Srila Sanatana Goswami Disappearance Day | 30 Jul 2007 | New Delhi | Śrīla Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī

This Hindi devotional discourse commemorates the disappearance (tirabhava) day of Srila Sanatana Goswami, a principal disciple of Chaitanya Mahaprabhu. The speakers recount Sanatana Goswami’s early devotion to the Bhagavata, his refusal of a royal appointment offered by Nawab Husain Shah, and his eventual return to a life of bhakti and scriptural study. They narrate episodes of his imprisonment, miraculous release aided by gold coins, and his journey toward Vraja, where he encountered the beautiful Madan Mohan deity in the Chobey Brahmin family’s house. Inspired, he established a temple for Madan Mohan, using donations from a rescued merchant. The discourse highlights Sanatana Goswami’s extensive literary output—such as the Hari Bhakti Vilasa and other Vaishnava texts—his pilgrimages across Braja, his teachings on devotional practice, and his role as a spiritual guide. The speakers also describe his later years, his continued practice of Govardhan (go‑don) pilgrimage, and the spiritual instructions he received from Mahaprabhu, emphasizing the importance of deity worship, scriptural composition, and spreading bhakti. The narrative is interwoven with reverent reflections on his character, miracles, and lasting influence on Gaudiya Vaishnavism, concluding with a call to honor his legacy on this auspicious day.
Chapters
तो आज है सनातन गोस्वामी जी का तीर भाव दिवस to snatn goswami
वैसे
कहा जाता है गोस्वामि में सबसे बड़े थे और रूपा। गोस्वामी के बड़े भाई थे। उनके 2 भाई थे रूपा के स्वामी और अनुपम और अनुपमरूप सनातन।
उनका सारा दिन केवल 1 कार्य था
भागवत का ध्यान, कृष्ण लीला का वर्णन और जब वो छोटे थे, सनातन के स्वामी ने छोटे पन से ही भागवत का बड़े गहराई से अध्ययन आरम्भ कर दिया था।
और पूरा समाज उन्हें बहुत आदर देता था। तो उस में बंगाल के राजा थे नवाब हुसेन शा राजा उश्यारथाराजतिकार्यो में। उसकी इच्छा थी कि कोई ऐसे व्यक्ति को दी जाए जिमेदार शासन करने की जिसमें प्रजा की श्रद्धा हो।
तो पहले उन्होंने सूचना भेजी, रूप और सनातन इन 2 भाइयों को की। मैं चाहता हूँ कि तुम लगा मेरा शासन करो। उनका नाम था अमर देव और संतोष देव।
तो इन 2 भाइयों ने इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि हवाई राजधिकारी में कोई रूचि नहीं, हमारी रूचि है कृष्ण भजन में।
पर जा ने कहा नहीं, मेरा हक है कि तुम यह जिम्मेदारी उठाओ। फिर जबरदस्ती इन 2 भाइयों को जोड़ा गया सरकार की सेवा में।
1 समय रूप स्वामी और स्वामी दोनों भाइयों ने कई पत्र डाले थे चेतन
या महा प्रभु जी को, जिसमें वो
कह रहे थे कि हम जबरदस्ती नौकरी
कर ले हैं, पर हमारी इच्छा है
कि हम आपके साथ आकर यात्रा करें।
पर चेतन। महाप्रभुजी ने ने पत्र में कहा इस
समय मत छोड़ो महाप्रभु 1 समय थे वृंदावन की ओर से, और महा प्रभु थे। तो रास्ते में
चले गए बंगाल जहाँ की ये 2 भाई रहते थे। और फिर महा ने इन 2 भाइयों को अपना दर्शन दिया। और थोड़ी देर बाद रूप गोस्वामी ने नौकरी त्यागी और सनातन गोस्वामी वापस लौटे।
सो सनातन गोस्वामी
ने राजा को सूचना
भेजी कि मैं बीमार हूँ
और क्या कर रहे थे, वो ग्रामीणो के साथ बैठकर भागवत का अध्ययन कर रहे थे। तो नवाब हुसेन शा ने संदेश भेजा लौटो अपनी जिम्मेदारी का पालन करने के लिए।
स्नातक स्वामी ने की रुचि नहीं थी।
और राजा ने अपने डॉक्टर को भेजा ये देखने के लिए की क्या बीमारी है सनातन?
