केवल भाग्यशाली व्यक्ति ही करते हैं प्रचार | SB 5.5.1 |26 Dec 2017 |Vrindavan | Gopal Krishna Goswami

Gopal Krishna Goswami teaches that preaching and chanting Krishna's names is a form of spiritual practice that removes ignorance and brings joy. He describes how distributing scriptures and spreading devotion, despite resistance, pleases the divine and leads to lasting happiness beyond material comforts.
Chapters
हाई कृष्ण, इन, श्लोक, आपने सुना। ये भागवत हमका 1 बड़ा प्रसिद्द श्लोक है जिसका उच्चालन करते है। भगवान विष्ण देव स्वयं स्वयं भगवान है। आप किसका मोबाइल पांचवी स्कल में आप पढ़ते हो। मराज ना भी उनकी पत्नी मेरु देवी बड़े यज्ञ कर रहे थे। उनकी इच्छा थी भगवान जैसा 1 पुत्र प्राप्त हो की भगवान प्राप्त हो। पुस्तक के रूप में भगवान उनके यज्ेसेबड़ेप्रसन् थे और भगवान ने अपने आप को प्रकट किया। भगवान ने कहा अगर तुम्हें मेरे जैसा पुत्र चाहिए। यह सम्भव है। हमारे जैसा कौन हो सकता है? मैं ही तुम्हारा पुत्र बन जाता हूँ। भगवान प्रकट हुए ऋषवदेव के रूप में। सबसे तो भगवान ऋषभदेव के सौ पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़े बेटे का नाम क्या था और उनका शासन इतना सुन्दर था। समाज में कोई भी नागरिक किसी प्रकार का कष्ट नहीं अनुभव कर रहा था। जैसे आज भी आप राम राज्य का स्मरण करते हो। क्यूँ? क्योंकि राम राज्य के समय समाज में किसी प्रकार का कश नेता तो रिशवदेव महाराज के शासन के समय में पूरी प्रजा अत्यंत सुखी थे। किसी प्रकार का कश्नेता और महाराज रिशवदेव 1 ब्राहमणों की सभा में आए, जहाँ की उन्होंने अपने सौ को बड़ा महत्वपूर्ण संदेश दिया। ये पुत्रों के माध्यम से पूरे मानव समाज को शिक्षा दे रहे हैं। तो इस लोक में क्या कहा जा रहा है? कह रहे हैं ये मेरे पुत्र? जिन्हें मनुष्य जीवन प्राप्त हुआ है, उन्हें क्या करना चाहिए? इंडिया सिद्दी से बच कर तपस्या का पालन करना चाहिए। अज्ञानता में मजा सिव्ती के कार्य में जुड़ते हैं। वेदिक शास्त्र के द्वारा हमें शिक्षा मिलती है कि ये पशु का जीवन माना जाता है और मानव जीवन प्राप्त होता आरम्भ होता है। जब हम तपस्या का पालन करे और किस उद्देश्य के साथ परम भगवान को प्रसिद्ध करने के लिए, संतोष करने के लिए, तो देवी वाशुदेव ने कहा तपस्या का पालन करो। पर अध्यात्मिक उद्देश्यो और तपस्या का पालन। भगवत प्राप्ति के लिए। तो ज्ञानता के कारण हम भदकार में जुड़ते हैं। पर जब हम अध्यात्मिक ज्ञान को अनुकूल करते हैं तो ये ज्ञान प्राप्त होता है कि तपस्या ही तपस्या का पालन करना चाहिए। ध्यान दे, गोलेश, वैसे देखा जाए, भौतिक समाज में रहना, ये भी 1 भारी तपस्या है। उदाहरण के लिए भारत के शहरों में इतना पोलूशन है की बड़ा भयंकर परना, परना स्केल पर आपके दिली, शहर में अगर आप सिगरेट नहीं पीते तो 20 सिग्नर दिन का, जो लंग्स में 20 दिन में पीने के बराबर है। तो ये भी तपस्या है। बलिक