मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र की महिमा | SB 9.10.53 | 10 Apr 2006 | Mumbai | Srila Gopal Krishna

Srila Gopal Krishna discusses Lord Rama's reign, when disease, aging, and death did not exist, contrasting Ram Rajya with today's suffering. He traces Rama's life through scripture and explains how bhakti and mantra chanting can help us transcend illusion and recover that lost era of peace.
Chapters
ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय, नम भगवते वासुदेवाय। हे कृष्ण। तो कुछ दिन पहले भर्ती ने राम राम उत्सव बनाया था, इस मंदिर में न क्या किया? हमारे कई मंदरों में तो 9 में संक्षेप रूप में भगवान राम की लीला का वर्णन है। श्रीमत भगवत अमर। तो आज को आपको 1 लोग पढ़कर सुनाएंगे ने दी व्याधि शोगा भया कलमा मृत्यु चनिचतनसेरामयरजन धो ले। श्लोक का अनुवाद इस प्रकार से है जब भगवान रामचन्द्र इस जगत के राजा थे तो सारे शरीरिक, शरीरिक तथा मानसिक कष्ट रोग बुढ़ापा बिछो, पछता 2 तथा खावत का नाम निशाना न था। यहाँ तक कि न जाने वालों के लिए मृत्यु भी नहीं होती थी। बड़ा अच्छा जा रहा है कि न जाने वालों के लिए मृत्यु भी नहीं। आज के जमाने आपको छूट मिल जाए तो कोई चाहेगा मृत्यु सच बोलिए चाहेगा। पर रामराज्य के समय लोगों की इतनी अच्छी बुद्धि थी कि हालांकि उनके उन्हें छूट दी गई थी। क्या मृत्यु के समय भी चुन सकते हो? नहीं चाहिए मृत्यु। तो चलो मृत्यु से भी मुक्त हो गए, पर लोगों की बुद्धि ऐसी थी की वो समय के साथ मृत्यु की तैयारी भी करते थे और मृत्यु को भी स्वीकार करते थे। हालांकि सुविधा थी, नहीं चाहिए तो मृत्यु से भी मुक्त। तो यहाँ कहा जा रहा है कि भगवान रामचंद्र जब इस जगत के राजा थे, दूसरे शब्दों में जब राम राज्य हो रा था इस पृथ्वी पर, तो शारीरिक कष्ट भी नहीं और मानसिक कष्ट भी नहीं। और आज आप क्या देखते हो? शरीरिक कष्ट भी है और मानसिक कष्ट भी है, शरीरिक कष्ट भी बढ़ते जा रहा है और मानसिक कष्ट भी बढ़ते जा रहा है या घटते जा रहा है, शरीरिक कष्ट भी बढ़ते जा रहा है। आज बच्चों को बीमारियां होती है की 1 समय बुरे को होती थी, छोटे छोटे बच्चे आजकल चश्मा पहनते हैं, न हीरिंग पहनते है। कभी पहले आपने सपना भी नहीं देखा था। तो भगवान राम के शासन के समय कोई शरीरीकशरही और कोई मानसिक कश्मीर और न चाहने वालों के लिए मृत्यु भी नहीं। साथ में कहा जा रहा है क्या रोग नहीं, मतलब की कोई डॉक्टर नहीं थे, हॉस्पिटल नहीं थे। जैसे कि हॉस्पिटल है यहाँ, उस समय कोई रोग नहीं, रोग नहीं हो तो हॉस्पिटल की आवश्यकता पड़ेगी नहीं, बुढ़ापा बन भी नहीं। मतलब की सदा जवान कोई भुराफापरीनहीआजकल तो हर व्यक्ति बुड़ापेपनसीबचने का प्रयास करता है। बुरे व्यक्ति को कह? 2 तुम कितना जवान खुश हो जाता है और जवान को करे। तुम बुरे लग रहे हो तो आप