The last pastime of Srila Prabhupada | 16 Apr 2023 | New Delhi | Srila Gopal Krishna Goswami

The recording captures a devotional discourse delivered by Srila Gopal Krishna Goswami on April 16, 2023, in New Delhi, focusing on the life, mission, and final pastimes of Srila A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada, the founder of ISKCON. The speaker situates Prabhupada’s work within a historic lineage of Krishna bhakti that stretches back 5,000 years, referencing the ancient city of Krishna, the later reforms of Chaitanya Mahaprabhu, and the 20th‑century global expansion of the movement. Central themes include Prabhupada’s relentless effort to make Krishna consciousness accessible worldwide, his teachings on the relationship between karma and pure devotion, and the unique spiritual status of his disciples. The talk also recounts Prabhupada’s final years, his instructions on how to approach death, and the way he modeled a life of self‑sacrifice, perseverance, and service. Anecdotes about his publishing activities, travels to New York, and interactions with Western youth illustrate the practical outworking of his mission. Throughout, the speaker emphasizes reverence for Prabhupada, encourages listeners to follow his example, and underscores the continuing relevance of his teachings for contemporary devotees.
Chapters
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कृष्णा पर कान न करे आवास पहुंचे,
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आपका बात कर ली आवाज ने
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बचपन अंतिम पाल कहा जाता है कि 5000 वर्ष पूर्व कृष्ण शहर में जाना जितना सुगम था। भगवान चैतन्य ने 500 वर्ष पूर्व उसे और भी अधिक सुगम बना दिया। और अब बीसवी शताब्दी में शील प्रभुपाद ने कृष्ण भक्ति को समग्र विश्व के लिए संभव बना दिया है।
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सबके पास प्रॉपर मंदी कॉफी है, मैंने पढ़ा है।
शिवरपातकेकार्यगलवो की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे मानवीय परिस्थितियों से संबंध बनाए रहकर भी उससे सर्वथा पृथक और परे ते है। शुक्रव भक्त होने के कारण कर्म का नियम उन पर लागू नहीं होता था, जिसके अनुसार पाप का था। पोटने का फल मिलता है। वे कर्म के बल से पैदा नहीं हुए थे, न कर्म के बल से उनकी मृत्यु होनी थी। जैसा कि शुरू को स्वामी ने कहा है, जिस कप्तान और वचन भगवान की सेवा में लगे होते हैं, इस संस रहते हुए भी विमुखता है। लोग प्राय 1 भौतिक लोक में शुद्ध भक्ति की गतिविधियों का गलत अर्थ लगाते हैं। जिस प्रकार चंद्रमा के ऊपर से बादलों को गुजरते देख कर लोग समझते हैं, की चंद्रमा चल रहा है। इसलिए शास्त्र हमें आगाह करते हैं कि गुरु को कर्माधीन। सामान्य व्यक्ति न समझे। किन्तु शीला प्रभुपाद ने इस जगत से परे रहकर वक्त जीवों को दिखाया कि किस प्रकार कृष्ण का निरंतर चिंतन और सेवा करते हुए वे भी मुक्ति के स्तर पर पहुंच सकते हैं और मृत्यु के समय कृष्ण के परम भी को लौट सकते हैं। प्रभुपाद की शिक्षाएं सदैव व्यवहारिक और 7 बजे साल जमीन होती थी। उनकी पुस्तकें और सिद्धांत न थी, भरण, व्यावहारिक और अनुभूत ज्ञान से पूर्ण थी और प्रभुका जो उद्देश्य देते थे,
