भगवान् के निकट जाने के लिए कैसे करे? | श्रील गोपाल कृष्ण गोस्वामी | SB 5.5.22 | मुंबई | 14 मई 1983

Shril Gopal Krishna Goswami explains that true knowledge means understanding the soul's eternal nature and its relationship with God, not just intellectual accumulation. All Vedic practices—study, sacrifice, charity, chanting—work only when aimed at pleasing the Lord. He uses stories of Dhruv Maharaj and Ravan to show how sincere devotion succeeds while selfish pursuit fails.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम नमो भगवते वासुदेवाय नम भगवते was divaya ga तेमर sa yahnanjanashalca cjurdmlitanana ras mai shri guravenamaha sri chetanya man vesta saptamenabutle स्वयं रूपा गदा माया ददाति श्वा पदतिक श्री गुरु श्री ता पदkmlamsregrn श्री रुपम सगजतमसहागनालगुन तन तन थम सजेवम सत तम सबधुतमपरिजना साइत कृष्ण चेतन्या देवम श्री राधा कृषण पदानसहागनाललिता श्री विषाखानवतमशा हे क्रृष्ण करना सिंधो धीना बंद जगपत गोपेश गोपिका कांता राधा मुस्त से रपताकंचुनागोरांधी राधे वृंदावनेश्वरी रिषबानुसूतदेवी namami hripijasrekrishna chetanya una श्रीयरेतगराद शिवा शरी गोल भक्त बिंदा हरकृष्ण।
तो इस अध्याय में नाराज मुनि जी ये बता रहे हैं कि ज्ञान की अन्य शखाएं जो हैं, उन्हें सदा भगवत सेवा में सलंगन होना चाहिए। और अगर भगवत सेवा में ये अनेक शाखाएं उपयोग नहीं की जाती, तो वे केवल व्यर्थ है, जैसे कि ज्ञान। ज्ञान का क्या उपयोग है? ज्ञान का उपयोग है कि हम यह समझे कि परमेश्वर के साथ हमारा क्या सम्बन्ध है, असली ज्ञान किसे कहते हैं? असली ज्ञान ही उस व्यक्ति को कहते हैं, जो कि यह स्वीकार करता है कि परम भगवान है, जो कि यह स्वीकार करता है कि प्रकृति भी भगवान के इशारे से चल रही है, जो कि यह स्वीकार करता है कि आत्मा सनातन है, और शरीर नाशवान है। और क्योंकि वो यह पहचानता है कि आत्मा सनातन है और शरीर नाशवान है, वो इस मानव जीवन का उपयोग करता है भगवत सेवा के लिए। तो जिस नारद मुनी जी कहते हैं कि जो पड़े लिखे व्यक्ति हैं, जो असली बुद्धिमान व्यक्ति हैं, उन्होंने यह निरूपण किया है कि ज्ञान जो है, उसका असली अर्थ है कि भगवान की सेवा या भक्ति योग के मार्ग में आना। और जब हम ज्ञान का हम उपयोग करते हैं, भगवान का विरोध करने के लिए, शास्त्र में के नियमों के विपरीत चलने के लिए, तो वो केवल व्यर्थ है। जैसा कि आजकल हम देखते है कि जो ज्ञानी लोग हैं, ये ज्ञानी लोग भगवान की परम स्थिति को नहीं मानते, ये सोच विचार करते है कि भगवान ही हरि प्रकृति, हरि की, उनके हाथ में है। पर हम देख सकते हैं कि ये जो वैदिक शास्त्रों का जो निचोड़ है, वो बिल्कुल सच है। अमेरिका के विज्ञानियों ने अभी यह पता लगाया है कि जो पेड़ हैं, वो भी 1 दूसरे से बात करते हैं। 