वैष्णव अपराध भक्ति नष्ट करने का सरल उपाय |SB 5.10.15 |12.04.2020 |Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja

The lecture presents a detailed exposition on the concept of "Vaishnava crime" (वैष्णव अपराध), describing it as any conduct that corrupts or weakens pure devotion, such as material attachment, hypocrisy, or neglect of spiritual duties. Drawing on Srimad‑Bhagavatam 5.10.15 and numerous other scriptural citations, the speaker explains why this crime endangers the bhakti garden and how it can be eradicated through a simple, disciplined practice: regular japa, sincere service (seva), study of sacred texts, and adherence to the authentic guru‑paramparā. Historical anecdotes of kings, sages, and devotees illustrate both the pitfalls of Vaishnava crime and the transformative power of repentance. The discourse stresses that spiritual knowledge must inform societal leadership, urging modern leaders to integrate dharma into governance. Practical guidance is offered for contemporary practitioners – daily reading of the Bhagavata, chanting the holy names, avoiding gossip and material allure, and cultivating humility. The talk culminates in a call to seek forgiveness, embrace pure devotion, and ultimately attain liberation (moksha) through bhakti yoga.
Chapters
मे भgteवaसुवाममभगते wah ा m m me baute you told people no qesonsmabgmपांचा या श्लोक नंबर पंद्रह ये लंबा श्लोक है होसfoरम में हम सीधा ये
श्रेष्ठ महाराज सिलदुसौलबदलीजि नमक राज्यों का राजा ततजियायारसेसमबनध जाने ने की रक्षा के बारे में सम्यक या इंद्रियों प्रधान मंतर पूर्ण नियम वाली श्रद्धा जी अभी अभी सच योग्यता पा।
तब उस जल
के भीतर झूठ भी जाऊंगी। वो जनम घोलने वाले विज बचा ब्राहमण जड़ भरत के सब ज ा सुनकर बहू ंतसंमतनसमस्तयोग मारा संत समर्थ दरिया सी गिरना पुरवा आलीजीसेशिरशापेस से आज चरण नमनरउुपसेतलात
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बयन अपने अपने हद के प्रात के इस ेगाझूठनमानतथा
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की दर्जा इस प्रकार शुरू होने को उसने जल भटक से ते इस नाम को, जिसकी संगति सभी योग साधना के करते हैं, और जिससे परीना इस प्रकार स या तुरंत मालिक से से उतरा और जरा अपना से पृथ्वी का धनबल, जिससे मैं इस ब्राह्मण स्रष्ट को हे मान को
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जिस प्रकार भगवत वतचारवानसीैएवम परम्परा
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नेहा को, वो इस प्रकार परम गुरु परंपरा द्वारा करा दिया गया।
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इसी किंतु परंपरा को इसलिए लुक होलिया परा से ही विशोक पूर्व काल में गजबजी जीवन दर्शन समझते और नागरिक उसी ओर की शिक्षा मे अर्थात जन धामती के मन से छुटकारा जब राज अयोध्या ने राज लिए, ये बार जीविषा असुर के उनसे रामचंद्र राव नक्सल को जनम लेजानेके आए। भारत दुसरे के दरबार में आए उनका संपर्क करने के लिए उन्होंने उनसे पूछा ये जन दिया अर्थात जनता को जीतने के उनके देर से चल रही है। वैदिक सत्ता की संपूर्ण प्रक्रिया इसी का है। वे ही जन जीवन दाता है। महाराज मन को भी जीवन का ना अदालत उनके समक्ष जीवन दर्शन प्रस्तुत किया तो उन्होंने इसी प्रकार को सुझा की वैदिक समाज की आधार शिला है। विद्वान ब्राह्मण, संत खारिश वैदिक प्रिणनसीपरचिती अतानीकााओको आम बन के कल्याण के लिए। इस प्रकार उनके सहयोग ऐसे को लाभ था। इसलिए दोस्तो में सफलता का ही भार सा कुण रुपए की कामना में घर को असोका था वे आ के
घर
के काम कर र छहाँमह और जीवन के मान के विष जिसे गणित किया जाते है अधिक जानने का इस समय के उचित राज्य अधिकारी जीवन मोलेवलेविषसरांजान है आधारित जादू लोग वैदिक ज्ञान का किसा करना चाहते हैं तो साथ ही और आध्यात्मिक ज्ञान के जार मे अमरूद आने लगे है। इस बार यह है कि प्राचीन राज सूर्य की था 5 शासन मरते है
