तपस्या हरेक सफलता का मूल मंत्र || SB 5.5.1| ISKCON Vrindavan || Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja

Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja explains tapas (austerity) as the foundation of all success, drawing from Srimad Bhagavatam 5.5.1. Tapas includes chanting Krishna's names, mental discipline, and selfless service. He contrasts ancient peaceful kingdoms with today's world of smoking and excess, showing how nama-japa purifies the heart and brings divine grace.
Chapters
mega ganan swayam rupa gda shrikrishna, चेतन कृष्ण थोड़ा ऊपर, ऊपर, हाई, कृष्णा, स्लोक, आपने सुना। ये भागवत हमरा 1 बड़ा प्रसिद्द श्लोक है, जिसका उच्चारन करते हैं। भगवान विश्वदेव दी स्वयं भगवान है। आप किसका मोबाइल 5 स्कल में आप पढ़ते हो। मराज नावी, उनकी पत्नी मेरु देवी बड़े यज्ञ कर रहे थे। उनकी इच्छा थी भगवान जैसा 1 पुत्र प्राप्त हो की भगवान प्राप्त हो। पुस्तक के रूप में भगवान उनके यगैसेबड़ेप्रसन्न थे और भगवान ने अपने आप को प्रकट किया। भगवान ने कहा अगर, तुम्हें मेरे जैसा पुत्र चाहिए। यह सम्भव है। तुम्हारे जैसा कौन हो सकता है? मैं ही तुम्हारा पुत्र बन जाता हूँ। भगवान प्रकट हुए रिशवदेव के रूप में है। सबसे प्रसिद। तो भगवान ऋषभ देव के सौ पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़े बेटे का नाम क्या था और उनका शासन इतना सुन्दर था। समाज में कोई भी नागरिक किसी प्रकार का कैश नहीं अनुभव कर रहा था। जैसे आज भी आप राम राज्य का स्मरण करते हो। क्यूँ रामराज्य के समय समाज में किसी प्रकार का कैश नहीं था। तो रिशवदेव महाराज के शासन के समय में पूरी प्रजा अत्यंत सुखी थे। किसी प्रकार का कशीदा और मराज रिशवदेव 1 ब्रामणों की सभा में आये। यहाँ की उन्होंने अपने सौ पुत्रों को बड़ा महत्वपूर्ण सन्देश दिया। ये पुत्र के माध्यम से पूरे मानव समाज को शिक्षा दे रहे हैं। तो इस शिष्ट लोक में क्या कहा जा रहा है? कह रहे हैं ये मेरे पुत्र। मनुष्य जीवन प्राप्त हुआ है, उन्हें क्या करना चाहिए? इंडिया सिप्री से बच कर तपस्या का पालन करना चाहिए। अज्ञानता में हम इंडिया के कार्य में जुड़ते हैं। विधिक शास्त्र के द्वारा हमें शिक्षा मिलती है कि ये पशु का जीवन माना जाता है और मानव जीवन प्राप्त होता आरम्भ होता है। जब हम तपस्या का पालन करे और किस उद्देश्य के साथ और भगवान को प्रसिद्ध करने के लिए संतोष करने के लिए, तप देवी सा मां ने कहा तपस्या का पालन करो और अध्यात्मिक और तपस्या का पालन। भगवत प्राप्ति के लिए, तो ज्ञानता के कारण हम भोतेकार्योमें जुड़ते हैं। और जब हम आध्यात्मिक ज्ञान का अनुकूल करते हैं तो ये ज्ञान प्राप्त होता है कि तपस्या ही तपस्या का पालन करना चाहिए। अध्यात्मिक को लेश, वैसे देखा जाए, भौतिक समाज में रहना ये भी 1 भारी तपस्या है। उदाहरण के लिए भारत के शहरों में इतना पोलूशन है कि बड़ा भयंकर प्रणाम परिणाम होता है। स्केल पर आपके दिल ही शहर में अगर