मुसकरा, जवान व्यक्ति की बस्ती करनी है तो बे जैसे देख रहे हो और बुरे व्यक्ति की खुशामत करने है तो उल्टा तुम कितने जवान दिख रहे हो तो किसी को नहीं चाहिए। आजकल खास कर के विदेशों में कई दुकानें हैं जिसको अंग्रेजी में कहते हैं एंटी एजिंग एंटी एजिंग मतलब की दुकान में वो मसाला मिलता है जिससे तुम बढ़ावा पन छुपा सकते हो और कुछ नहीं। मिलता बाल को दंग करने के अलग अलग रहा हूँ। बढ़ावे को छुपा सको पर भगवान राम के राज्य के समय यहाँ कहा जा रहा है, कोई बुढ़ापा बन भी नहीं, फिर आगे क्या कोई बिछो पछतापा पछपात हम पछताते रहते हैं। पति संसार में सदा ये खो गया, यह हाथ से फिसल गया। ये मौका मैंने गवा दिया है की नहीं किसी और के पास कोई सुविधा हो जो आपके पास नहीं है, तो फिर भी आप पछताते हो। फिर दुख देखा जाए। आज के जमाने में तो दुखी दुख है, पर भगवान राम के शासन के समय कोई दुख नहीं था। आज हम सब का मन भाई से भरा हुआ है। सच बात है। जैसे की आज से सौ साल पूर्व 1 कवि ने कहा है बाजार चलना, हे मेरा मन, तुम भय से क्या हो, भरे हुए हो। तो भगवान राम के शासन के समय कोई भाई नहीं था, समाज में कोई थकावत भी नहीं। इन चीजों का नाम निशान भी नहीं था। यह नहीं कि 90 प्रतिशत के पास नहीं था और 12 के पास था। तो राम राज्य की चर्चा लोग आज भी करते हैं। भगवान राम स्वयं भगवान है। भागवत में शुकदेव स्वामी जी ने कहा की अनादि काल से अनेक संतों ने भगवान राम की लीला का वर्णन किया है। इसलिए मैं केवल संक्षेप रूप में ही इसे प्रस्तुत करूँगा। संक्षेप रूप तो इसलिए हा कि राम कथा इतनी बढ़ी है और जी ने इसकी रचना की। श्रीमद भागवत में केवल 2 अध्याय है जहाँ की शुदवकस्वामीसंक्षेप रूप में भगवान राम की लीला का वर्णन करते हुए तो भगवान राम कब प्रकट हुए थे। दूसरे शब्दों में प्रकट हुए थे। लगभग 20 लाख साल पूर्व आप कहोगे आप ने 20 लाख साल की गिनती कैसे कर ली। 12 लाख साल का था त्रेता युग और 8 से अधिक 60 लाख से अधिक सालों के थे द्वार, पर, योग और भगवान थे युग के आनंद में, पर आज भी उनकी लीलाओं की चर्चा होती है। खास कर कि उत्तर भारत में सैना के समय राम लीला का उत्सव होता है। और भारत में ही नहीं कई और विदेश के देश है थाईलैंड। इननोनीजियाबकैला राम कथा होती है। आज भी आज भी वह राम लीला होती है। क्यूंकि 1 देश है जहाँ के 1 समय वेदिक संस्कृति का पूरा प्रभाव था। और आज तो लगभग देश मुसलमान बन गए। तो भगवान राम की लीलाओं का वर्णन होता है। हर स्थान, विश्व के कई स्थानों में भगवान राम प्रकट हुए थे। अपने 3 भाइयों के साथ। क्या क्या थे, उनके नाम लक्ष्मण, भारत और बाबा जी इसकी में कहते हैं। ये हैं विष्णु तत्व जीव तत्व। नहीं तो विष्णु तत्व जीव, तत्व में क्या अंतर है? विष्णु तत्व का अर्थ है जब भगवान स्वयं अपने आप को प्रकट करते हैं और जब वो प्रकट होते हैं, किसी प्रकार से मौलिक प्रगति के प्रभाव में नहीं