इसका कोई शक है आज का शासन बना ा om gan timnganandnashlka inasinataniamano sam, sarita men but smrupakdamधaसा bndehamshiguis, pm s, sाitमकृषणतवम, i raधakishnabzashagna lalita he krishna karuna sinधुzinbndujg, राधा कंसान, sasakaचnagoraraz van wancakpsasaकृपा, सिंधु चा परिसान, jai shri krishna jatana, हरे कृष्ण तो आप इस समय भागवत में महाराज रोगुन और जद भारत के विषय में पढ़ रहे हो। जद भारत ब्राह्मण से ामीण खानदान में जन्म लिया था और उनके पास पूरा अध्यात्मिक ज्ञान था। रुकना राजा थे पर साथ में भगवान की भक्ति का भी पूरा ज्ञान था न है प्राचीन समय में हमारे राजा होते थे उन्हें राज ऋषि कहा जाता था। राजरिशी, मतलब राजा और ऋषि। आज के शासन जो होता है, वह ना राजा प्राप्त है। ऋषि प्राचीन समय में जो शासन करते थे, उन्हें राजरिशी कहा जा रहा था। परीक्षा मरावी राज रिशी है। ओ शुकरेगुस्वामी हैं यहाँ, कि जब मनाज होगन ने पहले तो उन्होंने क्या किया, उन्होंने जल भारत की बेस्ट की। बड़े कठोर शब्दों में तुम मूर्ख हो, तुम जा देने में कौन हो। तो शुरू में तो जल्द भारत में सब कुछ कठिन शब्द से। तो इस विषय में कहा गया है भगवान के जो भक्त हैं, वो अत्यंत सहनशील होते है। अगर जल्द भारत चाहते तो वो भी तुरंत उनकी बेसी कर सकते थे। पर जल भारत में सेnशिलपूरा सैला अपराध हो रहा था। तो भगवान भक्तों को सेसिल होना चाहिए। और क्या कहते हैं ब्रेक ज्यादा सेंसि आप जब प्रचार के कार्य में जुड़े हो तो कई साल में आपकी बेचती होगी, कई सन में आदर होगा। हमें दोनो को स देना चाहिए। जब माँ प्रभु के आदेश के अनुसार जब हरदा ाकुर भगवान घर घर जा रहे थे, प्रचार करने, ये नहीं कि सब ने उनका साथ दिया, कोने तो साथ दिया। कइयों ने तो कहा संत आ गए हैं, हमारे घर में, हमारा सौभाग्य है, बोलो क्या है आपका आदेश पर कई साल में गए, उन्हें जासूस बुलाया गया। यह कहा गया जासूस आ गए हैं। संतों की वस्तु में। देखने हमारे घर में क्या है। बाद में आयेंगे, चुराने अंदाजा लगाओ। ये कहा जा रहा है कैसे वो कई साल लोगों ने दरवाजा भी नहीं खोला। जाओ जाओ जाओ या नहीं। आ सके वो कू ने कहा। क्योंकि जब मापन किया शिवा शंकर में केवल जोन के अत्यंत प्रिय भक्त थे, उन्हें अंदर आने की सुविधा दी थी। तो कइयों ने उनका अपमान किया। तुमने हमें अंदर आने दे दिया। जब हम प्रयास कर रहे थे आप तो बंधन नहीं आ सकते। तो नितिन हरिदास को जब कहा गया, जासूस हो, चोर हो, वो हंसने लगे, तो हमें अत्यंत सहनशील होना चाहिए। यह बहुत आवश्यक है। जब हरिदास ठाकुर ना मचा से हर नाम के और मुसलमान राजा ने काजी के कहने पर उन्हें बुलाया और राजा ने भी कहा तुम्हारा जन्म इतने ऊँचे खानदान में हुआ है, क्या ये हिंदुओं का नाम ले रहे हो। हम लोग तो हिंदू के घर से चावल का दाना भी लिखा। तो हरिदास ने कहा है नहीं है हरी नाम भगवान का नाम है, इसे नहीं छोडूंगा। हरीदास को जैसे आप जानते हो, बड़ी करक से जा दी गई, क्या दी जा। पीठ से गिर गए। 1 बजार से अगले बजार और अक्सर दूसरे ही से बजार तक पहुंचने पर व्यक्ति की मृत्यु हो जाती थी। 22 बजार तक पहुंच गए और हरिदास जॉब कर रहे थे। जब हरिदास ने देखा, 2 पीटने वाले ये चर्चा कर रहे हैं कि अगर हैदास जिंदा रहा तो राजा ने, हमें काजी ने हमें जिंदा नहीं छोड़ना। तो उनके प्रति दया रखते हुए हरिदास ने ऐसा व्यवहार किया जैसे भी बेहोश हो गए और उन्होंने सांस हिले बिल्कुल रोक दिया। जब पीटने वालों ने देखा, यह है। उनका सांस भी नहीं हिल रहा। तो उन्हें लगा कि यह मर गया है। खुशखबरी भेज दी, ह राज की पृति हो गई बाइस बाजार में। और जब वहाँ राजा ने कहा, अंतिम संस्कार कर। 