जीवन में भी आज के मात्रा में अनेक प्रकार की तपस्याएं अनुभव करनी पड़ती है। पर यहाँ स्पष्ट कहा जाता है कि हमें तपस्या का पालन करना चाहिए। इसलिए भगवान की खुशी के लिए, आध्यात्मिक कार्यों के लिए। तो क्या है आध्यात्मिक कार्यों की तपस्या। भाग गीता में भगवान जी फिर पानी की तपस्या, वानी की तपस्या की चर्चा करते हैं। औरधेीत वाणी की तपस्या क्या है? वाणी की तपस्या है। वाणी द्वारा भगवान के राम का उचारण करना प्रेक्षिमहाने। जब पूछा कलियुग में कैसे होगा, लोगों का उधार शुगदेगुसवमने कहा, कल 2 सेनराज कृष्ण वाणी द्वारा हमें क्या करना चाहिए? क्या करना चाहिए भगवान के नामों का उचार, वाणी द्वारा भगवान के नामों का उचारण, कृष्ण कथा की कृष्ण कथा की चर्चा में बचना चाहिए। रूप में कहते हैं भगवान के जो दिव्य नाम हैं, चीनी जैसे मीठे हैं, भगवान की जो लीलाएँ हैं, वो भी अत्यंत मीठी है। भगवान के जो गुण हैं, वो भी अध्ययन मीठे हैं। असल में भगवान के नामों का मीटर मनसूस नहीं कर पाते। इसलिए थोड़ी देर जॉब करते हैं, थक जाते हैं। तो कारण क्या है? कैसे हैं अज्ञानता के कारण, अविद्या की बीमारी के कारण। पर अगर अगर हम वाणी द्वारा भगवान के नामों का उच्चारण करे तो ये अवधिया की बीमारी दूर हो जाएगी। और फिर से मीठा फल महसूस होने लगेगा। जैसे आज आप देखते हो। अंतर राज्य कृष्ण भावना संघ का प्रचार विश्व के हर कोयले में हो रहा है। और उन सान में यहाँ कभी किसी ने कृष्ण का नाम भी नहीं सुना था। यहाँ के लोग जुड़े हुए थे। अनेक गल कामों में, परिणाम के द्वारा हृदय शोध हो रहा है और नाम का मिलान महसूस हो रहा है। तो यह आप प्रैक्टिकली देख सकते हो। यह अभ्यास है। इसलिए चेतन आप लोगों ने कहा छे। 2 दरपन वहां जनम मंगवा ने हा पर हर नाम के उच्छलन का 1 लाभ है कि हिंदी में हल निकालती है। यहाँ हाँ ऋश्ादेवजी कह रहे है कि जो पशु जीवन में प्राप्त होती है, उसे हमें बचना है, उसे कैसे बचोगे। अगर हम वाणी के द्वारा भगवान के नामों का चालन करे। वाणी के द्वारा कृष्ण कथा में की चर्चा करें। ये है तपस्या क्यों? क्योंकि भौतिक वतन में हमारी आदत है कि हम जल इत्यादि कार्य करें। जब हमें यह कहा जाता है तपस्या की वजह भगवान के नामों का उच्चारण करो। वो 1 प्रकार की तपस्या होती है। पर हमें इसका पालन करना चाहिए। क्योंकि यह हमारे आध्यात्मिक लाभ के लिए आध्यात्मिक जीवन आरंभ होता है। इस कार्य के माध्यम से शो जब यहाँ ने पू ने अपने बेटे को गोद में बिठाकर, पूछा बताइए आज क्या सीखे बकी का ज्ञान दे? तो ये हैं तपस्या 1 और तपस्या है जीव की कि सत्य का उच्चारण करो। हमें कलयुग में आदत है। झूठ बोलने के लिए सत्य का उच्चारन करो तो वाणी द्वारा हमें भगवान के नाम का उच्चालनषकथाऔर, अध्यात्मिक विषय की चर्चा बढ़ानी चाहिए। अगर हम बनी द्वारा भगवान के नामों का उच्चारन करे तो इसका क्या लाभ होगा? हिंदी की मैल जो है दूर होगी और साथ में जैसे महा प्रबु ने कहा बोली बोले आपको, अध्यात्मिक आनंद मिलेगा