The Untold Story behind 12 Jyotirlingas | Art of Living

Transcript of a Hindi lecture/video narrating mythological stories, symbolism, and significance of several of the 12 Jyotirlingas (Shiva shrines) in India. Speakers recount origin myths (Sati–Daksha, Moon/Chandra curse), symbolic interpretations (intellect vs emotion, nadi system), and brief legends associated with specific Jyotirlingas such as Somnath, Mallikarjun, Mahakaleshwar, Omkareshwar, Kedarnath, Bhimashankar, Kashi Vishwanath, Trimbakeshwar and Vaidyanath/Viswanath (Bajna). The tone is devotional-expository.
Chapters
पुराणों की कथाओं के अनुसार ब्रह्मा जी के पुत्र दक्ष प्रजापति की 60 पुत्रियां थीं। उनमें से सती का विवाह भगवान शिव के साथ हुआ। दक्ष प्रजापति भगवान शिव को बहुत प्रिय नहीं मानते थे। 1 बार उन्होंने शिव जी को अपने यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया, पर सती उस यज्ञ में पहुंच गए। वे अपने पति का अपमान सह न सकी और यज्ञ की अग्नि में स समा गई। सती ने आत्मदाह कर लिया। ऐसा जानकर शिवजी को बहुत क्रोध आया। उनके गणों ने यज्ञ का विध्वंस कर डाला और दक्ष प्रजापति का सिर काट दिया। किसी तरह शिव जी को शांत किया गया और उन्होंने दक्ष को क्षमा कर उनके शरीर पर बकरे का सर लगाकर उन्हें जीवित कर दिया। गुरुदेव कहते हैं कि ये कथाएं सुनने में विचित्र लगती हैं, पर इनमें गहरा ज्ञान छिपा है। दक्ष का अर्थ है निपुर्ण और कुशल होना। दक्ष, बुद्धि और तर्क का प्रतीक है। इससे बिल्कुल विपरीत है। बकरा उसे जिस दिशा में भेजो चला जाता है, उसकी अपनी बुद्धि मानो है ही नहीं। जब सांसारिक बुद्धि का अनंत असीम आत्मा से साक्षात्कार होता है, तो उसका अपना अस्तित्व नहीं रहता। सांसारिक बुद्धि का अंत हो जाता है। फिर उसे प्रकृति जिस दिशा में ले जाए, वह चली जाती है। दक्ष की 27 पुत्रियों का विवाह चन्द्रमा के साथ किया गया। ये ही 27 नक्षत्र हैं, जिनमें चंद्रमा 11 दिन बिता कर पृथ्वी की परिक्रमा लगभग 1 महीने में पूरी करता है। दक्ष को न की पुत्रियों ने बताया कि चंद्रमा को उन सब में से रोहिणी अधिक प्रिय है। आश्चर्य की बात है कि ऐसा वैज्ञानिकों ने भी पाया है कि चंद्रमा दूसरे नक्षत्रों की अपेक्षा रोहिणी नक्षत्र के अधिक निकट होकर जाता है। दक्ष ने पक्षपात देखा तो क्रोध में चंद्रमा को शाप दे दिया, तुम्हारा तेज मिट जाए। शाप से ग्रसित चंद्रमा ने शिव जी की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। शिव जी ने कहा, तुम्हारा तेज तो कम होगा, पर कृष्ण पक्ष में घटते घटते अमावस्या तक। फिर शुक्ल पक्ष में धीरे धीरे बढ़ते बढ़ते पूर्णिमा तक, तुम्हारा तेज पूर्ण हो जाएगा। दक्ष तर्क और बुद्धि का प्रतीक है। चन्द्रमा भावनात्मक मन का प्रतीक है। तर्क और भावनाएं प्रायः विरोध में रहती हैं। हमारे मस्तिष्क के 2 भाग हैं। बायां तर्क प्रधान हैं और दया भावना प्रधान है। बुद्धिजीवी वैज्ञानिक, विश्लेषण करने वाले इनमें तर्क प्रबल है। कवि, गायक, नर्तक, कलाकार इनमें भावना प्रबल है। इन दोनों प्रकार के लोगों में आपस में कुछ न कुछ अनबन चलती ही रहती है। चंद्रमा ईड़ा नाडी से संबंधित हैं और दक्ष पिंगला से। शिव जी का संबंध सुषुम्ना नाडी से है, जो दोनों में संतुलन लाती है। शिव