आप सिगरेट नहीं पीते तो 20 सिग्नल दिन का सर, लंग्स में, 20 सिग्नल दिन में पीने के बराबर है। तो यह भी तपस्या है। तो बालक जीवन में भी आज के वादन में अनेक प्रकार की तपस्याएं अनुभव करनी पड़ती है। पर यहाँ स्पष्ट कहा जाता है की हमें तपस्या का पालन करना चाहिए। इसलिए भगवान की खुशी के लिए, आध्यात्मिक कार्यों के लिए, तो क्या है? आध्यात्मिक कार्यों की तपस्या? भाग गीता है। भगवान जी की, पानी की तपस्या, वानी की तपस्या की चर्चा करते हैं। और की तपस्या, वानी की तपस्या क्या है? वाणी की तपस्या है, वाणी द्वारा भगवान के नामों का उचारण करना। परे महा ने जब पूछा कलियुग में कैसे होगा लोगों का उधार? दे गुम कलेदोसेराजनआजति का महान के कृष्ण वानी द्वारा हमें क्या करना चाहिए? क्या करना चाहिए भगवान के नामों का उचार, वाली द्वारा भगवान के नामों का उचारण, कृष्ण कथा की चर्चा, कृष्ण कथा की चर्चा से हमें बचना चाहिए। रूपमें कहते हैं भगवान के जो दिव्य नाम हैं, चीनी जैसे मीठे हैं, भगवान की जो लीलाएं हैं, वो भी अत्यंत मीठी है। भगवान के जो गुण हैं, वो भी अत्यंत मीठे है। पर असल में भगवान के नामो का मन इसलिए थोड़ी देर जॉब करते हैं, थक जाते है तो कारण क्या है? वो कहते हैं अज्ञानता के कारण, वा की बीमारी के कारण। पर अगर अगर हम वाणी द्वारा भगवान के नामों का उच्चारण करें तो यह विद्या की बीमारी दूर हो जाएगी। तो फिर से मीठा पर महसूस होने लगेगा। जैसे आज आप देखते हो। अंतरराज् कृष्ण भावना में संघ का प्रचार विश्व के हर कोदे में हो रहा है और उन स्थानों में यहां कभी किसी ने कृष्ण का नाम भी नहीं सुना था। यहाँ के लोग जुड़े हुए थे। अनेक गलकायो में, परिणाम के द्वारा ही दे शोध हो रहा है और नाम का मिलान महसूस हो रहा है। तो ये आप प्रैक्टिकली देख सकते हो। यह बिहार है, इसलिए चेत ने आप लोगों ने कहा 62 दरपन वहाँ नाम बाग में हर नाम के उच्छन का 1 लाभ है की हिंदी में हल निकालती है। यहाँ हाँ रिश् देव जी कह रहे हैं कि इन तीज की पशु जीवन में प्राप्त होती है, उससे हमें बचना है, उसे कैसे बचोगे। अगर हम वाणी के द्वारा भगवान के नामों का चालन करें। वाणी के द्वारा कृष्ण कथा में ये है तपस्या क्यों? क्योंकि भौतिक वतन में हमारी आदत है कि हम जल, पा, इत्यादि कार्य करे। जब हमें यह कहा जाता है तपस्या की बजाय भगवान के नामों का उच्चारण करो। वो 1 प्रकार की तपस्या होती है। पर हमें इसका पालन करना चाहिए। यह हमारे आध्यात्मिक लाभ के लिए है। आध्यात्मिक जीवन आरंभ होता है इस कार्य के माध्यम से। जब यहाँ शकुनें अपने बेटे को गोद में बिठा कर पूछा बताइए आज पाला क्या सीखे हो नदबकदीकाज्ञान? तो ये है तपस्या, कौर तपस्या है जीप की की सत्या का उच्चारन करो। हमें कलयुग में आदत है झूठ बोल देंगे, सत्या का उचारण कर तो वाणी द्वारा हमें भगवान के नाम का उचारण, कथा और अध्यातिक विषय की चर्चा बढ़ानी चाहिए। अगर हम वाणी द्वारा भगवान के नामों का उच्चारण करें। इसका क्या लाभ होगा? हृदय की मैल जो है दूर होगी। और साथ में जैसे महा। बू ने कहा