श्री राम भक्त और अभक्त के भाव में क्या है सबसे बड़ा अंतर? | SB 9.11.3 | Srila Gopal Krishna Goswami

Srila Gopal Krishna Goswami explains the difference between genuine devotion and fake devotion, using stories of Vamana and Prahlada. True bhakti means sincere love for God, not just wearing saffron robes or tilak. He emphasizes chanting 16 mala japa daily, serving in the temple kitchen, and studying Prabhupada's translations of the Vedic scriptures.
Chapters
अ प्रथम नस्त्वकिमनुभगवन भुवनेश्वर। यन्नोअंतरहृदयंविष मो हमसे स्वरोचिशा प्रतम नस्त्वयाकिमनुभगवन भुवनेश्वर। यन्नुअंतरहृदयम विषय कमोहमसीसोरोचशा प्रतम नस्त्वयाकिमनुभगवन बनेश्वर। यन्न अंतर हृदयम विषय तमोहमसीसोरोचिशा
जाने केलिए गवा।
या
यह रेखा
भगवलेश्वरागेश्वरा सी शारेबाजाजी हवा दी जा।
भगवान
ा
हासेकरोयाभगवान
शब्दर्
लो
भगवान
हम
कौन सा,
सबदार अप्र न दी हुई। ना हमको त्वया आपके द्वारा, किम क्या न नि संदेह भगवन। हे भगवन भुवनेश्वर हे संपूर्ण जगत के स्वामी। यह। क्योंकि नह हमारा अंत हृदय हृदय के अंदर विषय प्रवेश कर, तम अज्ञान का अंधकार हमसे आप नष्ट करते हो। स्वरोचिशा अपने तेज से अनुवादवातातपरिस डिवाइन ग्रेस। इसी वक्त वेदांत स्वामी शलाप्रपादमहाराज प्रपात महाराज की अनुवाद, हे प्रभु। आप सम्पूर्ण विश्व के स्वामी हैं। आपने हमें क्या नहीं दिया है? आपने हमारे हृदयों में प्रवेश करके अपने तेज से हमारे अज्ञान के अंधकार को दूर किया है। यही सर्वोत्कृष्ट उपहार है। हमें भौतिक दान की आवश्यकता नहीं है। तात्पर्य जब द्रुव महाराज को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान द्वारा वर दिया जा रहा था, तो उन्होंने कहा हे प्रभु। मैं पूर्ण रूप से संतुष्ट हूं। मुझे किसी प्रकार के भौतिक वर्ग की आवश्यकता नहीं है। इसी प्रकार जब प्रलाद महाराज को नर्सिंग देव वर्ग दे रहे थे तो उन्होंने भी उसे लेने से मना कर दिया और यह घोषित किया कि भक्त को उस वणिक अर्थात बनिए के समान नहीं होना चाहिए, जो किसी लाभ के बदले में कोई वस्तु देता है। जो व्यक्ति किसी भौतिक लाभ हेतु भक्त बनता है, वो शुद्ध भक्त नहीं है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान सदा से ब्राह्मणों को उनके हृदय में प्रकाश देते रहते हैं। सर्वस्चहमहदिसनिवेस्टो मत, स्मृति, ज्ञान, मपोहनमचह, चूंकि, ब्राह्मण तथा वैष्णव सदा से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान से मार्ग दर्शन पाते रहते हैं। अतएव वे भौतिक संपदा के कभी भी लालची नहीं रहे। जितना अत्यंत आवश्यक है, वो उतना ही रखते हैं, परन्तु उन्हें विस्तृत साम्राज्य की कामना नहीं रहती। इसका 1 उदाहरण वामन देव द्वारा प्रस्तुत किया गया था। ब्रह्मचारी के रूप में वामन देव ने केवल 3 पग भूमि चाहे थे। अपनी इंद्र त्पति हेतु अधिक से अधिक की चाह करना निरा अज्ञान है। ब्राह्मण या वैष्णव के हृदय में इस अज्ञान का स्पष्ट अभाव रहता है। श्लप्रपादकीअनुवाद हे प्रभु। आप सम्पूर्ण विश्व के स्वामी हैं। आपने हमें क्या नहीं दिया है। आपने हमारे हृदय में प्रवेश करके अपने तेज से हमारे अज्ञान के अंधकार को दूर किया है। यही सर्वोत्कृष्ट उपहार है। हमें भौतिक दान की आवश्यकता नहीं है,
बंदे हम श्रीगुरु श्रीधa
नताशीविताएकजा
या से
होने का द। हरे हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम हरे
जय, श्रीराम
जय, श्रीराम हेलो
आज कल राम का नाम सब हो गए है।
जैसा की मैं कह रहा था उस दिन आज कल राम का नाम सब लोग ले रहे हैं।
भगवान के नाम में इतनी शक्ति है। ज्ञान, ज्ञान से जो भी लेगा, उसका लाभ उठाएगा।
भगवान के नामों में इतनी शक्ति है कि जानेअनजाने में जो कोई भी उसका नाम उनका नाम लेगा, उसको लाभ मिलेगा।
जैसे कई बार हम हरी नाम में जाते है और लोग आगे हंसी उड़ाते हैं, वो हँसी उड़ाने में उनका लाभ है।
कई बार हम हरिनाम में जाते हैं, तो लोग आ कर के हंसी उड़ाते हैं। लेकिन वो हंसी उड़ाने में भी उनका लाभ है।
भगवान राम के नाम का उच्चारण हो रहा है, अच्छी बात है।
भगवान राम के नाम का उच्चारण हो रहा है। यह बड़ी अच्छी बात है।
राम की लीला है।
राम की जो लीला है, वो बहुत दिव्य है।
हम सोचते हैं कि मोदी वाले व्यक्ति यह नहीं समझ पाते कि हम भगवान का नाम ले।
हम सोचते हैं कि भौतिकवादी यह नहीं समझ पाते कि भगवान का नाम ले। तो वो सही है।
तो 1 नाम का शख् स ले।
वो कहते हैं तुम 1 ही नाम को चारण दिन रात करते हो, थकते नहीं। क्या गीता पढ़ते थे, गीता रोज पढ़ते हो, थकते नहीं।
रामायन महाभारत की कथा है। आपने हजारों बार सुनी है।
रामायण और महाभारत कथा आपने हजारों बार सुनी है। फिर भी आप थकते नहीं, थकते हो।
उ जितना ज्यादा हम उच्चारण करते हैं, उतने ज्यादा आनंद आता है, उल्टा जितना
हम ज्यादा उच्चारण करते हो, उतना ज्यादा आनंद आता है।
भौतिक स्थिति में अगर ज्यादा करते हो, तो
भौतिक स्थिति में, अगर आप ज्यादा करते हो तो टेस्ट घटते जाता है।
जैसे आपको भूख लगी है, छपालीाओगआ, अगर
आपको भूख लगी है और पहला चपाती खाते हो तो आपको अच्छा लगेगा, आनंद आएगा दूसरे में और दूसरे खाओगे थोड़ा कम हो जाएगा। तीसरे में और कम और फिर काहे। और नहीं चाहिए।
लोग गाना बार बार जाते हैं।
तो आप देखोगे बाहर के प्रोग्राम मे लोग 1 ही गाना बार बार बजाते
हैं, रेडियो नहीं नहीं, 1 ही बार,
1 ही बार, 1 गाना, 1 बार बजाते हैं।
क्यों क्यों, दूसरी बार बजायेंगे तो लोग
थक जायेंगे, क्योंकि दूसरी बार जाएंगे तो लोग थक जायेंगे।
न्यूज पेपर की हेडलाइन 1 ही होती
है, न्यूज पेपर की हेडलाइन रोज 1 ही होती है। मतलब फ्रेश होती है। वो बदलते हैं, रोज बदलते हैं, वो
की वो नई चीज पढ़ना चाहते हैं।
क्योंकि लोग नई चीज पढ़ना चाहते हैं।
तो आध्यात्मिक कार्य में व्यक्ति कभी सखा नहीं है।
आध्यात्मिक कार्य में व्यक्ति कभी थकता नहीं है।
और इसी प्रकार राम दिन राज गुगन करोगे।
इसी प्रकार अगर आप रामचन्द्र की लाओ का दिन रात गुणगान करोगे तो कभी नहीं थकोगे। भगवान राम प्रकट हुए थे। त्रेता युग में, महाराज इक्ष्वाकु के वंश
में
राम जो शुरू से ही थे,
पर भगवान राम जी शुरू से ही परम भगवान थे।
शास्त्र में साबित किया जाता है।
शास्त्रों में यह स्थापित किया जाता है।
भागवतम के 9 के लीलाओं का वर्णन केवल संक्षेप में है।
भागवतम के नौवे स्कन में, भगवान राम के जिला का वर्णन केवल संक्षेप में है।
क्यों?
क्यों?
क्योंकि शुगर को स्वामी ने कहा। भगवान राम की लीलाओं का वर्णन अनेक प्रसिद्ध भक्तों ने किया है।
मैं आवश्यक, क्योंकि सुखदेव स्वामी ने कहा कि भगवान राम की लीलाओं का वर्णन अनेक प्रसिद्ध भक्तों ने किया है। मैं केवल संक्षेप में बताऊंगा
केवल 2 अध्यायों में राम की लीला का वर्णन किया।
इसलिए उन्होंने केवल 2 अध्यायों में भगवान राम लीला का वर्णन किया है।
इसलिए पावर के द्वारा में राम लीलाओं का
है। इस प्रकार 2 अध्यायों में हमें भगवान राम लीलाओं का संक्षेप में ज्ञान प्राप्त
हो रहा है में आपने पढ़ा भगवान प्रकट हुए थे।
भाइयो के दसवें अध्याय में आपने पढ़ा किस प्रकार भगवान प्रकट हुए थे? अपने भाइयों के साथ कौन भारत, कौन भारत, शत्रुग्न लक्ष्मण
में लक्ष्मण का जो
प्रेम था, इन सब में लक्ष्मण का जो प्रेम था वो भगवान के लिए खास था।
अलग अलग समय में सोते हैं धर्म
के लिए, भगवान अलग अलग समय में अवतरित होते हैं। धर्म की स्थापना करने के लिए धर्म
तार होता
यदायदायधर्मस्या ग्लानी भवती भारत में अलग अलग समय में अवतरित होता हूँ
किस लिए, किस लिए थाना के धर्म की स्थापना के लिए युवा व्यक्ति समझ भगवान का
ज जो व्यक्ति समझ जाए कि भगवान का होना, प्रकट होना दिव्य है, वो भगवान के धाम पहुँच जाएगा।
भगवान गीता में क्या कहते हैं इस विषय पर जन्म
भगवान गीता में इस विषय पर कहते हैं जन्म कर्म च मे दिव्यं एवं योवेतितत्वतजो व्यक्ति समझ आये
भगवान
जो व्यक्ति समझ जाए की परम भगवान सदैव भगवान रहते हैं, दिव्य है वो परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
वो मायावती कहते है। भगवान
मायावती कहते हैं कि जब भगवान धरती प्रकट होते हैं तो साधारण पुरुष
बन जाते हैं भगवान सदा भगवान, भगवान
सदैव भगवान रहते हैं।
जिला छोटी आयु से कर दिया था।
भगवान अपनी अद्भुत दिला छोटी आयु से प्रकट करना प्रारंभ कर देते हैं।
रावण का विजय हुआ रावन, राम का
विजय हुआ रावण के प्रति, रावण के
रावन का रावण कौन था?