2 मुस्लिम विधियों के अनुसार काली नहीं आता, नहीं इसे, तो गंगा में फेंक 2 और फिर हरिदास तैयार कर गंगा पार जाने लगे। तो हरिदास ये सब पीले थे, सैदे गए। तो भगवान के भक्तों को अत्यंत सें शील होना चाहिए। हमारे सांसों में अनेक उदाहरण है। और यहाँ आप हो कि यदि भारत को राजा ने उनके बेस्टी की, जब भी वो से थे गए, तो आज के लोक में आप क्या देख रहे हो? आज के इस लोक में आप ये देख रहे हो। परि्वार से कह रहे हैं कि जब महराज रविना ने ये उपदेश सुना, जल भारत का तुम तुरंत पचान गए। यह कोई मूर्ख व्यक्ति नहीं है, ये तो आत्मज्ञानी व्यक्ति है। क्यूंकि? जो राजा थे, उनका भी अभ्यास था शास्त्र ज्ञान के विषय में। तो इसलिए वो एकदम पहचान गए। ये जो संत है, ये तो असली सं दिखता है। 1 दम वो पहचान गए, क्योंकि अगर आपके पास ध्यान में ज्ञान नहीं हो तो आप ठीक रूप से पहचान नहीं सकोगे। तो जल्द भारत, तुम्हार लोग न एकदम जान गए कि जो जल भारत है, यह असली सन दिखता है। इसने जो उपदेश दिया है कि जल्द भारत पिछले शो को में उपदेश दे। आए हैं कि आप सोच में पर सेवक हूँ पर कल बदल भी सकता है। उन्होंने समझा दिया ये अस्थायी है। तो जन भारत ने अपने उपदेश के द्वारा रोगुन के गुना को जागृत किया। महा रोगन समझ गए कि ये ज्ञानी व्यक्ति है। और ध्यान में ज्ञान प्राप्त करने से जो भौतिक आकर्षण था वो कमजोर हो गया। भौतिक आकर्षण को अगर हमने वश में लाना है तो 1 ही उपाय है। कल रात कम चर्चा कर रहे थे। भागोतम के छठे स्कंद से यहाँ की उपदेश दिया गया है। इस प्रकार व्यक्ति अच्छा ब्रमचारी बन सकता है। और अनेक विचारों के साथ ये पढ़ते हो। क्या वन इंडिया को मां की सेवा में जोड़कर रखना? तो लोग न समझ गए कि जद भारत बड़ा ज्ञानी व्यक्ति हैं, वो तुरंत ही वो अपने पलकी से नीचे आ गए। कल किसी उत्तर के नीचे क्यों आए? क्योंकि उन्होंने देखा कि ये तो आत्मज्ञानी व्यक्ति है और वो ज्यादा अपराध नहीं करना चाहता है, वैस्ट अपराध से हमें बचना चाहिए। हमारे सास में अनेक उदाहरण हैं। यहां की आप ये पढ़ते हो कि वैषणपराकेद्वारा भक्ति का सुन्दर बगीचा खराब हो जाता है। चितेमापसानादनगुस्वामी को शिक्षा दे रहे थे सना रूप दोनों 1 समय 1 प्रसिद्ध राजा के राज्य का शासन कर रहे थे। पर दोनों भाई छोड़कर जुड़ गए। माहापबकेसाथसपया ज्यादा बाद में महापाप ने स्वामी को उद्देश दिया। प्रबंधन कुल भगवान जी गुरु कृष्ण के अनेक योनियों में गुजरने के पश्चात जो भाग्यशाली व्यक्ति है, उसे क्या मिलता है? भक्ति का ज्ञान? यह ज्ञान की अगर हम बहुत सा से मुक्ति चाहते हैं। तो हमें भक्ति की विधियों का पालन करना पड़ेगा। यही 1 उपाय है। भागवत में आप देखते हो गीता का भी यही है भक्ति योग, भक्ति योग के माध्यम से आप अपना भौतिक आकर्षण तोड़ सकते हो। तो जल भारत ने रोगुना को बेच दिया, जिसके द्वारा वो मोगना समझ गए। जल भारत। अब ज्ञानी के प्राचीन समय में जो राजा होते थे, जैसे हमने कहा, उनके बाद राजा भी होते थे। और साथ भाई की चर्चा करे एवम परंपरा, ये जो भगवत गीता का ज्ञान है, ये गुरु परंपरा द्वारा आ रहा है। दूसरे शब्दों में राजा ऋषि होते थे, तो ये ज्ञान उन्हें दिया जाता था। और क्योंकि छोटी आयु से ही जो राजा थे और धार्मिक ज्ञान प्राप्त करे प्राप्त करते थे, तो उनका शासन भी जो होता था, धर्म के आधार पर होता था। पर आज के जमाने में कोई शिक्षा नहीं देता, ध्या्मिकशिक्ष नहीं देता। प्रदान माल जी ने कहा है कोमरा्रधरमभोपाँच साल की आयु से हमें यानी ज्ञान को अनुकूल करना आरम्भ कर देना चाहिए। कुछ दिनों में आप ने कहा ये भक्ति का सुन्दर बगीचा नष्ट हो जाता है। जब हम क्या करते हैं वो, तो रोग ना, उन्होंने पहचान लिया। इस गुगकेबहरेव्यक्ति के पास बहुत गहरा ज्ञान है। और ये भी वो समझ गए कि मैंने इसके विरोध में अपराध किया है। और इसलिए वो तुरंत ही अपने पलकी से उडकर नीचे आ गए और होंने क्या किया, बालत को प्रणाम किया। तो हमें भक्ति के विषय में वैश् अपराध से बचना चाहिए। अज्ञानता में हो जाए तो अलग बात है। और जान बूझकर, वैशणपरासेमें हमे नहीं जुड़ना चाहिए। वैशणअप्राध के द्वारा भक्ति का जो सुंदर बगीचा है, ज्ञान लाभ है, वो मिल जाता है। तो हमारे शास्त्र में नेक उदाहरण है। 