5000 साल पहले भगवत गीता और श्रीमद भागवत में यह बताया गया है कि अनेक प्रकार की योनियां हैं, जिनमें थावर यूनी भी है, 30 लाख टावर यूनी उन्हें कहते हैं, जो कि हिल नहीं सकते, जैसे कि पेड हुआ, पत्ता हुआ, फूल हुआ। तो इतनी देर तक हम यह नहीं मान रहे थे कि पेड़ों में, पत्तों में ये आत्मा है, जीवन है। अभी अमेरिका के 2 बहुत बड़े विज्ञानियों ने 10 साल तक खोज की और 10 साल की खोज के बाद यह अनुभव किया है कि जो पेड़ है, वो भी 1 दुसरे से बात करते हैं, जबकि कीड़ी पेड़ को काटती है, कीड़ी पेड़ के अन्दर अपना घर बनाती है, तो पेड़ को दुःख तकलीफ पहुँचती है, तो वो 1 खास, हवा मग अपने शरीर से निकालते हैं। वो उसके द्वारा जो पड़ोस का पेड़ है उसको पता लग जाता है कि बाजी में वो कीड़ी पहुँच गई है, वो मेरे पास आने वाली है। जैसे की अगर आपको कुछ पता लगता है कि कोई चोर है, इलाके में चोर आ रहा है, तब पड़ोसी को भी कह देते हैं। वो संभल के दूसरे प्रकार, 1 पेड़ दूसरे ब्रिक्स को इशारे से कह देता है की संभल के भाव कीड़ियाँ आ रही है, और वो अगले अगले पेड़ को ये सन्देश दे देता है। तो जो विज्ञानी लोग हैं वो ये सिद्धांत को नहीं मानते, पर वो अपनी इंद्रियों के द्वारा हर चीज को खोजना चाहते है। जैसे की आज से लगभग 16 17 साल पहले, 1 कैनाडा के बहुत बड़े डॉक्टर हार्ट सर्जन थे, डॉक्टर बिज लो, उसने कहा था कि वह 32 साल से आदमियों को मरते हुए देख रहा है, और उसको पका विश्वास है कि आत्मा है हर व्यक्ति में, और ये भाव तो भागवत गीता में 5000 साल पहले दिया गया था की आत्मा है और आत्मा सनातन है। तो मुनि यहाँ ये बता रहे हैं कि जो सचमुच बुद्धिमान लोग हैं, उन्होंने यह निरूपण किया है कि जो ज्ञान है, ज्ञान का उपयोग होना चाहिए। परम भगवान को समझने के लिए। और परम भगवान का वर्णन चुने हुए शब्दों में उनके भक्तों ने किया है, चुने हुए शब्दों में उनका वर्णन किया है। फिर तपस्या तपस्या का भी अर्थ है की तपस्या उठानी चाहिए। परम भगवान की प्रसन्नता के लिए। अगर वो तपस्या से, परम भगवान से कुछ सम्बन्ध नहीं है, तो वो तपस्या उठाना बिल्कुल बेकार है। यहाँ स्पष्ट रूप से व्यास देव जी यह बता रहे हैं कि ये ज्ञानी लोग, बुद्धिमान लोगों ने यह निरूपण किया है की ज्ञान, तपस्या ये सब यज्ञ इन सब चीजों का उपयोग होना चाहिए। परम भगवान को समझने के लिए। तो तपस्या के द्वारा हम भगवान को समझ सकते हैं। ब्रह्मा जी भी ब्रह्म भगवत कहते हैं। परम ज्योति भगवत की परम भगवान को समझना सरल नहीं है। पर तपस्या के द्वारा आप भगवान को समझ सकोगे। पर जब हम तपस्या के रास्ते में आते हैं, जब माया बहुत तेजी से हमें खींचने की कोशिश करती है, जब आप आध्यात्मिक जीवन आरंभ करते हो, तो हमें यह सुनाया जाता है कि आपको ये पाप के कार्य से दूर रहना पड़ेगा। सुबह उठना पड़ेगा तो ये सब तपस्या है, क्यूंकि सुबह उतना सरल नहीं है? रोज साढ़े 3 बजे उठ के मंगल आरती में भगवान