का क्या था भाव व हर कदम को पृथ्वी पर रखने से पहले ये देखता था कि आगे 3 फुट तक कोई जीव आत्मा तो नहीं है क्योंकि जो वैशमभक्तहै जो असली ब्राहमण है वो किसी किसी को कष्ट नही देना चाहता आप चेतन चेत में पढ़ते हो। 1 शिकारी था गारी भयंकर शिकारी जिसे बड़ा आनंद आता था पक्षोंको घायल करके, जब उनकी मृत्यु होती थी तो उन्हें बेचता था बाजार में नारद मुनि ने देखा इतनी घायल परशु तडफ रहे हैं। तुनकी संगत से ये ज्ञान उन्हें प्राप्त हुआ। इन सब परशु जिले कष्ट पचारे हैं, इनका परिणाम उन्हें भुगतना पड़े और उसके पश्चात उस शिकारी में ऐसा परिवर्तन आया कि वो पैरों को भी नहीं लगता था। देखे बिना कोई जीवात्मा नहीं है। तो दूसरे शब्दों में जो ग्रामीण है और वेस्टा हैं किसी को कर नहीं देना चाहते। और अगर उन्हें कुछ कश भुगतना भी पड़ता है तो सोचते है ये कशों के कारण भी मैं हूँ। ये जो ब्राहमण है वो किसी को कष्ट ही देना चाहता। ये असली हम सा आज कल समाज में बुद्धि सिद्धांत का काफी प्रचार है। बुद्ध जी ने ये कहा है हमसा किसी जीवात्मा को कष्ट। 2 आज धुन जो बुद्दि है वो हर प्रकार के जानवर को दिखाते। उजत भारत बड़ी सावधानी से चल रहे थे, जिसके कारण बल्कि धीमे धीमे चल। राजा ने फिर डाटा। राजा ने कहा कि क्या कर रहे हो? जानते? नहीं, मैं कौन हूँ, मैं हूँ। राजा, आदेश का पालन नहीं कर रहे। तुम्हे बड़े भयंकर, ऐसी जा दूंगा। यमराज तो शुरू में तो जद भारत में सुन लिया, सब कुछ और सुनने के पश्चात, जद भारत ने उपदेश देना आरंभ किया, जद भारत रूके थे, भरे थे, पर जब उनका व्यवहार था उनके व्यक्ति का पैर व्यक्ति, जब प्रचार का समय आया तो बचा कर लेते, कैसे? शेर जैसे 1 समय किसी 1 भक्त ने प्रापत से पूछा आप चाहते हो, हम प्रचार करें। पर अगर हम विनम्र तक भाव से प्रचार करेंगे तो कोई सुनेगा नहीं, तो हमारा क्या भाव होना चाहिए? पापा ने कहा कि जब तुम भक्तों से व्यवहार करते हो तो में लैम जैसे व्यवहार कर ो। और जो प्रचार करते हो तो शेर जैसे को यह नहीं कि घर में शेर बना और भार जैसे। प्रचार ने कहा, lamedहomलाइनआउसाइड तो ये है जल्द भारत का व्यवहार, जल्द भारत उनका व्यवहार था, लैम मेन कुछ लोग उनको डांटते थे, हंसी उड़ाते थे, कहते भला व्यक्ति है, उनकी बस्ती करते थे और वो से लेते थे। पर जब उन्होंने देखा क्या प्रचार का अच्छा मौका है, जब उन्होंने देखा की आप रहूगणक अपराध बढ़ते जा रहा है, तो फिर उन्होंने बोलना शुरू किया। तो जल भारत क्या कह रहे हैं हम कि आप ने मुझे दोष दिया है। हालाकि मैं जीवित हूँ, मैं मरे व्यक्ति जैसा व्यवहार कर रहा हूँ। और तुम इतनी अज्ञानता में हो, ये नहीं जानते कि हर चीज आरम्भ होती है और फिर समाप्त हो जाती है। तुम सोचते हो, तुम हो राजा और मैं हूँ तुम्हारा सेवक, पर कल मैं राजा बन सकता हूँ और तुम मेरे सेवक बन सकते हो। तो प्रॉपर जी 7 प्रे में क्या कह रहे हैं? 