आते। हम बोली के व्यक्ति सोचते है, भगवान नराकार है या सोचते है। ये जो भगवान के विग्रह है, जगनी का, गिरधारी का, ये लकड़ी का हैं, लोहे का है। ये है मूर्ती पूजा, मूर्ती पूजा और ठाकुर पूजा में क्या अंतर है? ठाकुर सेवा में मानते भगवान स्वयं भगवान उपस्थित है। और मूर्ति पूजा में क्या सोते तो मूर्ति है। तो भला भगवान जैसे गीता में कहते हैं जन्म कर्म च मे मेरा दोनो ही क्या है दिव्य राम। तो भगवान जब पृथ्वी पर आते हैं तो अपने दिव्य स्वरूप में आते है जिसकी तुलना न कोई कर पाया है न कर पाएगा। जैसे की भगवान राम ने भी देवी लीला की थी। तो भगवान शब्द किसके लिए उपयोग किया जा सकता है? भगवान सब उनके लिए उपयोग कर सकते हो। जिसमें 80 मात्र में क्या हो। 6 प्रकार के 1 है सब से धनी, सबसे वीर, सबसे खबसूरत, सबसे ज्यादा प्रसिद्ध, यानी और त्याग। और भगवान जब पृथ्वी पर आते हैं तो अजभूतदीलापकड़करते है। अजभूतलागी तुलना कोई कर नहीं सकता। ये सम्बन्ध आवश्यक है क्यूंकि? आज के जमाने में कई लोग ये दावा करते हैं कि भगवान क्या बता रहे हैं? नहीं करते हैं कि नहीं करते? हर लोग करते है, पर हम उन्हें भगवान के रूप में स्वीकार करते हैं जिनका वर्णन सास में भी प्राप्त होता है। और भगवान जब पृथ्वी पर आते हैं किसी रूप से इस भौतिक प्रगति के प्रभाव में नहीं आते। तो भगवान राम ने भी अदभूत लीला। प्रकट की भागवत मे इसका वर्णन संक्षेप रूप में ही है। जैसे कि जब सीता के पति चुनने का समय था तो कई राजकुमार आये थे। सीता को पत्नी के रूप में स्वीकार करने के लिए। क्या आवश्यक था की 1 बहुत भारी धनुष था शिव जी का धनुष जिसे उठाने के लिए 300 व्यक्तियों की आवश्यकता थी। कितने भगवान राम ने जब तोड़ना था, जैसे हाथी से वैसे उन्होंने तोड़ा की 3 पत्नियां थी और जिनमें 1 पत्नी कई ने 1 समय जज शरद क सहयोग दिया था। 1 कठिन परिस्थिति में, जिसके कारण शरद ने कहा था कि मां को मेरे से क्या मांगना चाहते हो, तुम ने मुझे कठिन स्थिति में सहयोग दिया है, क्या मैं कर सकता हूँ? आपके लिए कहकरश्यार थी? उसने कहा कि इस वक्त मुझे कुछ नहीं चाहिए। और ठीक समय पर आम से मांगोगे और दश्त ते थे की उनके बेटे का राजा अभिषेक किया जाए। हमारे वैदिक साहित्य के अनुसार 4 वर्ण, 4 आश्रम होना चाहिए और 4 वरना क्या है, ग्रामीण वैश और 6 आश्रम क्या है? वानर प्रतिशत सन्यास ये नहीं की जैसे आज के जमाने में अब कुर्सी में बैठे रहो, अंत हार्ट टैक गोली के कारण छोड़ कोई कुर्सी छोड़ना ही नहीं चाहता। और प्राचीन समय में ये रिवाज नहीं था। महाराज की इच्छा थी कि उनके सबसे बड़े पुत्र राम का राजा भी चेक किया जाए। तो इसलिए भूल योध्या सजा था, सड़कें सजी हुई थी और बैन बाजा बजते थे, क्यूँ क्यूँ अगले दिन सुबह भगवान राम का अभिषेक होने की योजना थी, तो अगले दिन सुबह भगवान राम के राजा विषय की तैयारी हो रही थी। तो उस समय का के बड़ी 4 औरत