का स्वागत करने आना साढ़े 4 बजे सरल नहीं है, है भी और नही भी है। बम्बई में तो साढ़े 4 बजे मंगल आरती होती है, और विदेश में सर्दी के मौसम में भी सुबह 4 बजे आरती होती है। और हमें अनुभव होता है कि सुबह उठने में भक्तों को कई बार कठिनाई होती है। क्या माया कोशिश कर रही है? ये नहीं। भक्ति के मार्ग में आ जाते हो। तो माया आपको कहती है? ठीक है, अब हम आपको छोड़ेंगे नहीं आ गए हो। माया आपको आखिरी दम तक खींचने की कोशिश करती है। माया अनेक प्रकार के भावों को आपके मन में भेजती है और ये भाव हमें तपस्या से दूर ले जाते है जैसे की जब कभी कोई आदमी अगर डूब रहा हो समुन्दर में तो किनारे की तरफ आने की कोशिश करता है और जब वो किनारे में पहुंचने वाला होता है तो वहाँ पानी बहुत तेजी से चल रहा है, तो अगर वो व्यक्ति ठीक तैरना नहीं जानता तो तेज पानी के चलने से वो वापस पीछे फेंका जा सकता है और अगर वो अच्छी तरह तैरना जानता है तो हालांकि पानी किनारे की तरफ बहुत तेजी से आ रहा है वो पानी को पार कर पायेगा। तो उसी प्रकार जब हम वो किनारे में आते है। शास्त्रा भगवत में उदाहरण दिया गया है कि हम सब समुन्दर के बीच में डूब रहे हैं और क्योंकि हम सब समुन्दर के बीच में डूब रहे हैं, यह अवश्य है कि हम किनारे में पहुंचे किनारा है, 21 है तपस्या का किनारा, दूसरा है ज्ञान का किनारा, तो हम ये समुंदर के बीच में डोल रहे हैं। समुंदर की लहरें हमें 1 तरफ से दूसरी तरफ फेंक रही है और अगर हम अपने आप को डूबने से बचाना चाहते हैं तो हमें वो किनारे में आना है समुंदर के किनारे पर और समुंदर के किनारे का उद्धार किया गया है तपस्या और ज्ञान के साथ, तो भागवत में यह समझाया गया है कि जब हम तपस्या और ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश करते हैं, जब हम आध्यात्मिक तपस्या करने की कोशिश करते हैं तो माया बहुत तेजी से हमारी बुद्धि को खींचने की कोशिश करती है, बहुत तेजी से। माया पूरी कोशिश करती है कि अपनी सेना काम नहीं हुए। जैसे की अगर मंदिर को छोड़ कर कोई जाना चाहता है तो पूरी कोशिश करते है के लिए मंदिर छोड़ के नहीं जाए। हम तो खैर इस भावना से कोशिश करते हैं क्योंकि भक्ति के द्वारा ही व्यक्ति प्रसन्न हो सकता है, तो माया पूरी कोशिश करती है की उसकी उसकी सेना कम नहीं हो। इसके लिए जब माया देखती है की ये भक्त अभी तपस्या करना चाहता है भगवान के लिए, ये भक्त ज्ञान उत्पन कर रहा है जिसके द्वारा वह भगवान के निकल जाए तो वो और तेजी से उस पर हमला करती है और जब वही माया देखती है कि ये भक्त निश्चित भावना से भगवान की उपासना कर रहा है तो फिर वो पीछे हट जाती है और वो 1 दम पीछे नहीं हटते, बहुत समय के बाद पीछे हटती है। तो ये मत सोचो की अभी आपने आप भक्ति के रास्ते में आये हो, अभी हरे कृष्ण मंत्र लेना शुरू किया है तो माया आपको छुएगी नहीं, माया पूरी कोशिश करेगी अपना प्रभाव फैलाने के लिए