आत्मा का विज्ञान | Science Of Soul | BG 2.26 | दिल्ली | 15 जून 1993 | श्रील गोपाल कृष्ण गोस्वामी

In this extensive Hindi discourse, the speaker expounds on the eternal nature of the soul (ātma) as taught in the Bhagavad‑Gita, especially chapter 2 verse 26. He argues that the soul never originates nor perishes, and that death merely involves the exchange of one body for another, governed by karmic law. The lecture explains how karma determines the quality of future births and describes the three modes of material nature—sattvic, rajasic, and tamasic intelligence—and their impact on spiritual progress. A clear distinction is drawn between dharma (the divine law revealed in the scriptures) and dharm (social or material customs), emphasizing that true dharma aligns with scriptural injunctions. The speaker critiques modern materialist skepticism, especially in Western societies, that denies the soul’s existence, and stresses the need for spiritual education alongside secular learning. He advocates for guidance from a guru, bhakti (devotional chanting), and regular study of the Gita and other Vedic texts as essential practices for realizing the soul’s nature and attaining liberation. Throughout, he uses analogies (teaching a child ABCs, the body as a garment) and calls listeners to integrate spiritual knowledge into daily life, warning that neglect leads to bondage and suffering.
Chapters
ओम नमो भगवते, बासु देवाया, ओम नमो भगवते, बासु देवाया, ओम नमो भगवते, वास देवाया, चाइना नित्य जाटम, मिजारम नित्य मन से कम कम महाभाव नाइन। 3 जी किन्तु यदि तुम सोचते हो की आत्मा व जीवन के लक्षण सदा जन्म लेते हैं, सदा सदा मरते है तो भी हे वहाँ बहू, तुम्हारे शो करने का कोई कारण नहीं है। श्री कन्या मानो, श्री कृष्णा के कन्या शो, हर कृष्ण, हरे राम था, चाइना नेत्या, जाता नेत्या व मे था पी महाबाहो नाम इन लोगों ने हम देख रहे हैं, ये भगवान अर्जुन को बता रहे हैं। क्या कि ये आत्मा हमारा अभी स्वरूप है, ये शरीर हमारा आखिरी स्वरूप नहीं है। जिस प्रकार आप जब किसी बच्चे को लिखना पढ़ना सिखाते हो तो ये ज्ञान कैसे आरंभ करते हो? अंग्रेजी में ए बी सी डी सिखाकर हिंदी में कर सिखा कर तो इसके द्वारा फिर आगे ज्ञान बढ़ता है। सबसे पहले तो ए बी सी डी या बच्चे को सिखाते हो तो उसी प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान आरंभ होता है इस शिक्षा के साथ की हमारा असली स्वरुप क्या है? क्यूँकी आज तो हम अपने स्वरूप को ही नहीं पहचानते। हम कह देंगे की हमारे पास डिग्री है, हम हार यूनिवर्स से पढ़ के लौटे हैं और जब उनसे पूछे की आप का स्वरूप क्या है तो उनके पास इसका उत्तर नहीं है। तो आप अध्यातिक ज्ञान में आगे कैसे, बढ़ोगे? अध्यात्मिक ज्ञान को अनुकूल कैसे करोगे? जब तक आप इस इस महत्वपूर्ण संदेश को नहीं समझा तो गीता में हम देखते है कि अनेक लोगों के द्वारा भगवान 1 ही विषय पर बल दे रहे हैं। 