A man describes his exhausting routine of early mornings and back-to-back client meetings, questioning how long he can sustain it. He wonders if there's purpose in the daily grind and yearns for something beyond the repetitive cycle.
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तो टाइम्स यू फीलिंग, कभी पैसा तो आ रहे हैं बट what, इस लाइफ क्या करेंगे मतलब अगर रोज रात को वो रोज रात को अगर 10 बजे, आयेंगे न ब्रेकिंग, पॉइंट व दर, न फाइन, डे, इट वाज मॉर्निंग, अराउंड थर्टी फॉर्टी फाइव, आई वाज ड्राइविंग तो र, माई ऑफिस एंड यू, नो प्रोफेशनल, कनवर्सेशन, स्टार्ट्स वो दिमाग में चलता रहता है कि भई आज क्लाइंट के वहां पर 9 बजे मीटिंग में जाना है। भले ऑफिस टाइम 10 बजे स्टार्ट होता है तो आप अपने आप को सवाल करते हो की यार आम डूइंग गुड ठीक है, लेकिन क्या मतलब वह कितने साल तक आप ऐसा करते रहोगे? राइट वो यहां 1 पैटर्न में हुई, जो पैटर्न में फंसे रहते हैं। कि सुबह साढ़े 6 बजे उठे फटाफट रेडी हुए, 8 बजे निकले साढ़े 8 बजे शिड्यूल कर दिया कि 1 मीटिंग करके 45 क्लाइंट से मिलने जाना है। एंड ऑफ द डे, इट इज आल फर्स्ट, शेटिंग, यू, आर, नौट, ग्रोइंग एज अ पर्सन।