साधु के लक्षण | Symptoms of a Sādhu | SB 3.25.21 | 26 Nov 1993 | वृन्दावन | Gopāl Kṛṣṇa Goswāmī

The video presents a devotional lecture by Gopal Krishna Goswāmī, delivered in Vrindavan, on the characteristics of a true sādhu (saint) as described in the Śrīmad‑Bhāgavatam (canto 3, chapter 25, verse 21). The discourse opens with the traditional mantra “Om Namo Bhagavate Vāsudevāya” and proceeds to a narrative dialogue between the sage Kapil and his mother, illustrating that bhakti (devotional service) is the sole means to attain liberation from material bondage. The speaker explains how bhakti is cultivated through the company of genuine devotees and sādhu‑sangati. He then addresses the practical problem of distinguishing authentic sādhu‑hood from pretended holiness, recounting personal observations of false sādhu‑like figures in various pilgrimage sites. The core of the lecture enumerates the essential qualities of a true sādhu: unwavering patience (saiṣṭhava), compassion (dayā), self‑less service, humility, equanimity in the face of praise or criticism, and a lifelong attitude of being a student of the scriptures. The importance of scriptural distribution (śāstra‑prasar) is highlighted as the highest form of charity, capable of awakening spiritual consciousness in society. The speaker repeatedly stresses that a devotee must remain detached from material comforts, continuously practice compassion toward all beings, and view every interaction as an opportunity for service. Throughout, he weaves anecdotes—from the story of a disciple’s steadfastness in the face of a curse to modern examples of devotees facing persecution—to illustrate how these qualities are applied in real life. The lecture concludes with a call for listeners to internalize these sādhu‑laksana (characteristics), to practice bhakti earnestly, and to propagate the teachings of the Bhagavata for the welfare of humanity.
Chapters
ओम नमो भागवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय स। आज हम भागवत के अध्याय का 21 वर्ष लोग पड़ेंगे तक करनी कहा सूद धेन भूषन भूषन। ओम ज्ञान थिमरस्या, श्री गुरु रूप गुन स सद वेतम सव धुतम परिजन सितम कृष्ण चेतना। श्री राधा कृष्णा पदानसहलितश्रीविाख। हे कृष्ण करुणा सिंधु दीन बंधु पते गोप गोपी कंचन गोरा घीरादहेविननेश्वरी बानु जय। श्री कृष्णा प्रभु करुणिका सर्व धन शत शत सा भूषणा। ये भागवत का 1 बहुत ही प्रसिद्ध श्लोक है। प्रभु जी ने इस श्लोक का अनेक प्रवचन में उपयोग किया और ने अनेक अवसरों पर इस महत्वपूर्ण स्लोक पर प्रवचन भी दिए हैं। इस श्लोक का उच्चारण परम भगवान कपिल देव कर रहे हैं। कपिल देव की माता देवा हूती