और जब माया देखेगी की हम निश्चित भावना से भक्ति कर रहे हैं तो फिर यही माया पीछे हट जाएगी। हमने उस दिन ध्रुव महाराज जी का उदाहरण दिया था कि ध्रुव महाराज जी ने निश्चित भावना से भगवान की उपासना की, जब वो छोटे से थे, उनका अपमान हुआ था उनकी सौतेली माँ के द्वारा, और नारद मुनि जी ने उनकी परीक्षा लेने की कोशिश की। नारद मुनि जी ने कहा कि तुम ऐसे गुस्से क्यों हो रहे हो? तुम तो छोटे से बच्चे हो, 5 साल के बच्चे को को गंभीरता के साथ गुस्सा नहीं आना चाहिए। वो तुम्हारी सौतली माँ तुम्हारे से मखौल कर रही थी, तुम जंगल में मत जाओ तपस्या उठाने के लिए। पर महराज निश्चित थे कि वो अवश्य ही बंद में जायेंगे। पर भगवान की उपासना के लिए। तो मुनी जी अंत में खुश हुए। तो उसी प्रकार और परम भगवान प्रसन्न होते है। जब वो देखते हैं कि उनका भक्त निश्चित भावना से उनकी भक्ति करना चाहता है। तो तपस्या का अर्थ है कि भगवान की प्रसन्नता के लिए, गुरु की प्रसन्नता के लिए आप तपस्या उठाओ। तपस्या का अर्थ है कि कुछ कठिनाई उठाना लंबे, सफर के लाभ के लिए, तो सुबह मंगल, मंगल आरती के लिए उठना तपस्या है। क्लास में जा कर रहना तपस्या है, शोला माला करना, सावधानी के साथ तपस्या है। दिन भर भगवान की सेवा करना तपस्या है। क्यूँ क्यूँकि मन? क्योंकि माया मन के द्वारा, भौतिक मन के द्वारा ये सन्देश भेजती है की तुम जरा और सो जीत कहती है। चलो जरा जल्पा करो जरा, गप्पे मारो दूसरों से काम कहता है, चलो जरा सुनो भौतिक भौतिक आवाज को सुनो। तो इसी प्रकार ये जो भौतिक इंदिया है, वो संतुष्ट की प्रयास कर रही है। और जब हम नदियों को भक्ति भगवान की प्रसन्नता के लिए उपयोग नहीं करते तो यह समझा जाता कि व्यर्थ है। तो तपस्या का मतलब है कि कठिनाई उठाना पल भगवान की प्रसन्नता के लिए। तो इसी प्रकार का 1 और लोग भगवत में भी है। जहाँ कहा गया है वासुदेव परा वेदा की सारे, वेदिक ग्रंथों का सन्देश उद्देश्य है कि हम वासु देव को समझ पाये। और जब तक हम वापस वासुदेव को नहीं समझे, जब तक सब बेकार है। तो इसी विचार से इस लोक में भी नारा मुनी जी कहते हैं वेद ध्यान के जो लोग वेद पढ़ते हैं, उन्हें यह समझ जाना चाहिए कि वेदों का असली उद्देश्य क्या है? वे देश सर्वे है में वे सारे, वेदों से मैं हूँ। तो वे का असली उद्देश्य यह है कि हम इसके द्वारा परम भगवान के शरण में आए, इसके द्वारा हम भगवान के निकट आये। वैदिक शास्त्रों का यह उद्देश्य नहीं है कि आप पाप का कार्य करो, आप बीकर में कार्य करो या ऐसा कार्य करो जो कि हमें नरक मिल जाएगा। वैदिक ग्रंथ हमें साफ उद्देश्य देते हैं कि 1 प्रकार का कार्य करने से हम सड़क में जा सकते हैं, दूसरे प्रकार का कार्य करने से नरक में जा सकते हैं। चुनाव हमारा है, इच्छा हमारी है कि हम किस प्रकार से ये जीवन को निभाना चाहते हैं। अक्सर हम यह देखते हैं कि लोग वेद वेदों के निकट में जाते हैं। यह