अक्षय तृतीया और चंदन यात्रा का महत्व एवं अद्भुत लीलाएं | Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja

In this devotional discourse, Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī Maharaja explains the profound significance of Akshaya Tritiya and the associated Chandan Yatra (Sandalwood Festival). He recounts historic episodes of saints and kings who received divine instructions in dreams to collect, prepare, and apply sandalwood (chandan) on the deity’s vigraha, emphasizing that the sandalwood represents the divine presence of Gopinath. The lecture details the ritual procedures—how sandalwood is sourced, consecrated, and applied over a three‑week period in temples—while highlighting the role of specific temples such as Jagannathpur, Anandpur, and Vrindavan. Interwoven with these narratives are moral teachings on self‑less service (nishkama bhakti), humility, and unwavering devotion even under difficult circumstances. The speaker urges listeners to emulate the saints’ readiness to follow divine commands, to perform service without expectation of honor, and to maintain a constant attitude of reverence and gratitude. The talk concludes with a call to actively participate in the Chandan Yatra, to engage in proper kitchen service, and to internalize the spiritual lessons of Akshaya Tritiya for personal upliftment.
Chapters
a a a a a बहुत ही शुभ अवसर है और पापाजी ने अच्छे अतेक ऊपर कुछ खास विचार नहीं दिया है की है। अक्षय जो सेवा दान 2 उसका आपको हजारों गुना लाभ मिलता है और अक्सर भारत में अक्षय पीते के दिन अनेक सौदे शादियां वगैरह होती है तो अक्षय पीते के दिन अनेक शुभ लीलाएं भी बीती है न की चर्चा, करेंगे और बरिशटांकीस्टीे सबसे प्रसिद्ध है ये आज के दिन चंदन या आम और आज के दिन मानपुर के द्वारा ये चंदन या साल का असर और आंदहिनपूरीकी कथा हर साल आप 3 बार साल में सुनते हो। अभी वह वाले दिन, किरवा वाले दिन और आज के दिन चलने पर आने और भी जिला है जिनका सम्बन्ध में आज के दिन में सख्लेपमेंहमउनकी चर्चा करेंगे और फिर द की कथा की पर चल करेंगे। तो गौर ब्रह्मा जी के द्वारा श्रषि का निर्माण भी हुआ था। आज के दिन तक आरम्भ हुआ था। कलियुग के पश्चात आज के दिन सत्य दिन भी शुरू हुआ था और धमशत्यशतीगणमह आज के दिन और विवादों की अबदी पहले 100 साल थी। आज के दिन से सतयुग में 1 लाख साल हो गई। सतयुग में लोगों की अवधि 1 लाख साल की थी। लगभग देती युग में 10 गुना कम, आप युगों में और 10 गुना कम और कल युग में और 10 गुना कम। और आज के दिन वेदव्यास जी ने गणेश जी को कहा, तुम महाभारत को लिखो वे व्यास लेने। पूरा महाभारत का संदेश हेलमैन में बिठा लिया था। उन्हें 1 सेकेंडरी की जरूरत थी जो कि डिक्टेशन को लेगा सो। गनेश ने कहा, मैं डिटेशन लूंगा, पर 1 शर्त पर आप ने बिल्कुल नहीं रोकना, अगर आप डिक्टेशन देना रोकोगे तो मैं लिखना बंद कर दूंगा। सो व्यासदेव ने कहा और तुमको लिखना भी है और क्या लिख रहे हो, उसको समझना भी है। उन्होंने बीच में 800 बड़े कठिन स्लोक डाल दिए जिनके लिए गनेश को रोकना पड़ा। सोचने के लिए मैं लिख रहा हूँ। इसका क्या अर्थ है? देर में देव ने पूरा महाबार दे दिया तो आज के दिन महा बारा का डेशन। आम ने बड़े अच्छे सेक्रेटरी थे, लिखते गये, लिखते लिखते बिल्कुल रुके, नहीं तो ये आम हो। आज के दिन और आज के दिन वन परश्रम प्रकट हुए थे, कुएरकोदेवताओं का खजांची बनाया था, आज के दिन रावविकी जो खजांची की पोजिशन आज के दिन न देनी चाहिए। कुएड को आज के दिन खजांजी बनाया था। और आज के दिन यदि समराज को अयक्ष पत्र प्राप्त हो जा रहे थे, जंगल में, वनवास में अपने भाइयों के साथ और जो उस समय के ऋषि मुनि थे। उन्होंने कहा, हम भी आपके साथ चलेंगे क्योंकि आपके साथ चलेंगे तो हमें कृष्ण कथा सुनने को मिलेगा। ये आप कृष्ण कथा के अलावा किसी और विश्व में रूचि में लेते। और सुनने का मैं तुम सब की देखभाल कैसे करूंगा, तुम सब हजारों देशी मनी मेरे साथ जाओगे, आप की देखभाल कौन करेगा। निर्देश ने सूर्य के देवता की पूजा की और सूर्य के सूर्य के देवता ने कहा, मैं तुम्हें खास सुविधा दूंगा, अक्षय पचरा, आम सुना, अक्षय पत्र इस काम में। तो उन्होंने कहा, मैं तुम्हें खास अक्षय पथरा दूंगा, जिसके द्वारा जितने लोगों को खिलाना खिला सकते हो। पर केवल 1 ही शर्द कि तुम्हे जो पुरी के दुपहर के भोजन खाने से पहले खिलाना है। सो यूनिस की तपस्या से सूर्य के देवता बड़े प्रसन्न थे, उन्होंने अक्षय पर दे दिया। 