ने उनसे पूछा हे पुत्र तुम मेरे आध्यात्मिक नेत्र हो। तुम मुझे ये बताओ किस प्रकार से मैं इस जन्म के बंधन से छुटकारा प्राप्त कर सकती हूँ? दाम दे देवहूति को पता था कि उनके घर में जो बच्चा है पर भगवान स्वयं है। ब्रह्मा जी ने उन्हें यह शिक्षा पहुँचा दी थी। तो देवहूती को पता था ये जो बेटा है उनका वो साधारण पुत्र नहीं है, भगवान स्वयं है। तो बेटी ने कहा हे माता तुम्हारा ये जो प्रश्न है बहुत ही सुंदर है। जैसे की जब परीक्षित महाराज ने शुकदेव को स्वामी जी से पूछा जिस व्यक्ति का अंत आने वाला है उसे क्या करना चाहिए? तो शुकदेव को स्वामी जी ने कहा आपका प्रश्न बहुत ही सुन्दर है क्यूंकि इसके उत्तर से पूरे समाज का लाभ हो सकेगा? तो कपिल भगवान ने कहा हे माता अगर आप जन्म के संघर्ष से मुक्त होना चाहते हो तो 1 ही उपाय है क्या भक्ति का। फिर माता ने पूछा बेटा ये बताओ भक्ति कैसे प्राप्त होती है? बेटे ने कहा माता भक्ति प्राप्त होती है भक्तों की संगत के द्वारा साधुओं की संगत। तो माता ने कहा मैं कैसे पहचानूँ कौन है? असली साधु कौन है नकली साधु। जैसे की आपके वृंदावन में और अनेक तीर्थ के स्थानों में बहुत से व्यक्ति साधु के वस्त्र ग्रहण करते हैं। 1 समय हम चंडीगढ़ में जाते थे तो देखा 1 साधु के वस्त्र के साथ आदमी चल रहा है, 1 हाथ में लौटा है, दूसरे हाथ में बड़ी है, कई साधु चोरी चोरी करते सब, 1 समय यहाँ 1 बड़ा पुलिस अफसर आया था मैं यहाँ सब साधुओं को जानता हूँ। वन के सब साधुओं ने लड़कियाँ रखी हुई है तो साधु के क्या लक्षण है वह भी पता होना चाहिए। तो फिर माता ने पूछा ये बताओ बेटा साधु के क्या लक्षण है? तो साधु के क्या लक्षण हैं? वो इस महत्वपूर्ण स्लोक में बताये जा रहे है और आप सब तो साधु बनने का प्रयास कर रहे हो। ठीक है हम अभी तक भक्त बने नहीं हैं, हम भक्त बनने जा रहे हैं। जैसे की आप मेडिकल कॉलेज में प्रवेश करो तो 5 साल का कोर्स होता है, बाद में 1 साल का। अपरेंटशिप तो ये नहीं कि अमेरिक कॉलेज में प्रवेश करते ही डॉक्टर बन गए पर अगर आप 5 साल का कोर्स करोगे, बाद में 1 साल अपरेंटशिप करोगे, फिर डॉक्टर बन पाओगे। तो उसी प्रकार ये नहीं की हमने अभी आश्रम में रहना तैयार कर दिया या या हमारी दिक्षा तो हम भक्त बन गए। नहीं, हम तो केवल विद्यार्थी हैं, हम केवल विद्यार्थी हैं और जंगी भर विद्यार्थी रहेंगे। और अगर हम अच्छे विद्यार्थी रहे। फिर हम उम्मीद है की जीवन के त्यागने से पहले भक्त बन जाएंगे। तो भक्तों के क्या लक्षण होने चाहिए, क्या लक्षण हमें अनुकूल करने चाहिए। उनका वर्णन हम इस भागवत के श्लोक में प्राप्त होता है। सबसे पहले सेंसी हमें सैंशीलहोना पड़ेगा चेतन्य महा। प्रभु जी ने क्या कहा? चेतन प्रभुजी ने अपने शिष्यों को आदेश दिया की ग्रांट लिखो लिखो और स्वयम उन्होंने केवल 8 लोग छोड़े जिनमे की। उन्होंने पूरे वैदिक शास्त्रों के सार को स्थापित किया है। तो 1 समय पापा जी के गुरु भाई आये थे। यहाँ। तो उन्होंने हमें कथा सुनाई। 