भावना से कि हम वेदों का उद्देश्य का उपयोग करेंगे। इन्दिय के लिए। जिस प्रकार 1 वकील कानून से खेलता है, वो कानून को पढ़ता है, और वो कानून को पढ़ता है, यह ढूंढने के लिए कि वो कानून में नुक्स कहाँ ढूंढ सकता है। उसी प्रकार बहुत से व्यक्ति वैदिक ग्रंथों को पढ़ते हैं। ये ये सोचने के लिए यह ढूंढते हैं कि वो वेदों में नुक्स किधर ढूंढ सकेंगे। तो असली असली उद्देश्य वेदों का है कि पनुन भगवान को समझना। वेद शास्त्र ये ज्ञान देते हैं कि परम भगवान और देवताओं में अंतर है। यही नहीं कि देवता और परम भगवान 1 समान है। यह देवता पास भगवान की उपासना में अंतर है। और वे यान यह भी सिखाता है कि समय जो है वो बड़ा कीमती चीज है, किमती वस्तु इस प्रकार के अगर आप समय के हो जाओगे। तो कितनी भी ध्यान से वो समय को आप वापस खरीदकर किसी स्थिति में ला नहीं सकते। तो वेदिक ग्रंथों को हमे पढ़ना चाहिए, वेद अध्ययन, वेदों का ध्यान करना चाहिए यह भावना से कि हम ज्ञान के द्वारा भगवान के जाएंगे। ये भावना ऐसी नहीं कि हम वेदों में कुछ कमी ढूंढेगे, उसके द्वारा हम इंदिया टिपणी कर सकेंगे। वो गलत उपयोग है वेदों का। आगे नरेंदर। मोदी जी कहते हैं यज्ञ यज्ञ करना है तो वो भी भगवान की प्रसन्नता के लिए करो। यज्ञ भावना से मत करो की आपको कुछ लाभ होगा। आर में। हाँ भावनाओं के साथ, परम भगवान की उपासना कर सकते हैं। या किसी की ध्रुव। महाराज जी ने। यह कामना उनकी इच्छा थी कि उन्हें 1 बहुत बड़ा राज्य प्राप्त हो, जो कि उनके दादाजी के राज्य से भी ज्यादा सुन्दर और ज्यादा बड़ा हो। तो ये भौतिक विचार लेकर वह परम भगवान के शरण में आए। पर क्योंकि उन्होंने श्रद्धा और भावना से उनकी उपासना की थी। अंत में उन्हें भगवान का दर्शन प्राप्त कर के इतना आनंद प्राप्त हुआ कि जब उन्हें अवसर प्राप्त हुआ 1 राज्य प्राप्त करने के लिए। उन्होंने कहा कि मुझे यह राज्य अभी नहीं चाहिए। मैं तो टूटा शीशा ढूंढ रहा था, अब मुझे हीरा प्राप्त हुआ है। तो ये जो भौतिक विचार है वो टूटी हुई शिष्य के समान है। भौतिक इच्छाओं की तुलना टूटी हुई शिष्य के साथ की जाती है। और जो भक्ति योग का जो माध्यम है, उसे हीरा के समान समझा जाता है। जैसे की आप सब और सनातन स्वामी और परस पत्थर की कथा जानते हो जो सबसे कीमती वस्तु है। यह हर 1 कृष्ण मंत्र सबसे कीमती वस्तु है। ये भक्ति योग मार्ग, कोई किसी प्रकार का भौतिक लाभ प्राप्त करना, वो सबसे कीमती वस्तु नहीं है। इसी इसी भावना से कृष्णनाथ कविराज कहते हैं। पूर्व श्रोता शिरोमणी प्रेम महा धना की सबसे बड़ा धन वो है जिसके द्वारा हम भगवान के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित कर सके, वो है। असली धन। तो यज्ञ करना चाहिए। इसी भावना से कि यह यज्ञ के द्वारा हम भगवान के निकट जा सकेंगे।
लोग।
