Transcendental Teachings of Prahlada Maharaja || SB 7.13.21 || 18 July 2021

In this devotional discourse, the speakers explore the essence of bhakti (devotional service) as the path to true happiness and liberation. They emphasize the necessity of associating with holy saints (sadhus) and chanting the divine names to purify the mind and overcome material attachment. Through scriptural anecdotes—such as the story of a wealthy Brahmin who lost everything, the restless mind of Arjuna, and Prahlada Maharaja’s unwavering devotion—the talk illustrates how wealth, desire, and Maya become obstacles when not surrendered to God. Practical guidance is offered on daily practices like morning chanting, service, and maintaining sincerity (dheerata) in devotion. The lecture also addresses the challenge of a chanchala (restless) mind, the role of Maya, and how to integrate material life responsibly while focusing on divine service. The overall message is that true wealth is the name of the Lord, and devotion transforms suffering into spiritual bliss.
Chapters
आय आयेरे हरा हरे रहा हर ह हरेक सहारे
hey krishna ये नीचे उड
गए
कि नीचे कितने लोग बैठे डेढ़सौ hi gsa everyone head mask mask alka
jaradmahawaahaara जायरा दमा हा बा भा वाला भा रा जमा भागा जब हार
जाय
र जमा हवा
हो
जागा
नगगबजजनलजना
रमन
तेरा बचाने जमना तेरा बल 4 जायरा
जायरा जा हा
बलााजलावालाभा siaaa गई श्री कृषण द
ना
ना ना राधा सा
ला हर किनारे
ना रे हरे रामा रामा हरे हारे के सा रे बेटा 4 हरे रामा रामा रामा रे हा रे
हर के रे
कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे रामा रे रामा रामा रामा रे रा हे रे
क्या रे आ
रे आरे रामा रे रामा रामा रामा हरे हाय कsणारिकrिsणा क्रिश्ना कृष्णा हा रे हाय रमा रा मा रे हे आय के ारेाहरेहयरामरेरा हमारा मारे आरेल राम ह रे हरे हरे रामा रामा रामा रामा
र
ले अरे राम रे राम राम राम ले ले र हा रे हे हा रे हरे हरे राम राम राम रे हा ले रमा नाम रा जा
जा गा जो गा
ये ब आय
गो ने तय की hindi e a
seven
higrushnaहोमनम भगवते वासुदेव, ओम नमो भगवते वासू जिव ओम नम भगवते वासु, hi krishna so but hardik swagtsosamodi go
over
हम चाहते नहीं है कि बहुत ज्यादा भक्त मन में बैठे हे हमन मो भगवते वासुदेव होम न मो भगवते वासु दिवा।
home
india to com
a
should you got fat to word meaning a
को
बोर्ड में ही क्या क्या करें वेट करें क्या करें ओके सूखा आस याद
बनो
रूपम सबे हो परते कानून माना संपशजमदश्वमबोगम स्वा
a
smsamishiaogoa सनी ज्यादा लाइट चाहिए पढ़ने के लिए छोटे शब्द है
का
साल 2 पासुखासरहबा अरे बो
बाते
जी
शब्द शुख
सुख के उस्का आगनहजीवकागुपम स्वाभाविक स्थिति सर नमस्ते है। भौतिक कर्म उपरति उड़ गया। स्थगित करके अधिक व्यक्ति का माध्यम,
सं इंद्री के लिए
मांगों से उत्पन्न शव देखकर होगा।
इंद्रीय भोग
सुख श्यामी चुप बैठा हूँ। इन भौतिक कार्यों के विषय में गहराई से सोच रहा हूँ। समविशनऐसे कार्यों में कर अनुमान जीवन के लिए जीवन का वास्तविक स्वरूप, आध्यात्मिक सुख का। और यही असली सुख। यह सुख भी नाम दिया जा सकता है। जब मनुष्य सारे प्रतिावादी बारिक इलाकों को बंद कर दे। भौतिक इंद्रिय भोग कोड़ी करतना है। अत इस विषय पर विचार कर मन सारे भौतिक कार्यकाल बंद कर दिए हैं। और अब यहाँ लेता हा। यहाँ पर हो मायावादी का अंतर मायावादी था। वेस्ट दोनों ही जानते हैं कि वादी कार्यक्राम में कोई शुभ नहीं। अत मायावादी दास ने ब्रह्म सत्यम विरिन्या के नारे से चिपकी। लेखक मिथ्या भौतिक कार्य कलापों से दूर रहना चाहते हैं। वे समस्त कार्य कलापों को बंद करके। परंतु लीन होना चाहिए। किन्तु वैशनलदर्शन के अनुसार यदि कोई भौतिक कार्य करना मात्र बंद कर दे तो वो दी ही काल तक निसक्रिय नहीं रह सकता। फलता देश व्यक्ति को आध्यात्मिक कार्यों में लग जाना चाहिए, जो इस संसार के दुखों की समस्या को हल कर रहे थे। कहा जाता है कि माया वाली दास भौतिक वादी कार्यों से विलग ने का प्रयास कर के ब्रह्म में लीन होना चाहते हैं और वे ब्रह्म में वास्तव में लीन हो जा। किन्तु सक्रिय न होने के कारण वे पुनः भौतिक परत में आ गिरते हैं। आरेहसग्रमपदमसथा, पतन, गधा तथा तथा पद त्यागी ग्रह वे, ध्यान में न, नारे, वाणी से अस्पताल तथा पाठ, साला आदि खोलने के चक्कर में हु कार्यों में लौट आता है। अतएव केवल ऐसे ज्ञान का अनुशीलन प्रयाप्त नहीं है कि भौतिकता वादी कार्यकला सुख प्रदान नहीं कर सकते। इसलिए व्यक्ति ऐसे कर्मों को करना बंद कर दे। व्यक्ति को चाहिए कि भौतिकता वादी कार्य कराहों को जाकर आध्यात्मिक कार्यक्रम अ निकाल करें, पर इस समस्या का हल निकल आएगा। आध्यात्मिक कार्य कला कृष्ण के आदेश से संपन्न होने वाले कार्यकलाप है। आम को लेने कछनामंशीजनमजो? कुछ कृष्ण कहते हैं, यदि उसे कोई करता है तो उसे कार्य करा तो उसके कार्य का बहुत देर नहीं होती होताहै। जब अर्जुन ने भगवान कृष्ण के आगे शानदार युद्ध किया तो उनके कार्यकलाप तक नहीं थे। इनकी के लिए युद्ध करना सत्तावादी कारी है, किन्तु भगवान के आदेश से युद्ध करना आध्यात्मिक है। अध्याय कार्यों से व्यक्ति धान वापस जाने के योग्य बनता है और कम मत आनंद में जीवन बिताता है। यहाँ इस जगत में प्रत्येक वस्तु मनो उदहारण है, जिससे हमें कभी भी असली सुख नहीं मिल सकता। अतेवावाजीकार्यकरातों को रंग करके आध्यात्मिक कार्यों में लगना ही व्यावहारिक समाधान है। यह था लोगो को न करना रहा। यदि कोई भगवान को प्रसन्न करने के लिए कर्म करता है तो उसे जीवन में समझा जाता है, किन्तु जो ऐसा नहीं कर पाता, वह बंधक मरीज में बना देता है।
क्या?