1 समय पर आप जानते हो की अल्लाह बाद में प्राहुपाजीकी फार्मेसी की दुकान थी। बाद में देखा तो 1 समय प्रहुपाजीने 1 नया टॉनिक बनाया था। तुम ने अपने गुरु भाई से कहा देखिये नया वाइटमन टॉनिक बनाया है मैंने। तो गुरु भाई ने कहा प्रासी बाबू यह टॉनिक नहीं चाहिए, मुझे टॉनिक चाहिए जिसके द्वारा भगवत प्रेम जागृत हो। तो पापा ने कहा अभी टॉनिक तैयार नहीं हुआ फॉर्म मुझे पता है। न के गुरु भाई ने कहा बताओ बाबू क्या फार्मूला है भगवत प्रेम को जागृत करने का तो भक्त को सहनशील होना पड़ता है। कम फाइनल भारत भगवान गीता में इसी विषय पर बल देते हैं। आदर अपमान सर्दी, गर्मी, खुशी, लुक, मे समानता के साथ हर अवस्था का सामना करना चाहिए। तो जब आप प्रचार में जाते हो, बुक डिस्ट्रब्यूशन में जाते हो तो आपको बहुत सहनशील होना पड़ेगा। चाहे आप किसी प्रकार का प्रचार करो, न शील होने बिना प्रचार में सफलता नहीं प्राप्त कर सकते। आप प्रचार करने जाओगे ये नहीं की सब आदमी उत्साह के साथ कहेंगे स्वामी जी बैठो सभी स्वामी, चाहे, असली स्वामी सब कोई स्वामी बुलाते स्वामी बुलाते हैं। तो जब आप प्रचार करने जाओगे, कोई आदमी आपका, आपको सुनेगा, कोई नहीं सुनेगा। जब आप ग्रंथों के वितरण में जाओगे, कोई आदमी जरा दिलचस्पी प्रकट करेगा, कहीं नहीं करेगा, कोई आपका अपमान भी करेंगे तो हमें हर स्थिति में संशील होना चाहिए। देखिये परीक्ष मरा जी का उदाहरण उन्हें गलती से 1 ग्रामीण लड़के ने श्राप दिया था। जल्दी से जब श्री के पिता को पता लगा कि उनके बेटे ने क्या किया है, तो वो भी क्रोधित हो गए थे। अपने उन्हों तुमने गलती कैसे कर दी। यह कोई सधारण को श्राप दिया। दिन के पश्चात आपका देहांत हो जायेगा। उन्होंने सहनशील होकर इसको स्वीकार किया। उन्होंने इसका विरोध नहीं किया। तो हमें भगवान की सेवा में बिल्कुल सहनशील होना चाहिए। चाहे सुविधा प्राप्त हो या सुविधा नहीं प्राप्त हो। हम सेवा से किसी प्रकार से जुदा नहीं होने की इच्छा रखेंगे। चेतन्य। महाप्रभु जी ने क्या कहा चाहे आप मुझे कुछ भी। 2 अपने पाँव के नीचे में केवल आपका ही उपासक रहूँगा ठीक है। तो अभी आप सब ग्रंथों के वितरण में जाओगे बिल्कुल सेम शील होना पड़ेगा से शील ये ये नहीं की माँ जब जाओगे देखोगे सिनेमा के पोस्टर या फिल्मी संगीत वगैरह तो वहाँ आजकल हर जगह फिल्मी संगीत लगाते है तो आप उसमे रूचि लो। नहीं हम इन चीजों में रुचि नहीं लेते क्यूंकि भक्तों के लिए इन चीजों के द्वारा कुछ आनंद का साधन नहीं है। भक्त के विचार यह है की इन चीजों के द्वारा केवल कष्ट का साधन है। तो भक्तों को सेसिल होना चाहिए। हर स्थिति में और कांच कैसे सेसिल होने की शक्ति प्राप्त होती है। यह भक्ति के सिद्धांत के पालन के द्वारा आगे कहते है दयालु। तो दयालु शब्द का उपयोग हर व्यक्ति करता है। हर व्यक्ति में बहुत दयालु हूँ, रास्ते में उसको 10 पैसा दे दिया, बहुत दयालु हूँ। और लोग बड़ा पाठशाला महाविद्यालय हॉस्पिटल बनाते है। वो सोचते है, वो है दयालु। पर असली दया। किसे कहते हैं अपनी दया ये है जिसके द्वारा हम अज्ञानता को दूर करे। वैसे तो