1 महान सं ठाकुर भक्ती विनोदी ने कहा है की गीता का यह दूसरा अध्याय है। यह सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है। गीता का सार बनाया जाता है। क्यूँ? क्यूँकि अगर आपने इस अध्याय को समझ लिया तो बाकी अध्याय को समझना है और दूसरा दिला नहीं समझा। तो बाकी ध्यान को आप नहीं समझ पाओगे या उस दिव्य ज्ञान का उपयोग नहीं कर पाओगे। तो हम देखते है की अर्जुन युद्ध में लड़ने को तैयार नहीं थे। उनके हृदय में ये विचार था कि युद्ध करने का कुछ लाभ नहीं है, क्यूँकि सब मारे जायेंगे। और अंत में वो दुखी हो गए। भगवान ने ये कहा की शक्ति होने के नाते हमारा यह कर्तव्य बनता है कि तुम जेल में लगा। और भगवान ये बताते है की आत्मा का न कभी जन्म होता है न ही कभी का देहांत होता है। तो हम सोचते है की किसी व्यक्ति का मृत्यु हो है या देहात होता है। हमे समझ आना चाहिए की केवल वो व्यक्ति अपने पोषण बदल रहा है जैसे की जब हमारे रेामेतरकीकोईमर जाता है, हम रोते हैं फिर पीटते है। पर गीता में कहा गया है कि जिस प्रकार हम हमारे पुराने वर्षों को त्याग कर नए वर्षों को ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार ये आसमार 1 शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर ग्रहण करती है और ये शरीर स्वीकार किया जाता है। कर्मों के अनुसार जिस प्रकार साधारण भाषा में हम क्या कहते हैं, जैसा दाम लोगे, वैसा मान मिलेगा तो जिस प्रकार के कर्म होंगे उसके अनुसार आपका अगला जीवन प्राप्त करना पड़ेगा। तो आज इस आधुनिक वाटर में बहुत से व्यक्ति ऐसे हैं जो आत्मा में विश्वास नहीं ग, खास करके पश्चिम देशों में हो। ऐसे नौजवान मिलते है जो कहते है आत्मा जैसी कोई ठीक है ही नहीं। भौतिक वादी व्यक्ति क्या कहते हैं? ये तो धार्मिक और तुम्हारे दरारे है। ये शरीर के समाप्ति पर पूरा खेल खत्म हो जायेगा। तो ये कहते हैं कि आत्मा जैसी कोई चीज है नहीं। और ये शरीर असली स्वरूप है। इसलिए जो बस सुबह से रात तक जीवन का उपयोग करो पर्चो के समान। और इस प्रकार के लोगों को जब के के विषय में चर्चा की जाती है तो उन्हें नींद न दाब दी है। इसमें रूचि नहीं लेते सोचते हैं की अध्यात्मिक ज्ञान केवल मुझ। तो भगवान अनेक श्लोकों के द्वारा कहते हैं। आत्मा है। तो आप ये पूछ सकते हो की आत्मा के विषय में सबूत क्या है। आज हम आधुनिक युग में रह रहे हैं, जहाँ हर व्यक्ति सबूत चाहता है। तो इसका सबूत है। और बड़ी सरलता के साथ आप इसको महसूस कर सकते हो। क्या है चेतना आशा के कारण शरीर में चेतना है। जब आत्मा शरीर को प्यार देती है तो हम क्या कहते हैं? मर गया, कहते है अभी मर गया, यह आदमी मरता है। और तस्वीर तो वही आपके सामने जीवित व्यक्ति का प्रश्न पूछा की आप कैसे हो? तो उसका उत्तर दे देगा। अगर आप किसी मरे व्यक्ति से पूछो कैसे हो तो उत्तर दे पायेगा नहीं दे पाएगा क्यूँ? क्यूँकि उसमें आत्मा नहीं है। आत्मा छोड़ने से चेतना समाप्त हो जाती है। 1 बहुत बड़े विज्ञानी हैं कैनाडा में, 32 साल से 32 साल से उनका अभ्यास था, वो लोगो को देख रहे थे, मरते हुए तो उन्होंने कहा की उन्हें पूरा विश्वास है की क्या जैसे व्यक्ति का चेहरा बदलता है। समय जरूर कोई चीज़ है जो की छोड़कर चले जाते है तो शरीर की रूटीचेहरेकीखसरोटी समाप्त हो जाती है। 