1 से में दरभा मुनि आये थे 10 हजार शिष्यों के साथ दुर्योधन के घर। दुर्योदन ने उनकी अच्छी अच्छी तरह देखभाल की। योजन राज्य कार्य में बड़े होशियार थे। तो फिर जो देखभाल करने के बाद वासा ने पूछा तो मैं कुछ सेवा कर सकता हूँ। आपके बदले में अगर आप स की खातर करो, वो भी पूछता है आप हैं न, हम भी कुछ कर सकते हैं आपके लिए। तो दुर्योधन ने कहा जिस प्रकार आज आपने मेरे घर को पवित्र किया है, मेरे भाई की, भाई के घर को पवित्र बना लो बड़े प्रेम से कहा। और आप तो जानते हो कितना श्नेता उनका नियोजन ने हर रूप से प्रयास किया था कि किसी प्रकार से पानो भाइयों को बंद हो जाए। उनके घर में रखा लैग लैक का है कि नया घर है। और उसको आग लगा दिया और विदुर के कहने पर वो भाग गए और बचा लिया। तो दुर्योधन के मन में यही भाव था। किसी न किसी प्रकार से इन भाइयों का बदल जाए। तो दुर्योधन के कहने पर दवा संवरी पहुंचे देश में सी पर के समय, जबकि द्रोपति ने अपना प्रसाद खा लिया था। और जब विवाद हम नहीं पहुंचे युदेशरनेउनकाबड़ा स्वागत किया। कहा जाता है कि आपके घर में कोई शत्रु भी आये तो इसकी हमें क्या करना चाहिए बड़े आदर के साथ स्वागत करना चाहिए। प्रापा जी की इच्छा थी कि जो भी व्यक्ति आए, हमारे बड़े में सब को बिठा कर कर प्रसाद खिलाया जाए। पापाजी कहते तिरुपति यात्री को भोजन खिलाते हैं। हमें भी वृंदावन बॉम्बे, बड़े मंत्र में गर्म गर्म प्रशाद खिलाना चाहिए। जब देश के घर में वास मुनि पहुँचे, देश ने क्या दिया प्रशाद खाइए। दरवास ने कहा ठीक है, हमें दोपहर का स्नान करने 2 फिर लौट कर खाते हैं। दवा मुनि और उनके भाई गए स्नान करने के लिए प्रसाद याद करो दवा समने। अभी आप जानते हो वो बड़ी सरलता से क्रोधित होते है, प्रशन होते है। रोती ने कहा, आप से मै कुछ तैयार नहीं कर सकती। अब मैंने का प्रसाद खा लिया है। अब तो दरबार से मनी को कल तक राह देखना पड़ेगा। और वो उन्हें ये पसंद नहीं आएगा। तो द्रोपदी घबरा गए। अब यह हमें श्राप दे दें। तो भगत जो है सुख और दुख में 1 ही व्यक्ति की उपासना करता है किसकी भगवान ने देखा पी चिंता में है। रोपरी ने, मन ने भगवान से प्रार्थना की, पूछा ओ, तो भगवान आ गये। रेस ोपुरीनेगानरोबरी मुझे कुछ खाने के लिए दीजयेगा भूख लग रही है, रोपरी कुछ है ही नहीं, कल मिलेगा आज तक कुछ ही नहीं। घर में तो मैंने प्रसाद खा लिया है। भगवान ने कहा नहीं, मुझे देखने 2 तो भगवान बड़े ध्यान से ढूँढ रहे थे, कुछ खाने के लिए ढूंढ रहे थे। तो उन्होने देखा 1 बर्तन के नीचे 1 चावल का दाना, सब्जी के दाने में सब्जी के टुकड़े से थका हुआ था। भगवान ने कहा रोबरी तुम रहे हो, कुछ नहीं खाने के लिए देखो यह चावल का दाना, अब भगवान नहीं खाने। जैसे ही भगवान ने खाया, पृथ्वी पर जितने ब्राह्मण थे सबको। ऐसा लगा हमारा पैर बहुत भर गया है। वो पेड़ जो भर जाता तो क्या होता है, अचकी होती है। सारे ब्राहमण जो थे सबको अचकी होने लगी और दुर्वासा मुनि को भी को सायं ब्राहमण आश्चर्य हो गए। दुर्वासा मुनि हुशियार थे, उन्हें अभ्यास हो गया था। अमृत के साथ। अमृत मराज ने 1 समय दुर्वासा मुनि को निमंत्रण दिया था प्रचार के लिए। दुर्वासा ने कहा मैं आता हूँ। कृपा का स्नान करके। वर्ध तोड़ने का समय आ गया था। और दरवाजा नहीं लौटे। अमीशा चिंता में क्या किया जाए। ब्राहमणों की सलाह ली। ब्राहमणों ने कहा जल्द पी लो, जल्द पीना। 