7 प्रे में बहुत ही महत्वपूर्ण शिक्षा दी जा रही है। बाबाजी कह रहे हैं बुद्धी ये शरीर से सम्बंध लगने के कारण, ये कारण हमारे सब कष्टों का, हम सोचते हैं। ये शरीर हमारा असली रूप है और हम सोचते हैं। शरीर को सुख देना, ये हमारा लक्षण है, हमारा उद्देश्य है और हम सुबह से रात तक प्रयास करते हैं किस कार्य के लिए शरीर को सुख पचाने। भागवत गीता के दुसरे तिहाई में भगवान आत्मा और धेकेविषयमें शिक्षा दे ते है। महान संत ठाकर भागते ने कहा है कि जो भागु गीता का दूसरा दिखाय है, इसका संदेश सबसे महत्वपूर्ण है। abc s body तो जद भारत कहते हैं क्या आज लोग इतनी अज्ञानता में है और ये नहीं जानते कि दे के अंदर आत्मा है। आज लोग क्या सोचते हैं जो करना कर लो, सब कुछ के साथ समाप्त हो जाती। तो ये है अज्ञानता, यह है ज्ञान का मैं। ज्ञान, शिन्या, ना हम सब जन्म लेते हैं। अज्ञानता में यहाँ की, हमारा ये भाव रहता है। यह शरीरी हमारा असली रूप है। पर साधु संत, इस संगत में आकर हमें शिक्षा मिलती है। क्या के शरीर केवल आप 2 दिन का साथी है। शासन में उधार दिया जाता है। लहरों के कारण ग्रास, पत्ते इकट्ठा होते है फिर जुदा हो जाते हैं। उसी प्रकार हम सब थोड़े समय के
लिए
माता, पिता, भाई, बहन इत्यादि रिश्तों में जुड़ते हैं, फिर जुदा हो जाते हैं। तार में प्राबाजी 1 ही विषय की चर्चा कर रहे है। कर्मों के आधार पर यह देह प्राप्त होता है। ये दे जो है वो क्या है? सताए है। तो यह समझना बहुत ही आवश्यक है। भगवान ने ता के अनेक सोबों द्वारा यह उपदेश दिया है। क्या जाए तो आत्मा जो है उतना जन्म होता है और आत्मा जो है आत्मा के काली चेतना है। आज के आधुनिक युग में आज जब इस की चर्चा करो की आत्मा सनातन
है,
कई भौतिकवादी व्यक्ति क्या कहते है? क्या praman परमान whats a pro? क्या प्रमाण है कि आत्मा सनातन है? आत्मा हैं दे में, चेतना अब तक आतमा हैं, जब तक चेतना है, जब आत्मा शरीर गोल त्यागती है तो चेतना भी नहीं रहे। तो ये जज भारत महाज रोगुन के माध्यम से हम बस जीवों को
यह
महत्वपूर्ण संदेश दे रहे हैं। क्या 1 संदेश से यह दिया जा रहा है कि हर चीज अस्थाई है। आज अगर आप कि आप राजा हो, यह मत भूलो कि आप सेवक भी बन सकते हो। जैसे की आज के वातारण में आप धनी व्यक्तियों से अगर चर्चा करो हो। कुछ स्थायी है और कर्म के अनुसार अगला दिन किया जाता है। कई लोग इसको का बहुत भोजन का सिद्धांत क्या है। मृत्यु के साथ सब कुछ समाप्त हो जाता है। ये हैं अज्ञान था। इसलिए साधु संगत की आवश्यकता है। तो यहाँ जब भारत ये उपदेश दे रहे हैं की अगर आपको राजा का पद भी प्राप्त हो। ये केवल थोड़े समय के और हमें असली आकर्षण बनाना चाहिए। इसके प्रति वह भगवान भी पद रात। पड़े में पापाजी ने चेतन संविदा के बड़े प्रसिद्ध श्लोक का उपयोग किया है। कौन सा 1 ही है। परम भगवान सब है उनके शो में। और अज्ञानता का कारण क्या है? इस अज्ञानता का कारण है ये सोचना कि ये हमारा स्वरूप है और इसका उपयोग करना चाहिए। इन से गीता में भगवान क्या कहते है? भोक्ता राम सर्वलोक महेश। तो ये स्वीकार