सभी पापों से कैसे मुक्त हों? | SB 6.1.13-14 | 19 Jan 2024 | Juhu | Srila Gopal Krishna Goswami

In this devotional lecture, Srila Gopal Krishna Goswami explains how to attain liberation from all sins, drawing on Śrīmad‑Bhāgavatam 6.1‑13‑14. He outlines a systematic spiritual regimen that includes tapas (austerity), strict brahmacharya, complete control of the senses, and ethical conduct such as charity, truthfulness, cleanliness, and non‑violence. The discourse repeatedly emphasizes external purity—clean clothing, clean living spaces, and hygienic habits—as essential to inner purification. He warns against intoxicants, violence, and curses, urging respect for all beings and avoidance of disputes. Detailed chanting practice is prescribed: completing 16 rounds (mala) of japa before moving to higher levels, adhering to four foundational rules, and maintaining enthusiasm (utsaha) in devotion. Practical advice on daily habits—moderate eating, regulated sleep, yoga, and disciplined routine—is offered, along with guidance on overcoming mental obstacles like sleepiness and the ‘avijna’ (ignorance) disease through focused chanting. The teacher stresses unwavering faith in scriptural teachings (Gita, Bhagavatam) and clarifies that no karma is free; all actions bear consequences. Audience questions address applying these principles in modern life, including handling distractions, maintaining interest, and integrating devotion with daily responsibilities. The lecture also touches on historical references to British colonial influence on Sanskrit scholarship, illustrating the need to discern myth from authentic teachings.
Chapters
नल तपसा ब्रह्म चर्य णाम शम नाच दमेनचमयागनशौचभ्या यमेननियमेनवादेहवा बुद्ध जंधीरा धरमगनाश्रद्धयan with sिपंत्यघममहdपiवेणु गुलमaमिबaनलहप
चाय का कोई भक्त पढ़ना चाहते हैं तो पढ़ते a
de
मार
पेहिवालामनबनाई चा चा
ा
हार
da शबद
तपसा, तपस्या या भौतिक भोग की सुरक्षा
से,
तिरस्कार द्वारा ब्रह्म चरण, ब्रह्मचर्य द्वारा शमेन मन को वश में करने से
6
तथा डमेन इंद्रियों को पूरी तरह वश में करने से 6 भी त्यागना स्वेक्षा से उत्तम कार्यों के लिए दान देने से, सत्य, सत्यता से शौच प्याम तथा अपने आप को भीतर बाहर से स्वच्छ रखने के विधानों का पालन करने से, जमेना शाप देने तथा अहिंसा से बचने
से
नियमेनाभगवान के नाम का नियमित कीर्तन करने से, वह तथा देहवा, बुद्धिजम, शरीर, वाणी तथा बुद्धि के द्वारा संपन्न धीरा धीर लोग धर्मज्ञा, धार्मिक सिद्धांतों के ज्ञान
से पूरित,
श्रद्धयान्विता श्रद्धा से युक्त शिपंतिनष्ट करते हैं। अगम सभी प्रकार के पापकर्मों को महदपियद्यपि, अदि, महन तथा निंदनिय वेणुगुलमम बांस के वृक्ष के नीचे कि सुखी लतर। एव सदृश्य, अनल, अग्नि, अनुवाद, ताता प्रेस शील प्रॉपर जी द्वारा मन को एकाग्र करने के लिए मनुष्य को ब्रह्मचर्य जीवन बिताना चाहिए और अध पतित नहीं होना चाहिए। उसे इन्द्रीय भोग क को स्वेच्छा से त्यागने की तपस्या करनी चाहिए। तब उसके मन तथा इंद्रियों को वश में करना चाहिए, दान देना चाहिए, सत्यवति, स्वच्छ तथा अहिंसक होना चाहिए, विधि विधानों का पालन करना चाहिए और नियमपूर्वक भगवान नाम का कीर्तन करना चाहिए। इस तरह धार्मिक सिद्धांत जानने वाला धीर तथा श्रद्धावान व्यक्ति अपने शरीर, वचन तथा मन से किए गए सारे पापों से स्थायी रूप से शुद्ध हो जाता है। ये पाप बांस के पेड़ के नीचे की लहरों, नीचे की लतरों की सूखी पत्तियों के समान है, जिन्हें अग्नि द्वारा जलाया जा सकता है, यद्यपि उनकी जड़े अवसर पाते ही फिर से उगने के लिए शेष बची रहती है। तात्पर्य स्मृति शास्त्र में तपह की व्याख्या इस प्रकार हुई है मनश्चेइंद्रियाणाम 61 ग्राम परम, तप, अवसर, मन तथा इन्द्रियों का पूर्ण नियंत्रण तथा 1 ही प्रकार के कार्य में उनकी पूर्ण एकाग्रता तप कहलाती है। हमारा कृष्णभावना अमृत आंदोलन लोगों यह शिक्षा देता है कि मन को भक्ति पर किस तरह एकाग्र करना चाहिए। यह उच्च कोटि का तप है। ब्रह्मचर्य के 8 पक्ष होते हैं। मनुष्य को न तो स्त्रियों के बारे में सोचना चाहिए, न यौन जीवन की चर्चा करनी चाहिए, न स्त्रियों के साथ क्रीडा करनी चाहिए, न स्त्रियों की ओर कामुक होकर देखना चाहिए, न उसे न उनसे घनिष्ठापूर्वक बातें करनी चाहिए, न संभव में रत होने का निर्णय लेना चाहिए, न ही यौन जीवन के लिए कभी प्रयास करना चाहिए। मनुष्यों को स्त्रियों के बारे में सोचना या उनकी ओर ताकना तक नहीं चाहिए। बातें करना तो दूर रहा। इसे ही उच्च कोटि का ब्रह्मचर्य कहते हैं। यदि कोई ब्रह्मचारी या संन्यासी एकांत में किसी स्त्री से बातें करता है तो वह स्वाभाविक है, कि बिना किसी के जाने ही यौन