1 रूप से वर्त से टूटता है, वन नहीं भी टूटता। तो उन्होंने ब्राहणों की सलाह लेकर जल पिया। मोनी के पास खास योगिक शक्तियां थी। समझ गए कि अमरीश ने जल पी लिया है। उनकी राह देखे बिना तो उन्होंने सोचा अमरीश को सबक सिखाया जाए अपने सीखे से बड़ा भयंकर राक्षस पैदा कर दिए। अमरीश घबराई ने। जिस प्रकार आप जद भारत की कथा में देखते हो, जब डाकू तैयार हो गए थे, उनका वध करने। जब भी जद भारत घबराए बिना भगवान का चिंतन करते गए। अमर सभी मना कृष्ण पधारे हो, ये तुमरा प्रसिद स्लोक है। भाना चिंतन करते रहे। भाने क्या किया सदन द्वारा का जाम। भाग दरवाजा सुदेश पीछा कर रहा था। अंत में भगवान के पास गए। भगवान ने कहा मैं भी कुछ माफ नहीं कर सकता। अमृत से माफी मांगो तो जरवासमुनिकाभ्यास था। जब उन्होंने देखा 1 दम थोड़ी देर पहले 1 को भूख लग रही थी और अब ऐसा लगता है कि हमने ज्यादा खा लिया हो। भगवान की लीला है यहाँ का आपने साथियों चलो यहाँ से भागो तो भगवान ने भी सन से कहा जाओ बोलो दरवाजा को आओ प्रसाद खाने प्रशातआरहे तो दरवाजा को बुलाने भीम सेन सब गए। दरवाजा बनी प्रसाद तुम्हार कई संत बैठे थे। अरे वो वो तो सब भाग गए ने थोड़ी देर। पहले तो भगवान ने क्या किया, न भाइयों की रक्षा की। तो ये जो अक्षय पत्र है यह प्राप्त हुआ था सूर्य के देवता के द्वारा। आज के दिन तो आज के दिन ये अक्षय पत्र भी प्राप्त हुआ। आज के दिन कई घटनाएं बीती है। तो और क्या आज के दिन सुदामा ब्राह्मण जो है वो कथा जानते हो उनकी चर्चा करेंगे। बाद में सुदामा ब्राह्मण गए थे द्वारका में भगवान को मिले, भगवान को मिले कौन से दिन 5 मिनट ये भी बड़ी सुन्दर करता है। सुदामा ब्राह्मण भगवान के बचपन के मित्र थे। ब्राह्मण जो है हर सदी में संतुष्ट रहता है। वैसे तो हम सुधारण सिद्ध समाज में 12 को दोष देते रहते है। तुमने यह किया। तुम्हारे कार कष्ट जा ब्राह्मण खुद स्वीकार करता है मेरे पापों का परिणाम है किसी को दोष नहीं दे रहा। सुदामा ब्राह्मण हर स्थिति में बिल्कुल संतोष था और भौतिक दर्जी से बहुत गरीब था रहने के लिए 1 छोटा मकान, छोटा कमरा और पहनने के लिए 1 फटी हुई धोती बाज आप रामना के बाद कितनी धोती हैं, कितनी है सुधार 1 ही फटी धोती थी उन की पत्नी 1 पुरानी। सारी बात तो पत्नी को पता था कि मेरे पति का 1 बड़ा धनी दोस्त है। पत्नी बार बार कहती थी के धनी मित्र को क्यों न मिले तो सुदामा त्यार थे, मिलने को कोई सुदामा त्यार थे। इस दृष्टि से मेरे बचपन के मित्र को मिलूंगा और जानते थे। ये बड़े खास लगती है। पत्नी का अलग भाव था। पत्नी का यह भाव था शायद पति अपने धनी मित्र को मिलेगा तो धनी मित्र कुछ आर्थिक सहयोग दे देगा, कोई ठेका दे देगा, कोई सुविधा दे देगा। सुन का यह भाव था। सुदामा ठीक है, आप कहते तो मैं जाता हूँ मिलने के और घर में कुछ है देने के लिए खाली। यहाँ जाना तो अच्छा नहीं, दिखता नहीं ये लगभग हर समाज धन न रिवाज है या मिलने जाओ। किसी संत को कुछ साथ ले जाओ, कोई भी आता है, कोई फूल या कुछ लेके आता है। सो पत्नी ने देखा घर में कुछ नही था। इतने गरीब है तो पड़ोस के मकानों से पड़ोसियों से थोड़ा 4 मुठी पावा चूड़ा ने इकट्ठा कर के 1 कपड़े में बांध कर दे दिया तो सुदामा जी गए, पहुंच गए द्वारका इतनी लंबी यात्रा की द्वारका पहुंचकर उस महल में पहुँचे जहाँ कि भगवान से रुकी के साथ भगवान के हजारों महल थे द्वारजा में और हर महल सजवा था गेना के साथ हरे मोतियों सा 1 से मिलना बनी गए थे में भगवान अपनी अद्भुत लीला कैसे पकड़ करते हैं, इतनी पत्तियां हैं, अपना विस्तार करते हैं। उन्होंने देखा कि हर महल में भगवान से अलग लीला के साथ तो भगवान सुदामा पहुंच गये है। भगवान के महल में भगवान दूर में बैठे थे, मिस सुमिन के साथ। उन्होंने दूर से देखा वह मेरा बचपन में मित्र आ रहा है। तुरंत ही वहां से उठ कर गए बचपन के मित्र को मिलने बचपन के मित्र को गले लगाया, चरण धोए, चरण धोए भगवान ने कोल तो मैंने ये बताया ब्रामण का आदर कैसे किया जाता। और दोनों ने बचपन की लीलाओं का स्मरण किया। दोनों के गुरु थे, हनी बनी मुनि। इस प्रकार उनके गुरु ने उन्हें कठिन सेवाएं भी दी थीं और बचपन की लीला का की चर्चा कर रहे थे। और थोड़ी देर बाद छिदामादाजनिकाले कहाँ जाने के लिए घर लौटने के लिए रास्ते में सोच रहे थे। मैंने तो कुछ माँगा ही अभी मैं पत्नी को क्या कहूँगा मैं इतनी दूर से पत्नी ने बार बार कहा कुछ कहा कि जाओ मिलो और निकलने से पहले हवा ने पूछा सुदामा, जो कुछ ला मेरे लिए सुदामा बड़े रा था, उन्हें पता था यह चूरा क्या है। ये भगवान जो धनी है। उनके को बहुत छोटा तोहफा है। भगवान क्या कहते है पतरमपुसपमफलमप्रेम के साथ, भक्ति के साथ। अगर, तुम जल्द ही मुझे अर्पण करोगे। मैं स्वीकार कर लूंगा। भगवान किस चीज के भूखे हैं। केवल प्रेम के प्रेम भक्ति सिधाराम। छोटे से कापट्य कपड़े में चूरा पावर रखा था। वो हिचक खोल रहा था। भगवान ने खोल दिया और भगवान ने 1 दाना खाया। भगवान संतुष्ट हो गए। किसके साथ थोड़े ही पोरे के साथ उजले संतुष्ट हो गए। भगवान को ना कठिन नहीं है। केवल प्रेम और भक्ति की आवश्यकता है सुशिदालामरामणचले घर की ओर। और आज यही सोचते हैं। मैं तो इसी धुन से मैंने कुछ मांगा भी नहीं। मेरे मित्र से। अब मैं पत्नी को क्या कहूंगा। यही भाव था। गीता में। क्या है? 