तपस्या उठाते है भौतिक इच्छाओं को पूरी करने के लिए। जैसे की हिरानी काशीपुर हिरानी काशीपुर ने बहुत तपस्या उठाई, बहुत यज्ञकी के भावना से यज्ञ किए ये भावना से कि यज्ञ के द्वारा वो 7 वो अमर बन जाएगा। हिरानी काशीपुर ने इतना यग किया, वो सोच रहा था कि वो अमर बन जाएगा, उसे कोई मार नहीं सकेगा, उसकी मृत्यु कभी किसी स्थिति में नहीं होगी। रावन ने भी बड़े यग्य किए, ये भावना से की वो भी अमर बन जायेगा। और रावन ये सोच रहा था कि वो सीढ़ी पर ले जायेगा, जैसे मकान बनाते है। तो रावण ये सोच रहा था कि सीढ़ियों को बना देगा और वो सर में पहुंचेगा सीड़ियों के ऊपर चढ़ कर। जैसे विज्ञानी लोग कहते है कि अनेक लोग हैं, वहाँ हम पहुँच सकेंगे। ये स्पेस क्राफ्ट के द्वारा 1 प्रकार का हवाई जा, उसके द्वारा, वो सोचते हैं कि वो सड़क में पहुँच जायेंगे। जैसे रावन सोचा था कि वो सड़क में सीढ़ी बनाकर सीढ़ी के ऊपर चढ़ कर पहुँच जायेगा, उसी प्रकार आजकल विज्ञानी लोग सोचते है की हवाई जाद के द्वारा वो 16 तक पहुँच जायेंगे। वो बिल्कुल मूर्ख है। तो रावन हिरानी काशी को उन्होंने भी यज्ञ किया था, पर उन्होंने यज्ञ किया था ये भावना से कि उन्हें ये यज्ञ करने से कोई भौतिक लाभ प्राप्त होगा। तो जो भक्त है वो यज्ञ करता है। 1 ही विचार से ये जिंदगी ये शरीर ये है, उसका नहीं है, ये तो भगवान का है, और भगवान की सेवा में ही उपयोग हो सकता है। जैसे कि सनातन को स्वामी जी जब वृंदावन से निकले चेतना महा प्रभुजी को जगतपुरी में मिलने के लिए, तो रास्ते में वो जारखंड के बंद से गुजर के गए थे, जो झारखंड बंद से गुजरते हुए, उनको बहुत बीमारी पहुंच गई उनके शरीर में, तो जब वो जगत पुरी में मिले न पहुंचे, उन्होंने ये विचार किया था कि चेतन मा प्रभु जी के रथ के सामने वो आत्मा हत्या कर लेंगे। तो चेतन्य महाप्रभु जी को जब पता लगा की सनातन गोस्वामी आत्मा हत्या करने की सोच रहे हैं, तो उन्होंने कहा कि तुम ये जो शरीर है, यह तुम्हारा नहीं है, तुम सोच रहे हो कि यह शरीर तुम्हारा है, पर यह तुम्हारा नहीं है, यह शरीर मेरा है, तुम्हारे शरीर का उपयोग करना है। कृष्ण भावना का प्रचार करने के लिए, तुम्हें आत्मा हत्या करने का कोई अधिकार नहीं है। और फिर चेतना प्री, गले मिले और स्वामी जी के शरीर में जो रोग पहुंचा था, वो 1 दम गुम हो गया। तो इस उदाहरण के द्वारा हम यह समझ सकते हैं कि ये जो शरीर है, यह हमारा नहीं है। जब हम सोचते है की ये शरीर हमारा है, सोचते है की ये मन हमारा है, जब हम इंडिया के मार्ग में चलते है, जब हम सोचते है की ये शरीर और इन्दिया मन हमारा है। जब जो मन कहता है, वो ही हम करने की कोशिश करते हैं। और जब हम यह पहचान लेते है की यह शरीर हमारा नहीं है, ये मन हमारा नहीं है, यह बुद्धि हमारी नहीं है, यह भगवान की है। जब यह विचार आता है कि इसे हम भगवान के प्रचार में उपयोग करेंगे, भगवान की सेवा में उपयोग करेंगे, तो बड़े स्पष्ट रूप में चेत ने, महाप्रभु जी ने सनातन गोस्वामी जी को कहा था कि ये जो शरीर