जी ने दक्ष को अपनी बुद्धि के अहंकार से मुक्त किया और चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया। पर पूर्ण चंद्र नहीं, अर्धचंद्र जीवन में तर्क का भी स्थान है और भावनाओं का भी। जिस स्थान पर चंद्रमा ने, जिनका नाम सोम भी है, अपने इष्ट शिव जी की आराधना की, उस तल का नाम हुआ सोमनाथ, जो 12, ज्योति लिंगों में प्रथम है। गुजरात में स्थित सोमनाथ मंदिर पर अनेकों बार आक्रमण हुआ पर ये आज भी करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। ये जीता जागता उदाहरण है कि हिंसा भले थोड़ी देर के लिए बलवान दिखाई दे, पर श्रद्धा में हिंसा से कहीं अधिक शक्ति है, भक्ति और प्रेम अविनाशी है, हमारे इतिहास में भी और हमारी चेतना में भी।
मलिकार्जुन ज्योतिर लिंग आंध्र प्रदेश में स्थित है, जहाँ स्वयं शिव और पार्वती ने निवास किया। इसकी कथा उस समय की है जब कार्तिक और गणेश के बीच श्रेष्ठता को लेकर प्रतिस्पर्धा हुई तो कार्ति के रुष्ट होकर दक्षिण की ओर चले गए। यह देख माता पार्वती अपने जेष्ठ पुत्र को ढूंढने निकल गयी। तभी भगवान भोलेनाथ से माता का दुःख देखा न गया और वो स्वयं उनके पीछे गए और वही उनके मिलन के स्थान पर मल्लिकार्जुन ज्योतिर लिंग प्रकट हुआ। यह ज्योतिर लिंग पुरुष और प्रकृति की एकता और प्रेम का प्रतीक है। महाकालेश्वर ज्योतिर लिंग। महाकालेश्वर ज्योतिर लिंग मध्य प्रदेश में स्थित है। यह भगवान शिव का संहारक स्वरूप हैं, जिन्हें महाकाल के रूप में पूजा जाता है। इस ज्योतिर लिंग की कथा राक्षस राज दूषण से जुड़ी है। जब उजैनी की धरती पर दूषण का अत्याचार मर्यादा और अधर्म की सारी सीमा लांघ रहा था, तब अपने भक्तों की रक्षा के लिए देवादि देव महादेव ने महाकाल के रूप में प्रकट होकर राक्षस दूषण का संहार किया। मान्यता है कि यह 1 मात्र ज्योतिर लिंग है, जहाँ शिव स्वयं प्रत्येक भस्म आरती में उपस्थित होते हैं। जो शिव की महिमा को जानता है, केवल वो ही जीवन के साथ साथ मृत्यु में भी शिव को पा सकता है और उसे मृत्यु का भय कभी नहीं सताता। यह ज्योतिर लिंग भगवान शिव के प्रति समर्पण और उनके द्वारा भक्तों की रक्षा का प्रतीक है। ओंकारेश्वर ज्योतिर लिंग ओंकारेश्वर ज्योतिर लिंग मध्य प्रदेश में स्थित है, जहाँ भगवान शिव नर्मदा के जल में स्वयं ओंकार रूप में स्थापित है। इस ज्योतिर लिंग की गाथा राजा मानधाता से जुड़ी है। जिन्होंने नर्मदा के किनारे इस पर्वत पर घोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और शिव जी के प्रकट होने पर उनसे यहीं निवास करने का वरदान मांग लिया। तभी से यह स्थान प्रसिद्ध तीर्थ नगरी ओंकार मान्धाता के रूप में पुकारे जाने लगे। यहाँ आदि शंकराचार्य ने गुरु गोविन्द भगवत्पाद से दीकशाली और अद्वैत वेदांत की स्थापना की। वर्तमान में इसे ओंकारेश्वर महादेव के नाम से पूजा जाता है। यह स्थान भगवान शिव के ओंकार स्वरूप की दिव्यता का प्रतीक है।