mrndsiayananjnaslka na s gurmenmsrictna manovesamsitena but swयmदमयमजद बंदे हम श्री गुरु ही
र
राधा
ललिता की कृष्णा करुना सिंधू बंधू
ra गोरा
नेबिोन jai shri krishna catnarbonitednda sreaswetgdaa
he krishn
b तो इस 7 खंड में आप फिलहाल महराज के विषय में पर जो भगत हैं, उनकी रुचि रहती है। कि भगवान ने भक्तों की लीलाओं का स्मरण करें और इस पर मन को वश मिला सकते हैं। तो इस लोग यहाँ पढ़े हो। लाल महाज के अनेक गुम थे और पिछले अध्याय में फिलहाल महाज ने कहा, भगवान ने उन्होंने कहा था, हे फिलाल, मेरे कारण, तुम्हे इन कस लेना पड़ा? तुम मांगो मेरे से क्या चाहिए? क्या वर चाहिए? क्या कहा? रांध ने कहा, मुझे आप से कोई वर नहीं चाहे। जो सेवक यह उम्मीद रखें कि सेवा के बदले में मुझे कुछ लाभ मिलेगा। वो पारित कर रहा है। जो गुरु यह सोचे कि इस के द्वारा मुझे यह लाभ आ रहा है, वो भी क्या है, वो भी पर पारी है। और सबसे बेहतर क्या है? निष्काम भाव से सेवा करे। जैसे क्षेत्र क्षेत्र में कहा गया है कृष्ण भक्त, निष्काम मुक्ति, मुक्ति सिदी ग्रामीण काली। जो कृष्ण भगवान के भक्त हैं, निष्काम भाव से जुड़ते हैं। वो हमेशा क्या सेवा में रहते है। तो राजा के में पढ़ते हो, उन्हें कितना कष्ट सहना पड़ा के में 12 हिस्सा क्या था? वो था, विश्व के उपासक और कठिन स्थिति में भी मुझे के पश्चात भी उन्होंने ने भांति लाल ने कहा कि अगर आप मुझे वर्ल्ड देना ही चाहते हो तो ऐसा वर्ड दीजिए जिसके द्वारा मेरे सारे भौतिक आकर्षण मुझे वर्ड देना चाहते हो तो ऐसा बोल दीजिये, मेरे सारे भौतिक इच्छाएं करती तो लाल महाराज इस प्रकार से हमें उपदेश दे रहे हैं। और लाल महा ने भगवान की भक्ति के लिए अनेक प्रकार तो प्रलाल महाराज वो अपने मंत्री मंत्रियों को लेकर अपने राज्य की यात्रा कर रहे थे। और रास्ते में उन्होंने देखा 1 पायथॉन का पातन समझते हो पायतन बैठा हुआ था 1 सा रास्ते में उन्हें मिले बंभगभीमधुमेतो प्रधान माराज अपने मंत्रियों के साथ अपने राज्य का की यात्रा कर रहे थे और उनकी इच्छा यह थी कि हम जाके देखें अलग अलग साधु महात्मा उनके क्या लक्षण है, कैसे वारना रहता है। तो वो यात्रा कर रहे थे ने मंत्रियों के साथ जब वो पहुंच गए जहाँ उन्होंने देखा 1 परतन बैठा है और मदमकीऔर प्रधान राज ने पतन को देखकर उनके चिरंद हुए, उनके चरण प्रणाम के चरण हुए क्योंकि प्रधान राज मंत्री यात्रा कर रहे थे क्या देखने के लिए उनकी क्या थी कि संतों दर्शन प्राप्त हो उसके द्वारा वो देखें कि संतों का क्या व्यभार होना चाहिए। तो मेरे इस पायदान को उन्होंने देखा ये पायतन 1 जगह पर बैठा है जात पायताने हेल्त ही नहीं है, 1 जगह पर बैठा है औ और उसका पूरा शरीर मिटटी से भरा हुआ है। और वो पैसा देखते हुए फिलहाल पहचान गए। ये साधारण पैदा उनसे शिक्षा की भीख मांगी। आध्यात्मिक जीवन में हमारा यही प्रयास होना चाहिए कि हमेशा ध्यानमे ज्ञान को प्राप्त करे। तो लाल ने प्रश्न पूछे, पायस ने कहा आप मेरे से प्रश्न पूछ रहे हो मैं तो जानता हूँ कि आपके पास पूरा ज्ञान है, मैं आपको क्या क्या? आपके पास भी तो पूरा ज्ञान है पर क्यूंकि आपकी इच्छा है कि मैं 1 ज्ञान आपको प्रदान करूँ? तो पान ने उपदेश दिया प्लान आज को। उन्होंने यह कहा हम जो कार्य करते हैं वो उनका 2 प्रकार के परिणाम होता है वर्ग और oपoवराओपोवर्गा। कहते हैं उस जिसके पालन से भगवान, आज के इस लोक में क्या कहा गया? आज में लाल कह रहे है, है। आज के शो में पाइल कह रहे हैं कि असली शोक क्या है? क्या है आध्यात्मिक sok? और ये जो सुख भौतिक कार्यों के द्वारा प्राप्त करते हैं, यह क्या है। botiksokआध्यात्मिक शो कभी समाप्त नहीं होता और जो भौतिक सुख है वो शुरू भी होता है और उसे मात भी होता है। जैसे मानलो आप बडे बडे पारी बन जाते हो, मानो टाटा बला बन गये और आपके पास हर प्रकार की सुविधा है। तो क्या ये सुविधा कूलर की हवा में तो मान लो आपको अनेक प्रकार की भौतिक सुविधाएं प्राप्त हो जाए। क्या ये सुविधाएं हमेशा रहेगी? नहीं। तो कराना कहते हैं असली जीवन का लक्ष्य है, असली जीवन का लक्ष्य है कि आप अध्यात्मिक सुख प्राप्त करने का प्रयास। जब आप भविष्य की भंग में, सागर में, आकर भक्ति ज्ञान को प्राप्त करते हो तो उनका उद्देश्य क्या है? कि आपको असली सुख लाल बना। इसी 7 में कहते हैं लोग ये नहीं जानते कि असली सुख कैसे प्राप्त हो जाए। आप सब जो भी स्कोर के साथ जुड़े हो, आप जानते हो कि असली सुख क्या है। भोपाल के ज्ञान को तो लाल बना जैसे जानते आये थे और उन्होंने अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर लिया था। कब कब तो माताजी जडमेटहेउनके पिता अध्यापक समझ नही पाये कि हवाएं बेटे को द विज्ञान कौन प्रदान करता है। और संदर और अमेरिका प्रधान के 2 अध्यापक थे, उन्होंने के पिता उनको डांट रहे थे। तुम लोग ध्यान नहीं देते। युबैशनेवालेहै पेश बदल कर मेरे बेटे का दिमाग घुमाने के लिए। और तुम पकड़ते ही नहीं, हमें झूठा आरोप मत। 