1 साथ बहुत खूबसूरत व्यक्ति हो और जब उसका अंत आता है, आत्मा शरीर को प्यार देती है तो वो शरीर तुरंत बदसूरत बन जाता है। तो आत्मा का सबूत क्या है? चेतना इस आत्मा को हम भौतिक नेत्रों से नहीं देख सकते। हालत आत्मा को जला नहीं सकते, हम इस आत्मा को सुखा नहीं सकते, हम इस आत्मा को भूल नहीं सकते। आज केवल आत्मा को महसूस कर सकते हो चेतना के द्वारा और आत्मा के विषय में ज्ञान प्राप्त कर सकते हो शास्त्रों के द्वारा। अगर हम ये सोचें क जब तक हम आत्मा को देखेंगे नहीं, जब तक हम आत्मा में विश्वास नहीं करेंगे, तो हम बहुत दुर्भाग्यशाली है। क्यूँकि? दुर्भाग्यशाली व्यक्ति वो है जो शांति में विश्वास नहीं करता, जो साधु में विश्वास नहीं करता, जो गुरु में विश्वास नहीं करता, जो केवल अपने भौतिक मन में विश्वास करता है, वो है दुर्भाग्यशाली व्यक्ति। इन इन कोटी के व्यक्ति कभी जीवन के उद्देश्य को नहीं समझ सकते। तो भगवान ही बताते है। आत्मा सनातन है, शरीर नश्वर है। शास्त्र में कहा गया है आत्मा का बात क्या है। आप मारे बाल के कोने के 10 हजार व हा अगर आप बाल के कोने पर हो और उसको बाटो टॉम भागों में फिर 1 को लेकर आ गया। बात में वो है आत्मा का मात। तो आप कैसे उम्मीद कर सकते हो कि किसी भौतिक प्रबंध के द्वारा अब आत्मा को कभी देख सकोगे नहीं देख सकोगे। तो इसलिए हमें इस विषय पर प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। और ये समझते हुए की आत्मा हमारा असली स्वरुप है, आत्म का तयहानतदाहोता है। हमें यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि किस प्रकार से हम कार्य करें जिसके द्वारा हम मानव जीवन के अपने उद्देश्य को पहचान सके। भागवत गीता के अठारहवें अध्याय में भगवान 3 प्रकार की खुशियों का वर्णन करते हैं। 3 प्रकार की बुद्धि का भी वर्णन करते हैं सातिक बुद्धि, राजसिक बुद्धि और तामसिक बुद्धि। बुद्धि किसे कहते हैं बुद्धि? उसे कहते है की जो शास्त्र के अनुसार यह पहचाने क्या हमें करना चाहिए, क्या हमें क्या हमें नहीं करना चाहिए? जो व्यक्ति 7 के द्वारा ये पहचाने क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए वो है सार्क बुद्धि। पर आज हम क्या देखते है की कोई व्यक्ति जानना ही नहीं चाहता, क्या कार्य करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए? शास् में कहा गया है कि 2 अलग अलग मार्ग हैं जिन पर हम चल सकते है प्रवृति मार्ग और निवृति मार्ग। प्रगति मार्ग से कहा जाता है। जो मार शाम सं के अनुसार हो, निमती मार्ग उसे कहते हैं जो कार्य शास्त्र के विपरित हो। तो ये कहा गया है कि शास्त्र में कि चाहे हम किसी भी आश्रम में क्यों न हो, हमें शास्त्र के अनुसार जानना चाहिए। क्यूँ शास्त्र का अर्थ है भगवान की वाणी और भगवान की वाणी में किसी प्रकार का दोष नहीं है, किसी प्रकार की भूलता नहीं है, किसी प्रकार की कमी नहीं है। तो हमें ये समझना चाहिए की प्रवति निवृद्धिमारका क्या अंतर है। कौन से कार्य हमें करना चाहिए और कौन से कार्य से हमें बचना चाहिए। हमें ये पत्ता लगाना चाहिए किस कार्य से हमें डरना चाहिए और किस कार्य से नहीं डरना चाहिए। हमें ये समझना चाहिए किस कार्य से हम मुक्त हो सकते हैं और किस कार्य से बंधन में पा सकते हैं। ये जब तक हम नहीं समझे, हमारी जो बुद्धि है, सामरिक बुद्धि है। तो सारिक बुद्धि के ये लक्षण है ये पहचान किस कार्य में आपको नहीं रहना चाहिए, किस कार्य से आपको अनित रहना चाहिए, किस प्रकार का भय आपको रखना चाहिए और किस भय से किस प्रकार का भय नहीं रखना