केदारनाथ ज्योतिर लिंग उत्तराखंड में स्थित है। यह ज्योतिर लिंग पर्वत राज हिमालय के केदार श्रृंग में उपस्थित है, जिसका जुड़ाव कई प्राचीन घटनाओं से माना जाता है। जिनमे से सबसे प्रथम है भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण ऋषि की कथा। उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उन्हें ज्योतिर लिंग के रूप में सदा केदार पर्वत पर वास करने का वचन दिया। इसके अलावा पंच केदार की कथा के अनुसार महाभारत के युद्ध के पश्चात भ्रात्री हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए पांडवों ने इसी केदार पर्वत पर महादेव शिव की आराधना की। उनकी भक्ति और द संकल्प देख कर भगवान प्रसन्न हुए और उन्हें त्रिकोण रूपी बैल के रूप में दर्शन दिया तथा उनको सभी पापों से मुक्ति कर उन्हें शमादान प्रदान किया। ये जोतल भगवान शिव की भक्तों के प्रति दया, करुणा और उनके तप का प्रतीक है।
भीमा शंकर ज्योतिर लिंग। भीमा शंकर ज्योतिरलिंग, महाराष्ट्र में स्थित है। कथाओं के अनुसार रावण के भाई कुंभकरण का पुत्र अपनी माँ राक्षसी कर्कटी के साथ सहयाद्री नामक पर्वत पर रहता था। श्री राम द्वारा रावण और कुंभकरण के अंत के पश्चात भीमा ने प्रतिशोध में आकर ब्रह्म देव की आराधना की और उनसे शक्ति प्राप्त कर मनुष्यों और देवताओं पर अत्याचार प्रारंभ कर दिया। त्रेता युग में राम राज्य के बाद उस पर अंकुश लगाने वाला कोई नहीं था। तब भगवान शिव शम्भु ने अपने भक्तों के उद्धार के लिए और लोक कल्याण के लिए भीमा नामक दैत्य का संहार किया। इस मंदिर के पास बहने वाली भीमा नदी महादेव की शक्ति का प्रतीक है। यह ज्योतिर लिंग शिव के अद्भुत पराक्रम और उनके भक्तों के प्रति प्रेम का संदेश देता है। काशी विश्वनाथ ज्योतिरलिंग काशी विश्वनाथ ज्योतिर लिंग, उत्तर प्रदेश में स्थित है। यह ज्योति लिंग और काशी नगरी दोनो ही माता पार्वती और भोलेनाथ के प्रेम का प्रतीक है। कहते हैं कि जब माता पार्वती 1 लंबे समय के अंतराल के पश्चात अपने पिता के घर से महादेव के पास लौट रही थी तो उनको भेट स्वरूप देने हेतु महादेव ने काशी नगरी का निर्माण किया और स्वयं को ज्योतिर लिंग के रूप में सदा के लिए वहाँ स्थापित कर दिया। शिव पुराण के अनुसार जब माता ने प्रथम बार नगरी में पाँव रखा तो उन्हें शांति और मोक्ष का अनुभव हुआ। तब स्वयं महादेव ने कहा कि जो काशी में अंतिम सांस लेगा, उसे अवश्य शांति और मोक्ष की प्राप्ति होगी। यह ज्योतिर लिंग ब्रह्माण की उर्जा का केंद्र है, जहाँ शिव विश्वनाथ के रूप में और शक्ति माता अन्नपूर्णा के रूप में सदा विद्यमान रहते हैं।
त्रम्बकेश्वर ज्योतिरलिंग त्रम्बकेश्वर ज्योतिरलिंग, महाराष्ट्र में स्थित है। प्राचीन काल में यह स्थान महाऋषि गौतम की तपोभूमि थी। इस स्थान पर गौतम ऋषि ने गौ हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान शिव का घोर तप किया। जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे वरदान मांगने को कहा। ऋषि गौतम ने भगवान से मानव कल्याण के लिए माता गंगा को धरती पर अवतरित होने का वरदान मांग लिया। तब देवी गंगा ने भगवान से आग्रह किया कि वो भी चोतिरलिंग स्वरूप में वहाँ वास क। बकेश्वर ने माता गंगा गोदावरी नदी के नाम से पूजी जाती है। यह स्थान भगवान शिव के त्रिनेत्र रूप और उनके ज्ञान स्वरूप को दर्शाता है। वैद्यनाथ चौतिरलिंगवैद्यना चौतिरलिंग, झारखंड में स्थित है। मान्यता है कि इसी स्थान पर रावण ने 9 बार अपना शीश काट कर भगवान शिव को अर्पित किया और उसकी भक्ति और तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे दशानन का नाम दिया। वरदान स्वरुप रावण ने स्वयं को महान शिव भक्त घोषित करने का आग्रह किया और साथ ही भोलेनाथ को अपने साथ लंका ले जाने की हठ की। तब भगवान ने भक्ति स्वरुप रावण को 1 