A Hindi coaching session on three levels of communication, focusing on how negative self-talk becomes automatic and undermines performance. Most people never learn to manage their internal dialogue, despite books on positive thinking. One client repeatedly told herself "I'm not able to do it" before presentations until she reframed her self-talk.
Chapters
न्यूरो लैंग्वेज टी प्रोग्राम लैंग्वेज में बताया मैंने बताया कि देर आर थ्री, लेवल सब कम्युनिकेशन, उसमें लेवल वन तो हम बहुत बार सीखते हैं लेकिन लेवल टू जो है वैन्यू कम्यूनिकेट वित, योर सेल्फ अनफॉर्चुनेटली वी हैव, नोट बीन डोड जब हम अपने आप से कम्युनिकेशन करते हैं तो वो टोन कैसा होना चाहिए, वो वर्ड्स कैसे होने चाहिए और लेवल थ्री कम्यूनिकेशन, लेवल थ्री वेन यू कम्यूनिकेट, व लेवल टू की अगर हम बात करें तो आपने ऐसी बहुत सारी बुक्स देखी होगी हाऊ टू इंफ्रेंस पीपल, हाऊ टू थिंक पॉजिटिव सेवन हैबिट्स ऑफ हाइली इफेक्टिव पीपल, क्या कभी आपने ऐसी बुक देखी हाऊ टू थिंग नेगेटिव why because its easy to think negative ऐक्चवली वी आर मास्टर ने हमें सीखने की जरूरत नहीं है, इसीलिए सी बुक मार्केट में नहीं तो 1 तो सेल्फ टॉक, हमें किसी ने सिखाया नहीं है, दूसरा सेल् टॉक इज नेचुरली, बायस नेगेटिव, ऑटो नेगेटिव, सेल्फ टॉक, हमेशा नेगेटिव आटोमेटिकली हो जाती है तो हमें काम करना है लेवल टू पे के, हम जो सेल्फ टॉक कर रहे हैं, अपने से जो बातचीत कर रहे हैं क्या वो नेगेटिव है जैसे की मैंने आपको ये एग्जाम्पल दिया प्रेजेंटेशन वाला तो वहां पे जो मेरे क्लाइंट थे वो अपने आप से सेल्फ टॉक, बार बार यही कर रहे थे i म नोट न आ, म नोट एबल टू डू इट।