समाज में बहुत सी व्यक्ति ये दावा करेंगे कि वो दयालु है, पर शास्त्र की दृष्टि से उन्हें हम दयालु नहीं मानेंगे। केवल राषनवाही दयालु। ै ठाकुर भक्त जी ने प्रार्थना में कहा है अभी बिना बंधू ने किया चे तुम्हारा महा के विषय में कहते है के तुमारा मेरे अलावा और कोई मित्र नहीं है। हम सोचते हैं हमारे माता पिता मित्र है। कई बार भक्तों के घर जायेंगे यहाँ, तो कष्टी कष्ट है? वो मित्र नहीं है आपके। आपके भाई बहन मित्र है, वो भी मित्र नहीं है। पत्नी बच्चे मित्र है। वो भी मित्र नहीं है। केवल वो मित्र हैं आपके जो आपको भगवान के शरणगत होते हुए देखना चाहते हैं। बाकी सब केवल नाम के मित्र हैं। क्या कहते हैं मैंने तो दिन रात इनकी सेवा की। अंत में कुछ कष्ट सुख नहीं आया। कौन है पूरे समाज का, केवल भगवान के भक्त जो भगवान के भक्तों की शिक्षा का वितरण कर रहे हैं। तो अगर हम समाज पर दया को दया की दृष्टि से देखना चाहते हैं तो हमें प्रयास करना चाहिए। लोगों की अज्ञानता को दूर करने के लिए। प्रभु पाजी ने इन ग्रंथों को क्यूँ इतनी कठिनाई ऐसे देखा जैसे हम उस दिन बता रहे थे। कई समय इतने बीमार थे जब भी उन्होंने कार्य को नहीं रोका। क्यूँ ये नहीं की आर्थिक हो, आर्थिक लाभ से भी मंदिर चलते हैं। आरोप क्यूँकी को पता था की इस शिक्षा के लावा और कोई उपाय नहीं है समाज के सुधार के लिए। तो अगर हम समाज पर दया करना चाहते है तो हमें प्रयास करना चाहिए ये ज्ञान देने के लिए। भक्त की नजर में यह स्पष्ट विचार है कि आध्यातकेबिनाऔर कोई उपाय नहीं है समाज की समस्या के लिए। इसलिए वो प्रयास करता है यह ज्ञान देने के लिए। तो इसलिए पापा जी ने कहा ये ग्रंथों का वितरण सबसे ऊँचे प्रकार का दान है। इस विश्व में सबसे ऊँचे प्रकार का दान है। पुरे विश्व में इन ग्रंथों का वितरण क्यूँ? क्यूँकि? इन ग्रंथों को पढ़ने से लोग अपने स्वरूप को पहचान लेते हैं। इन ग्रंथों को पढ़ने से लोग ये समझ लेते है की जीवन का क क्या उद्देश्य होना चाहिए। तो जो भक्त हैं वो दया की भावना से पूरे समाज के प्रति व्यवहार करता है। अगर हम शास्त्र को ध्यान से पढ़े तो हम यह देखेंगे की हजारों साल पूर्व भी इस पर भगवान ने बल दिया है भागवत गीता, भागवत गीता का उद्देश्य कितना पुराना है, किसे कितना प्राचीन है, ये तो विवश वन को बोला था। सबसे पहले अनादि महाभारत में कहा गया है इस भौतिक पृथ्वी में ज्ञान है के आर सी, क्यूँकि, ये ज्ञान महाराज शाक को दिया था, तो उसके खाने में रामचन्द्र जी आये थे। बाद में तो इस भौतिक जगत में भी कब से आता। तो भगवत गीता में भी क्या कहा गया? गुम कौन है भगवान का सबसे प्रिय भक्त जो की कठिनाई उठाता है उनके प्रचार के लिए, वो है सबसे प्रिय भक्त। जो भक्त केवल ये सोचता की मेरे लिए क्या अच्छा है, मेरे लिए कहा अच्छी है? वो असली भक्त में है। भक्त, वो है जो भगवान के प्रचार के लिए, भगवान की सेवा के लिए, हर प्रकार के कष्ट को उठाने के लिए तैयार है। जो व्यक्ति भगवान की प्रशंसा के लिए, कष्ट को उठाने के लिए तैयार है, वो