है, यह तुम्हारा नहीं है, ये शरीर मेरा है। ये शरीर लेने का तुम्हें कुछ हक नहीं है। तो जब हम इंडिया तृप्ति के मार्ग में चलते है तो उसे आत्म हत्या के बराबर ही समझा जाता है। इंडिया कृति का मार्ग है पीशा, झर पीने का मार्ग और भक्ति का मार्ग है अमृत पीने का मार्ग। तो आपको यहाँ ये भगवान ये सन्देश देते हैं कि हमें अमृत पीना चाहिए। और जब तक मार्ग बहुत इंदियों के बहुत कार्य से संतोष करने का प्रयास करते हैं तो उसे पीशा जहर पीने के बराबर समझा जाता है। तो यज्ञ करना चाहिए। हमें वो भी भगवान के लिए फिर मंत्र तथा दान आदि मंत्रों का जप करना चाहिए। वो भी भगवान को समझने के लिए अनेक प्रकार के मंत्र हैं वैदिक ग्रंथों में, पर वेदिक ग्रंथों में केवल हरे कृष्ण मंत्र का महा मंत्र बनाया गया है। तो हमे ये भावना से नहीं रखना चाहिए और हमें यह भावना ऐसी चाहिए इसके द्वारा हम भगवान को समझ सकेंगे पटना पुरान। और अनेक ग्रंथ में बताया गया है कि भगवान के नाम में और उनमें कुछ अंतर नहीं है। तो भक्त जो है वो भगवान का नाम लेते हैं क्योंकि ये भगवान का नाम लेने के द्वारा वो भगवान को संतुष्ट कर सकते हैं और उससे उनकी भी संतुष्टि होती है। भौतिकवादी व्यक्ति यह सोता है कि जब तक वो वो अपनी नदियों को पसंद नहीं करे, जब तक वो संतुष्ट नहीं होगा। और जो आध्यात्मिक वादी व्यक्ति है वो यह पहचानता है कि वो परम भगवान की संतुष्ट करके अपने शरीर को भी प्रसन्न कर सकता है। जैसे की जब आप पेट में खाना डालते हो तो आपके सारे शरीर अंगों में शक्ति आ जाती है। उसी प्रकार से ध जो है वो ये पाता है कि जो मंत्र है, ये जो भगवान के नाम है, ये उनका उपयोग होना चाहिए। भगवान को समझने के लिए, तो मंत्र का जो जप है वो इस भावना ऐसी होना चाहिए कि यह मंत्र के जप के द्वारा हम भगवान को समझ सकेंगे और धन धन भी होना चाहिए भगवान को समझने के लिए, परम भगवान को समझने के लिए लोग इतने मूर्ख हैं कि वो असली दान का अर्थ नहीं समझते। जैसे की जब हम प्रचार में जाते हैं लोग कहते हैं तो मंदिर क्यूँ बना रहे हो? भारत में कुछ कमी नही है, तुम हॉस्पिटल क्यूँ नहीं बनाते? तुम गरीबों को क्यों नहीं दान देते है की नहीं, तो वो हमें दान नहीं देते। और राज जी बता रहे है। दान का कर्तव्य है भगवान के दिव्य सेवा के लिए और भगवान की सेवा के लिए नहीं है तो वो भी व्यर्थ है। श्रम ही केवल हम क्यूँ अनेक प्रकार के दान हैं। इनका वर्णन श्रीमद भागवत में किया गया है। जैसे की अगर आप किसी साधारण, पाठशाला या हस्पताल के लिए दान 2 तो जितना दान दोगे अगले जीवन में उतना ही वापस मिलेगा समझो 10 रूपए दान दोगे तो अगले जीवन में भी 10 रूपए वापस मिलेगा समझो। आप ये दान कोई ब्राह्मण को 2 तो आपको अगली जिंदगी में सौ गुना ज्यादा मिलेगा 1 रूपए दोगे तो सौ रूपए प्राप्त होगा अगले जीवन में और अगर आप ये दान कोई वेद को दोगे वेदपलागाउसे कहते है की जिसने अपने