In this Hindi devotional lecture, Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī shares an anecdote from a program held in a Russian city where two adjacent halls hosted very different events: one hall featured a lively kirtan with devotees dancing joyfully without any intoxicants, while the neighboring hall held a ballroom with music, alcohol and dancing. The contrast illustrates that material pleasures, even when amplified by alcohol and entertainment, never bring lasting satisfaction, whereas devotional chanting produces a deep, ever‑increasing spiritual bliss. The speaker argues that worldly pursuits—new movies, songs, or material comforts—cannot fulfill the soul, likening them to trying to satisfy a fish out of water. He emphasizes the necessity of sincere bhakti, adherence to the four basic devotional rules, and the practice of chanting the holy name on a 16‑mala (japa) rosary. Each repetition deepens the experience of divine joy, which, unlike fleeting material happiness, continually expands. The lecture uses metaphors of sweet versus salty oceans to describe the nectar‑like nature of devotion, cites scriptural authority (the Gita) on the relationship between surrender and spiritual bliss, and urges listeners to perform every activity with devotion and joy, thereby transforming ordinary life into a source of divine pleasure.
Chapters
मैं 1 शहर में था रशिया में, जिसका नाम है सेम फीचर्स वर्ग। यह रशिया का सबसे दुसरे नंबर का शहर है। तो वहाँ हमारा प्रोग्राम हो रहा था, और वो प्रोग्राम के लिए, बड़े प्रोग्राम के लिए, कई बार रशियन मंत्रों में बहार के हॉल किराये पर लेते है, जिसमे की हजार 2000 लोग आ रहे हो। जहाँ में 1 हॉल लेंड किया था, उस फ्लोर में 2 होल थे, 1 में इस्कॉन के भक्तों ने लिया था, जहाँ की किरतन हो रहा था, और उपदेश बिल्कुल पास के हॉल में 1 बैंड बज रहा था, शराब बटरी थी और बाल रूम डांस हो रहा था। दोनो हाल पड़ोस के थे, 1 हॉल में किरतन हो रहा था, बिल्कुल पास के हाल में और कैसा था, बाल रूम डांस िंग हो रहा था, और होने थे और क्यूंकी इन दोनो कमरो की दीवारें साउंड प्रूफ नहीं थी। हमारा उनके कमरे में जा रहा था, न बन की आवाज हमारे हाल में आ रही थी। इतनी ज्यादा थोड़ी बहुत। तो जब उनके और केश वैन वालों ने जब बाल रूम डांस हो रहा था, उन्होंने पड़ोस के कमरे से किरतन देखा और देखा की उन्हें कीर्तन सुनाई दे रहा था, तो जिज्ञासा के कारण वो सब आये, अंदर कई आये सब नहीं, पर ये देखने के लिए कि पड़ोस के हव में क्या हो रहा है, उन्होंने देखा की भाग बड़े उत्साह से नाच रहे हैं और किर्तन हो रहा है? तो उन्होंने कई भक्तों से पूछा तुम लोग शराब वगैरह नहीं पीते तो कैसे नाच रहे हो? तो ये लोग हैरान हो गए थे कि शराब और और के शराब, इन सब चीजों के बिना लोग कैसे नाच सकते हैं, कैसे खुश हो सकते हैं? जैसे की आप देखते हो, भौतिक जगत में हर हफ्ते नई सिन्हा, नया सिवा कोई नई फिल्म रिलीज होती है, रोज नए नए गाने आ रहे हैं। लोगों ने इतनी फिल्में देख ली, इतने गाने देख लिए, संतुष्ता नहीं मिली। पर हम ये सोचते हैं किया। अगली फिल्म जो है, जो अगला कार्य है, उससे हमें संतुषता प्राप्त हो गई। पर भौतिक क्षेत्र में कभी भी किसी प्रकार से संतोषता प्राप्त