थी और भगवान राम थे कोस्टल के पुत्र। कई बार आप देखते हो भ्यर्थियों में इर्षा रहती है, देश रहती है नहीं रहती खास कर के कहते हैं औरतों में जरा ज्यादा द्वेश रहता है। तो के के की इच्छा क्या थी कि राम की वजह मेरे पुत्र को उसका राजा भी किया जाए। तो गए और कहने लगे तुम्हें याद है न कि तुमने मुझे वादा किया था, जब मैं मां गूंगी वो पूरा करोगे तो आज मैं आप से कुछ मांगना चाहती हूँ। पहले ये बताइए की इच्छा पूरी करोगे। आज के जमाने में तो आपके पास लिखित एग्रीमेंट हो, स्टैंड पेपर में भी तो भी उनकी कुछ खास कदर होती है, नहीं होती। ठीक है, कोर्ट में लड़ लेंगे। प्राचीन समय में वजनी बहुत था। सत्य का मांगो क्या मांगना चाहते हो? तो आप अपने बेटे को, राम को वनवास में भेज। 212 सालों के लिए नहीं 14 सालों के लिए। और उसके बजाय मेरे पुत्र को उसका राजाभिषेक होना चाहिए और राज्य का शासन उन्हें देना चाहिए। शरत ने वचन दिया हुआ था कि जो कके मांगेगी को पूरा करेंगे। तो हालांकि उनकी इच्छा नहीं थी। मजबूरन उन्हें कहना पड़ा किससे भगवान राम से जाओ। जंगल में। तो यहाँ भगवान ने अपने त्याग राजा की भावना प्रकट की। भागवत धारण किया जाता है आत्मज्ञानी व्यक्ति जब उसकी मृत्यु का समय आता है, जब उसे देखता है की मृत्यु दी है, घबराता नहीं है, श्रद्धा व्यक्ति घबराता है को मृत्यु का सामना नहीं करना चाहता। दे हार्दिक वादी है, आत्म ज्ञानी है। उसे पता है कि अगर हमने अपना जीवन उपयोग किया है। भगवान के सेवा में कोई भाई का प्रशन। भगवान राम ने पिता के आदेश को स्वीकार करके गए जंगल की और जंगल की ओर जाने की तैयारी की। वो तो अकेले जाने को तैयार थे। और सीता ने कहा कि मैं भी आपके साथ चलूंगी। भाग। राम ने कहा तुम तो राजकुमारी हो, महलों में पली हो, जिंदगी भर। तुम कहाँ जंगल का कर्ज भुगत सकोगे। रीता ने कहा नहीं पत्नी के रूप में मेरा कर्तव्य है, आपके साथ चलूँ। और फिर भारी लक्षण भी साथ में गए। बहुत होशियार थी। इसने केवल यही नहीं कहा की राम की वजह भारत को राजा बना। उसने कहा को जंगल में भेजो 14 सालों के लिए दूर क्यूँ क्यूँकि। उसे भय था कि अगर भारत का शासन हो और भी अयोध्या में ही है तो किसी से भी कहते हैं कूदियता हो, खुदियताकूदियता कहते है, राजा है, प्रधान मंत्री हैं तो मिल्टरी का चीफ। हमको 2 कुर्सी ने तो जैसे कई बार पाकिस्तान खुद तुम को डर था कि अगर राम यहां रहे तो मेरे बेटे के शासन को खतरा है। दूसरा। उन्होंने कहा क्यूँकि थोड़े दिन के लिए भेजा गया थोड़े सालों के लिए, फिर भी बेटे के छात्र को खतरा हो सकता है। पर रामचन्द्रजी ने सुरांतिस्वीकार कर लिया पिता का आदेश। उन्होंने ये नहीं कहा पिता, ये कैसे संभव है, मैं जाऊं। बोला राज्य। पूरी सभा यह उम्मीद कर रही है। यह मेरा अभिषेक होगा की चले घर से भगवान श्री कृष्ण रासिला के बीच में प्रगट हो जाते थे। अब विधा की भावना को प्रगट