Sandeep Sir traces how marketing evolved from listing features to selling benefits to adding emotions. The best approach, he argues, is the simplest: say what the product is, what problem it solves, the concrete benefit, and how the customer will feel. Skip the fluff.
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देखो मार्केटिंग में न समय अनुसार अपना रूप बदला है। तो 1 जमाना होता था जहाँ मार्केटिंग मतलब अपने प्रोडक्ट के आप फीचर्स बताओ, फिर 1 जमाना आया जहाँ पर आप अपने प्रोडक्ट के फीचर्स नहीं बेनिफिट्स बताते थे कि इससे फायदा क्या होगा और 1 ज़माना ऐसा भी है कि जहाँ पर आप फीचर्स बेनिफिट्स के साथ अटैच फीलिंग्स या इमोशंस की बातें करते हैं मुझे हमेशा सिम्पल और क्लियर मार्केटिंग अच्छी लगती है और मुझे लगता है कि वो सबसे ज्यादा इफेक्टिव है, आप क्या दे रहे हैं और इससे सामने वाले का क्या प्रोब्लम सॉल्व होगा, क्या फायदा होगा उसका और वो कैसा महसूस करेगा अगर ये बहुत सिंपल तरीके से आप सामने वाले को बता सकते हैं तो दैट इज, द, मोस्ट इफेक्टिव वे तो मार्केट प्रोडक्ट, सिंपल सीधी बात बाकी सब बकवास।