शिवलिंग प्रदान किया और कहा कि रावण। तुम जहाँ भी इस शिवलिंग को स्थापित करोगे, वहीं ये ज्योतिर लिंग के रूप में सदा के लिए वास करेगा। पर भगवान शिव रावण के अहंकार से परिचित थे। उन्होंने अपने पुत्र गणेश जी को बैजू बालक के रूप में रावण के पास भेजा और तीव्र लघुशंका के कारण रावण शिवलिंग को बैजू के हाथ में सौंप कर चले गए। तभी बड़ी चतुराई से गणेश जी ने शिवलिंग को वहीं स्थापित कर दिया, जिस कारण इसका नाम बजना ज्योतिरलिंग पड़ा। यह ज्योति लिंग भगवान शिव के प्रति भक्ति और भगवान गणेश की बुद्धि का प्रतीक है।
नागेश्वर ज्योतिलिंग नागेश्वर ज्योतिलिंग, गुजरात में स्थित है। मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर में माता पार्वती और महादेव नाग नागिन के रूप में प्रकट होते हैं। इसीलिए इसे नागेश्वर ज्योतिर लिंग बुलाया जाता है। धार्मिक कथाओं के अनुसार राक्षसी दारूका ने माता पार्वती के वरदान का दूरुपयोग करते हुए संसार में अत्यधिक, उत्पात, मचाया और सुप्रिया नाम की शिव भक्त को बंदी बना लिया। तब सुप्रिया ने भगवान शिव से दारुका राक्षसी का अंत करने की प्रार्थना की। अपने भक्त के कष्ट को दूर करने के लिए भोलेनाथ ने रौद्र रूप लेकर सभी राक्षसों का संहार किया। इस ज्योतिर्लिंग के रूप में भगवान भक्तों के भय और रोग को हरते हैं और अपने भक्तों को काल सर्प दोष से भी मुक्ति प्रदान करते हैं। रामेश्वरम ज्योतिर लिंग रामेश्वरम ज्योतिरलिंग, तमिलनाडु में स्थित है। त्रेतायुग अर्थात राम युग की सभी कथाओं के अनुसार माता सीता को रावण से मुक्त करवाने के लिए प्रभु श्री राम ने लंका और रावण के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की थी। तभी सेतु बंधन से पूर्व श्री राम ने उस धर्म युद्ध की विजय हेतु समुद्र तट पर भगवान शिव की आराधना की और शिव लिंग स्थापित किया। वहीं महादेव शिव न प्रकट होकर इस ज्योतिर लिंग को रामेश्वरम का नाम दिया। यह ज्योतिर लिंग अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। घृष्णेश्वर ज्योतिर लिंग गृषणेश्वर ज्योतिर लिंग, महाराष्ट्र में स्थित है। ये कथा है शिव भक्त घोषणा की, जो बाल पंजी शिव की भक्ति में लीन रहती थी। बड़ी बहन द्वारा ईशा वर्ष अपने पुत्र की हत्या देखने के बाद भी उसका अपने आराध्य पर से विश्वास नहीं डगमगाया। तब भगवान ने स्वयं प्रकट होकर अपने भक्त के कष्ट हरे और उसके पुत्र को पुनः जीवनदान दिया। भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव जी ने उस वरदान देना चाहा। पर घोषणा ने शिव जी से प्रार्थना की कि वे लोक कल्याण के लिए इसी स्थान पर विराजमान हो जाए। इस प्रकार इसे कृष्णेश्वर ज्योतिर लिंग का नाम मिला। यह ज्योतिर लिंग भगवान शिव के प्रति परम, भक्ति और वैराग्य का प्रतीक है। भगवान शिव के 12 रूपों बारा लिंगों की ये कथाएं जो हमने अभी देखी। हमें यह सिखाती है कि सच्ची, भक्ति, श्रद्धा और समर्पण से जीवन की हर बाधा दूर की जा सकती है। कि शिव केवल ब्रह्माण की ईश्वर रूपी शक्ति नहीं, वो हम सबके परम पिता हैं, जो अपने भक्तों से, अपने बच्चों से अत्यंत प्रेम और स्नेह रखते हैं। आइये आज महाशिवरात्रि के इस महारात्रि पर हम सब महादेव की साधना और आराधना करें, उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को कृतार्थ करें।
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