चाहिए, किस कार्य से आपको मुक्ति प्राप्त हो सकती है और किस कार्य से आप बंधन में फंसोगे आप। सब का भगवान विष्ण देवी परिचय है। भगवान विष्ण देव परम भगवान के अवतार हैं, जिनका उद्देश्य हमें गीता के पांचवे में प्राप्त होता है। तो देव ने कहा है न नाम कमाता गुरु देविका की। जो व्यक्ति शास्त्र के विपरीत कार्य करता है, ऐसी कहा जाता है वो व्यक्ति प्रमाता प्रवता का अर्थ मूर्ख पागल, पागल व्यक्ति है। क्या करोगे स्वामी जी आप लोगो का अपमान कर। नहीं, हम नहीं कर रहे। हम केवल आपको वही सुना रहे हैं जो भगवान ने स्वयं कहा है। तो भगवान ने क्यूं कहा की ऐसा व्यक्ति पागल है क्यूकी? जब तक वो कार्य करेगा जो कि शाह के विपरित है से अवश्य ही इस भौतिक संसार में फिर से 1 भे ग्रहन करना पड़ेगा जिसके द्वारा केवल काश काश काश ही भुगतना पड़ेगा। चाहे अब राजा का जीवन स्वीकार करो या गरीब का या किसी पशु का। 7 प्रकार के कष्टों से कोई व्यक्ति भी अपने आप को बचा नहीं सकता। बच्चा माता के घर से जन्म लेता है। हमेशा रोते हुए निकलता है, कभी हंसते हुए तो नहीं निकलता। चाहे दिल्ली में हो या मोस्को में हो या लंदन में हो। फिर रोग पीड़ा बीमारी, कोई बीमार तो होना नहीं चाहता। अगर आपको सरकार मुफ्त की दवाई दे जैसे इंग्लैंड वगैरह में प्री मेडिकल है, डॉक्टर फ्री, हॉस्पिटल, फ्री, दवाइयाँ भी लगभग फ्री है। विदेशों के कई विदेशी देशों में मुफ्त है। बस दर्द तो मुफ्त नहीं है, दर्द तो आपको ही कहना पड़ता है तो बीमारी तो किसी को अच्छा नहीं लगता, फिर बुढ़ापा कोई भी बुरा होना नहीं चाहता। आज किसी बुरे व्यक्ति से पूछो की अगर आपको कोई वरदान दे दे, जवान बनने के लिए आप को स्वीकार करोगे फिर से की नहीं सब चाहेंगे, कोई भी बुरा भी नहीं चाहता फिर को कोई नहीं चाहता। इसके लावा 3 और प्रकार के कष्ट है, मन ता है, दूसरे व्यक्ति से है, प्रकृति सताती है। तो देखा जाए ध्यान से इस भौतिक जगत में असली खुशी की प्राप्ति नहीं है। इसी कारण गीता में भगवान कहते हैं कि 7 खुशी का क्या लक्षण है जो आदर में बेशक जैसी महसूस होती है और अंत में अमृत बनती है और जिसके द्वारा आत्मा साक्षाकार की जागृति उत्पन होती है वो है सबसे खुशी। पर। आज हम क्या चाहते हैं जो आदर में हमें सुख दे, कल बेशक दुख दे हमें चिंता नहीं है। कई बार हम प्रचार करते है, लोग क्या कहते हैं? स्वामी जी न में जायेंगे तो जाने। 2 कई बार हम कहते है की अरे भाई इस प्रकार के कार्य से कुत्ते बिल्ली का ठीक है, कुत्ते बन जायेंगे। आज हमें जीने। 2 कल कुत्ता बनना तो बन जायेंगे, कुत्ता बना? तो लोग बुद्धि इतनी गिर गयी है, केवल सोच सकते। जैसे जब लोग कोई व्यक्ति शराब के नशे में हो, मुझे कितना भी समझाओ तो समझ नहीं पाता। आज हम इतने गहरे नशे में है। हमारे गुरु जी 1 उदाहरण देते थे। 1 समय 1 व्यक्ति पतंग डारा था और कोठे से निचे गिरने वाला था, तो 1 व्यक्ति ने उसे बचाया का, उसने क्या कहा? पतंग उड़ने 2 और गिरने को तैयार था न? तो यह है समाज की स्थिति से भगवान कहते है की हमें इस जीवन का उपयोग करना चाहिए किस काम के लिए, उस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए जिसके द्वारा हम जन्मृतिकेबंधनऐसी छुटकारा प्राप्त कर सके। तो सात्विक बुद्धि, सात्विक बुद्धि वो बुद्धि है जिसके द्वारा आप पहचान सको। क्या ये पहचान तक की कौन सा