यह वीडियो हिन्दी में एक वैष्णव भक्ति प्रवचन है जिसमें अध्वैत आचार्य के प्रकट्य दिवस (प्रकट्य तिथि) को स्मरण किया गया है। प्रवक्ता पहले ‘अध्वैत’ शब्द का अर्थ (अध्वैत – बिना अंतर के) और ‘आचार्य’ की भूमिका (धर्म के नियमों को अपने आचरण से प्रस्तुत करना) समझाते हैं, फिर अध्वैत आचार्य के जीवनकाल, महाप्रभु श्रीकृष्ण (भगवान) के साथ उनका संबंध, तथा उनका आयु‑अंतर (लगभग 50 वर्ष) बताते हैं। आगे माधवेंद्र पुरी से अध्वैत आचार्य तक की गुरु‑शिष्य परम्परा, शालिग्राम शिला पूजा, तूलसी‑जल अर्पण की विधि, चंदन यात्रा, तथा शान्तिपुर, मायापुर जैसे तीर्थस्थलों की यात्रा का वर्णन किया गया है। प्रवचन में कई कथा‑उदाहरण (जैसे बालक के दूध न पीने की कथा, हरिदास ठाकुर की जप‑गिनती) और भक्तों के दैनिक अभ्यास (जप, भागवत अध्ययन, प्रसाद वितरण) को भी सम्मिलित किया गया है। अंत में अध्वैत आचार्य की महाप्रभु के प्रति श्रद्धा, उनके द्वारा देखी गई दिव्य लीलाएँ, तथा भक्तों को शालिग्राम शिला और तूलसी‑जल अर्पण के माध्यम से कृपा प्राप्त करने का आह्वान किया गया है।
Chapters
तो आज हम अध्वेताछायकाअविभा तिथि मना रहे हैं। अद्वेता का अर्थ क्या है जिसके धेरत्मामेंअंतर नहीं हो? आपके देव में अंतर है या नहीं हैं? और भगवान के देवर में कोई अंतर नहीं है। अच्छा रिया अचार्या का अर्थ है जो अपने आचरण के द्वारा धर्म के नियमों को प्रस्तुत करता है और अपने आचरण के द्वारा धर्म का उपदेश देता है। शास्त्रों पर। तो परम भगवान जब पृथ्वी पर आते हैं तो उनके जो सनातन साथी है वो भी प्रकट होते हैं। उदाहरण के लिए जब महाप्रभु जी प्रकट हुए, इस पृथ्वी पर महाप्रभु जी कौन हैं, स्वयं भगवान, स्वयं कृष्ण, श्री कृष्ण, राधा कृष्ण ने, वो ही राधा कृष्ण प्रकट हुए है। ्ेतमहाप्रुटी के रूप में। तो अदवेताचार्या वहा प्रभुजी से पे 50 साल पहले प्रकट हो चुके थे, दूसरे शब्दों में अध्वेताचारेया 50 साल बड़े थे। आयु में आप पंचतारा की तस्वीर देखते हो, उसमें आपने देखा होगा, अनुभव किया होगा की अधवेताचारेकी तस्वीर में 1 बार दाढ़ी भी है। सफेद दाढ़ी है न क्यूँ बाकी जो साथी हैं महाप्रभु जी की नित्य नंदाजी, शिवाज, उनके पास नित्य नंदा, उनके पास दाढ़ी नहीं। 41 दाढ़ी क्योकि वो आयु में बड़े थे किन से ये चेतना महाप्रभु से। तो अध्वेतचार्या कुछ शिव जी का भी अवतार माना जाता है। वहाँ विष्णु जी के अवतार थे। और अधवेधचार्या उन्होंने भारत के तीर के स्थानों की यात्रा की और तीर के स्थानों की यात्रा के दौरान वो 1 महान संत को मिले। चिन का नाम था क्या माधवेंद्र पुरी। अब मधवंद्रपुरी से परिचित हो। माधवेद्रपुरी बड़े महान चार्य थे जिन्होंने हमे ये शिक्षा दी किस प्रकार भगवान के आर्चव्ग्रह की पूजा करनी चाहिए जैसे आप चन्दन यात्रा करते हो। ये चन्दन यात्रा भी पहले माधुवंदपुरी ने अनम की थी। तो माधवपुरी ने अधवेताचालय को दीक्षा दी और यात्रा करते करते पहुंचे शांतिपुर में। आप जानते हो शांतिपुर का खाए शांतिपुर बंगाल में कृष्णा नगर के पास त्वदवेतछानिया अगर आप लोग मायापुर जाते हो तो हर साल हम लोग प्रसाद भी बांटते हैं शांतिपुर में और वहाँ शांति पर में 1 मंदर है जहाँ की अभी भी आप उन मूर्तियों को प्राप्त कर सकते हो जिनकी पूजा अद्वेता छाल ले की थी। वहाँ शायग्रमशीला हैं जिनकी पूजा अद्वेता चाय ले की थी। तो अचार्या यात्रा करते करते पहुंचे शांतिपूर्ण और माधुरी से दीक्षा ली। शांतिपूर्ण