रावण कौन था भक्त भक्त, भक्त या भक्त।
जो कुमार आज है बरहज के पुत्र की यात्रा कर।
जो कुमार थे ब्रह्मा जी के पुत्र वो ब्रह्माण्ड की यात्रा कर रहे थे।
उनके पिता ने कहा था में प्रवेश करो, संतान बढ़ाने के लिए।
उनके पिता ने कहा था ग्रहस्त में प्रवेश करो, संसार बढ़ाने के लिए, उन्हें संतान बढ़ाने का संतान बढ़ाने के लिए
नहीं, हमने ही प्रवेश करना।
उन्होंने कहा नहीं, हमें ग्रहशस्त्र में प्रवेश नहीं करना।
जैसे कई बार हमारे भक्तों को
विवाह करो। जैसे कई बार हमारे भक्त को लोग कहते हैं विवाह करो।
ये असली धर्म है।
वो लोग कहते हैं ये असली धर्म है।
कई बार हमारे भक्तों को कहते है,
कई बार हमारे भक्तों को माँ। बाप कहते हैं कि गृहस्थ में प्रवेश करो, यही असली धर्म है,
भाव से नहीं। नहीं। हम
तो वो लोग फिर कहते हैं नहीं, नहीं, नहीं, ये असली धर्म नहीं है।
शास्त्र के आधार पर तो कुमार ने इसी प्रकार इनकार कर दिया,
तो इसी प्रकार कुमारा ने जो है ग्रहस्त में जुड़ने के लिए इनकार कर दिया।
छोटे बच्चे नंगे घूमते हैं, ये छोटे
बच्चे नंगे घूमते थे,
घूमते है, छोटे
बच्चे नंगे घूमते हैं। यात्रा करते करते करते करते भगवान के दम वैकुंट पहुँच गए।
वहाँ उन्हें चौकी धार ने रोक दिया।
वहां उन्होंने जय विजय चौकीदारों ने रोक दिया।
मंदिर में एंट्रेंस पर द्वारपाल होते है।
आपने देखा होगा इस कौन मंदिर में एंट्रेंस पर द्वारपाल होते है।
ये
2 चौकीदार थे।
पाल ने कहा रुको रुको।
द्वारपाल ने कहा रुको रुको, तुम नंगे बच्चे अन्दर नहीं जा सकते,
आनंद आ
रहा था रोको रोको।
तो उन लोगो को इतना आनंद आ रहा था उस स्थान पर पहुँच कर के, तो उन्होंने कहा रुको रुको, ये डिस्टर्ब हो गए
योग्य नहीं हो।
उन्होंने कहा तुम इधर आने के योग्य नहीं हो।
भगवान ने वार्ता सुन लिया था, भगवान
ने यह वार्तालाप सुन लिया था। भगवान उधर आये, भगवान उधर आ गये
प्रेम से चर्चा के अपने द्वारपालों से, कुमार को लगा की हमने गलती कर दी है।
भगवान ने इतने प्रेम से चर्चा की अपने द्वारपालों से की। कुमार स को लगा कि हमने गलती
कर दी है, वो हमने गलती से आपको श्राप दिया है।
तो न्होंने वो कहने लगे हमने गलती से आपको श्राप दे दिया।
नहीं यह मेरी इच्छा थी।
भगवान ने कहा नहीं, यह मेरी इच्छा थी की तुम श्राप 2
हमें यह नहीं सोचना चाहिए। हम 1 दुसरे को श्राप दे और कहे कि भगवान की इच्छा है, हमें
यह नहीं सोचना चाहिए की हम 1 दुसरे को श्राप दे और कहे यह भगवान की इच्छा है।
हमारे श्राप में,
हमारे श्राप में कोई शक्ति नहीं है।
तो उनको ये छूट दी या वो वो भक्त के रूप में आ सकते थे के रूप में, तो उनको छूट
दी गई थी कि वो भक्त के रूप में आ सकते थे या अभक्त
के रूप में के रूप में। ज्यादा मधुर बनाने के लिए। 3 जनम लेने पड़ेंगे अगर भक्त के
रूप में आयेंगे, भगवान लिला को मधुर बनाने के भक्त भक्त के रूप में आयेंगे। तो 3 जनम लेना पड़ेगा उनको
के रूप में आये।
और अगर भक्त के रूप में आयेंगे। तो 7 जनम उनकी क्या थी, उनकी छा क्या थी?
जल्द से जल्द लौटे, भगवान के धाम,
उनकी छाती का जल्द से जल्द, भगवान के धाम लौटे।
जो साधारण सूर नहीं है।
तो आप देखते हैं ये जो असुर है, ये साधारण असूर नहीं है।
बड़ी गहरी तपस्या उठाई थी, हिरन बड़ी
गहरी तपस्या उठाई थी और
पूजा की।
और रावन ने भी पूजा की थी।
यह जो है सर रोल धारण कर।
तो ये थे असुर, पर ये असुर का रोल धारण ड्रामा कर रहे थे।
रावण के 10 न दूसरों को केवल दुख दे।
तो रावण का अर्थ है जो केवल दूसरों को दुख दे, दू को रुलाये, दूसरों को रुलाये, यह है रावण का, ये है रावण का अर्थ।
भगवान कौन है? वो स्वयं भगवान है।
तो आपने पढ़ा कि परम भगवान कौन है? वो स्वयं भगवान है, रामजी स्वयं भगवान है,
भगवान जो हैं, वे है।
भगवान जो है, वो अद्वेत, अच्चूत। वो कभी अनंत रूपम
प्रकट हो सकते
हैं, वो पशु के रूप में भी प्रकट हो सकते हैं।
भगवान के रूप में प्रकट हुए आधे
पुरुष, आधे पशु, जैसे नरसीन देव के रूप में प्रकट हुए आधे पशु, आधे पुरुष।
तो बड़े भगवन राम बड़े हो गए थे। जब उन्हें पता लगा सीता का हरण
हो गया है, तो भगवान राम बड़े क्रोधित हो गए थे जब उन्हें पता लगा कि सीता का हरण हो गया
है
में गए जो सेना थी उनमें केवल 2 को गया था, 2 व्यक्तियों के पास धनुष चलाने का योग्यता थे।
वो जब युद्ध के लिए गए, उनकी सेना में केवल 2 व्यक्तियों के पास धनुष चलाने की योग्यता थी। बाकी सब क्या थे, बाकी सब क्या थे।
बंदर और भगवान रावण की सेना में कौन थे। रावण के पास सारे आधुनिक हथियार थे
और रावण के पास सारे आसुरिक हथियार थे।
आधुनिक उनके पास ऐसे हथियार थे जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर थे।
उनके पास ऐसे हथियार थे जिनकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते है।
ऐसा हथियार है मान लो, वो हजारों आदमी है, मारना हो तो भी टारगेट को मारेगा।
ब्रह्मास्त्र ऐसा हथियार है कि मान लो अगर हजारों आदमी है और किसी 1 को मारना है तो उसी टारगेट को मारेगा। वो
राहुल की विजय हुई, युद्ध में
राम की विजय हुई,
राम केवल बंदर,
राम की सेना में केवल बंदर थे।
उर में केवल पहाड़ की चोटियों को उठा कर बड़े बड़े पत्थर को उठा कर
युद्ध में लड़े तो वो केवल पहाड़ की चोटियों को बड़े, बड़े पत्थर को उठा कर युद्ध में लड़े।
बाबाजी तातपरेमेकहते हैं। 2 प्रकार की शक्तियाँ हैं।
प्रपा जी, तातपरे में कहते हैं 2 प्रकार की शक्तियां होती हैं बहुत ही भौतिक और आध्यात्मिक करे ुद्ध से पहले, कुरु कुरु क्षेत्र में युद्ध से पहले
ने कहा था मुझे ले लो या मेरी सेना को ले।
2 भगवान ने कहा था या तो मुझे ले लो या मेरी सेना को ले लो।
तो सोचा भगवान ने तो कह दिया है में नहीं लड़ेंगे पर, तो उनको लेने का क्या फायदा।
तो दुर्योधन और ग्रुप ने सोचा कि भगवान ने तो कह दिया वो युद्ध में लड़ेंगे, नहीं तो उनको लेकर क्या फायदा।
और जो चाहिए हथियार ले।
और जो पांडव थे उन्होंने कहा हमें कृष्ण चाहिए, हथियार नहीं,
ये है भक्त
भक्त के भाव में, ये है अंतर अभक्त और भक्त के भाव में भक्त
जो है, चाल है भगवान को, भक्त
जो है वो चाहता है भगवान को और
आनंद उठाये।
और जो भक्त है वो सोचते हैं कि भौतिक सुविधाओं के द्वारा हम आनंद उठायेंगे लामा।
कहते हैं सवर्गतिमीविश्णु लोग यह नहीं जानते है कि असली सुख कैसे प्राप्त हो सकता है।
प्रलाद माज कहते हैं नतेविदुस्वार्दगतिमी विष्णु लोग ये नहीं जानते कि असली सुख कैसे प्राप्त करें।
भोजवानी व्यक्ति सोचते हैं की अगर हम बौधिक धन प्राप्त कर ले, प्राप्त कर ले, उसमें सुख मिलेगा।
भौतिवादी सोचते है की अगर हम भौतिक, धन, बुत, इंद्र सुख प्राप्त करे तो उसमे सुख मिलेगा सोचते हैं।
क्या हमें असली आना चाहिए? भक्ति भक्ति मार्ग में जुड़ना चाहिए।
तो भक्त सोचते है की अगर हम असली आनन चाहिए तो भक्ति मार्ग में जुड़ना पड़ेगा।
न गीता में क्या कहते है भक्ति?
भगवान? गीता में कहते हैं भक्ति मा अभी
जान आती जो भगवान ने बड़ी सपर का पालन किया, 14 साल बदमाश किया था। और जैसे हम कह रहे थे भगवान की मार और भगवान 1050 थी, तो
हम उस दिन बता रहे थे कैसे भगवान राम ने बड़ी तपस्या की, 14 साल वनवास जा करके उनकी माता थी कौशल्या और उनके पिता ने साढ़े 300 विवाह किया था।
तो जब भगवान राम अयोध्या लौटे, भक्तों ने बड़े उत्साह से उनका स्वागत, जब
भगवान राम अयोध्या लौटे तो भक्तों ने बड़े उत्साह से उनका स्वागत किया, उनके
शासन में किसी प्रकार का क्लेश था,
उनके शासन में किसी प्रकार का क्लेश नहीं था।
वैसे, जन, शोक ये सब हम अनुभव करते हैं।
जैसे हम सब जन मृतु, जरा, व्याधि, लैमेनटेशन, शोक ये अनुभव करते है, कोई
दुर्घटना भी जाती है, शोक अगर कोई
दुर्घटना हो जाए तो हम शोक मनाते हैं
और कोई सुविधा को प्राप्त न हो तो
अगर कोई सुविधा में प्राप्त नहीं हो तो हम लेमिटेशन करते रहते हैं।
पर भगवान राम राज्य में किसी प्रकार
का कष्ट नहीं, भगवान राम के राज्य में किसी प्रकार का कष्ट नहीं था,
आज के समाज में कई बार राज्य दे, लोग कहते है की हम हम राम राज्य देंगे, हमें वोट 2 हम राम राज्य देंगे।
आज के समाज में कई नेता लोग कहते हैं कि हमें वोट 2 हम राम राज्य देंगे।
राम राज्य के समय समाज सुखी था
क्योंकि राम राज्य के समय समाज बहुत
सुखी था, राम राज्य के समय ग्राम जी का सम्बन्ध प्रजा के साथ वैसे था जैसे बाप का बेटे के साथ।
राम राज्य के समय भगवान राम का सम्बन्ध प्रजा से ऐसे था जैसे 1 बाप का ने बेटे के साथ भगवान
राम को पूरी चिंता रहती थी। समाज के सुख के लिए भगवान राम
को पूरी चिंता रहती थी समाज के
सुख के लिए और जो प्रजा थी वो अत्यंत सुखी है, वो अत्यंत सुखी थी। भगवान भगवान राम के शरणागत हो गए
थे और जो प्रजाति वो अत्यंत सुखी थी कि वो भगवान राम के शरणागत थे।
सो जो नेता है, देश का, राज्य का, इसमें होना चाहिए, जो नेता है,
देश का, उसका चरित्र होना चाहिए।
और होगा तो धर्म के नियमों का पालन होगा।
अगर ऐसा होगा तो धर्म के नियमों का पालन होगा।
प्राचीन समय में हमारे जो नेता थे उन्हें राज ऋषि कहा जाता था।
प्राचीन समय में हमारे नेताओं को राज ऋषि कहा जाता था। राजा भी थे, राजा भी थे और रिषि भी थे।
आज आप कह सकते हो में आज
आप कह सकते हो किसी को ऐसा नहीं
जो राम राज्य के समय सब
सुखी थे, रामराज्य के समय सब सुखी