जीवन की संभावना बनी रहती है। इसलिए पूर्ण ब्रह्मचारी इसके विपरीत अभ्यास करता है। यदि वह पूर्ण ब्रह्मचारी है तो वह बहुत आसानी से मन तथा इंद्रियों को वश में कर सकता है, दान दे सकता है, सत्य बोल सकता है आदि आदि। किन्तु प्रारंभ में उसे जीप तथा खाने पर नियंत्रण करना होगा। भक्ति मार्ग में मनुष्य को सर्वप्रथम जीव को नियंत्रित करके दृढ़ता पूर्वक विधि विधानों का पालन करना चाहिए सेवन मुख्य ही जीवा 2 स्वयम वस्पुरतयादव जीव को वर्ष में किया जा सकता है। यदि मनुष्य हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन करे, कृष्ण से संबंध विषयों के अतिरिक्त अन्य किसी विषय पर न बोलें तथा ऐसी किसी वस्तु का आस्वादन न करे, जो कृष्ण को अर्पित न की गई हो, यदि वह इस तरह जीप को वश में कर सकता है तो ब्रह्मचर्य तथा अन्य शुद्ध करने वाली प्रक्रियाएं स्वत ही पीछे पीछे चलेंगी। अगले श्लोक में बताया जाएगा कि भक्ति का मार्ग परमपूर्ण है। अत यह कर्म मार्ग तथा ज्ञान मार्ग से श्रेष्ठतर है। वेदों में उदाहरण देते हुए श्रिलवीरराघव आचार्य बतलाते हैं कि जितनी पूर्णता से संभावित हो, व्रत रखना तपस्या में सम्मिलित हो जाता है। श्रिलरुपगोस्वामी ने भी अत्यहार अर्थात अधिक भोजन करने को आध्यात्मिक जीवन की प्रगति में बाधक बतलाया है। यही नहीं, भगवत गीता में कृष्ण कहते हैं युक्त हार बिहार संयुक्त चेष्टसकर्मसुयुक्त। स्वप्नवबौधस्य।
योग भवति।
जो खाने, सोने, मनोरंजन तथा काम करने की आदतों में नियमित रहता है, वह योगा अभ्यास द्वारा समस्त भौतिक लेशों को कम कर सक। श्लोक 14 में धीर शब्द अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसका अर्थ है जो सभी परिस्थितियों में अविचलित रहे। भगवत गीता में कृष्ण अर्जुन को बताते हैं मात्र, स्परशसुकंतशितोषण, सुख, दुख, दहा, आगाम, पाइन, नित्य्ता, तितिकशस्वभारत, हेगुंतीपुत्र सुख तथा दुख का शणिकउदय तथा कालक्रम में उनका अंतर्धान होना सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के आने जाने के समान है। हे भरतवंशी। वे इंद्रिय बोध से उत्पन होते हैं और मनुष्यों को चाहिए कि अविचल भाव से उनको सहन करना सीखें। भौतिक जगत में अनेक उलझनें आती हैं। आध्यात्मिक, आधिदैविक आदि। भौतिक। जिस व्यक्ति ने सभी परिस्थितियों में इन संकटों को सहन करना सीख लिया है, वह धीर कहलाता है?
हम गया
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रegseepi hagia to bola so be e पूछा था पूरे पुरसवानी से कि किस प्रकार हम पाप का बस है, हम पाप का करते हैं। पावर ह भोर जल्दी कर लेते है। पेशवा ने कहा कि जैसे 1 आदि आदि में लय करता है और साफ होता है। जैसे ठीक होता है, बाहर बाहर हे तालाब से फिर से मिट्टी में गंदा हो जाता। ऐसी 2 कि हम पाप के तो स्वामी ने आज का वर्णन किया लो में, पर उन्होंने ये साबित किया था कि भक्ति भक्ति। आवाज तो इन लोगों में ध्यान जीवन में कैसे सरलता प्राप्त कर सफलता प्राप्त कर सकते हो। भालन साल में बजरी का क्या व्यवहार होना चाहिए, क्या व्यवहार होना चाहिए? तो इन लोकों में जाने कैसा व्यवहार होना चाहिए। तो यहां लोग े सबसे पहले प्रमुचरीमेंये भाव होना चाहिए। कि हमें तपस्या कर रहा है। तपस्या शब का उपयोग शासन में अनेक खाने में किया जाता है। उदाहरण के लिए जब अपने को शिक्षा दे रहे थे, आपको क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए? उन्होंने क्या कहा? सो सब तपस्या करो किसके लिए वाले जीवन में रहते हो। यह भी 1 प्रकार की तरस है। आज के वास और वो कहते है समस्या आएगी खुशी के लिए, तो अगर आपको हर दिल जीवन चाहिए चाहे आप किसी भी आशा में हो में बार बार उसका वर्णन किया जाता है जाता
है
an ho के भगवान कहते है और गया है। वानी की तपस्या सबसे महत्वपूर्ण है वानी की समस्या मतलब है वाणी का उपयोग करना
हे हु
वाणी का उपयोग करना कि वनिका उपयोग करना वन के नामों का हो। ani ani पेड और तीनों स्ट्रेट लाइन में है हमारा है। जैसे आप इस व्यक्ति को सुझाते हो, एनो के साथ हा अन्हामिकजीमको सुझाते हो। तपस्या के द्वारा तपस्या करने से हम डरते है, डरते है कि कि हम सोते हैं, हम दुखी हो जायेंगे, हमें सुख नहीं मिलेगा। आप तपस्या करो गान की खुशी के, फिर उठाओगे भगवान का तुम, तपस्या करो भगवान की खुशी के लिए से क्या मिलेगा सम आनंद जो कि केवल बढ़ता जाएगा पीछे सुनाई दे रहा है। तो वन को कहते हैं कि अगर तुम हाल करोगे। a a, a sl, s, s, m sok वा शिक्षा का पालन करते हो तो उसके द्वारा और जीवन में कुछ
भी
आप नहीं कर सकते हैं। अन्य में भी जीवन में कुछ काम करोगे। तो a a, a sa kin श्री की तपस्या है उपयोग करो के सेवा। तो क्या to
आगे
है, उसमें सबसे ज्यादा सुविधा है आपकी कोई चिंता नहीं, केवल ये भाव रहता है। यह सेवा सेवा से जुड़े रहे। हमें थोड़े नियमो का पालन में नियम कहा गया है। senate go wash wish you be to
देना इंद्रियों को वश में लाना तो इंडियन कैसे? इंद्रियों को वश में हम कैसे ला सकते हैं?