करो। असली भोक्ता कौन है भगवान? यह शिक्षा हमें कैसे प्राप्त होती है साधु संघ के माध्यम से। इसलिए सासों का निर्णय है साधु संग, साधु संग, सर्वर लावा मात्र साधु संग स्वर। इस लोक में कहा जा रहा है साधु संग में हो क्यूँकि भौतिक वाटर में रह कर बड़ी सरलता के साथ आप भूल जाते हो कि आपका असली स्वरुप क्या है? आपका असली कर्तव्य क्या है? चेतन में आप ने क्या कहा कि मेरे रूप कृष्ण ने किया। हम सब का ये वो देश रहना चाहिए, सब है क्या। भगवान के नतिजा। तो साधु संघ में रहोगे। तो ये शिक्षा प्राप्त होगी। और साधु संघ के 2 माध्यम हैं। 1 है भक्त, साधु, दूसरा है, दूसरा क्या है ग्रंथ साल। कई बार लोग पूछते हैं लोग क्यूँ इतना बल तेते हो ग्रंथों के विजन पर, क्योंकि इन ग्रंथों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त होता है। पापा जी कहते थे अगर इस विश्व में किसी चीज की कमी है तो इस ज्ञान है। यह ज्ञान क्या कि आप कौन हो? भगवान के सेवक? तो भागती की विधिया, पाकि, पालन के द्वारा हम सदा समझ, सकेंगे क्या, हमारा कर्तव्य। क्या है भगवान की। ये हैं शास्रों का निर्णय। तो इसलिए ग्रंथों का ध्, महामंत्र का उच्छलन, भक्ति के नियमों का पालन बहुत ही आवश्यक है। स्वामी कहते हैं अदोश्रदातातासालू आर में, हमारे हृदय में यह भाव होना चाहिए कि
हम
भगवान के शरणागत होना चाहते। और अगर हमारे भाव हो तो परम भगवान जो अंतरयामी हैं, आपको क्या देंगे, किसी साधु की संगत में ले जायेंगे। जैसे आज हो। हजारों भक्त सारे विश्व में जुड़े है। कृष्ण भक्ति में इन ग्रंथों के माध्यम से किसी ने उन्हें ग्रंथ दिया। उन्होंने ग्रंथ पढ़ा, अध्यात्मिक रुचि बडी भक्तों के संग में आए और भक्ति के विधियों का पालन करना आरम्भ होगा। तो साधु संघ में रहने का ये लाभ है। क्या आपको शुद्ध ज्ञान प्राप्त होगा और अगर हम इस ज्ञान का पालन करें। फिर हम समझ सकेंगे कि हम शरीर नहीं है, इसका पालन करना इतना आसान नहीं है। ये समझ है कि हम शरीर नहीं
है,
ये आसान है, इतना सा नहीं। इसलिए नासर नियमित रूप से हमें इस शिक्षा का अध्ययन करना चाहिए। और भगवत हमें क्या कहा गया है नासा प्रेशर, भगवत, सेवा, भागवत, तुम भाग, फिर भाग लेना चाहिए। इसलिए कहा गया है भागवतम का अध्ययन बहुत आवश्यक है। और अगर हम रोज पढ़ेंगे सुनेंगे। फिर ये ज्ञान बैठेगा हमारे हृदय में क्या, ये शरीर अस्थायी है और हर चीज स्थायी है। और समय के साथ नश जाएगा। समय के साथ हम सब जुदा हो जायेंगे और हम सब का असली कर्तव्य। क्या है यह स्वीकार करना। 1 श्र कृष्ण भगवान हैं। परम भगवान तो ये समझना कि हम उनके नीति दास हैं, हम उनके नीति सेवक हैं। ये समझना और इस शिक्षक को पालन करे। फिर हम असली सुख अनुभव कर सकेंगे। इसे भागवत गीता में कहा गया है। ब्रह्मा बुल प्रसनात्मनसोचती। जो व्यक्ति इस जीवन नियमों का पालन करे, वो सदा आनंद में रहेगा। और क्षेत्र महाप्रभु ने शिक्षा के उदेश्य में क्या कहा? अनंद बुरी बला। 