थे और मृत्य के समय भी आप
खुद न, मृत्यु के समय भी आप खुद चुन सकते थे, यह सुविधा है, आपको गया, आज ये सुविधा है आपके
पास, से के समय आप खुद चुन,
सको की मृत्यु के समय आप खुद चुन सको। सुविधा, यह सुविधा नहीं है।
लोग इतने सुखी थे, किसी चीज की
कमी नहीं थे, राम राज्य में लोग इतने सुख थे, भगवान ने इतनी सुविधा दी थी कि किसी चीज की कमी
नहीं थी, सागर भरे हुए थे, जल
के साथ, सागर भरे हुए थे, जल
के साथ पेड़ भरे हुए थे, फलों
के साथ पेड़ भरे हुए थे, फलों के साथ। पृथ्वी पर अन का उत्पादन, पृथ्वी पर अन का उत्पादन।
किसी चीज की कमी नहीं थे, किसी
चीज की कमी नहीं थी।
शासन किया इतनी ही थी कि वो बस बदल कर जाते थे। यह पता लगाने के लिए व्यक्ति दुखी है। यह सुखी है।
भगवान राम को अपनी प्रजा की इतनी चिंता होती थी कि वो भेस बदल कर जाते थे। ये पता लगाने के लिए कि प्रजा सुखी है, कि दुखी है।
आजकल कई स्थानों में सरकार की आलोचना
करो, जेल अगर आज के स्थान में आप सरकार की आलोचना करो तो आपको जेल भेज देते हैं। कई स्थानों में कई स्थानों में
पेश बदल कर जाते थे। यह देखने कि क्या है।
भगवान राम भेज बल जाते थे देखने के लिए कि क्या समस्या है प्रजा
की भवन राम ने राजगलीप्राप्तकरने के पाद, अब पूरी राम जो थे पूरे पृथ्वी के राजा थे।
भगवान राम जो थे पूरे पृथ्वी के राजा थे।
प्राचीन समय में पूरी पृथ्वी को भारत वर्ष कहा जाता था।
प्राचीन समय में पूरे पृथ्वी को भारत वर्ष कहा जाता था।
पर आज भारत वर्ष है। बहुत छोटा है।
आज का जो भारत वर्ष वह बहुत छोटा है।
जैसे कि गोवर्धन पर्वत 5000 साल पहले इतना ऊंचा था कि आकाश तक
जैसे कि गोवर्धन पर्वत 5 साल पहले इतना ऊंचा था कि आकाश तक उसकी ऊंचाई थी।
अब बहुत छोटा हो गया है, अब
बहुत छोटा हो गया है।
तो समय किसी प्रकार का खिलेश नहीं था।
भगवान राम के समय किसी प्रकार का क्लेश नहीं था।
भगवान राम ने राज्य को बाटा।
भगवान राम ने अपने राज्य को बाटा
पाठ दिया।
उत्तर पार्टिया 11 ब्राह्मण को
साउथ
और
ऐसे साउथ ईस्ट वेस्ट में सभी ब्राह्मणों को बाट दिया।
सारी सम्पत्ति
सारी संपत्ति बांट दी थी।
ब्राकोबुलाय आपको समाज में खास थान है। उन्होंने अपने सारे गहने और बाट तो
भगवान राम ने सभी ब्राह्मणों को बुलाया और कहा कि आपका समाज में खास थान, है तो अपने सारे गहने तक भी बाँट दिए थे।
उन लोगो को सीता देवी,
सीता देवी ने भी सब कुछ बाट दिया। के केवल 1 नथनी थी उनके पास।
भगवान राम
और भगवान राम ने अपनी सारी संपत्ति बांट दी और सारी सम्पति ब्रह्मण को बांट दी। का होना आवश्यक है, समाज में ब्राह्मण का होना आवश्यक है। चतुर वर्णा मया सिस्टम गुना कर्मा विभाग सह भगवान गीता में कहते हैं कि 4 वर्ण और 4 आश्रम होने चाहिए।
समाज में ब्राह्मण में गुण होने चाहिए,
ब्राह्मण में गुण होने चाहिए।
नहीं नहीं हम नाम के ब्राह्मण बन जाए।
यह नहीं कि हम नाम के ब्राह्मण बन जाए।
भारत में आप मिले हो।
आम ब्राह्मण, हम कई बार भारत में आप सुनते हो। लोग कहते हैं हम ब्राह्मण हैं, हम ब्राह्मण हैं।
ब्राह्मण व्यक्ति बचाता है।
गुणों के आधार पर ब्राह्मण व्यक्ति को पहचाना जाता है। गुणों के आधार पर जैसे कि बाकी,
सीधा, सरवली ठाकुर पहले महान चाहिए थे ने स्पष्ट बताया समाज में ब्राह्मण व्यक्ति बदले।
गुणों के आधार पर भक्ति सिद्धांत ठाकुर जी पहले ऐसे महान आचार्य थे जिन्होंने बताया ब्राह्मण गुणों के आधार पर बनता है।
कई बार लोग ब्रहम गुन दोष देते थे। स्वामी जी ने तो मलेको ब्राह्मण बना दिया।
कई बार लोग प्रहोपाजी को दोष देते थे कि स्वामी जी ने तो मलेच्छों को ब्राह्मण बना दिया।
वो ने पूछा आपने कोई चमत्कार किया है?
तो प्रॉपर जी से किसी ने 1 बार पूछा आपने कोई चमत्कार किया है कर सकते हो, आप चमत्कार कर सकते हो।
पर जी ने ही प्रपा जी ने
कहा नहीं बट 1 चमत्कार मैंने किया
है क्या क्या मैंने हजारों, ब्राह्मण ना
मैंने हजारों, मिर्चों को ब्राह्मण बना दिया है।
तो भक्ति सिधारी पहले माना चाहिए थे जिन्होंने ये सब किया ब्राह्मण बनता है उनके आधार पर।
तो भक्ति सिधार पहले माना चाहते थे जिन्होंने स्थापित किया व्यक्ति ब्राह्मण बनता है। गुणों के आधार पर
भग्न ठाकुर को मंत्र दिया था कि वो ब्राहमण सभा को लेक्चर दे।
1 समय भक्तों ठाकुर को निमंत्रण दिया था कि वह ब्राह्मणों की सभा को
लेक्चर दे और भोज का स्वाद ठीक नहीं था भक्त को भेजा और भक्ति
नो जी का स्वाद ठीक नहीं था। तो उन्होंने भक्ति सिधांत जी को भेजा
तो प्रवचन आरम्भ किया ब्रामण।
तो भक्ति सिधांत जी ने पहले तो प्रवचन को आरंभ किया ब्राहमण का गुणगान से प्रशंसा करके।
ये सच बात है।
ना समाज में बहुत आवश्यक है, यह सच बात है। ब्राह्मणों का होना समाज में बहुत आवश्यक है।
आप सिर के बिगड़ने की।
आप कभी सिर के बगैर कभी शरीर
देखा है, कोई हाथ के बिगर देखा होगा, पाँव के देखा देखा होगा, देखा
हाथ के बगर देखा होगा, पाँव के बगर देखा होगा, आँख के बगर देखा होगा। बट सिर के बगैर कभी देखा है?
शरीर में ऐसी ब्राहमण की तुलना की जाती है, सिर के साथ ब्राह्मणों की
तुलना की जाती है सिर के साथ।
वे भक्ति से जब यह साबित किया कि शोक के आधार पर ब्राहमण बनता है, गुणों के आधार पर, और के आधार पर।
भक्ति साज ने यह स्थापित किया कि व्यक्ति ब्राह्मण बनता है गुणों के आधार पर, लेकिन जन्म के आधार पर नहीं।
ब्राह्मण बड़े क्रोधित हो गए तो सारे
ब्राह्मण बड़े क्रोधित हो गए? और
इसलिए आप पढ़ते हो। ब्राहमण ने योजना बनाई थी भक्ति जिला
का वध करने के लिए, और आप भक्ति के लीला में पढते हो कि उन ब्राह्मण योजना बनाई थी भक्ति साजी का वद्ध करने के लिए।
जब भक्त साधी परिक्रमा में जा रहे थे। 1 समय जो गुंडे आये, जो पत्थर
फेंकने लगे, बक्शानी जब 1 बार परिक्रमा में जा रहे थे तो गुंडे आकर कर पत्थर फेंकने लगे
कपड़ा सैफरॉन कपड़ा धारण कर लिया था।
उनके 1 शिष्य ने सैफरोन कपड़ा धारण कर लिया था जिसके द्वारा जिसके द्वारा वो पहचान नहीं सके।
ब्राह्मणों का होना बहुत है, ब्राह्मणों का
होना बहुत आवश्यक है।
गवान राम ने अपनी सारी सम्पत्ति बाँट दी सारे
भगवान राम ने अपनी सारी संपत्ति गहने त्यादि ब्राह्मणों को बांट दी थी।
और ब्राहमणों ने क्या किया, ब्राह्मण ने क्या किया है तो सब कुछ स्वीकार
कर लिया पहले तो सब कुछ स्वीकार कर लिया।
गे गे ने सब कुछ ब्रामण, हम संतुष्ट है। मैं इन गानों की आवश्यकता ने।
फिर। ब्राह्मण ने कहा कि हम आपसे इतना संतुष्ट हैं, क्या मैं इन गहनों की आवश्यकता नहीं है।
हम हा, हमें अज्ञानता से बचाया है।
आपने हमारे हृदय में जा कर के हमें अज्ञानता से बचाया है।
आप जो हो,
आप जो हो पूरे पृथ्वी के स्वामी हो।
भगवान श्रीराम परम भगवान है,
भगवान श्री राम परम भगवान है, कोई देवी देवता नहीं है।
इसका उच्चारण ब्राह्मण कर रहे है।
ये जो श्लोक आज का है, इसका उच्चारण ब्राह्मण कर रहे हैं।
ब्राह्मण जो है अत्यंत थे। जब भगवान ने उन्हें सारी सम्पति अपनी
बात, तो ब्राह्मण अत्यंत प्रसन्न थे। जब भगवान ने उन्होंने अपनी सारी संपत्ति बांट दी।
उन्होंने अपने ब्राह्मण को पेड़ के रूप में दिया था।
उन्होंने अपने जो भी उनको गिफ्ट मिला था, सब ब्राह्मण को दे दिया था।
ब्राहमण ने क्या किया? ब्राह्मण ने कहा कि हमें उतना ही 2 जितना आवश्यक है।
ब्राह्मण ने कहा हमें उतना ही 2 जितना आवश्यक है।
बाकी उन्होंने इनकार कर, बाकी उन्होंने इनकार कर दिया।
लेने से।
आज के ब्राहमणों को आप सम्बधित होगे, वो कहेंगे उतना ही जितना आवश्यक हो।
आज के ब्राह्मण को अगर आप संपत्ति दोगे तो कहेंगे उतना ही 2 जितना जरुरत है, वो लालची है, वो लालची है।
वो कहेंगे जितना 2 उतना ही कम है।
बोले जितना 2 उतना ही कम है।
ब्राह्मण थे। उन्होंने प्रेम से स्वीकार किया, जो भगवान ने दिया। उन्होंने कहा हमें इतनी पृथ्वी नहीं चाहिए।
ब्राह्मणों ने प्रेम से स्वीकार किया, जो भगवान ने दिया। फिर कहा कि हमें इतनी पृथ्वी नहीं चाहिए।
सब उतना ही लोग।
जितना आवश्यक हो, उतना ही 2 जितना आवश्यक हो।
जो जो सीधा ने अपने गहने दिए और भ भगवान ने वो भी उन्हें लुटा दिए।
और जो गहने सीता, मैया और भगवान ने दिए वो भी लौटा दिया।
उन्होंने यह त्याग। ये है त्याग ब्राह्मण के गुणों का वर्णन। गीता अध्याय में ब्राह्मण के गुणों का
वर्णन गीता के 18 अध्याय में है।
समुद्र ब्रह्मा, स्वभाव, ये गुण ब्राह्मण के हैं। वो
ब्राह्मण के जो गुण हैं समोदमोतपोसौचम, ये गुण भगुततकअठारध्य में वर्णन करते हैं।
भगवान देखिये उदाहरण।
ये बड़ा प्रसिद्ध उदाहरण है।
प्राजी युव, मराज और मैच का वर्णन करते हैं।
तात्तरमेंप्रौपाजी, द्रु महाराज और प्रलाद महाराज का वर्णन करते हैं।
पापाजी ने। इस लोक में ब्राहमण विषय में प्राजी कहते हैं। द्र माराज और प्रलाद मराज उनका उदाहरण देते हैं।
तो प्रपा जी ब्राह्मणों के विषय में ध्रुव महाराज और प्रहाद महाराज का उदाहरण देते हैं।
ध्रुव माराज ने बड़ी बड़ी गहरी तपस्या उठाई।
ध्रुव महाराज ने बड़ी गहरी। तपस्या उठाई थी, उनकी इच्छा थी मुझे
1 बार राज्य प्राप्त हो।
उनकी इच्छा थी की मुझे 1 महान राज्य प्राप्त हो। तपस्या और उनकी तपस्या से भगवान बड़े प्रसन्न थे।
मा ने कहा मेरे कारण तुम मांगो में से क्या चाहिए।
भगवान ने कहा द्रु मेरे कारण, तुम इतनी तपस्या उठाई मांगो क्या मांगते हो?