बहुत कठिन है हम इंडिया को वश में,
आप कहोगे कि ये तो बहुत
कठिन है, हम इंद्रियों को वश में नहीं ला सकते, प्रयास।
तो
आप प्रयास करोगे। तो आप ला सकते हैं।
जैसे उदार है कि भगवान की सेवा मे।
जैसे कि शास्त्रों में उदाहरण है कि आप इंद्रियों का प्रयोग कर सकते हो भगवान की सेवा में। उदाहरण के लिए अम्बरीश महाराज का नाम
है
आप इंद्रियों का जो उपयोग करो भगवान का चिंतन करने में, मन का
चिंतन करने अनेक साधन है।
भगवान का चिंतन करने के अनेक साधन हैं।
क्या करना चाहिए,
क्या करना चाहिए? हमें भगवान का चिंतन।
तो मन जो है, अब शत्रु भी
है, मन जो है, हमारा मित्र भी है और मित्र भी है।
शत्रु कब कहलाता है?
शत्रु? कब कहलाता है?
जब हम भक्ति के रोज, जब आप
भक्ति के विरोध विचार रखते हैं, प्रतिकूल
का यह जिसका वर्णन शास्त्र में है,
प्रतिकूल विचार रखते हैं, जिसका वर्णन शास्त्रों
में है,
समझाते हैं, क्या अनुकूल है, क्या प्रतिकूल है?
रुप, गो, स्वामी, उपदेश, अमृत में समझाते हैं। क्या अनुकूल है, क्या प्रतिकूल है?
और शासन में आम धारण देखते हो। पशु किस प्रकार सामना करते करते है?
आप सर आप उदाहरण देखते हो कि पशु जो है, वो जो है, कैसे
मृत्यु का सामना करता है, अरे पुसंगापदंगाजो
है, वो अपने देश को संतुषकरनाचाहता है, वो देखता है कि की चमक ही वहाँ पहुँच जाता है।
जैसे उदाहरण पर पतंगा है जो अपने नेत्रों को संतुष्ट करना चाहता है। कोई भी चमकती हुई वस्तु को देख के उसके पास जाना चाहता है, उसके
पास है, जल जाता है।
जब वह उसके पास जाता है तो जल के मर जाता है।
मछली मछली को लोग कैसे पकड़ते हैं?
मछली को लोग कैसे पकड़ते हैं?
कैसे कोई आय का दाना डाल खाया जाता है, जाल में फस जाता है।
मछली को खाना दे के हम फंसाते हैं, लोग फसाते हैं। जैसे हम उसको खाना देते हैं तो खाने के लोभ में आके वो जाल में फंस जाता है।
हिरन हिरन, हिरन को वश में लाना बहुत मुश्किल है, बहुत तेजी से भागता है।
हिरन को वश में लाना बहुत मुश्किल है। क्योंकि वह बहुत तेजी से भागता है।
पर 1 धुन है,
पर 1 धुन है जिससे वो आकर्षित हो जाता है
और धुन बजाता है, भाग बन कर देता है और खोजता है। यह धुन गाने से आ रही है।
और शिकारी जब वह धुन बजाता है तो हिरन खोजत उसको कि यह धुन कहाँ से आ रही है। इस प्रकार वह
हाथी हाथी,
हाथी को कंट्रोल करना बहुत मुश्किल है।
तो शिकारी क्या करते हैं? शिकारी क्या कर?
शिकारी क्या करते हैं, खड्ढा खोजते हैं, खड्डा खोजते हैं।
जिसके ऊपर घात होता है, जिसके ऊपर नीचे और खाने जाता है।
और ज्यादा जान है हाथी, केले वो
खड्डा खोजते हैं और उसको घास से ढक देते हैं। जब हाथी उधर जाता है खाने के ले तो वो फंस जाता है।
उस खड्ढे में अभी 1 फूल जू से फूल में जाती है।
गंध की खोज में भवरा जो है
वो 1 फूल से दूसरे फूल में जाता है।
सुगंध की खोज में
कमल के फूल में बैठा है।
और जब वह कमल के फूल में बैठता है तो उसको लगता है कि यह मेरा सुख है। और इस प्रकार वो अपने शरीर को त्याग देता है। जब कमल का पुल बंद हो जाता है।
ये उदाहरण भागवतम में है।
ये उदाहरण भागवतम् है।
भागवतम में कहा गया है पशु जो है उनका प्यास रहता है। 1 इंद्री है वो संतोष करना।
भागवतम में कहा गया है जो पशु हैं वो उनका प्रयास रहता है। कि अपनी 1 इंद्रियों को संतुष्ट करना
मनुष्य है, वो सारे 1 साथ संतुष्ट करना चाहा है।
पर जो मनुष्य है वो 1 साथ सारी इंद्रियों को संतुष्ट करना चाहता है।
गली चीजों को देख रहा, वही से भौतिक चर्चा करना, कान से चर्चा सुनना। इसलिए मनुषी सावधानी से हमें बिठाना चाहिए। माल
मनुष्य जो है आंखों से भौतिक चीजें देखना चाहता है, कानून से भौतिक चीजें सुनना चाहता है, नाक से भौतिक चीजें सुनना चाहता है। इस प्रकार मनुष्य जो है वो हर जगह फंस सकता है। इसलिए उससे ज्यादा सावधानी से रहना चाहिए।
आगे कैसे यागेना्यागेना आगे ना
त्यागे, ना
खुद, खुद त्याग से हो। योगी प्रतिकूल
जो त्याग त्यागने का मतलब है, हमें वो चीज त्यागना है, जो भक्ति के प्रतिकूल है।
इस प्रकार साधारण जीवन में आप किसी को त्यागते हो, जो आपके स्वास्थ के लिए ठीक नहीं है।
वो जैसे साधारण जीवन में हम कुछ त्यागते हैं। जो हमारे स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं
है, उसे आगे स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। आप उसे स्वीकार कर दे।
और जो स्वास्थ्य के लिये अच्छा है, हम उसे स्वीकार करते हैं।
सच बात है, सही बात है, उसी प्रकार है।
स्वामी हमें शिक्षा देते हैं। क्या अनुकूल है, क्या उसी प्रकार रूप
को स्वामी हमें शिक्षा देते हैं। क्या प्रतिकूल है, क्या अनुकूल है, क्या?