4 वन से 4 हिंदी स्थानीय माता या पान में हरी के हिंद में जवान हूँ स्मरण अपान दोनों की योग्यता फिर से आती है, जिनमें योग्यता है। भगवान का स्मरण करने की कोई योग्यता आती है भगवान से, जो भगवान को भूलना चाहे, वो सुविधा भी आती है इसे। आज के वात में, जो भगवान को भूलना चाहते हैं, बहुत ही साल हो गया है। आपके स्मार्टफोन्स में है। अब हर चीज का दर्शन दे। सके तो छूट है। बबा ने हमें छोड़ दिया। सो सुनाम राम ने तो कुछ नहीं मांगा। भगवान समझ गए थे। क्या? उनकी इच्छा सुदाम रामन जा घर पहुंचे। उन्होंने क्या देखा, क्या देखा, उनका टूटा हुआ घर आपका, गड़ी का घर उसके बोस के सामने महल था। उनका गायब हो, उनका टूटा हुआ घर 1 कमरे का महल बन गया है। महल में अनेक सेवक हैं, मन सजा हुआ है। उनकी पत्नी कटोरे कपड़ो की जगह अच्छी साड़ी से सजी हुई है। वे समझ गए कि ये घटना कैसे, किसकी कृपा से, ये घटना बीती है। उनके मिल्स की कृपा से तो आज के दिन सुदामा ब्राहमन मिले थे किसे अपने मित्र को द्वार में आज के दिन आज के अनेक ली लाइन बीती है। आगे आज के दिन बाकी बिहारी मंदर है, िनदान भगवान के चरणों का दर्शन देता है। और आज के दिन प्रहुपाजी ने लीग और डिवोटीज की स्थापना की थी। आज के दिन पहले विदेश जाने से पहले पापा जी ने अत्यंत प्रयास किया था। कृष्ण भक्ति की स्थापना के लिए प्रवर के गरुमणआजनेउन्नीसौ 21 में आदेश दिया था। ले जाओ महाप्रभु के संदेश को पश्चिम देशों में तो नाइंटीन फिफ्टी वन में प्रौपर्जी ने वनप्रस्थ स्वीकार क नया स्वीकार किया और उसके पश्चात प्रयास किया। संस्था की स्थापना के लिए आपकी दिली छिबीवड़ामेंचाबा ने काफी समय काटा और झांसी में उन्होंने 12 कमरे किराये पर ले लिए थे और वहां प्रॉपाजीनेए 1 संस्था के रजिस्ट्रेशन की लीग ऑफ डिवोटीज लीग डिवोटिज का उद्देश्य यही था, जो इस्कॉन का है और आज के दिन अक्षय के दिन अपनी जान सी में लीगल डिबोडीकी स्थापना की थी। प्राबाजी को विश्वास था कि उनका लक्ष्य अंत में प्राप्त होगा। हालांकि, प्राबाजी को कई समस्यों का सामना करना पड़ा। रहने का स्थान नहीं था, रहने के लिए धन नहीं था, और ग्रंथों के प्रकाशन काशंकलेधानी था। जब भी वो प्रयास करते गये, उन्होंने विश्वास था क्योंकि गुरु की कृपा से सफलता प्रावसी और आज के होंने लीग डिबोडीजकी स्थापना की जान। सी में लिगऔडिबोडीके शाद रावल जी अमेरिका गए थे अमेरिका में, 1 दिन निक में बैठे थे, 1 बेंच में सो अमेरिका में तो कोई भेदभाव नहीं होता। 1 अमेरिकन आगा के साथ बैठने के लिए अमेरिका ने प्रॉपर से पूछा आप क्या करते हो? अंग्रेजी में क्या क्या आपका धंधा है? बाबा ने कहा मेरा धंधा है, भगवान का प्रचार करना मेरे मंदर है, पर दिखे नहीं हैं, मेरे ग्रंथ है, दिखने नहीं है। और सब के साथ दिखेंगे ग्रंथ भी पकड़ हो जाएंगे। उनको पूरा विश्वास था 1 दिन अनेक मंदिर खोलेंगे, 11 दिन अनेक ग्रंथ प्रकाशित होंगे, उनका विश्वास है लीग डिवोटीज की स्थापना हुई थी। कहा आज के दिन कहा जानती हैं जो आज के दिन कई घटनाएं हुई हैं और आज के दिन madunapuriने क्या आराम किया था। चंदन याद चंदन यादव का उत्सव वैश् भग्ज है, हर जगह मनाते हैं। इसका इतिहास क्या है, वानpuरीबहूतही ऊँची कोटी भगत है वो उसका कल्पना करना कठिन है। दिन रात भगवान का स्मरण करते रहते थे। कभी किसी से कुछ मांगते नहीं आप भक्त में वही कोने कभी नहीं मानते। किसी ने खाना दिया, खाना गोद खाते थे, नहीं तो भूखा रहते थे आप लोग कभी कोई भाव है न। अच्छा मान पूरी गोरधन लगभग रोज करते थे दिन उन्होंने गोरधान प्रेग्राम किया, गोड़धानकापरिग्राम करके विश्राम कर रहे थे कहा गोविंद खुन गोविंद कुंद बड़ा ऐतिहासिक स्थान