द्रुमक अगर लेना चाहते हो तो ऐसा वर दीजिये कि सदा
तो दुरमर ने कहा कि अगर मुझे आप वर देना चाहते है तो ऐसा वरदान दीजिये की मैं सदा। उच्च भक्तों के संपर्क में आऊँ, उन भक्तों के संपर्क में, उन्नत भक्तों, उन्नत भक्तों, एडवांस डी ओ टी के संपर्क में आऊँ वो वर चाहिए, भक्त की
सर में आओगे तो क्या लाभ होगा।
अगर आप भक्तों की संगत मे गे तो क्या लाभ होगा, क्या लाभ होगा, क्या लाभ होगा, आप कृष्ण कथा सुनोगे, आप कृष्ण कथा सुनोगे।
उन भक्तों में 1 भाव रहता है, हर 1 को ज्ञान दिया जाए।
उन्नत भक्तों में 1 भाव रहता है कि हर 1 को दिव्य ज्ञान दिया जाए।
इसलिए उन भक्तों की संगत में आओ तो भक्त प्रसन्न हो जाते हैं इसलिए
उन भक्तों की संगत में आओ तो भक्त प्रसन्न हो जाते है।
क्यूँ की आपको वो ज्ञान मिलता है जिसके द्वारा वो जीवन के लक्ष्य को
प्राप्त कर सके क्योंकि आपको वो ज्ञान मिलता है जिसके द्वारा आप जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सके और अपने
सामान के भक्तों को मिला तो क्या
भाव होना चाहिए और अपने सम्मान के भक्तों को मिले तो क्या भाव होना चाहिए।
मित्रता मैत्री का भाव मिलकर, भगवान की
सेवा करे कि हम मिल कर, भगवान
की सेवा करें में हजारो भक्त हैं,
अलग बैग्राउंड है, इस कान में हजारों भक्त है और हर 1 का अलग बैकग्राउंड है।
अलग प्रकार के शिक्षा, अलग प्रकार की शिक्षा, सबका भाव क्या होना चाहिए और
सब का भाव क्या होना चाहिए। विष्णु की सेवा, विष्णु की सेवा। तो आप भागत में पढते हो। कि जो प्रचेता थे, उन्होंने बड़ी गहरी तपस्या उठाई थी,
भाई े वो भाई
थे, 10 भाई थे। तो भगवान बड़े प्रसन्न हुए, भगवान बड़े प्रसन्न हुए।
मा ने कहा भगवान ने कहा भक्त से, तुम भाइयों से बड़ा प्रसन्न हूँ,
मैं तुम सभी भाइयों से बड़ा प्रसन्न हूँ। क्योंकि तुम सब में 1 ही भाव है। कृष्ण सेवा, सौरी, कृष्ण की सेवा, कृष्ण की सेवा।
तो हम यह भाव होना चाहिए।
तो हमारे अन्दर भी यही भाव होना चाहिए। उदाहरण दे प्रपा जी प्रलाद महाराज का उदाहरण देते हैं।
पिता ने कहा था पर इतना कष्ट, अनुभव का प्रलाद।
महाराज को। भगवान ने कहा था कि मेरे कारण तुमने इतना कष्ट कहा?
तुम मांगो, मुझे क्या मांगना, तुम मांगो,
मुझसे क्या मांगते हो,
व्यापारी नहीं हूँ।
न्होंने कहा भगवान, मैं कोई व्यापारी वणिक नहीं हूँ।
मुझे अगर आप वर्ड देना चाहते हो, ये वर दीजिये कि मेरे हृदय में किसी प्रकार का भौतिक आकर्षण नहीं।
अगर आप मुझे वर देना चाहते हो तो ये वर दीजिये कि मेरे हृदय में किसी प्रकार का भौतिक आकर्षण नहीं हो।
तो ये होनी चाहिए हमारी इच्छा तो ये होनी चाहिए। हमारी इच्छा, उन्नत भक्तों की संगत में
रहे, उन्नत भक्तों की संगत में रहे।
और हृदय में जो बहुत ही आकर्षण है उससे हम बचे और हृदय में
जो भौतिक आकर्षण है उससे हम बचे।
भगवान राम वो पूरी भुजा को मरा से पढ़ रहे है।
तो भगवान राम बनी पूरी पजाका जो है पुत्र से पालन करते थे।
सबसे धनी देश कौन।
है।
आज सबसे धनी देश कौन है, लोग सोचते हैं, अमेरिका लोग सोचते हैं, अमेरिका वो सच नहीं है, बट वो सच नहीं है।
मान लो, सड़कों को कैसे धोया जाता है।
तो मत मान लो अमेरिका, अमेरिका की सड़कों को कैसे धोया जाता है? सारे पानी के साथ, सादे पानी के
साथ पोरिया में सड़कों को साफ करते थे, गुलाब के परफ्यूम परफ्यूम, अयोध्या में
सड़कों को, सड़कों को साफ करते थे, परफ्यूम के साथ, गुलाब पानी के साथ
देखना चाहते हो। क्या है असली प्राचीन समय में
तो अगर आप देखने जाते हो कि धनी कौन था, तो प्राचीन समय में जो भारत था अयोध्या धाम, वो हजारों गुना
ज्यादा धनी था और भगवान राम स्वयं जाते थे देखने के लिए सफाई कैसे हो रही है?
और भगवान राम स्वयं जाते थे देखने के लिए कि सफाई कैसे हो रही है
और उदय को रोज साफ करते
थे
लड़कों को और अयोध्या को, हर स्थान को, हर दिन साफ करते थे।
और जो पानी है वो कैसे गिरता था? जो हाथी है हाथी जो है वो अभी सूट में पानी रखते थे और सड़कों को साफ करते थे तो साफ
कैसे होती थी, हाथी अपने सूंड में पानी लेकर सड़कों को साफ करते थे।
भगवान राम खुद जाते देखने की सफाई
कैसे हो रही है और भगवान राम खुद जाते थे देखने के लिए कि सफाई कैसे हो रही है।
तो तुझे प्रजा ने देखा भगवान राम इतने ध्यान से हमारी देखभाल कर रहे हैं, प्रजा और शरणागत हो गई।
तो जब प्रजा ने देखा कि भगवान राम इतने ध्यान से हमारी देखभाल कर रहे हैं तो वो और शरणागत हो गयी। ये है राम राज, ये है रामराज्य
जब राम जिया में थे अनेक भक्त भक्तों का नियम था कि हम प्रसाद खायेंगे केवल भगवान के प्रसाद, तो जब
भगवान राम अयोध्या में थे तो अनेक भक्तों का ये व्रत था कि हम प्रसाद खायेंगे रामजी के दर्शन के बाद
और तो 1 भक्त था, भगवान का 1 भक्त था इसलिए 1 महीने 1 महीने के लिए भगवान के बाहर गए थे तो पुरे 1 महीने के लिए ने कुछ नहीं खाया।
तो जब 1 बार 1 महीने के लिए भगवान राम अयोध्या के बाहर गए थे तो उस भक्त ने कुछ नहीं खाया, 1 महीने तक भूखा था भूखा था।
तो जब बाल राम लौटे, उनके भार ब्राहमण आपका इतना अच्छा भक्त है 1 महीने के लिए कुछ नहीं खाया।
तो जब भगवान राम लौटे तो उनके मंत्री लोगों ने कहा कि ये इतना बड़ा भक्त है आपका कि 1 महीने से कुछ नहीं खाया है।
भगवान राम ने आलमारी में उनकी मूर्ति थी मूर्ति को निकाल कर कहा तुम इस मूर्ति का दर्शन करो और मूर्ति पर मेरे में कोई अंतर नहीं है।
भगवान राम ने अपने अलमारी से 1 मूर्ति निकाल के दी और उसने कहा कि इस मूर्ति में और मेरे में कोई अंतर नहीं है, तो भगोत
के
रूप में भगवान प्रकट होते अर्ज विग्रह के रूप में कोई अर्च विग्रह और भगवान में कोई अंतर नहीं है ने
अपनी मूर्ति खुद भगवान ने अपनी मूर्ति खुद दी।
उस ब्राह्मण को अपनी मूर्ति उन्होंने अलमारी में छुपा के रखी थी। भगवान स्वयं प्रकट है, ये भगवान स्वयं कर दिया, प्रकट है, स्वयं प्रकट थे।
जब भगवान ने इस मूर्ति को दिया ब्रामूर्तकीुपासा को।
उन्होंने इस मूर्ति को ब्राह्मण को दिया और कहा इसकी उपासना करो भगवान राम
जब योजयाबनौरेथे स्वयं आचाया को स्वीकार किया।
भगवान राम जब अयोध्या लौटे थे, तो उन्होंने स्वयं आचार्य को स्वीकार किया और उपासना करे, तो आचार्य के शिक्षण से वो उपासना कर रहे थे।
पर भगवान स्वयं गुरु स्वीकार है। भक्ति के वीडियो का पालन करे।
पर भगवान स्वयं गुरु स्वीकार करते हैं। भक्ति के विधियों का पालन करने के
लिए भगवान कृष्ण ने भी स्वीकार किया था।
भगवान कृष्ण ने भी स्वीकार किया था कि किसे शांति पनिमुनिाचैतनमापुर ने स्वीकार किया था किसे किसे
तो परम भगवान जो
है
उदाहरण देते हैं, कैसे भगवान की सेवा करनी चाहिए?
तो परम भगवान उदाहरण देते हैं कि कैसे भगवान की सेवा करनी चाहिए।
लक्ष्मण जो है भगवान को बड़ा प्रिय
था, लक्ष्मण जो है भगवान को बड़ा प्रिय था।
और लक्ष्मण के मन में सदा है की भावना भाई की सेवा।
लक्ष्मण के मन में सदा 1 ही भाव था। बड़े भाई की सेवा, और कोई भाव नहीं था, और कोई भाव नहीं था।
कई बार उन्हें डाट भी पड़ती थी
भगवान, कई बार उन्हें डाट भी पड़ती थी, भगवान से, पर वो बर वो स्वीकार कर लेते थे।
पिता ने बोला जाओ। लक्ष्मण ने कहा मैं, मुझे अकेले जाने
नहीं दूंगा, मैं भी जाऊँगा, तुम वनवास, तुम वनवास में जाओ। राम जी को। तो। लक्ष्मण ने कहा कि मैं अकेले जाने नहीं दूंगा, मैं भी जाऊंगा, साथ में मैं भी जाऊंगी। सीता ने कहा मैं भी जाऊंगी हे
सब कठिनाइयों का सामना किया।
तो जब जंगल में गए, बहुत कठिनाइयों का सामना किया।
ल्मकोपतारा अरे भगवान खुशी क्या करना चाहती?