योगी केवल बढ़ते जाएगा, बिशु देव। महाराज की शिक्षा में आप देखते हो की अगर आप की तपस्या का पालन करोगे तो उसके बदले में क्या मिलेगा? आध्यात्मिक शोक मिलेगा। कई बार लोग सोचते हैं आध्यात्मिक जीवन में बहुत सी तपस्या है, कुछ लाभ भी है। क्या? हाँ स् याद कहा गया है। अगर आप तपस्या का पालन करोगे, उसके बदले में आपको असली आनंद प्राप्त होगा। आज कल गंधक मैराथन चल रहा है। पूरे भारत में आप लोग मेरा हो, मेरा मन नहीं है। तो जब आप गंध वेतन करते, कई बार लोग पूछते हैं तुम्हें क्या मिलेगा? इसमें तुम्हे कुछ कमीशन मिल रही है। तो के मेसन की सेवा में जोड़ते हो तो क्या परिणाम अनुभव करते हो? कई जगह तो आपको साथ दिया जाता है। लोग कहते हैं ओ संत महात्मा आ गए। हमारे उद्धार करने के ले पर कई जगहों में कई साल से पूछा जाएगा क्या तुम्हें क्या मिल रहा है? तो कई बार कंफ्यूज हो जाते है। क्या बोले हमें क्या मिल रहा है? हमें खास कृपा प्राप्त होगी? तो जब चेतने महापु ने अपना प्रचार का आंदोलन आरंभ किया तो उन्होंने 1 दिन भगवान नीतिनंद्रहयिदाज को बुलाकर कहा घर घर जाओ और ये संदेश 2 क्या बोलो कृष्ण बाजू, कृष्णा को कृष्ण शिक्षक, कृष्ण का नाम लो, कृष्ण की उपासना करो और शिक्षक को अपनाओ। कृष्णा की शिक्षा कम प्राप्त होती है। वेद ग्रंथो में, आजकल भगवत गीता में, तो लोगों को ये कहो कृष्ण आपका प्राण है। कृष्णा, ये असली धन है। कृष्णा ही तुम्हारा असली जीवन है। ये कहो और माँ। आप लोगों ने कहा इसके इलावा और मुझे और कुछ मत कहो और आकर मुझे बताओ प्रचार का क्या परिणाम सार। जैसे आप देखते हैं इस काल में रोज सुबह हम ठाकुर जी को सुनाते हैं। पिछले दिन का प्रचार का परिणाम, यह महा आदेश के अनुसार है। माँ प्रभु ने आया। हा, ये केवल नहीं कहा, जाओ, प्रचार करो। यह भी कहा कि आकर मुझे सूचना 2 प्रचार का क्या परिणाम था? तो माँ प्रभु के आदेश के अनुसार निरतिंदनवहानास ने प्रचार का कार्य आरम्भ किया। और जब वो घर घर जा रहे थे, कई स्थानों में उनका बड़ा उत्साहित हार्दिक स्वागत किया। दोनों जाने थे संन्यासी के वस्त्रों में और भक्तों ने कहा आ गई संत महात्मा बोलिए क्या है? आपका। संदेश ने कहा संदेश क्या है? उन्होंने ठीक है, हम अवश्य ही कृष्णा का नाम लेंगे, उनकी उपासना करेंगे, उनकी शिक्षा का पालन करेंगे। यह कहा गया। और कई स्थानों में जैसे आप प्रचार में जाते हो और खास कर के जाते हो। और घर में कई उत्साहित भक्त कहते हैं बोलो कितनी पेटी गीता चाहिए, कई लोग 12 पेटियां ले लेते, आगे बढ़ निकले। पर कई साल में भगवान हरिदास ठाकुर गए। लोगों ने कहा ये निमाई तो पागल हो गया है। अभी इन प्रतिनिधि को भेजा है। हमें पागल बनाने के लिए जाओ जाओ जाओ। जब माँ प्रभु ने अपना सम के आंदोलन आरम्भ किया, जब देव में यही नहीं कि हर व्यक्ति ने साथ लिया, मुसलमानों ने तो विरोध किया, कहा कि अगर हम रोकेंगे नहीं, इसके निमायकसमकेाडोलर को सारे मुसलमान हिंदू बन जायेंगे। तो रोको जानकारी से कहा। और कई हिन्दू ने भी विरोध किया, खास कर के जिंदगी आमदन समाप्त हो गई थी। उन्होंने। हिंदू ने कहा निमाई शिक्षा दे रहा है या धर्म के अनुसार नहीं है। 