2 हम ग्रामीण हैं, हमें खुद नहीं सोना। और वह कितना भी प्रयास किया वो सफल नहीं हो रहे। पर दिमाग मे ज्ञान क को निकालनी है। तो लाल भार दीर्ध उन्होंने भर्ती की विधियों का पालन तो पलालमावीअपनेबंधिों के साथ यात्रा कर रहे हैं। तो पाटन से उन्होंने अनेक आध्यात्मिक प्रश्न पूछे जिनका dena taactiyoslymarg asli sok fitna हमारे kare ya pbrgaलाy जा सकते हैं। या वर्ग और प्रवर्ग कहते हैं उस स्थिति को जब आप कार्य करते हो, भगवान की सेवा के असली सुख को प्राप्त करने में और फोवर्गाहइसके द्वारा आपको संदेश बनता है। कि 5 प्रकार के कष्ट है को, हम सब को पागल के पास क्या बनता है। पर आप मोदी समाज में भूत प्रेश करते हो। और इस परिश्रम का क्या प्रणाम होता है कि आपके मुंह से फोरम निकलती है, उसका है आप प्रयास कर रहे हो, मेहनत कर रहे हो, इतनी मेहनत कर हो। जो form है वो भी mu
ba
पे tna, pryas ka r, s, a point आप अपने आप को संतोष नहीं कर सकते हैं। चाहे आप कितनी भी सफलता प्राप्त करे, चाहे आप कितना कितना विधन प्राप्त करो, भौतिक द्वारा आपको प्री संतुष् नहीं मिली। तो इस फाइटर ने समझाया प्रधान मन को सबसे पहले हम परिश्रम करते हैं, परिश्रम करते हैं भौतिक सुख को प्राप्त करने के लिए। और परिश्रम का क्या परिणाम होता है? कि फोन आपके मुंह से निकलती है। आप ने देखा होगा, घोड़े जब दौड़ते हैं तो उनके मुंह से फेर बौत समाज का 1 और नतीजा है। धरा पॉट में आप इतना प्रयास कर रहे हो, क्या अनुभव करता, अब नौकरी कर रहे हो, साहब के लिए बहुत मेहनत कर रहे हो। और साहब क्या कहते हैं? तुमने तो कुछ नहीं किया, क्या कर? बच्चे माँ बच्चों को बड़ा करते हैं। बच्चे कहते हैं क्या किया?
तुमने
तो
बौधिक जीवन का 1 और लक्ष्य है। चाहे आप कितना भी प्रयास करो, क्या आप फिर माँ बाहर से क्या बनता है। तो हम सब भय मेर जीते हैं। भुवन दास कहते हैं बाजा हुए मनशिननदधधाभहमेरा मन, तुम भय से भरे हुए हो। और अगर असली शरण लेनी है तो क्या कहना चाहे तो सबके मन में भय है। अमेरिका का राष्ट्रपति माना जाता है, विश्व का सबसे पाक आदमी है। प्रदूषण भी भय रहता है, जो हो जाते हैं। कि तो चारों तरफ से सड़कें ब्लॉक हो जाती है। भारत का गा तो और नुकसान हो जाए। तो बौद्धिक समाज में चाहे आप कितना भी परिश्रम करो, क्या रहता है, परिणाम आप के भय रहता है। और अंत में क्या मिटी। तो चाहे आप कितनी भी प्रोग्रेस करोग, ज्ञान के द्वारा आप मृत्यु से बच सकते हो। नहीं तो आजकल ने प्लाजा को सिखाया कि अगर तुम बौद्धिक समाज में कितना भी प्रयास कर लोगे, तुम अपने आप को इन 5 परिणामों से नहीं बचा सकते। हम परिश्रम करते हैं, वो अपनी गलती है। तो फिर भी हम निराश होते हैं या भय? और तो ये है हम सब का नाश प्रधान विज्ञान, हमें क्यों दे रहे हैं? श्री भगवान में आप देखते हो। शुरू से अंत तक 1 ही विषय पर बल दिया जा रहा है। क्या व्यास देव ने अनेक शास्रों की रचना की थी, उनके सार को प्रस्तुत किया था। और जब भी उन्हें ऐसा लग रहा था कि हमारी रचना में कुछ कमी है। और जब वो पहुँचे के आश्रम में तो उन्होंने क्या कहा? उन्होंने कहा कि मैंने सब शासु की रचना की है, उनके प्रस्तुत किया है। मुझे क्या लगता है कि तेरे कार्य में कुछ कमी हो गयी है। और फिर ब्याज के कहने पर उन्होंने क्या दिया, शहर गया दिया। जिसमें शुरू से अंत तक 1 ही संदेश दिया जा रहा है। भक्ति। तो इस लोक में यह कहा जा रहा है कि हम सब का असली कार्य होना चाहिए कि हम आध्यात्मिक शोक भी कौन है? 1 प्राथना का उच्चारन करते हैं हम विज्ञान, शिवरनदस्यज्ञा, क्या, शील व जन्म अज्ञानता में पर साधु के द्वारा इसे ज्ञान प्राप्त हुआ है। इसके उपयोग से क्या अज्ञानता से आप सब का अनुभव होगा। जब आप इस कॉल में कॉल में नहीं आ रहे थे, आपके पास शुद्ध भक्ति का ज्ञान नहीं था। फिर जैसे भक्तों के संग में आने लगे और सास को पढने लगे। अब को क्या ज्ञान प्राप्त हुआ? तो प्रलाद मराज। यहाँ ये बताया जा रहा है कि हम सब का लक्ष्य क्या होना चाहिए? असली शो तो समाज में ध्यानिक ज्ञान की आवश्यकता है और ध्यानिक ज्ञान प्राप्त होगा। फिर हम समझ सकेंगे क्या है? तो ये धार्मिक ज्ञान, ध्यान दें, जीवन कैसे आरंभ होता है? सबसे पहले चिस्षीषकी आवश्यकता है