कार्य आपको करना चाहिए? और कौन सा कार्य आपको नहीं करना चाहिए? वो है खुशी और 7 बुद्धि। और ये पहचान की किस कार्य से आप बंधन में फँस जाओगे, किस कार्य से बंधन से मुक्त हो जाओगे। तो अगर आप के विपरित कार्य करोगे तो अवश्य ही आप बंधन में फंस जाओगे। इसलिए भगवान कृष्ण ने कहा है कि जो व्यक्ति यह मानव जीवन का ठीक उपयोग नहीं करता, वो व्यक्ति मुल्क है। जैसे की अगर किसी व्यक्ति के पास बहुत धन हो, वो केवल धन पर बैठता है, प्रधान का आगे उपयोग नहीं करता। आगे बढ़ाने के लिए। तो हम क्या करे? कंजूस रखती है? इसलिए कहा गया शास्त्र में ये जो मानव में प्राप्त हुआ है और लाखों लाखों योनियों में गुजरने के पश्चात, इसका हमें सुदपयोग करना चाहिए और दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। तो आगे भगवान ये भी कहते हैं कि हमें यह पहचानना चाहिए कि धर्म क्या है और अधर्म क्या है। आज 1 और दुर्भाग्य यह है कि धर्म क्या है? धर्म क्या है? किस कार्य को करना चाहिए। जिस कार्य से बचना चहिए वो ज्ञान का है। हमारे पास। तो जो व्यक्ति जिस व्यक्ति पर भी ज्ञान नहीं है कि धर्म और धर्म क्या है? धर्म के क्या लक्षण है और धर्म के क्या लक्षण हैं? ये हैडवेदराजसिंहबो धरम के क्या लक्षण हैं। सबसे पहले तो धरम का यह लक्षण है कि यह भगवान की वाणी, यह नहीं की आप और हम मिलकर 1 नए धर्म को की स्थापना कर सकते हैं। धर्म का अर्थ है भगवान की वाणी। दूसरा। धर्म में 4 लक्षण आवश्यक होने चाहिए। 1 है तपस्या, दूसरा है सत्यता, तीसरा है स्वच्छता, चौथा है दयालुता। जब तक इन 4 चीजों नहीं हो तो उसे हम धरम नहीं बनाते। तो धर्म का अर्थ है भगवान की वाणी। जो हमें वैदिक शास्त्र में प्राप्त होती है और उससे बाहर जो है वो फिर धरम है। तो भगवान कहते हैं कि जो व्यक्ति धरम और धर्म को नहीं पहचान सके, जो नहीं पहचान सकता कि असली धर्म क्या है? नकली, धर्म क्या है? वो है राजसिक बुद्धि, तो आज लोग नहीं पहचान सकते। कौन, असली, सन्देश, तेरे, कौन, अकली पहचाने का प्रयास भी नहीं करते। अगर हमें कोई चीज 10 रुपए सस्ता मिल जाए तो हम 1 घंटा दूर सफ़र करेंगे। कोई चीज खरीदी हो तो 50 दुकान में जाओगे। देखने के लिए आपको सबसे अच्छा सौदा मिले पैसे बचाने के लिए कहा भी चले जायेंगे, देखने से कोई ज्यादा पैसा नहीं ले। क्यूँकि पैसे से हमें बहुत प्यार है। पर यह पहचानने के लिए की असली धन का प्रचार कौन कर रहा है, कौन नहीं कर रहा है? कौन है? असली कौन नकली सर, वो वो पहचानने में रूचि नहीं लेते। तो भगवान क्या कहते है? वो बूढी जिस के द्वारा आप ये नहीं सम्बन्ध प्रयास करते। असली धर्म क्या है? नकली, धर्म क्या है? क्या कार्य आपको करना चाहिए, किस कार्य सबको बचना चाहिए, वो बुद्धि है। और तामसिक बुद्धि क्या है? जो धर्म को अधर्म मानता है, धर्म को मानता है और जो साधु को असाधु समझता है। अ साधु को साधु समझता है। ये है तामसिक बुद्धि। तो धर्म को धन और धरम को। कई लोग ऐसे हैं जैसे लोग। कई लोग तो ऐसे हैं जो दूसरे का कतर खाना अपना धन मानते है, बुरा नहीं मानना, दूसरे का कतर खाना खाना धन मानते हैं, धन के नाम पर युद्ध करते है, लोगो को मार देते है। वो धरम है और धर्म नहीं धर्म को तो जो अति धर्म के नियम है उसको हम कहते हैं धर्म आप हैरान होगे। कई बार हमारे भाजा पश्चिम देशों में लंदन में हरिनाम करते है क्योंकि