कहना आपका आकर्षण है? किसी
भौतिक विषय से, आपका आकर्षण हैं किसी भौतिक विषय में, और आप देखते
हो कि ये भक्ति है।
और आप देखते हो कि अगर वो भक्ति के प्रतिकूल हैं, त से त्याग देना चाहिए।
रूपक रूपक में कहते हैं रूप गोसवामी, महान संध है। जिन्होंने अनेक गंथ दिए, हमें रुप को
स्वामी, महान संत हैं, जिन्होंने अनेक ग्रंथ दिए हैं। वो कहते हैं
न जाये। दोनों भाई रूपा 1 मुसलमान राज्य के राज्य का शासन कर रहे थे।
चेतन माह प्रभु ने दोनों भाइयों को रूप और सनातन को वृंदावन भेजा। उसके पहले वे दोनों 1 मुसलमान राजा के शासन में सेवा करते थे।
तुम भक्ति है मदिर गंधों की रचना का।
रूप गोस्वामी से चेतन। महाप्रभु ने कहा कि तुम भक्ति संबंधी शास्त्रों का रचना करना और
मनों का
निर्माण और मंदिरों का निर्माण और जिस वन लिया, स्थान ढूंढना और भगवान की
जो लीला स्थली हैं, उनको ढूंढना।
आप जैसे आज में जाते हो, आपको के
आप ब्रज में जाते हो। तो आप सब को पता है कि कौन सी लीला भगवान की कहा पर हुई है।
गोस्वामी में, मैंने खोज कर इसे साबित किया और
किया, लेकिन वो सब स्थान जो है वो चैतनमहाप्रोवके आदेश पर गोस्वामी ने सब ढूंढ कर निकाला।
कहते हैं हे में में चाहे किसी भी कीमत भरने पड़े भरो, पर कृष्ण भक्ति को स्वीकार करो रुको।
स्वामी। कहते हैं मेरे प्रिय मित्र, तुमको जो भी कीमत भरनी पड़े भरो। लेकिन कृष्ण भक्ति को स्वीकार करो।
बल के शरीर का किसी महस्वपूर्ण अंग में बीमारी आ जाती है।
कभी हमारे शरीर के अंग में बीमारी आ जाती है।
है उसके इलाज के लिए कुछ भी
करने को तैयार हो, उसके इलाज के
लिए हम कुछ भी करने को तैयार हैं।
तो हमें ये सोच है। कृष्ण भक्ति में बड़ी कठिनाई से प्राप्त हुई है।
तो ये समझना चाहिए। कृष्ण भक्ति हमें बड़ी कठिनाई से प्राप्त
हुई है और हमें त्यागना चाहिए और हमें त्यागना चाहिए। जो के प्रतिकूल है, जो भक्ति में प्रतिकूल है।
सत्य
सत्य,
सचाई का उचारण
सत्य, मतलब
सच्चाई का पालन करना।
सबसे पहला सत्य है कि भगवान के संदेश को आप स्वीकार करो।
यथा रूप सबसे पहला सत्य है।
भगवान के संदेश को आप स्वीकार करो। यथा रूप।
पापाजी ने क्यों भी लगाओ का किया।
यथा रूप के नाम पर प्रपा जी
ने क्यों गीता को प्रकाशित किया।
यथा रूप के नाम पर ी पापाजी
भूमिका में समझाते हैं कि ये गीता का उपदेश दिया जा रहा है। भावना से बवाना लिया या रबर जी
समझाते हैं कि यह गीता का जो भाव है, वैसे ही है जैसे हमें भगवान ने दिया है।
तो और गीता में क्या है भगवान की वाणी?
श्री भगवान हुआ भगवत, गीता में क्या है भगवान की वाणी? श्री भगवान वाच।
जैसे आप भक्तों ने में गीता बाली बाली थी, आप भक्तों में गीता था। क्यूँ? हम चाहते हैं कि लोग भगवान की वाणी को पड़े, भगवान की वाणी को पढ़ेंगे अपने जीवन को सुधार सकते हैं?