कि
साधु संग, साधू संग की आवश्यकता है। अगर आप शुद्ध भक्ति के राज्य में आ सका है। पहले लोग जुड़े थे और असली ज्ञान, असली असली भक्ति का ज्ञान नहीं था। फिर साधु संघ, मे आने के पश्चात यह प्राप्त हो। तो हमें भक्तों की सं
la
l sha ज्ञान था कि मेरा बेटा भगवान का उतार ह। तो उन्होंने पूछा वो उनसे क्यों पूछा? उन्हें पता था उनका बेटा जो है, ध्यान नहीं दिया। तो भगवान ने क्या कहा? उन्होंने कहा कि जो आकर्षण आपका किसी बौजीबॉदीके प्रति है, कोई आकर्षित हमें क्या करना चाहिए? भगवान उनके भक्तों के प्रति जोड़ना चाहिए। तो साधु संग में रहोगे। तो आपको दिवि ज्ञान के विषय में ज्ञान मिलेगा। इसलिए भागवतो कहा जाता है कि हमें साधु संघ का लाभ उठाना जाए। साधु। की संगत प्राप्त होती है। उनमें 2 साधन हैं, 1 है भक्त, साधु दूसरा है। जैसे इस संस्था में बल दिया जाता है। ग्रंथों की वतन की सेवा क्यों 1 ही कारण है कि इनमें है शुद्ध भक्ति का या तो उपदेश राज महाराज को मिला। वो यही था कि हम सब का लक्ष्य क्या होना चाहिए कि हम असली शांति, असली आनंद के लिए प्रयास करें। क्षेत्र मा ने हमें आज लोग भी जिन्हें हम शिव शाशा के नाम से जानते हैं। बिल के पहले स्रोत में भगवान क्या कहते हैं क्षेत्र महान आनंद मो, आप भगवान राम का उच्चारन करोगे, उसका क्या लाभ होगा? 1 लाभ यह होगा कि आपको असली सुख प्राप्त होगा। जो की केवल बढ़ता जाएगा। तो भक्ति विधि शक्ति है। कि अज्ञानता से भी अगर आप ोी तो यह कहा जा रहा है हमें भक्ति योग का उपयोग करना चाहिए। भक्तियोग के द्वारा क्या प्राप्त होता है ये ज्ञान कि आप भिकारियों स कैसे बनते है? साधु संग, भक्ति की वीडियो का पालन इन के द्वारा आप क्या अज्ञानता से बन सकते है। तो आज हर समाज में किसी चीज की कमी है तो किसी की कमी है। इस विज्ञान की कमी है, वैसे अनेक पार्सल है, महाविद्यालय है। पर आज शिक्षा दी जा रही है। असली शिक्षा में तो भगवत क्या है? शिक्षा है। तो भक्तों के संग में रहोगे। तो दर्द होकर आप भक्ति में आगे बढ जा। स्वामी जी में कई ग्रंथ दिए है, है क्या छोटा ग्रंथ है, केवल या श्लोकका हर श्लोक है। बड़ा महत्वपूर्ण है। तो रूप कहते हैं भक्ति में सफलता प्राप्त करने लिए क्या चीज की आवश्यकता है। दिल भाव से लिटरेशन तो नाद मुनि। आगे ध्याय में कहते हैं अगर आप दिर्धभाव से सेवा में जुड़ोगे तो फिर आप इंडियन इंडियन शिफ्ट से बच सकते हो। और बागवत में बड़ा सुंदर उदाहरण दिया गया है। अगर आपने जूते पहने हुए हैं तो आप सड़क पर चल सकते हो, पत्रों पर चल सकते हो, कांटे पर भी चल सकते हो। जब परीक्षा में जाते हैं कई भंग, तो बिल्कुल नंगे नंगे पैदा ते है। पर अगर जूता हो तो आप पत्रों चल सकते हो, कांटों पर चल सकते हो। और तो उसी प्रकार राजमुनी ने कहा कि अगर हम दीर होकर भक्त के बाग में जुड़ते हैं तो आप सरलता से मनोमय को वश में करते और मनोरमियों को वश में कर आवश्यक है। अगर हम भक्ति में आगे बढ़ना जा रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या है चंचल मन, चंचल मन के विषय में क्या कहा? अर्जुन ने क्या कहा? चंचला? हे कृष्ण, मन को वर्शमे रखना, सरल वायु सेवी। तो आप चाहे विश्व के किसी कोने में जाओ। आपको क्या सुनने में मिलेगा चंचल मन। हमें बहुत सुधारा। तो भगवान कहते हैं हर जीव आत्मा, इन, हर जीव आत्मा, ये समस्या है। पर ये समस्या का उपाय है। कोई भगवान कहते हैं जेवीशगमायममाया जुड़ा तैयार। इस माया का विरोध करना क्या है। कोई व्यक्ति माँ, कोई व्यक्ति मेरे शहर में आता है, फिर उसे शक्ति प्राप्त होती है। इसका विरोध करे तो भगवान की भक्ति है, उसे पूरी शक्ति है। अगर हम भगवान की शिक्षा का पालन करे तो हवा जो यामी है, इश्वर भुगता नाम हमें बुद्धि देते हैं कि अब किस प्रकार दीर्ध होकर भी मैं आगे बढ़। मनबुद्धि वश मे लाने का उपाय सास में शास रचना किसने की थी? किसने और शासों की रचना किसने की है? भारत समाज के सुधार तो हर प्रश्न का उत्तर इन ग्रंथों में है और हर प्रश्न का, हर समस्या का उपाय भी है। पापाजी को पूरा विश्वास था कि 1 दिन लोग भगवत पढ़ेंगे गीता पडेंगे और उन्होंने यह स्थापित करके बताया कि गंध का अध्ययन पूरे विश्व में हो जाता है। ध्यान हर प्रकार का व्यक्ति