1 मुसलमान था जो बार बार जाकर चान। का जी को कहता था रोको रोको निमायक आंदोलन को चान। काजी ने कहा कि तुम जब कहते हो रोको रोको रोको। पर जब भी मैं तुम्हें देखता हूँ रहा हूँ, तुम हरे कृष्णा बोल रहे हो। यह क्या कारण है? यह बात सच है। जब से मैंने ये नाम सुना है, ये हर नाम जी से निकला। ओके हिन्दू ने भी एमआई के आंदोलन का विरोध किया। शिकायत की के बनावटी धरम है, और कई घरो में हो गए। और लोगों ने देखते ही कहा, नहीं, तुम्हे हम अंदर नहीं आने। देंगे को, जब हमने प्रयास किया, शी वाज अगर में, तुम्हरे मंडली में उपस्थित होने के लिए हमें अंदर आने नहीं दिया। जब चेतन महा अपना समकृतिनअंडोनआरम किया था, तो शी वाज अंगन में यह कथन करते थे? 8 घंटे, 1 साथ, और केवल जो की उनके प्रसिद्ध भाग थे, उन्हें अंदर आने का अधिकार दूसरों को अंदर आने नहीं दे देते। कई घरों में गए, लोगों ने अपराध किया, लोगों ने कहा कि हमने प्रयास किया था तुम्हारे कार्यक्रम में उपस्थित होने के लिए, तुमने हमें अंदर आने नहीं नहीं दिया, हम तुम्हे अंदर आने नहीं देंगे। और कई लोगों ने। हा, ये तो सन्यासी के वेश में किसी डाकू के प्रतिनिधि हैं, आये हैं। देखे घर में क्या है? फिर बाद में आएंगे चोरी करने के लिए। तो ये परिणाम कैसे दिया जा रहा था। जब आप प्रचार के कार्य में जुड़े हो तो क्या अनुभव होता है? ध्यान से देखो। आज के वाटर में भी इसी प्रकार का परिणाम होता है। कई स्थानों में आप जाते हो, लोग बड़े उत्साह से आपका स्वागत करते हैं, कई स्थानों में जाते हो, लोग आपकी बस्ती भी करते हैं, कई स्थान में जाते हो। लोग कहते और कोई काम धंधा नहीं है। आज हमें दंग करने के लिए, तो ये है तपस्या या बाप भगवान के प्रचार के लिए परिश्रम करते हो। 1 प्रकार से देखा जाए ये कठिन सेवा है? सब सेवाओं में सबसे कठिन सेवा क्या है? यह बिचार की सेवा और कई बार भगत चिंता में होते हैं। आप में से कितने भक्त ग्रंथ के वेतन की सेवा करते हो? तो कई बार जब आप ग्रंथ के वेतन की सेवा में जाते हो, चिंता होती रहती है। क्या कोई ग्रंथ लेगा या नहीं लेगा। कई बार भक्त कहते हैं जब लोग गंध लेते हैं तो बड़ा उत्साह उत्साह बढ़ जाता है और जब नहीं लेते तो उत्साह घट जाता है। हम जब प्रचार में जाते हैं, ये उमीद नहीं रखनी चाहिए की हर व्यक्ति ग्रंथ लेगा। 1 समय 1 शिष्य ने पापाजी से कहा, जब हम ग्रंथों की सेवा करने जाते हैं तो चिंता बढ़ जाती है। ये चिंता रहती है। कोई ग्रंथ लेगा या नहीं लेगा लेगा या नहीं लेगा तो हमे किस प्रकार का व्यवहार रखना चाहिए? बाबाजी ने कहा कि ये चिंता यशोदा माता की चिंता के बराबर है। यशोदा माता को सदा क्या चिंता रहती थी। क्या फुल के सुख है कोई शेतानी, कोई गड़बड़ तो नहीं करने को। भगवान ने अपनी अलगू लीलाएँ प्रकट की। जब आपने देखा कि अनेक सूर आये थे, उनका