1 प्रसिद्ध उदाहरण है सच्ची माता का। भक्त। बकैदा कहते थे अब सब पर दयालु हो, पर अपनी माता पर दयालु नहीं है। और क्यू माता ने अपराध किया? क्या था उनका अपराध केवल उनके मन में थोड़ा द्वेश था। वो सोचती थी, मेरा बड़ा बेटा घर छोड़ गया। अदविता चारिया के प्रचार के कारण। वो छोटा बेटा भी जब अविताचार्याको कहा जाता था। महा भव ने कहा उनकी माँ ने अपराध किया है। आपके विरोध। वो कहते थे ये कैसे हो सकता है यह नहीं हो सकता। पर जब भगवान को प्रणाम कर थे तो सच्चिदा पीछे से आकर गिरनों की धूल लेकर माथे में लगाया। और जब भगवान ने यह देखा तो क्या का, हमें माँ को भक्ति की कृपा प्राप्त होगी। तो माँ प्रभु ने ये उदाहरण क्यों दिया। आप ही उदाहरण कई बार सुन बैठे हो ये बताने के लिए कि ये वैश अपराध इतना महत्वपूर्ण है, हमें हर रूप से प्रयास करना चाहिए। इससे बचने के लिए और अनेक और उदाहरण है। जब आप लोगों ने अपना समकृतिनंडोलन आराम किया, शिया संगन में 11 ब्राह्मण था, जिसके हृदय में इंशा थी। शिवा को इतना आदर मिल रहा है। प्रभु रोज उसके घर आते हैं। सारी रात के सुनते हैं। तो सीधा श्रीवास के नाम को बिगाड़ने के लिए क्या क्या? क्या? क्या दुर्गा देवी की पूजा का समान उनके घर के सामने रख दिया। और जब शिवा ने दरवाजा खोला, सुबह देखा, शराब की पाउडर मास। शिवा ने कहा, देखो पड़ोसी, मैं तो धोखा दे रहा था, मैं तो दुर्गा का भक्त हूँ। इसका परिणाम क्या हुआ? परिणाम यह हुआ कि ब्राहमण को सुरती कोड की बीमारी हो और वो दर्द से दे गया। कई साल बीत गए हैं। प्रभु से कहा माफ कर 2 वो तरफ ंतमेंस्ीवासी जाकर, उन्हें माफ कर तो वैष्ण अपराधों से हमें बचना चाहिए। रामचंद्रपुर ईश्वरपुरी के गुरु भाई थे, उन्हें वैष्णों की निंदा करने में बड़ा आनंद आता था। रामचंद्रपुर अक्सर जब सनी हांसी आते थे, पुणे में सबके सामने महा प्रसाद ले जाते थे। और जब सन्यासी कहते थे हम तो सन्यास है, हमें इतना नहीं खाना चाहिए। तपस्या करने का नहीं खाओगे तो अपमान होगा। जब वो खा ले ते थे तो फिर क्या करते थे? वे कहते थे देखो, ढोंगी सुन्सी ज्यादा खाते। तो इनको बड़ा आनंद आता था। बक्सों की कमजोरी देखकर 1 बार पूरी। वहाँ कमरे में आये, उन्होंने देखा अनेक चिट्टियां चल रही हैं। तो उन्होंने सोचा जरूर सौ सन्यासी ने मीठा खाया होगा। और मीठा खाने के कारण ये चिटियां यहां चल रही है। पर गर्मी के मौसम में भी चीटियाँ ऊपर आ जाती है। गर्मी के। तो क्या परिणाम हुआ। इस ब्राहमण राम पुरी ने कहा अखेसन्हासीको मीठा खाने की बहुत आदत है। तुम्हार प्रभु ने इसे बड़ी गंभीरता से लिया, माँ प्रभु के लिए कहा। 1 छोटा काला दाग सफेद चादर में दूर से भी दिख जाता है। तो ने कहा कि सन्यासी का ऐसा होना चाहिए, कोई कोई कलंक नहीं हो। तो उन्होंने अपना खाना बहुत कम कर दिया। जिसके कारण महा प्रभु के सारे भर बड़े क्रोधित हुए। और रामचन्द्र पुरी में आदत थी लुक्स। तो 1 दिन वह अपने गुरु के कमरे में थे। उनके गुरु का नाम था मालनपुर। क्यूंकि। बहुत। तो विनम्रता से मालविनपुरी, मैंने इस जीवन का उपयोग नहीं किया। सेवा करने में। ये है वैसा का। हालांकि वास्तव में सब गुण होते हैं। क्या सोचता है मेरे में कोई गुण नहीं। पर इसका यह अर्थ नहीं कि हम सच में सोचें कोई गुण नहीं है। जैसे ठाकुर अपनी राधा कहते हैं, दयाकरमेरपर मेरे में कोई गोल नहीं है। पर ये उनकी तो रामचंद्र पुरी। जब गुरु के शब्दों को सुना तो गुरु को मायावादी उपदेश देने लगा। जिसके कारण गुरु ने कहा तुम निकल जाओ, मेरी नजर। तो इसकी तुलना में मालनपुर के 1 और शिष्य थे, उनके नाम था ईश्वरपुरी। ईश्वरपुरी जो थे अपने गुरु की सेवा बहुत ही विनम्रता से कहते थे। बुढिया उनके मल को उठाना, उनको बीच में उठाना, उनके पिशाब को साफ करना। मधुपुरी इतने प्रसन्न थे ईश्वरपुरी के सेवा से ईश्वरपुरी को आशीर्वाद दे। और कहा तुम्हारे द्वारा सारे विश्व में कृष्ण का नाम पहले और वो उन्होंने किया मा और प्रोप द्वारा। तो ये जो वैन अपराध है, इससे हमें बड़ा सावधान रहना चाहिए। सर की 1 बेटी थी जिसके पति का नाम था मोगा। मोगा दिन रात छुप छुप के वहाँ प्रभु के पीछे जाता था। वो उसका उद्देश्य क्या था कोई नुक्स निकालना है। प्रभु को को कुछ कह दिया उन्होंने जो गलत है वो कुछ भी ढूंढ नहीं पाया। 