हो। सीता का कनाकिया किसने रावण ने सती सीता नहीं थी, माया सीता सीता को कोई छू नहीं सकता। खैर, जब समय आया, श्रीलंका जाने के लिए भवन गए, समुन्द्र की छत पर 3 दिन के लिए, वहाँ रुके, और समुन्द्र ने उन्हें कुछ आदर नहीं दिया, न ही सेवा की भावना पकड़ के। जब 3 दिन बीत गए और समुन्द्र ने किसी प्रकार से सेवा की। भावना भी थी, तो भगवान ने अपने क्रोध नेत्रों से देखा, समुन्द्र की ओर और समुन्द्र ने वो नेत्रों के क्रोध की गर्मी को मजूस किया। सारी यूनियन जो थी, सब कांपने लग गयी, समुद्र समझ गया कि स्वयं भगवान हैं और हमें इनके आदेश को पूरा करना है। भगवान ने अपनी सेना के साथ क्या किया, श्रीलंका जाने की योजना बनाई। 2 प्रकार की शक्तियाँ हैं। 1 है डेविड एजेंट भोले। दैविक शक्ति का अर्थ है क्या प्रयास करते हो, रहते हो। भगवान की कृपा पर। भौतिक शक्ति का अर्थ है कि आप की श्रद्धा विश्वास है। आपकी भौतिक योजना में, तो जो भक्त हैं, दैवी शक्ति में, ज्यादा श्रद्धा रखते है। जैसे की गुरु के युद्ध शुरू होने से पहले। भगवान ने यह निर्णय कर लिया था, क्यूंकि दोनों ही उनके रिश्तेदार थे कि मैंने किसी का पक्ष नहीं लेना। और जब दोनों सेना को छूट दी गयी कि अब सुनो तो जो कोर्वर थे, उन्होंन चुना क्या? भगवान की सेना को क्यूँकि दियोदर ने सोचा, भगवान ने निर्णय दे दिया है। हे उन्होंने ही ना सुने, हमारी तरफ रख कर, क्या, फायदा और पांडे थे, वो ज्यादा खुशियाल थे, उन्होंने कहा, हमें कृष्णा चाहिए, उनकी आधुनिक सेना सेना पति, हथियार नहीं चाहिए थी। जब सेना के जाने कहा, श्रीलंका राहुल से लड़ने के लिए, यह शीतक को वापस लाने के लिए, तो भगवान राम की सेना में केव 2 व्यक्ति थे, जिनमें धन चलाने की भी शक्ति थी। वो कौन थे राम और बाकी, सबसे मंगल की सेना के बार। यहाँ से। भगवान ने अपने लीला पर जब बाहर की चोटियों को पदों था, तो ये डूबने की वजह तैर रहे थे। अब भगवान के लिए क्या कोई कार्य असम्भव है? जैसे की आज हजारों, क्या लाखों ग्रेह है, गे लोग प्लैनेट और ये सारे प्लेनेट जो हैं, ये ग्रह, ये तैर रहे हैं। ब्रह्मन में, ये डूब रे तो नहीं हैं? कैसे तैरते हैं हवा को मेनेप्रेटकरके जैसे हो। आज के जमाने में अनेक हवा अभी, आप, बॉम्बे, एअरपोर्ट, जाओ, वो, एयरपोर्ट, आपको, ट्रेन स्टेशन जैसे दिखता है। आजकल इतने हवाई जादा एयरपोर्ट में जाते थे, जरा शान से बैठते थे। आज जाओ, पूरी, भीड़ जैसे बॉम्बे सेंट्रल स्टेशन उतना बड़ा नहीं, पर लगभग क्यूँ आजकल इतने हवाई जा है। तो आज किसी 1 समय आकाश में हज़ारों हवाई जाज, उरेहै 1 साथ। और ये हवाईजाज कैसे तैरते हैं? हवा के बैनपलेशनउनकेबाद? पंखे होते हैं। कारण फल भगवान हवा के बैनुपलेशनऐसी। ये जो ने, ग्रह लोग हैं, हर हैं, ये हवा में ही तैरते हैं। तो भगवान के पत्थर पे और उन्हें तराना कोई असम्भव कार्य नहीं था। रावण के कितने शेर थे? रावण का अर्थ क्या