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उसे जीवन में उतार दे थे। उनका सारा जीवन आदर्श था। वे ग्रस्त जीवन में थे। तब भी वे बैक टू गार्ड पत्रिका निकाल कर जोरदार प्रचार करते थे। उन्होंने अपी्चनऔरधुबील अवस्था में रह कर 1 आध्यात्मिक आंदोलन का सूत्र वाद करने के लिए संघर्ष किया था और कृष्ण और गुरु महाराज की कृपा से वे सफल रहे। वे अपने मानव तुल्य प्रवास प्रयासों द्वारा सदय जीवन की कठोरताओं को सहन करने और आपदाओं का सामना करने की तत्परता दिखाते रहे। उन्होंने आध्यात्मिक जीवन का सब के लिए अनुकरणीय आदर्श किया। वृद्धा वस्था में बयान के लिए विदेश है और वहाँ न्यूयॉर्क नगर के 1 बार में हर 1 कृष्ण तिन करके अमेरिकी युवकों तथा युवतियों को आकृष्ट किया। अतः प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि उनके उदाहरण को स्वीकार करके कृष्ण की सेवा करे। भले ही उ उसके मार्ग में तात्कालिक बाधाएं आए। जिला प्रभुपाद को रोगों का सामना करना पड़ा, फिर भी अपने इच्छा और कृष्ण की सहायता से वे उन सबको पार करते रहे। यह उनका विस्मयकारी उदाहरण ट्री प्रभु की
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सुकमा जिले से इस देश को स्वीकार लेकर 40 साल लगे इस प्यास को बनाए मोबाइल को यहां पर पापा प्रभारी भर से तो उनको यह सुविधा थी वो टुनसादेदे
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कोई भी जो और कोई नही होता है तो जी 1 दिन बोला हा से बेल बजी ने विदेशों में साथ दे उनकेवश्ा हिंदुस्तान में है या पढने हो की रोबजीेलेकरजीवन मात हो लास धिकार है जिसमें बाजी 4 किया था
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यह कमजोर हो गया था पर जल्दी पी और वीडियो करता है और a wise man to i और आप देखते होगे प्लीज यहाँ कहा जाता है बुदी सफल जाते मन में क्या बैठे मन
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भगवान पबरजीकीआयबलादे पूरा कार्य के साथ रिजा what मेशा r som sotैंयूवे
as you say सिस्टम। कहा जाता है कि 5000 वर्ष पूर्व कृषि शरण में जाना जितना सुगम था। भगवान जतन ने 5 सौ वर्ष पूर्व उसे और भी अधिक सुगम बना द। और अब इसी श्रदा में शीलप्रभा ने कृष्ण भक्ति को समग्र विश्व के लिए संभव बना दिया है। शीलप्रभा जानते थे कि अपने उद्देश्य तथा उदाहरण के आंगरसकोरूपउन्होंने लोगों को दिखाना होगा, कि कैसे बनना चाहिए, उन्हें लोगों को दिखाना होगा, कैसे बनना चाहिए। वे कई बार मृत्यु से बच चुके थे, दृश्य की कृपा से, भक्तों की प्रार्थना से, अपने आंदोलन को फैलाने की अपनी शुभ और प्रबल इच्छा से। किन्तु 1970 ईसवी में उन्हें दृश्य से जो संकेत मिले, उसे शिला प्रभुपाद। इस भौतिक जगत में अंतिम और निश्चित रूप में अपने मिशन का समापन करने में लग गए। और उनके अंतिम कर्तव्यों में 1 यह था कि वे पूरा निर्देश दे कि मरना कैसे चाहिए। वे पूर्ण रूप में दिखा रहे थे कि उसे कैसे करे, जिसे हर हर व्यक्ति को परिणाम है, किन्तु जिसे सफलता को रद करना सबसे कठिन है। तथा किन्तु 1 प्रेत पूर्ण संघर्ष चल रहा था। रविवार को अपने शिष्य प्री। वे यह भी जानते थे कि शिष्य अभी पूर्ण प्राउड नहीं हो पाए थे। उनके आंदोलन में महान आंतरिक शक्ति थी, और संसार में उसका अपना ऊंचा मानता। तब भी उनके अनेक शत्रु थे। वे अपने शिष्यों, अपने आंदोलन, सभी जीवों, यहां तक कि पशुओं की रक्षा करने
की
करने को सदैव व्यर्थ थे। अर्थात जब उनके परम, घनिष्ठ तथा श्रद्धालु शिष्यों ने कहा कि वे उनके बिना नहीं रह सकते, तो वे मरना कैसे चाहिए। इसे दिखाने के बजाय वे उन सबों के साथ रहकर उपदेश देने को सहमत होंगे, किन्तु वे उनके इस समय जाने के इच्छुक होंगे। वे कब कहेंगे कि माया के संसार और कृष के शत्रुओं का सफाया हो गया है, किस समय उनके शिष्य पूर्णतया प्रोढ हो जाएंगे। जीवित रहने के अपने निर्णय का अनुगमन करते हुए, श्री प्रभुपाल ने अपने आप को अपने शीशों पर छोड़ दिया।