हमने मैराथन में गीता बांटी थी, क्योंकि हम चाहते हैं कि लोग भगवान की वाणी को पढ़ें, क्योंकि वो भगवान की वाणी को पढ़ेंगे तो अपना जीवन सुधार सकते हैं।
अगर आज उसको संसा के भागों की संख्या बढ़ रही है, उसका मूल कारण है।
अगर। आज इस इस कौन संस्था के भक्तों की तादाद बढ़ रही है, संख्या बढ़ रही है, तो इसका मूल कारण है पुस्तक वितरण।
तो जो ब्रह्मचारी है, उसे सत्य का
उच्चारण करना चाहिए, जो ब्रह्मचारी है, उसे
सत्य का उच्चारण करना चाहिए।
और सत्य उच्चारण पर सत्य का उच्चारण बहुत आवश्यक है।
प्याला सत्य है कि भगवान की शिक्षा को
पहला सत्य है कि हम भगवान की शिक्षाओं को यथा रूप स्वीकार करें।
वे 1 दूसरे के व्यवहार व सत्य
होने, फिर 1 दूसरे के व्यवहार में भी सत्य होना चाहिए।
वैष्णव भक्त होंगे, घर में हो, खास
करके जब आप वैष्णव भक्तों के संग व्यवहार करते हैं। सत्य का उच्चारण कर, सत्य का उच्चारण करना चाहिए।
और उच्चारण करोगे तो भक्ति में आगे
बढ़ोगे, सत्य का उच्चारण करोगे तो भक्ति में आगे बढ़ोगे।
कई भक्त, कई भी ये सोचते हैं। हम चापलूसी करेंगे, हम कुछ बना, कुछ गलत काम करेंगे, किसी को पता नहीं रहेगा।
कुछ वक्त सोचते हैं कि हम चापलूसी करेंगे और गलत काम करेंगे, किसी को पता नहीं। पड़ेगा
हर चीज के साक्षी हैं और
भगवान हर चीज के साक्षी हैं।
प्रयास सत्य का उच्चारण करे, हमारा प्रयास रहना चाहिए।
हम सत्य का उच्चारण करें।
जो धार्मिक मार्ग में चल रहे है, उन्हें सत्य का उच्चारण करना चाहिए।
जो धार्मिक मार्ग पर चल रहे हैं, उन्हें सत्य का उच्चारण करना चाहिए।
खास सुकदेकोसवामीकहरे 4 जो है, उसे सत्य का उच्चारण करना चाह।
खासकर सुखदेव गोस्वामी कह रहे हैं। जो ब्रह्मचारी हैं, उन्हें सत्य का उच्चारण करना चाहिए।
आगे के सोच सौचभ्यमकी हमें बाहर से सफाई चाहिए और हृदय में सफाई चाहिए।
हमें बाहर से सफाई चाहिए और हृदय में भी सफाई चाहिए।
यह नहीं कि बाहर से हम थिलगलाएंअच्छे, कपड़े, पहने, सब को प्रणाम करें और अंदर से कल काम करें।
ऐसा नहीं है कि बाहर से हम तिलक लगाएं, अच्छे, कपड़े, पहने, सबको प्रणाम करें और अंदर से गलत काम करें।
लेकिन यहाँ कहा जा रहा है ही शुड बी जी,
हमें अंदर और बाहर दोनों से ही, दोनों में ही शुद्ध होना चाहिए।
a my book a both quality in quality outside।
जैसे प्रwपाजी ने 1 बार कहा मेरे जो ग्रंथ है, qualitinsाid quality outside,
sndesh, it first class and a presentation is
first class, जैसा उसका मतलब है, जो हमारा संदेश है, वो भी फर्स्ट क्लास है, और जो उसका प्रेजेंटेशन है वो भी फर्स्ट ा।
so ratri
intel clean extren सो ब्रह्मचारी
को अंदर और बाहर दोनों से ही शुद्ध रहना चाहिए।
ब्रह्मा है। हर हाल में ढूंढना चाहता है। उसको ये भाव रखना चाहिए।
यह नहीं कि यह उदेश्य सिर्फ ब्रह्मचारियों के लिए जो भी धार्मिक मार्ग से जुड़ना चाहता है, यह उन सबके लिए है।
उन्नति करना चाहते हो। ये हमें प्राइज
आप।
अगर आप उन्नति करना चाह।
अगर आप उन्नति करना चाहते हैं तो आपको उसके लिए कीमत चुकानी पड़ेगी।
ध्यान में क्या कहते है
भगवान अठारहवे अध्याय में कहते हैं समान मुख, शिक्षा में मा, सोचा, आप सभी को छोड़के मेरे पास आओगे, तब मैं आपकी सुरक्षा करूँगा।
भगवान जितनी मात्रा में आप शरण होगे, बात भगवान की सुरक्षा होगी।
भगवान ये भी कहते हैं भगुतगीतामें जितनी मात्रा में आप शरण लोगे, उतनी मात्रा में सुरक्षा प्रदान हो।
या भगवान कहते हैं खयाल करके अन्ना से भी साफ होना चाहिए और बाहर से भी साफ। हमें साफ कपड़े पहनना चाहिए। क्या हम रहते हैं, आश्रम में हमें साफ करना चाहिए। और जब हम खाते हैं पर सा उरसान साफ करना चाहिए। थाली में हम खाते हैं, हमें साफ करना चाहिए। तो हमें जी क्लीन और
सो ब्रह्मचारी को बाहर से, अंदर से साफ रहना चाहिए। हमें साफ कपड़े पहनने चाहिए। जहां हम रहते हैं, आश्रम में वो भी साफ रखना चाहिए, जहां प्रसाद खाते हैं, वो स्थान भी साफ करना चाहिए और जिस थाली में खाते हैं, उसको भी साफ रखना चाहिए।
आगे कहा गए है यह मीना की हिंसा मत करो और किसी को शराब मत जाओ, झगड़ा मत करो,
किसी से झगड़ा मत करो और श्राप मत।
2
म wodigcosinniing
तो किसी को भी शराब मत दीजिए।
ke yog shrabowontmefectiv को है
हिंसा आप,
श्राप धोखे भी तो उसका ज्यादा फायदा नहीं है। हमारे श्राप में कोई शक्ति नहीं है।
किसी प्रकार का मतभेद मत रखो, हिंसा भी मत करिए।
किसी प्रकार का मतभेद मत रखिए।
वो सबको आदर से देखता है, को आदर से देखता है।
ब्रह्माचारी जो होता है वो सबको आदर से देखता है।
न मन का
यह मेन, निया मेनाजा
और भक्ति के नियमों का पालन करना।
इसका अर्थ है नियमित रूप से जप करना और भक्ति के नियमों का पालन करना।
जो आधारित है
शास्त्र।
इस्कॉन संस्था में हर चीज शास्त्रों के आधार पर होती है।
सो sastre से सब शास्त्र में है, उसका पालन करना चाहिए।
जो इसको में जैसे नियम है। मंगलाआरती में आओ, गुरु, पूजा, मे, आओ, क्लास में आओ, ये सब शास्त्रों में दिया हुआ है और हमें उसका पालन करना चाहिए।
तो ये प्रॉपरली बना नियम है।
यह नियम प्रहोवा जी ने नहीं बनाया। ये नियम तो शास्त्रों में आ रहे
हैं और सदा ही राम का उचारण करो।
सदा। हरि नाम का उच्चारण करो।
हरी राम में हमारी रूचि बढ़नी चाहिए,
हरिनाम में हमारी रुचि बढ़नी चाहिए।
उसका क्या होगा?