है असली भक्त। तो अगर आप श्रीमद भाग जैसे हम लोग आज पढ़ रहे हैं। ये श्लोक तो भागवतम का है। भागवतम भी बहुत ही प्राचीन सन्देश है। यह कोई नया सन्देश नहीं है। तो बिल्कुल ऐसी भगवान ने यह कहा है क्या? जो भाग मेरा प्रचार करता है वो सबसे प्रिय है। ये कोई कली के लिए खास, यह श्लोक नहीं है। शुरू से ही चलते आ रहा है। तो कहने का है की हम ये दया की दृष्टि से देखते हैं। समाज के प्रति, जब हम योजना बनाते हैं, प्रयास करते हैं ये भगवान के सन्देश को लोगों तक पहुँचाने के लिए। तो ये है दया को देने का असली साधन। बाकी जो है वो नकली तरीके से दया दे रहे हैं। अगर आपके आपके हाथ में कोई फूटी पस के साथ करने से आपके पास चले जायेगा, फुकने से नहीं जाएगा, वो फस जायेगी जब आप वो पूंती को दबाओगे। 1 समय पर नाइनटीन सेवंटी सेवन में प्रापा जी ऋषिकेश में थे 10 नाम, तो प्रापा जी रोज रात को लेक्चर देते थे, वह रोज शाम को तो 1 दिन, 1 अमेरिकन औरत ने कहा प्रापा से स्वामी जी स्वामी को तो ऐसे नहीं बोलना चाहिए। आप तो फूल शब्द का उपयोग करते हो, स्वामी शुड नॉट स्पीक लाइक दिस। तो प्रापर ने कहा जब आपकी फुंसी हो, पस के साथ फुकने से काम नहीं चलेगा, पस को दबाना पड़ेगा भगवान स्वयं कहते हो, हम उसको गधे को अंग्रेजी में बोलो या फूल बोलो। तो मतलब ये है कि हमें स्पष्ट रूप से भगवान के संदेश का वितरण करना है। पर सुन्दर शब्दों में, जैसे कि भागवत में कहा गया है स्वेद बड़ा हौसला करे, सुता पुरुष पशु न यत करना पतो। तो जातो दूसरे में है की जो आदमी है। 6 प्रकार के पक्षों के साथ तुलना की गयी है। स्ववेद, करे, सुपर, कुत्ता, ऊंट और गधे। भौतिकवादी व्यक्ति की तुलना यह 6 प्रकार के पक्षों के साथ की गई है। कुत्ते के साथ, क्यों, कुत्ते के साथ की गई है। क्यूँ की कुत्ता जो है, जो भी उसको खाना दे उसका सेवक बन जाता है। जैसे जो लोग हैं वो भी कुत्तों का उपयोग करते हैं पुलिस से भागने के लिए और पुलिस वाले वो भी कुत्ते का उपयोग करते हैं। चोरों को पकड़ने के लिए। कुत्ता तो भेदभाव नहीं कर सकता, जो भी उसको रोटी का खाना दे उसका सेवक बन जाता है। और हम लोग की आजकल कितनी भी डिग्री प्राप्त कर लो, जाओ नौकरी है, नौकरी है साहब, हमको नौकरी चाहिए। तो हमे भी मांगनी पड़ती है। जब हम विदेश में ये उदाहरण देते हैं तो लोगों को समझ नहीं आता क्यूँकी गधे दिखते ही नहीं है। जैसे गधे हमें गैर में देखते हैं। गैर देख मे भारत में, तो आप देख सकते है गधों का हर जाएगा, गधे जो है कितना बोझा उठाते है क्यूँ? अंत में थोड़ा घास खाना, वो घास तो प्रकृति के नियम से प्राप्त हो जायेगा। पर वो क्या सोचते हैं। हाँ ये सारा भोज नहीं उठायेंगे तो घास नहीं मिलेगा। फिर सुअर सुअर जो है भेद, भाव के खाता है, भेद, भाव के भोग इलाज करता है। समाज की भी वही स्थिति है। फिर ऊँट, उस दिन हम लोग परिक्रम मंडल में गए थे, तो हमने देखा ऊंट काटे को खा रहा था। तो हमें ये भागवत का उदाहरण याद आया, ऊंट काटे को खाता है। तो क्या मशहूर खून निकालता है। तो क्या कहता है? खाता