वध करने के लिए, वह हमेशा उनकी सुरक्षा हुई, तो संवाद सदा चिंता में रहती थी कि मेरे बेटे को किसी प्रकार का नुकसान नहीं आ जाए, पानी नहीं आ जाए। तो पापा ने कहा कि ये जो चिंता रहती है, कोई ग्रंथ लेगा नहीं लगा। यह ध्यान चिंता है। और यह चिंता अच्छी चिंता है। ये 1 तपस्या है। यहां न। इस लोक में, हमें तपस्या करनी चाहिए किस लिए? आध्यात्मिक उन्नति के लिए, आध्यात्मिक कार्य के लिए, देवम, भगवान की खुशी के लिए। तो ये तो प्रचार की सेवा है। यह सेवा किस की खुशी के लिए है, भगवान की खुशी के लिए। आखिर जब हम इन ग्रंथो को बांटते हैं, तो इन ग्रंथो में है किस का संदेश। पर, हम भगवान के सुने। हम कहते हैं प्रापलबोकसप्रापल, बुक्स, प्रा। अगर आप ध्यान से देखो, प्रापा की किताबो में है क्या? कृष्ण भगवान भगवान। तो ये जो कार्य है, प्रचार का, ये सबसे महत्वपूर्ण कार्य है भगवान को प्रसन्न करने के लिए। और भगवान क्या कहते हैं? इस विषय में? भागवत गीता के अठारहवें अध्याय में, वो सबसे प्रिय है। उससे ज्यादा हुआ है, ना होगा। कई बार लोग पूछते हैं, आपकी संस्था में कोई शार्टकट नहीं है। ये है शॉर्ट। कट आप 4 की सेवा में है? और यह प्रचार की सेवा कठिन है? पर भगवान की खुशी के लिए। और हमारे आचार्यों ने इस सेवा पर अत्यंत बल दिया है। जैसे की हमारे परम गुरु, भक्ति, शीना। उन्होंने क्या कहा? प्रबल से अगर, भगवान, तुम्हें सुविधा दे, गंधों को प्रकाशित करना और वजन करना। उठाकर भक्त नो जी महान 4 थे, जिन्होंने शुद्ध भक्ति को ठीक रूप से स्थापित किया। चेतन महा शिक्षा गलत में आ गई थी, और ठाकुर भक्त जी ने फिर से उनकी स्थापना की। ठीक रूप से उन्होंने ग्रंथ लिखा था चेतन मा प्रभु के जीवन के ऊपर। उन्होंने विश्व के अनेक महाविद्यालय में भेजा, क्योंकि चेतीनेमहाब्रभुजी की भविष्य वाणी थी। क्या, पृथिवी ज्यादा ना दे। तो भगवान रिशवदेव अपने पुत्रों के माध्यम से हम सब को ये शिक्षा दे रहे हैं कि हमें पशियों के समान जीवन नहीं बिताना चाहिए। पर हमें इस जीवन का उपयोग करना चाहिए। भगवान की खुशी के लिए, आध्यात्मिक कार्य के लिए, तपस्या का पालन करना, तपस्या अनेक रूपों से पालन करना पड़ता है। 1 उदाहरण हमने देना जीप की वे मन की भी तपस्या है। मन की तपस्या क्या है? मन द्वारा, भगवान का चिंतन करो, भगवान का स्मरण करो, भगवान के शिक्षक का स्मरण करो, मन के द्वारा और पेले की तपस्या मन, बुधि का उपयोग करो भगवान की सेवा में। और अगर आप जानना चाहते हो इस तपस्या के बदले में। हमें क्या मिलेगा? आपको? असली सुख मिलेगा भौतिक कार्यों के द्वारा जो सुख प्राप्त होता है, असली है या नकली? प्रलाद माल भागवत हमें में कहते है न जानते कि असली सुख कैसे प्राप्त होगा। तो ये जो ज्ञान हमें प्राप्त हुआ है, ये ज्ञान हमे आगे दूसरों को भी बचाना है। यह नहीं कि हमें ज्ञान प्राप्त हो गया, अब हम और किसी को नहीं देंगे। ये जो प्रचार की सेवा है, यह सेवा है, जिसके द्वारा हम लोगों के ज्ञान को दूर ना