1 दिन जब सर वो नचाया के घर में माँ पर प्रशाद खा रहे थे, जब वो प्रसाद खाते थे, उनकी पत्नी खिलाती थी, प्रसाद और सर बोले चाय रात द्वार में खड़े रहते थे डंडे के साथ, क्योकि वो चाहते नहीं थे कि हम गा देखे क्या खाया जा रहा था। 1 दिन पति को पति को सहयोग देने देना पड़ा जो मोगा ने देख लिया, इतना बड़ा बंडारा उनके टेबल में, तो मोगा कहने लगे देखो ढोंगी सन्यासी। तो क्या परिणाम हुआ? इन्हें थोड़े दिन में बीमारी को मा प्रबु ने गोपिनाचारयासे पूछा कि मोगा का श्वास कैसे माँ प्रबु बड़े प्रभावित है सर वो की भक्ति से, तो गोपिनादाचारिया ने कहा उसे कोड की बीमारी हो गई है, कल हो गया, माँ बबू गई उसके घर। ये माँ बाबू चाय को दुखी नहीं देखना चाहते थे, उनके घर गए, छाती पर हाथ रखा और कहा जब तक तुम्हारे हृदय में द्वेश एशिया रहेगी, जब तक भगवान वहां निवास नहीं करेंगे। दूसरे शब्द में हमें एशिया द्वे से बचना चाहिए, सो एशिया और दवे से बचना चाहिए। अभी आपको सेंशील बनाना चाहिए। तो यहां तातपेईमें कहा जा रहा है? प्राचीन समय में जो राजा थे वो पूरी प्रजा को धार्मिक ज्ञान भी दे और पूरी प्रजा को अपनी प्रजा जैसे मानते थे। जैसे राम राज्य के समय समाज में पूरा सुख था क्योंकि पूरा समाज भगवान राम के गुणगान करता था और धार्मिक नियमों पर जीता था। तो जो संवाद नेता हैं, राजा हैं, उनके पास अध्यामिक ज्ञान भी होना। पापा जी ने 1 समय 1 लेख लिखा था, सॉरी नो टाइम, ये लेख लिखा था विदेश जाने से पहले इसमें ने कहा 1 प्रसिद्ध मंत्री को मिलने और मंदी ने कहा sorry सभी आपको मिलने के लिए कोई टाइम नहीं है, उसका हार्ट टैक हुआ सॉरी नो टाइम सो ताजपुर में पापा जी कह रहे हैं कि जो प्राचीन समय में जो नेता थे वो अपनी जिम्मेदारी मानते थे, यह प्रजा को आध्यात्मिक ज्ञान भी दिया जाए। और आध्यात्मिक ज्ञान के बिना प्रजा कभी भी सुखी नहीं रह सकती। मछली को आप जल के बाहर रखोगे तो मछली जी पाएगी नहीं जी पाएगी। अध्यात्मिकता के बिना समाज अधूरा माना जाता है। तो इसलिए प्रापा जी कह रहे हैं तारप्रिएमेंकि जो नेता थे वो यही सोचते थे कि हमें आध्यात्मिक ज्ञान भी देना, आध्यात्मिक ज्ञान दे सकते हैं और खुद भी अनुकूल करें। आप भागवत में है। महाराज अमरीश का उदाहरण पढ़ते हो। किस प्रकार महाराज अम्बरीश ने मनबुद्दीनीयका उपयोग किया किसलिए वाण की सेवा में पुशादमेशासनमीडिया महाराज रंसीदेवएबडे दयालु राजा थे। तुम्हारा रांची देव ने फॉर्टी डेज के लिए वर्ड रखा था, वो अपना वर्ड तोड़ने वाले थे, वो उनकी पत्नी और बच्चे, जबकि 1 ब्राहमण उनके महल में पहुंच गया। ब्राह्मण ने कहा हे राजा, मुझे भूख लगी है कुछ खाने के लिए 2 और कुछ खाने को दे दे। और जो ब्राहमण गये। फिर 1 और सूद्र व्यक्ति आ गया। थोड़ा सा बचा था खाना। और जब ये सुंदर व्यक्ति चला। 1 और भूख व्यक्ति आ गया, वहां कुत्तों के साथ, तो अंत में राजा के पास खुश नहीं था, केवल थोड़ा जल था। वो जल पीने गए। प्यास बुझाना चाहते थे, जल पीने वाले थे, जल्द पीने जा रहे थे। 1 प्यासा व्यक्ति आ पहुँचे। मैं प्यासा हूँ, आपकी जिम्मेदारी बनती है, मुझे पानी के लिए, तो वो भी तो मेरे स्तुति में कहा, हे भगवान, मैं सबकी कर्मों की सजा भोगने को तैयार हूँ। अब सब का उद्धार कर लो। इन सबका और सब का जो पाप का बोझा है, वो मुझे सोने। 2 इस प्रकार का भाव किसी और ने भी प्रस्तुत किया था। कौन से हुआ? मैं आप से कुछ मांगना चाहता हूँ। मांगो आप सब के पापों का परिणाम मुझे तो रंडी देव की परीक्षा ले रहे थे। कौन देवता देवता इतने प्रसन्न थे कि उन्होंने अपना असली रूप प्रस्तुत किया। तो कई बार भक्ति में जुड़े हो। भगवान भी आपकी परीक्षा देते है। जैसे मा पूरी की कथा में भगवान क्या, बड़ा कठिन कार्य दिया। उन्होंने कहा कि मैं भारी हूँ, तुमने मेरी स्थापना कर दी और मुझे अब भी गर्मी लग रही है। तुम मेरे लिए क्या लेकर आऊ, चंदन लेकर आऊ। चंदन लाने के लिए। उन्हें वरदान से आना किस जगनापुर। अगर। आज के जमाने में 5 लिए चंदन लेकर आओ और पैदल जाना पड़ेगा। हमारे बस गा तो पूरी बड़ी बड़ी कठिन से चंदन लेकर आओ। उन्होंने मान लिए, स्वीकार कर लिया। उस समय किसी प्रकार की आधुनिक सुविधा