तो डॉक्टर साहब सीधा अंदर आ गए। जब अंदर आये तो उन्होंने क्या देखा सनातन को स्वामी पंडितों के साथ बैठ कर
क्या कर रहे हैं, भागवत का अध्ययन कर रहे हैं।
तो जब राजा को यह सूचना मिली की सनातन का स्वाद ठीक है और वो केवल शास्त्रों का अध्ययन कर रहे हैं पंडितों के साथ, तो उन्होंने कहा कि यहाँ तुम अपनी जिम्मेदारी में वापस
लौटा नहीं तो मैं तुम्हे जेल खाने भेज दूँगा। तुम सनातन को जेल में डाल दिया था
जो जेल के सिपाही होते हैं।
उनको कहा कि मुझे छोड़ 2
मैं मैं क्या जाना चाहता हूँ।
उसने कहा भाई आप तो इतने बड़े कहती हो, आपको छोडूंगा तो राजा मुझे जिंदा नहीं छोड़े। खैर उसी समय सनातन को स्वामी को पतला आ गया था कि भाई का की मैंने थोड़ी रकम, यहाँ छोड़ी है। 10 हजार सोने के सिक्के। तो फिर उन सोने को सिक्कों को लेकर और उनके द्वारा सनातन निकाले जेल से। फिर सनातन गोस्वामी जा रहे थे बनारस की ओर, रास्ते में रुके उनके रिश्तेदार श्रीकांत के घर में। श्रीकांत धनी व्यक्ति था, जिसके पास 300 3000 सोने के सिक्के थे, आया था मुसलमान राजा के घोड़ों को खरीदने के लिए।
उसने जब सनातन को देखा, दाढ़ी भराई
हुई और वो जा रहे हैं फटे कपड़ों के साथ।
उन्होंने ने निमंत्रण दिया व रहने के
लिए, पर सनातन की कोई रुचि नहीं थी। फिर सनातन महाप्रभु जी को मिले सी में।
तो सनातन गोस्वामी ने महाप्रभु जी से
बड़ी गहरी शिक्षा प्राप्त की और चेत ने।
महाप्रभु ने 4 मूल सेवाएँ दी थी, पहली सेवा दी थी यह कि आप राज्य में जाकर उन स्थानों की स्थापना
करो जहाँ की जहाँ की भगवान कृष्ण ने अपनी देवी लीला प्रकट की।
फिर महाप्रभु जी ने उन्हें आदेश दिया कि भगवान के अर्चा विग्रह की स्थापना करो। फिर आगे उन्होंने कहा की हाँ भक्ति
के नियमों के ऊपर ग्रंथ की रचना करने के लिए। आगे उन्होंने कहा कि भक्ति सम्बंधित भक्ति संबंधित शिक्षा का प्रचार करो।
तो सनातन गोस्वामी ने हमें अनेक प्रसिद्ध ग्रंथ दिए हैं।
हरि भक्ति विलास जिनका वर्णन बार बार सुनते हो और अनेक और ग्रंथों की
रचना उन्होंने की है। तो सनातन गोस्वामी
वृंदावन में जाकर बड़ा सादा जीवन बिता रहे थे मधुकरी करके।
तो सनातन गोस्वामी जब वृंदावन में और
मथुरा में मधुकरी करते थे तो इसके
दौरान 1 चोबी नाम के खानदान के
घर में हो गए, जिनके पास 1 बहुत ही सुंदर विग्रह था, जिनका नाम था मदन मोहन।
फिर चौबे खानदान ब्राहमणों का खानदान था। सनातन गोस्वामी ने जैसे उस विग्रह का दर्शन लिया, इतने आकर्षित हो गए।
कौन की इच्छा यही थी कि दिन रात इस विग्रह का स्मरन करते रहे। पर विग्राह तो उनका नहीं था, चौबे खानदान का था।
और चौबे खानदान की जो पत्नी थी उनका 1 पुत्र था जिसका नाम था
सनातन, तो वो अपने पुत्र को
और
मदन मोहन विग्रह को 1 समान दोनों की सेवा करती थी।
और सनातन इतने प्रभावित हो गए थे, आकर्षित हो गए थे इस विग्रह की खुबसूरती से। क्यूंकी इच्छा यही थी कि किसी प्रकार से उन्हें प्राप्त हो जाए।
तो खानदान से पूछा ये विग्रह मुझे प्राप्त हो सकता है, उन्हें नहीं, यह तो हमारा बेटा है।
फिर सनातन ने कुछ खानदान की धर्मपत्नी से कहा कि आपको भेजिए जैसे तो पूछते हो, अच्छा है पर आपको भगवान ये के देव हैं, इनकी आपको खास पूजा करनी चाहिए।