हम लोग तो हर जगह किर्तन करते हैं। केवल आपके सुना था की आपके इस थाने भक्तों ने कीर्तन किया था। थोड़ी देर पहले और विश्व के हर शहर में लंदन हो वो हर जगह हफ्ते में 23 बार तो सब हरी नाम के लिए जाते हैं और शाम को विश्व के हर प्रसि शहर में, वे कुल शहर के बीच में जैसे है। हमारे सौ 200 भक्त हर मंदिर से जाते हैं बड़ा हरी नाम के लिए, तो कई बार जब हमारे पास हरी नाम के लिए जाते है सड़को में, विदेशो में भी हमारे हिंदू भाई बहन आ कर कहते है क्या? अरे भाई तुम तो हिंदुस्ता कर ये कोई धर्म है बुरा नाम दे रहे है। अरे भाई हम का असली नाम दे रहे है। कभी इतिहास में इतने लोग आकर्षित हुए थे धर्म के प्रति तो क्या निंदा करते है तो धर्म है यह धर्म थोड़ी है जो असली धर्म है उसको धन मानते है और किसी नकली बाबा को भगवान बना लिया, भगवान मान लिया और धर्म को धर्म बना लिया। जो असली महात्मा है उसकी हम निंदा करते हैं। और हम ने हजार और नकली महात्मा को असली महात्मा बना दिया। आप किसी तीर के स्थान में जाओ। आज आपका परिचय अनेक महात्माओं से होगा। ठीक है हर व्यक्ति वहाँ महात्मा बना हुआ है। हमारे देश में पोलिश लोग भी महात्मा बन जाते है, सब जाते हैं उनके छूते हैं के पास भी उनका दरबार होता है सब आते हैं उनके चलन छूने के लिए सब उनको महात्मा बनाते है। तो महात्मा कौन है कौन व्यक्ति ये दावा कर सकता है की वो महात्मा है हसबानसीमानपरथा दे जो बेटी सदा भगवान की भक्ति में लीन हो वो ही व्यक्ति महात्मा बन सकता है। यही नहीं धरा जादू करके सोना पैदा कर दे, धूल पैदा कर दे तो लोग समझे हाँ भगवान इन्होंने कोई चमत्कार दिखाया। आज कल लोग क्या पूछे है चमत्कार दिखाओ और कोई चमत्कार दिखा दे तो हम उसको भगवान मान लेते हैं। 1 समय हमारे गुरु महा प्रचार कर रहे थे तो भारत ने पूछा स्वामी जी कोई चमत्कार दिखाओ चमत्कार दिखा सकते हो जी ने कहा की चमत्कार तो मैं नहीं दिखा सकता और न मैंने दिखाया है चमत्कार जरूर दिखाया हजारों मेचों को मैंने बना दिया यह देखो छोटा चमत्कार तो नहीं है छोटा चमत्कार है। जो व्यक्ति बचपन ऐसी बरसात मच्छी खाते आ रहे हैं, बचपन से हर प्रकार कार्य करते आ रहे हैं। आज वो उत्तम कोटी के ब्राहमण बन गए है। छोटा चमत्कार नहीं है। कई बार हमारे भारतीय लोगो को जब पता लगता है की किसी अधिक मात्रा में विदेशों में भी लोग इसको स्वीकार कर रहे है, इन्होंने क्या मच्छी खाना बंद कर दिया। वो सोचा की हमारे भट अंडा कहते हैं, अंडा मच्छी छोड़ो भाई प्यार थे, ये छोड़ो चाय भी पी ले, भारत मे जान छोड़ने के चाय छोड़ना मुश्किल है, सोना लेंगे छे कप से 1 कप पर आ जायेंगे, 1 कप से जीरो पर नहीं आयेंगे, 1 कप से जीरो 2 साल लग जाते है। और तो जब वो सुनते है की विदेशो में हमारे पास चाय बनी, पीते कॉफी, पीते, सुबह, ढाई बजे, 3 बजे जागते हैं, सारा सा तो वो हैरान हो जाते है। तो ये था हमारे गुरु जी का, उन्होंने 12 नहीं लाखों भक्तों को बनाया, आज के लगभग 600 केंद्र है सारे विश्व में और लाखों लाखों पहुंचते है। पड़े लिखे, पीएचडी, बिजनेस मैन और वो अगर आप उनसे चर्चा करोगे देखोगे, तब से कोटी के ग्रामीण बन चुके हैं। तो धर्म क्या है? और धर्म क्या है? महात्मा कौन है? और सहादुर कौन है? जो व्यक्ति यह नहीं पहचान सकता उसकी बुद्धि क्या है? दाम से होती है। जैसे की हमें अफसोस होता, यह