बहुत मीठा है। इसी प्रकार हम लोग भोग नाश रूचि लेते है, ये नहीं जानते की अपने खून को बढ़ा कर, ये आनंद थोड़े समय के लिए मिलता है। तो जब हम प्रचार के ले जाते है, हम लोगो को ये तो नहीं कह सकते। ऊट गदा सुनो हमें आदर के साथ, प्रेम के साथ बोलना है। पर ये पता है की भौतिक वाद की जो कार्य है, ये जान के समान है। इसलिए शास्त्र में कहा गया है घर में नहीं, पशु भी समान जीवन है, किसके समान है? पशु के समान है। तो हमें भगवान क्या कहते है? बिल्कुल दयालु होना है। तो जो भक्त ग्रंथों का वितरण करते हैं, जो भकमेरथमेंहिस्सा लेते है, जो रूचि लेते है, जो प्रचार में सहयोग थे, वो ही दया को प्रकट कर है। जो हमेशा बहाना देते हैं। प्रचार से छुपने के लिए, दया की दृष्टि को नहीं प्रकट कर दे। फिर समझ जीवन के प्रति मित्र भाव रखना सो भक्तों में और दूसरों में क्या अंतर है? वो तो सबके दोस्त है, वो तो सबके दोस्त है, जो भगवान के भक्त हैं। किसी के शत्रु में जो इसाई लोग हैं, क्या कहते हैं, जानवरों में आत्मा नहीं है। 1 समय हम पद यात्रा के साथ केरल गए थे, 89 साल जब पदयात्रा शुरू हुई थी न, तो हम केरला में गए थे, वहाँ के जो सबसे बड़ा पोप हैं, भारत का कर्टन, उसको मिलने के लिए। तो पहले तो हमने ऐसे बरकातिया कैसे हो? वगैरह मिलकर खुश। बाद में हमने कहा आप क्रिस्टन लोग मांस क्यों खाते हो, क्रास नहीं खाना चाहिए? जानवर में तो आत्मा नहीं है, जानवर में आत्मा कैसे नहीं है? खाते, पीते, सोते, ग्लास कैसे उनमें नहीं है, कहने लगा जानवर सोच नहीं सकते। हमने कहा कैसे सोच नहीं सकते। जब आप डंडा उठाओ तो कुत्ता एकदम भाग जाएगा बोलो। तो हमने कहा दिल्ली रसोई में आएगी दूध लेने के लिए, केवल जब कोई रसोई में नहीं हो। ठीक है न? ऐसे ही थोड़ी आएगी बिल्ली कोई हो तो नहीं। आती दूध चोरी करने से उसको कहा जानवर भी सोच सकते हैं। आप कहते हो अंत में कहने लगा मैं तो ये डिस्कशन के लिए तैयार नहीं था। तो मेरी बात का मुझे दिल की बीमारी है। तो मतलब ये है। ये उदाहरण हमने इसलिए दिया की जो भगवान के जो भक्त हैं वो सबके मित्र है। आप जानते हो वो कथा के क्षेत्र मुनि जी ने वो शिकारी को कैसे सुधारा है। सो वो शिकारी सुधर गया। तो इतनी सावधानी से वो चलता था की चिट्टी के ऊपर भी पाँव रखने को वो तैयार नहीं समझे न आप तो भग है, चीटी को भी कष्ट नहीं देना चाहता। वो सबका मित्र है, ये नहीं, ये भक्त मेरे मित्र हैं, ये भक्त मेरे शत्रु हैं। यह प्रलाधमहराजके पिता ने शुक्र बच्चों को कहा। इसको राजनीति ज्ञान 2 डिप्लोमेसी। तो क्या कहा प्रलाद ने, मेरे राजनीतिक ज्ञान में कोई रूचि नहीं है, मेरा कोई शत्रु नहीं है, ठीक सभी मेरे मित्र हैं। तो हम भक्तों को ऐसे व्यवहार करना चाहिए की सभी मित्र हैं जिनको आप प्रचार करने जाओ। वो भी आपके मित्र हैं जिनका प्रचार करने जाओ। जब आप भौतिक वादी व्यक्तियों को देखो, आपको क्या सोचना चाहिए? ये सब हमारे परम पिता की उलाद है, अपने पिता को भूल गए हैं। और हमारा कर्तव्य यह है की को पिता की गोद में वापस