लक्ष्मण को पता था कि भगवान की खुशी के लिए क्या करना चाहिए।
तो सीता देवी ने देखा उसके लिए तो कोई सेवा है ही।
तो सीता देवी ने देखा की उसके लिए तो कोई सेवा है ही नहीं,
जो सेवा वो करना चाहती है। लक्ष्मन से पहले पहुँचा।
तो जो सेवा वो करना चाहती है, लक्ष्मण पहले ही पहुँच जाता है। वहाँ पर।
तो
सीता देवी बड़ी चिंता में थी,
भगवान के सामने भी था, भगवान के
सामने भी संकट था किस को खुश करें, किस को खुश करें,
वो 24 घंटे यह सोच की जाए।
और 1 तरफ लक्ष्मण था, जो 24 घंटे सोता था। राम की सेवा कैसे की जाए।
जिसकी इच्छा थी कि वो पति की सेवा करे।
और दूसर तरफ सीता थी, जिसकी इच्छा थी कि वो पति की सेवा करे।
यह प्रश्न केवल गुरु जी उत्तर मिलेगा।
1 प्रश्न तो केवल केवल गुरु जी इसका उत्तर दे सकते हैं।
गुरु जी के पास, तो वो लोग
गए, गुरुजी के पास, वो असिस्ट के पास है।
उनहोंने कहा। लक्ष्मण ने कहा मेरे मन में 1 ही इच्छा है, 1 ही लक्ष्य, जीवन का 24 घंटे भगवान की सेवा करूँ।
लक्ष्मण ने कहा, मेरे जीवन का 1 ही लक्ष्य है कि मैं 24 घंटे भगवान की सेवा करूँ।
सीता ने कहा है।
और सीधा ने कहा, मेरा भी लक्ष्य
है मैं राम की सेवा करूँ कि
मैं राम की सेवा करूँ
हो।
उन्होंने उत्तर दिया, फिर जो घर का
काम है, वो सीधा देवी की देखी,
जो घर का काम है, वो सीधा देवी करेगी।
और बाहर का कार्य है, शासन है, वो लक्ष्य मन करेगा।
और जो बाहर जो शासन का कार्य है, वो लक्षमण करेगा।
लक्ष्मण दुखी हो गया था, तो लक्ष्मण
था दुखी हो गया था।
सारा काम वही करे, उनकी छाती की
सारा काम वही करे।
भक्तों में देखते हो। 1 भक्त इच्छा होती है, सब काम मैं करूँ।
कई बार आप भक्तों में देखते हो कि इच्छा होती है, सब काम करूं। भक्त में ह
भवन राम, राम नाम हम ले रहे हैं। राम।
भगवान राम का तो नाम हम ले रहे हैं। जय श्री राम बोल करके। लेकिन उनकी शिक्षाओं को भी हमें लेना चाहिए।
उस पर ज्यादा बल नहीं दिया जाता,
उस पर ज्यादा बल नहीं दिया जाता।
नहीं, नहीं, भगवान राम की शिक्षा का पालन करना चाहिए।
भगवान राम की शिक्षा का में पालन करना चाहिए।
आध्यात्म बड़ा सरल बना दिया है।
चैतन महापुर ने, आध्यात्मिक जीवन बड़ा सरल बना दिया है। राम, कोई अंतर नही चैतन महापुरु, भगवान राम में कोई अंतर नहीं है।
भगवान
भगवान राम प्रकट हुए तेतर के आरंभ में, करोड़ो साल पहले।
और आज भी हम आज भी हम
उनकी लीलाओं का वर्णन कर रहे हैं। और फिर वो प्रकट हुए कृष्ण। भगवान के रूप में,
उनके भाई प्रकट
होते हैं, उनके भाई लक्ष्मी प्रकट होते हैं। उनके साथ।
जब भगवान प्रकट हुए थे लक्ष्मण छोटे भाई के रूप में, तो जब भगवान
राम प्रकट ए, तो लक्ष्मण छोटे भाई
के रूप प्रकट हुए थे, भगवान रूप में प्रकट हो रहे थे। बड़ा भाई बनूगा।
तो जब भगवान कृष्ण गरपप्रकटहुएतो। लक्ष्मण ने कहा, अब मैं बड़ा भाई बनूंगा।
मैं छोटे भाई के रूप में, बहुत
सही पड़े, छोटे भाई के रूप में, मुझे बहुत डांट सहनी पड़ी लक्ष्मण। लक्ष्मण ने कहा।
वो प्रकट हुए बाल राम के रूप
में, तो प्रकट हुए बलराम जी के
रूप में, बलराम जी कौन थे?
बलराम जी कौन थे भगवान के बड़े भाई, भगवान के बड़े भाई। और फिर भगवान प्रकट हुए चेतन महापुर
के रूप में, और लक्ष्मण के रूप में।
लक्ष्मण पकोड़े किस रूप में, नित्यानंद के
रूप में भगवान होते हैं। अब इन भक्तों को ही माता पिता से अधिक रूप में स्वीकार करते है।
तो भगवान जब परगट होते हैं, तो अपने भक्तों को ही माता पिता के रूप में स्वीकार करते हैं।
जैसे की वादे।
जैसे वासुदेव देवकी।
उन्होंने हजारों 12 हजार देवताओं के वर्षों के लिए तपस्या उठाई थी।
उन्होंने देवताओं के हजारों वर्षों से ज्यादा तपस्या उठाई थी, उनके मन में 1 भाव, उनके मन में 1 ही भाव था।
हे भगवान, प्राप्त हो पुत्र के रूप
में, की, हमें भगवान प्राप्त हो। पुत्र के रूप में।
उन्होंने कुछ खाया नहीं, कुछ पिया नहीं,
उन्होंने कुछ खाया नहीं, कुछ पिया नहीं, केवल ताजी हवा का, केवल ताजी हवा
भगवान प्राप्त पुत्र के रूप में।
और उनका निरंतर चिंतन था कि हमें भगवान प्राप्त हो। पुत्र के रूप में
होते है।
पर हम भगवान अलग अलग समय प्रकट होते हैं धर्म की स्थापना के लिए।
तो हम जब भगवान का नाम ले, भगवान का, आदेश का पालन करे तो वो है असली उपाय।
तो अभी हम जो है भगवान का, आदेश का पालन करे। वो है असली उपाय।
तो कलयुग में क्या है, कलयुग में क्या है? हाय राम नाम, हर नाम है वो केवल नाम।
तो कलयुग में यही उपाय है। केवल हरी का नाम हरी, हरी का नाम ले,
राम राज्य चाहिए। आपको आज कलयुग में हमें क्या करना चाहिए?
तो अगर हमें असली राम राज्य चाहिए कलयुग में तो हमें क्या करना चाहिए हैं हरे कृष्ण मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। भगवान और उनके नामों में कोई अंतर नहीं है।
भगवान को मर्यादा पुरुषोतम कहा जाता है।
भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है।
एग्जाम, उसके आधार पर
तो उनके जो आदर्श जो एग्जांपल सेट किया था, उस का, उस पर सब खुश थे।
शिक्षा किस प्रकार राज्य का शासन होना चाहिए।
उन्होंने शिक्षा दी, किस प्रकार राज्य का शासन होना चाहिए।
आजकल के वात में हम देखते ही थे।
आजकल के वातों में हम देखते हैं कि नेता का क्या चरित्र है।
प्रधान बन गए थे, उनका सब जानते हैं।
1 प्रसिद्ध देश है है, जहाँ के जो राजा प्रेसिडेंट हैं, उसका चरित्र सब जानते हैं।
जब भी वो उनको चुनते हैं, जब
भी लोग उनको चुनते हैं बाबा जी
डेमोक्रेसी,
प्रभाजी दे डेमोक्रेसिज डिमन क्रेजी
सूर की सरकार सूर के प्रयास है।
असुरों की सरकार असूरों की प्रजा से बनती है।
को राम राज्य चाहे। तो नेता है न।
राम राज्य चाहिए तो नेता है उसको आदर्श बनना।
पड़ेगा भवन में भगवान क्या कहते है?
भगुतान, भगवान क्या कहते हैं?
फॉलो करेंगे।
जो 1 महान व्यक्ति करेगा, नेता करेगा, वही दूसरे लोग फॉलो करेंगे।
उसी में जो हैं उनको भी आदर्श होना चाहिए।
तो इस प्रकार नेताओं में जो आदर्श हैं राम जी जैसे आदर्श होने चाहिए।
बंदरों में भी, बंदर के शासन में
तो अभी, जो शासम में जो व्यक्ति हो पर आदर्श होना चाहिए। मंदिरों में, मंदिर में, सौरी, मंदिरों में भी जो नेता हो, जो लीडर हो, उनका आदर्श होना चाहिए।
अच्छा
और अगर अच्छा आदर्श आप देखोगे तो आप प्रभावित होगे।
हा गया। हमारे के द्वारा धर्म के नियमों को प्रस्तुत करना चाहिए।
शास्त्रों में कहा गया कि हमारे आचरण के द्वारा हमें धर्म के नियमों को प्रस्तुत करना चाहिए।
आचरण है कु शा पर धारित, हमारा
जो आचरण है वो शास्त्र पर आधारित होना चाहिए।
यह नहीं मुंह में राम, राम में,
ये नहीं, मुंह में राम, राम बगल में छूरी, इस प्रकार का भाव नहीं होना चाहिए।
चाहते थे के नियमों पर, कौन प्रपा
जी चाहते थे कि पवित्रता के नियमों पर इस्कॉन संस्था चले।
तो राम राज्य की बहुत आवश्यकता है।
आज के समाज में तो राम राज्य की बहुत आवश्यकता, आज के समाज में
और शिक्षा, उनकी शिक्षा और हमें मुक्ति चाहिए। भक्ति योग उपाय है।
और अगर हमें मुक्ति चाहिए, कष्ट होचे तो भक्ति योग ही उपाय है।
ब्राह्मण हैं नाम का आभार स्वीकार कर रहे हैं।
इस लोक में जो ब्राह्मण है वो भगवान राम का आभार प्रकट कर रहे हैं।
आपने हमें क्या नहीं दिया?
आपने हमें क्या नहीं दिया?
शब्दों में आपने हमें दिव्य ज्ञान दिया है।
आपने हमें दिव्य ज्ञान दिया है।
कैसे कैसे है आप हमारे हृदय में आकर ज्ञान दिया है, जिससे हम ज्ञानता से मुक्त हो गए हैं।
आपने हमारे हृदय में, आकर हमें ज्ञान दिया है, जिससे हम ज्ञानता से मुक्त हो सके।
हेली ज्ञान, मेरे द्वारा ही ये आदेश मन की शक्ति आती है।
भूले भगवान गीता में कहते हैं सर्वस्य चाहं हिदि सन्न विस्टो। मेरे द्वारा जो है वो याद करने की शक्ति आती है। मेरे द्वारा ही भूलने की ताकत आती है।
वो बैठकर
ब्राह्मण इस लोक में कह रहे है आप हमारे हृदय में बैठ कर, हमारी अज्ञानता को दूर कर रहे हैं।
तो हम सब जन्म लेते है।
अज्ञानता में हम सब जन्म लेते हैं। अज्ञानता में ज्ञान का हमारा जन्म होता।
अंधकार में पर गुरु साधु का अज्ञानता दूर हो है।
पर गुरु साधु की कृपा से अज्ञानता दूर होती है।
तो ब्राह्मण है राम। भगवान राम का स्वीकार कर रहे है। ज्ञानता अज्ञानता दूर हुई है। उनके आचरण।
तो ब्राह्मण जो कह रहे हैं कि ये जो अज्ञानता दूर हो रही है, ये उनके आचरण और शिक्षा से है। भगवान राम के आचरण शिक्षा से दूर हो रही है।
भगवान की वाणी धर्म है। भगवान की वाणी में भगवान की वाणी का पालन करना चाहिए।
हमे भगवान की वाणी का पालन करना चाहिए।
भगवान राम या पुरुष भगवान राम। पर भगवान, हमें यह नहीं सोचना चाहिए।
तो भगवान राम जो परम भगवान है, हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि वो साधारण व्यक्ति थे,
स्वयं विष्णु तत्व थे।
प्रभा जी कहते है वो स्वयं विष्णु
तत्व थे, उनके भाई थे, वो भी
विष्णु तत्व, उनके भाई थे, वो भी विष्णु तत्त्व थे।
विष्णु कभी भी भौतिक प्रभाव में नहीं।
विष्णु तत्व कभी भी भौतिक प्रभाव में नहीं आते हैं।
और उनके भाई भरत पड़ते हो।
उनके भाई भरत का भी बड़ा अच्छा उदाहरण न पड़ते हो।
जब भगवान भारत को पता लगा की उनकी मां ने ये कहा है पति से राम को वनवास में भेज, तो वो बिल्कुल दुखी हो गए थे।
तो जब भरत को पता चला कि उनकी मां ने दसजी से कहा है कि राम जी को वनवास भेजो, तो बड़े दुखी हो गए।
राज्य किया किसके
उन्हे राज्य क्या? किस के ब्याह पर, रामजी के व्यास
पर और खाने के खाने के लिए, जो की गाय के मुत्र और इतनी
तपस्या की थी, खाने में बारली गाय के मूत्र में सोख करे खाते थे खाली 14 सालों के लिए, 14 सालों
के लिए वो भगवान राम का की भावना, राम की सेवा।
और जब भगवान राम लौटे अयोध्या में तो सब भाइयों का 1 ही भाव था। भगवान राम की सेवा।
तो राम राज्य
आवश्यक है तो राम राज्य आवश्यक है।
तो प्रॉबाजीसाथमहमें कहते हैं पिछले हाय में कि आज कलियुग में भी राम राज्य की 7 हो।
प्रपा जी पिछले ध्यान में में कहते हैं कि आज कलयुग में भी आप राम राज्य स्थापित कर सकते हो।
राम राज्य व वातावरण था, सतयुग है
तो तरता युग में ऐसा वातावरण था रामराज्य के कारण जैसे सतयुग चल रहा
हो, प्रभा में वो आज कर सकते हो।
प्रपा जी कहते है तत्पर में की वो सुख आप आज भी प्राप्त कर सकते हो।
अगर हर कृष्ण मंत्र का उचारण कर।
अगर आप हरे कृष्ण मंत्र का उचारण करो
या कलियुग में सतयुग होगा।
अगर आप हर 1 कृष्ण मंत्र उच्चारण करोगे तो कलयुग में सतयुग प्राप्त हो जाएगा। कई लाभ है हर 1 कृष्ण महामंत्र के उच्चारण से कई लाभ हैं।
चेतो दरपन, मार, जनम उचारण, ऐसी क्या लाभ है?