आनंद मोदी बोला आपको, अध्यात्मिक आनंद मिलेगा लोग केवल बढ़ते जाएगा बृशुदेवमहाराज की शिक्षा में। आप देखते हो की अगर आप की तपस्या का पालन करोगे तो उसके बदले में क्या मिलेगा। आध्यात्मिक शो को मिलेगा। कई बार लोग सोचते हैं आध्यात्मिक जीवन में बहुत सी तपस्या है, कुछ लाभ भी है। क्या? हाँ यार कहा गया है। अगर आप तपस्या का पालन करोगे, उसके बदले में आपको असली आनंद प्राप्त होगा। आज कल रद्दों का मैराथन चल रहा है, पूरे भारत में मैदान कर रहे हो, मेरा करने है, मेरा नहीं है। तो जब आप गंध वेदन करते हो। कई बार लोग पूछते हैं तुम्हें क्या मिलेगा? इसमें तुम्हे कुछ कमीशन मिल रही है के हो वेतन की सेवा में जोड़ते हो तो क्या परिणाम अनुभव करते हो? कई जगह तो आपको साथ दिया जाता है। लोग कहते हैं ओ सद, महात्मा आ गए हमारे उद्धार करने के लिए, पर कई जगहों में कई साल से पूछा जाएगा क्या तुम्हें क्या मिल रहा है? तो भग कई बार कंफ्यूज हो जाते हैं। क्या बोले हमें क्या मिल रहा है? हमें खास कृपा प्राप्त होगी? तो जब चेतन मापने अपना प्रचार का आंदोलन आरम्भ किया तो उन्होंने 1 दिन भगवान नीतिनंद्रहायदाज को बुलाकर कहा घर घर जाओ और ये संदेश। 2 क्या बोलो कृष्ण, बाजू कृष्ण, कृष्णा शिक्षा, कृष्ण का नाम लो, कृष्ण की उपासना करो और शिक्षक को अपनाओ। कृष्ण की शिक्षा काम प्राप्त होती है। वेद ग्रंथों में हज कर के भगवत गीत बना। तो लोगों को ये कहो कृष्ण आपका प्राण है कृष्णा, ये असली धन है, कृष्णा ही तुम्हारा असली जीवन है। ये कहो और मा। प्रभु ने कहा इसके इलावा और मुझ और कुछ मत कहो और आकर मुझे बताओ प्रचार का क्या परिणाम था? जैसे आप देखते हैं इस काम में रोज सुबह हम ठाकुर जी को सुनाते हैं। पिछले दिन का प्रचार का परिणाम मा के आदेश के अनुसार है। हाँ प्रभु ने हिना से नित्य को कहा ये केवल नहीं कहा जाओ, प्रचार करो ये हा कि आकर मुझे सूचना 2 प्रचार का क्या परिणाम था? तो महाप्रभु के आदेश के अनुसार नित्य हरिदास ने प्रचार का कार्य आरम्भ किया। और जब वो घर घर जा रहे थे, कई स्थानों में उनका बड़ा उत्साहित हार्दिक स्वागत किया। दोनों जा रहे थे सन्यासी के वस्रों में। और भक्तों ने कहा आ गई संत महात्मा बोलिए क्या है आपका संदेश? तो उन्होने कहा संदेश क्या है? उन्होंने कहा ठीक है हम अवश्य ही कृष्णा का नाम लेंगे, उनकी उपासना करेंगे और उनकी शिक्षा का पालन करेंगे। हा गया। और कई स्थानों में जैसे प्रचार में जाते हो और खास कर के जब हम दफ्तरों में जाते हो और घरों में कई उत्साहित भगत कहते हैं बोलो कितनी पेडिया गीता चाहिए। कई लोग 12 पेटियां ले लेते है। आगे बढ ने के ले पर कई साल हमें भगवान हरिदास ठाकुर के लोगो ने कहा ये निमाई तो पागल हो गया है। अभी इन प्रतिनिधि को भेजा है। हमें पागल बनाने के लिए जाओ जाओ जाओ। जब माँ प्रभु ने अपना सब के दिन आंदोलन आरम्भ किया नामदेव में। यही नहीं कि हर व्यक्ति ने साथ लिया। मुसलमानों ने तो विरोध किया, कहा कि अगर हम रोकेंगे नहीं, इसके निमायक सम केदिन आंदोलन को सारे मुसलमान हिंदू बन जायेंगे। रोको जानकारी से कहा। और कई हिंदु ने भी विरोध किया। खास कर के जिंदगी आमदन समाप्त हो गई थी। उन्होंने। हिंदू ने कहा ये निमाई जो उसे शिक्षा दे रहा है। मैं धर्म के अनुसार नहीं है। 