है। वैदिक साहित्य में क्या है सनातन शिक्षा? तो रूपसभी कहते हैं, देर होकर भक्ति की मांग में उत्साह हमें उत्साहित होना चाहिए। क्यों नहीं। आप किस की सेवा से जुड़े हो? कि है? आप सबसे कुसीद व्यक्ति की सेवा कर रे हो। सायद होने मे दिर्द होगा निडरमनेशनऔरिटरमनेशन। कैसे बढ़ता है रूप समय क्या कहते है? भजन क्रिया के माध्यम से बुझने किया करोगे। जो अनल्थनेवृतिहोती है, जो बहुत ने हैं, वो कमजोर होती है। और अगर भक्ति करते जाओगे तो क्या अंत में आएगा? कृष्ण प्रेम तो हम शासन में हर प्रकार का उपाय है। जैसे कि मी कहते हैं हमारे रवि नाम जो है। चीनी जैसे मीठे और विद्या बिमारी के कारण हम उनका मीटर फल महसूस नहीं कर सकते। पर विद्य बिमारी का कोई इलाज है, क्या है, इलाज है। मधुर का उचारण। तो लाख नाराज। ऐसे आत्म वैज्ञानिक थे, उन्होंने देव विज्ञान प्राप्त किया था। कि वो माता के घर में थे और माता के घर में थे। उन्हें जो हिंदू देवता थे, उनके मन में भय। 1 दिन उनके पिताजी की तपस्या के कारण कितना का सहना पड़ा, उनको डर था। बेटा बाप जैसे नहीं, निकले कहते। कई बार कौन नरेंद्र मोदी ने क्या कहा, ये जो बालक है, इस निर्दोष के घर में 1 महान संत है। आप प्रयास करोगे तो भी उनका वध नहीं हो पाएगा। और फिर राजमुनी ने लाल की माता को अपने आशा में स्थान दिया। उन्हें दिव्य ज्ञान दिया तो दिव्यज्ञान की आवश्यकता है। समाज में और प्लान ज अनेक श्लोकों द्वारा यह स्थापित करते हैं कि कि शुद्ध भक्ति ही जीवन का लक्ष है। तो यहां नानी कहते है कि जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। शुद्ध भक्ति के मान में जुड़े और शुद्ध भक्ति के मार्ग में जुड़ने के लिए हमें दीर्ध होना पड़ेगा। कई बार हम देखते हैं कि हाथ भर भाग्य बनना चाहता है, पर बिलकुल देर भाव नहीं है। थोड़े से थोड़ी सी कठिनाई हुई, यह थोड़े से मन हो गया, भक्ति को छोड़ने गया। तो इस प्रकार की भावना से आओगे तो आप भक्ति का पति में सफलता नहीं प्राप्त कर सकोगे। इसलिए बार बार संतो का कहना क्या है कि हमें क्या चीज की आवश्यकता है? जिस भाव से भक्ति वे जुड़े है और ये भाव कैसे अनुकूल होता है। भक्ति की विधियों का पालन करे तो लाज मनाज। हमें शिक्षा दे रहे हैं कि अगर हम ज्ञान को अनुकूल करें, यात्रा दूर हो जाएगी। जैसे अज्ञानता को दूर। आप कैसे करोगे या को कर सकते है किस के द्वारा, ध्यान के द्वारा, अंधेरा बन, दूर कैसे होता है। कृष्ण सूर्य सम माया, निकारा, कृष्णा थाने। जहाँ कृष्ण भक्ति होगी, वहां का प्रभाव नहीं रहेगा। जैसे आप जहाँ रोशनी हो वहाँ क्या देखते हो। अंधेरा ही मसूर होता है। तो हमें इस ज्ञान की आवश्यकता है। और अगर हम शासक के अनुसार इस ज्ञान का पालन करेंगे। बिना शंख के आप भक्ति योग में सफलता प्राप्त हो जायेंगे। तो देर हो हमें भक्ति भी जुड रहे और साधु सर्ग में रहोगे। तो क्या सुनोगे। rename maham hina हाय का नाम का नाम, स कल में भगवान अवतार होते है, कल भगवान अवतरित होते हैं। तो लाल राज का पूरा ज्ञान था। पर जब भी वो जब उन्होंने उस अजगर को देखा तो उन्होंने उनको प्रणाम किया, चरण धोए और उनसे क्या उनसे यह मांगा क्या भacतiकाjञanlo hirn hirnpanyeoekua gas der देख नही सकते। अंदर क्या है? वो ज्यादा है बहुत दूर दूर कुआ है। तो कुआ ढाका हुआ है। आप उस कुए के पास भी खड़े हो। तो आप जान सकोगे आप क्या करते हैं, घूम दें, सब जगह आनंद प्राप्त करने पर यह प्राप्त नहीं होता। तो असल में अगर आपको असली सुख चाहिए। तो क्या उपाय साधु शक में आकर असली ज्ञान को प्राप्त और साधु की क्या पहचान। saduecapecasadu can r og। शास्वोकानिर्णय और देर सोकर हमें भक्त की मांग। अब इर्शादे इशिया द्वेश से आप कैसे बचोगे, इर्शा हवाएं अनर्थ में गिने जाते हैं। और इस द्वेश क्यों रहता है? क्योंकि हम ये दिखाना चाहते हैं कि हम सबसे प्रसिद्ध भक्त हम हैं सबसे। और हम जब देखते हैं तो दूसरा भक्त भक्त में आगे बढ़ रहा है। तो क्या आता है? एशिया का बा, देश का भाव। और चेतन। बाप ने चेतन में कहा था, उन्होंने मोगल नीला की कथा सुन ली है। और भगवान ने क्या, जब भगवान गए मोगला जो उनकी मृत्यु होने वाली थी, उन्होंने हाथ रखा उनकी शादी का। जब तक द्वेश तुम्हारे हिरदे में रहेगा, जब भगवान तुम्हारे हृदय में नहीं निवास करेंगे, तो एशिया द्वे से कैसे बचा जाए? मुनी शिक्षा देते हैं। मुनी कहते हैं एशिया द्वे से बचोगे, अगर आपके हृदय में हर्षा का भाव निकले और वो है भक्तियों के पालन से। और जैसे की धन धन सब धन के पीछे है। सच बात आए तो सब धन के पीछे है। हमे नही कहते धन मत लाओ, धन लाओ। तो ये स्वीकार करो। धन के असली स्वामी कौन है? कौन है भोक्ता? सर्वलोक महेश। भगवान ने असली भोक्ता तो वो है असली पर हम सोचते हैं, यह हमारा परिश्रम है। तो ये जो लाभ प्राप्त हो रहा है, इसका सुख हमे ही अनुभव होना चाहिए। और अगर आप सोचो, ये जो धन