उत्साह।
उसका अर्थ होगा के क्षेत्र में आगे बढ़ोगे,
उत्साह उत्साह रहेगा तो हम भक्ति में आगे बढ़ पाएंगे।
तो राम का उच्चारण सबसे महत्वपूर्ण है।
हरिनाम का उच्चारण सबसे पहले करना है।
कई बार से माला का है। ओह कमरे में में
16 हो गया है तो बोलते हैं कमरे में है
16 माह हो गया, हमारा 16 माला हो गया।
हमारा यह अच्छी बात है। पर अगर समय है। मै क्या कहना
16 माला हो गया। यह अच्छी बात है। लेकिन समय है तो हमें 16 माला से अधिक करना चाहिए, कम नहीं करना।
1 पल भी कल।
1 पल भी हमें गलत सेवाओं में, गलत चीजों में नहीं बिताना चाहिए।
हम करोगे भगवान ने क्या प्रार्थना कर रहे हैं। मुझे भक्ति 2, भक्ति 2, भक्ति 2
और जब हरि नाम का जप कर रहे है तो हम भगवान से क्या प्रार्थना कर रहे हैं। मुझे भक्ति 2, भक्ति 2, भक्ति 2
तो हर भर को चाहिए और नियमों का पालन।
सभी भक्तों को ये भक्ति के नियमों का पालन करना चाहिए लिया धीर
4
बरा जेंटलमैन होना चाहिए, ब्रह्मचारी को जेंटलमैन होना चाहिए।
हम सब को जेंटलमैन होना चाहे।
हम सब को जेंटल मैन होना चाहिए।
हम का व्यवहार इतना अच्छा होना चाहिए। लोग समझे
पहुंच गए, हमारा व्यवहार इतना अच्छा होना चाहिए कि लोग समझे कि हम वैकुंट पहुंच गए।
पापा ने इस स्थान को क्या नाम दिया था?
पापा जी ने स्थान को क्या नाम दिया?
पृथ्वी पर स्वर्ग, पृथ्वी पर स्वर्ग
क्या मतलब है बना।
पृथ्वी पर स्वर्ग का क्या मतलब है? खूबसूरत मंदिर बनाना है यस
और मैं। आचरण ऐसा हो कि कोई उस भकीलेकेजअसीधार्मिक
आलमी यानी के नाम के साथ खूबसूरत मंदिर बनाना।
भगवान के शिविग्रहोंकी अच्छे से सेवा करना और हमारा आचरण बहुत उच्च कोटी का रखना। हमारा आचरण ऐसा हो कि लोग देखें तो उनको लगे। हां, ये सही में धार्मिक मार्ग का पालन कर रहे हैं।
यही होना चाहिए। मुंह में राम, राम बगल में छुरी,
यह नहीं होना चाहिए। मुंह में राम, राम बगल में छुरी
का अध्ययन करना चाहिए।
हमें शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए में
कृपा के पूरा विश्वास होना चाहिए। जो गीता का संदेश है, यह असली है, कुछ कल्पना नहीं है।
हमें मन में पूरा विश्वास होना चाहिए। जो ये गीता का संदेश है, यह असली है, इसमें कोई गलत नहीं है।
ये भागोतम संदेश है है, ये भागोतम
का संदेश है, ये असली है।
अब अंग्रेजो का राज्य था, उन्होंने अपने कई स्कॉलर्स को भारत भेजा, संस्कृत भाषा सीखे फिर उन्होंने अनवार किया तो को अपने भावज के साथ।
जब भारत भारत में अंग्रेजों का शासन था तो उन्होंने कई स्कॉलर्स को भेजा था भारत संस्कृत सीखने का संस्कृत सीखने के बाद उन्होंने ग्रंथों को अपने भाव से जो है वो बदल दिया था।
लोग कहने लगे bुkamitogमइथोलॉजी हो रही, इसलिए
उन लोग कहने लगे कि ये जो है ये माइथोलॉजी है।
कॉलर्स को भेजा संस्कृत भाषा है, उन्होंने
अपने स्कॉलर्स को भेजा था। संस्कृत भाषा सीखने के लिए
देखा। ये सब कल्पना है।
और उन्होंने देखा और ये उन्होंने कहा जो स्कॉलर्स थे सो सब कल्पना है। यह माइथोलॉजी है।
भगवान राम राम को परम भगवान कई दुर्भाग्यशाली व्यक्ति क्या कहते है
जैसे भगवान राम तो परम भगवान है लेकिन कई लोग क्या कहते हैं कि भगवान राम जो हैं वो 1 साधारण व्यक्ति है।
तो इस में इस लोक में है कि मुझे जीवन में सबसे पहला है और मुझी जीवन में किस प्रकार का हमारा व्यवहार होना चाहिए।
तो शुकदेव गोस्वामी लोक में कहते हैं कि ब्रह्मचारी जीवन में क्या नियम पालन करने चाहिए और ब्रह्मचारी जीवन में हमारा क्या व्यवहार होना चाहिए।
और मुझ को स्त्री संघ से दूर रहना चाहिए।