नहीं थी। कोई मोटर नहीं, प्लेन नहीं, कोई साइकल नहीं। पूरी यात्रा उन्होंने पैदा की और जब यात्रा कर के लौटे थे। चंदन लेकर। भगवान ने शब्द में कहा, जब रेमिना पहुंचे बंधन, पूरी प्रस हूँ, तुम्हारी सेवा से चंदन कैसे सो। पहले तो भगवान ने उनकी परीक्षा ली। बड़ी कठिन सेवा थी। और जब वो सेवा उन्होंने ठीक रूप से निभा दिया। भगवान ने कहा, अब इतने लम्बे सफर करने की आवश्यकता नहीं। ये भगवान खुश हो गए थे कि उन्होंने सेवा को तो। जब हम भक्ति में जुड़ते हैं, हमें कई प्रकार के चैलेंजेस भी प्राप्त होते हैं। हमें दिल होकर सेवा करनी चाहिए। तो 4 पर पर प्रभाव जी कह रहे हैं? जो सामाजिक नेता हैं, उन्हें यह समझना चाहिए। उनका मेन विषय ये होना चाहिए। यह समझना कि जन्म मृत के बंधन से कैसे छुटकारा प्राप्त सकता? और प्रपाती महाराज दशर का उदाहरण देते हैं। वह दर के राज्य में जब भी कोई आता था, उससे पहले पूछा जाता था, what is प्रोग्रेस, मैं जर्नी बैक टू हू। आजकल आप लोग किसी को मिलते हो, आप क्या कहते हो? कैसे हो? दूसरा व्यक्ति कहता है? ठीक, आप कैसे बोलने वाला? ठीक है सुनने वाला। पर ये जीवन का रिवाज बन गया है। महाराज दशरथ के महल में जो भी आता था, उसे पहले पूछा जाता था, what i a progress bak हो? तो रोज पूरे। तार में यह कह रहे हैं, जन्म मिर्च के जो चक्कर है, उसे छुटकारा कैसे प्राप्त करें? ये होना चाहिए। हम सबका विषय। पापाजी। 1 समय बड़े महाविद्यालय में लेक्चर दे रहे थे। उन्होंने पूछा, इस प्रसिद्ध महाविद्यालय में ऐसा कोई विभाग है? यहां की यह शिक्षा प्राप्त होती है कि जन्ममृत्रकेबंधन से कैसे छुटकारा प्राप्त किया जाता। तो यह ज्ञान सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान है। इसलिए भगवत गीता में भगवान कहते हैं राजा गिरिया, राजा गुरिया। और अगर हम इस ज्ञान को अनुकूल नहीं करें तो यह जीवन व्यस्त माना जाता है। तो हम सब का यह चिंतन होना चाहिए। जन्म मृत्यु के बंधन से कैसे छुटकारा प्राप्त हो सकता है? ये है आध्यात्मिक ज्ञान। और जब तक हम अध्यात्मिक ज्ञान को अनुकूल नहीं करेंगे, आप किसी प्रकार संतोष नहीं हो पाएगा। और कपनी में प्रभा जी कह रहे हैं, क्या कह रहे हैं? प्राचीन समय में जो सरकार का शासन शासन था, वैसे लगता था जैसे स्वर है। और आज के वातारण में क्या लगता है जैसे असल में नरक जाने की आवश्यकता नहीं। भौतिक जगत में ही इतनी कठिनाइयां हैं, क्या कोई नरक जाने की आवश्यकता सो? अगर समाज में किसी चीज की कमी है तो किस चीज की कमी है? इस िविज्ञान की कमी है। इसलिए हमारे आचार्यो ने विचार की सेवा पर बहुत बल दिया है। तो ये होना चाहिए हम सब का कार्य। भगवान दे। उन्होंने क्या कहा? हम सत सुर समाद। उन्होंने कहा पुत्र से क्या कहा, हे पुत्र। तुम्हे जो मानव देह प्राप्त हुआ है, उसका उपयोग पशु जैसा मत करो, उसका उपयोग करो। किसलिए तपस्या का पालन करने के सो। तपस्या का अर्थ क्या है? तपस्या का अर्थ है उन चीजों को त्यागना जो धार्मिक क्षेत्र में प्रतिकूल हैं। और उन चीजों को स्वीकार करना जो अनुकूल है। ये है तपस्या। और अगर। आप तपस्या करते हो जी पी क्या तपस्या है जी की। 1 तपसी। यह है जीव द्वारा भगवान के नामों का उच्चारण करना, जीव द्वारा कृष्ण कथा की चर्चा करना, जीव द्वारा खाओ। तो क्या खाओ, कृष्णा प्रसाद खाओ? और कुछ नहीं। जीव द्वारा सत्या का उच्चारण करो। यह संक्षेप में है। जीप की तपस्या। पर अज्ञानता में हम क्या करते हैं? जीप के द्वारा बहुत चर्चा करते रहते है। इसको क्या कहते है? स्वामी? क्या कहते हैं सनातन को स्वामी ने हमें अनेक ग्रंथ दिए हैं। और सब ग्रंथों की रचना उन्होंने की। वहाँ प्रभु के आदेश के अनुसार हाँ प्रभु ने संक्षेप में बयान दिया था। इसके आधार पर उन्होंने नए ग्रंथ की रचना की। कुस में क्या कहते हैं है पर जलपा के द्वारा भक्ति नष्ट हो जाती है। कल रात को हम लोग चर्चा कर रहे थे कि अच्छी ब्रहमचारी बनने के लिए क्या करना चाहिए? हम से अच्छा डिस्कस और में क्या कहते है? 