में। उस समय हरराज ठाकुर भी रह रहे थे और हरदा ठाकुर दिन में 3 लाख बार जप करते थे। तो अद्वेत चार्य और हरिराज ठाकुर 1 साथ निवास करते थे। सुबह से रात उनका 1 ही धंदा था और धंदा क्या था हरि का नाम और शास्त्रों का अध्ययन। सारा दिन भागवत का अध्ययन करते थे और हरि नाम का उचारन और हरिदास ठाकुर ने समाज की स्थिति देखी तो उन्होंने देखा सोचा ये जो समाज की आज स्थिति है अगर हम बज्जीमोका उधार करना चाहते हैं तो भगवान को स्वयं अवतरित होना पड़ेगा। और इस इच्छा को सफल बनाने के लिए अदवेदाचारयकेपास चारे ग्राम शीला थी। मेरे कमरे में भी अनेक शालीग्राम शिला है। ग्राम शीला भगवान का रूप है जो कि पत्थर के रूप में प्रकट होता है और शीला भगवान ने कोई अंतर नहीं तो वो जो 2 साल शिला जिनकी पूजा उनका दर्शन आज भी प्राप्त कर सकते हो अगर आप अगली बार मायापुर जाओगे तो शांतिपुर में वो मंदिर है जहाँ की आप उनका दर्शन प्राप्त कर सकते कार्य और हीरा ठाकुर दिन रात नाम जाप कर रहे थे, साफ शीत भागवत का अध्ययन चर्चा चर्या की पूजा कर रहे थे तुलसी के पत्ते के साथ और जल के सा भगवान की पूजा करना कठिन नहीं है भगवान कहते हैं शास्त्र में पत्रम पुष्पम फलम, रोया, तुल्सी का पत्ता 2, पत्रम पुष्पम फल 2 और क्या फल फल, सोयम पानी भगवान ये भी नहीं कहते बिसलरी पानी होना चाहिए कि लडके का पानी भी चलेगा सो अगर प्रेम और भक्ति के साथ अर्पण करोगे तो उसे मैं स्वीकार करूंगा तो देखिये तुलसी के पत्ते से करने थे बस और गंगा जल से और क्या हिंदी भगवान प्रकट हो जाए और ठाकुर की पुकार के उत्तर में भगवान प्रकट हुए, कहा कहा नाद प्रकट हुए जन मिश्र और सचिव माता के पुत्र के रूप में तो अद्वेता चार्य और महाप्रभु का बड़ा गहरा सम्मान था जब भगवान प्रकट हुए थे अद्वेता चार्य थे माधवन पुरी के शिष्य और जो महाप्रभु जी के पिता और माता थे उनके गुरु थे अद्वेता चार्य जब भगवान प्रकट हुए थे वो अपने माता के स्तन का दूध नहीं पी रहे थे, उन्होंने दूध पहले तो पी रहे थे फिर दूध पीना बंद कर दिया तो उनके माता पिता को चिंता थी हमारा बेटा दूध नही पीरा माता के स्तन का तो वो गए अद्वेता के पास क्यूंकि जैसे मैंने कहा अधवेताचाययाकी आयु महाप्रभुजी से 50 साल अधिक थे वहाँ दुसरे शब्दों में अद्वेत 50 साल के थे जब महाप्रभु जी इस प्रीति पर प्रकट हुए तो जगनाथ मिश्रा ने कहा अद्वेता 4 से की मेरा बेटा उसकी माँ का स्तन का दूध नहीं पी रहा क्या कारण है तो अधवेताचार्नेकहा क्यू तुम्हारी माँ ने तुम्हारी पत्नी ने दीक्षा नहीं ली हुई और तुम्हारा बेटा केवल प्रसाद ग्रहण करना चाहता है इसलिए माता के स्तन का दूध नहीं पी रहा फिर अद्वेता जगनाथ मिश्र सच्ची माता दोनो को दिक्षा दी और दीक्षा देने के बाद वेटर ने दूध पीना शुरू कर दिया तो अद्वेता महा प्रबिधि के माता पिता दोनो के गुरु थे तो वे की प्रथा में परम भगवान प्रकट हुए इस पृथ्वी पर और भगवान ने अपनी दिव्य लीला प्रकट की तो अधवेताचार्याको महा प्रभु जी बहुत ही आदर देते थे महाप्रभु जी ने 1 समय अपने विश्व रूप महा प्रकाश का रूप प्रकट किया था और कोई चुने हुए भक्तों को ये दर्शन मिला जिनमे 1 थे अद्वेता जिन्हें उन्होंने अपने विराट रूप का दर्शन दिया इस प्रकार वेद है और छाया की कृपा से वहाँ पर बिजी प्रकट हुए तो हमें इस शुभ अवसर पर आधरित छाया की प्रार्थना करनी चाहिए क्या की हमे उनकी कृपा प्राप्त हो हाई क्रष्णा हाई के किश्णहालेहाहे।