है। इंद्र ने भगवान का मजे किया तो गोविंद कुन में विश्राम कर रहे थे। गोविंद कुन की परिक्रम करो स्थान पर आते है। जाम पांडा कहते हैं यहाँ वदपुरी तो 1 बहुत ही खुबसूरत ग्वाला 1 मटके में दूध लेकर वहाँ पहुँचा और उस ग्वाले ने कहा, मुझे लगता है तुम भूखे हो, थके हो। ये दूध पियो मैं लौटता हूँ मडका लेने के लिए। मान पुरी ने पूछा, आपको कैसे पता कि ना भूगाहँतोमेरे गाँव की ओर से जारी थी पानी लेने कुएं से और तुम्हारे चेहरे को देखकर समझ गए। क्या भूखे हो मेरे गाँव में किसी को भूखा देने की का अधिकार नहीं है। दूध पीजिये में लौटता हूँ मानपुर ने दूध पी लिया, रा देखे थे कब लौटेगा 1 फुल बालक मडका लेने के लिए और वो थोड़ी देर के लिए वाला नहीं लौटा और मानद पुरी को हल्की सी नींद आ गई। नींद में अमानपुर ने उसी बालक का दर्शन दिया जिस बालक ने उन्हें दूध बुझाया था। जब दूध बुझाया था, मानो पूरी उनकी खुबसूरती को देकर उनके मधुर कंठ को सुनकर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने सोचा मैंने तो कभी इतना खूबसूरत बालक नहीं देखा बादल पूरे हलकी सी नींद आ गयी, जिसमें वो ही पालक जिससे उनमें दूध दिया था। वहां प्रकट हुए और बालक ने कहा, फल पूरी, मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत ही खुश हूँ और मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी सेवा करो। मुझे मुसलमान के हतिथार से बचाने के लिए खुजाया ने मुझे दबा दिया था। इस स्थान पर वहाँ मुझे बहुत गर्मी लग रही है। तुम जाकर खोदो, मुझे वहाँ से निकालो और मेरी स्थापना करो। उस समय इतिहास में मुसलमानों का शासन था और खास कर के जो प्रसिद्ध हिंदू मंडल थे, शिक्षक को या उखाड़ दिया, या पुजारियों ने, मूर्तियों को छिपा कर भाग गए। यहाँ वो मूर्तियों को उठाकर जयपुर ले गए। इसलिए अगर आप जयपुर जाओ तो अनेक प्राचीन मंदिर है। और जयपुर का कौन नाम है? गुप्त वृंदावन छुपा वृंदावन। वह पूरी ने अगले दिन गाँव वालों को उठाया और सपने की चर्चा के सबने निर्णय कर लिया। चलो हमें खोदकर देखना चाहिए। क्या है ये सच है ये झूठ जब खोला तो देखा उसी स्थान पर, वो ही उसी स्थान पर वही मूर्ति प्राप्त हुई। और इससे पहले जब मानव जनवरी को पता लगा कि वो बालक जिसने उन्हें दूध दिया था, वही बालक था, जिसने सपने में आदेश दिया, मदन पुरी बड़े शर्मिंदा हो गए। शर्मिंदा किस दृष्टि से उन्होंने भगवान से सेवा ले ली। जब उन्हें पता था कि वो बालक जिसे ने मटके में लाकर दूध दिया था, वो ही बालक भगवान हैं। तो वो आश्चर्य हो गए। 1 रूप से प्रसन्न, 1 रूप से दुखी प्रशन, इस दृष्टि से हम भगवान का दर्शन प्राप्त किया। अगर आपको पता लगा किसको मिले हो तो भगवान है तो प्रशन नही होते, पर दुख भगवान से सेवा ले ली। उत्तम कोटि का भक्त है, भगवान का अपना ऑर्डर सप्लाई नहीं बनाता, ये चाहिए वो केवल भक्ति की भुख मांगता है, भक्ति की भीख मांगता है। तो पुरी शर्मिंदा हो गए। मैंने भगवान से वाली खोजने पर खा, उसी स्थान पर मूर्ति है। वो मूर्ति इतनी भारी थी कि 1 आदमी से उठाई नहीं गई। कई भक्त जुड़े साब ने जुड़कर मूर्ती को बाहर निकाला, माँ ने कहा कर अभिषेक किया पानी से और सबने निर्णय किया कि हमें यहाँ 1 मंदिर बनाना चाहिए भगवान के लिए। फिर सबने, ये मंदिर की तैयारी तो 2 दिनों में, 2 दिनों में तैयारी हो गई। और सारे ब्रजवासी जुड़ गए। इस सेवा में। प्राचीन समय में यह भाव होता था कि जो पृथ्वी है, गाय है, सम्बधि है, इन सबके असलिकस्वामी कौन है? परम भगवान? यदि प्रापा जी ने जब पेरिस में राधा कृष्ण की स्थापना की, मंदर में प्रापा ने पदान को क्या नाम दिया श्री श्री पर ईश्वर पर मंदर के असली मालिक पापाजी लंदन में की, बाबा जी ने क्या नाम दिया श्री श्री लंदन लंदन के शादी पूरे दिल्ली के स्वामी पर अभी कई और मूर्तियां भी प्रकट हो गई हैं, तो भक्तों के सहयोग से अभिषेक का प्रबंध हुआ। 2 दिन में सब ने तैयारी कर ली है। 1 बड़ा पत्थर लेकर ऑर्डर बनाया और भगवान की गरामीशेिासाजकिया, भगवान को पंचे गमियां के साथ अभिषेक किया और 900 लोटों में पानी लाये, भगवान का अभिषेक कर, नही और पूरे उत्साह से सुपराजा भोजन बनाया और बृजवासी जुड़े सेवा में और 2 दिन के अंदर भगवान की स्थापना कर। और पुजारी कितने थे? 