1 और अवश्य गाय क्या है? जलपा से बचना, प्रजल्प से भक्ति न सुझा दी। तो प्रजल्पा किधर भी आप कर सकते हो। प्रजा से बचो अगर समय है। तो इसी समय का उपयोग करो। भगवान के नामों का चयन करने के लिए की है। आजकल भगवान ने भक्तों को लंबी छुट्टी दी है। मैंने तो सोचा था, 14 तारीख तक रहेगी। अब छुट्टी का पीरियड एक्सटेंड होने वाला है। मैंने क्या कहा? अभी हमारे भाई समय है। क्या करें खुश खबरी। यह है भगवान के नामों का उच्चारण दिन रात कर सकते हो। ये नहीं भगवान के जो नाम है, 16 माला से ज्यादा नहीं कर सक। जैसे जब प्रापा जी ने इस काम के पहले केंद्र की स्थापना की, प्रॉपाजीनेोभक्तों को कहा था करने के लिए तो समय है। जो भौतिक वादी हैं, उन्हें यह नहीं पता समय से क्या किया जाए। पर जो दिहादिवादी हैं हम्हारे पास बहुत काम करने मे भगवान के नामों का उच्चारण करो। और यह नहीं कि अगर 23 घंटे जॉब कर लिया तो जाओगे भगवान ने, क्योंकि अपने नामों में पूरी शक्की डाली है, भगवान के नाम अब भिन है। अब दिन रात भी जॉब करोगे। सुन सकोगे नहीं हैहयराज। ठाकुर 3 लाख बार रोज जाब करते थे साथ में सासों का अध्ययन। पर पर्ज ने कहा कि जो ग्रंथ है, केवल बांटने के लिए नहीं है, पढ़ने के लिए भी है। तो ये अच्छा समय है। तों को भी पढ़ सकते। यह नहीं कि सुबह के कार्यक्रम में रहे हैं। रास्ते में जाकर, विश्राम करने, 5 घंटे
मे
हम इस सुविधा का लाभ नहीं उठा। इस सुविधा का लाभ जब उठाएंगे, जब हर पल, हर श का उपयोग किया जाए। भगवान की सेवा में। और चने के बंदे ने इस वृक्ष में क्या कहा? 1 पल दुरुपयोग, 1 पल का भी करोगे, तो उसे सारे विश्व के धन से वापस नहीं ला सकते। तो हमें इस समय का उपयोग करना चाहिए। हम किस ले श्याम को बढ़ाने के लिए और सकते हो। पूरे साल का कोटा तो ये महत्वपूर्ण है। यहां में समय का लाभ उठायें। शासन को ध्यान से पढ़ने के लिए शास्त्र में जितना पढो, उतना ही कम है। आप मानो गीता पढ़ लिए, 1 बार, 2 बार, 3 बार, 4 बार, आप सोचोगे, 4 बार तो पढ़ लिया, हमारा है। वो मुझे कह रहे थे कि उन्होंने गीता 130 बार पढ़े, तो आप गीता को दिन रात पढ़ सकते हो। और अब थकोगे नहीं, वो दिन रात पढ़ सकते हो और थकोगे नहीं। तो दूसरे शब्दों में ये जो सुविधा प्राप्त हुई है, हमें इसका पूरा लाभ उठाना चाहिए, लाभ उठाना चाहिए। सणमकेसरमकेवृषय में। यही नहीं, लाभ उठाने का विश्राम ज्यादा करो, विश्राम उतना ही करो, जितना की आवश्यक हो। और ज्यादा समय लगाओ और जितना तेज, जितना अधिक श्रम किम करेंगे, उन्हें जल्दी ही जो मैन है, दूर होगी। सो। मनाजहोगना समझ गए कि जल्द भारत जो है, आत्मज्ञानी व्यक्ति है। मैंने इस संघ के प्रति अपराध किया है और क्यूंकि उनके पास ध्यात्म ज्ञान था, वह अपराधों से बहुत डरते थे। तो वैसे जीवन में हमें भी सावधान रहना चाहिए और अपराधों से नहीं डरना चाहिए कि आप कुछ सेवा नहीं कर। हमें अपराध करने से डर लग रहा है, सावधान रहना चाहिए। और अगर आप किसी में कोई कमी है और उसको सुधार ले हो, वो अपराध नहीं माना जाता है। इस द्वेश के प्रभाव में आकर हम जब कार्य करते हैं, वो उस प्रकार के अपराध से भरा, तो आज अगर समाज में किसी चीज की कमी है। इसे विज्ञान की कमी है। जिस प्रकार जल भारत ने अपना व्यवहार किया, शुरू उनका व्यवहार था क्या, भूमि और भरे व्यक्ति का, जब प्रचार का समय आया तो शेर जैसे उन्होने प्रचार किया। तो इससे हम क्या सीखते हैं? हमारा भी व्यवहार ऐसा होना चाहिए। साधारण स्थिति में हम गूंगे और भरे जैसे गुंगी और भरे जैसे रहते है। इस दृष्टि से बहुतिक चर्चा में हमने रुचि नहीं लेनी, बहुतिक चर्चा से हमें दूर रहना है। तो इसलिए हम गूंगे और भेरे का व्यवहार करते हैं। मुझे प्रचार का मौका मिले, फिर आपको प्रचार करना चाहिए। कैसे? शेर से प्रचार करने जदवारतीपहलेसारी बेसी सैली ने देखा, मुझे प्रचार करना है। तो उन्होंने बड़े उत्साह से प्रचार किया, जिसका यह परिणाम हुआ कि राजा तुरंत ही पलकी से नीचे उठे, राजा ने उन्हें प्रणाम किया और माफी मांगी। तो ये होना चाहिए हमारा व्यवार और 1 विश्व में मूवी और भरे प्रचार का समय मिले। बड़े उत्साह से हमें प्रचार करना चाहे। तो प्राचीन समय में जो शासन थे, वो थे, ऐसा वाचन