पूरे जीवन का अर्पण किया है भगवान के नियमों के द्वारा, निभाने के लिए, जो तन मन धन से भगवान की सेवा कर रहा है, अगर आप ऐसे व्यक्ति वे, पराग को ध्यान 2 दान दोगे तो अगले जीवन में आपको हजार गुना ज्यादा मदद में मिलेगा तब किसी भी निगाह से देखो वो दान जो कि भगवान के चरणों में आता है उस की तुलना कोई नहीं कर सकता सबसे ज्यादा सूद मिलता है जैसे कि कोई धनी व्यक्ति है तो यह देखता है कौन सी कंपनी उसको ज्यादा सुध देगी तो जो कंपनी ज्यादा सूद देगी वो वहाँ पैसा लगता है तो यहाँ दान भी देना चाहे तो पास में दान देना है 2 और अगले जीवन में उतना ही सुध मिलेगा ग्रामीण को देना है तो सौ सौ टक्कर सूद मिलेगा और भगवान की सेवा के लिए दान देना है तो हजार टाका, सुर मिले इंटर को क्या टाका कहते है हजार टाका, सुर मिलेगा तभी चुनाव हमारा है और लोग इतने मुल्क है की वो 10 टका में दे देते है जबकि हजार टाका मिलने का असर है अभी क्या किया जाए तो असली दान जो है असली दान का अर्थ है कि जो कि परम भगवान की सेवा के लिए उपयोग किया जायेगा।
तो
ये अनेक शाखाएं का वर्णन ये श्लोक में दिया गया है यह बताने के लिए कि इन सब का बु विमान व्यक्तियों के अनुसार निरुपन होना चाहिए परम भगवान जो की दिव्य है उनकी प्रसन्नता के लिए और अगर उन भगवत सेवा में ये सब शाखा का संलंगन नहीं होता तो फिर वो बड़े दुःख की बात है। तो आज हम ये देखते है की जो ज्ञानी व्यक्ति हैं, जो धनी व्यक्ति हैं, जो वेदों को प बोल रहे हैं, जो यज्ञ कर रहे हैं, जो मंत्र का जप कर रहे हैं, वो सब भगवान की सेवा में इन चीजों का उपयोग नहीं कर रहे हैं तो वो है समाज की कमजोरी और हमें ये समझ जाना चाहिए कि नाराज मुनि जी इस लोक में क्या बता रहे हैं और उसी के अनुसार अपने जीवन को निभाना चाहिए।
हर 1 प्रश्न
गलगगमनगा।
More from PRASAD

Rare Pastimes & Timeless Lessons of Guru Mahārāja | Stories Every Disciple Should Hear

ISKCON Legends- pure devotees meet-HH Jayapataka Swami, HH Gopal Krishna Goswami, HH Radhanath Swami

Jagannātha Ratha-yātrā Through Śrīla Prabhupāda's Mercy | 29 April 2006 | Nairobi, Kenya

Lord Jagannātha's Appearance Pastime | 21.07.2019 | ISKCON Calgary | Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

The Ācārya Teaches by His Own ExampleGuṇḍicā Mārjana by Guru Mahārāja #shorts

Guṇḍicā Mārjana – Lord Jagannātha's Pastime | 21.7.2019 | ISKCON Calgary |Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

H.H. Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī Mahārāja - Exemplary Sādhana and Deity Worship # shorts

भगवान की कृपा कैसे प्राप्त होगी ? | 11 Jan 2014 | Punjabi Bagh | Srila Gopal Krishna Goswami

Material Education vs Spiritual Education | Srila Gopal Krishna Goswami #shorts