1 ही पुजारी आनंदपुरी भानपुरी अकेले पुजारी थे, उनका उदाहरण हमें हमारे पुजारी हम को देना चाहिए। मानपुरी सारा दिन अकेला सेवा करते थे। भोग बनाना, भगवान का अभिषेक करना, अभिषेक के बाद भूख बनाना, 7 आरतियों को दिन में करना और रात को भगवान को सुलाना। आप जब पर्दे बंद करते हो 9 बजे तो भगवान को सुलाया जाता है नसों के उच्चारण से आप जब भगवान को जगाते, मंगल से पहले मंत्र के साथ भगवान को जगाया जाता है। और पूरी भगवान को सुलाने के बाद क्या करते थे, थोड़ा सा दूध पी को, भगवान को दूध पिला दे, वो दूध पीते रे पास, ये थी भगवान की कुरार आनद पुरी की खुला। 6 दिन कुछ नहीं खाना और रात को थोड़ा दूध पीना। सोने से पहले। इस प्रकार 23 साल के लिए गोपाल का विग्रह की पूजा हो गई। 1 हत्या ने मंदिर भी बना लिया था। 2 साल बाद भगवान ने महानंदपुर को शब्द में 1 और आदेश दिया। भगवान ने कहा महान पुरि मंजमर सेवा से बहुत ही प्रसन्न हो। पर मुझे अभी भी गर्मी लग रही है। मैं चाहता हूँ तो मेरे लिए चंदन लेकर आओ। जगतपुरी से चंदन जो है केवल गर्मी में लगाया जाता है, सर्दी में नहीं। आपने देखा होगा गर्मी के मौसम में पापाजी को चन्दन लगाते हैं, ठाकुर जी को लगाते हैं और सर्दी में बंद कर देते हैं। तो चंदन लेकर पुरी को भगवान ने देखा जा। बहुत कठिन आदेश दिया, धनपुरी थे कहा गोरधान पहुंचना था कहाँ? जगनललपुरवदपुरी ने ये नहीं कहा। वो एंड टिकट में लगी नही हा, गाडी गाडी की टिकट मिलेगी ही उन्हें ये नही कहा पलक मुझे उठाकर, कोई ले जाएगा नहीं। उन्होंने एज आदेश को स्वीकार कर लिया। और क्या आदेश है 2000 मील की यात्रा करो, इतनी लम्बी यात्रा। तो भगवान भक्तों को कई बार थोड़ी कठिन परीक्षा देते हैं। और भगवान देखते है जो भक्त हैं कितना दिर्द है आजकल वो क्या भाव है। इंग्लिश में कहते है कम्फर्ट जोन हम करेंगे सेवा पर हमें सुविधा भी चाहिए। साथ में सुविधा दोगे तो सेवा करेंगे और सुविधा नहीं दोगे तो पैर के सेवा असंभव है। और भगवा और मान। पुरी ने वैसे तो नहीं किया। मामा ने कहा रे चन्दन लाके। 2 जगनपुरी से वो एकदम तैयार हो गये, मे कुछ पूछा नहीं और उन दिनों में जो चुंगियां थीं वहाँ हर जीत चुंगी में मुसलमान अधिकारी था। तो जाना और आना दोनों ही बहुत कठिन था। तो भाजपुरी के कहने पर भानपुरी ने क उसी समय जो बंगाली पुजारी आये थे उनको शिक्षा दी, रक्षा दिया और उनको ठाकुरजी की देखभाल की जारी सोपकर वो चले गए तो मालपुरी से भगवान परीक्षा ले रहे थे, परीक्षा कैसी थी 1 बड़ा कठिन कार्य दिया तो हमें भी सेवा के मामले में जुड़ना चाहिए। बड़े दर्द होता और हमारी भी परीक्षा ली जाती है। कई बार भगवान कठिन स्थितियों में डालते हैं। जैसे 1 रूप से देखा जाए। आज की स्थिति भी काफी कठिन है। भगवान की कृपा से रहने के लिए, खाने के लिए तो अच्छा स्थान है, पर प्रचार की दृष्टि से अनेक समस्याएं है। पर हमें हिम्मत ही आना चाहिए। हमारे मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें उत्साहित होकर सेवा करनी है। युपकउुसहमें क्या कहते हैं उत्साहन ने से हरिया संसद पर वर्तन संगति। आगे सतोड़ेतेसभीवी तो हमें जब चैलेंजिंग साइनमेंट दिया जाए तो कठिन है हमें सोचना है किसी और को को नहीं भेज देते हमें क्यों भेजे किसी और को। तो ये कठिन सेवा, अगर, कठिन सेवा मिले। यह भगवान की कृपा है। वा पूरी चले रमन की ओर जा रहे थे, जगन रास्ते में ये ऐतिहासिक मंदर था। कौन सा मंदिर है गोपीनाथ का, कहा जाता है। ये बड़ा प्राचीन मंदिर है। और यहाँ की जो मूर्तियां है, भगवान ने खुद बनाई थी अपने हाथों से, भवन राम ने। तो ये जो मंदिर है शुरूसे, किसके लिए? जो ठाकुर जी की राज, वो बहुत ऊंचे सन। जैसे साधारण स्थिति में किसी में ज्यादा योग्यता हो, हम उनसे सीखते हैं, उसी प्रकार अन्य क्षेत्र में हम 1 दूसरे से सीखते हैं। कोई नया आदमी जुड़ता है डिस्ट्रीब्यूशन में, आप क्या कहते हो? तो मान पूरी के मन में भाव था कि अगर मुझे किसी प्रकार से यहा ये तेज करने का मौका मिल जाए, जो खीर बनती है तो मैं अपने ठाकुर जी के ले से बना सकू। ये था उनका भाव। तो उन्होने लोगों से पूछा आप लोग क्या बनाते हो, क्या भोग लगाते हो? और उस मंदिर में जो भोग लगाया जाता था उनको क्या कहते थे। अमृत अकेले अमृत में बन गया था। तो ये था मानद पुरी का भाव और यह