कह कर जैसे की जगतपुरी का मंडल है। भगवान जगरनाथ का अर्थ क्या है? पूरे जगत के राजा और उस मंदिर में विदेशी भक्तों को अंदर नहीं जाने देते। जब वो सबसे ऊँची बोली के ब्राहमण बन गए है तब क्यूँ लोग? कैसे लोग भगवान दर्शन करने के लिए? तो क्यूँकी हम समझते नहीं है? धर्म क्या है? धर्म क्या है? साधु कौन है? और साधु कौन है? तो हम अपने मन की कल्पना के नुसार कार्य करते है। तो हमें यह समझना चाहिए। बुद्धि क्या है? राजसिक, बुद्धि क्या है? तामसिक बुद्धि क्या है? और हम यह सब ज्ञान कैसे प्राप्त कर सकते हैं? भक्तों की संगत द्वारा द्वारा, गुरु की संगत द्वारा, हम मिले संदेश को ग्रहण कर सकते हैं। तो हमें बहुत खुशी है की सब रूची ले रहे हो अध्यात्म में आगे बढ़ने के लिए। कई बार लोग सोचते हैं कि गेहस्ताआश्रमइतनी छूट है कि जो सब मा हो जाता है कार्ड बलों है का मतलब अंग्रेजी में जान जाना, कुछ खरीदना खरीदा, कोई समय नहीं रोकेगा, हम सोचते है की हस्ता छूट है, जो करना कर लो, कुछ परिणाम भोगना नहीं पड़ेगा। थोड़े समय पहले हमें कोई सर्जन मिले थे। स्वामी जी आप तो सन्यास है, वो तो बहुत ही आसान है, असली आश्रम है गहस्तआशमजोआदमी में रह कर थोड़ा भी नम कर दे। सन्यासी मारी के लिए तो बहुत आसान काम है, वो तो बेकार की है। तो आज हम लोग सोचते है की क्या में कोई हमारी जिम्मेदारी नहीं है, धन कमाओ बचाओ बस आगे 10 वीडियो के लिए प्रबंध छोड़ 2 और आपकी आत्मा कहाँ जाएगी उसकी चिंता मत करो। 1 समय बहुत धनी व्यक्ति ने बोलिंग कोठी बनाई थी, फिर वो कोठी ने बेचारे का देहांत हो गया, तब बच्चों के नाम बच्चों को दे दिया। अगले जीवन में वो मोठी बना और मोठी कान बनाई थी। वो पुरानी कोठी के तो 1 दिन कल दिन से मोती उसी कोठी के अन्दर आ गया। पानी चाहिए था। बेटे ने उसको चप्पल मार कर बाहर निकाल दिया। उनको पता नहीं था कि पूर्व जन्म में यम के पिता थे। तो हाँ इतने प्रेम के साथ बड़े बड़े मकान बनते हैं। मकान से बहुत प्रेम रखोगे। हम मकान को छोड़ना चाहते पर से मकान बनाया है। इतनी जल्दी मैं कैसे जाऊँ और 10 साल रह लो। तो फिर भगवान क्या करते है? ठीक है अगला जीवन उसी मकान में जन्म लो और मालिक के किले के रूप में के रूप में, कॉकरेज के रूप में, उसी मकान में आप कॉकरेज बन के वापस आ जाओगे। बोला नहीं मानना। प्रकृति के नियम बहुत कड़क है। जब तक आप यह भौतिक आकर्षण को नहीं तोड़ेगे, असली नहीं प्राप्त करोगे तो आप सब भक्तों से यही निवेदन है कि आप प्रयास कीजिएगा आध्यात्मिकता में आगे बढ़ने के लिए हमें बहुत दुख होता है। ये देख कर और कह के कि आजकल विदेशों में लोग हिंदुस्तानियों से आगे बढ़ रहे हैं। आध्यात्मिकता की रूचि में भी बहुत अधिक मात्र में लोग कृष्ण एनर्जी की तरफ जा रहे हैं। बहुत लोग इस्लाम की तरफ जा रहे हैं और बहुत से लोग कृष्ण भक्ति को भी स्वीकार कर रहे हैं। कृष्ण भक्ति को भी स्वीकार भारत से बहुत ज्यादा किया जा रहा है। पश्चिम देशो में मेरा अभ्यास यह है की जैसे रशिया वहाँ जो मुसलमान स्थानों है, वहाँ के मुसलमान लोग हमारी हिंदु लोगो से ज्यादा जल्दी भक्ति में आगे बढ़ रहे हैं। बुरा नहीं माना मुसलमान लोग वहाँ के 16 माला का जाप, 4 नियम का पालन, गीता का अध्ययन दिन रात करते हैं और अपने को भी बदल रहे है। और हम लोग बहुत ढीले हैं। वो डर कर आगे बढ़ते हैं। कोई सिनेमा देखना हो