तो सर के प्यारे per day in a man में वर को रात होगा, वन है, सर कुलवान होगा बज के
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जहाँ का मन है पर इस में न बजे
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वो उनके परिचय का था, मान मिलेगा इससे मेले से 1 प्रश्न ही था की कौन सी ज 1 को इस विषय का स्मरण करना है न की क रूस देश व देश का प्राप्त होता है। हे हर या परसते है, उस में सो मैं तो में तरह सो जी पंच में गी सो रक्षा को जोर होने जा रहा है, और प्रबल रिक्षा सी उनके साइन बर्थ है। कई स्टोर ने वजीर डवाइस, विश्वास ने वो सर तो पुरानी है, वो उनका महत्व है प्रापरली प्लीस फाइएक्ाल, we have to co s क्यों उसने देखा कि धान से इस प्रकार तो पर इस समय यिजदामधा में है और
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कर रहे है की अच्छे डॉक्टर लाए 1 डॉक्टर डॉक्टर हो ता है और उसे खुश नहीं है। इस स्थिति में भी
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प्रोपर्ली पूरी अच्छी स्थिति है। वो 1 पद माइकोपकसरहएकबत भगवन पर धान और 1 बार वो रो वो पे समाज करते थे। बाल फ्रेंड हो गया, जो बचपन से उन्हें भी में का है। ये दिखा रहे हैं। इस प्रकार हमें 4 सो हमने शुरू के साथ नाइनटी फंटी फॉर में और उन में on so no time। मिलने के दे रनटाइम जुलाई 1 है, जिससे लोग समज को इस विधान के रात में त। preta tested न some transen train in america, said it s core i सो यह पर ध्यान रहे, भगवान ने हमें ध्यान का ज्ञान दिया था।
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नाम िनामकेड। यही 1 उपाय है की मार ने संदेश दिया जाता छेकिाकखुले।
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f आपको कभी समझ नहीं आया, पर के साथ प्ले है। very a book a can by so।
जीवित रहने के अपने निर्णय का उद्गमन करते हुए, शीला प्रवुपपाब ने अपने आप को अपने शीशों पर छोड़ दिया और उन्हें पूर्ण रूप से अपनी देखभाल करने की अनुमति दे दी। वे उनकी देखभाल में से भागी बने। उन्हें याद आया कि शीला प्रभुपाल ने अपने और अपने शिष्यों के बीच इतने घनिष्ठ व्यवहार की अनुमति इसके पहले कभी ही ली थी। इससे मिलती जुलती 1 अन्य घटना 1900 छयासठ ईसवी में नियोर्क की है। जब वे अपने पास पहले पहल वाले व्यक्तियों से बहुत वरिष्ठता का व्यवहार करते थे। वे ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें ज्ञान नहीं था कि आध्यात्मिक गुरु से व्यवहार कैसे किया जाता है। किन्तु जो लोग अब मौजूद थे और जो उस मै भी मौजूद रहे थे, कहते थे कि ये दिन हे से भी अधिक निष्टता थे। 1 बार तीर्थना दृढ़ता से आग्रह करने लगा कि शीला प्रभुपाद 1 पूरा प्याला भरकर रस पिए। जबकि प्रभुता कह चुके थे कि वे बहुत पी चुके हैं। तीर्थदानद को आग्रह करना अनुपयुक्त लग रहा था। उसने कहा, मैं माता यशोदा की तरह नहीं हूँ, कि यह करो। मुझे सदा स्मरण रहता है कि आप मेरे धर्म गुरु हैं। किन्तु शीला प्रभुपाद नान का आदेश मानते रहे। इसी तरह भवानंद तमाम पुरुष भक्ति 4 उपेंद्र तथा अन्य सेवक शीला प्रपात को सुखाते रहते थे कि वे विशेष प्रकार का भोजन लें और हमेशा अपने शरीर की भेद भालक के अन्य शीशों को ईश्वरपुरी की कहानी की याद आई जिसने अपने अध्यात्म पुर माधवेंद्र पुरी की घणिशकरशारीरिक सेवा की थी, जब वे जीवन के अंतिम दौर थे और अशक्त हो गए थे के अनुसार ईश्वरपुरी ने अपनी इस दासोचित शारीरिक सेवा से अपने गुरु महाराज के प्रति अपना ब्रेड सिद्ध किया और अंत में भगवान चेतन के आध्शी गुरु बन सके।