तो इस प्रकार सनातन को स्वामी किसी न किसी बहाने चौबे खानदान के घर
में पहुँच जाते थे।
उनका श्री भाव था मदन मोहन का दर्शन 1 दिन मदन।
मोहन विग्रह ने सपने में कहा चौबे
खानदान की पत्नी से श्रीमती
की ये जो सनातन आता है रोज आपके घर में इसकी बड़ी इच्छा है कि मैं
उसके घर में रहूँ तो आप मुझे दे।
2 उन्हें। तो अगले दिन जब सनातन गोस्वामी आये
तो श्रीमती चोबी ने कहा आप इस
फिकरा को ले जाओ
क्यों? भगवान ने सपने में आदेश दिया था
तो सनातन के पास कोई रहने का ठिकाना नहीं था जमना किनारे 1 पेड़
के नीचे रह रहे थे तो उन्होंने
अपने कमरे के पड़ोस में 1 कुटिया
बनाई जिसे उन्होंने मदन मोहन की उपासना शुरू कर दी साजन जब मधु कर कर के रह रहे थे तो बहुत ज्यादा जीवन था जया मिट्टी से बनाते थे कुछ और सूखी चपाती भोग में अर्पण करते थे।
1 दिन विग्रह ने कहा कि सनातन कुछ और खिलाओ मुझे यार रोज सूखी
चपाती नमक के साथ खिलाते हो और
सनातन को सूचना मिली की उनका भाई आने वाला है उन्हें मिलने के लिए सनातन के हृदय में इच्छा प्रकट हुई मेरे भाई आयेंगे मुझे उन्हें को ही कुछ अच्छा भोजन खिलाना चाहिए
तो सुविधा तो थी नहीं, हालांकि 1 समय के बाद इतना धन था अब वो रहते थे 1 गरीब ब्राहमण के रूप में ब्रज में तो 1 राजा रानी जी ने 1 खबसूरत लड़की का रूप ग्रहण
कर के
चीनी दूध और सब सुविधा ले गए और सनातन को दिया और कहा कि खाओगे रूप दिया तो सनातन समझ गए जब रूपक गोस्वामी ने बड़ी अच्छी खीर बनायी थी तो सनातन समझ गए ये खीर कैसे बनी है क्यूँकी रूपक गोस्वा लाल रानी ने लड़की का रूप ग्रहण कर के ये सब सुविधा दी थी। तो उन्होंने अपने भाई को डाटा तो ने भगवान से सेवा ले ली तो
सनातन को स्वामी ने विभा की पूजा कर रे थे उनके मन में इच्छा
थी की 1 मंदिर बनाया जाए इनके लिए और कोई सुविधा तो थी नहीं। 1 व्यापारी अपने नाव में जा रहा था और व्यापारी की नाव फंस गई रास्ते में व्यापारी के नाव में बहुत धन था महंगे गहने वगैरह तो उसके
हृदय में चिंता थी कि अंधेरा रहा
था कि हम यहाँ फंस गए तो डाकू आयेंगे रात को सब लूट लेंगे वो देख रहा था कोई चारों तरफ कोई व्यक्ति है जैसे आप कभी अँधेरे में हो एकांत के स्थान में तो आप ढूंढते कोई साथी मिल सकता है या थोड़ी दूर में देखा की कुटिया में थोड़ी रोशनी दिख रही है हो गई वहाँ वह सनातन स्वामी अपना भजन कर रहे थे और पड़ोस की कुटिया में थे उनके विग्रह मदन मोहन की पूजा।
तो उस व्यापारी ने कहा मेरी समस्या है कि मेरी ना फंस गई है,
मेरा नाम गहनों से भरी हुई है मुझे डाकूनीआजाएरातको लूटने के लिए तो सनातन ने उन्हें भेजा अपने विगरा के पास पूछा खिले तो दिखानी व्यपारी ने पूजा की की मैं नाव अगर निकल जाए। किसी प्रकार से तो जैसे वो लौट
रहा था बहुत तेजी से लहर आई
तो नाव जब फँसी हुई थी से हिलने लगी।
फिर उस पारी ने यह प्रार्थना की थी अगर मैं नाम निकल जा यहाँ से जो जो जो मैं पैसा कमाऊंगा बना कर मैं आपके लिए आपकी सेवा
में अर्पण करूँगा तो पारी जाकर। उसने बहुत पैसा कमाया माल बेचकर तो धन लेकर आया और उसने अर्पण किया सनातन जी को पर सनातन गोस्वामी ने कहा इस धन से तुम इस मंदिर की मंदिर बनाओ मदन मोहन के लिए। तो फिर उन्होंने मदन मोहन का मंदिर बनाया और फिर थोड़ी देर बाद लालानी जी की मूर्ति को वह 7 से जोड़ा गया था।
