ऐसा क्या करें कि भगवान का स्मरण हमेशा बना रहे ? | Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja

यह हिन्दी वैष्णव व्याख्यान भगवान के निरन्तर स्मरण के महत्व को समझाता है। वक्ता अर्जुन‑कृष्ण संवाद, भागवत गीता के विभिन्न अध्यायों और अन्य शास्त्रों के उद्धरणों के माध्यम से यह दर्शाते हैं कि कैसे मन को मित्र बनाकर, नाम, रूप, गुण, लीला तथा शास्त्रों के माध्यम से भगवान को स्मरण किया जा सकता है। वे अर्जुन के द्वारका में सात‑महीने के अनुपस्थिति, उसके बाद के शोक‑दुःख, तथा उसके स्मरण से प्राप्त शक्ति को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। व्याख्यान में मन को मित्र या शत्रु मानने की अवधारणा, ध्यान‑योग की आवश्यकता, काली युग में नाम‑जप की प्राथमिकता, तथा मृत्यु के क्षण में स्मरण के परिणामों पर प्रकाश डाला गया है। अंत में श्रोताओं को निरन्तर भगवान के नाम, रूप, गुण, लीला और शास्त्रों के अध्ययन‑स्मरण के द्वारा जीवन‑पर्यंत स्मरण बनाए रखने का व्यावहारिक मार्गदर्शन दिया गया है।
Chapters
हरे कृष्ण हमने पढ़ा है की परम भगवान का भगवान, परम भगवान ने अपनी इच्छा के अनुसार अपना अंत धान किया है। जैसे की भगवान गीता में कहते हैं अपनी इच्छा के अनुसार ही वो प्रकट करते हैं। और अप्रकट जन्मा कर्मा जाने दिव्य। यदि महाराज ने अपने भाई अर्जुन को भेजा था द्वारका और लगभग 7 महीने के लिए, अर्जुन द्वारका से नहीं लौटे, जब वो इतनी देर के लिए नहीं लौटे। युधिष्टर महाराज को शक हो गया था कि परम भगवान ने अपने आप को अप्रकट कर लिया है, यहाँ अंतर्धान कर लिया है। और साथ में कलीग की जो लक्षण है वो भी प्रकट होने लग गए थे। छोटी छोटी बातों में झगड़ा हो रहा था, मौसम ठीक रूप से नहीं, मौसम भी बदलने लग गए। जब सर्दी होनी च गर्मी हो रही थी, गर्मी के समय सर्दी और जब अर्जुन लौटे 7 महीने के बाद, तो उनके चेहरे को देखते ही जब उन्होंने युधिस्टर में आज देखा, क्योंकि चेहरे में इतना शोक दुख था, वो समझ पाए नारदमुनि कहा था? जो भविष्य वाणी दी थी वो शायद सबसे निकल गई है। भगवान के जो प्रिय मित्र हैं, भगवान के जो प्रिय भक्त हैं, वो भगवान से जुड़ा नहीं रहना चाहते। ये हम भौतिक वालियों के लिए समझना जरा कठिन है। तो परम भगवान आते हैं धर्म के नियमों की स्थापना के लिए और अपने भक्तों के साथ, अद्भूत कृष्ण कथा, कृष्ण लीला प्रकट करने के लिए। और उनके जो सनातन भक्त है वो भी परम भगवान के साथ आते हैं। और जैसे की भागवत गीता के चौथे बिहार में भगवान ने अर्जुन से कहा की मैंने ज्ञान दिया था सबसे पहले सूर्य के देवता विवस्वान को, और ये ज्ञान रिवास्वनसेआया महाराज मनु को जो कि मानवता के पिता है। और फिर महाराज इक्शवागोको और समय के साथ यह ज्ञान खो गया था। यह ज्ञान मैं अभी तुम्हें फिर से दे रहा हूँ। तो अर्जुन ने पूछा कि मैं यह कैसे विश्वास करूँ? यह आपने ये ज्ञान दिया था। सूर्य के देवता विवासन, जबकि उनकी आयु आपसे अधिक है, भगवान ने कहा, बहुत बहुत बार तुमने और मैंने जन्म लिया है, मैं अपने सब जन्मों को याद कर सकता हूँ। और तुम में तो अर्जुन जो है, यह भगवान के सनातन साथी है। और भगवान जब अपने आप को प्रकट करते हैं तो उनके सनातन भक्त ही अब साथ में प्रकट होते हैं। तो अर्जुन कुछ शोक था। अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण की शुभकामनाएं लीलायें, इत्यादि का स्मरण आरम्भ किया। जैसे ही उन्होंने इसका स्मरण आरम्भ किया, अर्जुन ने बोलने की शक्ति आई और अर्जुन को ऐसा लगा की बदन भगवान उनके साथ उपस्थित हैं। तो प्रापति समझाते हैं इस अध्याय में और आगे किस लोक में, कि जिस प्रकार अर्जुन ने भगवान की लीलाओं का शिक्षा का स्मरण किया और उनके शो की स्थिति समाप्त हुई, उसी प्रकार अगर हम भी भगवान की लीला, उद्देश्य, इत्यादि का स्मरण करेंगे तो हमें भी ऐसा महसूस होगा कि स्वयं भगवान हमारे साथ उपस्थित हैं। तो इसीलिए भागवत गीता के अनेक श्लोकों के द्वारा भगवान हमें बेच दे रहे हैं कि हमें सदा उनका चिंतन करना चाहिए। भागवत गीता के छठे अध्याय में भगवान इस विषय पर बदल देते हैं। यह हमें मन को बंधु बनाना चाहिए और शत्रु नहीं। मन बंधु जब माना जाता है। जबकि मन के द्वारा हम भगवान की शिक्षा का पालन करने का प्रयास कर रहे हैं। और मन शत्रु जब माना जाता है। जब मन के द्वारा शास्त्र के विपरीत विचार का स्मरण कर रहे हैं तो भगवान गीता के छटे अध्याय जिसका नाम है ध्यान, योग में इस विषय की स्थापना कर रहे हैं। मन को हमें बंदू बनाना चाहिए। इस विषय की चर्चा गीता के अनेक स्थानों में है। 9 वे दहाई में भी भगवान इसी विषय की चर्चा करते हैं और फिर अठारहवे दिहाई में भी इसी विषय की चर्चा करते हैं। अठारहवें दहाई में, जिसमें भगवत गीता का साल हमें प्राप्त होता है, भगवान कह रहे है मन मन भाव, भक्तों, माल्या, जी, माम, मुस्कुर माँ, मैं वाशी प्रति दिन मेरा चिंतन करो, मेरे भक्त बनो, मेरी उपासना करो, मुझे नमस्कार करो। तो यहाँ अर्जुन में भगवान श्री कृष्ण की शुभ कामनाओं का स्मरण आरम्भ किया, उनके सम्बन्ध का, उनकी लीलाओं का और फिर उनमें बोलने की शक्ति भी आई। भगवान के जो गणेश भक्त है वो दुखी हो जाते हैं जबकि भगवान उनसे दूर हो जाते हैं। जैसे की गोपियां जो थी, ब्रज की रज, ब्रज की गोपियों का सदा यही भाव था कि सदा व भगवान के साथ ही रहे। और जब भगवान कभी प्रकट हो जाते थे तो वह अत्यंत दुखी हो जाते थे जो गोपियां थी। उन्होंने ब्रह्मा जी को भी दोष दिया कि आपने आंखों को पलकना पड़ता है, आंखों का पकना होता है। वे 1 क्षण ले थोड़े समय भगवान का वो चेहरा नहीं देख सकते। तो जो भगवान के भक्त हैं वो सदा यही चाहते हैं कि वो सदा भगवान के साथ रहे। तो शास्त्रों का निर्णय है की हमें प्रयास करना चाहिए। सदा भगवान का स्मरण करें और भगवान की लीलाओं का, शिक्षाओं का, शुभ कामनाओं का स्मरण करके अर्जुन बोल ही नहीं पाये और अर्जुन को ऐसे लगा, यह स्वयं भगवान, उनके समक्ष उपस्थित भी हैं। भगवान में उनके विचारों में कोई अंतर नहीं। अब प्रश्न यह है कि कृष्ण भगवान का स्मरण किस प्रकार से हम करे? इस अधियान में आप पढोगे क की लगभग हर तातपर्य में प्रॉपर्टी इस विषय पर बल दे रहे हैं कि हमें किसी न किसी माध्यम से भगवान की लीलाओं का, उदेश्य का, स्मरण करना चाहिए। तो इस विषय में कहा गया है हमें स्मरन करना चाहिए भगवान के नामों का, रूपों का, लीलाओं का, गुणों का, भगवान के रूप का नाम रूपा, गुना लीला भगवान की। जैसे कि इस दिहाई में अर्जुन उन लीलाओं का स्मरण कर रहे हैं जो कि भौतिक दृष्टि से असंभव थी और भगवान की हेतु की कृपा के कारण वो सफल हो पाए। और न की अनेक लीलाएं हैं। जिनके विषय में हम भागवत पढ़ते हैं, उसके