नहीं हो सकती। जब तक हम अध्यात्मिक कार्यों में नहीं जुड़े। जैसे की प्रॉपर उदाहरण देते थे, अब मछली को जल के बाहर रखकर कभी भी संतुष्ट नहीं कर सकते। इसी प्रकार जब तक हम आध्यात्मिक कार्य में नहीं जुड़े, व्यक्ति किसी प्रकार से संतुष्ट प्राप्त नहीं कर सकता। तो इसी विषय पर प्रभाजी कह रहे हैं कि जब भक्त, अध्यात्मिक, आनंद अनुभव करते हैं, जो भक्त हैं, वो ये देख कर आश्चर्य हो जाते हैं और कहते हैं यह कैसे सम्भव हो सकता है जैसे हमारे भक्त हैं। जब उन्होंने किसी और अपने मित्र को कहा था कि हमें 4 नियमों का पालन और 16 माला का जहाँ वगैरह करना पड़ता है, के मित्र ने कहा, फिर जीने का क्या फायदा? अगर तुम्हे रोज सुबह उठना है, ये 4 नियम का पालन करना है, व जीने का फायदा ही नहीं। लोगों के मन में यह विचार बैठ गया है, क्या कि जब तक हमें ये सब सुविधाएँ प्राप्त नहीं हो, आप असली सुख आनंद अनुभव नहीं कर सकते तो 1 रुप से देखा जाए। आज के ज़माने में भौतिक समाज में रहना ही बहुत बड़ी तपस्या है, पैसा का माना सा काम नहीं है उसके इलावा आज के जमाने में, हवा में कितना पोलूशन है जैसे दिल्ली जैसे शहर में मैंने कई साल पहले, 1 साल पहले पढ़ा था, क्या कोई व्यक्ति सिगरेट नहीं पीता तो उसके लंग्स में 20 सिगरेट दिन में पीने का असर पड़ जाता है, आप सिगरेट नहीं कोई कह सकता है उसे अच्छा सिगरेट पीना शुरू कर ले, वो सिगरेट मिनट फिर शुरू करेंगे तो उसके अक्सर और भी ज्यादा पड़ेगा जो नहीं पीते उनके लंग्स पर भी 20 सिंगर दिन में पीने का असर पड़ता है, ये भी देखा जाए तपस्या है तो ऐसे अनेक प्रकार की तपस्या है पापा जी कहते थे कि बहुतिक सागर का जो जल है, वो नमकीन होता है और भक्ति के सागर का जो जल है, वह मीठा है अमृत के समान और जितनी अधिक मात्रा में हम भगवान के शरणागत होते हैं, उतना ही अधिक मीठा पन, आपको महसूस होता है हमें यह नहीं सोचना चाहिए की भगवान के शरणागत होने से हमें इस जल का मीठापन महसूस नहीं होगा जब भगवान गीता में कहते हैं, यह हम आप पर पर ध्यान दें जितनी मात्रा में कोई मेरी शरण में आता है, उतनी ही बुद्धि में देता हूँ उसे मुझे समझने के लिए जितनी मात्रा में हम भगवान के चरण कमलों में अपने आप को समर्पण करते हैं, उतनी अधिक मात्रा में हमें ये आध्यात्मिक आनंद अनुभव होता है और चित्र महा भावज ने कहा ये जो आनंद है, यह केवल बढ़ता जाएगा, घंटे का नहीं चित्र महावरी कहते हैं कि हर नाम के उच्चारण का 1 लाभ यह है कि आनंद बुधि, आपको, असली आनंद अनुभव होगा और ये जो असली आनंद है, ये बढ़ता जाएगा तो कृष्ण का खाजा है, वो असली अमृत है और जो भौतिक चर्चा है वो क्या है, विषय या जय है जैसे की 1 बड़े प्रसिद्ध भक्त ठाकुर जी ने कहा है मनुष्य जन्म पाया, मनुष्य जन्म प्राप्त कर लिया, मैंने और राधा कृष्ण नहेबाजराधाकृष्ण का मैंने भजन नहीं किया, तो उसका क्या परिणाम है कि मैं जान बुझ कर पीछा, ठान जान, बुझकर में ज झेल पी रहे हो, जो आज की स्थिति यह है कि लोग जहर पी रहे हैं, जब आप उन्हें अमृत देने जाओ तो क्या कहते हैं जहर पीने 2, हमें झर पीने 2 उनको विश्वास ही नहीं है कि कृष्ण कथा है, असली अमृत, इसलिए प्रॉपर जी इसके तारे में ये कहते हैं कि जब भक्त जो है, अध्यात्मिक आनंद अनुभव करते हैं, जो भक्त हैं, वे देखकर आश्चर्य हो जाते हैं कि कैसे सम्भव है सुजीत मात्रा में हम भगवान के चरण कमलों में अपने आप को समर्पण करते हैं, उतनी अधिक मात्र में हमें ये आध्यात्मिक आनंद अनुभव हो जाए कर्ण क्रिश्ना हरे हरे लाहलनमलालेहाले।