ब्रह्मचारी को, ब्रह्मचारी को स्त्री संघ से दूर रहना चाहिए।
पापाजी में कहते हैं सोच नहीं।
पाजी दात्रे में कहते हैं कि स्त्रियों
के विषय में सोचना नहीं चाहिए।
उतना ही चर्चा करो जितना आवश्यक हो
और उतनी ही चर्चा करो जितनी आवश्यक हो।
यह नहीं कि हम किसी बहाने उनकी सर मिल जाए, आवश्यक
यह नहीं कि किसी बहाने से हम उनसे ज्यादा वार्ता अब करें। आवश्यकता से अधिक।
तो शुकदेव गोस्वामी कहते हैं ये जो हमारे पाप की भावना है, जो पाप की इच्छा है, ये नष्ट हो जाएगी। शुद्ध भक्ति के द्वारा,
ये जो पाप की भावना है, सुखदेव को स्वामी कहते हैं। हमारे अंदर यह नष्ट हो जाएगी।
शुद्ध भक्ति के द्वारा हमें गुणों को
कुल करना चाहिए, हमें इन गुणों को स्वीकार करना चाहिए।
हरे हरे
अभी हम लोगो की इस गोष्टी है। इसलिए वो आगे विदेश वाले है। कोई प्रश्न है किसका
इसके बाद ब्रह्मचारियों के लिए स् गोष्टी है। वृंदावन हॉल में अभी किसी का कोई प्रश्न है
पूछे,
हरे कृष्णा, गुरु, महाराजी। जैसे हम भक्ति में नये आते हैं तो तपस्या करने में ज्यादा परेशानी नहीं होता है। और कुछ पाप होता है तो पश्चाताप होता है। लेकिन अभी ऐसी स्थिति होती है कि तपस्या करने का मन नहीं करता है और पाप होता है। कुछ गलत कार्य होता है तो पश्चाताप का भाव नहीं आता है।
तो इसके लिए जब आप जुडते हो। कहा जाता है चाय नही 16 माला तो हम क्या 16 माना करेंगे तो आपका शमी रहेगा।
जब आप रिस्क में आते हैं। शुरू में आपको कहा जाता है कि 16 माला का जप करो और 4
नियम का पालन करो।
अगर आप 4 नियम का पालन करते रहेंगे तो आपके रूचि बनी रहेगी।
भक्ति,
बक्सा, गुन
और अपने दुर्गुणों को देखो दूसरों के नहीं और कोई प्रश्न
कृष्णा महाराज जी, आपने बताया कि तपस्या का महत्व सो। मैं जब तपस्या करता हूँ थोड़ी तो देखता हूँ कि बीमार पड़ जाता है
और फिर सो जाता हो। तपस्या का मतलब यह नहीं कि आप शाद नहीं खाओ।
तपस्या का मतलब यह नहीं कि आप
प्रसाद नहीं खाओ, पुशर जितना खाना खाओ,
प्रसाद जितना खाना खाओ।
इतिहास है कि लोग पतले और जिसका है, आभ्यास है होते हैं। पतले
हमारा अभ्यास है,
लोग जुड़ते हैं, वो पतले होते हैं।
जब स्कॉन्स हमारा हमने देखा है कि लोग जब विस्कोंट से जुड़ते हैं तो बहुत पतले होते हैं।
समय के जाल और समय ज्यादा अच्छा सो जाता है तो आपको उसी नंबर से जम कर सकते हो।
उसे जादा हे आप उतनी तपस्या करो जितनी कर सकते हो, उससे ज्यादा नहीं। 6 घंटा आप सोच सकते हैं। रात को और कोई प्रश्न राज थैंक
यू, इस महाराज हमने अपनी मैना में ब, जो अnfेverablहैभcतi के लिए, marade you do anything, it is unfavorable for devotions life, we should we should avoided, we should rejected, but many times i see maharaj i know, what is to be done? and what is not to be born, but i m able to do it so from, where this didrmination and the
strani you the right, but that keep in the sand one for avilable and gagreteationecom, you get more fixtupalanas।
आप सही पथ पर हैं, आप बस
उसे ही सही मार्ग पर है, सही
मार्ग पर हैं, आप उस पर चलते रहिए। 16 माला का नियम पूर्वक जब करते रहिये, 4 नियम का पालन कीजिए। तो दृढ़ता जो है वो धीरे धीरे दृढ़ता, आपके में बढ़ेगी, ये जो प्रोसेस
है, इस गैरंटी, तो फी, ये जो
प्रोसेस है, ये गारंटी है सक्सेस के
लिए, इसमें गारंगी वान खुद कहते हैं,
भगवान खुद कहते हैं, हमें विश्वास होना चाहिए भगवान की वाणी में
ओ last
last question
पूछिए
पूछे, gुरुmaराज, how to over come duplisiusbeavir?