भगवान राम चर से क्या लाभ है?
हृदय की मैल है।
हृदय की मैल दूर हो जाती है।
हृदय में मेल है या नहीं, हृदय
में मेल है या नहीं?
पापा जी कहते थे की वह हृदय कोयले से भी ज्यादा काला है।
पापा जी कहते थे कि हमारा हृदय कोयले से भी ज्यादा काला है, स्वीकार
करोगे, स्वीकार करोगे, सो इसे इस मैल को दूर करना है।
तो इसे इस मैल को दूर करना है। कैसे सम्भव है, कैसे सम्भव है हरी नाम के उचारण से, हरी नाम के चारण से
ही राम का उज्जारण करते जाओगे। क्या लाभ होगा?
हरि नाम को चालन करते जाओगे तो क्या लाभ होगा? आनंद बुधी, आनंद बुदी वर्दन असली आनंद
प्राप्त कर रहा है।
हम असली आनंद प्राप्त करेंगे, केवल बढ़ते जा और जो केवल बढ़ते जायेगा।
जो बड़ा भयंकर वातावरण।
समाज में इस समय बड़ा भयंकर वातावरण है। समाज में
क्लेश चिंता तनाव बेचैनी बढ़ते जा रहा है।
आप देखते हो क्लेश चिंता तनाव बेचैनी बढ़ती जा रही है। सच बात है, सच बात है।
हर मनसा का उच्चारन करोगे बन जाता है।
बट जहाँ आप हर 1 कृष्ण महतो चान करोगे वहाँ वैकुंठ बन जाता है।
पापा जी ये जो हमारे है बॉम्बे बम्बे नहीं है।
प्रपा जी कहते थे ये जो हमारे मंदिर हैं वो दिल्ली, कलकता बॉम्बे में नहीं है, वो है वैकुंठ में
जहाँ क्या भगवान के नामों का, चलन को वो स्थान क्या बन जाता है, वैकुंठ
जहाँ जहाँ भगवान नामों को चालन करो वो स्थान वैकुंट बन जाता है।
तो कलियुग में वातावरण बना सकते हो।
तो आप कलयुग में भी त्रेता युग का, सत्युग का वातावरण बना सकते हो।
में पूरी प्रजा जुड़ी थी भगवान की
सेवा में, सत्युग में, पूरी प्रजा जुड़ी थी भगवान की सेवा में, और उनका का सा किया था चिंतन और उनका साधन क्या था? भगवान का चिंतन करना
कम हो गया,
त्रेता युग में 10 गुना कम हो गया।
और बड़ा साधन क्या था?
साधन क्या था यज्ञ करना द्वापयुगमें और कम हो गया। क्या था डॉपर में, साधन क्या था अरचविगरहकी सेवा और कलयुग में क्या क्या साधन भगवान ग्राम कोच।
ये है
असली उपाय, ये है असली
उपाय,
चयन करें जब करें तो ये हर नाम शक्ति है की चाहे कितना भी भौतिक आकषनआपकाआभक्ति मार्ग में अगर आप
हरीराम को चालन करोगे तो इसमें इतनी शक्ति है कि कितना भी भौतिक क्षण क्यों न हो आप भक्ति मार्ग में जुड जाओगे।
आप भगवन राम को प्रसन कर सकते है। महा मंजर योजना है आप भगवान राम
को प्रसन्न कर सकते हो महामंत्र के उच्चारण से भगवान कृष्ण, भगवान कृष्ण को प्रसन कर सकते हो। महामंत्री चरण से
सबसे दयालु अवतार माने
जाते हैं चेतन महापुरु सबसे दयालु अवतार माने जाते हैं
ने क्या कहा है
चेतन बाबू ने क्या कहा है
हर
राम हरि नाम जा रे देखो तारे का हो कृष्ण उपदेश जिससे भी तुम मिलो कृष्ण का उपदेश।
2
हमें पूरा लाभ उठाना चाहिए तो
हमें अभी ये वातावरण का पूरा लाभ उठाना चाहिए हम
हमें राम जी का नाम लो अपना तो हमे क्या प्रचार
करना चाहिए रामजी का नाम लो और राम जी की शिक्षा का पालन करो
के नाम और नाम से और नाम
मिले तो ध्यान से ले
आप कृष्ण का नाम भी ले रहे हो राम
का नाम ले हरे कृष्ण महामंत्र में आप कृष्ण का भी नाम ले रहे हो और राम का भी नाम ले रहे हो।
तो ये है महा मंत्र, ये है महामंत्र महा मंत्र सबसे प्रसिद्ध मंत्र महामंत्र
कद सबसे प्रसिद्ध मंत्र
पढ़ सकते हो,
सुन सकते हो, नहीं रामजी कथा पढ़ सकते हो, सुन सकते हो कभी थकोगे
नहीं और भगवान का उदेश्य वो भी कितनी बार पढ़ सकते हो को नहीं
और आप गीता में जो कृष्ण का उदेश्य है कितनी और पढोगे आप थकोगे नहीं।
1 भक्त हमारे 1 भक्त हमारे जिन भगवतगीता को 120 बार पढा है, जिनहोने
भगता को 120 बार पढा है,
जितना सुनो उतना ही कम है तो आप
जितना सुनो उतना ही कम है।
कहा जा रहा है ब्राह्मण बड़े प्रसन्न थे भगवान राम की कृपा से कहा हमें कोई भेद नहीं चाहिए आप से,
तो इस लोक में आप देख रहे हो कि ब्राह्मण बड़े प्रसन्न थे भगवान राम से और उन्होंने कहा हमें कोई भेट नहीं चाहिए।
आपसे हम प्रसन्न हैं। क्यूंकि आपने हमें ज्ञान नहीं दिया है, हम प्रसन्न है।
क्योंकि आपने हमें अध्यात्मिक ज्ञान दिया है। क हमारे अज्ञानता को दूर किया है
जो हमें भी ज्ञान का अध्ययन करना चाहिए।
हमे भी इस दिव्यज्ञान का अध्ययन करना चाहिए और पालन करना चाहिए और पालन करना चाहिए।
साधु
और साधु संगत में सरल हो जाता है। सच बात है, सच बात है।
मान लो हम अकेले किसी गाँव में हो या कोई भक्त नहीं हो, कोई टेक्नोलॉजी की सुविधा भी हो।
मान लो आप किसी अकेले गाँव में हो जहाँ कोई भक्त नहीं हो, टेक्नोलॉजी की सुविधा नहीं हो तो आनंद नहीं आयेगा।
भक्तों के संग में हो तो भक्ति का ऐसा हो जाता है तो आपको
कोई आनंद नहीं आयेगा वहाँ पर अकेला फील करोगे लेकिन आप भक्तों के संग में हो तो भक्ति आसान हो जाती है। आनंद आता है
तो पापाजी ने इस कोनसा स्थापना की है जिसमें s temple,
a, spiritual, hospital, तो प्रपज ने सौनस्नाविक स्थापना की है। चैतजतामितमेंप्रपाजी कहते हैं दिस टेम्पल्स है, स्पिरिचवल हॉस्पिटल्स जाते हो, हॉस्पिटल में, लोग क्यों जाते हैं इलाज इलाज करने के लिए।
इसी प्रकार हम अज्ञानता में है, भक्तों की जीवन हो जाता है।
तो इस पर हम अज्ञानता में हैं। मंदिर में, आकर के, भक्तों की संगत में, आकर के जीवन सरल हो जाता है, अध्यात्मिक जीवन सरल हो जाता है
प्रोपर,
तो प्रॉपर जी ने स्कॉट स्थापना की और 40 साल 40, 40 रुपए के साथ, केवल 40 रुपए के साथ
केंद्र बढ़ते जा रहे है।
और आज आप देख रहे हो केंद्र बढ़ते ही जा रहे हैं।
1 मंदिर भी नहीं था, 1 समय
भारत में 1 मंदिर भी नहीं था
कौन का इस कौन का लगभग 400
केंद्र है, आज लगभग 400 केंद्र है
में किसी कोने में जो आपको मंदिर
मिल जाएगा, आप आज किसी कोने में जो आपको मंदिर मिल जाएगा महाराष्ट्र में, महाराष्ट्र में और कई शहरों में और कई शहरों में भी
कोई अन्तर नहीं है।
राम जी की शिक्षा और कृष्ण भगवान की शिक्षा में कोई अंतर नहीं है। परम भगवान वो परम भगवान है, परम पुरषोतम भगवान है कृष्ण, भगवान, परम भगवान है।
राधा कृष्ण हुए और चैतन्य महाप्रभु जो
है श्री कृष्ण, चैतन्य राधा कृष्ण नहीं अन्य राधा कृष्ण प्रकट है। चैतन महापुरु के अवतार हैं।
मारे मंदिरों में गोरता मूर्ति होती है,
हमारे मंदिरों में गोरनतायकीमूर्ति होती है
और
बीच में राधा कृष्ण की सीता और कई मंदिर में सीता, राम, लक्ष्मण, हनुमान,
पर भगवान के रूप में दर्शन दे रहे हो।
इस प्रकार आप भगवान कृष्ण, भगवान के रूप मे भी दर्शन ले रहे हो।
सीता राम, लक्ष्मण हनुमान, भी, सीता, राम,
लक्ष्मण हनुमान और गौर निताई बी और
आपके मंदिर में
आपके। इस मद में ये तीनों आ रहे है।
लोगो को प्रयास करना है, जल्द से जल्द, आपका दर्शन लो।
आप लोगो को प्रयास करना चाहिए जल्द से जल्द उनका दर्शन लो।
थोड़ी। भगवान के मंदिर बनते हैं, भक्त के
प्रयास है, भगवान के मंदिर बनते हैं। भक्तों के प्रयास से। सच बात है, सच बात है भगवान
की, परीक्षा के हजार मंदिर बने है
भगवान की, तो हर जगह मंदिर बने।
हम प्रयास करते हैं। भगवान जल्दी अपना दर्शन देते है।
बट जब हम प्रयास करते हैं तो भगवान जल्दी दर्शन देते हैं।
भगवान को किसी चीज की आवश्यकता नहीं,
भगवान को किसी जी की आवश्यकता नहीं है।
कहा गया है ओम पूर्ण, पूर्ण।
इस परिषद में कहा गया है ओम पूर्णमद पूर्ण।
भगवान हम भक्तों को मौका देते हैं। सेवा में जुड़ने के।
भगवान हम भक्तों को मौका देते हैं उनकी सेवा में जुड़ने के लिए।
उसी प्रकार भगवान प्रकट होने जा रहे हैं। आपके कार्य में, मौका दे रहे हैं उनकी सेवा में जुड़ने के।
तो इस प्रकार भगवान प्रकट होने जा रहे हैं आपके कार्यगर में और आप सबको मौका दे रहे है उनकी सेवा में जुड़ने के लिए।
तो जो व्यक्ति भगवान की सेवा मंदिर बनाने में सहयोग देता है, मुझे भगवान की असीम कृपा।
जो व्यक्ति भगवान के मंदिर में, आने में सहयोग देता है, उसे असीम कृपा प्राप्त होती है।
1 समय 1 भक्त हैं जिन्होंने सहयोग दिया था जू मंदिर के निर्माण में।
1 समय 1 भक्त ने प्रहुपाजी का बहुत सहयोग दिया था। जुहू मंदिर के निर्माण में, पापाजी ने उन्हें कहा प्रपा जी न्होंने कहा तुम
भगवान का मंदिर यहाँ बना रहे हो।
तुम भगवान तुम भगवान का मंदिर यहाँ बना रहे हो।
भगवान तुम्हारा घर मे अपने धाम में बना रहे।
भगवान तुम्हारा घर अपने धाम में बना रहे है।
तो जो व्यक्ति भगवान के मंदिर बनाने में सहयोग देता है।
भगवान के जो व्यक्ति भगवान के मंदिर जाने में सहयोग देता है उसे असीम कृपा प्राप्त होती है।
सब उत्साहित होकर मेहनत करो। इसके द्वारा मंदिर
तो आप सब उत्साहित हो कर के मेहनत करो जिसके द्वारा मंदिर जल्दी तैयार हो जाए। अभी योग्यता के अनुसार अपनी योग्यता के अनुसार
आप बढ़े
स्कूरल गिलहरी
प्रयास करती थी। आस्सेपानीरामजी को सेतु बनाने में सहयोग।
तो आप पढ़ते ये कथा जहाँ पर 1 छोटी गिलहरी अस्त्यस्ते प्रयास करती रामजी का सेतु बनाने में।
वान ने कहा ये तो बहुत से काम कर रही है। तो हनुमान ने हटो यहाँ से।
हनुमान ने कहा हटो, यहाँ से तुम बहुत आस्ते काम कर रही हो।
नहीं, ये अपनी योग्यता के अनुसार।
भगवान राम ने कहा नहीं, ये अपनी योग्यता के अनुसार सेवा कर रही है।
सेवा भी कर सकते हो।
तो छोटी सेवा भी कर सकते हो।
बड़ी सेवा भी अपनी योग्यता के अनुसा
अपनी योग्यता के अनुसार।
भगवान साक्षी है। वो जानते है आपने कितनी योग्यता है?