है? जो दूसरों को रुलाता है? हम सब का परिचय है कि रावन दुष्ट राक्षस का रोते। भगवान के भक्त ुन्होंने कहा की अगर हमें जन्म ग्रहण करना है तो किसी राक्षस से दुष्ट व्यक्ति का 2 और सदा हम भगवान की संगत में रहे। तो जब भगवान राम लौट जैसे आज भी लोग राम राज्य की चर्चा करते हैं, खास कर के जब चुनाव का समय आता है तो अनेक नेता क्या कहते हैं हमको वो हमको वोट 2 हम तुम्हें राम राज्य देंगे तो राम राज्य क्यों कहते हैं? आज के शो में हमने पढ़ा उस समय न कोई मानसिक कष्ट था न जाने का सुखी सुख। तो जब भारत को सूचना पहुँची की भगवान राम लौट रहे हैं तो भारत अपने मंत्रियों के साथ और पूरी अयोध्या की प्रजा उनका स्वागत करने गए और भारत का चरित्र देखो आचरन देखो 14 सालो के लिए मने जो शासन किया भगवान राम की खड़ाऊ को सिंघरान में बिठाया था मतलब की उनके व उनकी तरफ से शासन और खाने के लिए क्या खा रहे थे। जो जो की गाय से तो राम राज्य के समय भागवत के अनेक श्लोकों में यह बताया जाता है की भगवान राम पुरी प्रजा को अपनी उन समान बच्चे जैसे पाल रहे थे। वो पुरी जो प्रजा है भगवान राम को पिता के रूप में स्वीकार कर रहे थे। आज आप उम्मीद रख सकते हो, आपके प्रधान, मंत्री और राष्ट्रपति आप अपनी उन जैसे पालें आप उन्हें पिता जैसा आदर 2 उम्मीद कर सकते हो। शास्रों में कहा गया है खास करके श्रीमद भागवत में के जो राजा है, जो शासन करता है उसका कर्तव्य बनता है कि समाज के सब आवश्यकताओं को, प्रजा की आवश्यकता को पूरा किया जाए और उनकी पूरी सुरक्षा दी जाए। भागवत में कथा पढते हो के 1 समय 1 राजा थे जिनका नाम था महाराज सिद्वी बड़े दयालु थे, कोई उनके भंडारे में जाता था, महल में खाली हाथ में आता था। तो 1 समय देवताओं ने निर्णय किया कि हम उनकी परीक्षा लेंगे। तो 11 देवता ने 1 चिडिया विजन का रूप धारण किया, कबूतर दूसरे ने 1 बाज का और ये बाज तो है कबूतर का पीछा कर रही थी तो कबूतर महाराज सीवी की गोद में कहने लगा बचाओ बचाओ वो बाज मुझे खाना चाहती है, मेरा पीछा कर रही है। और में वहाँ बाज भी पहुँच गयी। बाज ने कहा आपके यहाँ कोई कबूतर आया है? राजा ने कहा मुझे वो कबूतर चाहिए खाने के लिए। राजा ने कहा वो कबूतर मेरे पास आया है सुरक्षा के लिए, मैं तुम्हें वापस नहीं कर सकता पर मुझे मास चाहिए उसका। राजा ने कहा मेरे शरीर से मास ले लो और यह निर्णय हुआ कि जो कबूतर का वजन है उतना ही मांस उनके शरीर का को दिया जाएगा। और क्योंकि देवता परीक्षा ले रहे थे राजा की दया की, भावना की, तो कबूतर का जो वजन है बढ़ते गया और राजा के बिल्कुल मुखड़ा नहीं वो अपने शरीर का चरणा काट कर देते गए। अंत में जो देवता थे वो बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने फिर अपना असली रूप दिखाया और चमड़े को वापस जोड़ दिया। राजा के शरीर के साथ तो राजा का कर्तव्य क्या है समाज की सुरक्षा? तो भगवान राम पूरी प्रजा