भेजना। तो हमें इस भावना से जानना चाहिए में कहा गया है कि भक्त को हमेशा ये सोचना चाहिए की किसी समय भी किसका हो सकता है। और केवल भक्ति को अपनाया तो बंधन से वो बच सकता। तो जो भक्त हैं वो सबका मित्र है सबका, फिर उसका कोई शत्रु नहीं है, फिर वो शांत है। स्वामी जी हम तो बिल्कुल शांत नहीं है। जहाँ कोने में जाओ सब भक्त यह कहते हैं शांति नहीं है। हा वगैरह क्यों सताता है, मन से सताता है। क्यूँकि मन में अनेक भौतिक विचार है, साथ में आध्यात्मिक विचार भी है। तो क्यूँकि दोनो इच्छाएँ हैं। अध्यातिक संघर्ष होता है, संघर्ष होता है, किस को पूरा करे मन शांत रहता है। और शांत मन के बिना आप भक्ति नहीं कर सकते। श्रीमद भागवत में देखते हैं। जब रुकमिनी का विवाह शिशिला उनका भाई करने को तैयार हो गया था तो रुक्मिनी ने ब्राहमण को भेजा सन्देश के साथ भगवान को पहुँचाने के लिए जल्दी से मुझे बचाओ मेरा जबरदस्ती विवाह हो रहा है शिशिपलाकेसाथ, तो भगवान ने तो बड़े आदर के साथ उस ब्राह्मण का स्वागत किया, फिर उस ब्राह्मण से भगवान ने पूछा क्या आपका मन शांत है? क्यूँकि? जब तक मन शांत नहीं हो, आध्यात्म आगे प्रवेश नहीं कर सकते। तो यहाँ भगवान कपिल देव? कह रहे है की मन को शांत बनाओ। तो आप कहोगे कैसे हम शांत बनाये? यही है हमारी सबसे बड़ी समस्या की मन को कैसे शांत बनाये? मन को कैसे जीते हैं? तो जीतना सरल बन जायेगा। जब ये निर्णय कर लो की भौतिक इच्छाओं को अपने उखाड़ना है, जब मन शांत हो जाएगा। अगर मन शांत नहीं है तो गुरु साधु शास्त्र का सहयोग लो। मन को शांत बनाने के लिए यहाँ भगवान कहते हैं, शांत रहता है, वो शास्त्रों का पालन करता है शास्त्रों का पालन क्यूँ, शास्त्र का अर्थ है भगवान की वाणी। भगत शास्त्र का अर्थ है भगवान की वाणी। हम भगवान की वाणी से बिल्कुल जुदा नहीं होते। जब आप मिलेंगे जो कहेंगे हमारे पास 1 गीता है, हमारे पास भी ये है, हमारे पास भी वो है, तो उस गीता इस गीता में क्या अंतर है? वो भी शास्त्र तो है। पर अफसोस की बात यह है कि अनुवादक ने अपने भाग को साथ में जोड़ दिया है। पर प्रभु ने अपने ग्रंथों में अपने विचारों को नहीं जोड़ा के विचार तो भगवान के विचार 1 ही थे। तो उन्होंने भगवान के विचार को यथा रूप रूप में प्रस्तुत किया है। तो हम जो भी कार्य करते हैं, शास्त्र के अनुसार जैसे की कभी मन में इंडियन टिपती के विचार आये, हम उनको उखाड़ देते, हम कहते हैं। गुरु ने कहा ये पाप है। साधु ने कहा ये पाप है। शास्त्रों ने कहा ये पाप है। तो इससे हम नहीं स्वीकार करे। फिर कभी मन में आये ये भौतिक सुविधा सुख का विचार। तो हो आप कहो सोचो शास्त्र में क्या कहा गया है? तो शास्त्र में आप देखते हो, कहा गया है की इंडिया के जहर है, फिर हो शास्त्र में, तो कहा गया ये जहर है। तो मैं जहर कैसे पी जहर, कौन पीना चाहेगा, मन नई नई शास्त्र। क्या भगवान ने किसी पर तो हमें हर चीज को शास्त्र की दृष्टि से देखना है। जैसे हम दिन रात प्रचार पर बल देते हैं। क्यूँ? क्यूँकि शास्त्र में प्रचार पर बल दिया गया