1 मुसलमान था जो बार बार जाकर चान, काजी को कहता था, रोको रोको निमाई के आंदोलन को चान। काजी ने कहा कि तुम जब आते हो, कहते है रोको रोको रोको। पर जब भी मैं तुम्हें देखता हूँ रहा हूँ, तुम हरे कृष्णा बोल रहे हो। यह क्या कारण है? यह बात सच है। जब से मैंने ये नाम सुना है, ये हर नाम निकलता नहीं। ओके हिन्दू ने भी हवाई के आंदोलन का विरोध किया, शिकायत की के बनावटी धरम है। और कई घरों में हो गये। और लोगों ने देखते ही कहा, नहीं, तुम्हे हम अंदर नहीं आने देंगे। जब हमने प्रयास किया शी वाज अंगन में, तुम्हारे कितन मली में उपस्थित होने के लिए हमें अंदर आने नहीं दिया। जब ेतिनमापुनेअपना सम अंडो आराम किया था, तो शी वाज अंगन में केतन करते थे। 8 घंटे, 1 साथ। और केवल जो कि उनके प्रसिद्ध भाग थे, उन्हें ही अंदर आने का अधिकार था। दूसरों को अंदर आने नहीं देते थे। कई घरों में गए, लोगों ने अपराध किया, लोगों ने कहा कि हमने प्रयास किया था तुम्हारे कार्यक्रम में उपस्थित होने के लिए, तुमने हमें अंदर आने नहीं नहीं दिया, हम तुम्हें अंदर आने नहीं देंगे। और कई घर में गए। लोगों ने कहा, ये तो सन्यासी के वेश में किसी डाकू के प्रतिनिधि हैं, आये हैं, देखे घर में क्या हैं, फिर बाद में आएंगे चोरी करने के लिए। तो यह परिणाम कैसे दिया जा रहा था नितिन? जब आप प्रचार के कार्य में जुड़े हो तो क्या अनुभव होता है? ध्यान से देखो। आज के वातल में भी इसी प्रकार का परिणाम होता है। कई स्थानों में आप जाते हो, लोग बड़े उत्साह से आपका स्वागत करते हैं, कई स्थानों में जाते हो, लोग आपकी बस्ती भी करते हैं, कई स्थानों में जाते हो, लोग कहते हैं और कोई काम धंधा नहीं है, आ जाते हो। हां, बार बार हमें दंग करने के लिए। तो ये है तपस्या। अब आप भगवान के प्रचार के लिए परिश्रम करते हो। 1 प्रकार से देखा जाए यह कठिन सेवा है? सब सेवाओं में सबसे कठिन सेवा क्या है? यह विचार की सेवा। और कई बार भगत चिंता में होते हैं। आप में से कितने भक्त ग्रंथों की वेतन की सेवा करते हो? तो कई बार जब आप ग्रंथों के वेतन की सेवा में जाते हो, चिंता होती रहती है। क्या कोई ग्रंथ लेगा या नहीं लेगा? कई बार भगत कहते हैं, जब लोग ग्रंथ लेते हैं तो बड़ा उत्साह उत्साह बढ़ जाता है और जब नहीं लेते तो उत्साह घट जाता है। हम जब प्रचार में जाते हैं, ये उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि हर व्यक्ति ग्राम रहेगा। 