चाहते हैं। अगर आज आप देख रहे हो के भक्तों की संख्या बढ़ी है, उसका 1 कारण यह है इन ग्रंथों का प्रभाव, इन ग्रंथों का वेतन। तो ये जो ग्रंथ के वेतन की सेवा है, खास कर के ये जो मैराथान करते हैं हमेश महीने, इसमें हम सब को जोड़ना चाहिए। अगर हम प्रयास करेंगे, भगवान हमें बुद्धि देंगे और हम प्रयास करेंगे। कुछ कमी भी होगी तो वो दूर हो जाएंगे। हमारे अनेक भक्त हैं जिन्होंने कमी जीवन में ये सेवा नहीं की। आज भारत में आप क्या देख रहे हो? बंदर के ब्रह्मचारी तो करते ही है सेवा। पर। हमारे जो गृहस्थ भक्त हैं, वो अपना समय का उपयोग करते हैं। इस पर जा के सेवा में जोड़ने के लिए जिन्होंने कभी सपना भी नहीं देखा था। घर घर जाएंगे। आज वो घर घर जा रहे हैं, गीता लेकर और कई जगह स्वागत होता है, कई जगह अपमान होता है, पर वह सेवा में जुड़े है। क्यों पापाजी की हार्दिक इच्छा थी कि इन ग्रंथों का वितरण हो। प्रापा जी ने क्या कहा, अगर तुम मुझे संतुष्ट करना चाहते हो तो क्या करना चाहिए? तो आप सब उत्साह से जुड़िए और अगर आप प्रयास करोगे तब वश की सफलता प्राप्त कर सकोगे। तो भगवान रिशवदेव कहते हैं कि अगर हम तपस्या करेंगे तो आनंद का जीवन प्राप्त करेंगे। और ये है असली आध्यात्मिक आनंद। तो जब हम आध्यात्मिक कार्य में जुड़ते हैं, फसल आनन अनुभव करते हैं। प्रॉपर जी उदाहरण देते थे गोस्वामियों का, वृंदावन के रूप और सनातन का 1 समय समाज में बहुत ऊंचा स्थान था। उदाहरण के लिए जब रूप गोस्वामी ने अपनी सरकारी नौकरी त्यागी तो उनके पास इतने सोने के सिक्के थे के पूरी नाव भर गई थी। पर वृंदावन में जब वो आये वो रहने थे, अलग अलग रिक्शों के नीचे और है नाम में जुड़े थे और बिल्कुल संतुष्ट। तो ये है नाम और भक्ति की विधि के माध्यम से असली संतुष्त प्राप्त कर सकते हो और भौतिक समाज में चाहे कितनी भी सुविधाएं हो सदा, हम क्या अनुभव करते हैं। निराश बेचैन, चिंता और अगर हम अध्यामिक मार्ग को अपनाये अति शुक प्राप्त कर सकेंगे। संक्षेप में रिशु देव भगवान की जो शिक्षा है, पूरे मानव समाज के लिए है। रिशु देव। महाराज ने कहा कि जो व्यक्ति इनदरचिपतेकेकार्य में जुड़ता है वो प्रमत मुर्ख व्यक्ति है। क्योंकि वो देख देख कर रहा है। यहाँ जो देय प्राप्त हो रहा है वो केवल कष्ट ही दे रहा है। और सास के विपरीत कार्य का क्या परिणाम है। फिर से भेज के वह कर्ष देगा तुझे बुदिमान व्यक्ति है। उसे इस शिक्षा का लाभ उठाना चाहिए। साधु संघ के माध्यम से धार्मिक जीवन के महत्व को हम पहचान पाते हैं और हमें साधु संघ में रहना चाहिए और भक्ति की विधियों का पालन करना चा। इसके दौरान असली, आनंद, अनुभव कर, सकोगे और प्रचार की जो सेवा है, यह केवल भाग्यशाली व्यक्तियों को दी जाती है। प्लीज सेवा में जुड़िये गंधक वेतन की सेवा में सहयोग दीजिये पढने में तो मात्र बनी है, जिसके द्वारा हम लोगों के जीवन को सुधार रहे हो। हाय, कृष्ण नारा बार आ रे।
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