है,
इसकी असली स्वामी कौन है। इसलिए मेरा असली से क्या बनता है। इस धन का उपयोग करे वाली से आप में 1 कथा पढते हो। 1 वंदी ब्राहमण था बिहार में, जो बहुत धनी था, बहुत धनी, उस समय का सबसे बड़ा व्यापारी था, खेत। उसके बाद इतना धन थ तो वो 1 कौड़ी भी न खुद खरीदता था, न किसी और को देता था। तो क्या परिराम हुआ, क्या पर्दा सब दुश्मन बन गए। पत्नी बच्चे,
क्या फायदा
पैसा, a, a, a, a दुश्मन, पत्नी बच्चे और रिश्तेदार। सब ने कहा हमारे रिश्तेदार तो है, हमें 1 पैसा नहीं देता है क्या से क्या और जब धन हो तो शोर भी आपके दुश्मन बन जाते। चोर कभी गरीब घर में ज्यादा है, चोरी करने नहीं देता है। किस की बड़ी मोटर है, किसका बड़ा महान है। किस के बच्चे। तो जो धन हो व किसे में उपयोग नहीं कर रहे। तो आप के कई दुश्मन बन जाते हैं। तो सरकार कहती है हवाई सुंदर शासन के कारण, तुम इतने धनी बने हो, हमें कर 2 टैक्स लो। तो। तो आप टैक्स कंसल्टेंट रखते हो टैक्स बचाने के लिए। और सरकार टैक्स बना ऐसे बनाती है नहीं तो हर चारों तरफ से दुश्मन बन जाते हैं। अगर धन के द्वारा ये भाव नहीं हो, का असली मालिक कौन है? तो ये जो ब्राहमन बहुत धनी था, पर 1 साथ सारी संपत्ति उसकी समाप्त हो गई, रिशेदार मिलकर पत्नी के साथ उन्होंने सब लूट लिया, वो थोड़ा हिस्सा छोड़ में ले लिया, वो थोड़ा। ऐसा सरकार ने चने में कहा गया है। जब आप केवल धन हो, जिसको आप भगवान के सेवा में उपयोग नहीं कर रहे, पंद्रह प्रकार के शत्रु बन जाते हैं। आपके पंद्रह प्रकार के, सरकार के, हमें टैक्स 2 छोड़ के, हमें भी अपना हिस्सा चाहिए हो। तो जब ये सारा धन समाप्त हो गया, उसके पश्चात ब्रहमण शुरू मे तो बहुत शोक में था, अंदाजा लगा सकते हो। और धन है अपना घर ले। सभी साउथ अफ्रीका में राइट्स हुए हैं, अभी पानी बंद हुए कि नहीं में बनी चीजें स्वामी कह रहे थे सब भक्तों को भी बंदर खाली करके जाना पड़ा। क्यूंकि ये जो काले लोग थे, सबके घरों में जाकर थे। और धन वगैरा चुराए तो शुरू में शो में था। जबकि सारी संपत्ति समान शो से अगला कब क्या हुआ? त्याग की भावना हो और उसे यह समझ ले मेरा अटैचमेंट था। इतनी देर मेरी संपत्ति के प्रति प्रिय सम्पत्ति मेरे पास कहाँ है? आज से उपदेश दिया इस संपत्ति के पीछे भागोगे, वो भी अस्थाई है, केवल थोड़ी देर है। तो हमें यह स्वीकार करना चाहिए। असली धन क्या है? सी धन क्या है? क्या है असली धन? भगवान का नाम ये है। असली धन। हम ये नहीं कहते की आप नकली धन को मत छोड़ो। जैसे की अगर हमें सौ डॉलर देगा, हम ले लेंगे। बाबा जी कहते थे माया वाली सौरगर नोट देखता है। तो कहता है यह मिथ्या और जो है वो कैसा है उनको भगवान की सेवा में लगाना है। तो वंदिब्रामणशुरू में अत्यंत शोक में था। पर बाद में यह शोक बदल बदल गया किसमें वो का नाम न जा भी हो जाते थे। लोग कहते थे देखो ये साधु, उसका वैपार सब खत्म हो गया। तो साधु बन गया। पहले हमारे से बात हमारे पास आता, पर वो उसे इतना इतनी संतुष्ट प्राप्त थी। भगवान के नामों का उच्चारण करके वो बिल्कुल डिस्टर्ब, न फील किया। इसी प्रकार आप भागवत मे बहुत कथा पढ़ते हो। 1 वैश्या थी, पिंगला। पिंगला सारा दिन प्रयास करती थी, ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए। सो अपने घर के सामने उसे बनाने में बैठी हुई थी। और जो जो पुरुष वा से जाते थे, तो वो सोचती थी। ये अगला व्यक्ति सर मेरा गिराक बनेगा। तो इस प्रकार सारा दिन बीत गया और उसने देखा कोई गिराक नहीं बना। मेरा तो पिंगला शुरू में उसे क्या महसूस हुआ, बड़ी बेचैनी बेचैनी। फिर पिंगला ने हरे के नाम का उच्चारण शुरू किया, रे नाम का उचारण शुरू किया। जो शोक दुख था, सब समाप्त हो गया। वो संतुष्ट हो गई। तो आप अगर संतुष्ट रहना चाहते हो। आप अगर असली सुख चाहते हो तो क्या है? उपाय यह मत सोचो कि मान लो, वे मान लो। इस मगर गे नही। तो आपका कहने का मतलब है, सारी समस्याएं विश्व की नहीं, किसी और बहाने आ जा। तो यह है दुखानसारशदमकष्टकश और हर चीज। जो पायदान था, उसे यह शिक्षा दी। और मधुमखी का उदाहरण देते। 