है? तो जो भी हम कार्य करते हैं ये देखने के लिए का स्वाभाविक है या नहीं, प्रमाणिक है या नहीं इसको हम शास्त्र के आधार पर स्थापित करते हैं। अब समझे न। तो इसलिए भक्तों को शास्त्र पढ़ना भी चाहिए। जो भक्त शास्त्र पड़ेंगे उनका मन जल्दी शांत होगा। क्यूंकी? जब शास्त्रीय ज्ञान आपके पास है तो फिर आप माया रूपी विचारों को आसानी से त्याग काट सकते। आप जानते हो हर समस्या का क्या हल है। और जब आपके पास शास्त्र ज्ञान नहीं है, आप ये नहीं जानते की हर समस्या का क्या हल है। और फिर योजना बनाते हो की नदियों के अनुसार इन समस्याओं को हल करने का प्रयास करे। तो इस लोक में भगवान साधु का वर्णन करते हैं और समझाते हैं क्या डीजल क्राइस के बारे में तो प्रकार डीजल क्राइज क्रूसीफाई कर दिया था, किस प्रकार हरि ठाकुर को पीटा था, कितने बाजारों में हरिदास ठाकुर को पीटा क्या पड़ा था हरिदास ठाकुर का केवल 1 ही दोस्त का नाम में उनके पिता ने उबलते हुए तेल में क्यूँ क्यूँ, पहाड़ की चोटी से फेका, क्यूँ उन्हें खिलाया, क्यूँ ये सब कर दिया? क्या दोस्त है मैं 1 ही दोस्त की हरी में रूची थी। तो भगवान के भक्तों को किनारों का सामना करना पड़ा है। विदेशों में तो हमारे भक्तों को जेल में डाल देते हैं। आप तो जानते हो रशिया में कई भक्तों को 5 साल तक जेल में रखा था। साइबीरिया की सर्दी में यहाँ की सर्दी तो साइबीरिया की सर्दी की तुलना में कुछ भी नहीं है। 65 साल उनको पुरानी डबलरोटी खाने को मिलती थी, बस नही थे तो 34 साल ही डबलरोटी खाकर, बिना कम्बल के, बिना गरम कानी पानी के बोला है क्यूँ? क्यूँकि सरकार ने उनको कहा तुम्हारे नाम छोड़ 2 और मीट खा लो, उन्हें मीट नहीं खायेंगे और हरे नाम भी नहीं छोड़ेंगे तो भगवान के भक्तों को जैसे प्रॉपर्टी तारी है, सेना पड़ता है, से घबराते नहीं है। क्यूँ? क्यूँकि वो हरी के नाम की न लेते हैं? क्यूँकि वो हरि के नाम के होते हैं, उसके द्वारा उन्हें पूरी शक्ति आती है। तो अगर आप मे से यह प्रश्न पूछो की कैसे ये सारे लक्षण हम अनुकूल कर, सकेंगे सारे के सारे लक्षण अनुकूल होंगे, कैसे साधना भक्ति भक्ति के द्वारा हर का जब मंगल, आरती, आरती, क्लास, फिर ये लक्षण अनुकूल होंगे, पर होगा क्लास हो माला का, जब ठीक से मैंने गए, फिर ये लक्षण आप अनुकूल नहीं कर सकोगे। इन लक्षणों का अनुकूल करना बहुत ही महत्वपूर्ण है। अगर आप भक्त बनना चाहते हैं, अगर हम केवल प्रखंड भक्त बनना चाहते है, इनकी चिंता मत करो। और अगर आप असली भक्त बनना चाहते हो, फिर आपको प्रयास करना पड़ेगा इन दोनों को अनुकूल करने के लिए। तो आप भक्त से यही निवेदन है। आप बड़े ध्यान से इन गुणों को स्मरण करो। चास में कहा गया। जैसे की भौतिक स्थिति में औरत को अपने शरीर को सजाती है गहने के साथ, तो भक्त सजाते हैं अपने आप को इन गुणों के साथ। और अगर आप प्रयास करोगे, ईमानदारी से अनेक नियमों का पालन करोगे तो अवश्य ही ये गुण भी 1 गुंबियात अनुकूल कर। पाओगे हरी कृष्ण हर he।
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