1 और लाभ भगवान के नामक विचारण का क्या है आपको असली आनंद प्राप्त होगा। लाल बाज कहते हैं न दे। ते में विश्णु लोग आज यह नहीं जानते कि असली सुख कैसे प्राप्त होगा जब भारत का उपदेश बहुत ही महत्वपूर्ण है और राज रहूण के माध्यम से ये देश हम जीवों को दिया जा रहा है। हमें इसका पालन करना चाहिए। आप कहोगे, हम तो रोज ही यह क्लास में सुनते हैं। चाहे कोई स्वामी जी क्लास दे या कोई नया भग दे। रोज सुनते लोग में क्या कहा जा रहा है? संक्षेप में यह कहा जा रहा है आत्मा सनातन है और हर चीज स्थाई रोज सुनते आ रहे। तो आप पूछोगे रोज सुनने की क्या आवश्यक है। 1 बार सुनने से काम नहीं चलेगा। तो प्रापा जी गीता में कहते हैं रिपिटेशन, इस नsसरytodrाivethe point home किसी विषय को ध्यान से समझने के लिए बार बार सुनने की आवश्यक है। जैसे भौतिक समाज में देखते हो, किसी प्रोडकट samsng telefon हर जगह देखते है, उनका एडवजलसबकोमालूम है, ये है सैमसंग टेली हो याद दिला रहे हैं तो हम याद अपने आप को कैसे दिलाते हैं, शा से, पढ़ने से और सुनने से। तो आगे जाकर जब जल भारत का उपदेश सुना वो समझ गए, ये व्यक्ति भरा नहीं है, गुमला नहीं है, क्या है, आत्मज्ञानी लगी है। और वो अपने पालकी से नीचे उतरे और उन्होंने जब भारत को प्रणाम किया और कहा मुझे किसी विषय का भाई नहीं है और 1 ही विषय का भय है, क्या है वो विषय वैश्ना अपराध भक्ति के मांग में हमें वैष्ण अपराधों से बचना चाहिए। और फिर महाराज होंगे ना जल भारत के शेष। तो इस संदेश से हम ये भी समझ सकते हैं इस साधारण सिटी में हमारा व्यवहार गुगीऔरबैरेजैसे हो सकता है। यह प्रचार का मौका आये तो आप को जल्द भारत के समान शेर जैसे प्रचार कर। यह नहीं कि प्रचार के समय आये तो हम डरपोक बन जाए। तो ध्यान से बगुद सुनिए। पढ़िए प्राय की इच्छा थी की इस संसा के भक्त इन ग्रंथों को ध्यान से पढे विज्ञान प्राप्त होगा। विज्ञान के उपयोग से यह उनके लक्ष्य को प्राप्त कर सके। hi krishna pressin, br pression, he kasia p्रeशoनह यह चले पूछे
बादी हर रोज पर
से कुछ पूर्व के जीवन का रण की। उनके भाइयों की तेरी सौतेली माँ उनको खाने के लिए बहुत खराब तरह का खाना किया गया, तो वह उस पर गलत विजन की है। हमारे देश में क्या संदेश है? असल में यह बड़ा अच्छा प्रश्न। जद भारत जल बाल के पिता और माता का ध्यान हुआ। उसके पश्चात, उनके सौतेले भाइयो ने, माता ने उन्हें पशु जैसे रखा, उन्हें पशु बुद्धि, बुद्धू आदमी और इस उन्हें अनेक कठिन स्थितियों में लाला ज भारत से ले गए, टॉलरेट करते गए। उन्होंने ये नहीं कहा मुझे पशु जैसे रख रहे हैं तो गूंगे और बैठे रहने का कोई फायदा नहीं। वो सहते गए और ये निश्चित कर लिया था कि मैंने ये अब फिर से वो गलती नहीं करनी जो पहले में कर बैठा हूँ। उसी प्रकार इन घटनाओं को पढ़कर सुनकर। हमारे में भी दिल भाव उत्पन होना चाहिए और बढ़ना चाहिए। हम जब भी में जुड़ते हैं, यह नहीं कि कोई कठिनाई का सामना नहीं कर। करना पड़ेगा। यह नहीं कि आपको कभी कभी नमक