भगवान साक्षी है। वो जानते हैं हममें कितनी योग्यता है।
यह नहीं हम खाये रसगुला करे।
तुलसी यह नहीं कि हम खाएं रसगुला और भगवान को अर्पण करे। तुलसी
भगवान कहते हैं पत्रम, पुष्पम फलं।
तोयम वैसे। तो भगवान कहते हैं पत्रं, पुस्तम फलम।
तोयम हमारी योग्यता के अनुसार हमें सेवा
करनी चाहिए और हमारी योग्यता के अनुसार हमें सेवा करनी चाहिए।
और भक्ति के साथ सेवा भी करनी
चाहिए और भक्ति के साथ सेवा भी करनी चाहिए।
कहते थे जैसे बीमार व्यक्ति के इलाज के लिए, उसको दवाई भी चाहिए और प्रेज भी चाहिए।
जैसे प्रभा जी कहते है बीमार व्यक्ति के इलाज के लि, उसको दवाई भी चाहिए और परहेज भी चाहिए।
दवाई हमारे हर कृष्ण दवाई, हमारे हरे कृष्ण मंत्र और परहेज क्या है?
और परहेज क्या है?
सेवा, सेवा जुड़े है।
तो आप सब सेवा में भी जुड़िए
और अपने जीवन को सफल बनाइए और
अपने जीवन को सफल बनाइए। हरे हरे कृष्णा कोई प्रशन
है।
मई कॉलेज, दी,
हरे कृष्णा, महाराज जी,
महाराज जैसे आप बताए प्रचेता का उदाहरण दिए कि भक्तों को उनका 1 ही भाव था भगवान की सेवा करना और भगवान उनसे बहुत प्रसन्न हुए। तो हम देखते हैं कि भक्त लोग सेवा में रहते हैं। लेकिन किसी न किसी कारण से भक्तों का भक्तों में दोष दृष्टि ज्यादा होता है और जो गुण है वह दृष्टि हम कम करते हैं। तो इसके बारे मतलब हम कैसे अपना? जो दोष दृष्टि या जो हमारी दृष्टि है उसको हम गुण दृष्टि में परिवर्तित करे।
महाराज प्रभु जी कहते थे यू शुड बी बी फ्लाई।
तो प्रभु जी का प्रश्न है कि भक्तों के बीच में कभी कभी जो मनमुटाव हो जाता है। तो दोष देखने लगते है कैसे दोष वृत्ति को गुण वृत्ति में बदले। तो महाराज कह रहे हैं वी शुड बी लाइक बी नौट लाइक फ्लाय।
जो मधु मक्खी है, जो मधुमक्खी है, केवल साफ स्थानों में रहती है, वो
केवल साफ स्थानों में जाती है, जो मी है। और जो मक्खी है, गंदे स्थान की खोज में रहती है, वह गंदे स्थानीय खोज में रहती है। जो हंस है, जो हंस है, वो साफ हो, जल में रहता, वो साफ जगह में रहते हैं।
को कौआ कौआ है, वो गन में रहता है।
और जो कौआ है वो गंदे स्थानों
में रहता है, खोजता है,
कोसता है, गंदे स्थानों को खुलता है।
1 दूसरे के गुणों को देखना चाहिए,
हमें 1 दूसरे के गुणों को देखना चाहिए।
और अगर आप कोई कमी देखो भी तो उसको वैशनहलसिद्धांत से उसको हल करना चाहिए।
और अगर आप कोई कमी देखो भी तो उसको वैष्णव सिद्धांत से हल करना चाहिए।
यह नहीं कि हम फिर आकर हल
करे, ये नहीं कि हम सीधा चिडा कर, उनको करें चलो।
और आद है दोषों को पहले ढूंढना,
हमारी आदत है लोगों के दोषों को पहले ढूंढना।
यह कमी है, यह कमी है, यह
कमी है, यह कमी है, यह कमी है, यह कमी है।
हवा में सारे गुण है, दूसरों में,
सब की, हमारे में सारे गुण, दूसरों में कमी है।
अच्छा ऐसा सोचना चाहता हूं।
अक्सर हम ऐसा ही सोचते रहते हैं।
मैं श्रद्धालु हूँ, मेरी श्रद्धा को जानते
नहीं, मैं बहुत श्रद्धालु हूँ मेरी श्रद्धा को, आप जानते नहीं हो
कोई और
प्रश्न गुरु महाराज धंयवाद प्रणाम महाराज। 1 प्रश्न ये आता है हमारे मन में की जैसे भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और उनको त्याग पुरुष भी कहा जाता है। तो उनकी जो त्याग है, बहुत सारे जो जैसे वन में जाते हैं, वो तो उसे हमको सीखने को मिलता है अज्ञाकारी पुत्र का, लेकिन जब हम सीता के त्याग, जब भगवान सीता माता का
त्याग करते हैं,
ृगुमहरवाभृगुमोनि का उनके पर शाप था, तो इससे हमको क्या सीखने
को मिलता है
की त्याग से पति की सेवा करनी चाहिए।
तो प्रभुजी का प्रश्न है कि सीता के त्याग से हमको क्या सीखने को मिलता है? तो महाराज कह रहे हैं कि किस प्रकार से में पति की सेवा करनी चाहिए। तो जब भगवान राम वन में जा रहे थे, उन्होंने कहा सीता में से तुम मत आओ, तुम 1 राज्य कन्या हो? लेकिन फिर भी आई marisaskingaftr game then he banisecitafrom that fastive what was आलसो प्रेगनेंट द टाइम
नाउं।
तो ये दिखाता है कि भगवान राम कितने रिनाउंसथे कितने त्यागी थे?
नहीं जिन्होंने सीा।
उन्होंने जब सुना कि 1 व्यक्ति यह सोच रहा है कि वो राम जैसे नहीं है कि उन्होंने सीता को स्वीकार कर लिया वापस रावण के पास वापस
आ एग्जाम्पल के लिए,
तो उन्होंने 1 आदर्श एग्जाम्पल सेट करने के लिए ऐसा कार्य किया। नेक्ट क्वेश्शन यस
कृष्ण। महाराज जी, महाराज जी, प्रश्न यह है कि सेवा करते हैं। लेकिन अगर हम भगवत गीता पढ़ें तो भगवत गीता में प्रउपाजी कहते है कि अगर हम सेवा करें तो हमें ज्यादा आनंद की अनुभूति होती है। लेकिन देखते हैं कि ज्यादा सेवा करने पर भी कभी कभी भक्त फ्रस्टेड हो जाते, निराश हो जाते हैं।
तो उसका कारण तो उनका प्रश्न है कि कभी कम देखते हैं। प्रपा जी कहते हैं गीता में कि जितना सेवा करोगे, उतने आनंदित होगे। बट हम देखते हैं लोग ज्यादा सेवा करके फ्रस्टेट हो जाते हैं और दुखी हो जाते हैं। ऐसा क्यों होता है?
होना ही चाहिए।
होना तो नहीं चाहिए।
कहवा हम हवा, हम निराश। अगर आप भगत करे हो तो कभी संभव नहीं। निराश हो गया।
तो महज कह है? अगर आप शुद्ध भक्ति कर रहे हो तो कभी सम्भव नहीं कि आप निराश हो जाओगे।
जैसे कि हवा भलपूरतेहै, हम उत्साहित कैसे रहे?
जैसे कई बार भक्त पूछते हैं कि हम उत्साहित कैसे रहे? हमेशा
उत्साह उत्साह कम हो गया।
तो अक्सर वो कहते है की जब शुरू शुरू में आये थे, बड़े उत्साहित थे, अब थोड़ा उत्साह कम हो गया है।
कारण क्या है?
उसका कारण क्या है?
कारण है हम मेरी भगत के पालन में कमजोर हो गए है।
तो कारण है कि हम भक्ति के नियमों के पालन में कमजोर हो गए हैं।
तो यह आवश्यक है कि हम सदा उत्साह से सेवा करते रहे।
तो ये आवश्यक है कि हम सदा उत्साह से सेवा करते रहे।
और अगर सेवा करते जाओगे तो फिर
और अगर सेवा करते जाओगे तो फिर अनर्थ निवृत्ति होगी। बहुत ही आकर्षण, जो है वो घटेगा, यस महाराज महाराज। हम नाम की महिमा सुनते हैं। और समाज ये भी सुनते हैं कि मुख्यम म बगल में छोरी, इसको कैसे
समझे हम,
हमें,
हमें असली भक्त बनना चाहिए। भारी भक्त है।
तो प्रश्न था प्रभु जी का कि कई बार हम सुनते हैं मुंह में, राम बगल में छूरी। इसका अर्थ क्या है? तो महाराज कह रहे हैं हमें असली भक्त बनना चाहिए। बनावटी भक्त नहीं बनना चाहिए।
बराबरी भक्तों की कमी नहीं है, बनावटी
भक्तों की कमी नहीं है। संसार में
सैफरन कपड़ा पहने थे, तिलक लगा ले थे। और
क्या हम सैफरन कपड़ा पहले थे, तिलक लगा लेते हैं। लेकिन चरित्र जो है वो सही नहीं है। माताजी को दीजिए,
हरिकृष्ण महाराज, प्रणाम, महाराज।
जैसे शीशों की 3 क्वालिटी बताई गई है।
फर्स्ट क्लास सेकंड क्लास, थर्ड क्लास तो फर्स्ट क्लास के। तो हम सोच सकते हैं कि वो
तो इसी जन्म में उदार हो जाएगा।
बट थर्ड क्लास शिष्यों का क्या गति होगा? माताजी का प्रश्न है कि हम 3 श्रेणी के शिष्य को सुनते हैं। फर्स्ट क्लास सेकंड क्लास, थर्ड क्लास? तो फर्स्ट क्लास का, तो उद्धार हो जाएगा। बट थर्ड क्लास शिष्यों का क्या होने वाला है? इस संसार में उनका क्या गति है?
्य थर्ड क्लास।
आप का क्या अर्थ है? माइक में माताजी, माइक में बोलिए लीज। जो आपके आदेशों का पालन न करता
हो और अपने मनमाने ढंग से कार्य करता है। या दाम भरोगे वैसा माल मिलेगा जैसा
दम भरोगे वैसा माल मिलेगा
भगवान गीता में क्या कर। कहते हैं ये जितनी मासमें कोई मे में आयेगा, उतनी मा में मैं उसको
भगवान गीता में कहते हैं ये थामा प्रप्त, जितनी मात्रा में कोई मेरे शरण में आयेगा, मैं उतनी मात्रा में उसको फल, दूंगा,
उचानेमुकापालन। कहते हैं बिना शंका के है तुम भगवान के जाओगे।
अगर आप रोज 16 माला का जप करो और चाहने में पालन करो तो प्रभा जी कहते हैं बिना शंका क्या भगवत दम जाओगे।
भगवत प्राप्त इस कलयुग में बहुत सरल बना।
जैसा की हमने कहा चेतन बाबू की कृपा से भगवत प्राप्ति इस कलयुग में बहुत सरल हो गई है।
प्रापा जी ने और सरल बना दिया।
कैसे प्रपा जी ने और सरल बना दिया। इसको बताओ कैसे
प्रापा जी ने अनेक ग्रंथों का अनुवाद किया।
प्रापा जी ने अनेक ग्रंथों का अनुवाद किया।
ये सब वैदिक साहित्य है।
ये सब वैदिक साहित्य है।
अगर किताबें नहीं होती तो आपने पढ़ पाते।
अगर आप ये किताबें नहीं होती तो क्या हम ये पढ़ पाते
भगवत गीता का अनुवाद किया और सरल भाषा में प्रस्तुत किया।
प्रपा जी ने भागवत गीता का अनुवाद किया और सरल भाषा में प्रस्तुत किया।
कितने लोग पढ़ सकते थे?