1 समय 1 शिष्य ने प्रभा जी से कहा, जब हम ग्रंथों की सेवा करने जाते हैं तो चिंता बढ़ जाती है। ये चिंता रहती है। कोई ग्रंथ लेगा या नहीं लेगा लेगा या नहीं लेगा तो हमे किस प्रकार का व्यवहार रखना चाहिए? बाबाजी ने कहा की ये चिंता यशोदा माता की चिंता के बराबर हैं, यशोदा माता को सदा क्या चिंता रहती थी। क्या पुरे सुख कोई सितानी, कोई तो नहीं करने का, जो भगवान ने अपनी अलगू लीलाएँ प्रकट की। जब आपने देखा कि अनेक असूर आये थे उनका बंद करने के लिए, वह हमेशा उनकी सुरक्षा हो, तो इसदंवादसदाचिंता में रहती थी की मेरे बेटे को किसी प्रकार का नुकसान नहीं आ जाए, पानी नहीं आ जा। तो पापा ने कहा कि ये जो चिंता रहती है, कोई गंध लेकर नहीं लगा, यह ध्यान चिंता है। ये जिंदा अच्छी जिंदा है। ये 1 तपस्या है यहाँ के लोक में, कि हमें तपस्या करनी चाहिए किस लिए? आध्यात्मिक उन्नति के लिए, आध्यात्मिक कार्य के लिए, देव भगवान की खुशी के लिए। यह तो प्रचार की सेवा है। सेवा। किस की खुशी के लिए है भगवान की खुशी। आखिर। जब हम इन ग्रंथों को बाँटते हैं, तो इन ग्रंथों में है किस का संदेश। पर हम भगवान को सुने। हम कहते हैं प्रापा बुक्स, प्राप, बुक्स, प्रा। अगर आप ध्यान से देखो, प्रापा की किताबों में है क्या? कृष्ण, भगवान श्री भगवान हो। तो ये जो कार्य है, प्रचार का, यह सबसे महत्वपूर्ण कार्य है भगवान को प्रसन्न करने के लिए। और भगवान क्या कहते हैं इस विषय में? भागवल गीता के अठारहवें अध्याय में, वो सबसे प्रिय है। उसे ज्यादा प्रिय लगा हुआ है, ना होगा। कई बार लोग पूछते हैं आपके संसार में कोई शोर्टकट नहीं है। ये है शार्ट और प्रचार की सेवा में जुडी है। और यह प्रचार की सेवा कठिन है? पर भगवान की खुशी के लिए। और हमारे अचारियों ने इस सेवा पर अत्यंत बल दिया है। जैसे कि हमारे परम गुरु भक्त सिधांदरजीउन्होंने क्या कहा? प्रबल से? अगर भगवान तुम्हें सुविधा दे, तो गंध को प्रकाशित करना और वजन करना। ठाकुर भक्तिनी महान थे, जिन्होंने शुद्ध भक्ति को ठीक रूप से स्थापित किया। चे तिन माहापाप की शिक्षा गलथहातोंमेंपआ गयी थी, और ठाकुर भक्त जी ने फिर से उनकी स्थापना की। ठीक रूप से उन्होंने ग्रंथ लिखा था। चेतिनेमहापभू के जीवन के ऊपर। उन्होंने विश्व के ने महाविद्यालय में भेजा क्यूँकी के तीर मा ब्रवुजीकीभविष्यवानी थी। क्या आज जाता? तो भगवान ऋिशवदेवअपने पुत्रों के माध्यम से हम सब को ये शिक्षा दे रहे हैं कि हमें पशु के समान जीवन नहीं बिताना चाहिए। पर हमें इस जीवन का उपयोग करना चाहिए। भगवान की खुशी के लिए, आध्यात्मिक कार्य के लिए, परिसय का पालन करना की तपस्या अनेक रूपों से पालन करना पड़ता है। 1 उदाहरण हमने देता जीत के वे मन की भी तपस्या है मन की। तपस्या क्या है? मन द्वारा, भगवान का चिंतन करो, भगवान का स्मरण करो, भगवान के शिक्षक का स्मरण करो मन के द्वारा। और वे देगी, तपस्या, मन, बुधि, इंदिया का उपयोग करो भगवान की सेवा में। और अगर आप जानना चाहते हो इस तपस्या के बदले में, हमें क्या मिलेगा? आपको? असली सुख मिलेगा। बहुत कार्यो के द्वारा, जो सुख प्राप्त होता है, असली है या नकली है? नकली लाल महल भाग मे कहते है न जाने की असली सुख कैसे प्राप्त होगा? तो ये जो ज्ञान हमें प्राप्त हुआ है, ये ज्ञान हमें आगे दूसरों को भी बचाना है। यह नहीं कि हमें ज्ञान प्राप्त हो गया। अब हम और किसी को नहीं देंगे। ये जो प्रचार की सेवा है, यह सेवा है, जिसके द्वारा हम