या पार्टी में जाना तो डरते नहीं है, पर आध्यात्मिक कार्यक्रम हो तो उसमे डर जाते हैं। भाई लगता है क्या डर की आकर्षी हो जाए तो हम ज्यादा आगे नहीं जाना चाहते। तो थोड़ा, आगे जाने का प्रयास करते है तो घर वाले खींच लेते जवान बूढों के लिए धर्म मेरी जवान उम्र में का कहाँ फस गए। तो बुरा कौन है 90 साल का 80 साल तक हम जवान ही रहते। सोचते ही नहीं जब भगवान के प्रति आकर्षित होने के लिए। तो महाप्रभु जी ने कहा है क्या गृहस्थ में रहते हुए भी भगवत प्राप्त कर सकते हो। कैसे हरे कृष्णा मंदा का उच्चारण करो बहुत ही सरल है। इस वीर से में किसी को शक नहीं है की असली मनथलाहैकीहै, शायद, आप में से कोई यह तो नहीं सोचेगा की हर किस की कल्पना है या ये बनावदीमंतलआपमें से किसी को यह महसूस होता है। ये तो प्रामाणिक है, छात्रो में है तो हरे कृष्ण को भगवत गीता, श्रीमद भागवत का अध्ययन करो, भक्तों की संगत का लाभ उठाओ और भगवान है। भगवान की मूर्तियों की उपासना करो, भगवान की तस्वीर रखो और उसकी उपासना करो। ये तो कुछ कठिन नहीं है, हर व्यक्ति कर सकता है और माता पिता बच्चों को भी शिक्षा। 2 हम सोचते है क्या बच्चे पैदा करके उनका भौतिक शिक्षा देना ही हमारा कर्तव्य है पढ़ाओ अमेरिका भेज 2 फिर शादी करवा। 2 जिम्मेदारी का और वो आपकी केवल भौतिक जिम्मेदारी है अध्यात्मिक जिम्मेदारी क्या है की आप बच्चों को ये दिखाओ वो है कौन बच्चों को सिखाओ कैन सी जन के बंधन से छुटकारा प्राप्त करोगे तो आप अगर बच्चों को भौतिक शिक्षा। 2 अध्यात्मिक शिक्षा नहीं 2 तो आप उन बच्चों के दुश्मन हो कैसे आप गहराई से उनको फंसा के बंधन से आपने उनको इस दुनिया में लाने में सहयोग दिया है और जेल में जेल से निकलने का रास्ता नहीं बता रहे हो ये भौतिक संसार 1 बड़ा जेल खाना है जेल खाने में तो आप उनको ले आये और जेल से निकालना कैसे वो शिक्षा हम नहीं देना चाहते तो फिर हम इसका परिणाम हमें करना पड़ेगा इस लिए और कई बार ये अभ्यास है की माता पिता प्रयास करते है देने के लिए ्यात्मिक शिक्षा पर बच्चे साथ नहीं देते, रूची प्रकट नहीं करते तो माँ बाप कहते हैं हम क्या करे वो मानते इसमें आपका दोष है क्या बचपन से आपने यह ज्ञान क्यूँ नहीं दिया महाराज और साथ में कहा गया है की हमारा 5 को अनुकूल करना आसान कर देना जैसे हम बचपन से आज कल बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा भी दे देते है तो उसे साथ में आध्यात्मिक शिक्षा दे। 2 श्री ईश्वर परिषर में कहा गया भौतिक शिक्षा, अध्यात्मिक शिक्षा दोनों साथ साथ अनुकूल करो और साथ साथ अनुकूल करोगे आश्रम में हो और आश्रम में रहते हुए आप जीवन के उद्देश्य को प्राप्त कर सकोगे। आप सब जनों से यही प्रार्थना है। हर कार्यक्रम 1 नए मित्रों को लाल। जिस प्रकार आप लोग भाग, आपका भाग्य खुला है, दूसरों के भाग्य को ये लोग हँसेंगे। कई बार लोग धार्मिक प्रोग्राम में जाते हैं और चोरी चोरी हमारे मित्र हैं उनकी बहुत रूची है और घर में किसी को नहीं बताते वो मंदर जा रहा है डर लगता है के दिन घर वाले बुरे काम के लिए मैं हँसने का डर नहीं रहता तो से हँसे तो भगवान तो देखेंगे की मेरे लिए इतना कष्ट रहा था तो आप जाँच कीजिये और प्रचार में सहयोग दीजिये और इस प्रकार अपने जीवन को सपोर्ट बनाए ल। हाल credit।
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