तो अगर भागवतम संस्कृत के श्लोक होते तो कितने लोग पढ़ सकते थे?
पापा जी। इन ग्रंथों को बड़ी सरल भाषा में प्रस्तुत किया है।
प्रपा जी ने इस ग्रंथ को बड़ी सरल भाषा में प्रस्तुत किया है।
पापाजी उसको पढ़ते है।
प्रपा जी जो पहले पूर्व वर्ती आचारों के तात्पर्य को भी पढ़ते थे और
फिर उससे जो महत्वपूर्ण ज्ञान था, लेते थे। और साथ में अपने विचार, अपने विचारों
को तो उसके महत्त्वपूर्ण ज्ञान को लेते थे, उनसे और अपने विचारों को प्रस्तुत करते थे।
तो इन माध्यम से 400 पर।
तो इन ग्रंथों के माध्यम से हम शास्त्रों को पढ़ सकते है।
है की नहीं है कि नहीं। पापा जी ने कलयुग में और भी सरल बना दिया है। हम भक्तों को आध्यात्म।
तो प्रपा जी की कृपा से। इस कलयुग में उन्होंने और सरल बना दिया। हम भक्तों को आध्यात्मिक प्रगति करने के
लिए हमें ग्रंथों का अध्ययन करना।
इसलिए हमें ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए,
करते हैं, पर अध्ययन भी करना।
जाए, तुसी वितरण नहीं, पढ़ाई भी करना चाहिए। नेक्ट हरे कृष्णा प्रभुजी महाराज जी के रण में धन प्रणाम जो कृष्ण महामंत्र, हरे, कृष्ण हरे, कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे रे शास्त्रों में हरे, राम हरे, राम राम राम हरे, हरे हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। ये दोनों में अंतर क्या है और शास्त्रों में इसका उल्लेख कहाँ पर है? कौन चेतन महाप्रभु ने कृष्ण मंत का स्टार्ट किया है और राम मंत्र क्या है? अभी आपने बताया कि कृष्ण मत में राम भी है और कृष्ण भी है। बट कई जगह हम पढते हैं कि राम कार्थ राधा या राधाजी के उसमें लिया गया है तो इस पर थोड़ा सा बता सकीं कि शास्त्रों में बताया गया हरे कृष्ण महामंत्र जो है वो पहले राम आता है। पहले हरे राम, हरे राम आता है। और हम लोग पहले हरे कृष्ण, हरे कृष्णा करते हैं। तो दोनों में क्या अंतर है?
ज्यादा।
तो महाराज कह रहे हैं जो हम हर पहले करते हैं, वो ज्यादा उत्तम है। क्योंकि महापुरु ने उनका प्रचार किया इस मंत्र का, इस रूप में। और हमारे आचारों ने इस महामंत्र का उच्चारण किया है इस रूप में। तो प्रपा जी ने ये मन्त्र दिया हमें, क्योंकि उनके गुरु भक्षण ठाकुर जी ने दिया, उन्होंने ये मंत्र दिया क्यूंकि? चैतन भाप ने दिया। यह मंत्र, ठीक है कोई प्रशन हरी कृष्णा, महाराज जी, हरी महाराज जी, शुद्ध भक्त कैसे बने, शुद्ध भक्ति कैसे करें, शुद्ध भक्त कैसे बने? शुद्ध भक्ति कैसे करें?
जो शिक्षा प्राप्त हुई है, प्रंपाजीकमेंउसके पालन से, शुद्ध भक्ति कर सकते हो।
जो शिक्षा प्राप्त हुई है, प्रपा जी के ग्रंथों से, उसका पालन करने से, आप शुद्ध भक्त बन सकते हो।
हाय राम का उछाल करो और नाम अपराधों से बचो। सवारी नाम का पूरा लाभ आएगा।
आप हरी नाम को चारण कीजिये और नाम अपराधों से बचोगे तो आपको नाम का पूरा लाभ मिलेगा। ध्यानपूर्वक जब्त कीजिए पूरा लाभ मिले, उसका पूरा लाभ मिलेगा। ओके नेक्स्ट प्लीज पूछिए माइक, माइक, भेजे,
अरे कृष्णा गुरू, महाराज गुरु महाराज। हमने ये वर्क्स में देखा कि प्रपा एक्सप्लिसिटली मेंशनिंग की डिवोटी, शुड, नॉट, बी लाइक, अ बिजनेस, मैन एंड आपने भी काफी अच्छे एग्जामपल दिए। बट महाराज वाल कंटेमपलेटिंग ऑन दिस वर्ष 1 चीज दिमाग में आता है कि ईवन 2 महाराज वी चैट, व रीड एंड वी आर, इन असोसिएशन वि डिवोटिज। बहुत बार ये भौतिक जो कामनाएं हैं वो हमारे इसमें आती है। और हम न चाहते हुए भी टें आस्क लॉड की अगर ये मुझे प्राप्त हो जाती तो मैं और अच्छा कर पाता। तो हाऊ टू अंडरस्टैंड दिस एंड हव। we can limit are desires good news
प्रभुजी का प्रश्न है कि हम ये श्लोक में पढते हैं। प्रपा जी एक्सप्रेस ली मेंशन कर रहे हैं कि हम जब भक्ति करे, वो बिजनेस मैन नहीं करना चाहिए। लेकिन न चाहते हुए भी हम नाम
जब कर रहे हैं।
भागवत गीता पढ़ रहे हैं। तभी भौतिक कामना मन में आ रही है। तो कैसे समझे? इसको? तो महाराज के उत्तर में कह रहे हैं। 1 बहुत अच्छी खबर है। गुड न्यूज क्या है वो सुनिए भगवान कहते है।
4 स्तरों में
भगवान कहते हैं। 4 शीत में, 1 व्यक्ति मेरे शरण में आता है,
चाहिए।
1 जिसे धन चाहिए, दूसरा जिज्ञासु है, दूसरा जो जिज्ञासु है, तीसरा पीड़ित है, तीसरा जो रोगी पीड़ित है।
और चौथा जो ज्ञानी है, आत्मा है।
ये 4 के 4 पुण्यात्मा है।
श्रेष्ठ कौन है?
जो ज्ञान के आधार बट, सब में श्रेष्ठ कौन है? जो ज्ञान के आधार पर आता है। तो भगवान कहते है अगर तुम्हारी इच्छा के को मर्सिडीज गाड़ी चाहिए तो भी मेरे पास आओ।
भगवान कहते है जो वार देवता देते उन्हें मैं दे रहा हो।
भगवान कहते है जो वार देवता देते है वो मैं ही देता हूँ।
तो मेरी शरण में आओ।
तो मेरी शरण में आओ तो आपके
चाहे कोई भी इच्छा हो
तो आपकी कोई भी इच्छा हो कृष्ण की शरण लो और रास्ते आसते आप पवित्र बन जाओगे।
ok
हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे परम पुज्य गोपाल कृष्ण उस महाराज के सो वी आर इंडिड वेरी लक्की एंड बहुत भाग्यशाली है कि महाराज हमेशा जब भी बॉम्बे में लैंड किए तो उनका एजेंडा में खारगर मंदिर रहता
है
और आप सब बहुत भाग्यशाली हैं आप लोगों ने सब ने एक्सपीरियंस किया होगा महाराज सबके साथ 1 बहुत ही सुन्दर सा, सम्बन्ध और 1 तरह का क्या करते हैं आप रियलाइज भी करते होगे कि महाराज को सब याद रहता है किस वक्त से कम मिले कैसा मतलब क्या कर सकते हैं उनसे क्या इन्टरेक्शन हुआ ईवन कौन से एयरपोर्ट में कब बोला की मैं, दिक्षा दूंगा इत्यादि इत्यादि महाराज का क्या कह सकते हैं ये अब पर्सनल टच और जिसको सोच के, जो शक्ति के ये अधिष्ठाता क्या है मूर्तिमान स्वरूप है तो हम महाराज का धन्यवाद तो असल में धन्यवाद नहीं रह सकते हैं महाराज के ग्रैटिट्यूड महाराज की कृपा हमारे ऊपर हमेशा बनी रहे यह प्रार्थना करते हुए हम हरेक मंत्र कल फिर से 1 बार उद्घोष करेंगे। हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे परम पूजा गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज
के
महाराज के पर्पज विंदावन चन्द्र स्वामी महाराज की र सम अनाउंसमेंट जगदकृष्णअनाउंसमेंट करेंगे
तो जो भी भक्त दीक्षा के लिए फार्म भरा है उनके लिए 1 बजे प्रापत कोटर में महाराज जी के द्वारा मीटिंग है तो सभी जो भी दिक्षा लेने दीक्षा लेने वाले है यस 1 बजे, 2 सबको 1 बजे बुला लेंगे 2 बजे, 1 बजे बोलेंगे ओके सभी भक्तों को टाइम बता दिया जायेगा और किचन में कुकिंग के लिए बहुत सारे वॉलेंटियर भक्तों के सहयोग की जरूरत है तो सब लोग के पास सब्जी वगैरह काटने के लिए वहां पर जाए और सेवा में कृपया ख्याल रखे महाराज बार बार कहते हैं कि सेवा हमें करते रहना है तो मंदिर में बहुत सारे वॉलेंटियर की सेवा के लिए हमें जरूरत पड़ती है तो कृपया सभी लोग सामने से उपस्थित हो तो बहुत ही अच्छा है हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे और आज कलमबोली में जगना जी की रथयात्रा है जगनाजमहामहुसव की कृष्ण बलराम रथ यात्रा, शोबा यात्रा तो आप सभी भक्तों से विनती करते हैं कि कृपया 2 बजे के बाद कल्लमूलिमें जो कृष्ण बलराम जी का शोबा यात्रा है कृपया इस प्रोग्राम का लाभ लीजिये 1 बजे वहाँ पर कललमबूलिमें सभी भक्तों के लिए प्रसाद है और बाद में शोभा यात्रा के बाद भी सभी भक्तों के लिए प्रसाद की व्यवस्था की गई है हरी कृष्णा
रे कृष्ण तो सभी भक्त आज कल बोली में कृष्ण बलराम शोभा यात्रा के लिए आमंत्रित हैं 1 बजे सभी के लिए महाप्रसाद की व्यवस्था
है बोलिए शॉर्ट 2 वर्ग जो है या शॉर्ट
तो दोपहर को यहाँ पर मंदिर में शार्ट लंबे फिस प्रोग्राम होगा जल्दी खत्म हो जाएगा तो उसके ठीक बाद आप लोग को कलंबोली प्रस्थान करना है शोभा यात्रा के लिए भव्य कृष्ण बलराम शोभा यात्रा होती है तो आप सभी भक्त आमंत्रित है कृपा करके आइए और वहाँ पर सभी भक्तों को अपना आशीर्वाद देकर कृतार्थ करें हरे कृष्णा
हरे कृष्णा ये जो दीक्षा ले रहे है उन भक्तों के लिए 2 बजे है पर क्वार्टर में सभी भक्तों को आना है 2 बजे है हमने सब भक्तों को मैसेज कर के रखा है कृपया 2 बजे सभी भक्तों का उपस्थित हो जाए परोपतकोटरमेंहरी कृष्णा टाइम तो बताओ
अरे कृष्ण रत यात्रा 2 बजे प्रारम्भ होगा तो सभी भक्त से निवेदन है कि लोकेशन के हम लोग कांग्रिगेशन ग्रुप में लोकेशन डाल देंगे कहां पर आपको आना है तो उस लोकेशन के हिसाब से आप आ सकते हैं जो लोग कांग्रीगेशन ग्रुप में हैं कॉन्ग्रिगेशन ग्रुप में आपको सभी को लोकेशन मिल जाएगा। स्थान कलंबोली, रोड, पाली भूमि, गार्डनिया वन के सामने, हरे कृष्ण।
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