होता था जैसे स्वर्ग में है, स्वर्ग में जब अनुभव होगा, यह पूरा समाज में आध्यात्मिक वाचन होगा। फिर स्वर वरन अनुभव कर सकते हो जैसे पापाजी कहते थे। these temples like heaven on, पृथ्वी पर स्वर अभी आप, ये हरे बाहर जाओ, बिल्कुल वतन हो, जब अंदर आओ सुरक, ऐसा लगता है कि आप स्वर्ग में आ गए हो, जहाँ भगवान का गुणगान होगा, यहाँ भगवान की शिक्षा का प्रचार होगा, वहाँ वास लगेगा। तो हमें मंदरों में बिलकुल आध्यात्मिक बात रखना चाहिए। जैसे लोग कोई प्रवेश करे, उसे आध्यात्मिक ज्ञान रूचि बढे। तो जद भारत, जद भारत से रोगन ने क्या किया? माफी मांगिए ने कहा यह अपराध मैंने किया है। और फिर उनके शिष्य बन गए। तो जिस प्रकार जल भारत के चित्र में आप देखते हो। गूंगे थे और भरे थे। और जब प्रचार के समय आया, जब गूंगे में भरे नहीं थे और वो अत्यंत सेन शील थे, जब शुरू में जद भारत ने उनकी बेसी की, तो ने माना उनकी बेस। तो न्होंने सैल का cेतनेmaपaपनेसिधा श्लोक पर बहुत बल दिया। और हमारे वैश ने इस श्लोक की चर्चा कि बार बार न सदा। अगर तुम चाहते हो कि हरी का नाम सदा लेते जाओ तो सेना हमें अत्यंत सें शील होना चाहिए। और आदर 2 बिना किसी आदर की उम्मीद रखे हुए ये नहीं कि हम तुम्हें आदर देंगे और तुम भी हमको आदर दोगे नहीं पेला, ये हमारा व्यवहार नहीं होना चाहिए, वर व्यवहार होना चाहिए कि हमें अत्यंत सें शील होना है। और आद 2 मे किसी आदर की उम्मीद रखे हुए और अगर वैश्व सिद्धांत का उपयोग होगा तो पूरे मंदिर में, आश्रम में आध्यात्मिक वासन होगा। तो भर जो हैं, प्रयास करते हैं कि अध्यात्मिक जीवन को अनुकूल करें और ये ज्ञान दूसरों को मिले। तो आज के इस लोक में कहा जाता है कि प्राचीन समय में जो हमारे राजा थे, ऋषि थे, उन्हें छोटी आयु से अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता था, इसलिए उनका शासन था। वो भी निर्भर था किसके ऊपर ध्यान दे, ज्ञान के। ऊपर और जब भगवान को केंद्र बिंदु बनाओगे उनकी शिक्षा का पालन करोगे तो जब समाज का वतन भी ध्यान रहेगा। और यह बहुत आवश्यक है कि अिहादिवासपलरहे तो प्रयास करने पर हर कार्य संभव हो सकता है और अगर हम इन विधियों का पालन करें तो हमारा भी भौतिक आकर्शन टूट सकता है। जब रहना ने सुना जद भारत के उपदेश, तो एकदम जो उनका बौधिक आकर्षण था, ये भाव था मैं राजा हूँ, मेरे सब को मेरी प्रशंसा करनी चाह क्यों वो भारत से उपदेश सुन बे उनका भौतिक आकर्षण टूटने लगा। तो उसी प्रकार के के माध्यम से जो भौतिक आकर्षण है, वो टूटेगा। इसे भगवान विश्वदेव कहते हैं कि सपस्या के माध्यम से अब असली आनंद प्राप्त करोगे। असली आनंद, तप सेवा, परम, ज्योति भागवत मधोऑकसीड, तपस्या के माध्यम से परम भगवान जो धोक से हैं, उन्हें तुम समझ पाओगे, तपस्या आवश्यक है। और तपस्या का जैसा मैंने कहा ये उद्देश्य है प्रतिकूल कार्य त्याग, जो निपुर कार्य हैं, उन्हें स्वीकार करो और जो शासन करते हैं, उनका ये भाव होना चाहिए कि हम आजाद विज्ञान दें और ज्ञानविज्ञान के द्वारा ही असली सुख शांति प्राप्त हो सकती है। तो जल भारत, हमें बड़ा जो देश देते हैं, हम देखते हैं कि मना रोगुन बड़े, मनाज रोगुन या अपराधों बच्चे अपराधों से डरते हैं और इसलिए उनकी इच्छा है कि अपराधों के लिए वो माफी, मांगें, वैष्ण अपराध से हमें चाहिए और मान लो, आपने बैठण अपराध किया है और समझ वैषणअपराधहैतोअगर आप दूसरे व्यक्ति को कहो ये अपराध फिर से नहीं होगा। तो दूसरा व्यक्ति जो है, उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। उसे यह नहीं करना नहीं, नहीं, कई बार प्रश्न पूछते हैं, हम अगर अपराध करें और माफी मांग ले तो दूसरे व्यक्ति माफी स्वीकार नहीं करेगा और दूसरे में भी यह भाव होना चाहिए। क्या माफी मांग रहा है तो हमें भी दयालु होना चाहिए, यह नहीं कि हम कहें नहीं। हम स्वीकार नहीं करते। तो आगे के फ्लो को में आप पढ़ोगे कि किस प्रकार है। गुना ने माफी मांगी और उनके शरणागत हो गए, शिष्य हो गए। वह बड़ी गहराई के साथ और आध्यात्मिक ज्ञान जल्द भारत में भी है।
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