लोगो के ज्ञान दा को दूर ना चाहते हैं। अगर आज आप देखते हो कि भक्तों की संख्या बढ़ी है, उसका 1 कारण, यह है इन ग्रंथों का प्रभाव, इन ग्रंथों का वेतन, तो ये जो ग्रंथ की वेतन की सेवा है, खास कर के ये जो मेन करते हैं, हम इस महीने, इसमें हम सब कुछ जोड़ना चाहिए। अगर हम प्रयास करेंगे, भगवान हमें बुद्धि देंगे। और अगर हम प्रयास करेंगे, कुछ कमी भी होगी तो दूर हो जायेगे। हमारे अनेक भक्त हैं जिन्होंने कमी जीवन में ये सेवा नहीं की थी। आज भारत में आप क्या देख रहे हो? बंदर के ब्रह्मचारी तो करते ही हैं सेवा। हमारे जो गृहस्थ भक्त हैं, वो अपना समय का उपयोग कर रहे हैं। इस पर जहाँ की सेवा में जोड़ने के लिए, जिन्होंने कभी सपना भी नहीं देखा था, घर घर जायेंगे। आज वो घर घर जा रहे हैं, गीता लेकर। और कई जगह स्वागत होता है, कई जगह अपमान होता है। और वह सेवा में जुड़े क्यूँ? क्योंकि प्रौपाजीकी हार्दिक इच्छा थी कि इन गंतोकािनहोराबाजी ने क्या कहा? अगर तुम मुझे संतोष करना चाहते हो तो क्या कहना, चाहे? तो आप सब उत्साह से जुड़ी है। और अगर आप प्रयास करोगे तो बच्चो की सबोता प्राप्त कर सकोगे। तो भगवान रिशवदेव कहते हैं कि अगर हम तपस्या करेंगे तो आनंद का जीवन प्राप्त करेंगे। और ये है असली आध्यात्मिक आनन, तो जब हम आध्यात्मिक कार्य में जुड़ते हैं, असली आनन अनुभव करते हैं। पापा जी उदाहरण देते थे गोस्वामी का, वृंदावन के रूप और सनातन का 1 समय समाज में बहुत ऊंचा स्थान था। उदाहरण के लिए जब रूपरगुस्वामी ने अपनी सरकारी नौकरी त्यागी को, उनके पास इतने सोने के सिक्के थे। 1 पूरी नाव भर गई थी, पर वृंदावन में जब वो आये, वो लेने थे, अलग अलग वृक्षों के नीचे और है नाम से जुड़े हए थे और बिल्कुल संतुष्ट। तो ये है नाम और भक्ति की विडियो के माध्यम से असली संतुष्टता प्राप्त कर सकते हो। और भौतिक समाज में चाहे कितनी भी सुविधाएं हो सदा, हम क्या अनुभव करते हैं, निराश बेचैन चिंता और अगर हम दीहार्दिक मार्ग को अपनाये और दि सुख प्राप्त कर सकेंगे तो संक्षेप में रिशवदेव। भगवान की जो शिक्षा है, पूरे मानव समाज के लिए है। रिशु देव महाराज ने कहा कि जो व्यक्ति इंदर तिप्ती के कार्य में जुड़ता है, वो प्रवता मुर्ख व्यक्ति है, क्योंकि वो देख देख कर रहा है। यहाँ जो देय प्राप्त हो रहा है, वह केवल कष्ट ही दे रहा है। और सास के विपरीत कार्य का क्या परिणाम है? फिर से भेज केवल कर्ज देगा। जो बुदिमान व्यक्ति है, उसे इस शिक्षा का लाभ उठाना चाहिए। साधु संघ के माध्यम से धात्मिक जीवन के महत्व को हम पहचान पाते हैं और हमें साली संग में रहना चाहिए और भक्ति की विधियों का पालन करना चाहिए। इसके द्वारा आप असली आनन अनुभव कर सकोगे और प्रचार की जो सेवा है, ये केवल भाग्य शाली व्यक्तियों को दी जाती है। प्लीज सेवा में जुड़िये वेतन की सेवा में सहयोग, दीजिये और निमित मात्र बनिए, जिसके द्वारा हम लोगों के जीवन को सुधार लो। हाय कृष्ण हाय kश्णhiिशनाकरिषण हारे हारे हारे हम हारे।
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