के साथ रोटी खानी पड़ेगी। जेनी की कठिन सिती होगी, तो हम बाकी छोड़ देंगे। ओके ओके, येस the relationship is price not mater just like in his said, the segedesbyitinstructions ropa dedicates, the first cantidersgurany said in this forever by s instructions and their follow live with him, so the spercialmaster is also become un un manifested one day। but what were not become nunmenifesis i is instructions so the relationship just like reseter reas, they was the one time, i gave these pipes and or is gone when we still reconizereasathere so his books to his instructions so the relationship between the disciple and a spirtual master or the the siple than ultimately the supreme blood is all based on sprituality or instructions jesa man have a lot of people say i worship krishna? but they don t know what krishna s real srendedocrishna means sending to his instructions you can live in brindavan and do the opposite at krishna wants you to do and so you amsenbthat⁇snot so what is important is falling the instructions and these instructions are no different from the lord, not different from this portal mass in the first cantare best father was getting ready to leave is body it was a better bars and he ate get fortune krishna was present right there so we would love to ben a situation that when we living a bodies krishna we there right there but in the aldeesnotogoing to happen, but proper case in the purport if your fortune in up we hearing the holy name or hearing the bagwat gita than that is a same as krishna sending next so the instructions paramount everyone to make special adwance okay have to go olwepresoneskay और शिक्षा गुरु 1 होना चाहिए
सकते
है कई हो सकते है
और बुर को के अकॉर्डिंग खोलना चाहिए और
आम का प्रेशर क्या है
बोल रहे है और कोन
and everyone understand in presion no i understand इनका प्रशन ये है शास्त्र में कहा गया है 1 ही शिक्षक गुरु होता है पर अनेक दिक्षा गुरु हो सकते है गुरु शिक्षक गुरु अनेक हो सकते हैं और अगर शिक्षक गुरु ऐसा उपदेश्य दे शिक्षा गुरु के उपदेश्य से अलग है पहले देखो की शिक्षा गुरु जो कह रहा है बिल्कुल प्रापत के शिक्षा के अनुसार है। अगर वो बिल्कुल शांत प्रापत की शिक्षाओं के अनुसार आपको उपदेश देते हैं तो फिर जो शिक्षा दे रहा है उसको भी उसके आधार पर ही होना चाहिए। जैसे स्कॉल में अनेक सन्यासी, संत, महात्मा क्लास देते हैं, उनकी क्लास, मत, सुनो, क्यूंकि सब आपको 1 ही उपदेश दे रहे हैं सांसों पर आधारित प्रापर अगर शिक्षा गुरु वो ही दे रहा है फिर कोई चिंता की बात नहीं ओके थैंक यू भारी कृष्णा
o।
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