पूरी रसद पुरी के थे puri puri की थी उनमें sai
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सन्यास लिया है i ma लगता है कि हमारे सन्यासी ने दिखा हो ये राज गुरुब कल बहुत प्यार वो गुरु के मारे भी साफ कर दे। तो पूरे जिले पर शेवर से होने कहा कि तुम सारे विश्व में
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देश का है या े पुरी पुरी के समान की पूरी अंतिम दिन में मार है और जिस ओर प्रॉपली और प्रबल क्या वो 24 घंटे पूरे न दिखे or e
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जो देखा प्रापरली विधान हम अब प्रॉपली 1 बात से लोग की इसमें को जी बाजी से पहले सन्यासिन विज देश के मिसल मां के संदेश के नाती थे उनको उन्होंने देखा वे डिफिकल्ट प्लीज देश में कोई ध्यान दिया है सुंदर
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हा भूपेश बढ़ते े 1 पुल से पूरा विश्वास था या जवानी इसके लिए उन्होंने जेल होकर वह ने पाली पेशी का तैयारी करने से उस फसल में सुने और और क्या गुमान और अगर आप प्रैक्टिस करें
अगर
प्रैकटिस नही करेगे उतना नहीं जाएगा इसके स विलमेट के वो हमारे घर से भरा है बराबर नहीं मिल पाया जो कार मिल सकते हो पाप मान जो है वो को है वाणी है शिक्षा वाणी जो है आप से याद हम शिक्षा आ बात कर सकते हैं ऐसे thing to know is there is हम भी कहेगी वो वाली व ऐसा तो अब मे पढते हो इस प्रकार आप ने इशारा किया इस प्रकार उस पानी के साथ हम पर पता यानी पा
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तो कैसे
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न कुछ भी है कि अंदर जाने के जो पते है पड़ eh आप पढ़ सकते से खुला है जोरसे दी
शरीवास 11 जार सिर मेरा शत हूँ
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थाउसेन as
much on the requesting from स्थिति में भी 4 जोड़े ने है तो हम लोग जैसे
नही करते है
हम अगर प्रचार करते है हमारे जीव
फॉलो नही कर
rose to any how
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हाव वीक प्रैक्टिस imilitynवाsरvics को कर सकते हो
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अरे किस तो हमारे बहुत सारे परशन स्टेटस हम सब का हार्दिक स्वागत करते हैं
बड़ा अच्छा
होता है कि राम का फ्लो सा फिगर्स लिया है। तो बल जब कलकल था तो रविवार के दिन वहाँ पर 300 या 300 है वहाँ पर तो जब यहाँ पर आये और सक्शन शुरू होने लगा की लाइन के साथ तो सभी कई लोगों ने कमेंट्स किया कयोंकि भंताबासबातेकरते है पड़ा है लेकिन बेसिकली पीछे साथ स्लाव और सो ली बड़ा गंदा रियर ह और ये था तो कई लोग बोले हम भी चर्चा करते थे यहाँ आप देखिये बालक फरसे बाल के सा
और
देना चाहते हैं 1 तो सर और साथ ही जो है 4 तारीख को हवाले नशी दे के साथ ले कर रहे हैं तो आज सब के लिए तैयार है के बाद का ही लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है बहुत लोग आये ना भागों की संख्या बढ़ते जा रहे हैं और नरसिहवालकेआनेके बाद
सामने दूसरा खुला था तो जाने बारे जब प्रजा ने खुदा तो हम लोग कब जाएंगे बीज से खोला कोई चीज े लोग
कमल
मंदिर कुल दे गए
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कम
सबालसोसरेगराजकी
कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्ण
बाल ला दिया और सुरसा की आज इदितकाएकरबारसमना करे ने।
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