1 बार कई बार पढ़ते हैं। मधुमखी जो है, अगर कचरे का डब्बा हो और उसमें 1 फूल हो, मधु मक्खी वहाँ पहुँच जायेंगे। 1 फू फूल से 1 बूंद रस निकाले, पूरा कचरे का डब्बा है, उसको 1 फूल देखे ओर पहुच जायेगी, उसे उसका 1 बुल रस लेने। और जो बखी है, बहुत गंदी जगह है। और कि थोड़ा भी मल होगा, वहां पहुंच जाएगी। तो उसी प्रकार प्रॉपर्टी ने उदाहरण दिया था, हमें भक्तों के गुरु को देखना चाहिए, हमें हमेशा भक्तों के गुरु को देखना चाहिए। और गणों की बजाय जैसे की मधु के 1 फूल दिखे, उसे उस कचरे के डब्बे में वहां पहुंच जाएगी, फुल फुल को निकाल लेंगे, क्योंकि उस फूल में 1 गुण रस मिल जाए समझो। उसी प्रकार सब भक्तों में गुण है। अब गुण है हमारा प्रयास, हम 1 दूसरे के गुणों को और किस भाव से ना करे? क्या भाव होना चाहिए? अब रोज सुनते हैं, जब वे भूल जाते हैं तो इसलिए बकायदा सोने की आवश्यकता है। तो संक्षेप में आज के इस लोक में जो अजगर है, वो प्रलाद महराज को शिक्षा दे रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री क्या शिक्षा दी? कि असली शो क्या है, क्या है? त्यो? हमें इस दुर्लभ जीवन का उपयोग करना चाहिए किसलिए असली सुख ने नकली सुख लेने और असली सुख विषय में ज्ञान, गुरु, साधु और क्या जैसे साधु गुरु, भगवान की वाणी, भगवान की वाणी, हमें कौन बचायेगा? भगवान खुद थोड़ी साधु, आचार्य देश को स्वीकार करे, फिर आप असली सुख प्रात सुने। तो प्लान, आज आत्म ज्ञानी थे, पूरा विश्वास था उनका। भगवान की भक्ति में और कठिन स्थितियों का सामना किया उन्होंने? केवल भ में सफलता प्राप्त करने के लिए। तो जब आप कला, मनाजधुमहाजअमीशमराज, इन सब की कथा पढ़ते हो, तो आपको लगता है। आप बलका स्टैन हजारों में नहीं पहुंच सकते। तो कई बार कहोगे आप वहाँ तक नहीं पहुंच सकते। तो उसके। खुलने का पढ़ने का लाभ लिया। पर अगर आप सुनोगे ध्यान से और पढोगे तो क्या लाभ होगा आपका दिल भावना डिटरबननबढती जाएगा और फिर कैसे बढ़ेगा वैसे आपकी धार्मिक शक्ति भी बढ़ेगी। जैसे आपने क्षेत्र, क्षेत्र और भागवत में भगवान के भक्तों की लीलाओं को पढ़ते हैं। हर लीला के समाप्त में लिखा है जो कि ध्यान से यह लीला सुनेगा पड़ेगा, उसका भौतिक आकर्षण कम हो जाएगा। तो हमें भक्ति रस देने चाहे, शासन के संदेश में रूचि लेनी चाहि। इस प्रकार के जीवन को सफल बना है। kshnayeसय a question yes batei ldyजl्दydbykis the resin maike, itr hevipूछिएकॉनहeर ce के
भगवान
चाहिए, लेकिन जब द माने जाते है तो
ना पड़ता है और छू कर
भी देना पड़ता है तो इस केस में चेतना है, गिर जाती है और फिर मन नहीं लगता है क्या करना
अगर आप
भक्ति के निहवोकापालन करोगे, मोनिंग खाना रखोगे तो अच्छी संभावना है के दिन में आप माया से बच सकते हैं। 10 इस गारंटी, ये जो दवाई है, ये कोई बहुत समाज की नहीं है, ये दवाई आ रही है पर भगवान की दिवेधामसgarnti okewtrprsantequik bike is our working बायकिसरबोडके i m sorry i translate el कुछ न कुछ संघर्ष समस्या आती ही रहेगी, ये भूलना नहीं चाहिए। आप इस समय जेल खाने में हो, स्वतंत्र नहीं हो तो जेल खाने में कर्म के नुसान सुकर कोटा दिखाऊंगा यह हमें भुगतना ही पड़ेगा, ये जरूरी है। जब आप भक्ति में जुड़े हो तो आपकी सजा का कोटा कम हो जाता है। बाबा जी कहते थे सुप्रीम कोर्ट आपको 20 साल की सजा देता है, वो हाई कोर्ट घटा। तो हमें ये ह, हमें ये कठिनाई क्यों आ रही है उनका भक्त को सोचा, भगवान की कृपा से ये कष्ट बहुत छोटी मात्रा में अनुभव हो रहा है। hzargnaa बेकार
ना
हलाकि 2 संसार से निकालने के लिए, अध्यापन में भक्ति में आगे बढ़ने के लिए और ब्रह्मचार्य जीवन जीने के लिए की मैं अगर लक्ष्मी की जरुरत पड़ती है तो उसके लिए बुरी तरीके से ब्रमचरजीवनजीनेहै और अभ्यास जीवन में आगे बढ़ना है तो र्मी दिक्कत आ रही है तो के लिए और भक्ति में भी आगे बढ़ कर आगे बढ़ना है तो उसके लिए क्या क्या
ना हूँ राज लक्ष्मी चाहिए तो
आगे बढ़ना है। अगर हम जॉब नहीं करते हैं और
आगे बढ़ना चाहते है तो बढिए कौन रोक रहा है।
महाराज जी जैसे लक्ष्मी के कभी कभी
यह विश्वास रखो कि अगर आप ब्रह्माचारी के रूप में सेवा कर रहे हो, जो आवश्यक आवश्यकता है, आपकी उनकी पूरा पूरा देखा जाएगा। जैसे की आप यहाँ प्रसाद खाते हो, घर में, वे खाते हो, अंतर होगा। यहाँ के स्टैनेट में हुआ करे तो भक्त भक्त बन के आप किसी भी प्रकार से भूखा नही रहोगे, न दुखी और य अगर आप भगवान की शरणगत हो जाओ, भगवान तो करे तो हम हम निकलना नहीं चाहते है। इधर के क्वेशन कि ये