तो सनातन गोस्वामी ने अनेक ग्रंथों की
रचना की और रोज वो
गोवर दान का परिक्रम करते थे। बूढी आयु में भी गोवर दान का परिक्रम करते थे 1100 8 बार गोवर
दान को प्रणाम करते थे और जो
भी वैष्णव आता था उन्हें मिलने के
लिए, उसे भी वो प्रणाम करते थे। तो बुरे होते थे सनातन गोस्वामी।
तो गोवर ने कहा भगवान कृष्ण ने
कहा
अब तुम बुरे हो, रे हो, परिक्रम करना बंद कर।
2 अब तुम्हारे बस का नहीं तुम 24 किलोमीटर की परिक्रम करो। रोज ने कहा नहीं मैं 1 परिक्रम कर सकता। तो भगवान भक्तों की सेवा करते हैं। इसलिए भगवान के अनेक नामों में 1 नाम है भक्त, भक्तों के बड़े प्रेमी हैं, भक्त प्रयास करते हैं, भगवान को
प्रसन्न करने के लिए, भगवान प्रयास करते
हैं भक्तों को प्रसन करने के लिए। तो भगवान ने 1 और दिव्य लीला प्रकट की। उन्होंने अपनी बंसी बजाई 1 गोदान शीला पर खड़े होते हुए और बड़ा पहाड़ था वो बाहर, फिर पिगल बंसी की बंसी को सुनकर और उस पहाड़ के पिगल स पत्थर में भगवान के 4 कमरों की निशानी भी है।
तो फिर भगवान ने कहा सनातन से की अगर तुम इस पत्थर की परिक्रम
करोगे रोज तो यह माना जायेगा कि तुम गोवर दान की परिक्रम कर रहे हो। 4 बार अगर इस पत्थर की परिक्रम करोगे तो यह माना जायेगा की आप गोवर दान की परिक्रम कर रहे हो। सनातन बुरे हो गये थे, बहुत ही
कठिनाई से गोदान की परिक्रम कर रहे थे। 40 से अधिक सालों के लिए सनातन
ने ब्रज की परिक्रम की। बकैदा और ब्रज के हर स्थान में गये और ब्रज के लोगों को उपदेश देते थे। वहाँ उन्होंने अनेक ग्रंथो की रचना की और उन स्थानों को खोजा यहाँ की भगवान कृष्ण अपनी दिव्य लीला की।
तो चेतना महाप्रभुजी ने सनातन गोस्वामी जी
को बहुत ही महत्वपूर्ण शिक्षा दी है। जिसके विषय में आप चेतना के मध्य लीला के 22 या दिहाई में प्राप्त करते हो। ऐसे बच्चे ने महा पवजी ने भक्ति सम्बंधित शिक्षा दी थी। दोनों भाइयों को रूप का और सनातन को। महा पवजी ने कहा किस प्रकार भज्जी अनेक योगों में गुजरने के पश्चात भाग्यशाली व्यक्ति हैं। जैसे भक्ति का ज्ञान प्राप्त होता है। ब्रह्म मीकोनोभगवाणोजी गुरु, कृष्ण कृपा पाय भक्ति। बीज का के क्षेत्र में महा प्रभु ने कहा कि ये भक्ति का बीज कैसे उठता है। यह भक्ति का बीज उगेगा। आप उसे शवनम और किसम के माध्यम से पानी पिलाओगे।
पाक क्षेत्र में महाप्रभुजी ने कहा कि
अगर आप अपने आप को माया के
प्रभाव से बचाना चाहते हैं तो क्या
करना चाहिए, साधु संगत में रखना चाहिए। और फिर उन्होंने आगे शिक्षा दी। किस प्रकार हमें भगवान के संगत होने के छ नियम हैं। उनके विषय में उन्होंने कहा जो भक्ति के लिए अनुकूल है, स्वीकार कर, जो भक्ति के लिए प्रति।
तो सनातन गोस्वामी
वैसे मंजारी के अवतार हैं और मंजारी उन्हें कहा जाता है जो कि गोपियों का सहयोग देते हैं। राधा रानी जी की सेवा में साजन गोस्वामी जी ने हमें अनेक प्रसिद्ध ग्रंथ दिए हैं। तो हम हमें आज इस शुभ अवसर पर सनातन गोस्वामी जी ऐसे कहने के लिए तो बहुत कुछ है चेतन उनकी अनेक लीलाओं का वर्णन है।
चेतन महाप्रहुजी ने कहा कि मेरे सब शिष्यों में सबसे प्रिय शिष्य है मेरा
सनातन गोस्वामी
हरे कृष्णा हरे, किशना कृष्णा हरे हरे हरे हरे।
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