को उला के समान पाल रहे है। और इसलिए स समाज में कुछ कष्ट नहीं। न मानसिक, न शरीरिक और योध्या की गलियों को कैसे साफ किया जाता था। रोज पहले झाड़ू से और फिर सुगंधित गुलाब के पानी के साथ आज वाशिंगटन विश्व का सबसे धनी स्थान है। वहाँ की सड़कों को भी आप सुगंधित गुलाब के पानी से नहीं हो सकते। बहुत महंगा है। या की सड़कों को साफ किया जाता था। कैसे इस सुगंधित पानी के साथ प्रश्न यह है कि जो सुख राम राज्य में प्राप्त हुआ था, वो ही सुख आज भी आपको प्राप्त हो सकता है। इस कलियुग में किस साधन के द्वारा, महा मंत्र के उच्चारण के द्वारा, राम राज्य के समय कोई शरीरिक मानसिक कश नहीं, वो सुख आप आज भी प्राप्त कर सकते हो। अगर आप के महामंत्र का उच्चालन करो। जैसे की आप देखते हो, टेक्नोलॉजी के सहयोग से गर्मी में सर्दी आ जाती है। सर्दी में गर्मी आ मिली देश में जाओ बहुत गर्मी है, वहाँ आपको महसूस ही नहीं होता। घर एर कंडीशन, दफ्तर एयर कंडीशन, बस एर कंडीशन, टैक्सी एर कंडीशन, बनी की दुकान एर कंडीशन लगा गर्मी है और आप के सीरिया में जाओ वह माइनस 40 टेम्प्रेचर होता है। जैसे हमारे भौतिक विज्ञानी गर्मी में, सर्दी सर्दी में गर्मी पैदा कर देते हैं। अगर आप हर 1 इस महान मंत्र का उच्चारण करो तो आपको वो ही सुख प्राप्त होगा जो की दुसरे रामराज्य के समय शुभ प्राप्त होना था। हालांकि यह रामराज्य बीता था, थ्रेदरयुगमें जो सुख था प्रजा का, उसकी तुलना कर सकते हो। साथियों के सुख के साथ सतियों के समान सुख व्यक्ति बुत रहे। राम राज्य के समय ए राम राज्य के समय भगवान राम ने और सीता देवी जी ने अपने सारे घने जो हैं बात दिया था। ब्राहमणों ने स्वीकार किया और फिर क्या किया वापस लौटा दिया। राजा को। आज आप उम्मीद कर सकते हो। 2 सदी ब्राहमणों को और ब्राहमण आपको वापस दे देंगे। यह 1 भगवान राम के शासन के समय कई 1 ब्राहमण था, जो उनके दर्शन लिए बिना कुछ खाता नहीं था। जब वो अपनी यात्रा करके आये, लगभग 2 हफ्ते के लिए बाहर गये थे। भाई ने कहा, ये ब्रा है, पिछले 23 हफ्तों से भूखा है। क्यूंकि इन्हें आपका दर्शन प्राप्त नहीं हुआ? भूखा है और प्यासा है। जब भगवान राम ने अपना ही बिगड़ा हा निकाल कर उन्हें दे दिया। अलमारी में बंद भगवान स्वयं उपस्थित थे और ये विग्रह दे दी और कहा तुम इस ग्रह की उपासना करो। और इस विग्रह और मन में कोई अंतर नहीं है। जब हम भगवान के आर्च विग्रह की पूजा करते हैं, आर्च मूर्ति के रूप में, तो हमें यह नहीं सोचना चाहिए। ये छोटी सी मूर्ति है, या ये बड़ी सी मूर्ति है। इस में भगवान स्वयं तो अगर आप शरीरिक और मानसिक कष्टों से बचना चाहते हो, अगर आप इन क्लेशों से बचना चाहते हो, अगर आप इन क्लेशों का नाम निशाना नहीं देखना चाहते, और अगर आप मृत्यु से भी बचना चाहते हो उपाय है की आप 1 अध्यात्मिक देश कर करो। इस समय जो आपका है यह भौतिक है। तो भौतिक है। आपको बुलायेगा