कैसे हम छोडे सबको हाँ कहने की,
कैसे हमे आदत छोड़े सबको हाँ कहने
की और किसी को कुछ कहना, किस
को कुछ कहना, किसी को कुछ कहना,
किसी को कुछ कहना, कुछ हमारे दोस्त हैं, किसी को कहते हैं, हमारे दुश्मन
हैं, हम गलत काम करते हैं, सोचते हैं, कोई देखा नहीं है, हम गलत
काम करते हैं, सोचते हैं, कोई देख
नहीं रहा है, पर वो भूल जा
साली है, पर हर कार्य का साक्षी
है सो रुबुसिबिभेवर करोगे, भक्ति में भी बढ़ोगे नहीं, आगे और उसका कर्म भी मिलेगा।
अगर आप कपटी व्यवहार करेंगे तो भक्ति में भी आगे नहीं बढ़ेंगे और उसका कर्म भी मिलेगा।
यह मत सोचो मेरे सर्फर कपडे पहन लिए, अब कर्मा फ्री हो गए, आप
यह मत सोचिये कि आपने गेरु व्यवस्थ पहन लिया, अब आप कर्मा फ्री हो
गए,
कोई भी कर्मा फ्री नहीं है,
कोई भी कर्म से मुफ्त नहीं है
के
पीछे माइक दीजिये जल्दी।
हरे कृष्ण महाराज जी, मेरा ये क्वेश्शन है कि हम जब भी साधना करते हैं, चैटिंग करते हैं और लेक्चर क्र सुनते तो बहुत तेज नींद आती है और हम ये सोचते हैं कि हमारा शुद्धि हो रहा है इसलिए नींद आती और बाहर की अट्रेक्शन आ रहे है। लेकिन लेकिन ये सब हमें आते रहते हैं। और साथ साथ में हम सोचें कि हर समय शुद्धि हो रही है, तो ऐसा कुछ है नहीं कि हमारे हमें नींद नींद न आए, ताकि वरना हम यही सोचेंगे अंत तक भी की शुद्धि हो रही, शुद्धि हो रही, जैसे शुद्ध नहीं हो पाएगा और नींद आते ही रहेगी और ऐसे ही हमारा रूटीन बन जाएगा। मतलब 1 ऐसे ही नींद आती रहेगी। और हम सोचते हैं कि शुद्धि हो
इसलिए आती है, हमारी रूस ही नहीं
है नींद, इसलिए आती है कि हमारी
रुचि नहीं है, सादा देखते हो,
आप प्रसाद महल में देखते हो, कभी नींद आती है
तो ये रूचि को हमने
बढ़ाना है, रुचि को हमें बढ़ाना है।
कहते है मे भी में विद्या की
मारी है रुप कोसमी कहते हैं कि हमारे जीव में अविद्या की बीमारी है
हो इसलिए हमें भगवान के नामों का
मीठापन मसूस नहीं होता इसलिए हमें भगवान
के नामों का आस्वादन नहीं कर पाते जो मीठापन है पर
नाम करोगे तो क्या होगा विद्या की बीमारी ले जाएगे
लेकिन आप जब करते रहोगे ध्यानपूर्वक तो यह अविद्या की बीमारी चली जाएगी वह
कैसे है वह नाम की मीठे हैं
रुपको स्वामी कहते हैं भगवान के नाम जो है मिश्री के समान मीठे हैं
जॉइnजॉइंडबीमारी में हम को मीठा देगा या
मजदूर नही कर सकोगे लेकिन हमारे जीवा
में जो है पीलिया हो गया है जॉन्डिस हो गया इसलिए हम जो हैं वो मीठा भी खाने पर हमको मीठा
नहीं लगता प्रापाजीउदहरण बहुत बार देते रोपा
जी उदाहरण बहुत बार देते थे
ट्रेनिंग में ने का पालन करो और जब करो तो उसके द्वारा का इलाज हो
जाएगा आप 4 नियमों का पालन करो और ध्यान से जब करो तो यह बीमारी का इलाज हो जायेगा ओके साहब
हरे कृष्ण मारे जी, हर विश् मारे जी जैसे इस पर्पट में 1 श्लोक युक्ताहार विहार अस्य उसमें हमारी जो शारीरिक आवश्यकता है भोजन करना और निद्रा वो तो बैलेंस रखना है बट वाट अबाउट रीक्रियेशनल एक्टिविटीज जो मनोरंजन हैं वो क्या
है कि में नाचो
किरत मनोरंजन भक्ति में है कीर्तन में नाचो
में शामिल है और 1 हॉल में हमारा किरसन हो रहा था और वायु के हॉल में बॉलरूम डांस हो रहा था शराब पीने दे रहा तो उन लोगों ने देखा ये लोग चले केरल में ही जोर से उन्होंने कहा कि हम शराब पी रहे पी लड़कियों का हाथ पकड़ते हैं थोड़ी खुशी मुझ होगी है लोग शराब भी नहीं पी रहे हैं रियो लड़ियों का हाल भी नहीं पड़ रहे हैं रहे नाचे इतनी खुशी
1 बार हमने रशिया में देखा कि 1 हाल में 2 हाल थे पास बाजूबाजीमें 1 हाल में कीर्तन चल रहा था दूसरे हाल में भौतिक लोग शराब पी के स्त्रियों के साथ नाच रहे थे वो आके देखे उन्होंने यहाँ पर देखा कि यहां तो हम शराब भी पी रहे हैं और स्त्रियों के हाथ भी पकड़े हैं फिर भी हमें वो सुख नहीं मिल रहा है लेकिन इधर आपके भक्त जो हैं वो तो शराब भी नहीं पी रहे हैं स्त्री और पुरुष अलग अलग हैं कीर्तन कर रहे हैं आनंद में नाच रहे हैं
सा रे
पर
बोज गोपाल कृष्ण को स्वामी महाराज की
तो जो भी मंदिर सो जो भी भक्त मंदिर के है ब्रह्मचारी भक्त वो सभी वृंदावन हाल में सीधा यहाँ से प्रस्थान करें महाराज भी वही है वहाँ
पे श्षकुष्टी होगी हरे कृष्ण।
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