पता लगा भूख लग रहा था भोग मानद पूरी की इच्छा हुई में भोग चखने को मिले नियम, ये है जो भोग तैयार कर रहे हो। आपके मन में यह भाव होना चाहिए। ये भोग में भगवान के लिए बना रहा हूँ। जो भोग लग जाए फिर हमें करना चाहिए। यह नहीं हमारे चस्के बन रहा है। और बनते ही हम तुलसी पता दा लेंगे और खा लेंगे। सुने ऐसा भाव नहीं होना। मन में भाव भोग बन रहा है। भगवान को लगेगा भगवान खायेंगे। फिर पंद्रह मिनट बाद पूरी, शर्मिंदा, हु वो छोड़कर चले गए बाजार में अनाम करने जो उस मन में पुजारी है, उसे रात को सपना आया और भगवान ने कहा मैंने 1 खीर का प्यारा, अब मेरे भाग के लिए चुरा कर छुपाया है। रोज शाम को बाला खील के प्यारे भगवान को चरा जा। दे तुझे पुजारी को यह सपना आया। मैंने कहा यह कैसे संभव है। भगवान ने 1 ही का प्याला चुरा कर छुपा दिया, एन पॉसिबल गए, उन्होंने यह सच है। और फिर आदेश के अनुसार जाने गए। हाँ के मदन पुरी से मिले वो कहा क्या भाग्य है तुम्हारा तुम्हारी प्रशंसा के लिए। भगवान ने ये खीर अपाला छुड़ाया था। महानद पूरी बड़े खुश हुए कि ये थी उनकी इच्छा नाचने लगे, छोटे छोटे टुकडो में तोड़ दिया, डोना हो सकते थे। मानपुर के मन में 1 भय पैदा हो गया। आना पुरी ने कहा अब तो सब को पता लग गया है की भगवान ने मेरी खुशी के लिए 1 कर चुराया था। अब लोग मेरी प्रशंसा करेंगे, मेरा गुणगान करेंगे, मुझे आदर देंगे मेरी खुशामद करेंगे मुझे आदर है। और इतना नाम मिलेगा। गाए तो खतरनाक स्थिति है। हम ऐसे नाम के लिए तरजतेहैंसवलेनही नहीं। हम तो तरजते हैं, हमारा नाम लेना चाहिए, हमारा गुणगान होना चाहिए, हमें प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए की हमारे जा कोई भक्त नहीं है। और सब को हमारे हमें आदर देना चाहिए। जब लैमपायपहलेमुझे आना चाहिए मेरे दूसरों को, तो हम अपने मन में सोचते रहते हैं। इतना आदर नहीं मिला। ये कम और मिलना चाहिए। शियोगी संगत हम त्याग देंगे। धन की इच्छा त्याग देंगे। मान प्रतिष्टा। ये बड़ा कठिन है। इसको त्यागना असली त्याग है। हमें किसी का आदर नही चाहिए, प्रतिष्ठा नहीं। चाहे। माल पूरी क्या घबराए, वो घबरा गए। अब मुझे इतना आदर मिलेगा लोग मेरी प्रशंसा करेंगे। लोग गये, मैं भक्त हूँ मेरे लिए। भगवान ने ये सब चुराया माल पुरी डर गए। ये तो बहुत ज्यादा होगा। मुझे से भागना चाहिए, लेमिना छोड़कर भाग गए। इस लिए नहीं भागे कि कोई और कारण वो प्रतिष्ठा नहीं चाहते थे, वो अपना गुनगान चाहते थे। हमारे बसों और संतों ने कई बार कहा हमारा नाम ही मत लो। न लोगे तो तुम्हारे सारे गोल समाप्त हो जाएंगे, नाम न लो। हम जब भक्ति में जुड़ते हैं, हम 4 नियमों के विषय में सुनते हैं, 10 नाम अपराधो के विषय में सुनते हैं। हमें यह भी विचार करना चाहे। हमें सचमुच चुना चुना का भाव अनुकूल करना है। जब तक हम इस भाव को अनुकूल नहीं करें, हमारे मन में यही रहेगा। विचार हम इतने अच्छे भक्त हैं। अच्छे उत्तम कोटी के। वक्त हमें इतना आदर मिलना चाहिए, हमें इज्जत मिलनी चाहिए। कई बार लोग दान देते हैं और हम उनका इतनी गहराई से बाहर नहीं कर पाते, वो खुश हो जाते हैं। इतना दान दिया। जरूरी हवा भानी पकड़कर। हमें कहना पड़ता है। प्रयास तो खासकर के जो भक्त हैं, जो जिकिर भक्त हैं, उनको यह समझना चाहिए। ये प्राण प्रतिष्ठा आदर, ये सब झेल हैं हमारे लिए। जितना ये मान की इच्छा रखोगे, उतना ही भक्ती में हंसते आगे बढ़ोगे और रामचंद्र पूरी हा चंद्रपुरी का भाव देखो। उनको डर था कि सब मेरेको आने देंगे, सब प्रशंसा करेंगे, सब मेरा गुणगान करेंगे। अगर चलो वहां से भाग ने लो तो हमें भी ये भाव हृदय में बिठाना है। इसलिए लगभग हर लेक्चर में, हर श्लोक के साथ प्रेम है। आप ना पिसुसनीछेनापडते हो क्यों? क्यों ये इतना महत्वपूर्ण है। और इतना कठिन भी है। 