खर्च देगा। और भगवान कहते है की मेरे धाम में लौटो वैकुनता कुद्दा का अर्थ हैं, यहाँ की कोई कष्ट भोगना नहीं पड़े। तो भगवान कहते हैं कहाँ लौटो? कुद धान में लौटो, यहाँ की किसी प्रकार का कश ही और ये जो जगत है इसे हम क्या बुलाते हैं? लते है कुन्दा जगत, यहाँ की कष्ट कष्ट है? भगवान हमें निमंत्रण दे रे क्या लौटो। हमें ऐसी योजना बनानी चाहिए की हम भगवान हो, उसका साधन क्या है? महा मंदर का। भगवान इस कलयुग में अवतरित होते है। उनके दिव्य नामों में जैसे ने कहा है की भगवान ने पूरी शक्ति डाली है। इन दिव्य नामों में तो हमें इन नामों का उच्चारण करना चाहिए। हमें भूलना नहीं चाहिए। भगवान ही भगवान अपने आप को अनेक रूपों में प्रकट करते हैं, अेमुजूतमनादीअनंत रूपम अनंत अनेक रूपों में प्रकट करते हैं। इन सब के विषय में हमें ज्ञान कहाँ मिलता है? शास्त्रों के शास्त्र में इस विषय का प्रमाण है। और अगर आप शास्त्र के आधार पर चलोगे फिर भगवत प्रेम को हृदय में अनुकूल कर पाओगे। हम सबका प्रयास ना चाहिए। क्या हरी नाम के साथ शस्त्र का भी अध्ययन करें। जैसे की महा ने क्या ही नाम के साथ क्या भागवत का अध्ययन करो। इसलिए इस काम के केंद्र में रोज सुबह भागवत का अध्ययन किया जाता है। शाम के समय गीता का और हमें इसका लाभ उठाना चाहिए। और अगर किसी हालत हम अंदर तक नहीं पहुँच सकते, क्योंकि नौकरी ये काम है तो घर में इसका अध्ययन करके इसका लाभ उठाना उठा सकते है। तो भगवान राम की लीलाओं हमने बड़े बड़े सविशेप रूप में वर्णन किया। जैसे हमने कहा था चुकदेगोस्वामी कह चुके हैं कि अनेक तत्वदर्शी व्यक्तियों ने भगवान राम की लीलाओं का वर्णन किया है। तो श्रीमद भागवत के द्वारा हमें यह सन्देश प्राप्त होता क्या की सबसे उत्तम भक्ति क्या है? भगवान के चरणों में, सेवा में जुड़ना और साधु संग द्वारा हमें यह प्रेरणा मिलती है की हम इस मार्ग में जुड़े रहे। इसलिए शास्त्र में कहा गया क्या साधु संत, साधु संघ, सर्वर साथ, सारे साल का निर्णय क्या है। साधु संग का, लाभ का, खास कर के आज के वाद में जहाँ मोड़ो, जहाँ देखो वह माया का प्रभाव है कि नहीं? दफ्तर में जाओ, स्कूल में जाओ, कॉलेज में जाओ। तो अगर आप भी माया के प्रभाव से बचना चाहते हो। ध हमें इन आधुनिक हथियारों का लाभ उठाना पड़ेगा। प्रॉपर हमें पर स्पष्ट शिक्षा दी है। किस प्रकार से आप अपने आप को माया के प्रभाव से बचा सकते हो? जैसे और 12 महीने में बाद में बारिश शुरू हो जाएगी तो बारिश से अपने आप को कैसे बचाओगे? छाता के द्वारा। तो उसी प्रकार भगवान कहते हैं देवी माया, माया का विरोध करना बहुत कठिन है। और अगर तुम ये हर कृष्ण, महा, मंत्र का लाभ उठाओगे तो अगर तुम मेरी शरण लोगे, फिर तुम्हे माया के प्रभाव से बन सकोगे हरे कृश्ना हारे, क्रिष्णा हारे, किष्णा क्रिष्णा हारे हारे हारे हारे।
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