मेरा कोश महाराज की राय हमलोग हम प्रतिदिन बोल रात है,
लेकिन
लगता है करे बहु सेवा है तो हमारे अंदर तो नहीं।
अगर आप ईमानदारी से सेवा कर रहे हो, जितना आप कर सकते हो। भगवान इसके साक्षी है, भगवान खुश है। अब मान लो 6 घंटे जाओ भुकेशनेलिआपइतनी किताबों को नहीं बात पाओ जब भी, क्योंकि प्रयास किया 6 घंटे के लिए आपको 6 घंटे का पूरा आशीर्वाद मिलेगा थोड़ी, कुछ थोड़ी थोड़ी, कुछ सेवा में करोगे, उसका भी आपको लाभ मिलेगा। ओके। और कोई का प्रश्न यह है दीर्ध होना आवश्यक है, कमी है। तो ये जो भक्ति योग शिक्षा दी जाती है, वो उसी समस्या को हल करने के लिए है। भगवान संतों को पता है कि हम बिल्कुल भावना है zero इसलिए उन्होंने कहा सोदा बना करो 4 नियमों का पालन करो। मंगल से के टॉप
राजी की के साथ मेरा कि भौतिकवाद से बाहर निकलना है। और आध्यात्मिक तो हालांकि अगर हम आध्यात्मिक जीवन की जाएगी तो हमारा जो भारतीवाद में जैसे मेट्रो है, फोन है हम इसका इस्तेमाल कर पा रहे है तो इन चीजों का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे हम आध्यात्मिक जीवन। तो इस चीज को कैसे, इस चीज को हम कैसे कैसे हमारे परम गुरु
भक्ति सिधांत जी पहले महाचार्य थे, जो मोटर में भी बैठे हैं, उनसे पहले कोई गोडिया सन्यासी मोटर में नहीं बैठा था। रूप स्वामी जी ने हमें 1 सिद्धांत दिया है, जिसको हम कहते हैं युक्त बढ़ा गया असली बागा। जब आप हर सुविधा का उपयोग करो भगवान किसे हमारा सिद्धांत यह है कि हर प्रकार की सुविधा का उपयोग हो सकता है। भगव सेवा मे आप भौतिक शिक्षा प्राप्त करना चाहते हो, भौतिक धन चाहते हो भगवान। आज के शो के तार प्रेम में भगवान पाबूजी ने अर्जुन का उदाहरण दिया था कि अर्जुन ने भगवान के लिए युद्ध किया तो उसी प्रकार हमें हर कार्य का लक्ष्य होना चाहिए। an khushi okay would take one more question in insta observe the ones a
fi and the
asecortiitheresult site for how we soresaconfresess contes ofar sore contes proves
to
jaise ko soraon depetingnhwther is no role for speculation if wy exploring mein speculation, there is no room, because proper said, we dont have to speculate was the an all the research, we jesavetofollo once have as talking to propel avav selling of a resarch institute, because in india ivijunateerchinstit gas im tax benefit to prop said, why vetit research, we say here all the research, we just have to follow so, we have all the research donate and proper as some rise so just follow it okay so we stop here and you re making announcement yeah sositii⁇msorry you repeat your repeat please repite question जो कर की पर देख
रहे हैं, तो उसको कैसे रियेक्ट करता है?
what we dont support communal rites? because i understanding is we are all child in of the same father and everyone o co exist communal rit take place why, because there i denefingmuslim my them is better in hind my hermione, but they are not understanding and term krishna das to sell the lone so if you the the no communal rites chrishnaisinthe center, propeetoiranons and he to all the diodia people chain names the love problem, chain the names of god okaywildstop
is।
More from PRASAD

Rare Pastimes & Timeless Lessons of Guru Mahārāja | Stories Every Disciple Should Hear

ISKCON Legends- pure devotees meet-HH Jayapataka Swami, HH Gopal Krishna Goswami, HH Radhanath Swami

Jagannātha Ratha-yātrā Through Śrīla Prabhupāda's Mercy | 29 April 2006 | Nairobi, Kenya

Lord Jagannātha's Appearance Pastime | 21.07.2019 | ISKCON Calgary | Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

The Ācārya Teaches by His Own ExampleGuṇḍicā Mārjana by Guru Mahārāja #shorts

Guṇḍicā Mārjana – Lord Jagannātha's Pastime | 21.7.2019 | ISKCON Calgary |Śrīla Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī

H.H. Gopāla Kṛṣṇa Gosvāmī Mahārāja - Exemplary Sādhana and Deity Worship # shorts

भगवान की कृपा कैसे प्राप्त होगी ? | 11 Jan 2014 | Punjabi Bagh | Srila Gopal Krishna Goswami

Material Education vs Spiritual Education | Srila Gopal Krishna Goswami #shorts