1 रूप से हम सब बाहर से हम नमस्कार कर देंगे। हृदय में हम आदर चाहते हैं। वो ये भाव को निकालना है। और हमारे अनेक संत हैं जिन्होंने अपने उदाहरण से दिखाया कैसे निकालना चाहिए। मानद पुरी में पहुँच गये जगनातपुरी और जगनाथपुर पहुँचे। राजा से कहा कि किस पर गोपाल प्रकट हुए थे। और राजा ने चंदन टू पाउंड और 8 हाउस कैम पर 1 सेवा का प्रबंध किया है। साथ में पत्र भी दे दिया। ये जो चंदन है, ये हमने दान में दिया है। आज भी हम विदेशी भक्त भार से जाते हैं, कुछ खरीदकर पत्र लेते हैं। मंदिर से यह दान मिला तो वो मेरा आदर पुरी। चले कहाँ है। गोरदान वापस लौटने के लिए। रास्ते में फिर से उतरे रुके कहा रेमुना में। और 1 रात रुके थे। और उस रात को माने सपने में कर दे दिया। भगवान लगा मेरे में और गोपीनाथ में कोई अंतर नहीं। और ये जो चंदन तुम लाये हो मेरे शरीर को ठंडा करने के लिए। यही चंदन लगाओ किस के विग्राम हैं, गोपीनाथ के विग्राम है और इसमें में कोई अंतर नहीं है। हमें यह नहीं देखना चाहे। हमारी मूर्तियां अच्छी हैं, बाकी मदों की मूर्तियां सब बेकार की हैं। भगवान अपने आप को आर्चर विग्राह के रूप में प्रकट करते हैं। और इस आशय विग्राह को भगवान के समान मानना चाहिए। तो मान कोई ने सुबह पुजारियों को उठाकर कहा। भगवान ने सपने में क्या कहा? यही चंदन क्या करें? यही चंदन का या गोपीनाथ के विगरा में लगाए। तो जब यह सूचना पुजारियों को दी गई, बड़े खुश हो गई। और मादरपुर ने खुद अपने हाथों से 2 पुजारियों को सिखाया कि चंदन कैसे लगाया जाता है? भगवान के विगरानके और 3 हफ्ते के लिए रोज। ये चंदन यात का उत्सव हमारे भाशराममंदनोंमें किया जाता है। 3 हफ्ते के लिए। तो ये चं्दन्यातका उत्सव शुरू हुआ था आनंदपुरी के द्वारा। आंनदपुरी बोली ऊंची पुरी बरसे। अदवेतचायनेभी उनसे दीक्षा ली थी। तो मालन पुरी। भगवान ने 3 बार सपने में आदेश दिया कि नहीं तो आप कहोगे हमे भी सपने में आदेश मिलना चाहिए। हम उसका पालन करें और क्या करना चाहे? पापा ने कहा, तुम शुद्ध भग बन जाओगे। जब आदेश सब्तिंगआदेशका पालन कर लो, नहीं तो रोमानि प्रतिनिधि द्वारा संदेश में उसका पालन करो। तो ये इस घटना से हम ये भी देखते हैं कि मानपुर ने बिना हिचके अपने गुरु, अपने भगवान के आदेश का पालन किया, जो उन्होंने कहा, जाओ जाओ और वो तुरंत तैयार हो गए। तो हमें भी उसी प्रकार का भाव रखना चाहिए। कभी भी सेवा के दौरान सुविधा होती है, कभी कभी नहीं होती। पर हमें हर स्थिति में तैयार रहना चाहिए सेवा करने के लिए। अगर हम इस निष्काम भाव से कार्य करें। बिना शंकर के भगवान के धाम लौट सकोगे। और जब भगवान ने परीक्षा तो ले ली। जब भगवान ने देखा, कमालपुरी ने सफलता से पास हो गए हैं, चंदन इकट्ठा कर लिया है। माँ ने कहा, बस और परीक्षा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उन्हें पता था कि मुसलमान चुंगी वाले थे। उन्होंने कहा, वह पास हो गए हैं और परीक्षा नहीं ले ली। तो उसी प्रकार हमारा भाव होना चाहिए। चाहे कठिन स्थिति भी हो, हम उस से तैयार करें और सदा नमन का भाव रखना चाहिए। और इस 1 और शुभ कार्य रथयात्रा जो जगतपुरी बनती है, जगन सु हर साल नया रात बनता। तो आज के दिन नया रात कब बनाना? शुरू करते हैं। आज के ये साल करे मालूम नहीं और अक्सर आज के दिन इन उसपर भी शुरू होता है। आज के दिन अनेक लीलाएं बीती हैं और हमें इनका स्मरण करना चाहिए और जितना स्मरण करेंगे। पदम, आया से, बचेंगे, श्रवन, कितना, विश्णस्पलपालत, सन और चंदन्याताका उत्सव। हर साल हर मंदिर में बनाया जाता है। वृंदावन में खास करके बड़े हस्सा से हर साल मनाया जाता है। सो अब सब इस सेवा में जुडी है चंदनिया क्या है अब चंदन की पेश बनाने में भी थोड़ी मेहनत करो। ये चंदन लगाने चंदन लगाने आ जाओ। चंदन को पैदा करने में भी मेहनत करो। यह प्रशाद खाने सब पहुँच जाते हैं जब उनको कहा जाता है सब्जी का 22 चूले में पास करा नहीं वो नहीं करेंगे हम आरती करने आ जायेंगे। रजापुर कहा जाता है आरती करना है तो किचन में सब बर्तन भी साफ करो और झाडू भी। 2 फिर हम भाग जाते हैं तो ये अधूरी सेवा है हमें पूरी सेवा करनी चाहिए और दुध सेवा भी करनी चाहिए फिर आप भक्ति मिल का आपको पूरा लाभ मिलता है जब हम आदि भक्ति करते हैं कोई जो हमें सुविधा लगती है तो उसका फिर पूरा लाभ नहीं मिलता तो मधुपुरी के उदाहरण लेकर हमें इस प्रकार का भाव अनुकूल करना चाहिए विनम्र के भाव से हम सेवा करे और बिना कुछ उम्मीद कि वो हमें किसी प्रकार आदर अपना आदर और आदर नहीं चाहिए हम केवल सेवा करना चाहते हैं यह भाव रहेगा मेरा भगवान के शरणागत हो सकोगे और भगवान के धाम लौट सकोगे हरे कृष्णा हरे कृष्ण हरे किशना क्रिष्णा हारे हारे हारे हारे हारे।
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