साथ भगवान के शुद्ध भक्तों की अनेक लीलाएं हैं। फिर लीलाओं के इलावा भगवान के अनेक गुण भी हैं। इनका वर्णन ब्रह्माजी करते हैं। ब्रह्मा समित में भगवान जो हैं, अद्वेता है, चूता है, कभी गलती नहीं कर। अनंत रूप वह अपने आप को अनंत रूपों में प्रकट करते हैं। उनके लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं है। आगे ब्रह्माजी कहते हैं वो किसी 1 अंग से किसी और अंग का कार्य भी कर सकते हैं। अंगनीयसस्कलंदरवृध्य मंत्री आप हम 1 अंक से 1 ही प्रकार का कार्य कर सकते हैं। भगवान किसी अंग से किसी और अंक का कार्य कर सकते हैं। जैसे की जब हम वैश्य भक्त उन्हें भोजन भोग लगाते हैं तो भगवान ये भोग कैसे स्वीकार करते हैं अपने नेत्रों से और कानून से नेत्रों से भो को देखते हैं, कानून से भक्त की जो प्रार्थना है उसे सुनते हैं और इसे स्वीकार करते हैं। तो भगवान के गुण के विषय में वो किसी 1 अंग से किसी और अंग का कार्य कर सकते हैं। तो दूसरे शब्दों में भगवान के गुणों का स्मरण करें नीला उनका उनके रूपा रूपा का क्या अर्थ है? उनके स्वरूप और रोज हम भगवान का दर्शन लेते है। रोज हम भगवान को प्रणाम करते हैं, उनके रूप का दर्शन ले, फिर उनके नामों का और इस कलियुग में हर नाम के उच्चारण के द्वारा ही आप परम भगवान को आकर्षित कर सकते हो। नाम रूप गुण लीला तो इस प्रकार किसी न किसी रूप से हमें मन के द्वारा सदा भगवान का चिंतन करते रहना चाहिए। भागवत गीता में भगवान ने अर्जुन से कहा चस्मा सर्वेश कलेशो म मनस्मरयुमईअरपिता मनो बुधि मन बुद्धि को मुझे अर्पण करते हुए क्या करो। अर्जुन तुम इस युद्ध में लड़ो भागवत गीता में भगवान कहते यामयमवापीस्मरणहवा जहाँ हमारा मन होगा, मृत्यु के समय उसी प्रकार का दे आपको प्राप्त करना पड़ेगा। इसलिए शास्त्र का निर्णय क्या है, शास्त्र का उपदेश है अंति नारायण स्मिति की हमें जीवन की योजना इस प्रकार से करनी चाहिए की अंतिम समय में हम परम भगवान का स्मरण कर सके। तो जहाँ मन होगा उसी प्रकार का दिया में प्राप्त होगा, जन मन होगा मृत्य के समय तो उसी प्रकार हम जो भी कार्य कर रहे है मन और बुद्धि द्वारा भगवान का स्मरण करना चाहिए। हरी कृष्ण हारे, क्रिष्णा हार, किशना कृष्णा हारे, हारे हारे।
More from PRASAD

Rare Pastimes & Timeless Lessons of Guru Mahārāja | Stories Every Disciple Should Hear

ISKCON Legends- pure devotees meet-HH Jayapataka Swami, HH Gopal Krishna Goswami, HH Radhanath Swami

Jagannātha Ratha-yātrā Through Śrīla Prabhupāda's Mercy | 29 April 2006 | Nairobi, Kenya

Lord Jagannātha's Appearance Pastime | 21.07.2019 | ISKCON Calgary | Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

The Ācārya Teaches by His Own ExampleGuṇḍicā Mārjana by Guru Mahārāja #shorts

Guṇḍicā Mārjana – Lord Jagannātha's Pastime | 21.7.2019 | ISKCON Calgary |Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

H.H. Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī Mahārāja - Exemplary Sādhana and Deity Worship # shorts

भगवान की कृपा कैसे प्राप्त होगी ? | 11 Jan 2014 | Punjabi Bagh | Srila Gopal Krishna Goswami

Material Education vs Spiritual Education | Srila Gopal Krishna Goswami #shorts

